Wednesday, October 29, 2014

१.'मनः संयोग'- एक परिचय' 'दी मदर बर्ड हैचिंग हर एग्स ' [ " मनःसंयोग " लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ] (1)

 (प्रथम संस्करण २५ दिसम्बर २००१ -द्वितीय संस्करण २५ दिसम्बर २०१४ )
'आवरण चित्र की व्याख्या '
इस पुस्तिका के आवरण पृष्ठ पर जो चित्र छपा है उसका विस्तृत विवरण रामकृष्ण मठ, नागपुर से प्रकाशित श्रीरामकृष्णवचनामृत के बीसवें संस्करण के प्रथम भाग परिच्छेद ९ में इस प्रकार मिलता है : दिन बृहस्पतिवार है, सावन शुक्ला दशमी, २४ अगस्त १८८२ ई. ……श्रीरामकृष्ण मास्टर से खड़े खड़े वार्तालाप कर रहे हैं, कभी बरामदे में टहल रहे हैं ।  
 श्रीरामकृष्ण :  " ह्रदय में सोना दबा पड़ा है। ह्रदय में ही ईश्वर हैं --यह समझ लेने के बाद सब कुछ छोड़कर व्याकुल हो उन्हें पुकारने की इच्छा होती है। किन्तु ह्रदय में क्या है ?-- इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिये कुछ साधना (मनःसंयोग) आवश्यक है। "
मास्टर : साधना क्या बराबर करते ही रहना चाहिये ?
श्रीरामकृष्ण परमहंस : नहीं, पहले कुछ कमर कसकर करनी चाहिये। फिर ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती। जब तक तरंग, आँधी, तूफान और नदी मोड़ से नौका जाती है तभी तक मल्लाह को मजबूती से पतवार पकड़नी पड़ती है; उतने से पार हो जाने पर नहीं। जब वह मोड़ से बाहर हो गया और अनुकूल हवा चली तब वह आराम से बैठा रहता है, पतवार में हाथ भर लगाये रहता है। फिर तो पाल टाँगने का बंदोबस्त करके आराम से चिलम भरता है । कामिनी और कांचन की आँधी, तूफान से निकल जाने पर शान्ति मिलती है ! 
 "अन्तश्चराणां मरुतां निरोधान्  निर्वातनिष्कम्पमिव प्रदीपम्  " ॥कुमारसम्भव ३.४८॥

योग के विघ्न :- " मन के स्थिर हुए बिना योग नहीं होता। संसार की हवा मनरूपी दीपशिखा को सदा ही चंचल किया करती है। वह शिखा यदि जरा भी न हिले तो योग की अवस्था हो जाती है।  कामिनी और कांचन योग के विघ्न हैं। वस्तुविचार करना चाहिये।  स्त्रियों के शरीर में क्या है ---रक्त, मांस, आतें, कृमि, मूत्र, विष्ठा --यही सब। उस शरीर पर प्यार  क्यों ?
" किसी किसी में योगियों के लक्षण दीखते हैं परन्तु उन लोगों को भी सावधानी से रहना चाहिये। कामिनी और कांचन ही योग में विघ्न डालते हैं। योगभ्रष्ट होकर साधक फिर संसार में आता है, - भोग की कुछ इच्छा रही होगी। इच्छा पूरी होने पर वह फिर ईश्वर की ओर जायेगा- फिर वही योग की अवस्था होगी। 
" तराजू में किसी ओर कुछ रख देने से नीचे की सुई और ऊपर की सुई दोनों बराबर नहीं रहतीं। नीचे की सुई मन है और ऊपर की सुई ईश्वर। नीचे की सुई का ऊपर की सुई से एक होना ही योग (मनःसंयोग) है। 
" त्याग (वैराग्य) के लिये मैं अपने में अपने में राजसी भाव भरता था। साध हुई थी कि जरी की पोशाक पहनूँगा, अँगूठी पहनूँगा, लम्बी नलीवाले हुक्के में तम्बाकू पिऊँगा।  जरी की पोशाक पहनी। ये लोग (मथुरबाबू) ले आये थे। कुछ देर बाद मन से कहा - यही शाल है, यही अँगूठी है, यही लम्बी नली वाले हुक्के में तम्बाकू पीना है। सब फेंक दिया, तब से फिर मन नहीं चला । " 
शाम हो रही है। कमरे के दक्षिण-पूर्व की ओर के बरामदे में द्वार के पास ही, अकेले में श्रीरामकृष्ण मणि से बातें कर रहे हैं। 
श्रीरामकृष्ण - " योगियों का मन सदा ईश्वर में लगा रहता है --सदा आत्मस्थ रहता है। शून्य दृष्टि, देखते ही उनकी अवस्था सूचित हो जाती है । समझ में आ जाता है, कि चिड़िया अण्डे को से रही है। सारा मन अण्डे ही की ओर है, ऊपर दृष्टि तो नाममात्र की है। अच्छा, ऐसा चित्र 'दी मदर बर्ड हैचिंग हर एग्स ' क्या मुझे दिखा सकते हो ? " 
मणि- जैसी आज्ञा। चेष्टा करूँगा, यदि कहीं मिल जाय।"


[ हिज आईज़ आर वाइड ओपन, विथ ऐन एमलेस लुक, लाइक दी आईज़ ऑफ़ दी मदर बर्ड हैचिंग हर एग्स. हर इन्टायर माइंड इज़ फिक्स्ड ऑन दी एग्स, ऐंड देयर इज़ अ वेकेंट लुक इन हर आईज.   'आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि।' (बृहदारण्यक उपनिषद /२२) इसका अर्थ यह है कि 'अरे मैत्रेयी, आत्मा के ज्ञान या दर्शन का होना सर्वथा सर्वदा वांछनीय है। उसके लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना होगा। ]
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 भूमिका  
( 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल' के अध्यक्ष श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय के द्वारा बंगला भाषा में लिखित पुस्तिका- ' मनः संयोग ' का हिन्दी भावानुवाद.)
'मनः संयोग ' अर्थात मन की एकाग्रता  इतना महत्वपूर्ण विषय है जिसको सीखे बिना कुछ भी कर पाना संभव नहीं है। केवल पढ़ाई-लिखाई व जीवन-गठन ही नहीं, बल्कि समाज और देश का कल्याण भी इसी पर निर्भर करता है। इतना महत्वपूर्ण विषय होने पर भी, जिनके लिये इसे सीखना अत्यन्त अनिवार्य है- उन छात्रों-युवाओं के पाठ्यक्रम में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है।
महामण्डल का ' उदेश्य ' है- ' भारत का कल्याण ' क्योंकि 'कृण्वन्तो विश्वं आर्यं' - विश्व को आर्य बनाने के पहले - ' कृण्वन्तो भारतं आर्यं ' भारत को भी आर्य बनना होगा; और इसका उपाय है-' चरित्र-निर्माण'! इसीलिये महामण्डल का आदर्श-वाक्य है - 'Be and Make' स्वयं आर्यं (चरित्रवान मनुष्य) बनो और साथ ही साथ दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो ! ' बनो और बनाओ ' - इसीको स्वामीजी कहते हैं- पशु मानव (दस्यु) को देव मानव (आर्य) में उन्नत करो ! पहले भारतवासियों को ' सुसंस्कृत ' या चरित्रवान मनुष्य में रूपान्तरित करो, ताकि वे ' पृथ्वी के समस्त मनुष्यों के मन पर शुभ-संस्कारों की छाप डाल कर उन्हें एक सभ्य मनुष्य में परिणत होने की पद्धति सीखा सकें ! 
अतः स्वाभाविक रूप से महामण्डल के 'मनुष्य निर्माण कार्यक्रम ' के अर्न्तगत, आर्य बनने और बनाने के लिये प्रत्येक भारतवासी को मनः संयोग अर्थात मन को एकाग्र करने की विधि को सीखना अनिवार्य है। इसीलिये महामण्डल द्वारा इसे सीखने की एक पद्धति निर्धारित की गई है। विगत सैंतालीस वर्षों से हमारा यह अनुभव रहा है कि जिन छात्रों-युवओं ने मन को एकाग्र करने की पद्धति को अपने दैनिन्दन जीवन में अपनाया है, उन्हें उसका आशातीत परिणाम मिला है। यह अब एक 'परीक्षित सत्य ' बन चुका है।
पाश्चात्य जगत्, मनोविज्ञान के क्षेत्र में अभी एक नवजात शिशु के समान है ; जबकि हमारे देश में यह विज्ञान अत्यन्त ही प्राचीन है। इसीलिये इस पुस्तिका को- वेद, उपनिषद, गीता, भागवत्, पातंजलि योग-सूत्र, एवं स्वामी विवेकानन्द के मनोविज्ञान विषयक असाधारण आविष्कारों के साथ-साथ पाश्चात्य मनोविज्ञान को भी दृष्टि में रखते हुये लिखा गया है। किन्तु कम उम्र के छात्र-छात्राओं की सुविधा के लिये, इसमे शास्त्रादि के नामों को उल्लिखित किये बिना, इसे अत्यन्त ही सरल भाषा में लिखा गया है। विद्यालय एवं महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं के साथ साथ जनसामान्य भी इससे लाभान्वित होंगे ऐसी हमारी आशा है। 
अध्यापक तथा अभिभावक गण छात्र-छात्राओं को यदि मनः संयोग की पद्धति का अनुसरण करने के लिये अनुप्रेरित करेंगे तो इससे, न केवल उनको अपने अध्यन में सफलता मिलेगी बल्कि देश का भी यथार्थ कल्याण होगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
- प्रकाशक 

[ मानवतावादी जर्मन दार्शनिक एवं मनोविश्लेषक एरिक  फ्रॉम (23 मार्च 1900 - 18 मार्च 1980) कहते हैं - " साइकोलॉजी कैन शो अस व्हाट मैन इज़ नॉट. इट कैन नॉट टेल अस व्हाट मैन, ईच वन ऑफ़ अस, इज़. दी सोल ऑफ़ मैन, दी यूनिक कोर ऑफ़ ईच इंडिविजुअल, कैन नेवर बी ग्रैस्पड ऐंड डिस्क्राईब्ड ऐडक्वट्ली." 
  " Psychology can show us what man is not. It cannot tell us what man, each one of us, is. The soul of man, the unique core of each individual, can never be grasped and described adequately." --Erich Fromm
" मनोविज्ञान हमें यह नहीं बता सकता कि मनुष्य - हम में से प्रत्येक व्यक्ति वस्तुतः क्या है ? वह यह तो बता सकता है कि मनुष्य क्या नहीं है । किन्तु यह  मनुष्य की आत्मा, प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग ह्रदय, उसका सत्व-  कभी बुद्धि के द्वारा समझा नहीं जा सकता और न ही उसे पर्याप्त रूप से भाषा में कभी वर्णित किया जा सकता है."  -- एरिक फ्रॉम
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१.'मनः संयोग- एक परिचय'
मनः संयोग किये बिना अर्थात मन को एकाग्र किये बिना, हम न तो किसी कार्य को अच्छी तरह कर सकते हैं, न किसी विषय का सम्यक ज्ञान ही अर्जित कर सकते हैं। किसी भी विषय का ज्ञान अर्जित करने के लिये तथा किसी भी कार्य को सुचारू ढंग से करने के लिये हमें उसके ऊपर अपने मन को एकाग्र करना ही पड़ता है। हमलोग यह अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी भी कार्य को मन लगा कर करने से वह कार्य अच्छी तरह सम्पन्न हो जाता है।
किन्तु जब हमे मनःसंयोग के बारे में कोई जानकारी नहीं थी तो क्या उस समय हम बिल्कुल निष्क्रिय थे और किसी भी विषय कि जानकारी हमे प्राप्त नहीं हो रही थी ? ऐसा नहीं है। हम सभी लोग हर समय कुछ न कुछ कर रहे हैं, और कुछ न कुछ ज्ञान भी अर्जित कर रहे हैं। किन्तु हम जिस कार्य पर और जिस विषय पर मन को तल्लीन करने में अर्थात मनःसंयोग करने में जितना अधिक सक्षम हुए हैं - वह कार्य उतना ही अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ है, तथा उस विषय को उतने ही अच्छे ढंग से जान सके हैं। फिर भी हमलोग मनःसंयोग की पद्धति सीखे बिना ही निरन्तर विभिन्न विषयों में मनःसंयोग करते रहते हैं।
लेकिन जब हमे ज्ञात हो जायगा कि मनः संयोग क्या है, तथा अपनी इच्छा और प्रयत्न द्वारा मन को किस प्रकार एकाग्र किया जाता है-उस पद्धति को यदि सीख लिया जाय तो हम अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी कार्य (कर्म) में इसका प्रयोग कर उसे अत्यन्त कौशल से सम्पन्न कर सकेंगे तथा कम समय में ही किसी भी विषय के ज्ञान को और अच्छी तरह से अर्जित कर लेंगे।
हमलोग लगातार जो कुछ भी कार्य करते रहते हैं- जैसे देखते या सुनते अथवा जो कुछ भी करते हैं, उसे करते समय उस कार्य में हमे अपने मन को संयुक्त करना ही पड़ता है। मन की सहायता के बिना, देखना-सुनना अथवा कुछ भी करना सम्भव नहीं है। कभी-कभी ऐसा होता है कि मेरे सामने से कोई चला गया, या किसी ने कुछ कहा तो वहीं होने पर भी मैं उसे देख या सुन नहीं पाता। ऐसा क्यों होता है ? 
ऐसा इसीलिये होता है कि देखने और सुनने की तरफ मेरा मन लगा ही नहीं था, उस समय मेरा मन कहीं  और लगा हुआ था। ऐसी स्थिति में कहना पड़ता है कि- 'क्षमा कीजियेगा, मैं थोड़ा अन्यमनस्क (Inattentive) हो गया था- मेरा मन कहीं और था इसीलिये आपको देख न सका या आपकी बात को ठीक से सुन न सका, क्या एक बार फ़िर से कहियेगा ? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि -देखने, सुनने  अथवा कोई कार्य करने, किसी विषय को जानने, अथवा किसी भी विषय का ज्ञान अर्जित करने के लिये उसके साथ मन को संयुक्त करना ही पड़ता है। जो व्यक्ति अपने मन को किसी कार्य या विषय पर जितना अधिक एकाग्र रखने में समर्थ होता है, उसके द्वारा इस प्रकार किया गया कोई भी कार्य उतना ही उत्कृष्ट श्रेणी का होता है। 
यह जो किसी विषय या कार्य में मन को लगाया जाता है, उसे क्या कहते हैं ? उसे ही मनोयोग करना अर्थात उस कार्य या विषय से मन का योग करना या संयुक्त करना कहते हैं।और जब यह मनोनिवेश अपनी आवश्यकता और इच्छा के अनुसार सम्यक रूप से और पूरी दक्षता के साथ सम्पन्न होने लगता है- तो उसे ही मनःसंयोग करना कहा जाता है। अब यह स्पष्ट हो गया कि ' मनः संयोग ' किसे कहते हैं और उसे क्यों किया जाता है! किसी प्रयोजनीय कार्य या ज्ञातव्य विषय में मन को भली-भांति संयुक्त रखने कि क्षमता को ही मनः संयोग कहते हैं। और जिस किसी कार्य में मनःसंयोग जितनी दक्षता के साथ किया जाता है, वह कार्य भी उतना ही अधिक उत्कृष्ट तथा सफल होता है। उसी प्रकार हम चाहे जिस विषय का भी ज्ञान अर्जित करना चाहते हों, उस विषय पर दक्षतापूर्वक मनःसंयोग करने से उस विषय का सम्पूर्ण ज्ञान भी अर्जित हो जाता है।
अतः किसी भी कार्य को सफलता पूर्वक सम्पन्न करने के लिये हम सर्वदा मनः संयोग कि पद्धति को व्यवहार में ला सकते हैं। मान लो कि हम पढ़ रहे हैं, पर उस समय हमारा मन पढ़ाई में अच्छी तरह से न लगा रहे (क्रिकेट के मैदान में चला जाय) तो पढ़ाई भी अच्छी तरह से नहीं हो सकती। किन्तु ज्ञातव्य विषय पर मन को एकाग्र रख कर पढ़ाई करने से, जिस विषय को पढ़ा जा रहा है, उसे उसे भली-भांति समझा जा सकता है तथा वह विषय याद भी जल्दी हो जाता है। अर्थात मन को पढ़ाई पर एकाग्र रख कर पढने से पढ़ाई सहजता से सम्पन्न हो जाती है। इतना ही नहीं, मन को एकाग्र रख कर पढ़ने से कम समय में ही अधिक पढ़ा जा सकता है। विषय को गहराई से समझा जा सकता है, और वह सभी याद रह जाता है।
इस तरह मनः संयोग सीखने से कई लाभ हो सकते हैं। मन कि चंचलता या अस्थिरता से सभी कार्यों में हानी होती है। कोई भी कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं हो सकता और समय भी व्यर्थ में नष्ट होता रहता है। जबकि मन को एकाग्र रख कर जो भी कार्य किया जाता है, वह कार्य चाहे जैसा भी क्यों न हो, अल्प समय में ही सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न हो जाता है। इसके बाद जो अतिरिक्त समय बचा रह जाता है, उसका सदुपयोग हम अध्यन में या अपनी इच्छानुसार किसी नए मनपसंद विषयों को सीखने या अन्य अच्छे कार्यों में कर सकते हैं।
अतः मनःसंयोग की पद्धति को सीख कर अपने दैनन्दिन जीवन में उसे व्यवहार में लाना सचमुच अत्यन्त बुद्धिमानी का कार्य है। इसके आभाव में सम्पूर्ण जीवन में नुकसान बढ़ता ही जाएगा। जबकि मन को एकाग्र रखना सीख लेने से दुनिया के सभी क्षेत्रों में लाभ का परिमाण उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाएगा। जीवन में सफलता सहज-साध्य हो जायेगी !

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Monday, October 6, 2014

' सम्पूर्ण विश्व के मानव-इतिहास में भारत वर्ष का अवदान'

स्वामीजी मैसूर के महाराज को २३ जून १८९४ को लिखित एक पत्र में कहते हैं-" दिस लाइफ इज शार्ट, दी वैनिटीज़ ऑफ़ दी वर्ल्ड आर  ट्रांजिएन्ट,बट दे अलोन लिव हु लिव फॉर अदर्स, दी रेस्ट आर मोर डेड दैन अलाइव !"
" हे राजन, यह जीवन क्षणस्थायी है, संसार के भोग-विलास की सामग्रियाँ भी क्षणभंगुर हैं। यथार्थ रूप से वे ही जीवित हैं जो दूसरों के लिये जीवन धारण करते हैं। (जैसे निर्विकल्प- समाधि में जाने के बाद भी ठाकुर की आज्ञां से स्वामीजी बटवृक्ष बन कर दूसरों को छाया देने के लिये जीवन धारण किये थे.) बाकी लोग तो मृत से भी अधम हैं ! "(२/३६८)

हम स्वयं देख सकते हैं- हजारों वर्षों से आज तक विश्व के समस्त देशों में जितने भी अवतारी महापुरुष, संत, या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन को मानव-जाति के कल्याण  के लिये न्योछावर कर दिया था, उनमें से सभी को काल का ग्रास बनना पड़ा था। अन्य लोगों की तरह उन सबकी मृत्यु भी अवश्य हुई है; किन्तु वे आज मर कर भी अमर हैं।  तथा उनके जीवन और सन्देश धरती पर करोड़ों मनुष्यों को आज भी उच्चतर जीवन के लिये अनुप्रेरित कर रहे हैं। और जो मनुष्य घोर स्वार्थी होकर केवल अपने लिये जीता है, उसकी तो गणना भी मनुष्यों में नहीं होती ! कहा गया है -'आहार निद्रा भय मैथुनं च.……… '  
श्रीरामकृष्ण कहा करते थे " जब लकड़ी का बड़ा भारी (गुरु) कुन्दा पानी पर बहता है तब उस पर चढ़कर कितने ही लोग आगे निकल जाते हैं, उनके वजन से वह डूबता नहीं। परन्तु सड़ियल लकड़ी (खोखला गुरु) पर एक कौआ भी बैठे तो वह डूब जाती है। इसी प्रकार जिस समय अवतार-महापुरुष आते हैं उस समय उनका आश्रय ग्रहण कर कितने लोग तर जाते हैं; परन्तु सिद्ध पुरुष (केवल अपनी मुक्ति चाहने वाला? ) काफी श्रम करके किसी तरह स्वयं तरता है। सिद्ध पुरुष कैसा होता है ? --जैसे किसी जगह पर कुआँ था, पर मिट्टी से पट गया था; सिद्ध पुरुष उसे फिर खोद निकालता है। सिद्ध पुरुष मुमुक्षुजनों को ही मुक्ति दे सकते हैं परन्तु अवतार प्रेम-भक्तिरहित शुष्क ह्रदय व्यक्तियों का भी उद्धार करते हैं । " सद्गुरु या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता युगों-युगों की अन्धकार-काराओं-ह्रदय को अन्तर के प्रकाश से आलोकित करने वाले प्रकाश-स्तम्भ हैं। नेता जगतगुरु बड़े दु:साहसी और विपरीत धारा के तैराक होते हैं। वे बड़े मरजीवड़े होते हैं। वे मृत्यु के मुख से अमरता की मणि " सर्वग्रासी प्रेम"  को जबरन निकालकर अपना  शीशमुकुट बना लेते हैं। 
" कोई मनुष्य सच्चा नेता केवल तभी बन सकता है, जब उसके हृदय में इसी प्रेमाग्नि का एक स्फुलिंग, इस प्रेम का एक छोटा सा अंश विद्यमान हो। जिसके हृदय में मानवमात्र के लिये ऐसा ही प्रेम नहीं छलकता हो, वह किसी भी व्यक्ति के जीवन -गठन या पूर्णत्व की दिशा में अग्रसर होने में कोई मार्गदर्शन नहीं दे सकता है। अतः लीडरशिप या नेतृत्व के इस  नूतन सिद्धान्त के आलोक में हमें भी अपने ह्रदय को ऐसे ही प्रेम से परिपूर्ण रखने के लिये निरंतर प्रयासरत रहना चाहिये ।  भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुध्द, ईसा मसीह, हजरत मोहम्मद, भगवान वेदव्यास, आचार्य शंकर, श्रीरामकृष्ण परमहंस, माँ सारदा देवी, स्वामी विवेकानन्द आदि मानवजाति के मार्गदर्शक ' नेता ' इसी प्रेम की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ मात्र थे। इन सभी नाम और रूपों में केवल प्रेम ही मूर्तमान हुआ है! ईश्वर प्रेमस्वरूप हैं इसीलिये विष्णुसहस्र नाम में भगवान का एक नाम ' नेता ' भी है। "
क्या हमलोग भी नेता नहीं बन सकते ? क्या हम उस प्रेम के छोटे से अंश को भी अपने ह्रदय में धारण नहीं कर सकते ? क्या हमलोग अपने संघ के अन्य कर्मियों के प्रति ; जो एक ही लक्ष्य ' मनुष्य बनो और दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता करो' आन्दोलन के सहकर्मी हैं, उनके साथ प्रेमपूर्ण संबन्ध स्थापित नहीं रख सकते ? क्या हम उन्हें इस अनित्य, दुःखपूर्ण संसार के विविध कष्टों, दारिद्र्य और बेवशी के दलदल से ऊपर नहीं उठा सकते ? निश्चय ही हमलोग ऐसा कर सकते हैं, और हमें ऐसा अवश्य करना चाहिये। हमलोगों को भी मानवजाति का एक ऐसा नेता अवश्य बनना चाहिये। ऐसा नेता बन जाने पर हमलोग कितनी धन्यता का अनुभव करेंगे!! इसी प्रकार के हजारों नेताओं की हमें आवश्यकता है।
  ( पूज्य नवनीदा लिखित पुस्तिका नेतृत्व का अर्थ एवं गुण -पेज ५-७ )  
अत: जीवन की सफलता के लिए इसी जीवन में सार्थकता तथा सुख और शान्ति की उपलब्धि के लिए हमें यथाशीघ्र अपने जीवन के लिए एक महान लक्ष्य निर्धारित कर लेना चाहिए। हमारा जीवन ऐसा हो जिसका लक्ष्य व्यक्तिगत स्वार्थ और सुखों से ऊपर उठकर समस्त संसार के कल्याण, उन्नति और सुख के लिए समर्पित हो। ऐसा उदात्त लक्ष्य व्यक्ति के हृदय का तत्काल विकास और विस्तार करना प्रारंभ कर देता है। मनुष्य अपने क्षुद्र स्वार्थ एवं संकुचित व्यक्तिगत इन्द्रिय सुखों से ऊपर उठकर जगत के हित, कल्याण और सुखों से स्वयं के हृदय को जोड़ने लगता है। दूसरे शब्दों में उसके हृदय का विस्तार होने लगता है। और जैसा कि स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि " विस्तार (हृदय का विस्तार-मानवमात्र के लिये प्रेम) ही जीवन है एवं संकोच (हृदय की क्षुद्रता) ही मृत्यु है। जो स्वार्थ देखता है, आराम अधिक चाहता है अथवा आलसी है, उसके लिए तो नरक में भी जगह नहीं है। " 
मानवजाति के मार्गदर्शक नेताओं का पूरा जीवन ही एक लम्बी प्रार्थना होती है। वह स्वयं के देखे को, आत्मसाक्षात्कार एवं अनुभव को ही प्रमाण मानता है। यह अनुभूति ही परम-आत्मा है। इस सूक्ष्म, ब्रह्माण्ड में जल-तत्तव की भाँति पूरित, ब्रह्मचेतना को स्वयं देखता भी है और सबको दिखाता भी है। उसका मार्ग अति कठिन है। दुर्गम ही नहीं, अगम है।
जिनका अपना खेल समाप्त हो चुका था, ऐसे अवतारवरिष्ठ भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंस जैसे जगतगुरु, (म्यूजिक डायरेक्टर- 'लेलो लेलो दुआऐं माँ -बाप की' बैक ग्रांउण्ड से गाना सुनाकर ) - १८ वर्ष के शिष्य नरेन्द्र नाथ दत्त जैसे 'लम्प ऑफ़ मिस्ट' को हाथ में लेकर ३० वर्ष की उम्र में जगतगुरु स्वामी विवेकानन्द में रूपान्तरित कर सकते हैं। ऐसे सद्गुरुओं को ही सम्पूर्ण मानवजाति का मार्ग दर्शक नेता - कहा जाता है।
 श्रीरामकृष्ण ने कहा था,  " शिव के अंश से जिसका जन्म होता है, वह ज्ञानी होता है; उसका मन हर समय 'ब्रह्म सत्य,जगत मिथ्या ' के बोध की ओर चला जाता है। विष्णु के अंश से जिसका जन्म होता है, उसमें प्रेम-भक्ति होती है।" किन्तु शंकराचार्य में विष्णु के प्रति भक्ति भी कम नहीं थी। ठाकुर यह भी कहते थे, कि " शंकराचार्य ने लोक-शिक्षा के लिये 'विद्या का मैं' रख लिया था। "
' विवेकानन्द दर्शनम् ' के रचनाकार परमपूज्य आचार्य देव श्रीनवनीहरण मुखोपाध्याय (हमारे भ्राता नवनी दा) अपनी प्रसिद्द पुस्तक "स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना" के "आचार्य शंकर के प्रसंग में" शीर्षक ६३ वें निबंध में कहते हैं- 
" ठाकुर ने कहा था - ' मैं ब्रह्म और माया, जीव और जगत-सबको लेकर चलता हूँ। पहले नेति नेति करने के समय जीव और जगत को छोड़ देना होता है। जिसका नित्य है, उसीकी लीला है। इसीलिये मैं नित्य और लीला दोनों को लेता हूँ। माया के बल पर विश्व-ब्रह्माण्ड को उड़ा देने के लिये नहीं कहता हूँ। ज्ञानी देखते हैं, कि सबकुछ स्वप्नवत है। भक्त सभी अवस्था को लेते हैं। उत्तम भक्त नित्य और लीला दोनों को लेता है। इसीलिये नित्य से उतर आने के बाद भी उनका सम्भोग कर सकता है।"
आचार्य शंकर ने जगत को व्यावहारिक सत्य कहा है। उनहोंने भी जगत को बिलकुल उड़ा नहीं दिया था। आचार्य शंकर कोई शुष्क हृदय मनुष्य नहीं थे इसका प्रमाण उनके द्वारा लिखित -गंगा-स्त्रोत्र,भवानी-स्त्रोत्र, शिव-स्त्रोत्र आदि में देखा जा सकता है। आचार्य शंकर के द्वारा रचित 'विष्णुषट्पदी ' नामक एक अभूतपूर्व स्त्रोत्र है, जिसमें विष्णु का वर्णन किया गया है। उसको पढने से समझ में आता है कि शंकर कितने हृदयवान व्यक्ति थे।
 
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अविनयमपनय विष्णो दमय मनः शमय विषयमृगतृष्णां ।
भूतदयां विस्तारय तारय संसारसागरतः ॥ १॥
" सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वं । 
सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥ ३॥

-हे विष्णु ! मेरे अविनय या अशिष्टता को दूर कर दो। मेरे अहंकार को चूर्ण करदो, मुझे अपने मन का दमन करने में सहायता करो। विषय-भोग रूपी मृगतृष्णा (मरीचिका)-उसमें सुख है, ऐसा मानकर, इस लौकिक सुखों में आनन्द है, इसीमे अर्थ है, ऐसा सोंच कर उसके पीछे दौड़ रहा हूँ। किन्तु उस उषर रेगिस्तान में जीवन का थोडा भी आनन्द नहीं मिलता, किन्तु वहीं पहुँच कर हमलोग अपने को खो देते हैं। इसीलिये प्रार्थना करते हैं कि इस प्रकार की विषय भोगों की मृगतृष्णा बिल्कुल दूर हो जाये। ऐसा केवल मन का दमन करने से ही संभव है। इसीलिये हे विष्णु ! मेरे मन को दमन करने में मेरी सहायता करें। 
किन्तु जब तक अहंकार है, तब तक मन का दमन नहीं किया जा सकता है। इसीलिये सर्वप्रथम मेरा अविनय, अर्थात विनयहीनता या अहंकार दूर करो। इसका, अहंकार दूर करने का -क्या उपाय है ? एकमात्र सभी भूतों पर दया का विस्तार करने से ही अहंकार दूर करना संभव होता है। 

इसी बात को ठाकुर देव कहते थे, " अपने लोगों को प्रेम करने का नाम माया है, सर्वभूतों  को प्रेम करने का नाम दया है। " हमारे समस्त शास्त्रों में चिरकाल से दया की प्रशंसा होती आ रही है। समस्त प्राणियों के प्रति दया,प्रेम, करुणा, सहानुभूति बढ़ाने का उपदेश दिया गया है। इसका फल क्या होगा ? यही, कि वैसा करने से ह्मलोग संसार से मुक्त हो जायेंगे, या जन्म-मृत्यु के हाथों से छुटकारा प्राप्त कर लेंगे। संसार-
सागर से उद्धार मिल जायेगा।
 बौद्ध धर्म के प्रभाव से हमलोगों का सनातन धर्म लगभग लुप्त होने के कागार तक पहुँच गया था। क्योंकि बौद्ध धर्म में वेद के उपर विश्वास करने की कोई बात नहीं थी। यहाँ तक कि स्वयं बुद्धदेव ने भी ईश्वर के बारे में कुछ नहीं कहा है। हालाँकि वे सचमुच नास्तिक थे या नहीं ? इस सम्बन्ध में संदेह की गुंजाईश है, और इसको लेकर बहुत मतभेद भी है। किन्तु सामान्य जनता- जिनमें तत्वज्ञ बनने की क्षमता नहीं थी, वे  उनके ईश्वर के सम्बन्ध में चुप्पी को गलत समझ लिया, और ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को खोने लगे। वेद पर विश्वास नहीं करने के कारण, वेद-वेदान्त में जो महान सत्य छुपे हुए थे, वे सब मनुष्य के जीवन से लूप्त होने लगे।
 बुद्धदेव ने जिस संन्यासी सम्प्रदाय की स्थापना की थी, उसमें कोई व्यक्ति संन्यास धारण करने का उचित या योग्य अधिकारी है या नहीं इसपर कोई विचार किये बिना ही, बिना परीक्षा के सभी को संन्यास दिया जाने लगा था। परिणाम स्वरूप संन्यास धर्म की अधोगति होने लगी, और क्रमशः संन्यास का आदर्श विकृत होकर अपभ्रष्ट हो गया था। बौद्ध संन्यासियों के जीवन में क्रमशः अराजकता का प्रवेश हो गया, एवं  संन्यासियों के जीवन में व्याप्त अराजकता को देखकर समाज भी कलुषित होने लगा। सम्पूर्ण भारतवर्ष के राष्ट्रीय चरित्र में क्रमशः क्षरण होने लगा। 
जबकि संन्यास का अर्थ होता है- स्वयं को स्वयं की मृत्यु की खबर देना।  जीवित अवस्था में भी इस तरह जीना जैसे यह रीर शरीर संसार के भोगों के प्रति मर चुका हो। जो भी व्यक्ति जीते जी इस मृत्यु (त्याग या संन्यास) में उतरेगा, वह अमृत को उपलब्ध होगा।
जब हमारे विवेक-जीवन (विवेक-अंजन) में यह शोक -समाचार छपता है कि [ ' धीरेन दा ' (७सितम्बर २०१४ को ) दिवंगत हो गये] अर्थात मर गये !  तो मौत से घबड़ाने वाले लोग कहते हैं हाय , बड़े अच्छे मनुष्य थे - बेचारे मर गये ? हमें यह खयाल ही नहीं आता, कि अपने मरने की खबर आई है !  किसी अंग्रेज कवि की पंक्ति है-  ' किसी को यह पूछने  लिये मत भेजो कि ' आज चर्च की घंटी किसके लिए बज रही है ? तुम्हारे लिए ही तो बज रही है। बिना पूछे ही जानो कि तुम्हारे लिए ही बजती है।’ हम मौत से बहुत घबराते हैं। हम मृतक को फूलों से ढककर मौत की भयावहता को कम करने की चेष्टा करते हैं। संन्यासी सदैव जानते हैं कि ' जो चर्च में घण्टी बज रही है, मेरे लिए ही बज रही है, वह जो रास्ते से लाश गुजर रही है, वह मेरी ही गुजर रही है।'
जब हमारा सनातन धर्म ऐसी दुरवस्था को प्राप्त हो रहा था - उस संकट के समय में धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिये आचार्य शंकर ने व्यास-सूत्र पर भाष्य की रचना किये, समस्त उपनिषदों पर (दस उपनिषद या मतभेद है की बारह उपनिषदों ) भाष्य की रचना किये। उसके भीतर जो कर्म में रूपायित करने की दृष्टि थी, जिसकी व्याख्या व्यासदेव ने गीता के माध्यम से की थी, उसके उपर भी असाधारण भाष्य की रचना की। इसप्रकार वेदान्त, ब्रह्मसूत्र, एवं गीता के बीच सुसामंजस्य स्थापित करके तत्व और जीवन के बीच स्थापित किये। ताकि अपने व्यावहारिक जीवन में भी उपयोगी तत्वों को ग्रहण करके भारत की उन्नति हो सके। नया संन्यासी सम्प्रदाय स्थापित किये, चार नये मठ स्थापित किये। 
पुनः अंग्रेजों की गुलामी और पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से जब भारत के नव-शिक्षित हिन्दू-समाज में इन मठों प्रति सम्मान में क्षरण होने लगा तो जगतगुरु श्रीरामकृष्ण -माँ सारदा और स्वामी विवेकानन्द ने उसी प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अनुरूप उन्हीं वेदान्त के तत्वों को जीवन में अपनाने के योग्य तथा नये ढंग से समाजोपयोगी बनाकर,अपने जीवन के माध्यम से हमलोगों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है।
यदि सम्पूर्ण विश्व के मानव-इतिहास में भारत वर्ष का अवदान , उसका दर्शन, उसकी संस्कृति, उसकी प्रगति, उसके उत्थान-पतन का इतिहास में भारत वर्ष के अवदान को याद रखने की बात हो, तो बहुत सी बातों को याद नहीं रखकर,केवल इन तीन सोपानों को याद रखने से काम हो जायेगा। वेदव्यास ने क्या किया था, आचार्य शंकर ने क्या किया था तथा ठाकुर-माँ-स्वामीजी ने अपने जीवन में क्या और कैसे किया था- इतना जान लेना ही भारत के सच्चे इतिहास को जानना है। सम्पूर्ण मानव सभ्यता के इतिहास में विकास की जीवनधारा को याद रखने के लिये यदि तीन चरणों में विभक्त करके देखा जाय, तो प्रथम सोपान पर व्यासदेव हैं, दूसरे सोपान पर आचार्य शंकर हैं, और तृतीय तथा अंतिम सोपान पर श्रीरामकृष्ण-माँ सारदा-स्वामी विवेकानन्द हैं। 
इन तीन सोपानों के माध्यम से भारतवर्ष के सामयिक पतन (इंडिया हिन्दूस्तान बनने ) और पुनः उसके पुनरुत्थान- भारत से भारतवर्ष बनने और बनाने का - एकमात्र उपाय स्वामीजी द्वारा प्रदत्त्त भारत निर्माण सूत्र " Be and Make " है - इस तथ्य को भलीभांति समझा जा सकता है। हमलोग यह जानते 
हैं कि प्राचीन युग में जब बहुत दीर्घ समय तक वर्नाक्यूलर स्क्रिप्ट या प्राकृत लिखित भाषा नहीं बनी थी, तो उस युग में गुरु-शिष्य परम्परा के अनुसार शिष्य किस प्रकार श्रुति के माध्यम से,अर्थात वेदमंत्रों को गुरुमुख से सुन सुन कर, मन ही मन याद रख लेते थे। और प्राचीन भारत में तथा वंश परम्परा (चतुर्वेदी -त्रिवेदी?) के अनुसार वेदों को इसी प्रकार संरक्षित रखा जाता था। महर्षि वेदव्यास ने बाद में उनको एकीकृत या संहित करके उसे चार भागों में विभक्त किया था। महर्षि व्यास त्रिकालज्ञ थे तथा उन्होंने दिव्य दृष्टि से देख कर जान लिया कि कलियुग में धर्म क्षीण हो जायेगा। धर्म के क्षीण होने के कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु हो जावेंगे। एक विशाल वेद का सांगोपांग अध्ययन उनके सामर्थ से बाहर हो जायेगा। इसीलिये महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें। व्यास जी ने उनका नाम रखा - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी वेद व्यास के नाम से विख्यात हुये।
 वेदों की बहुत सी साखायें हैं, जिनके पाठ्य-विधि में (Text) थोड़ा-बहुत अन्तर या विभिन्नता होती है। उसके बाद जब इनकी संख्या बहुत ज्यादा हो गयी, तो उसको याद रखना बहुत मुश्किल हो गया, सुसंहती (compactness) का अभाव दिखाई देने लगा-तब व्यासदेव ने उसको ठीक से सजाकर एकत्रित किया और उसको समान वर्ग में श्रेणीबद्ध कर दिया। पहले उनको तीन श्रेणी में विभाजित किया-ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा जो शेष रह गए उनको अथर्ववेद कहा गया। ऋगवेद में जितने भी मन्त्र या श्लोक हैं, वे काव्यमय हैं, उनको कविता के माध्यम व्यक्त किया गया है। यजुर्वेद मुख्यतः गद्य है। तथा सामवेद में मुख्यतः ऋग्वेद के मन्त्र हैं, जिनमें कुछ और मन्त्र जोड़ कर संगीतमय बनाया गया है। सामवेद गाया जाने वाला -ग्येय वेद है। 
 वेद को मुख्यतः तीन भागों में विभक्त क्या गया है, इसीलिये उसको 'त्रयी' कहा जाता है। वेद के सारांश को वेद से अलग करके -उसका नाम 'उपनिषत' दिया गया। चूँकि वेद का सारांश उसमें है, जिसे गुरु के मुख से सुन सुन कर याद रखना होता था, इसीलिये उसको 'श्रुति' कहा जाता है। फिर उनका भी प्रधान या सिर होने के कारण उपनिषदों को 'श्रुतिशिर' भी कहा जाता है। वेदों का विभाजन करने के बाद महर्षि वेदव्यास ने वेदान्त या उपनिषद के भीतर जो दर्शन है, उस दर्शन के मूल तत्वों को सूत्रबद्ध कर दिए। 'सूत्र' का अर्थ होता है, मूल और प्राथमिक तत्वों को छोटे छोटे शब्दों में अभिव्यक्त करना या संचित रखना। क्योंकि छोटे छोटे शब्दों को याद रखना अपेक्षाकृत सहज  होता है, और आवश्यकता पड़ने पर उसकी व्याख्या करने से, या उसके भाव की विवेचना करने से, सम्पूर्ण दर्शन समझ में आ सकता है। इसका नाम - व्याससूत्र, या 'ब्रह्मसूत्र' या 'शारीरकसूत्र' अथवा 'वेदान्तसूत्र'। वेदान्त सूत्र के प्रथम चार सूत्र अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। इन चारों को मिलाकर 'चतुःसूत्री' कहा जाता है।
किसी प्राचीन कवि ने कहा था- " वेदान्ती लोगों द्वारा लोक कल्याण के कर्मों में निरन्तर लगे रहना सम्भव नहीं होता - जो लोग ऐसा कहते हैं, इससे बढ़ कर और हास्यापद बात क्या हो सकती है ?"  वेदान्त किस प्रकार दैनन्दिन जीवन में उपयोगी हो सकता है, इसको वेदव्यास ने महाभारत की रचना करके दिखलाया है। विशेषरूप से महाभारत में उस स्थान पर जहाँ श्रीकृष्ण ने गीता कहा है। इसीलिये कहा गया है-
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दन:। पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।    
समस्त उपनिषद मानो गाय है, और गोपालनन्दन कृष्ण मानो दूध दुहने वाले हैं।वे मानो उपनिषदों का दोहन कर रहे हों, और पार्थ अर्थात अर्जुन मानो बछड़ा है। बछड़ा जब दूध खींचता है,तभी तो दूध दूहा जा सकता है। पार्थ बार बार जिज्ञासा करके, थोड़ा थोड़ा करके उपनिषदों से खींचे थे, इसीलिये वहाँ से गीतामृत रूपी असाधारण पौष्टिक दूध सम्पूर्ण मानवता को प्राप्त हुआ है। यह गीता ही व्यावहारिक वेदान्त है ! इस प्रकार वेद से उपनिषद बना है, उपनिषद से वेदान्तसूत्र बना है, और वेदान्त का जो व्यावहारिक पक्ष या प्रयोग-धर्मी वेदान्त है, वह है गीता। किन्तु ये समस्त कार्य व्यासदेव ने अकेले ही कर दिखाया था। इसीलिये सनातन धर्म, या दर्शन या मनुष्य जाति के लिये व्यासदेव का अवदान असाधारण है। इसीलिये व्यास को ' चिरजीवी विशालबुद्धि व्यास' कहा जाता है, उनकी कीर्ति ने उनको मानवता के समक्ष अमर बना दिया है।
एक अन्य दृष्टि से देखने पर, यदि यह विचार करें कि वास्तव में 'व्यास' किसको कहते हैं? किसी वृत्त के केन्द्र गुजरती हुई जो सरल रेखा परिधि को दोनों ओर स्पर्श करती है, उसे व्यास कहते है। अर्थात यदि किसी वृत्त का व्यास ज्ञात हो जाय, तो व्यास के सम्बन्ध में जुड़े रहने वाले को, इस पार और उस पार सम्पूर्ण का ज्ञान हो जाता है। इसलिये गीता के ध्यान मन्त्र में, जहाँ व्यासदेव की स्तुति की गयी है, वहाँ उनको 'विशालबुद्धि' कहा गया है।
व्यासदेव ने जो वेदान्त-सूत्र लिखा था, उसके बाद आचार्य शंकर उसके उपर भाष्य की रचना किये थे।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य कृत साधना पंचकं में कहा गया है-' वाक्यार्थश्च विचार्यताम श्रुतिशिर: पक्ष: स्माश्रीयताम।
{ साधना पंचकं 
गुरु: ब्रह्मा: गुरु: विष्णु: गुरु देवो महेश्वर: |
गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ||

 
[गुरु ही ब्रह्मा विष्णु महेश हैं.... गुरु ही ब्रह्म हैं इसलिये उस गुरु को प्रणाम ...]

वेदो नित्यम्धीयताम तदुदितं कर्म स्वनुष्ठियतम |
तेनेशस्य विधीयतामपचिती: काम्ये मतिस्त्यज्यताम ||
पापौघ: परिभूयताम भवसुखे दोषो अनुसंधीयता |
मात्मेछा व्यव्सीयताम निजगृहातूर्णम विनिर्गाम्यताम ||१||


[हम नित्य स्वाध्याय करें, अर्थात विवेकानन्द साहित्य के कम से कम एक चैप्टर को अवश्य पढ़ें, यही युवाओं  लिये वेद-अध्यन है। तथा वेद आधारित रीति से कर्मकाण्ड और देवताओं का पूजन करें, का अर्थ है - अच्छी आदतों का निर्माण करके अपना चरित्र गढ़ें (Be) और ' शिव ज्ञान से जीव सेवा ' करें अर्थात दूसरों को भी मनुष्य बनने के लिये प्रेरित करें (Make)' Be and Make ' को ही ' कर्म और उपासना ' एक साथ करें । हमारे कर्म अनासक्त भाव से हो और हमें पाप समूहों से दूर ले जाने वाले हो,-अर्थात नाम-यश पाने की इच्छा से कुछ न करें। हम अपने जीवन में निरंतर विवेक-प्रयोग करके अपनी गलतियो को जान सकें, आत्म-ज्ञान प्राप्त करें और मुक्ति की ओर बढें]

संग: सत्सु विधीयताम भगवतो भक्तिदृढा धीयताम |
शान्त्यादि: परिचीय्ताम दृढतरं कर्माशु सन्त्यज्यताम ||
सिद्विद्वानुपसर्प्याताम प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यताम |
ब्रह्मैकाक्षरमथर्यताम श्रुतिशिरोवाक्यम स्माकर्न्याताम ||२||


[ हम अच्छे संग में रहे (१. नियमित पाठ -चक्र में जाएँ ) , ठाकुर -माँ -स्वामीजी के प्रति दृढ भक्ति प्राप्त करें, हम शान्ति जैसी मन की अवस्था को जान सकें, हम कठिन परिश्रम करें (२. नियमित व्यायाम और यम-नियम का पालन करते रहें ), सद्गुरु (स्वामी विवेकानन्द स्वरूप किसी आदर्श ) के समीप जाकर आत्म समर्पण करें (३. विवेक-प्रयोग ) और उनकी चरण पादुका का नित्य पूजन करें, हम एकाक्षर ब्रह्म-(ॐ के साकार रूप) का ध्यान करें (४. श्रीरामकृष्ण के चित्र पर मन को प्रतिदिन दो बार एकाग्र करें मनःसंयोग का अभ्यास प्रातः सायं करें) और वेदों की ऋचाएं सुनें.(५. नित्य प्रातः जगत के कल्याण की प्रार्थना करें ।]

वाक्यार्थश्च विचार्यताम श्रुतिशिर: पक्ष: स्माश्रीयताम |
दुस्तर्कात्सुविरम्यताम श्रुतिमतर्कात्सो अनुसंधीयताम ||
ब्रह्मैवास्मि विभाव्यताम हरहर्गर्व: परित्ज्यताम |
देहे अहम्मतिरुज्झ्यताम बेधजनैर्वाद: परित्ज्यताम ||३||


[हम महावाक्यों और श्रुतियो को समझ सकें, हम कुतर्को में ना उलझें, "में ब्रह्म हूँ" (I am He) ऐसा विचार करें, हम अभिमान से प्रतिदिन दूर रहे, "में देह हूँ" ऐसे विचार का त्याग कर सकें और हम विद्वान बुद्धिजनों से कुतर्क न करें... ]

क्षुद्व्याधि:च चिकित्स्य्ताम प्रतिदिनं भिक्षोषधम भुज्यताम |
स्वाद्वन्नम न तु याच्यताम विधिवशातप्राप्तेन संतुश्यताम ||
शीतोष्नादि विषह्यताम न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यता |
मौदासीन्यमभिपस्यताम जनकृपा नैष्ठुर्यमुत्सृज्यताम ||४||


[ हम भूख पर नियंत्रण पा सकें और भिक्षा का अन्न ग्रहण करें (संन्यास की नियमानुसार-गृहस्थ हों तो ? वर्ष में कम से कम एकबार चंदा मांगकर आयोजित होने वाले युवप्रशिक्षण शिविर का अन्न खायें ), स्वादिष्ट अन्न की कामना न करें और जो कुछ भी प्रारब्ध वशात हमें प्राप्त हो उसी में संतुष्ट रहे,म शीत और उष्ण को सहन कर सकें, हम वृथा वाक्य न कहें, सहनशीलता हमें पसंद हो किन्तु हम दयनीय बनकर न निकलें... ]

एकान्ते सुखमास्यताम परतरे चेत: समाधीयताम |
पूर्णात्मा सुस्मीक्ष्यताम जगदिदम तद्बाधितम दृश्यताम ||
प्राक कर्म प्रविलाप्यताम चितिब्लान्नाप्युत्तरै: श्लिष्यताम |
प्रारब्धम त्विह भुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थियाताम ||५||
 
[ हम एकांत सुख में (निर्जन शिविर में ) बैठ सकें और आत्मा के परम सत्य (ब्रह्म श्रीरामकृष्ण) पर मन को केन्द्रित कर सकें, हम समस्त जगत को सत्य (माँ सारदा और श्रीरामकृष्ण ) से परिपूर्ण देख सकें, हम पूर्व कृत बुरे कर्मो के प्रभाव को नष्ट कर सकें और नवीन कर्मो से न बंधे(चरित्र-निर्माण मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा को प्राप्त करें, हम इस निष्कर्ष पर यथाशीघ्र पहुंचें कि - ' After all this world is series of pictures.' यह जगत तो चलचित्र या टीवी सीरियल में दिखने वाले रंगीन छाया-चित्रों की एक श्रृंखला मात्र है ! यहाँ सब कुछ प्रारब्धानुसार हो रहा है; और हम परम सत्य (ठाकुर) के साथ रहें... ]

य: श्लोकपंचक्मिदम पठते मनुष्य: संचितयत्यनुदिनम स्थिरतामुपेत्य |
तस्याशु संसृतिद्वानल तीव्र घोर ताप: प्रशांतिमुप्याति चिति प्रसादात ||


[ जो मनुष्य इस पंचक के श्लोको का पाठ नित्य करता है, वह जीवन में स्थिरता (संतुलन) को अर्जित और संचित करता है... इस तपस्या से प्राप्त प्रशांति के फलस्वरुप जीवन के समस्त घोर दुख शोकादि के ताप उसके लिए प्रभाव हीन हो जाते हैं..(वह सभी घटनाओं को फ़ास्ट-फॉरवर्ड मोड में डालकर उसका साक्षी बन सकता है ।) ]  
अतः महर्षि व्यास और श्रीरामकृष्ण-माँ सारदा-स्वामी विवेकानन्द रूपी बेलपत्र तीन पत्तों में एक को ही देखने  दृष्टि प्रदान करने वाले, इनके बीच की कड़ी आचार्य शङ्कर का महत्व और अधिक बढ़ जाता है! इसीलिये तो कहा गया है- 
 "शङ्करः शङ्करः साक्षात् व्यासो नारायणः स्वयम् । 
 
आचार्य शंकर साक्षात् शिव हैं, शिवजी का अवतार हैं -आचार्य शंकर; उन्होंने मनुष्य के कल्याण के लिये शरीर धारण किया था, ऐसा कहा जाता है। इन्होंने सन्यासी शिष्य भी बनाये थे और गार्हस्थ सम्प्रदाय में गाणपत्‍य, सौर, शैव, शाक्‍त और वैष्‍णव संप्रदाय इत्यादि छः संप्रदाय बनाये थे। इस प्रकार उन्होंने साधारण लौकिक धर्म को बिल्कुल उठा ही दिया हो, ऐसी बात नहीं है। इस ओर भी उनका ध्यान समानरूप से था, इससे यह सिद्ध होता है कि शंकराचार्य एक महान समन्वयवादी थे; ये कार्य ही उन्हें 'जगदगुरु' पद पर प्रतिष्ठित करते हैं।
आद्य जगद्‍गुरु शंकराचार्य ने वैदिक धर्म या सनातन धर्म को पुनर्स्थापित करने का भरपूर प्रयास किया। आचार्य शंकर ने हिंदुओं को यह समझाया कि तुम्हारा धर्म वैदिक धर्म या वेदान्त है।  इस धर्म का ससंस्थापक कोई व्यक्ति या मनुष्य नहीं है; इसलिये इसे सनातन धर्म कहा जाता है। भगवान बुद्ध भी सनातन अवतारों में एक अवतार हैं, और भविष्य में ऐसे कई अवतार आविर्भूत होंगे। अतः बौद्ध भी प्रकारान्तर से हिन्दू ही हैं ! जैसे भारत में रहने वाले सभी लोग चाहें तो स्वयं को हिन्दू या बौद्ध कह सकते हैं। क्योंकि हिन्दू शब्द भारतीय (या Indian) होने का ही पर्याय है। 
अतः उन्होंने सभी जातियों को इकट्ठा करके’दसनामी संप्रदाय’बनाया और साधु समाज की अनादिकाल से चली आ रही धारा को पुनर्जीवित कर चार धाम की चार पीठ का गठन किया जिस पर चार शंकराचार्यों की परम्परा की शुरुआत हुई।
शंकराचार्य का जन्म केरल के मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण के यहाँ हुआ। मात्र बत्तीस वर्ष की उम्र में वे निर्वाण प्राप्त कर ब्रह्मलोक चले गए। इस छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने भारतभर का भ्रमण कर हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार मठों ही स्थापना की।  चार मठ के शंकराचार्य ही हिंदुओं के केंद्रिय आचार्य माने जाते हैं,  इन्हीं के अधिन अन्य कई मठ हैं। चार प्रमुख मठ निम्न हैं:-
1. वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)।
2. गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)
3. शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)
4. ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)
**  किन्तु जगतगुरु श्रीरामकृष्ण  के आविर्भूत होने के पश्चात् , सम्पूर्ण विश्व आज एक ' ग्लोबल विलेज ' बन चूका है , और भारत की गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित वेदान्त का ज्ञान प्राप्त करने  हेतु  किसी भी सम्प्रदाय या देश के  आत्मजिज्ञासुओं के लिये भारत आकर ' स्पिरिचुअल नॉलेज' (आध्यत्मिक ज्ञान ) प्राप्त करना सहज हो गया है। इसी सम्भाव्यता को ऋषि दृष्टि से देखकर जगतगुरु स्वामी विवेकानन्द ने अपने अंग्रेज (ईसाई) शिष्य  कैप्टन जेम्स हेनरी सेवियर और उनकी पत्नी श्रीमती सी ई सेवियर को हिमालय में एक 'वेदान्त मठ ' स्थापित करने के लिये अनुप्रेरित किया था। उन्हीं की प्रेरणा से उनके अंग्रेज सेवियर दम्पति-शिष्य ने (गृहस्थ होकर भी) अद्वैत आश्रम, मायावती को उनके एक संन्यासी शिष्य स्वामी स्वरूपानंद के साथ मिलकर १९ मार्च १८९९ को प्रतिष्ठित कर दिखाया था। 
समुद्र तट से ६४०० फीट ऊंचाई पर टनकपुर रेलवे स्टेशन से ८८ किमी तथा काठगोदाम रेलवे स्टेशन से १६७ किमी दूर चम्पावत जिले के अंतर्गत लोहाघाट नामक स्थान से उत्तर पश्चिम जंगल में ९ किमी पर है, देवदार, चीड़, बांज व बुरांश की सघन वनराजि के बीच अदभुत नैसर्गिक सौन्दर्य के मध्य मणि के समान अद्वैत आश्रम, मायावती स्थित है।
सन् १९०१ में कैप्टन जेम्स हेनरी सेवियर के देहांत का समाचार जानकर स्वामी विवेकानंद श्रीमती सेवियर को सांत्वना देने के निमित्त मायावती आये थे। तब वे इस आश्रम में ३ से १८ जनवरी तक रहे. कैप्टेन की मृत्यु के पंद्रह वर्ष बाद तक श्रीमती सेवियर आश्रम में सेवाकार्य करती रहीं.
स्वामी विवेकानंद की इच्छानुसार मायावती आश्रम में कोई मंदिर या मूर्ति नहीं है इसलिए यहाँ सनातनी परम्परानुरूप किसी प्रतीक (मूर्ति या चित्र) की पूजा नहीं होती। सांय काल मधुर वाणी में सामूहिक रूप से संगीत वाद्यों के साथ राम नाम संकीर्तन होता है।  
[नवनीदा की आत्मकथा ' जीवन नदी के हर मोड़ पर' के [५४] वें निबंध में महामण्डल के जीप द्वारा 'अल्मोड़ा यात्रा ' प्रसंग में लिखते हैं- " मायावती तक आराम से आ गये। वहाँ पर हम सभी लोगों के लिये रहने कि व्यवस्था थी. घूम-फिर कर आस-पास देख आया. स्वामीजी लोग जिस स्थान पर बैठ कर ध्यान करते थे, वहाँ की निस्तब्धता को देखकर ऐसा लगता था मानो जगत हो ही नहीं ! वसन्त रोग (चेचक) से आक्रान्त रहने के समय जो देखा था- मैं मर गया हूँ, और जिस जगह पर शरीर का दाह-संस्कार कर दिया गया था, उसी स्थान को पुनः अपने सामने सेभियर के समाधि-स्थली के  रूप में साक्षात् देखा.(???)"  
'अद्वैत आश्रम'
भारत के उत्तराखण्ड राज्य के चम्पावत जिले में मायावती नामक स्थान पर स्थित है जहाँ संन्यासी या गृहस्थ कोई भी प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं यह अद्वैत आश्रम, मायावती  रामकृष्ण मठ की एक शाखा है, जिसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेलुड़ में है। अतः 'अद्वैत आश्रम, मायावती ' को 'अद्वैत मठ' की परम्परा में पाँचवाँ मठ कह सकते हैं, जहाँ सभी धर्मों या देश के अनुयायी अद्वैत-वेदान्त की शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। रामकृष्ण मिशन दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्म योग मानता है जो कि हिन्दु धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। रामकृष्ण मिशन का ध्येयवाक्य है - 'आत्मनो मोक्षार्थं जगद् हिताय च' (अपने मोक्ष और संसार के हित के लिये) {तभी तो हिन्दू संस्कृति की प्रचारक संस्था आरएसएस के प्रचारक श्री नरेन्द्र भाई मोदी यहाँ से गुरु-शिष्य परम्परा के अनुसार संन्यास लेने गये थे।} 
शंकराचार्य के चार शिष्य: 1. पद्मपाद (सनन्दन), 2। हस्तामलक 3. सुरेश्वराचार्य (मंडन मिश्र) 4. तोटक (तोटकाचार्य)। उनके ये शिष्य चारों वर्णों से थे।

वर्णव्यवस्था विषय
सब मनुष्यों की एक जाति है, अर्थात मनुष्य – जाति  ! मनुष्य-जाति चार-वर्णों में विभक्त होती है – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र l इनका नाम ‘वर्ण’ इसलिए है कि जैसे जिसके गुण-कर्म हों वैसा ही उसको अधिकार देना चाहिए। चार वर्णों के गुण-कर्म:  गुण-कर्मों के अनुसार ही वर्ण ‘वरा’ जाता है, वेदाध्ययन और परमेश्वर की उपासना के साथ वर्तमान तथा विद्या आदि उत्तम गुणों से युक्त पुरुष को ब्राह्मण कहते हैं।  एश्वर्य, बल, वीर्य, शौर्य आदि गुणों से सम्पन्न पुरुष को क्षत्रिय कहते हैं । लेन -देन, व्यापार, पशु-पालन तथा कृषि आदि के कर्मों में सकुशल मनुष्य को वैश्य तथा शिल्पविद्या के जानने वाले तथा सेवा क्षेत्रों में कुशल किन्तु संस्कृत नहीं जानने वाले अज्ञानी मनुष्य को शुद्र कहते हैं। अतः संस्कृत सीखकर कोई भी जाति - धर्म  जन्मा मनुष्य क्रमशः ब्राह्मण बन सकता है। 
*मनुष्य जाती के दो भेद *
मनुष्य जाति के दो भेद अन्य प्रकार से भी किये हैं – आर्य और दस्यु ।  श्रेष्ठ मनुष्यों को आर्य कहते हैं और दुष्ट स्वभाव से डाकू आदि को दस्यु कहते हैं । इन्हें ही देव और असुर भी कहते हैं अर्थात आर्यों को देव तथा दस्युओं को असुर कहते हैं l
*वर्ण-परिवर्तन *
*शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम l
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विध्याद्वैश्यात्त्थैव च ll

*मनु-स्मृति (अध्याय 10, श्लोक 65)
अर्थात शूद्र ब्राह्मण हो जाता है, और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है अर्थात गुण-कर्मों के अनुसार ब्राह्मण हो तो वह ब्राह्मण रहता है और ब्राह्मण यदि क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के गुनोंवाला हो तो वह क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र हो जाता है l वैसे शूद्र भी मुर्ख हो तो वह शूद्र रहता है और जो उत्तम गुणों से युक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है । इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य के विषय में भी जान लेना चाहिए l जो शूद्र को वेदादि पढने का अधिकार न होता तो वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अधिकार को कैसे प्राप्त हो सकता था ? महर्षि विश्वामित्र और महर्षि वाल्मीकि जैसे अनेकों उदाहरण हैं शास्त्रों का अध्ययन करें तो।  वेदादि शास्त्रों के पढने-पढ़ाने, सुनने-सुनाने में सब मनुष्यों का अधिकार है,जो-जो पदार्थ ईश्वर ने रचे हैं वे सबके उपकारार्थ हैं ।   स्त्रियों को भी वेदादि शास्त्रों को पढने-सुनने का समान अधिकार है।  यजुर्वेद 26/2 में लिखा है :
यथेमा वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य: l
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च ll

अर्थात वेदों को पढने का अधिकार सब मनुष्यों को है, और विद्वानों को पढ़ाने का भी अधिकार है। ईश्वर आज्ञा देते हैं कि हे मनुष्य लोगों! जिस प्रकार मैं (परमेश्वर) तुमको चारों वेदों का उपदेश देता हूँ उसी प्रकार तुम भी उनको पढ़कर सब मनुष्यों को पढ़ाया और सुनाया करो, क्योंकि वह वेदरूपी वाणी सबका कल्याण करनेवाली है । वेदाधिकार जैसा ब्राह्मण के लिए है वैसा ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पुत्र, भृत्य और अतिशूद्र के लिए भी बराबर है । वर्णपरिवर्तन के सम्बन्ध में यह निश्चितरूप से जान लेना चाहिए कि 25वें वर्ष में वर्णों का अधिकार ठीक-ठाक होता है, क्योंकि 25 वर्षों तक बुद्धि बढती है, इसलिए उसी समय गुण-कर्मों कि ठीक-ठाक परीक्षा करके वर्णाधिकार होना उचित है।
  ' आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः '
आचरण हीन को वेद भी पवित्र नहीं करते । वशिष्ठ स्मृति में कहा गया है - ' आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः ' अर्थात आचरण हीन को वेद भी पवित्र नहीं करते । गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र इन दोनों के प्रणेता एक ही हैं। ‘आपस्तम्बधर्मसूत्र’ (प्रश्न 2, पटल 5, खंड 11, सूक्त 10-11) में भी कहा गया है -  धर्माचरण से नीचे के वर्ण पूर्व-पूर्व वर्ण के अधिकार को प्राप्त होते हैं और अधर्मआचरण करके पूर्व-पूर्व वर्ण नीचे के वर्णों के अधिकारों को प्राप्त होते हैं ।  यह व्यवस्था समाज के संतुलन के लिए थी। समस्त ऋषियों ने भी समाज को चार वर्णों में विभाजित करना अनिवार्य बताया है। अन्य धर्मों में भी इस प्रकार की वर्ण व्यवस्था की गयी थी। प्रत्येक व्यवस्था गुणों और कर्मों के आधार पर थी।
शंकराचार्य का दर्शन: शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत का दर्शन कहा जाता है। क्योंकि वेद या उपनिषद के भीतर जो दार्शनिक तत्व थे उनको वर्गीकृत करके व्यासदेव ने जिस वेदान्त-सूत्र की रचना की थी, उसकी व्याख्या में भी विभिन्नता की सम्भावना हो गयी थी। विभिन्न लोग अलग अलग ढंग से वेदांत-सूत्र की व्याख्या करने लगे थे, जिसके कारण भ्रान्ति उत्पन्न हो गयी थी। इनमें से किसकी व्याख्या सही है, किसकी गलत है? इसमें ग्रहण करने योग्य कौन सा भाष्य होगा ? इन सबके बारे में भी भ्रम उत्पन्न हो गया था। तब अत्यन्त तीक्ष्णबुद्धि-सम्पन्न शंकर ने समस्त शास्त्रों का अध्यन कर लेने के बाद, उसके अद्वैत पक्ष को लेकर वेदान्त-सूत्र पर भाष्य रचना किया ।
 सनातन भावधारा में सामान्य रूप से तीन मतों को स्वीकार किया जाता है- द्वैत,विशिष्टाद्वैत एवं अद्वैत। शंकर ने अद्वैत पक्ष को आधार बनाकर, पहले ब्रह्मसूत्र के उपर, फिर उपनिषद एवं गीता पर भी भाष्य रचना किये थे। इन तीनों को एक साथ मिलाकर 'प्रस्थानत्रैय' कहा जाता है। इस 'प्रस्थानत्रैय', अर्थात गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र में ही-हमलोगों के देश का सम्पूर्ण प्राचीन ज्ञान-भण्डार छुपा हुआ है, इसीलिये जो लोग उसके उपर भाष्य लिखते हैं, उन्हें हमारे देश में आचार्य कहा जाता है। शंकर, रामानुज,
मध्व, निम्बार्क आदि आचार्यों ने अपने-अपने मत के अनुसार इनकी जो व्याख्या की है, उनमें कुछ व्याख्या की भिन्नता है, और अपने मतानुसार स्वतंत्र-व्याख्या की गयी है।
आचार्य शंकर की सर्वश्रेष्ठता या वैशिष्ट्य (per-eminence) का प्रारंभ यहीं से होता है। उनहोंने वेदान्त के अद्वैत पक्ष को आधार बनाकर ब्रह्मसूत्र की जो व्याख्या की है, उसका मूल बिन्दु यही है कि -एकं सत्य विप्राः बहुधा वदन्ति ' - यहाँ दो  कुछ भी नहीं है, सत्य एक है, अनेक नहीं! और अनेक नाम-रूपों में जो कुछ दिख रहा है-वह सब ज्ञेय वस्तु या प्रतीत होने वाली वस्तु है, क्षणभंगुर है, मायिक वस्तु है, या अध्यस्त है। जो वस्तु दिखाई दे रही है, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कोई वस्तु वहां है,किन्तु वास्तव में नहीं है, तो उसको ही भ्रान्ति या भ्रम कहते हैं; जिसका कारण है 'माया'। जो एक होकर भी अनेक रूपों में भास रहा है- उसी को माया कहते हैं। 
जो वस्तु वह नहीं हो, जिस रूप में वह दिख रही हो, उसी को 'माया' कहते हैं। माया (एक वस्तु का किसी अन्य वस्तु के रूप में दिखना -परिणाम नहीं है, विवर्त है।)का सबसे प्रसिद्द उदाहरण है, ' सर्प-रज्जू-न्याय ' - अर्थात अँधेरे में रज्जू को देखने से, उसके सर्प होने का भ्रम हो जाता है। जो एक को एक नहीं देखते, अनेक रूप में देखते हैं, वे समझते हैं कि जो कुछ दिख रहा है, वही सत्य है।माया की शक्ति कार्य कर रही है, इसीलिये आवरण पड़ जाता है, इसीलिये हमलोग ब्रह्म को देख नहीं पा रहे हैं, या अनेकता में एक की उपलब्धी नहीं कर पा रहे हैं। जिस प्रकार रस्सी को रस्सी के रूप में नहीं देख रहे हैं, वह बिल्कुल सर्प प्रतीत हो रहा है।
उसी प्रकार माया में आवृत होने के कारण ही हम जगत को जो ईंट,लकड़ी,पत्थर इत्यादि अलग अलग रूपों में देख रहे हैं। जब माया हट जायेगी तो सब कुछ को ब्रह्म के रूप में देख सकेंगे। सत्य प्रकट हो जायेगा। एक बार माया का पर्दा हट जाने के बाद,हमलोगों की सत्य-दृष्टि खुल जाती है।जो वास्तव में वह नहीं है, वह उसी रूप में दिखाई पड़ रहा है। इसकी व्याख्या अनेक प्रकार से की गयी है। आचार्य शंकर इस भ्रम को अध्यास कहते हैं, अर्थात सम्मोहित अवस्था में जो जैसा नहीं है, वैसा ही दिख रहा है; इसीको माया या माया का कार्य कहते हैं। माया-तत्व की व्याख्या में कहा जाता है, कि इसकी दो शक्तियाँ है- एक है आवरण-शक्ति और दूसरी है विक्षेप शक्ति।
आवरण-शक्ति की सहायता से जो वस्तु वास्तव में जो है, उसको यह माया उस रूप में देखने नहीं देती है। जैसे वास्तव में है तो रज्जू किन्तु वैसा देखने नहीं देती है, या दिख नहीं रही है। फिर विक्षेप शक्ति की
सहायता से जो नहीं है, उसी रूप में दिख रही है। जैसे वास्तव में है तो रज्जू, किन्तु सर्प जैसी दिख रही है। और हम वहाँ रज्जू नहीं देखकर सर्प देख रहे हैं। ' एकं सत्य विप्राः बहुधा वदन्ति ' -- वास्तव में एक ही है,अनेक नहीं है, उसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं है।
इसी बात को जगतगुरु श्रीरामकृष्ण बहुत सरल भाषा में इस प्रकार कहते हैं-" ब्रह्म या ईश्वर ही वस्तु हैं, उनके स्थान पर अन्य जो कुछ भी दिख रहा है, वह सब अ-वस्तु है। एक को जानने का नाम ज्ञान है, अनेक को जानने का नाम अज्ञान है।" ईश्वर की सर्वव्यापकता को और भी स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था - " प्रत्येक वस्तु नारायण है। मनुष्य नारायण है, पशु नारायण है, साधु नारायण है, लम्पट भी नारायण है। जो कुछ है, सब नारायण ही है। नरायण विभिन्न रूपों में लीला करते हैं। सब उन्हीं के भिन्न-भिन्न रूप हैं, उन्हीं की महिमा (शक्ति ) का प्रकाश है! " किन्तु अपने शिष्यों को सावधान करते हुए यह भी कहा था कि ' यदि हाथी नारायण है तो महावत भी नारायण है-इस कथा को मत भूलना। ' 
वास्तव में सभी मनुष्य ब्रह्म ही हैं, किन्तु हमलोग उन्हें  अनगिनत नाम-रूप में देख रहे हैं। मनुष्य के तीन प्रमुख उपादान '3H' हैं -शरीर,मन और ह्रदय। इन तीनों के समंजस्यपूर्ण विकास,'3H' निर्माण के प्रशिक्षण द्वारा ही हम यथार्थ मनुष्य बन सकते हैं। इस तथ्य को समझते हुए भी हमलोग अपना जीवन और चरित्र गढ़ने के लिए जो कठोर परिश्रम नहीं करते हैं -यही माया है ! इसको ही अध्यास (देहाध्यास-माया) कहते हैं। विवेक का अर्थ है तृष्णा-लालच-वासना को अलग करना या शरीर-मन को ह्रदय से पृथक करना। 
हमारा बंधन (लालच) नाम-रूप (शरीर-मन ) कर्त्तृत्त्व भोक्तृत्त्व उपाधि को लेकर है । तृष्णा शरीर और मन के लिये हैँ । शरीर एवं मन (2H) न हो तो तृष्णा नहीँ हो सकती । कर्त्तृत्त्व कर्मेन्द्रियोँ और प्राण को लेकर है। जब कर्मेन्द्रियोँ से मेरा संबंध नहीँ तो मेरे मेँ कर्त्तृत्त्व का भी संबंध नहीँ । तभी इस दुःख से छूट सकते हैँ । हम अनादि काल की वासनाओँ से ग्रस्त हैँ । वासनायेँ हमारे मेँ भरी हुई हैँ , उसी के कारण हम कर्त्ता – भोक्ता बने हुए हैँ अन्यथा हैँ तो हम – ” अमृतस्य पुत्राः ”। परन्तु तृष्णा लालच वासनाओँ के कारण हम जीव बने हुए हैँ ।
वासनाओँ का प्राकाट्य जाग्रत – स्वप्न मेँ होता है । जब 'सुषुप्ति' मेँ जाते हैँ तब परम तृप्ति है क्योँकि तब हमारे अन्दर कर्त्तृत्त्व – भोक्तृत्त्व कुछ प्रकट नहीँ रहता है । 'जाग्रत','स्वप्न' मेँ आते ही दुर्वासा अर्थात् दुर्वासना का शाप लग जाता है । हम लोगोँ की कत्तृत्व शक्ति बकरी की तरह और भोक्तृत्व शक्ति हाथी की तरह है । इसलिये हमारी भूख कभी मिटती नहीँ । 
” चाहिये , चाहिये ” की आशा कभी नहीँ मिटती । ऐसा होना चाहिये , ऐसा करना चाहिये , भारत को महान देश होना चाहिये , अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिये , इत्यादि अपेक्षाएँ-इच्छायें असंख्य है जबकि हमारा कत्तृत्व बकरी की तरह है। हम चाहते हैं की गाय २० लीटर दूध दे , जब कहते हैँ कि ” इसके बारे मेँ कुछ करो ” तब जबाब मिलता है ” हम क्या कर सकते है, सारा चारा तो नेता खा गए ? ” अर्थात् कुछ नहीँ कर सकते । हम चरित्र-निर्माण और मनुष्य निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार तो कर नहीँ सकते पर चाह सकते हैँ, कि मेरा भारत महान बन जाय। और इसलिये देश-चिन्ता ग्रस्त निरंतर दुःखी भी बने हुए हैँ। जैसे वरुण पुत्र – वारुणी को निरंतर दुःख का ही अनुभव करता रह ता था, क्योँकि दुर्वासा (अर्थात दुर्वासना) के श्राप से, उसका पेट हाथी का और मुँह बकरी का हो गया था। उसके खाने वाला मुख (मन Head) और भरने वाला पेट (Hand) दोनोँ मेँ सामञ्जस्य नहीँ था! ऐसे ही हमारी मन पर संयम रखने का अभ्यास न करने के कारण हमारी भोक्तृत्त्व शक्ति- बहुत ज्यादा है। ओर नियमित शारीरिक व्यायाम न करने के कारण कर्त्तृत्त्व शक्ति सीमित है, इसलिये हमारी इच्छायें जब पूर्ण नहीं होतीं तो हम दुःख का अनुभव करते हैँ । यह दुःख का अनुभव तब जाये जब हाथी के शरीर (पेट) और बकरी के मुख से पीछा छूटे। 
इसलिये भगवान् ने भी श्रीगीताजी मेँ कहा – कि अमृत के पुत्र होकर भी तुम मृत बने हुए हो । ये शरीर (नाम-रूप) अन्त होने वाले हैँ । कर्त्ता – भोक्तापने का अनुभव कराने वाले तो ये शरीर-मन हैँ। आपके स्वरूप मेँ ये सब कुछ नहीँ हैँ। आप तो स्वयं नित्य हो , शरीरी (ह्रदय) हो , आपका कभी नाश नहीँ हो सकता, आप अप्रमेय हो । हमेशा ही अपने स्वरूप मेँ स्थित हो । इसलिये इन उपाधियोँ (नाम-रूप) से अपनी आसक्ति को हटाना मात्र है, ब्रह्म की प्राप्ति नहीँ करनी है क्योँकि वह तो हमेशा आपका स्वरूप है ।
शंकराचार्य के दो गुरु थे:   अद्वैत वेदांत की परंपरा में गौड़पादाचार्य को आदि शंकराचार्य के परमगुरु अर्थात् शंकर के गुरु गोविंदपाद के गुरु के रूप में स्मरण किया जाता है। गौड़पादाचार्य के गुरू, शुकदेव परमहंस थे । शकराचार्य का स्थान विश्व के महान दार्शनिकों में सर्वोच्च माना जाता है। उन्होंने ही इस ब्रह्म वाक्य को प्रचारित किया था कि’ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया।’आत्मा की गति मोक्ष में है।
‘निर्वाण-षटकम्’
जब आदि गुरु शन्कराचार्य जी की अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय माँगा । बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन जाता है…
यह परिचय ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||1||

[मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ...]

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः |
न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||2||

[न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) में कोई हूँ, न मैं सप्त धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ...]
न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ
मदों नैव मे नैव मात्सर्यभावः |
न धर्मो नचार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||3||

[न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ...]

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं
न मंत्रो न तीर्थं न वेदों न यज्ञः |
अहम् भोजनं नैव भोज्यम न भोक्ता
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||4||

[न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ...]

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म |
न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||5||

[न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ...]

अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम |
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||6||

[मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ...]

अद्वैत वेदांत अर्थात उपनिषदों के ही प्रमुख सूत्रों के आधार पर स्वयं विद्वानों ने उपदेश दिए थे। उन्हीं का विस्तार आगे चलकर माध्यमिका एवं विज्ञानवाद में हुआ। इस औपनिषद अद्वैत दर्शन को गौड़पादाचार्य ने अपने तरीके से व्यवस्थित रूप दिया जिसका विस्तार शंकराचार्य ने किया। वेद और वेदों के अंतिम भाग अर्थात वेदांत या उपनिषद में वह सभी कुछ है जिससे दुनिया के तमाम तरह का धर्म, विज्ञान और दर्शन निकलता है।
ग्रंथ: शंकराचार्य ने सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य के अतिरिक्त ग्यारह उपनिषदों पर तथा गीता पर भाष्यों की रचनाएँ की एवं अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों स्तोत्र-साहित्य का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन (वेदान्त ) को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा मण्डन मिश्र जैसे कर्मकाण्डी हिन्दू विद्वान से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया।

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“ आचार्य श्री शंकर और मण्डन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ ” 

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मार्ग में मण्डनमिश्र जी की दासियाँ , जो परस्पर संस्कृत में वार्तालाप करती हुई नदी से जल लेने जा रही थीं उनसे आचार्य शङ्कर ने पूछा कि मण्डनमिश्र का घर कहाँ है ? श्री आचार्य शङ्कर का दर्शनकर दासियाँ भी विभोर हो गईं और सविनय उत्तर दिया : अर्थात् जिस द्वारपर टंगे पिजरों के भीतर बैठी मैनाएँ वेद अर्थात् श्रुति स्वतः प्रमाण है अथवा परतः प्रमाण । कर्म का शुभाशुभ फल कर्म देता है अथवा ईश्वर । जगत् ध्रुव है अथवा अध्रुव ? इस बातपर विचारकर रही हो उसे आप मण्डन मिश्र पण्डित का घर जानिये । दासियों से इस प्रकार वचन सुन आचार्य शङ्कर मण्डन के घर गये , परन्तु उस समय घरका द्वार बन्द था । मार्ग में दर्शक लोग उस अल्प वयस्क यतिवर का दर्शनकर मुग्ध होने लगे तथा उनके मुख मण्डल से किसी विशेष अवतारी पुरुष की अलौकिकता का अनुभव करने लगे । 
उस समय मण्डन मिश्र श्राद्ध कर रहे थे। योगिराज आचार्य शङ्कर आकाश मार्ग से आँगन में उतरे, शिखा सूत्र रहित जब एक सन्यासी को मण्डन ने देखा तो उनके क्रोध का ठिकाना न रहा । क्योंकि कुछ विद्वान् लोग श्राद्ध के अवसर पर संन्यासी का आना निषिद्ध मानते हैं जबकि यह शास्त्र विरुद्ध है ।  मण्डन मिश्र ने क्रोध भरी दृष्टि से यतिन्द्र शङ्कर की ओर देखते हुए कहा :” कुतो मुण्डी ” ? 
{ हे मुण्डी ! कहाँ से आये ?} यहाँ मुण्डी शब्द संन्यासी के प्रति अनादर सूचक सम्बोधन है । इस वाक्य दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि कहाँ से मुण्डित हो ? आचार्य श्री शङ्कर ने दूसरे अर्थ को मन में रखकर कहा ” आगलात् मुण्डी ” अर्थात् गले तक मुण्डन है ।
अरे ! मैं मुण्डन के विषय में नहीं पूछता , किन्तु ” पन्थास्ते पृच्छ्रयते मया ” मण्डन मिश्र आचार्य से कहते हैं कि मैं आपके मार्ग के विषय में पूछता हूँ कि आप आये कहाँ से ? तब आचार्य शङ्कर स्वामी ने मुस्कुराते हुए कहा – ” किमाह पन्थाः ? ” मार्ग से पूछे जाने पर उसने क्या उत्तर दिया ? मण्डन मिश्र ने चिढ़कर ”त्वन्माता मुण्डा ” मार्ग ने मुझे उत्तर दिया कि तुम्हारी माता मुण्डा है । आचार्य सर्वज्ञ शङ्कर स्वामी कहते हैं – बहुत ठीक , ” इत्याह तथैव हि ” तुमने ही मार्ग से पूछा है इसलिए वह उत्तर भी तुम्हारे लिए ही होगा अर्थात् तुम्हारी माता मुण्डा – संन्यासनी है , हमारी माता नहीं । आचार्य शङ्कर मण्डन को ललकारते हुए कहते हैं : ब्रह्मतत्त्व को न जानेवाला आत्महत्या को प्राप्त होता है । ” असन्नेव स भवत्यसद्ब्रह्मेति चेद्वेद ” ब्रह्म असत् है – नहीं है यदि ऐसा जानता है तो वह असत् ही हो जाता है । असूया नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चाऽऽत्महनो जनाः ॥
{ ईशावास्योपनिषद् 3 }
” परीक्ष्य लोकान्कर्मचित्तान्ब्राह्मणो निर्वेदमायात् ” { कर्मोँ से सम्पादित लोकों – फलों का परीक्षण कर अर्थात् अनित्य अनुभव कर ब्राह्मण वैराग्य को प्राप्त हो } ” यदहरेव विरजेतदहरेव प्रव्रजेत् ” { जाबाल खण्ड 4 } { जिस दिन वैराग्य हो उस दिन संन्यास ग्रहण करे } { ब्रह्मचार्याद्वा गृहाद्वा वनाद्वा ” { ब्रह्मचर्याश्रम से गृहस्थाश्रम से अथवा वानप्रस्थाश्रम से संन्यास ग्रहण करे } ” न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागैनैके अमृतत्वमानशुः ” { महा नारायण उपनिषद् 10 / 5 } { एक शाखा वाले ऐसा कहते हैं – न कर्म से , न प्रजा से न धन से अमृतत्व प्राप्त होता है किन्तु के एक त्याग से ही प्राप्त होता है } ” अथ परिव्राड् विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः ” { जाबाल 5 } आदि श्रुति वाक्यों में ब्रह्मज्ञान के लिए संन्यास ग्रहण करने का स्पष्ट निर्देश है । यदि शिखा सूत्र का विधिवत् परित्यागकर संन्यास ग्रहण न किया जायगा तो उक्त श्रुति का निर्वाह नहीं हो सकेगा । श्रुति को भार से मुक्त करने के लिए संन्यास ग्रहण करना बुद्धिमता है , दुर्बुद्धि तो तुम हो जो ऐसा नहीं किया है ।
शङ्कर और मण्डन दोनों ही महापण्डित थे । समग्र देश में दोनों की ख्याति प्राप्त थी । दोनों के शास्त्र विषयक चर्चा सुनकर बहुत पण्डित तथा विद्वद्गण अधिक संख्या में आकर उपस्थित हुए।  आचार्य शङ्कर और मण्डन मिश्र के आग्रह से ” उभयभारती { शारदा } ने मध्यस्थपद को सुशोभित किया। ऐसा लगता था मानो दोनों विद्वानों के शास्त्रार्थ के तारतम्य का निर्णय करने के लिए स्वयं सरस्वती समामण्डप में पधारी हो यह नारी जाति के लिए महान् गौरव की बात थी। इसी प्रकार भारतीय संस्कृति में योग्य नारियों का समाज में सम्मानित स्थान रहा है । ” आचार्य श्री शङ्कर की प्रतिज्ञा ” :
 
ब्रैह्मैकं परमार्थसिच्चिदमलं विश्वप्रपञ्चात्मना
शुक्ती रूप्यपरात्मनेव बहलाज्ञानावृतं भासते ।
तज्ज्ञानान्निखिलप्रपञ्चनिलया त्वात्मव्यवस्थापर
निर्वाणं जनिमुक्तमम्युपगतं मानं श्रुतेर्मस्तकम् ।।

 – ब्रह्म एक सत् चिद् निर्मल तथा परमार्थ है । जैसे मिथ्या ज्ञान से सीप रजतरूप में भासती है,वैसे ही सत्,  चिद् आनन्द स्वरूप ब्रह्म  मिथ्या अनादि अज्ञान से इस दृश्यमान प्रपञ्चरूप से भासित होता है । जब इसे ” तत्त्वमसि ” , ” अहं ब्रह्मास्मि ” आदि उपनिषद् वाक्यों द्वारा जीवब्रह्मैक्यज्ञान उत्पन्न होता है तब अनादि कारण मिथ्याज्ञान सहित यह समस्त प्रपञ्च निवृत्त हो जाता है और यह अपने असली चिन्मय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जन्म – मरण से रहित होकर मुक्त हो जाता है । यही हमारा सिद्धान्त है । इसमें उपनिषद् प्रमाण है । मैं फिर अपने इस कथन को दुहराता हूँ ” जीवब्रह्मैक्य ” { जीव ब्रह्म एक है} यही मेरा विषय है । उसमें निम्न उपनिषद् वाक्य प्रमाण हैं ।
* ” एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म { छान्दोग्य 6 / 2 / 1 }* ” सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ” { तैतरेय 2 / 1 / 1}
* ” सर्वँ खल्विदं ब्रह्म ” { छान्दोग्य 3 / 14 / 1 }* ” ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति ” * ” ब्रह्मविदाप्नोति परम् “
* ” तत्र को मोहः कः शोकः एकात्मनुपश्यतः ”
आचार्य शंकर आगे कहते हैं - जय निश्चित होने पर भी यदि मैं इस विवाद में पराजय का भागी हुआ तो हे प्रिय ! इस कषाय वस्त्रों सहित संन्यास को छोड़कर श्वेत वस्त्र धारण करूँगा । इस विवाद में जय तथा पराजयरूप फल की निर्णायक यह ” उभयभारती ” हो ।
मण्डन कहते हैं : इस वाद के करनेपर यदि मेरा पराजय हुआ तो आपसे कहे हुए से विपरीत भाव शुक्ल वस्त्र – गृहस्थाश्रम को छोड़कर कषाय वस्त्रों को धारण करूँगा । जिन मेरी पत्नी उभयभारती को आपने शास्त्रार्थ में मध्यस्थ बनाया है उसे मैं स्वीकार करता हूँ । तब उभयभारतीजी ने उनके कण्ठ में पुष्पमाला पहनाकर यह घोषणा कर दी : जिसके भी कण्ठ की माला जब मलिन हो जायेगी तब उसीका निश्चित पराजय समझा जायगा। 
गृहकार्य में संलग्न उभयभारती जी ने ऐसा कहकर घर चली गई , क्योंकि अपने पति के लिए भोजन और संन्यासी के लिए भिक्षा तैयार करनी थी । आचार्य शङ्कर बोले – हे सौम्य ! मुझे साधारण अन्न की भिक्षा में कोई आदर नहीं है , मैं विवादरूप भिक्षा लेने की इच्छा से आपके पास आया हुआ हूँ । परन्तु शर्त यह है कि परस्पर शिष्यरूप से भिक्षा देनी स्वीकार करनी चाहिए अर्थात् जो पराजित होगा वह दूसरे का शिष्य बन जायेगा।
इस शास्त्रार्थ में एक श्लाधनीय बात यह थी कि दोनों वादी प्रतिवादी बड़े प्रेमभाव से साधु शब्दों का प्रयोग कर रहे थे कभी क्लान्त मन नहीं होते , न उनकी वाणी तथा स्वरादि भें शिथिलता प्रतीत होती धारावाहिक प्रश्नोत्तर की झड़ी चल रही थी । मध्यस्थ उभयभारती प्रतिदिन मध्याह्न काल में आकर अपने पति को कहती कि भोजन का समय हो गया है और यति शङ्कर को कहती की भिक्षा का समय हो गया है ।
इसी प्रकार पाँच छः दिन बीत गये । मण्डन कहते हैं : अश्वालम्बं गवालम्बं संन्यासं पलतैतृकम् । देवरात्सुतोत्पत्तिं पञ्च कलौ विर्जयेत् ॥ अर्थात् अश्वालम्ब , गवालम्ब , संन्यास , श्राद्ध में पितरों को मांस पिण्ड , देवर से पुत्र की उत्पत्ति ये पाँच कलियुग में वर्जित हैं । आगे कहते है कहाँ वह ब्रह्म , कहाँ वह दुर्बुद्धि , कहाँ वह संन्यास , कहाँ यह कलियुग स्वादु अन्न भोजन की इच्छा से तुमने यह योगियों का वेष धारण किया है ।
आचार्य शङ्कर ने पराशर स्मृति का प्रमाण देते हुए कहा  कि " जब तक वर्ण विभाग है जब तक वेदो का प्रचार है तब तक कलियुग में संन्यास और अग्निहोत्र का विधान है । " शङ्कर कहते हैं : क्व स्वर्गः क्व दुराचारः क्वाग्निहोत्रं क्व वा कलिः । मन्ये मैथुनकामेन वेषोऽयं कर्मिणां घृतः ॥ कहाँ स्वर्ग और कहाँ दुराचार कहाँ अग्निहोत्र और कहाँ कलियुग । 
मैथुन की इच्छा से ही तुमने यह कर्मियों का वेष धारण किया है ।  दुःख हेय है और सुख उपादेय है , दुःख की निवृत्ति और सुख की प्राप्ति प्रत्येक प्राणी चाहता है, वही पुरुषार्थ है । प्रत्येक व्यक्ति का यह प्रसिद्ध अनुभव है कि मैं ईश्वर नहीं हूँ , किन्तु मैं अल्पज्ञ जीव उसका दास हूँ । यह प्रत्यक्ष प्रमाण जीव ब्रह्म की एकता का विरोधी है । यदि मुक्ति उपासना का फल है , तब तो उपासनारूप क्रिया जन्य होने से स्वर्ग आदि फल के समान अनित्य हो जायेगी , क्योँकि ” यज्जन्यं तदनित्यं ” { जो भाव पदार्थ उत्पन्न होता है वह अवश्य नष्ट होता है } यह नियम है । उपासना भी मानसिक क्रिया है । इसका करना न करना व अन्यथा करना व्यक्ति के अधिन है । समस्त कर्मोँ की यही दशा है । परन्तु ” ज्ञानं वस्तुतन्त्रं न पुरुष तन्त्रम् ” ” ज्ञान व्यक्ति के अधीन नहीं है प्रत्युत वस्तु के अधीन है । उसमें जानना , न जानना , अन्यथा जानना मनुष्य के अधीन नहीं है ” । जैसी वस्तु होगी वैसा ही ज्ञान होगा अन्यथा नहीं । यथा अग्नि उष्ण है, उसको शीतल नहीं कहा जाता , इत्यादि उदाहण हैं । इसलिए ज्ञान कर्म के अन्तर्गत नहीं है ।
जीव तथा ईश्वर में भेद के समान पृथ्वी (सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड) तथा ईश्वर में भेद भी अविद्यारूप उपाधि से ही मानते हैं , क्योँकि जब तक अविद्या है, तब तक ही भेद है । जैसे ही अविद्या से निवृत्त  कि कोई भेद नहीं रहता ।  
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समाने वृक्षं परिषस्वजाते । 
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥” 
 दो सखा { समान नाम वाले } सुन्दर गतिवाले पक्षी शरीररूपी एक ही वृक्ष को आश्रित किये रहते हैं । सदा इकट्ठा रहनेवाले उनमें एक तो उसके स्वादिष्ट फलों { कर्मफलों को } भोगता है और दूसरा उन फलोँको न भोगता हुआ केवल देखता रहता है । नीचे वाला पक्षी अन्तःकरण { बुद्धि } है और जीवात्मा है अर्थात् कर्मफल भोक्ता अन्तःकरण { बुद्धि} है और पुरुष (आत्मा ) उससे नितान्त भिन्न है – सम्पूर्ण संसारसे रहित है , ऐसा श्रुतिभगवती कहती है । वह केवल साक्षी है । इसप्रकार ” द्वा सुपर्णा ” यह मन्त्र – ” बुद्धि और जीवात्मा के भेदका प्रतिपादक है। यद्यपि लोहा स्वयं दाहक नहीं , फिर भी अग्निके सम्बन्ध से उसमें दाहक शक्ति आ जाती है , अर्थात् उसमें दाहकत्व प्रयोग होता है , उसी प्रकार उसमें चेतन के प्रवेश करने से अर्थात् चेतनके आध्यासिक तादात्म्य सम्बन्ध से अथवा चेतन प्रतिबिम्बित होनेसे बुद्धिमें भी चेतन के समान भोक्तृत्व शक्ति उत्पन्न हो जाती है।“ जो व्यक्ति इन प्रत्यगभिन्न दोनों पक्षियों- जीव और ब्रह्म में थोड़ा सा भी भेद सा देखता है - " मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति " { कठ 2 / 10 }  उसे जन्म – मरणरूप भय प्राप्त होती है, वह मृत्यु से मृत्युको प्राप्त होता है। अतएव अभेद सिद्धान्त सत्य है। सत्य है ।।  जीव भी परमात्मा के समान नित्य है तथा आनन्द आदि गुणों का निधान है । ये गुण आत्मा में सदा रहते हैं, परन्तु अविद्या से आवृत्त होने के कारण इनकी प्रतीति नहीं होती । जीव अविद्या से आवृत्त होने के कारण अपने को ब्रह्म नहीं समझता । जब अविद्या की निवृत्ति हो जाती है तब वह अपने को सचमुच ब्रह्म समझने लगता है । इसका यह अभिप्राय हुआ कि चेतन होने के कारण जीव ब्रह्म के तुल्य है। इस कथन से यह सिद्ध होगा कि यह संसार चैतन्य से उत्पन्न हुआ है । ” तदैक्षत ” यह विचारणीय प्रश्न है कि जगत् का मूल तत्त्व जड़ है अथवा चेतन ? नैयायिक और वैशेषिक जड़ परमाणुओं से जगत् की उत्पत्ति मानते हैं । सांख्य मत में जड़ प्रधान सृष्टि का कृर्त्तृकारण है । परन्तु वेदान्त चेतन ब्रह्म को जगत् का मूल कारण मानता है । यथा – { तदैक्षत बहुस्या प्रजायते (छान्दोग्य 6 / 2 / 3 ) उसने ईक्षण अर्थात संकल्प किया कि मैं बहुत होऊँ ऐसा मानने से अचेतन परमाणु अथवा प्रकृति से जगत् की उत्पत्ति मानने वाले ” वैशेषिक ” तथा ” सांख्यों ” का खण्डन स्वतः सिद्ध हो जाता है । }
” क्षीयन्ते चात्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ” { मुण्डक 2 / 2 / 8 } उस परमतत्त्व के दर्शन करने वाले विद्वान् के सब कर्म क्षीण हो जाते हैं । ” आनन्दं ब्रह्मणो निद्वान्न विभेति कुतश्चन ” { तैत्तिरीय 3 / 1 / 1 }  ब्रह्म साक्षात्कार होनेपर तो सर्व कर्तव्यता की हानि और कृतकृत्यता हमारे मत में अलंकाररूप है । मननादि सहकृत श्रवण से ब्रह्म साक्षात्कार होनेपर संसारित्व का निवृत्ति श्रुति – स्मृति और अनुभव सिद्ध है ।
 यदि इन्द्रियों द्वारा जीव और ब्रह्म का भेद ज्ञात होता तो अभेद प्रतिपादक ” तत्त्वमसि ” आदि वेद वाक्यों का विरोध निश्चित होता। भेद का तात्पर्य  है अभाव होना – जैसे ” सूर्य चन्द्रमा नहीं है , मनुष्य पशु नहीं है ” इत्यादि। भेद तो  है । किन्तु उसके साथ इन्द्रियों का सम्बन्ध अयुक्त है । अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् ” रूप आदि रहित होने से ईश्वर के साथ इन्द्रियों का सम्बन्ध ही नहीं है , इससे ईश्वरका प्रत्यक्ष भी नहीं होता । वेदान्त सिद्धान्त में मन इन्द्रिय नहीं है , किन्तु ज्ञान कराने में इन्द्रियों का सहायक मात्र है । जैसे दीपक नेत्रेन्द्रिय द्वारा रूपज्ञान में सहायकमात्र है । ” इन्दियेभ्यः परा ह्यार्थाः इन्द्रियेभ्यश्च परं मनः ” { कठ श्रुति 3 / 10 } { इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने से उनके विषय श्रेष्ठ हैं , विषयों से मन उत्कृष्ट है } ” मनः षष्ठानीन्द्रिमाणी{भगवद्गीता 15/7} { मन के साथ छः इन्द्रियाँ हैं } इत्यादि श्रुतिः स्मृति प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि मन इन्द्रिय नहीं है , किन्तु उनके साथ वर्णन मात्र है । इससे अभेद प्रतिपादक श्रुतियों के साथ कोई भी विरोध नहीं है । आत्मा तो इन्द्रियों से अप्रत्यक्ष है । ” न चक्षुषा गृह्यते ” { जो चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा गृहित नहीं है } इसलिए भेद अनुगृहीत है ।” आत्मा वा अरे द्रष्टव्य ” { बृहदारण्यक 2 / 4 / 5 } { याज्ञवल्क्य – हे मैत्रेयी ! आत्मा द्रष्टव्य है }
” यह रज्जु है सर्प नहीं है ” इत्यादि श्रवण से जैसे भ्रान्त श्रोता के भय कम्पनादि निवृत्त होते हैं , वैसे ब्रह्मस्वरूप के श्रवण से संसारित्व भ्रान्ति निवृत्त नहीं होती, क्योंकि श्रुत ब्रह्मस्वरूप पुरुष में यथापूर्व सुख दुःखादि संसार धर्म देखे जाते हैं और ” मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः ” { आत्मा का मनन और निधिध्यासन करने चाहिए } इस प्रकार श्रवण के अनन्तर मनन और निधिध्यासन का शुति में विधान है अर्थात् यदि श्रवणमात्र से चरितार्थ होता तो मनन और निधिध्यासन का विधान क्यों होता ?  ” उद्दालक ” आदि महान् गुरु लोग ” श्वेतकेतु ” आदि प्रमुख शिष्यों परमात्मा का आत्मरूप से ग्रहण कराते हैं ,  'स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ” { छान्दोग्य – उपनिषद् 6 / 8 / 7 } वही सत्य है ; वह आत्मा है ; हे श्वेतकेतु ! ” तत्त्वमसि ” तू , अर्थात् तेरा आत्मा ” तत्त्व ” है , तेरा शरीर ” तत्त्व – वस्तु ” नहीं । जैसे जल में डाला गया लवण अर्थात् नमक घुल जाने से दृष्टिगोचर नहीं होता , वैसे ही ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त होनेपर भी दृष्टिगोचर नहीं होता । ” न चक्षुषा गृह्यते ” रूपरहित होने से वह चक्षु से गृहीत नहीं होता । ” याज्ञवल्क्य कहते हैं – ” अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि तदाऽऽत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि तस्मातत्सर्वमभवत् ” हे जनक ! निश्चय है तू अभय पदको प्राप्त हुआ है , मैं ब्रह्म हूँ , ऐसा अपने को जान ऐसा जानने से वह सब ब्रह्म हुआ । ” ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है ” ” तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ” एकत्व देखनेवाले को मोह कहाँ और शोक कहाँ? इत्यादि श्रुतिप्रमाण , युक्ति और उदाहरणों से जीव ब्रह्म की एकता सिद्ध होती है।
हे विद्वन् ! जाग्रत् – स्वप्न तथा सुषुप्ति व्यभिचारी ये तीनों अवस्थाएँ मिथ्याज्ञान से तुम्हारे आत्मस्वरूप में कल्पित है । चक्षु आदि इन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञानावस्था को जाग्रत् और इन्द्रियों से अजन्य विषय के परोक्ष ज्ञानकी अवस्था को ” स्वप्न ” कहते हैं तथा केवल अविद्या जिस अवस्थामें विद्यमान रहती है इसे विद्वान् लोग ” सुषुप्ति – अवस्था ” कहते हैं । आत्मा इन तीनों अवस्थाओं में अनुगत तथा पृथक् है । जिस प्रकार रज्जु साँप, दण्ड भूमिच्छिद्र आदि की कल्पना की जाती है , उसी प्रकार आत्मामें इन तीनों अवस्थाओं की कल्पना है , इन तीनों अवस्थाओं से रहित होनेके कारण ब्रह्म तूरिय अभय तथा शिवरूप है । हे विद्वन् ! वह सबकी अन्तरात्मा है फिर भी मूर्ख उसे बाहर ढूँढते है । दर्पण में दीखती हुई नगरी के समान यह समस्त नामरूपात्मक विश्व अपने सच्चिदानन्दस्वरूप व्यापक आत्मा के भीतर दृश्यमान है , अर्थात् इन कल्पित प्रतीतिमात्र विश्वका अधिष्ठान एकमात्र आत्मा है । जैसे निद्रादोष से अविद्यमान स्वप्न प्रपंच सत्य की भाँति बाहर उत्पन्न हुए के समान स्वप्न साक्षी तैजस् आत्मा मे प्रतीत होता है । तद्वत् यह जाग्रत् प्रपञ्च आत्मा में मायाशक्ति से सत्यकी भाँती भासता है ।
आचार्य शंकर से जब उभयभारती ने शास्त्रार्थ करना चाहा तो आचार्य बोले - यशस्वी पुरुष महिला के साथ वाद – विवाद नहीं करते ।
उभय भारती : क्यों, गार्गी ऋषि वचक्नु की कन्या थी , इसलिए उसका नाम ” गार्गी हुआ था , { महाभारत शान्तिपर्व अध्याय 320 } । उनके  साथ महर्षि याज्ञवल्क्य ने शास्त्रार्थ किया तथा सुलभा ने धर्मध्वज नामवाले राजा जनक के साथ वाद – विवाद किया , क्या स्त्री से शास्त्रार्थ करनेपर भी वे यशस्वी न हुए ?
” आचार्यवान् पुरुषो वेद ” गुरु उपदेश से ही आत्मा का यथार्थस्वरूप अवगत होता है ।” तरति शोकमात्मवित् ” आत्मवेत्ता शोक रहित हो जाता है । हे विद्वन् ! आत्मा कि महिमा अपार है । जिसकी बुद्धि विमल हो उसे केवल वेद का एक वचन ” तत्त्वमसि ” श्रवण मात्र से आत्मसाक्षात्कार हो जाता है । आत्पज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु की परमावश्यकता है । शास्त्र के श्रवण , ममन का उतना फल नहीं मिलता जितना गुरु के सदुपदेश का । अतः गुरु आज्ञाको प्रसन्नता से प्रालन करना चाहिए । ” श्री पद्मपादाचार्य ” अद्वैत – तत्त्व का सुमधुर स्वर में गायन करते हुए कहते है :
” सर्वं चिदात्मकं सर्वमद्वैतं तत्त्वमसि राजन् ,
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म तत्त्वमसि तत्त्वमसि राजन् ।
 आत्मविषयक सार गर्भित गायन को सुनकर राजा ने अपने कार्यकलापों का स्मरण किया। उन सबको विदाकर आचार्य शङ्कर ने भी उस राजशरीर को सर्प की केँचुली के समान त्यागकर अपने पूर्व देह में प्रवेश किया ।
अत्यन्त शोकाकुल पद्मपाद आदि को सान्त्वना देकर साथ ही ” आकाश मार्ग ” से ” विश्वरूप मण्डन मिश्र ” के घर में उतरे । आचार्य को आकाश मार्ग से उतरते देखकर मण्डन मिश्र उनकी पूजा करने के लिए उठ खड़े हुए । तथा विनीत भाव से प्रणामकर विधिवत् आचार्य शङ्कर का पूजन किया ।आसनपर बैठे तथा विद्वानों से घिरे हुए आचार्य शङ्कर के समीप आकार ” सरस्वती उभयभारती ” बोली : -

समस्त विद्याओं के आप स्वामी हैं , सब प्राणियों के आप ईश्वर हैं , ब्रह्मा के आप अधिपति हैं । हे ब्रह्मन् ! आप साक्षत् ” सदाशिव ” हैं ।सभा में मुझे न जीतकर ” कामशास्त्र ” में कथित कामकलाओं के जानने के लिए आपने जो प्रयत्न किया है , वह मानव चरित का अनुसरण मात्र है , अन्यथा आप सर्वज्ञ हैं । जगत् में ऐसा कोई विद्या नहीं है जो आपसे अज्ञात हो।हे पूज्य ! आपने हम दोनों स्त्री और पुरुष को पराजित किया है उससे हम लोगों को किसी प्रकार की लज्जा नहीं है । क्या सूर्य के द्वारा किया गया पराभव चन्द्रमा की अपकीर्ति फैलाता है ?
अब मैं अपने निर्मल ब्रह्मलोक को अवश्य जाऊँगी । हे पूज्य ! आप कृपया मुझे जाने की आज्ञा दीजिये। ऐसा कहकर अन्तर्धान होनेवाली शारदा योग शक्ति से जानकर श्री शङ्कर स्वामी बोले –
हे देवी ! ऋष्यश्रृङ्ग क्षेत्र में हमारे द्वारा नवनिर्मित मन्दिर में ” शारदा ” नाम से पूजा प्राप्त करें और भक्तों की अभिलषित कामनाओं को पूर्ण करती हुई सज्जनों के पास सदा निवास करें ” तथास्तु ” कहकर शारदा ब्रह्मा के प्रिये लोक को चली गई । वहाँ शारदा के अकस्मात् अन्तर्धान होने से सभा में उपस्थित लोग अतिविस्मित हुए ।
 मण्डन मिश्र भी सब पदार्थों का दान आदि से त्याघर , सविधि आचार्य से संन्यास की दीक्षा ग्रहण की। अनन्तर आचार्य ने उसे ” तत्त्वमसि ” का वास्तविक अर्थ समझाया । आप्त वाक्य होने से ” वेद स्वतः प्रमाण ” माने गये हैं । भेद श्रुति से अभेद श्रुति प्रबल है , अतः जीव ब्रह्म की एकता मानना ही ठीक है ।{ यह श्रुति जीव ब्रह्म की एकता , जो लोकमें प्रसिद्ध है } का बोध कराती है , इसलिये वह अधिक बलवती है । सत्व वह है जिसके द्वारा स्वप्न देखा जाता है और क्षेत्रज्ञ वह है जो शरीर में रहता हुआ साक्षी है दोनों सत्त्व और क्षेत्रज्ञ हैं ।
अन्धेरे में घट – घड़ा ज्ञात नहीं होता , तो इससे यह नहीं समझा जाता कि अन्धेरे में घड़ा नहीं है ? क्योँकि प्रकाश से अन्धकार के निवृत्त होनेपर वह स्पष्ट प्रतीत होता है । इसी प्रकार अविद्या के कारण यद्यपि अभेद ज्ञान नहीं होता फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अभेद नहीं है , क्योँकि विद्या से अविद्या के निवृत्त हो जानेपर अभेद स्पष्ट ज्ञात होता है । ' घट द्रष्टा घटात् भिन्नः ' { घट आदि कार्य वाणी – कथनमात्र है , सत्य तो केवल मृत्तिका ही है । } घट आदि मृत्तिका से उत्पन्न हुए हैं । जैसे ये मृत्तिका से भिन्न नहीं हैं अर्थात् इनकी मृत्तिका से भिन्न सत्ता नहीं हैं , वैसे ही परमात्मा से उत्पन्न हुआ यह जगत् भी परमात्माके विना त्रिकालमें नहीं है अर्थात् इसकी पृथक् सत्ता नहीं है , मिथ्या है । शरीर के विषय में सबको यह दृढ़ धारणा है कि यह शरीर दृश्य है , इसका द्रष्टा अवश्य इससे भिन्न होना चाहिए ।अन्नमय , प्राणमय , मनोमय , विज्ञानमय तथा आनन्दमय इन पाँच कोशों के भीतर वह ऐसा छिपा हुआ है कि बाह्य दृष्टिवाले अज्ञानी को उसकी परमसत्ता का पता ही नहीं चलता । विद्वान् लोग युक्तियों से इसकी विशेष विवेचनाकर  तिलों में छिपे तैल की भाँति जिस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करते हैं , वह तत्त्व तुम्हीं होबुद्धिरूपी सारथि कुशल और सर्वदा समाहित चित्त से युक्त होता है । उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती है जिस प्रकार योग्य सारथि के अधीन अच्छे घोड़े।आत्मा जाग्रत् स्वप्न तथा सुसुप्ति , इन तीनों अवस्थाओं में अनुस्यूत होकर भी इनसे इस प्रकार पृथक रहता है जिस प्रकार पुष्पमाला में अनुस्यूत धागा । इन तीनों उपाधियों से पृथक् कर विद्वान् लोग जिस तत्त्व को जानते हैं वह तत्त्व तुम्हीं हो ।जो कुछ वर्तमान में है , भूतकाल में था तथा भविष्यकाल में उत्पन्न होगा वह सब पुरुष ब्रह्म है । सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलाम् ” ।उसीसे इस विश्व की उत्पत्ति , स्थिति तथा लय होता है ।जिस प्रकार सुर्वण अपने कार्यरूप मुकुट आदि का कारण भी है तथा आत्मा भी , वह परम तत्त्व तुम्ही हो।हे सोम्य! तत्त्ववित् पुरुष कभी पश्चाताप  हुए अपना सिर नहीं पीटता कि  हाय ! मैंने अमुक पाप कर्म क्यों किया ? तथा अमुक पुण्य कर्म क्यों नहीं किया , इस प्रकार वह ताप को प्राप्त नहीं होता । यह सम्पूर्ण जगत् मिथ्या है , इस प्रकार हृदय में अनुसंधान करनेवाला पुरुष कर्मफलों से किसी प्रकार भी लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार स्वप्न काल में किये गये पुण्य पाप जागनेपर मिथ्या बुद्धि से नष्ट होने के कारण कदाचिदपि शुभाशुभ फल के लिए नहीं होते
चाहे वह सौ अश्वमेध यज्ञ करे अथवा चाहे अगणित ब्राह्मणों की हत्या करे , तो भी परमार्थतत्त्व को जाननेवाला पुरुष सुकृत और दुष्कृत से लिप्त नहीं होता !शरीर बन्धनरूप है । इसका कारण धर्माधर्भ है । इनकी शिथिलता समाधि बल से होती है और चित्त के गमनागमन की नाड़ी के ज्ञान से योगी लोग चित्त को अपनी इच्छा से दूसरे शरीर में प्रवृष्ट कर सकते हैं
इस प्रकार श्री शङ्कर देशिकेन्द्र द्वारा आत्मतत्त्वका उपदेश पाकर मण्डनमिश्र आचार्य के श्री चरणों गिरकर कहने लगे -हे भगवन् ! आज मैं धन्य हुआ हूँ । आपकी कृपासे अविद्यारूपी पिशाचिनी से मुक्त हुआ हूँ । अनन्त जन्मों से इस अज्ञाननिद्रा में सोया आज जागा हूँ । अन्धकार से प्रकाश में आया हूँ । द्वैत से अद्वैत , भय से अभय , मृत्यु से अमृत को प्राप्त हुआ हूँ । आहा ! हा !! आज मायाका पदा हट गया जिसने आज तक हमारे असली आत्मस्वरूप को ढाक रखा था जिससे आत्मा से भिन्न जड वस्तुओं को आत्मा मानकर आसक्त होकर अनन्त दुःखों का अनुभव करना पड़ रहा था । भगवन् ! आज आपके कृपा कटाक्षसे मुझे दिव्यनेत्र प्राप्त हुए है जो अभी तक अनेक देवताओं को प्रसन्न करनेपर भी प्राप्त नहीं हो पाये थे । मैं ही ब्रह्मा हूँ । मैं देवाधिदेव साक्षात् शिव हूँ । मैं ही शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव हूँ । सुख क्षणिक विषयों में ढूँढनेपर मी प्राप्त नहीं हुआ वह निरतिशय अनन्त आनन्द का समुद्र आज आपकी कृपा से प्राप्त हुआ है । हे दयालु गुरुदेव ! हमारे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आपको भेंटकर सकूँ । यही सब आपके चरणों में अर्पित है ? ऐसा कहते मण्डन मिश्र फिर आचार्य के चरणकमलों में गिर पड़े।
 आचार्य ने उसे स्नेह से उठाकर कहा – हे विद्वन् ! तुम कृतकृत्य हुए हो । आजसे आपका सन्यास नाम
” सुरेश्वराचार्य ” रखा जाता है ।{ आचार्य ने अपने प्रथम अद्वैत वेदान्त मठ ” श्रृङ्गेरी मठ में आचार्य पदपर पूर्णाभिषेक कर ” अहं ब्रह्मास्मि ” महावाक्य का दान दिया । } 
!!! भज गोविन्दम’ स्तोत्र !!!
 ‘मोह मुगदर’
भज गोविन्दम’ स्तोत्र को मोहमुदगर भी कहा गया है जिसका अर्थ है- वह शक्ति जो आपको सांसारिक बंधनों से मुक्त कर दे । ‘भज गोविन्दम’ में शंकराचार्य ने संसार के मोह में ना पड़ कर भगवान् कृष्ण की भक्ति करने का उपदेश दिया है। उनके अनुसार, संसार असार है और भगवान् का नाम शाश्वत है। उन्होंने मनुष्य को किताबी ज्ञान में समय ना गँवाकर और भौतिक वस्तुओं की लालसा, तृष्णा व मोह छोड़ कर भगवान् का भजन करने की शिक्षा दी है। इसलिए ‘भज गोविन्दम’ को ‘मोह मुगदर’ यानि मोह नाशक भी कहा जाता है।

भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। 
सम्प्राप्ते सन्निहिते मरणे, नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥1॥

हे भटके हुए प्राणी, सदैव परमात्मा का ध्यान कर क्योंकि तेरी अंतिम सांस के वक्त तेरा यह सांसारिक ज्ञान तेरे काम नहीं आएगा। सब नष्ट हो जाएगा।

मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णां, कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्। 
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं, वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥2॥

हम हमेशा मोह माया के बंधनों में फसें रहते हैं और इसी कारण हमें सुख की प्राप्ति नहीं होती। हम हमेशा ज्यादा से ज्यादा पाने की कोशिश करते रहते हैं। सुखी जीवन बिताने के लिए हमें संतुष्ट रहना सीखना होगा। हमें जो भी मिलता है उसे हमें खुशी खुशी स्वीकार करना चाहिए क्योंकि हम जैसे कर्म करते हैं, हमें वैसे ही फल की प्राप्ति होती है।
नारीस्तनभरनाभीनिवेशं, दृष्ट्वा- माया-मोहावेशम्।
 एतन्मांस-वसादि-विकारं, मनसि विचिन्तय बारम्बाररम् ॥ 3॥

हम स्त्री की सुन्दरता से मोहित होकर उसे पाने की निरंतर कोशिश करते हैं। परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सुन्दर शरीर सिर्फ हाड़ मांस का टुकड़ा है।

नलिनीदलगतसलिलं तरलं, तद्वज्जीवितमतिशय चपलम्। 
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥4॥

हमारा जीवन क्षण-भंगुर है। यह उस पानी की बूँद की तरह है जो कमल की पंखुड़ियों से गिर कर समुद्र के विशाल जल स्त्रोत में अपना अस्तित्व खो देती है। हमारे चारों ओर प्राणी तरह तरह की कुंठाओं एवं कष्ट से पीड़ित हैं। ऐसे जीवन में कैसी सुन्दरता?

यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावत् निज परिवारो रक्तः। 
पश्चात् धावति जर्जर देहे, वार्तां पृच्छति कोऽपि न गेहे ॥5॥

जिस परिवार पर तुम ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, जिसके लिए तुम निरंतर मेहनत करते रहे, वह परिवार तुम्हारे साथ तभी तक है जब तक के तुम उनकी ज़रूरतों को पूरा करते हो।

यावत्पवनो निवसति देहे तावत् पृच्छति कुशलं गेहे। 
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥6॥

तुम्हारे मृत्यु के एक क्षण पश्चात ही वह तुम्हारा दाह-संस्कार कर देंगे। यहाँ तक की तुम्हारी पत्नी जिसके साथ तुम ने अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारी, वह भी तुम्हारे मृत शरीर को घृणित दृष्टि से देखेगी।

बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः। 
वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥7॥

सारे बालक क्रीडा में व्यस्त हैं और नौजवान अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट करने में समय बिता रहे हैं। बुज़ुर्ग केवल चिंता करने में व्यस्त हैं। किसी के पास भी उस परमात्मा को स्मरण करने का वक्त नहीं।

का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयं अतीव विचित्रः। 
कस्य त्वं कः कुत अयातः तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः ॥8॥

कौन है हमारा सच्चा साथी? हमारा पुत्र कौन हैं? इस क्षण- भंगुर, नश्वर एवं विचित्र संसार में हमारा अपना अस्तित्व क्या है? यह ध्यान देने वाली बात है।
सत्संगत्वे निःसंगत्वं, निःसंगत्वे निर्मोहत्वं।
 निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥9॥

संत परमात्माओ के साथ उठने बैठने से हम सांसारिक वस्तुओं एवं बंधनों से दूर होने लगते हैं। ऐसे हमें सुख की प्राप्ति होती है। सब बन्धनों से मुक्त होकर ही हम उस परम ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं।

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः। 
क्षीणे वित्ते कः परिवारो ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥10॥

यदि हमारा शरीर या मस्तिष्क स्वस्थ नहीं तो हमें शारीरिक सुख की प्राप्ति नहीं होगी। वह ताल ताल नहीं रहता यदि उसमें जल न हो। जिस प्रकार धन के बिखर जाने से पूरा परिवार बिखर जाता है, उसी तरह ज्ञान की प्राप्ति होते ही, हम इस विचित्र संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।

मा कुरु धन-जन-यौवन-गर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वम्। 
मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्म पदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥11॥

हमारे मित्र, यह धन दौलत, हमारी सुन्दरता एवं हमारा गुरूर, सब एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। कुछ भी अमर नहीं है। यह संसार झूठ एवं कल्पनाओं का पुलिंदा है। हमें सदैव परम ज्ञान प्राप्त करने की कामना करनी चाहिए।
दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः। कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चति आशावायुः ॥12॥
समय का बीतना और ऋतुओं का बदलना सांसारिक नियम है। कोई भी व्यक्ति अमर नहीं होता। मृत्यु के सामने हर किसी को झुकना पड़ता है। परन्तु हम मोह माया के बन्धनों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते हैं।

का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता। 
त्रिजगति सज्जन संगतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥13॥

सांसारिक मोह माया, धन और स्त्री के बन्धनों में फंस कर एवं व्यर्थ की चिंता कर के हमें कुछ भी हासिल नहीं होगा। क्यों हम सदैव अपने आप को इन चिंताओं से घेरे रखते हैं? क्यों हम महात्माओं से प्रेरणा लेकर उनके दिखाए हुए मार्ग पर नहीं चलते? संत महात्माओं से जुड़ कर अथवा उनके दिए गए उपदेशों का पालन कर के ही हम सांसारिक बन्धनों एवं व्यर्थ की चिंताओं से मुक्त हो सकते हैं ।

जटिलो मुण्डी लुञ्चित केशः काषायाम्बर-बहुकृतवेषः।
 पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः उदरनिमित्तं बहुकृत शोकः ॥14॥

इस संसार का हर व्यक्ति चाहे वह दिखने में कैसा भी हो, चाहे वह किसी भी रंग का वस्त्र धारण करता हो, निरंतर कर्म करता रहता है। क्यों? केवल रोज़ी रोटी कमाने के लिए। फिर भी पता नहीं क्यों हम सब कुछ जान कर भी अनजान बनें रहते हैं।
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशन विहीनं जातं तुण्डम्। 
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चति आशापिण्डम् ॥15॥

जिस व्यक्ति का शरीर जवाब दे चूका है, जिसके बदन में प्राण सिर्फ नाम मात्र ही बचे हैं, जो व्यक्ति बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकता, वह व्यक्ति भी स्वयं को सांसारिक मोह माया से छुड़ाने में असमर्थ रहा है।

अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः रात्रौ चिबुक- समर्पित-जानुः। 
करतलभिक्षा तरुतलवासः तदपि न मुञ्चति आशापाशः ॥16॥

समय निरंतर चलता रहता है। इसे न कोई रोक पाया है और न ही कोई रोक पायेगा। सिर्फ अपने शरीर को कष्ट देने से और किसी जंगल में अकेले में कठिन तपस्या करने से हमें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी।

कुरुते गंगासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्। 
ज्ञानविहिनः सर्वमतेन मुक्तिः न भवति जन्मशतेन ॥17॥

हमें मुक्ति की प्राप्ति सिर्फ आत्मज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकती है। लम्बी यात्रा पर जाने से या कठिन व्रत रखने से हमें परम ज्ञान अथवा मोक्ष प्राप्त नहीं होगा।

सुर-मन्दिर-तरु-मूल- निवासः शय्या भूतलमजिनं वासः। 
सर्व-परिग्रह-भोग-त्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥18॥

जो इंसान संसार के भौतिक सुख सुविधाओं से ऊपर उठ चुका है, जिसके जीवन का लक्ष्य शारीरिक सुख एवं धन और समाज में प्रतिष्ठा की प्राप्ति मात्र नहीं है, वह प्राणी अपना सम्पूर्ण जीवन सुख एवं शांति से व्यतीत करता है।

योगरतो वा भोगरतो वा संगरतो वा संगविहीनः।
 यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दति एव ॥19॥

चाहे हम योग की राह पर चलें या हम अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना ही बेहतर समझें, यदि हमने अपने आप को परमात्मा से जोड़ लें तो हमें सदैव सुख प्राप्त होगा।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गंगा- जल-लव-कणिका-पीता। 
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ॥20॥

जो अपना समय आत्मज्ञान को प्राप्त करने में लगाते हैं, जो सदैव परमात्मा का स्मरण करते हैं एवं भक्ति के मीठे रस में लीन हो जाते हैं, उन्हें ही इस संसार के सारे दुःख दर्द एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्।
 इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥21॥
हे परम पूज्य परमात्मा! मुझे अपनी शरण में ले लो। मैं इस जन्म और मृत्यु के चक्कर से मुक्ति प्राप्त करना चाहता हूँ। मुझे इस संसार रूपी विशाल समुद्र को पार करने की शक्ति दो ईश्वर।

रथ्याचर्पट-विरचित- कन्थः पुण्यापुण्य-विवर्जित- पन्थः। 
योगी योगनियोजित चित्तः रमते बालोन्मत्तवदेव ॥22॥

जो योगी सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर अपनी इन्द्रियों को वश में करने में सक्षम हो जाता है, उसे किसी बात का डर नहीं रहता और वह निडर होकर, एक चंचल बालक के समान, अपना जीवन व्यतीत करता है।

कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः।
 इति परिभावय सर्वमसारम् विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥23॥

हम कौन हैं? हम कहाँ से आये हैं? हमारा इस संसार में क्या है? ऐसी बातों पर चिंता कर के हमें अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। यह संसार एक स्वप्न की तरह ही झूठा एवं क्षण-भंगुर है।

त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि सर्वसहिष्णुः।
 सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥24॥

संसार के कण कण में उस परमात्मा का वास है। कोई भी प्राणी ईश्वर की कृपा से अछूता नहीं है।

शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ। 
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाछंसि अचिराद् यदि विष्णुत्वम्॥ 25॥

हमें न ही किसी से अत्यधिक प्रेम करना चाहिए और न ही घृणा। सभी प्राणियों में ईश्वर का वास है। हमें सबको एक ही नज़र से देखना चाहिए और उनका आदर करना चाहिए क्योंकि तभी हम परमात्मा का आदर कर पाएंगे।

कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं भावय कोऽहम्। 
आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥26॥

हमारे जीवन का लक्ष्य कदापि सांसारिक एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं होना चाहिए। हमें उन्हें पाने के विचारों को त्याग कर, परम ज्ञान की प्राप्ति को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। तभी हम संसार के कष्ट एवं पीडाओं से मुक्ति पा सकेंगे।
गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्। 
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥27॥

उस परम परमेश्वर का सदैव ध्यान कीजिए। उसकी महिमा का गुणगान कीजिए। हमेशा संतों की संगती में रहिए और गरीब एवं बेसहारे व्यक्तियों की सहायता कीजिए।

सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः। 
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥28॥

जिस शरीर का हम इतना ख्याल रखते हैं और उसके द्वारा तरह तरह की भौतिक एवं शारीरिक सुख पाने की चेष्टा करते हैं, वह शरीर एक दिन नष्ट हो जाएगा। मृत्यु आने पर हमारा सजावटी शरीर मिट्टी में मिल जाएगा। फिर क्यों हम व्यर्थ ही बुरी आदतों में फंसते हैं।

अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।
 पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥ 29॥

संसार के सभी भौतिक सुख हमारे दुखों का कारण है। जितना ज्यादा हम धन या अन्य भौतिक सुख की वस्तुओं को इकट्ठा करते हैं, उतना ही हमें उन्हें खोने का डर सताता रहता है। सम्पूर्ण संसार के जितने भी अत्यधिक धनवान व्यक्ति हैं, वे अपने परिवार वालों से भी डरते हैं।

प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्य विवेकविचारम्। 
जाप्यसमेत समाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥30॥

हमें सदैव इस बात को ध्यान में रखना चाहिए की यह संसार नश्वर है। हमें अपनी सांस, अपना भोजन और अपना चाल चलन संतुलित रखना चाहिए। हमें सचेत होकर उस ईश्वर पर अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर देना चाहिए।
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः।
 सेन्द्रियमानस नियमादेवं द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम् ॥ 31॥

हमें अपने गुरु के कमल रूपी चरणों में शरण लेनी चाहिए। तभी हमें मोक्ष की प्राप्ति होगी। यदि हम अपनी इन्द्रियों और अपने मस्तिष्क पर संयम रख लें तो हमारे अपने ही ह्रदय में हम ईश्वर को महसूस कर पायेंगे।
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‘यक्ष- युधिष्ठिर संवाद’
यक्ष और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच संवाद -महाकाव्य महाभारत में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद नाम से एक पर्याप्त चर्चित प्रकरण है यह प्रसंग वस्तुतः काफी लंबा है । संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय ३१२ एवं ३१३ में दिया गया है । संक्षेप में उसका विवरण यूं है:-
पांडव जन अपने तेरह-वर्षीय वनवास पर वनों में विचरण कर रहे थे । तब उन्हें एक बार प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश हुई । पानी का प्रबंध करने का जिम्मा प्रथमतः सहदेव को सोंपा गया । उसे पास में एक जलाशय दिखा जिससे पानी लेने वह वहां पहुंचा । जलाशय के स्वामी अदृश्य यक्ष ने आकाशवाणी के द्वारा उसे रोकते हुए पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर देने की शर्त रखी, जिसकी सहदेव ने अवहेलना कर दी । यक्ष ने उसे निर्जीव (संज्ञाशून्य?)  कर दिया । उसके न लौट पाने पर बारी-बारी से क्रमशः नकुल, अर्जुन एवं भीम ने पानी लाने की जिम्मेदारी उठाई ।
 वे उसी जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की शर्तों की अवज्ञा करने के कारण सभी का वही हस्र हुआ । अंत में युधिष्ठिर स्वयं उस जलाशय पर पहुंचे । यक्ष ने उन्हें आगाह किया और अपने प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कहा । युधिष्ठिर ने धैर्य दिखाया, यक्ष को संतुष्ट किया, और जल-प्राप्ति के साथ यक्ष के वरदान से भाइयों का जीवन भी वापस पाया । यक्ष ने अंत में यह भी उन्हें बता दिया कि वे धर्मराज हैं और उनकी परीक्षा लेना चाहते थे । यक्ष ने सवालों की झणी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली । अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए । [ किन्तु युधिष्ठिर  का उत्तर प्रत्येक मनुष्य का उत्तर नहीं हो सकता है, अतः हमें स्वयं इन प्रश्नों  का सही उत्तर ढूँढना चाहिये - चाहे किसी प्रश्न का उत्तर खोजने में हमें ४० वर्षों तक भी चिन्तन-मनन क्यों  न करना पड़े!}
१. यक्ष प्रश्न – कौन हूँ मैं? युधिष्ठिर – तुम न यह शरीर हो, न इन्द्रियां, न मन, न बुद्धि। तुम शुद्ध चेतना हो, वह चेतना जो सर्वसाक्षी है।
२. यक्ष – जीवन का उद्देश्य क्या है? युधिष्ठिर – जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है।
३. यक्ष – जन्म का कारण क्या है? युधिष्ठिर – अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं।
४. यक्ष – जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है? युधिष्ठिर – जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
५. यक्ष – वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है? युधिष्ठिर – जैसी वासनाएं वैसा जन्म। यदि वासनाएं पशु जैसी तो पशु योनि में जन्म। यदि वासनाएं मनुष्य जैसी तो मनुष्य योनि में जन्म।
६. यक्ष – संसार में दुःख क्यों है? युधिष्ठिर – लालच, स्वार्थ, भय संसार के दुःख का कारण हैं।
७. यक्ष – तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की? युधिष्ठिर – ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की।
८. यक्ष – क्या ईश्वर है ? कौन है वह ? क्या रुप है उसका ? क्या वह स्त्री है या पुरुष ? युधिष्ठिर – हे यक्ष ! कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो इसलिए वह भी है उस महान कारण को ही आध्यात्म में ईश्वर कहा गया है। वह न स्त्री है न पुरुष।
९. यक्ष – उसका स्वरूप क्या है? युधिष्ठिर – वह सत्-चित्-आनन्द है, वह अनाकार ही सभी रूपों में अपने आप को स्वयं को व्यक्त करता है
३५. यक्ष – वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी? युधिष्ठिर – माया।
३६. यक्ष – माया क्या है? युधिष्ठिर – नाम और रूपधारी नाशवान जगत 
३७. यक्ष – परम सत्य क्या है 
युधिष्ठिर – ब्रह्म।…!
पहले श्लोक में हमने जीवन की अन्तर्मुख यात्रा के संबंध में हमने पढ़ा था कि हमारा लक्ष्य, यम-नियम-आसन-पत्याहार-धारणा अर्थात महासंयोग का अभ्यास करके अतिचेतन में पहुँचकर अविनाशी आनन्द का साक्षात्कार करना है ! चीत्त में वह संस्कार यदि क्षण के लिए एक बार भी पड़ गया; स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " एक बार संस्कार पड़ने पर वह मिटता नहीं, चित्त के उपर उसकी गहरी लकीर पड़ जाती है।  हमलोग बार बार मन-वचन-कर्म से जो कुछ भी सोचते, बोलते, करते हैं, उसकी ऑफिस कॉपी या कार्बन कॉपी-उसकी  एक छाप या संस्कार चित्त में संचित रह जाते हैं। अतः पहले बुरी आदतों को अच्छी आदतों में बदलो -इससे चित्त के ऊपर सद्संस्कारों की गहरी छाप पड़ जायगी।  और अवचेतन मन के विशाल सागर में गहराई तक छपे कर्मों के संस्कार नियंत्रण में आने लगेंगे। यही हमारी साधना का पहला अंग (निरंतर विवेक-प्रयोग और चरित्र-निर्माण अर्थात यम-नियम का अभ्यास) है, और हमारे सामाजिक कल्याण के लिये इसकी नितान्त आवश्यकता है।
 ( फिर प्रातः और सायं दो बार नियम पूर्वक आसन-प्रत्याहार-धारणा या मनःसंयोग का अभ्यास करते हुए क्रमशः) अतिचेतन या इन्द्रियातीत अवस्था में पहुँचना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। अतः जीवन में एक ईश्वर तुल्य अर्थात पूर्णतः निःस्वार्थ आदर्श जो प्रेमस्वरूप एवं पवित्रता स्वरुप भी है, उसका चयन आज ही कर लो। और उन्हें अपने ह्रदय-कमल में आसन देकर उनके ही ऊपर प्रत्याहार -धारणा का अभ्यास करो। इस प्रकार अध्यवसाय पूर्वक अपने जीवनादर्श या रोल मॉडल पर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करते करते, एक दिन जब साहचर्य  (लॉ ऑफ़ असोसिएसन)के नियमानुसार चित्त शुद्ध हो जाता है, मन इन्द्रियातीत अवस्था में पहुँच जाता है। जब उस अवस्था की उपलब्धि हो जाती है, तब यही मानव दिव्य बन जाता है, मुक्त हो जाता है।और तब हम जन्म-मृत्यु के इस बंधन से मुक्त होकर उस ' एक' की ओर प्रयाण करते हैं, जहाँ-जन्म और मृत्यु किसी का अस्तित्व नहीं है, तब हम सत्य को जान लेते हैं और सत्यस्वरूप बन जाते हैं। ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति ! " ३/९३ 

" ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सम्पूर्णतया बुरी हो। यहाँ शैतान और  ईश्वर दोनों के लिए ही स्थान है, अन्यथा शैतान यहाँ होता ही नहीं। हमारी भूलों की भी यहाँ उपयोगिता है। बढे चलो ! यदि तुम सोचते हो कि तुमने कोई अनुचित कार्य किया है, तो फिर पीछे फिर कर मत देखो। यदि तुमने पहले इन गलतियों को न किया होता, तो क्या तुम मानते हो कि आज तुम जैसे हो, वैसे कभी हो सकते थे ? छोटी छोटी भूलों और बातों पर ध्यान न दो। हमारी इस रणभूमि में भूलों की धूल तो उड़ेगी ही।
यदि किसी चित्र (टीवी धारावाहिक ) में तुम दुःख का दृश्य देखो, तो तुम में से कौन उसे सहन नहीं कर सकता ? इसका कारण क्या है -जानते हो ? -हम उन चित्रों की धारावाहिक श्रृंखला के साथ अपना तादात्म्य नहीं करते, क्योंकी चित्र-शृंखला असत है, अवास्तविक है, हम जानते हैं कि वह एक दृश्य मात्र है। यदि पर्दे पर कोई भयानक दुःख वाला दृश्य -'फिल्म देवदास ' चल रहा हो, तो शायद हम उसका रस भी ले सकते हैं। हम कलाकार और निर्देशक के कला की प्रशंसा करते हैं, हम उसकी असाधारण प्रतिभा पर आश्चर्यचकित हो जाते हैं, भले बिभीतस्तम् दृश्य ही क्यों न हो। इसका रहस्य क्या है ? अनासक्ति ही इसका रहस्य है। अतएव साक्षी बनो। कहो -'मैं साक्षी हूँ, मैं आत्मा हूँ ! 'कोई भी बाह्य वस्तु मुझे स्पर्श नहीं कर सकती। 
सुवर्ण की एक थैली क्या कभी मेरा आदर्श हो सकती है ? कदापि नहीं ! कोई कारण नहीं कि मैं {इस्केलिये } कर्म करूँ, कोई कारण नहीं, जो मैं इसको पाने के लिये दुःखभोग करूँ, मैं सब कर्मों से निबट चूका हूँ, मैं साक्षी स्वरुप हूँ। मैं अपनी पिक्चर गैलरी या टीवी रूम में हूँ, यह विश्व मेरा म्यूज़ियम-थियेटर  है, मैं यहाँ एक साक्षी के रूप में इन क्रमिक चित्रों को देख रहा हूँ। वे सभी सुन्दर हैं -भले हों या बुरे। मैं सतरंगी चित्रों के इस श्रृंखला के अत्यद्भुत् कौशल को देख रहा हूँ; यह सब उस महान चित्रकार की अनन्त चित्र-शृंखला है। सचमुच, किसी का अस्तित्व नहीं है- न संकल्प है, न विकल्प। वही सब कुछ हैं। वही जगत जननी लीला कर रही है, और हम सब उनके खिलौने जैसे हैं, उनकी लीला में सहायक मात्र हैं। यहाँ वे किसी को कभी एक भिखारी के रूप में सजाती हैं, और कभी एक राजा के रूप में, तीसरे क्षण उसे एक साधु का रूप दे देती हैं,  देर बाद एक शैतान की वेश-भूषा पहना देती हैं। जगतजननी के लीलाविलास में उनकी सहायता के लिये हम विभिन्न रूप धारण कर रहे हैं।
हमारे जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं, जब हम अनुभव करते हैं, कि हमारा खेल - ( मनुष्य बनने का ) खत्म हो चुका, और तब हम जगन्माता की ओर दौड़ जाना चाहते हैं। तब, हमारे लिये यहाँ के सारे कार्य-कलापों का कोई मूल्य नहीं रह जायेगा, नर-नारी-बच्चे, धन-नाम-यश, जीवन के हर्ष और महत्व, दण्ड पर पुरस्कार-इनका कुछ भी मूल्य न रह जायेगा और  सारा जीवन एक तमाशा प्रतीत होगा। हम केवल उस असीम छन्दोक्रम -बदलते हुए छाया -चित्रों का अवलोकन करेंगे, बिना किसी गंतव्य स्थल के, बिना किसी उद्देश्य के जो चलता जा रहा है, न जाने कहाँ? हम केवल इतना ही कह सकेंगे - ' हमारा खेल समाप्त हो चुका ! (हम मनुष्य बन सके ? ) ३/ ९८ 

' ब्रुकलिन से २० जनवरी, १८९५ को श्रीमती ओलि बुल को लिखित पत्र '

[उनके पिता की मृत्यु के अवसर पर लिखित। स्वामीजी ने उन्हें धीरा माता कहकर सम्बोधित किया था]

प्रिय धीरा माता, 
आपके पिता के जीर्ण शरीर छोड़ने से पहले ही मुझे पूर्वाभास हो गया था, किन्तु जब किसी व्यक्ति से भावी माया की प्रतिकूल लहर टकराने वाली हो तो मैं उसे पहले से ही लिख दूँ-मेरा यह नियम नहीं है। ये अवसर जीवन को मोड़ देने वाले होते हैं। और मैं जानता हूँ कि आप विचलित नहीं हुई हैं। समुद्र के सतह पर लहरें बारी बारी से उठती-गिरती रहती हैं, किन्तु द्रष्टा आत्मा को - जो ज्योति की सन्तान है, प्रत्येक लहरों के डूबने की गहराई तक, समुद्र के तल में मोती और मूंगों की परतें ही प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं। 
आना (जन्म ) और जाना (मृत्यु) केवल भ्रम है। आत्मा न आती है, न जाती है। वह किस स्थान में जायगी, जब कि सम्पूर्ण स्पेस (देश) आत्मा में ही स्थित है? प्रवेश करने और प्रस्थान करने का कौन समय होगा, जब समस्त काल आत्मा के भीतर ही है।
पृथ्वी घूमती है और सूर्य के घूमने का भ्रम उत्पन्न होता है। किन्तु सूर्य नहीं घूमता। इसी प्रकार प्रकृति या माया चंचल और परिवर्तनशील है। यहाँ नाम-रूपों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है, और इसी क्रम में एक के बाद दूसरा घूँघट उठता चला जाता है; माया इस जगत रूपी विराट पुस्तक के पन्ने पर पन्ने बदलती जाती है, जबकि साक्षी आत्मा अप्रभावित (अन्मूव्ड), और अपरिणामी (अन्चेन्ज्ड=रज्जु-सर्प न्याय) रहकर ज्ञान का पान करती है। 
जितनी भी जीवात्माएं हो चुकी हैं या होंगी,सभी वर्तमान काल में हैं -और यदि जड़ जगत की एक उपमा की सहायता लेकर कहें, तो वे सभी दिवंगत या भावी आत्माएँ एक ही ज्यामितीय बिन्दु (जोमेट्रिकल पॉइंट) पर स्थित हैं। चूँकि आत्मा में देश का भाव नहीं रहता, इसलिये जो हमारे थे, वे हमारे हैं, सर्वदा हमारे रहेंगे और सर्वदा हमारे साथ हैं। वे सर्वदा हमारे साथ थे, और हमारे साथ रहेंगे। हम उनमें हैं, वे हममें। निम्नांकित कोषाणुओं (सेल्ज्स) के  रेखा-चित्र (डायग्राम) देखो ।  
यद्द्पि इनमें से प्रत्येक पृथक है, तथापि वे सब के सब (A) देह और (B) प्राण को जोड़ने वाली रेखा (AB-आत्मा) के इन दो बिन्दुओं में अभिन्न भाव से संयुक्त हैं। वहाँ सब हैं। प्रत्येक देहाध्यासि जीवात्मा -a',a'',a''' (मनुष्य) और  b',b'',b''' (अन्य दृष्टिगोचर या सूक्ष्म जीव-जड़ वस्तुओं ) का अलग अलग व्यक्तित्व (नाम-रूप) है, परन्तु वे सब 'AB' बिन्दुओं पर एक हैं। 
कोई भी उस अक्ष-रेखा (ऐक्सिस 'AB' -आत्मा या भगवान ) से निकलकर भाग नहीं सकता। और उसकी परिधि चाहे कितनी टूटी या फूटी क्यों न हो, परन्तु अक्ष-रेखा में खड़े होने से हम किसी भी कक्ष (चैम्बर) में प्रवेश  सकते हैं। यह अक्ष-रेखा ईश्वर (आत्मा) है। वहाँ उससे हम अभिन्न हैं, सब सबमें  है, और सब ईश्वर में है। चन्द्रमा के मुख पर चलते हुए बादल यह भ्रम उतपन्न करते हैं कि चन्द्रमा चल रहा है। 
 इसी प्रकार प्रकृति, शरीर और जड़ वस्तुएँ  (a',a'',a''' (मनुष्य) और  b',b'',b''') ही गतिशील हैं और उनकी गति (जन्म-बचपन-कैशोर्य-यौवन-प्रौढ़-बुढ़ापा -मृत्यु ) उनकी यह अनिवार्य गति ही ऐसा भ्रम उतपन्न करती है कि मानों (AB) आत्मा ही गतिशील है!! इस प्रकार अन्त में हमें यह पता चलता है कि जिस जन्मजात-प्रवृत्ति (अथवा अन्तः स्फुरणा ? ) से सब जातियाँ -उच्च या निम्न -दिवंगत आत्माओं (मृत व्यक्तियों ) की उपस्थिति अपने समीप अनुभव करती  हैं, यह घटना युक्ति की दृष्टि (इन्टलेक्चूअली बौद्धिक रूप से ) से भी सत्य है!! 
प्रत्येक दिवंगत जीवात्मा एक नक्षत्र है, और ये सभी नक्षत्र ईश्वररूपी उस अनन्त निर्मल नील गगन में विन्यस्त हैं। वही ईश्वर प्रत्येक जीवात्मा का मूलस्वरूप है, वही प्रत्येक का यथार्थ स्वरुप और वही प्रत्येक और सबका प्रकृत व्यक्तित्व है। इन जीवात्मा -रूप नक्षत्रों में से कुछ के, जो हमारी दृष्टि-सीमा से भी परे चले गये हैं, अनुसन्धान से ही धर्म का आरम्भ हुआ और यह अनुसन्धान तब समाप्त हुआ, जब हमने पाया कि उन सबकी अवस्थिति (AB-आत्मा) या परमात्मा में ही है और हम भी उसी में हैं। अब सारा रहस्य यह है कि आपके पिता ने जो जीर्ण वस्त्र पहना था, उसका त्याग उन्होंने कर दिया, और वे वहीँ अवस्थित हैं, जहाँ वे अनन्त काल से थे। 
इस लोक में या किसी और लोक में क्या वे फिर ऐसा ही कोई वस्त्र पहनेंगे ? मैं सच्चे दिल से प्रार्थना करता हूँ कि ऐसा न हो, जब तक कि वे स्वयं ऐसा पूरे ज्ञान के साथ न करें। मैं प्रार्थना करता हूँ कि अपने पूर्व कर्म की अदृश्य शक्ति से परिचालित होकर कोई भी मनुष्य अपनी इच्छा के विरुद्ध कहीं भी न ले जाया जाय। मैं प्रार्थना करता हूँ कि सभी मुक्त हो जायें अर्थात वे यह अपने अनुभव से जान लें कि वे यहाँ और अभी इसी शरीर में मुक्त हैं !! और यदि वे पुनः कोई स्वप्न देखना चाहें (संसार को मुक्त कराने  इच्छा से ? ) तो वे सब स्वप्न आनन्द और  शान्ति के ही स्वप्न हों।" …… 

प्रसिद्द वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बोस को विदेश भेजने के लिए भारत ने जी जान से कोशिश की। क्योंकि उन्होंने स्वामीजी के ही निम्नोक्त कथन-के आधार पर यह सिद्ध कर दिखाया था कि पौधों में भी जीवन होता है। " यदि यह कहा जाय कि पौधा (प्लैन्ट) 'अचेतन'  है, या अधिक से अधिक वह -'चैतन्यरहित इच्छाशक्ति से युक्त ' है, तो उसका यह उत्तर होगा कि यह 'अचेतन वनस्पति क्रिया' (अन्कान्शस प्लान्ट-वील ) भी चैतन्य की ही अभिव्यक्ति है, यह चेतना (कन्श्स्नेस ) उस पौधे का भले न हो, किन्तु वह उसी विश्वव्यापी चेतन बुद्धिशक्ति (कॉस्मिक इंटेलिजेंस) की अभिव्यक्ति है, जिसे सांख्य दर्शन में महत् कहते हैं!" (४/३४१ इ ० टी० स्टर्डी को अगस्त १८९५ में लिखित पत्र) इसी पत्र में आगे कहते हैं -
" बौद्धों का यह मतवाद कि, ' वास्तव-जगत का सभी कुछ उस 'एषणा'  या संकल्प से उद्भूत हुआ है '-- अपूर्ण है। क्योंकि प्रथमतः 'इच्छा' स्वयं ही एक मिश्र पदार्थ (कम्पाउन्ड-संयुक्त जुड़ा हुआ शब्द) है, और द्वितीयतः चैतन्यता या ज्ञान (कांशसनेस ऑर नॉलेज) जो पहले दर्जे का (सर्वश्रेष्ठ) मिश्र पदार्थ (कम्पाउन्ड) है। क्योंकि वह 'तदेकं ' इच्छा के भी पहले विद्यमान है। नॉलेज इज एक्शन - ज्ञान ही क्रिया है। पहले क्रिया होती है, फिर उसके बराबर और बिपरीत प्रतिक्रिया होती है। मन पहले अनुभव करता है एवं उसके बाद प्रतिक्रिया के रूप में उसमें संकल्प का उदय होता है। क्रमविकास की प्रत्येक परम्परा के पीछे क्रमसंकोच की क्रिया निहित है। इसलिये 'वासना' या 'संकल्प' विकास के पूर्व 'महत्' या ' विश्वचेतना' (कॉस्मिक इंटेलिजेंस) संकुचित अथवा सूक्ष्म भाव से विद्द्य्मान रहती है। 

 
Conscoiusness or Mahat by Swami Vivekananda


कॉस्मिक कांशसनेस या विश्वचेतना या महत 
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अवचेतन मन (सब्कान्शस माइंड)----------चेतन मन (कॉन्शस माइंड)-------अतिचेतन मन(सूपर कॉन्शस)|
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चेतनारहित इच्छाशक्ति 
 (अन्कान्शस प्लान्ट-वील)-------चेतन इच्छाशक्ति (कॉन्शस विल प्रॉपर)----अतिचेतन संकल्प (सूपर कॉन्शस विल 'विवेक ')

 देयर इज नो विलिंग विदाउट नोइंग--' बिना ज्ञान के संकल्प असंभव है,' हाउ कैन वी डिज़ायर अनलेस वी नो दी ऑब्जेक्ट ऑफ़ डिज़ायर ? क्योंकि इच्छित वस्तु के संबन्ध में यदि किसी प्रकार का ज्ञान न हो, तो उसको पाने की इच्छा का उदय होगा ही कैसे ? 
 जिस क्षण तुम ज्ञान (अतिचेतन नॉलेज) को चेतन (कॉन्शस) और अवचेतन (सबकॉन्शस) में विभक्त कर सकोगे, उसी क्षण आपाततः कठिन ज्ञात होनेवाला यह ' ज्ञान ' तत्व सरल हो जायगा। ऐसा हो भी क्यों नहीं? यदि संकल्प या इच्छाशक्ति को हम इस प्रकार (विवेक-शक्ति में ) विभक्त कर सकते हैं तो उसके बाप (ज्ञान को ?), उसकी मूल वस्तु को क्यों नहीं विभक्त कर सकते ? ( The apparent difficulty vanishes as soon as you divide knowledge also into subconscious and conscious. And why not? इफ़ विल कैन बी सो ट्रीटेड, व्हाई नॉट इट्स फादर?"
 १३ फरवरी १८९६ ई में श्री इ.टी. स्टर्डी को एक पत्र में लिखते हैं - " श्रीयुत् टेस्ला वैदान्तिक प्राण, आकाश और कल्प के सिद्धान्त को सुनकर बिल्कुल मुग्ध हो गए। उनके कथनानुसार आधुनिक भौतिक विज्ञान केवल इन्ही सिद्धान्तों को ग्रहण कर सकता है। चूँकि आकाश और प्राण दोनों कॉस्मिक महत ब्रह्माण्डीय महत्, यूनिवर्सल माइंड (समष्टि या सर्वव्यापी मन)-- ब्रह्मा या ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं। 
श्री टेस्ला यह समझते हैं कि गणितशास्त्र कि सहायता से वे यह प्रमाणित कर सकते हैं, कि जड़ और शक्ति (मैटर ऐंड एनर्जी) दोनों ही स्थितिक उर्जा (पोटेंशियल एनर्जी ) में रूपांतरित हो सकते हैं।  गणितशास्त्र के इस नवीन प्रमाण (E=Mc2) को समझने के लिए मैं आगामी सप्ताह में उनसे मिलने जाने वाला हूँ। ऐसा होने से वैदान्तिक ब्रह्माण्ड विज्ञान (दी वेदान्तिक कॉस्मोलॉजी) अत्यन्त दृढ़ नींव पर स्थित हो सकेगा। 
मैं आजकल वैदान्तिक 'कॉस्मोलॉजी' एवं  'एस्केटालॉजी' (Eschatology- concerned with death, judgment, and the final destiny of the soul and of humankind.) ब्रह्माण्ड विज्ञान और परलोक विद्या में बहुत कुछ काम कर रहा हूँ। आधुनिक विज्ञान के साथ उनका पूर्ण सामंजस्य मैं स्पष्ट रूप से देखता हूँ, और एक कि व्याख्या के बाद दुसरे की भी हो जायगी। तदोपरान्त इसी विषय पर प्रश्नोत्तर के रूप में एक पुस्तक भी लिखना चाहता हूँ। उसका पहला अध्याय 'कॉस्मोलॉजी' या ब्रह्माण्डीय विज्ञान होगा, जिसमें वैदान्तिक सिद्धान्त और मॉडर्न फ़िजिक्स में सामंजस्य दिखलाया जायगा।  
 
 


      ब्रह्म       =   ऐब्सलूट (पूर्ण-असीम-अनन्त)    
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                   महत् या ईश्वर   =   मौलिक रचनात्मक ऊर्जा (आदि सृष्टिशक्ति)

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                           प्राण         आकाश      फ़ोर्स (शक्ति या ऊर्जा)   मैटर (पदार्थ)         
                                                         
[अविनाशी  ब्रह्म =(पूर्ण-असीम-अनन्त)> से ब्रह्माण्डीय महत्, यूनिवर्सल माइंड (समष्टि या सर्वव्यापी मन) या ईश्वर=आदि सृष्टिशक्ति बने माँ दुर्गा > उसी से प्राण और आकाश उत्पन्न हुआ> उसी मौलिक रचनात्मक ऊर्जा, आदि सृष्टिशक्ति का फ़ोर्स और मैटर का मिलाजुला रूप है माइंड-स्टफ ! वास्तविक मनुष्य आत्मा है।]
  'एस्केटालॉजी' की व्याख्या केवल अद्वैत के दृष्टिकोण से होगी। द्वैतवादियों का कहना है कि मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा सोलर स्फीयर (सूर्य लोक) में जाता है, वहाँ से लूनर स्फीयर (चन्द्र लोक) में और वहाँ से इलेक्ट्रिक स्फीयर (विद्द्युत लोक) में। वहाँ से किसी पुरुष के साथ वह ब्रह्मलोक जाता है। अद्वैतवादी कहते हैं कि वहाँ वह निर्वाण प्राप्त करता है। 
अद्वैतवादी दृष्टिकोण से आत्मा न कहीं आता है, न जाता है और ये सब लोक (स्फेयर) या जगत के  स्तर (लेअर) आकाश और प्राण के विभिन्न परिणाम मात्र हैं। अर्थात सबसे नीचा और सबसे घना सौर मण्डल (सोलर स्फीयर) है जो हमारा विज़िबल यूनिवर्स (दृष्टिगोचर जगत) है। इसी सौर मण्डल में प्राण फिजिकल फ़ोर्स (चुंबकत्व - भौतिक शक्ति) के रूप में प्रकट होता है, और आकाश पंचेन्द्रिय ग्राह्य पदार्थ (सेंसिबल मैटर) के रूप में। 
इसके बाद के स्तर को लूनर स्फेयर - चन्द्र लोक कहते हैं जो सूर्यलोक को चारों ओर से घेरे है। यह चन्द्रमा नहीं है, परन्तु देवताओं का निवासस्थान है; अर्थात प्राण यहाँ साइकिक फोर्सेज (मानसिक शक्तियों) के रूप में प्रकट होता है, और आकाश तन्मात्रा या सूक्ष्म भूत (फाइन पार्टिकल्स) के रूप में प्रकट होता है। इसके परे विद्द्युत लोक - ' इलेक्ट्रिक स्फेयर '; अर्थात वह अवस्था जहाँ प्राण आकाश से प्रायः  इन्सेपरबल (अभिन्न) है, और यह निर्णय लेना कठिन हो जाता है कि ' इलेक्ट्रिसिटी ' (विद्द्युत) फ़ोर्स  है या मैटर ? विद्द्युत द्रव्य है या शक्ति ?
इसके बाद ब्रह्मलोक है जहाँ न प्राण है, न आकाश, परन्तु दोनों ही चित् -शक्ति अर्थात आदिशक्ति (दी प्राइमल  एनर्जी, माइंड-स्टफ या मनवस्तु) में  मर्ज्ड हैं, या मिले हुए हैं। यहाँ प्राण और आकाश के न रहने से जीव को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक  विश्व समष्टि मन या महत् के रूप में प्रतीत होता है। यह प्रतीति पुरुष या सगुण विश्वात्मा (माँ सारदा ?) की अभिव्यक्ति है, न कि निर्गुण अद्वितीय परमात्मा (श्रीरामकृष्ण ?) की, क्योंकि 'मल्टप्लिसिटी' या विविधता  सूक्ष्म संभावनाओं के रूप में यहाँ भी विद्यमान है। इसके पश्चात् जीव को पूर्ण एकत्व की अनुभूति होती है, जो कि मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है। 
अद्वैत के अनुसार जीव के सम्मुख इन सब अनुभूतियों का प्रकाश एक के बाद एक क्रमशः होता है; परन्तु जीव स्वयं न कहीं आता है न जाता है; और इसी प्रकार इस वर्तमान जगत भी प्रक्षिप्त (प्रोजेक्टेड या अभिव्यक्त) हुआ है। इसी क्रम से प्रक्षेपण (प्रोजेक्शन= सृष्टि) और प्रलय (डिसलूशन) होते हैं; केवल एक का अर्थ है -' पीछे जाना ' (क्रमसंकोच) और दूसरे का -'बाहर निकलना ' (क्रमविकास)।
अब चूँकि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने ही विश्व को देखता है, इसलिये उस विश्व की उत्पत्ति उसके बन्धन के साथ ही होती है, और उसकी मुक्ति से वह विश्व लय हो जाता है, तथापि वह औरों के लिये, जो बन्धन में हैं, अवशेष रहता है। नेम ऐंड फॉर्म से या नाम और रूप से ही विश्व बना है। समुद्र की तरंग, उसी समय तक तरंग कहला सकती है जब तक कि वह नाम और रूप से सीमित है। यदि तरंग शांत हो जाय तो वह समुद्र ही है । किन्तु उसके नाम और रूप  सदा के लिये विलुप्त हो गये। इसलिये उस तरंग का नाम और रूप जल के बिना नहीं हो सकते। उसी जल से नाम और रूप ने तरंग का निर्माण किया, परन्तु फिर भी वे स्वयं तरंग नहीं हैं। जैसे ही तरंग पानी बन जाती है वैसे ही नाम और रूप का लोप हो जाता है, परन्तु दूसरे नाम और रूप, जिनका दूसरी तरंगों से संबन्ध है, वर्तमान रहते हैं। यही ' नेम ऐंड फॉर्म ' या नाम और रूप माया कहलाता है; और पानी ब्रह्म है। [ चादर में पड़ी हुई गाँठ (नाम-रूप) तभी तक गाँठ कहा जाता है, जब तक वह खुल नहीं जाय, यदि गाँठ खुल जाय तो यह पहले भी चादर थी, अब भी चादर ही है। नेम ऐंड फॉर्म = 'गाँठ' या लहर माया है पानी या चादर ब्रह्म ]
सब काल में तरंग पानी ही है, परन्तु फिर भी तरंग (माँ जगद्धात्री ) के आकार में उसका नाम और रूप है! पुनः ये नाम और रूप एक क्षण के लिये भी पानी से पृथक होकर नहीं रह सकते, तथापि तरंग जल-रूप में अनन्त काल नाम और रूप से पृथक होकर रह सकती है। परन्तु  -'नेम ऐंड फॉर्म ' कैन नेवर बी  सेपरेटेड, नाम और रूप कभी पृथक नहीं किये जा सकते, इसलिये उनका अस्तित्व नहीं माना जा सकता। फिर भी ' नेम ऐंड फॉर्म ' ज़ीरो - 
' शून्य ' नहीं है। यही माया है।
[ श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थे - " ईश्वर ( प्राइमल एनर्जी आदि सृष्टिशक्ति 'माँ जगद्धात्री ') का रूप मानना पड़ता है। जगद्धात्री रूप का अर्थ जानते हो ? जिन्होंने जगत को धारण कर रखा है, उनके धारण न करने से, उनके पालन न करने से जगत नष्टभ्रष्ट हो जाय। मनरूपी हाथी को जो वश में कर सकता है, उसी के हृदय में जगद्धात्री उदित होती है । ] 
मैं इसका विवेचन बड़ी सावधानी से करना चाहता हूँ, फिर भी तुम तुरंत यह समझ सकते हो कि 'आइ एम ऑन दी राइट ट्रैक.'--मैं सही राह पर हूँ ! ऊँचे और नीचे केन्द्रों के परस्पर सम्बन्ध को जानने के लिये शरीर-क्रिया विज्ञान  या फिजियोलॉजी का अधिक गहराई से अध्यन करने की आवश्यकता है, केवल तभी इससे मन-वस्तु, जिससे मन बनता है या चित्त (माइंड स्टफ- 'दी प्राइमल  एनर्जी) और बुद्धि ( 'इंटेलेक्ट'या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता ) आदि से सम्बंधित जो साइकोलॉजी या मनोविज्ञान है -उसे पूर्णता प्राप्त होगी। परन्तु मेरी बुद्धि के समक्ष अब सब कुछ स्पष्ट होता जा रहा है, धुँधलापन बिल्कुल दूर हो गया है। मैं उन्हें (तथाकथित बुद्धिजीवियों -कबीलांठों को) देना चाहता हूँ
 ' ड्राई, हार्ड रीज़न' - रुखा और कठोर तर्क, जो प्रेम के अति मधुर रस से कोमल किया गया हो, इंटेंस वर्क या उत्कट कर्म से सुगन्धित मसालेदार बना हो और योग की रसोई में पका हो, जिससे उसे एक शिशु भी -' ईज़ली डाइजेस्ट ' कर सके, या सहज रूप से पचा सके। " (४:३८४) 
" हमें केवल यह समझ लेना होगा कि सामाजिक दोषों के निराकरण का कार्य उतना वस्तुनिष्ठ नहीं है, जितना आत्मनिष्ठ। समाज के दोषों को प्रबल उत्तेजनापूर्ण आन्दोलन द्वारा अथवा कड़े कानून के बल पर सहसा हटा देने से जिस उद्देश्य के लिए वह किया गया था वह उद्देश्य ही विफल हो जाता है। दोषारोपण अथवा निन्दा करने की भला आवश्यकता क्या? ऐसा कौन सा समाज है, जिसमें दोष न हों ? हम जानते हैं कि यहाँ बुराइयाँ हैं, पर बुराई तो हर कोई दिखा सकता है। मानव समाज का सच्चा हितैषी तो वह है जो इन कठिनाइयों से बाहर निकलने का उपाय बताये। ५/ १०९ " मेरा विचार है कि मैं भारत में कुछ ऐसे 'ज्ञान मंदिर ' स्थापित करूँ, जहाँ हमारे नवयुवक अपने शास्त्रों के ज्ञान -(मनःसंयोग और चरित्र-निर्माण पद्धति ) में प्रशिक्षण प्राप्त करके भारत तथा भारत के बाहर मनुष्य-निर्माण और चरित्र निर्माणकारी शिक्षा - 'Be and Make ' का प्रचार कर सकें। ' मनुष्य ' -केवल मनुष्य भर चाहिये। बाकी सब कुछ अपने आप हो जायगा। आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धासम्पन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे सौ मिल जायें, तो संसार का कायाकल्प हो जाय। .... सबके समक्ष अपने धर्म के महान सत्यों का प्रचार करो, संसार इसकी प्रतीक्षा कर रहा है। " हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य बन सकें। हमें ऐसे सिद्धांतों की जरुरत है, जिससे हम मनुष्य हो सकें। हमें ऐसी सर्वांगसंपन्न शिक्षा चाहिये, जो हमें मनुष्य बना सके। और यह रही सत्य की कसौटी --जो भी तुमको शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से दुर्बल बनाये उसे ज़हर की भाँति त्याग दो, उसमें जीवन-शक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता। " ५/११८-१२०