Monday, November 10, 2014

५. मन का स्वाभाव कैसा है ? ६. मन स्वभावतः चंचल क्यों है ? ["मनःसंयोग " - लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ]

५. मन का स्वाभाव  
(अन्तर्जगत में मनोनिवेश करने की शिक्षा)
मन का स्वभाव अत्यन्त चंचल है। मन की गति भी प्रचण्ड है। अभी हमारा मन यहाँ है तो दुसरे ही क्षण धरती के दूसरे छोर पर चला गया, या सुदूर आकाश के किसी कोने में जा पहुँचा। हमारा यह मन शब्द ही नहीं प्रकाश की गति से भी अधिक वेगवान है। सभी दिशाओं से असंख्य सूचनाएं और संवाद पंचेन्द्रिय के माध्यम से मन हर क्षण प्राप्त करता रहता है, इसलिए यह सर्वदा विभिन्न प्रकार के विचारों, भावनाओ या कल्पनाओं के उधेड़-बुन में डूबा ही रहता है। यहाँ तक की कि स्वप्न में भी हमारा मन कितने ही प्रकार की वस्तुओं का निर्माण कर लेता है, देखता और आस्वादन करता है। 
मन की तुलना प्रायः किसी सरोवर से की जाती है। मंद गति के वायु प्रवाह से भी जैसे जल की सतह पर छोटी-छोटी लहरें या तरंगें उत्पन्न होती रहतीं हैं, उसी प्रकार जगत के नाना विषयों के संवादों से मन में भी सदैव विचार तरंगें उठती रहती हैं। हमारे शांत चित्त-सरोवर में पंचेंद्रियों के विषय रूपी ढेले गिरते रहते हैं, इसलिये विभिन्न वस्तुओं और घटनाओं के संवाद तरंगों से मन सदैव उद्वेलित ही बना रहता है। इन्द्रियाँ मन को सदैव बाह्य विषयों में खींचे रखती हैं,निरंतर ऐसा करते करते वह इसका अभ्यस्त हो गया है, इसीलिये विभिन्न वस्तुओं या विषयों की ओर हमेशा दौड़ते रहना मन का स्वभाव बन गया है। 
स्वामी विवेकानन्द ने मन के स्वभाव की व्याख्या बन्दर के एक रूपक के द्वारा समझाया है - " कहीं एक बन्दर था। वह स्वभावतः चंचल था, जैसे कि सभी बन्दर होते हैं। लेकिन उतने से संतुष्ट न हो, एक आदमी ने उसे काफ़ी शराब पिला दी। इससे वह और भी चंचल हो गया। इसके बाद उसे एक बिच्छू ने डंक मार दिया। तुम जानते हो, किसीको बिच्छू डंक मार दे, तो वह दिन भर इधर-उधर कितना तड़पता रहता है। सो उस प्रमत्त अवस्था के ऊपर बिच्छू का डंक ! इससे वह बन्दर बहुत अस्थिर हो गया। तत्पश्चात् मानो उसके दुःख की मात्रा को पूरी करने के लिए एक भूत उस पर सवार हो गया। यह सब मिलकर, सोचो, बन्दर कितना चंचल हो गया होगा। यह भाषा द्वारा व्यक्त करना असंभव है। 
बस, मनुष्य का मन उस बन्दर के सदृश है। मन तो स्वभावतः ही सतत चंचल है, फ़िर वह वासनारूप मदिरा से मत्त है, इससे उसकी अथिरता बढ़ गयी है। जब वासना आकर मन पर अधिकार कर लेती है, तब सुखी लोगों को देखने पर इर्ष्या-रूप बिच्छू उसे डंक मारता रहता है। (वह अतिरिक्त चंचल हो जाता है) उसके ऊपर भी जब अहंकाररूप भूत उसके ऊपर सवार हो जाता है, तब तो वह अपने आगे किसी को नहीं गिनता। ऐसी तो हमारे मन की अवस्था है ! सोचो तो, इसका संयम करना कितना कठिन है ! "(१: ८६)
मनुष्य का मन स्वभाव से ही चंचल बना रहता है। क्योंकि चित्त (मन-वस्तु) में कई प्रकार के विषय-संवाद रूपी ढेले गिरते रहते हैं, जो उसको सर्वदा तरंगायित किये रखते हैं। और मन सदैव क्या-है, वह क्या है -करता ही रहता है। फिर तरह तरह की वस्तुओं को देख-सुनकर, नाना प्रकार के भोगों की कामना-वासना उसे  मदिरा के जैसा नशे में धुत्त किये रखता है। फिर दूसरों के सुख-ऐश्वर्य को सहन न कर पाने से अकारण ही वह सर्वदा ईर्ष्या-द्वेष रूपी बिच्छू के डंक से छटपट करता रहता है। और इन सबके उपर अहंकार रूपी भूत (मैं क्या कम हूँ? दिखा दूंगा) सर्वदा उस पर सवार रहता है। जरा विचार तो करो, इस प्रकार के मन वाले मनुष्य की दशा कैसी होती होगी ! ऐसे मन को नियंत्रित करना कितना कठिन होगा ? 
 तथापि इसी मन की शक्ति से हमें समस्त कार्य करने होंगे, और सभी प्रकार के ज्ञान प्राप्त करने होंगे।साधारण ढंग से जीवन निर्वाह करने के लिये भी हमें मन की शक्ति की आवश्यकता होती है। फ़िर यदि हम अपने जीवन को सुंदर ढंग से गठित कर,अपने जीवन के द्वारा मनुष्यों का कल्याण करना हमारा उद्देश्य हो, तब तो मन की शक्ति की आवश्यकता कितनी और अधिक बढ़ जाती है। जीवन को सुंदर ढंग से गठित करने के लिये ज्ञान अर्जित करना होगा, पारदर्शी विचारण क्षमता की सहायता से अच्छा-बुरा अर्थात शाश्वत -नश्वर विवेक करके अपने जीवन-लक्ष्य निश्चित कर लेना होगा।
मन में केवल शिव-संकल्प अर्थात कल्याणकारी विचार भरने होंगे। 'पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय' ये सभी मन के गुण हैं, और सर्वोपरि है ह्रदय में रहने वाला प्रेम! [3P 'प्यूरिटी, पेशेंस, पर्सविरन्स + Love प्रेम] हम इन गुणों की उपेक्षा करके अपने जीवन को सार्थक नहीं बना सकते हैं। इन सदगुणों को धारण करने के लिये, पहले मन की चंचलता और अनुशासनहीनता को नियंत्रण में रखना अनिवार्य होगा। मन को शांत करना होगा,उसके ऊपर प्रभुत्व रखना होगा, उसको संयमित, धैर्यवान बनाकर लक्ष्य के ऊपर केन्द्रीभूत करना होगा, तभी तो जीवन को सुंदर रूप से गठित करके अपने निश्चित लक्ष्य -'मनुष्य बनो और बनाओ' की ले जा सकेंगे।  
किन्तु मन के स्वभाव के सम्बन्ध में जान लेने के बाद मन में थोड़ी हताशा उतपन्न हो जाती है, कि जब मन का स्वभाव इतना चंचल है तो हम कैसे उसे संयमित करेंगे, और मनःसंयोग करके जीवन लक्ष्य तक पहुँच पायेंगे? किन्तु हताश होने जैसी कोई बात नहीं है। कठिन होने पर भी मन को संयत करना सम्भव है। मन के सदैव चंचल बने रहने के कारणों को ठीक से समझ लेने पर, उसको पूरी तरह से अपने वश में रखने का उपाय भी सीखा जा सकता है। किन्तु मन के ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न नहीं करने से जीवन को सार्थक करना सम्भव नहीं होता। अतः मन को अपने वश में रखने की विधि या मनः संयोग की पद्धति को सीख कर उसका अभ्यास करने से ही, जीवन को सुंदर ढंग से गठित कर अपने जीवन को सार्थक और आनंदमय बनाया जा सकता है।
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मोहजनित मल : मनुष्य को स्वर्ण-मृग के पीछे दौड़ लगाते देखा जाता है, क्योंकि इसके मन के पीछे पुरुष (चेतना) की चिनगारी है, यद्दपि अधिक मात्रा में यह मल से युक्त है। जब कोई मनुष्य अपने बच्चों से से प्यार करता है, या कोई स्त्री अपने पति से प्यार करती है, तो उनको आकृष्ट करने वाली कौन सी शक्ति होती है ? वह उनके पीछे पुरुष का स्फुलिंग ही है। यह वहाँ विद्य्मान है, केवल वह 'मल' से आवेष्टित है। तुलसीदासजी महाराज विनय पत्रिका (८२) में कहते

मोहजनित मल लाग बिबिध बिधि कोटिहु जतन न जाई।
जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई।।

मोहसे उत्पन्न जो अनेक प्रकारका (पापरूपी कचरा ) मल लगा हुआ है, वह करोडों उपयोंसे भी नहीं छुटता। अनेक जन्मोंसे यह मन पापमें लगे रहनेका अभ्यासी हो रहा है, इसीलिये यह मल अधिकाधिक लिपटता ही चला जाता है।।
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६. मन स्वभावतः चंचल क्यों है ?
(विवेक-प्रयोग की क्षमता)
मन को दोष देते हुए कहा जाता है कि, यह मन बन्दर के समान चंचल है। किन्तु मनुष्यों का मन यदि चंचल नहीं होता, सर्वदा स्थिर ही रहता - तो उसे और कोई भी संज्ञा दी जा सकती थी, किन्तु मन नहीं कहा जा सकता था। जैसे कोई यह सोचे कि पारा यदि ठोस पदार्थ होता तो बहुत अच्छा होता। लेकिन अगर वैसा होता तो जितने भी थर्मामीटर, बैरोमीटर आदि यन्त्र बने हैं, उनका भी कोई अस्तित्व नहीं होता। पारा में यह गुण उसके आपेक्षिक गुरुत्व (स्पेसिफिक ग्रेविटी) तथा सांद्रता (विस्कोसिटी) के कारण ही विद्यमान रहता है। पारा में इन गुणों के रहने के कारण उससे जो कार्य किए जाते हैं वे अन्य किसी पदार्थ द्वारा संपन्न नहीं हो सकते थे।
उसी प्रकार मन के भी कई स्वाभाविक गुण हैं। वे गुण हैं, इसीलिये मन को मन जैसा उपयोग में लाया जा रहा है। क्योंकि 'मन' की संज्ञा वाला कोई बिल्कुल ठोस वस्तु यदि तुम्हारे सिर के किसी भाग में, या छाती के किसी भाग में प्रत्यारोपित कर दिया गया होता, तुम भी एक जड़ पदार्थ ही होते। क्योंकि मन के चंचल न होने से, तुम्हारे मन में कोई विचार भी नहीं उठता। तुम हानिकारक विचार तो क्या, कल्याणकारी चिंतन भी नहीं कर सकते थे। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही दूसरे प्रकार का हो गया होता। तुम्हारे मन में न तो कोई प्रश्न उठता, न ही तुम उन प्रश्नों के उत्तर पाने की चेष्टा करते। मन यदि सदा चंचल नहीं बना रहता तो, मन की शक्ति के द्वारा जितने कार्य किये जाते हैं (ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझना,हिग्स बोसॉन की खोज आदि कार्य), उन्हें करना भी सम्भव नहीं होता। मन कैसे कैसे अद्भुत कार्य नहीं कर लेता ? ***हमारा मन स्वभावतः चंचल है, तभी तो नित्य-नूतन वैज्ञानिक आविष्कार सम्भव हो रहे हैं।  (इतना ही नहीं चेष्टा करने पर वह अपने बनाने वाले को या ब्रह्म को भी जानने का सामर्थ्य रखता है!)
किन्तु जो मन स्वभावतः चंचल है, उस मन को यदि हमलोग नियंत्रित करना नहीं सीखें तो जिन आवश्यक कार्यों को मन की सहायता से ही करना पड़ता है,उन्हें करना सम्भव नहीं होगा। अति-सामर्थ्यवान् किन्तु उदण्ड मन रूपी भूत यदि हमें ही खाने के लिये दौड़े, अर्थात जिस मन को मेरे द्वारा शासित होना चाहिये,उल्टे मैं ही अगर मन के द्वारा चालित होने लगूँ, तब तो बिल्कुल अस्वाभाविक बात होगी। इसीलिये मन हमें कहीं खा ही नहीं डाले, अतः मन को अपने वश में रखने की विद्या (बाँस पर चढ़ो-उतरो-***) सीखनी होगी। मन का स्वाभाविक तौर से चंचल होना, बहुत अच्छी बात है।  
अतः चंचल होने से ही मन को दुष्ट या शैतान नहीं समझना चाहिये। यदि यथोचित रूप से हम उसे शासित नहीं कर सकेंगे, तभी वह हमारे साथ शत्रुओं के जैसा व्यवहार करेगा। चंचल होने का अर्थ है कि मन झूले के समान दोलायमान हो सकता है। मन का यह दोलन (oscillation या स्पंदन) अथवा इसकी बड़ी लहरों जैसी उठने-गिरने वाली (ज्वार-भाटा जैसी)  जो प्रकृति है, वही तो मन में विचारों के उठने का मूल कारण है। मन यदि दोलायमान नहीं हो पाता, तो इसमें विचारों का उठना ही सम्भव नहीं था। मनके अनवरत दोलायमान रहने के फलस्वरूप विचारों का प्रवाह भी अविच्छिन्न भाव से चलता रहता है। किन्तु मन यदि अपनी इच्छानुसार, मनमाने ढंग से दोलायमान या उद्वेलित होता रहे, तथा किसी भी तरह शासित न हो, यथाविधि संचालित न रहता हो, तो हमारी अवस्था भी उसी मदमस्त बन्दर के सामान हो जायेगी। और हममें से प्रत्येक व्यक्ति की वर्तमान अवस्था लगभग ऐसी ही है।   
चंचलता ही मन का धर्म है। मनःस्थिति कब कैसी है, यह बात समझ पाना हर समय सम्भव नहीं होता। फ़िर भी मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो मन कि समस्त चंचलता को शांत कर सकता है। जो अपने मन को जीत सकता है-वही विश्वविजयी है ! वही वीर है ! वही मनुष्य जैसा मनुष्य या मैन विथ कैपिटल 'एम' है। ऐसे मनुष्य से ही समाज और देश कुछ आशा रख सकता है, जिसने अपने मन को वशीभूत कर लिया हो वही समाज को सही नेतृत्व भी दे सकता है। 
सिर्फ़ मन ही क्यों, सब कुछ चंचल है, सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड ही असाधारण चंचलता का स्रोत (quarry) है। चंचलता से ही जगत की सृष्टि हुई है। किन्तु इस असाधारण चंचलता के मध्य रहते हुए भी मैं किसी प्रशांत निष्कम्प दीपक के समान अन्तःकरण का अधिकारी बन सकता हूँ। समस्त चंचलता के मध्य भी मैं (अपने यथार्थ स्वरुप को पहचान लेने के बाद) बिल्कुल शांत या स्थिर होकर रह सकता हूँ। यही मनुष्य की बहादुरी है ! यही मनुष्य की महिमा है ! इसी सामर्थ्य के कारण मनुष्य को 'मनुष्य' कहा जाता है। 

किन्तु जो लोग ऐसा कहते हैं कि मन के इस प्रकार सुख-भोग के नशे में धुत्त होकर पागलपन करने के साथ-साथ,मैं भी पागलों जैसा व्यव्हार करने लगूँगा चित्त की चंचल तरंगों में बह कर मैं भी चंचल हो जाऊँगा- हो सकता है कि इस प्रकार का क्षणिक सुख उन्हें कुछ दिन तक तो अच्छा लगे। किन्तु कुछ ही समय बाद असहनीय पीड़ा का अनुभव होगा। इसीलिये जो लोग विद्वान् (विवेक-वान) होते हैं, वे जगत के समस्त वस्तुओं की चंचलता,उन्माद या नर्तन को देखकर स्वयं ही नहीं नाचने लगते हैं । क्योंकि वे जानते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा ?  वे अच्छी तरह जानते हैं कि समस्त चंचलताओं के बीच भी शांत और स्थिर होकर कैसे रहा जा सकता है ! और जो लोग यह कर सकते हैं, उनके लिये वैसा कुछ रहता ही नहीं जिसे वे नहीं कर सकते ! अब यह पूरी तरह से हमारे विवेक पर ही निर्भर करता है कि इन विभिन्न संभावनाओं*** में  हम किस प्रकार के सुख का चयन करेंगे ?  एवं हमारी इसी विवेक-प्रयोग की क्षमता पर यह निर्भर करता है, कि हम भविष्य में किस प्रकार के मनुष्य बनेंगे ? तथा विवेकी और चरित्रवान मनुष्यों की संख्या पर ही निर्भर करता है, कि भविष्य में हमारा देश कैसा बनेगा, समाज कैसा बनेगा, (भारत विश्वगुरु बनेगा या नहीं )? 
[सुख-प्राप्ति की इच्छा सभी मनुष्यों में स्वाभाविक तौर पर पाई जाती है।  मनुष्य धन कमाने के लिए जितनी भाग-दौड़ करता है, चेष्टा और श्रम करता है उस सब के पीछे कारण केवल सुख पाने की इच्छा ही होती है. किन्तु मोहित या अचेत-मनुष्य (हिप्नोटाइज्ड-भेंड़) विवेक-विचार रहित होने के कारण गलत जगह में सुख की खोज करता है, और इन्द्रिय-विषयों से मिलने सुखों के पीछे दौड़ते हुए अपने जीवन को ही व्यर्थ में गँवा देता है।  आज का मनुष्य संसार के संसाधनों में सुख खोज रहा है. सुख की प्रत्याशा में ही वह कर्म करता है, वह आशा करता है की उसे सुख अवश्य मिलेगा, पर ऐसा होता नहीं है। ]
क्या हम इस बात की कल्पना भी कर सकते हैं कि हमारे देश में असंख्य मनुष्य आज भी ऐसे हैं, जिन्हें जी-तोड़ परिश्रम करने के बाद भी आधे-पेट खाकर, या भूखे ही सो जाना पड़ता है ? उन्हें अज्ञान के कितने घोर अंधकार में रहना पड़ता है ?*** [एक पूर्व प्रधान मंत्री ने तो स्वीकार भी किया था कि, आवंटित राशि का केवल १५% ही सही जगह पर खर्च होता है, शेष ८५% धन भ्रष्टाचार कि भेंट चढ़ जाता है। एक संस्कृत सूक्ति में सुख और दुःख इस प्रकार परिभाषित किया गया है- सर्वं परवशं दुखम सर्वमात्म्वषम सुखं - अर्थात दुसरे (मन) के बंधन में अधीन रहना दुःख है, जबकि आत्माधीन या स्वतंत्र रहना सुख है।]
यदि हम इन स्थितियों में परिवर्तन लाना चाहते हों, तो पाश्चात्य-संस्कृति के समस्त उन्माद और चंचलता के बीच भी स्वयं को स्थिर या अविचल रखने कि शिक्षा ग्रहण करनी पड़ेगी। मनःसंयोग करना पड़ेगा, मन की एकाग्रता (कान्सन्ट्रेशन ऑफ़ माइंड) को अर्जित करना पड़ेगा।  शांत और स्थिर मन से सब कुछ को देख कर, सब कुछ के अर्थ को समझ पाउँगा, देश की समस्त समस्याओं की जड़ (चरित्रवान मनुष्यों का आभाव) को देख सकूँगा। देश की समस्त समस्याओं का समाधान - चरित्र निर्माण ! 'Be and Make' हमारी आंखों के समक्ष स्पष्ट रूप उद्भासित हो जाएगा।आत्मश्रद्धा, आत्मविश्वास, भयशून्यता, त्याग और सेवापरायणता जैसे सदगुण ही तुमलोगों में उस चारित्रिक दृढ़ता से भर देगा, जिसके बल पर तुम वह संकल्प ले सकोगे कि मैं स्वयं को मन के उन्मादी एवं पागलपन कि तरंगो में बहने नहीं दूँगा; तथा बिना विवेक-प्रयोग किए कोई भी कार्य नहीं करूँगा। मन की क्षणिक दुर्बलताओं के आवेग से स्वयं को मुक्त कर लूँगा। अपनी अन्तर्निहित शक्ति (दिव्य-प्रेम) को प्रकट करूँगा, और अपने जीवन को सुंदर ढंग से गठित कर उसे मनुष्य के कल्याण में न्योछावर कर दूँगा। स्वभतः चंचल मन को अपने वश लाकर, उसे उपयोगी कार्यों में नियोजित करने की पद्धति सीखने से ही स्वयं में एवं विश्व में उल्लेखनीय परिवर्तन लाया जा सकता है। 
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 [ सुख की विभिन्न संभावनाओं*** आम विषयी लोग जिसे ( इन्द्रिय विषय भोगों को ) सुख समझते हैं, उसकी तुलना दाद-खाज से करते हुए आचार्य नरहरि ने कहा है-' कंडूयनेन यत कंडू सुखं तत किं भवेत सुखम । पाश्चादत्र महापीड़ा तथा वैषेयिकं सुखं ।।'अर्थात दाद-खाज खुजलाते समय जिस क्षणिक सुख का अनुभव होता है, क्या उसे सच्चा सुख समझना कोई बुद्धिमानी है ? खुजला देने के बाद वहाँ जिस प्रकार के तीव्र जलन का अनुभव होता है, इन्द्रिय-विषय भोगों से मिलने वाले सुख को भी वैसा ही समझना चाहिए.गीता (१८/३७-३९) में भगवान ने कहा है - " इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाला सुख प्रारम्भ में तो अमृत के समान मालूम पड़ता है, किन्तु (कंडू सुखं की भाँति) उसका परिणाम में  विष के समान होता है. इस प्रकार से प्राप्त होने वाले सुख को राजसिक सुख कहा गया है. अतिभोगी और विलासी लोगों को विवेकहीन होने के कारण (शराबियों आदि को) जिस सुख का अनुभव होता है,वह भोगने के प्रारंभ एवं परिणाम में भी मनुष्य को मोहित (अचेत) कर देता है, उसे तामसिक सुख कहा गया है. एवं जो सुख प्रारम्भ में तो कष्टकर प्रतीत होता है (प्रत्याहार का अभ्यास और वैराग्य ), किन्तु परिणाम में (परिपक्व ज्ञान-वैराग्य) अमृत जैसा प्रीतिकर लगता हो, उसे सात्विक सुख कहा जाता है.श्रेय (Good) अर्थात शाश्वत,और प्रेय (Pleasant)अर्थात नश्वर?
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, यह कहानी हिंदू, मुस्लमान, इसाई सभी धर्म के पुराणों में पायी जाती है। " सब प्रकार के शरीरों में मानव-शरीर ही श्रेष्ठतम है; मनुष्य ही श्रेष्ठतम जीव है. मनुष्य सब प्रकार के प्राणियों से-यहाँ तक कि देवादि से भी श्रेष्ठ है. मनुष्य से श्रेष्ठतर कोई और नहीं. देवताओं को भी ज्ञान-लाभ के लिए मनुष्य-देह धारण करनी पड़ती है. एकमात्र मनुष्य ही ज्ञान-लाभ का अधिकारी है, यहाँ तक कि देवता भी नहीं. यहूदी और मुसलमानों के मतानुसार, ईश्वर ने देवदूत और समुदय सृष्टियों के बाद मनुष्य की सृष्टि की. और मनुष्य के सृजन के बाद ईश्वर ने सभी देवदूतों को बुलाकर मनुष्य को प्रणाम और अभिनन्दन करने को कहा. इबलीस को छोड़ कर बाकि सब ने मनुष्य के आगे अपने सिर को झुकाया. अतएव ईश्वर ने इबलीस को अभिशाप दे दिया. इससे वह शैतान बन गया. " (१/५३) 
मन कैसे कैसे अद्भुत कार्य नहीं कर लेता ? ***श्रीमद्भागवत पुराण (११-९-२८) में इस बात के इस प्रकार वर्णन आता है- सृष्टि में जीवन का विकास क्रमिक रूप से हुआ है...
 सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्तया
वृक्षान्‌ सरीसृपपशून्‌ खगदंशमत्स्यान्‌।
तैस्तैर अतुष्टहृदय: पुरुषं विधाय
व्रह्मावलोकधिषणं
मुदमाप देव:॥

- अर्थात ब्रह्माण्ड की मूलभूत शक्ति ने (महत् तत्व) स्वयं को सृष्टि के रूप में क्रमविकसित किया ....और, इस क्रम में वृक्ष, सरीसृप-रेंग कर चलने वाले, पशु, पक्षी, डंक मारने वाले कीड़े-मकोड़े, मत्स्य आदि अनेक रूपों में सृजन हुआ। परन्तु ,उस सृजन से विधाता को सन्तुष्टि नहीं हुई, क्योंकि उन प्राणियों में उस परमचैतन्य की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो सकी थी। अत: अन्त में विधाता ने मनुष्य का निर्माण किया, उसकी चेतना इतनी विकसित थी कि वह उस मूल तत्व का साक्षात्कार कर सकता था;अर्थात जो अपने बनाने वाले को भी जान सकता था !और अपने इस रचना को देखकर ब्रह्म अत्यन्त प्रसन्न हो गये! (पुरुषं विधाय व्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवा !) मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है जो अपने बनाने वाले को भी जान सकता है ! 

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