Wednesday, August 13, 2014

विवेकानन्द दर्शनम् सारांश (17-26)

श्लोक संख्या -------विषय --------------------------------------------------------------पृष्ठ
विवेकानन्द दर्शनम्
१७.


जिसका हृदय गरीबों के लिये द्रवीभूत होता है- वह महात्मा है !

श्लोक १७ : प्रयत्नं श्रद्धया कुर्यात् धैर्येनैकाग्रचेतसा। शुद्धतया च वीर्येण तरिंतु भयमुल्वणम्॥

To overcome the great fear (of bondage) one has to strive hard with courage, Shraddha, and one pointed devotion to the ideal.


1.' Purity, patience and perseverance are the three essentials to success.'


2. ' Upon ages of struggle a character is built. '


मनुष्य को भयंकर भय (जन्म-मरण के बन्धन) पर विजय प्राप्त करने के लिये, अदम्य साहस, श्रद्धा एवं अपने आदर्श के प्रति अनन्य भक्ति के साथ कठोर प्रयत्न करना ही पड़ता है।

प्रसंग : १. " परन्तु मेरे बच्चे, इस मार्ग में बाधाएं भी हैं। जल्दबाजी में कोई काम नहीं होगा। (3P) are the three essentials to success  पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय, इन्हीं तीनों गुणों से सफलता मिलती है, और सर्वोपरि है प्रेम।"  (३० नवम्बर, १८९४ को डॉ० नंजुन्दा राव को लिखित पत्र)>

२.' आगे बढ़ो ! सैकड़ों युगों के उद्द्य्म से चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ। (५४१, डियरबॉर्न एवेन्यू, शिकागो, से १८९४ में श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखित पत्र।)

विषयवस्तु -१  : बड़े बड़े काम बिना त्याग (एषणाओं का त्याग - renunciation) के नहीं हो सकते।

संसार के इतिहास से तुम जानते हो कि महापुरुषों ने बड़े बड़े स्वार्थ-त्याग किये उनके शुभ फल का भोग जनता ने किया। अगर तुम अपनी ही मुक्ति के लिये सब कुछ त्यागना चाहते हो, तो फिर वह त्याग कैसा? क्या तुम संसार के कल्याण के लिये अपनी मुक्ति-कामना तक छोड़ने को तैयार हो ? You are God, think of that. यदि तैयार हो, तब तो तुम स्वयं ईश्वर हो, इस पर विचार करो। मेरी राय में तुम्हें कुछ दिनों के लिये ब्रह्चारी बनकर रहना चाहिये। अर्थात कुछ काल के लिये स्त्री-संग छोड़कर अपने पिता के घर में ही रहो ; यही 'कुटीचक' अवस्था है। संसार की हित-कामना के लिये अपने महान स्वार्थ-त्याग के सम्बन्ध में अपनी पत्नी को सहमत करने की चेष्टा करो।
क्योंकि पहले तो किसी व्यक्ति को अधिक उतावलेपन में (अपनी क्षमता को पहचाने बिना) कोई कदम नहीं उठाना चाहिये; दूसरे - तुम्हें अपनी माता और स्त्री के सम्बन्ध में सहृदयतापूर्वक विचारों से काम लेना उचित है। सच है, और तुम यह कह सकते हो कि आप श्रीरामकृष्ण के शिष्यों ने संसार त्याग करते समय अपने माता-पिता की सम्मति की अपेक्षा नहीं की। मैं जनता हूँ और ठीक जानता हूँ कि बड़े बड़े काम बिना त्याग के नहीं हो सकते। मैं अच्छी  जानता हूँ, भारत-माता अपनी उन्नति के लिये अपनी श्रेष्ठ सन्तानों की बलि चाहती है, और यह मेरी आन्तरिक अभिलाषा है कि तुम उन्हीं में से एक सौभाग्यशाली होगे।  
तुम श्री रामकृष्ण को समझ सके (कि वे ब्रह्म हैं), यह जानकर मुझे बड़ा हर्ष है। तुम्हारे तीव्र वैराग्य से मुझे और भी आनन्द मिला। ईश्वर-प्राप्ति का यह आवश्यक अंग है। मुझे पहले से ही मद्रास से बड़ी आशा थी और अभी भी विश्वास है कि मद्रास से वह आध्यात्मिक तरंग उठेगी, जो सारे  प्लावित कर देगी। मैं तो केवल इतना ही कह सकता हूँ कि ईश्वर तुम्हारे शुभ संकल्पों का वेग उत्साह के साथ बढ़ाता रहे; परन्तु मेरे बच्चे, यहाँ कठिनाइयाँ भी हैं। 
समय आने पर तुम्हें वह अधिकार (चपरास) प्राप्त हो जायगा, जब तुम संसार त्यागकर चारों ओर उनके पवित्र नाम का प्रचार कर सकोगे। तुम्हारा संकल्प शुभ और पवित्र है। ईश्वर तुम्हें उन्नत करे, परन्तु जल्दी में कुछ न कर बैठना। पहले कर्म और साधना (उपासना) द्वारा अपने को पवित्र करो। भारत चिरकाल से दुःख सह है रहा है; सनातन धर्म दीर्घकाल से अत्याचार पीड़ित रहा है। परन्तु ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) दयामय हैं। अपने वादे के अनुसार -वह फिर अपनी सन्तानों के परित्राण के लिये आया है, पुनः पतित भारत को उठने का सुयोग मिला है। श्रीरामकृष्ण के पदप्रान्त  बैठने पर ही भारत का उत्थान हो सकता है। उनकी जीवनी एवं उनकी शिक्षाओं को चारों ओर फैलाना होगा, हिन्दू समाज के रोम रोम में उन्हें भरना होगा। यह काम कौन करेगा ?  
है कोई, जो श्रीरामकृष्ण की पताका हाथ में लेकर संसार की मुक्ति के लिये अभियान पर निकल पड़े? है कोई, जो अपने व्यक्तिगत नाम-यश का, ऐश्वर्य-भोग का, यहां तक कि इहलोक और परलोक की सारी आशाओं का बलिदान करके भी, राष्ट्रीय चरित्र में अवनति की बाढ़ रोकने में जुट जाये ? हाँ, कुछ इने-गिने युवकों ने इस कार्य में अपने को झोंक दिया है, अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया है; परन्तु इनकी संख्या अभी बहुत थोड़ी ही है। हम चाहते हैं कि ऐसे ही कई हजार मनुष्य आयें -और मैं जानता हूँ कि वे आयेंगे !
(कहाँ से आयेंगे ?-महामण्डल का जन्म इसी लिये हुआ है) मुझे हर्ष है कि हमारे प्रभु ने तुम्हारे मन में उन्हीं में से एक होने का भाव भर दिया है। धन्य हैं वे, जिन्हें प्रभु ने चुन लिया है ! तुम्हारा संकल्प शुभ है, तुम्हारी आकांक्षाएँ उच्च हैं, घोर अंधकार में डूबे हुए हजारों मनुष्यों को प्रभु के ज्ञानलोक के सम्मुख लाने का तुम्हारा लक्ष्य संसार के सब लक्ष्यों से महान है। परन्तु मेरे बच्चे, इस मार्ग में बाधाएं भी हैं। जल्दबाजी में कोई काम नहीं होगा। Purity, patience, and perseverance (3P) are the three essentials to success and, above all, love. पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय, इन्हीं तीनों गुणों से सफलता मिलती है, और सर्वोपरि है प्रेम। तुम्हारे सामने अनन्त समय है; अतएव अनुचित शीघ्रता आवश्यक नहीं।
यदि तुम पवित्र और निष्कपट हो, तो सब काम ठीक हो जायेंगे। हमें तुम्हारे जैसे हजारों (चपरास प्राप्त व्यक्तियों) की आवश्यकता है, जो समाज पर टूट पड़ें और जहाँ कहीं वे जायें, वहीं नए जीवन और नयी शक्ति का संचार कर दें।" अगर तुममें ज्वलन्त श्रद्धा (burning faith), सर्वविजयनि प्रीति और सर्वशक्तिमयी पवित्रता है, तो तुम्हारे शीघ्र सफल होने में मुझे कुछ भी सन्देह नहीं। तन, मन और प्राणों का उत्सर्ग श्री रामकृष्ण की शिक्षाओं का विस्तार करने में लग जाओ, क्योंकि निःस्वार्थ कर्म (Be and Make) पहला सोपान है।
खूब मन लगाकर संस्कृत का अध्यन करो और साधना का भी अभ्यास करते रहो। कारण, तुम्हें मनुष्य जाति का श्रेष्ठ शिक्षक (नेता) बनना है।( और दूसरों को भी मानव जाति का श्रेष्ठ शिक्षक (नेता) बनने में सहायता करना है। ) और जगतगुरु श्री रामकृष्ण (सम्पूर्ण विश्व के मार्गदर्शक नेता) कहा करते थे, कि कोई आत्महत्या करना चाहे, तो वह नहरनी से भी काम चला सकता है, परन्तु दूसरों को मारना हो (अर्थात दूसरों को भी नेता बनने में सहायता करना हो) तो तोप-तलवार (चपरास) की आवश्यकता होती है।
विषयवस्तु-२ : ' आगे बढ़ो ! सैकड़ों युगों के उद्द्य्म से चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ। '

सत्य अविनाशी है, सद्गुण अनश्वर हैं, पवित्रता अक्षय है ! मुझे सच्चे (अकृत्रिम) मनुष्य की आवश्यकता है; मुझे शंख-ढपोर चेले (जिनका जीवन वैसा न हो जिसका वे उपदेश करते हों)  नहीं चाहिये ।
मेरे ब्च्चे, दृढ़ रहो। कोई आकर तुम्हारी सहायता करेगा, इसका भरोसा न करो। क्या सब प्रकार की मानव-सहायता की अपेक्षा मोस्ट हाई- 'परमपुरुष' श्रीरामकृष्ण क्या अनन्त गुना शक्तिमान नहीं हैं? पवित्र बनो, ईश्वर पर विश्वास रखो, हमेशा उनके ऊपर ही निर्भर रहो- फिर तुम्हारा सब ठीक हो जायेगा, कोई भी तुम्हारे विरुद्ध कुछ न कर सकेगा। आओ, हम सब प्रार्थना करें, ' हे कृपामयी ज्योति, पथ-प्रदर्शन करो' --और अंधकार में से एक किरण दिखायी, पथ-प्रदर्शक कोई हाथ आगे बढ़ आयेगा।
जो लोग दारिद्र्य, पुरोहित-प्रपंच तथा प्रबलों के अत्याचारों से पीड़ित हैं, भारत के उन करोड़ो पददलितों के लिये प्रत्येक आदमी दिन-रात प्रार्थना करे। सर्वदा उनके लिये प्रार्थना करे।

मैं धनवान ओर उच्च श्रेणी की अपेक्षा इन पीड़ितों को ही धर्म का उपदेश देना पसन्द करता हूँ। मैं न कोई तत्व-जिज्ञासु हूँ, न दार्शनिक हूँ ओर न सिद्ध पुरुष हूँ। मैं निर्धन हूँ ओर निर्धनों से प्रेम करता हूँ। इस देश मे जिन्हें गरीब कहा जाता है, उन्हें देखता हूँ -भारत के गरीबों की तुलना में इनकी दशा अच्छी होने पर भी, यहाँ के कितने ही लोग उनके प्रति सहानुभूति का भाव रखते हैं ! और भारत में, बीस करोड़ नर-नारी जो सदा गरीबी और मूर्खता के दलदल में फँसे हैं, उनके लिये किसका हृदय रोता है ?  पाश्चत्य के लोगों और भारत की सहृदयता में यही महान अन्तर है।  उनके उद्धार का क्या उपाय है ? कौन उनके दुःख में दुःखी है ? वे अंधकार से प्रकाश में नहीं आ सकते, उन्हें शिक्षा नहीं प्राप्त होती --उन्हें कौन प्रकाश देगा ? शिक्षा देने के लिये उनके द्वार द्वार तक कौन घूमेगा ? ये ही तुम्हारे ईश्वर हैं, ये ही तुम्हारे इष्ट बनें। निरन्तर इन्हीं के लिये सोचो, इन्हींके लिये काम करो, इन्हींके लिये निरन्तर प्रार्थना करो--प्रभु तुम्हें मार्ग दिखाएगा।
उसी को मैं महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये द्रवीभूत होता है, अन्यथा वह दुरात्मा है। आओ, हमलोग अपनी इच्छा-शक्ति को ऐक्य भाव से उनकी भलाई के लिये निरंतर प्रार्थना मे लगायें। हम अनजान, बिना सहानुभूति के, बिना मातमपुर्सी के, बिना सफल हुए मर  जायेंगे, परन्तु हमारा एक भी विचार नष्ट नहीं होगा। वह कभी न कभी अवश्य फल लायेगा। मेरा हृदय भाव से इतना गद्गद हो गया है कि मैं उसे व्यक्त नहीं कर सकता; तुम्हें यह विदित है, तुम उसकी कल्पना कर सकते हो। जब तक करोड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, परन्तु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता !  वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाट-बाट से अकड़कर चलते हैं, यदि उन बीस करोड़ देशवासियों के लिये जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं, कुछ नहीं करते, तो वे घृणा के पात्र हैं। मेरे भाइयों, हम लोग गरीब हैं, नगण्य हैं, किन्तु हम जैसे गरीब लोग ही हमेशा उस परम पुरुष (Most High) के यन्त्र बने हैं! परमात्मा तुम सभी का कल्याण करे।
आज भारत को उस नव विद्युत्-शक्ति की आवश्यकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नवीन चेतना का संचार कर सके। यह कार्य हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और आगे भी उसी प्रकार होगा। निःस्वार्थ भाव से काम करने में सन्तुष्ट रहो और अपने प्रति सदा सच्चे रहो। पूर्ण रूप से पवित्र, सत्यनिष्ठ और निष्कपट रहो, शेष सब कुछ ठीक हो जायेगा। यदि तुमने श्रीरामकृष्ण के शिष्यों में कोई विशेषता देखी है, तो वह यह है कि वे सम्पूर्णतया निष्कपट हैं। यदि मैं, ऐसे सौ आदमी भी भारत में तैयार करके मर सकूँ, तो मेरा काम पूरा हो जायगा और मैं शान्ति से मर सकूँगा। कब तक ऐसे लोग मिलेंगे, यह केवल भगवान ही जानते हैं।
मैं फिर तुम्हें याद दिलाता हूँ, ' तुम्हें कर्म करने का अधिकार तो है, किन्तु उससे मिलने वाले फल के ऊपर नहीं।' चट्टान की तरह दृढ़ रहो। सत्य की हमेशा विजय होती है ! श्रीरामकृष्ण की सन्तान निष्कपट और सत्यनिष्ठ रहे, शेष सब कुछ ठीक हो जायेगा। कदाचित हम लोग इस मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण आन्दोलन का, फल देखने के लिये जीवित न रहें; किन्तु जैसे इस समय हमें, अपने जीवित होने में कोई सन्देह नहीं, उसी प्रकार देर या सबेर निःसंदेह इस चरित्र-निर्माण कारी आन्दोलन का फल अवश्य प्रकट होगा !
मोहनिद्रा में सोये हुए अज्ञानी मनुष्य, तो अनापशनाप आरोप लगायेंगे ही। ' neither seek aid nor avoid'-- हम न तो सहायता ढूँढ़ते हैं, न उसे अस्वीकार करते हैं ;  हम तो उस परम-पुरुष (Most High- 'T') के दास हैं। मोहनिद्रा में सोये हुए क्षुद्र मनुष्य इस आन्दोलन के विरुद्ध क्या तुच्छ प्रयत्न कर रहे हैं, उस ओर हमारी दृष्टि भी नहीं जानी चाहिये।  ' Onward! Upon ages of struggle a character is built.' आगे बढ़ो ! सैकड़ों युगों के उद्द्य्म से चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ। सत्य के एक शब्द का भी लोप नहीं हो सकता। वह दीर्घ काल तक कूड़े के नीचे भले ही दबा पड़ा रहे, परन्तु देर या सबेर वह प्रकट होगा ही।

================



विवेकानन्द दर्शनम् १८. 

 ब्रह्म दो रूपों वाला है ' मूर्त और अमूर्त ' - स्वामी अभेदानन्द !


श्लोक १८. ब्रह्म सत्यं जगत सूक्तं ब्रह्मयं सनातनम् । द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे बृहदारण्यकं जगौ ॥

1.  Brahman alone is real and it has been well been said that the world, which is also eternal, is nothing but Brahman.
 

2.  Brahman has two states of existence, said the Brihadaranyaka Upanishad (2.3.1)
 

- अर्थात एक मात्र ब्रह्म ही सत्य है। किन्तु इसके साथ साथ चूँकि प्रवाह रूप में यह परिवर्तनशील जगत भी शाश्वत है, इसीलिये यह बिल्कुल सही कहा गया है कि यह जगत भी ब्रह्म के सिवा अन्य कुछ नहीं है ! निश्चित रूप से ईश्वर ही जगत के रूप में प्रतिभाषित हो रहे हैं !

इसीलिये बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है - ब्रह्म दो रूपों वाला है- मूर्त और अमूर्त; स्थूल और सूक्ष्म, नश्वर और अविनाशी, ससीम और असीम, परिभाषित और अपरिभाषित (defined and undefined)।

प्रसंग : १. ' ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:' > २. द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे - मूर्तं चैवामूर्तं च। बृहदारण्यक उपनिषद  (२.३.१)
विषयवस्तु : भगवत्पाद जगद्गुरू शंकराचार्य का यह कथन- ' ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ' सत्य है, पर इस सिद्धान्त को समझने में प्रायः भ्रम हो जाता है। यह उनका अपना अनुभव है, समाधी की उच्चतम अवस्था में पहुँचकर उन्होंने इस सत्य को अनुभूत किया था। इस सत्य को आचार्य जगद्गुरू शंकराचार्य ने चेतना के जिस स्तर- (अतिचेतन अवस्था) को उपलब्ध होकर कहा, उसे हम भी चेतना के उस स्तर पर जाकर ही समझ सकते हैं। बुद्धि द्वारा किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते।
जब तक मनुष्य वासनाओं, तृष्णाओं को सत्य मानकर चलता है तथा उसमें लिप्त रहता है, वह ‘ब्रह्म सत्य है तथा जगत मिथ्या है '- इस सिद्धांत की कल्पना भी नहीं कर सकता। पंचेंद्रियों में फँसा हुआ जीव स्वभावतः द्वैतवादी होता है। जब तक हम पंचेंद्रिय भोगों में पड़े हैं, तब तक हम सगुण ईश्वर ही देख सकते हैं। परन्तु मनुष्य के जीवन में ऐसा भी समय आता है, जब देहाध्यास में डाल देने वाली भावना, मृत्यु का डर और दुर्बलता सभी मिट जाते हैं। यम-नियम-आसन-प्रत्याहार-धारणा का अभ्यास करते करते, ध्यान की अग्रवर्ती अवस्था (advance stage) में जब शरीर-ज्ञान बिल्कुल चला जाता है, जब मन भी क्रमशः सूक्ष्मानुसूक्ष्म होता हुआ आत्मा में लीन हो जाता है, तभी - केवल तभी, समाधी की उच्चतम अवस्था में उस प्राचीन महान उपदेश की सत्यता समझ में आती है !
सत्य-मिथ्या विवेक का निरंतर अभ्यास करने से यह समझ में आ जाता है कि शरीर सत्य दिखने पर भी नष्ट होने की तरफ अग्रसर हो रहा है, एक दिन नष्ट भी हो जायेगा। इसीलिये इसको मिथ्या कहा जाता है। मनुष्य के लालच को कम करने के लिये, विषय वासनाओं के प्रति साधक के हृदय में वैराग्य उत्पन्न करने के लिए, यह सिद्धान्त जनसाधारण को भी सुनाया गया। किन्तु ' जगत मिथ्या' कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि मनुष्य कर्म से विरत जाये, क्योंकि जीवन का अस्तित्व ही कर्म पर टिका है। कर्म के बिना तो एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता है। जिन लौकिक कर्मों से जीवनोपयोगी संसाधनों की प्राप्ति होती है, उससे विरत होकर उस परम् सत्य की खोज भी सम्भव नहीं है। जीवनमुक्त भी लोक कल्याण के लिए कार्य करते हैं। संसार को माया मानकर कर्म को त्यागकर बैठना, एक प्रकार का पलायनवाद है। इसे अपनाकर कोई भी पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। अभ्यास के लिए यह सत्य है किन्तु अभ्यास कि उपरान्त व्यावहारिक दृष्टि से ‘सर्व खल्विदं-ब्रह्म’ को ही उपयोगी मानना पड़ता है। इसीलिये आचार्य शंकर कहते हैं - " ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है तथा जीव ब्रह्म ही है, कोई अन्य नहीं।" 
किन्तु हमारे भौतिकविदों (physicists) को केवल यह इन्द्रिय-गोचर जगत ही सत्य दिखता है; क्योंकि इन चर्म-चक्षुओं के द्वारा सर्व-व्याप्त सत्ता या ब्रह्म को नहीं देखा जा सकता है ! इसीलिये पश्चिम के लोग यह मानते हैं कि - ' जगत सत्य, ब्रह्म मिथ्या !' और जगत को ही सत्य मानकर उन्होंने कुछ भौतिक विज्ञान के सूत्रों का आविष्कार किया जिससे मनुष्य का भौतिक जीवन तो समृद्ध बन गया।  विज्ञान तो खूब फला; लेकिन ध्यान खो गया। धन का अंबार लग गया; लेकिन भीतर का आदमी- यथार्थ मनुष्य बिलकुल दरिद्र हो गया।
किन्तु आज के भौतिक विज्ञानी भी यह स्वीकार करने लगे हैं कि पदार्थ (Matter) का कोई अस्तित्व नहीं है, यह वास्तव में घनीभुत उर्जा (Energy) ही है, जो अपनी आवृतियों द्वारा पदार्थ के रूप में व्यक्त हो रही है। किस अणु में कितने इलेक्ट्रोन हैं वे तय करते हैं कि पदार्थ का बाह्य रूप क्या हो। अंततः ऊर्जा भी एक विचार मात्र है-सृष्टिकर्ता के मन की इच्छा या संकल्प। आज के वैज्ञानिक जिस सत्य को अपनी प्रयोगशालाओं में सिद्ध करना चाह रहे हैं, उसी सत्य को भारतीय ऋषियों ने समाधी की अवस्था में हजारों वर्ष पहले अपनी अनुभूति के द्वारा जान लिया था। इस सत्य को आत्मविज्ञानी या ऋषि बनकर अपनी अनुभूति से ही जाना जा सकता है, किताब पढ़कर, प्रयोगशाला में, या बुद्धि के द्वारा इस निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता। जिन उच्च डिग्री प्राप्त शिक्षाविदों को भी यदि आत्मानुभूति नहीं हुई है, उनके लिये तो यह जगत ही सत्य है और ब्रह्म असत्य।
अध्यात्म में सूर्य, पृथिवी व चन्द्रमा का रूपान्तर क्रमशः प्राण, वाक् व मन के रूप में किया जा सकता है। भौतिक जगत में तो पृथिवी और सूर्य आदि के बीच स्वाभाविक आकर्षण है, लेकिन लगता है कि अध्यात्म में भी इस आकर्षण को उत्पन्न करना पडेगा । भौतिक विज्ञान की दृष्टि से दो प्रकार के कण होते हैं - एक तो वह जिनके बीच आकर्षण - विकर्षण होता है । उन्हें फर्मी कण नाम दिया गया है । दूसरे वह होते हैं जिनके बीज आकर्षण - विकर्षण नहीं होता । उन्हें बोस कण (हिग्स बोसॉन) नाम दिया गया है । ऊर्जा की कोई किरण किसी स्थूल कण से कितने अंशों में टकराएगी, यह उस कण की प्रकृति पर निर्भर करता है । बाह्य जगत में सूर्य, पृथिवी व चन्द्रमा के आपेक्षिक परिभ्रमण के आधार पर आन्तरिक सूर्य>प्राण, पृथिवी> वाक् और चन्द्रमा> मन के परस्पर परिभ्रमण के आधार पर की गई है। यही वास्तविक यज्ञ हो सकता है जब यह एक दूसरे से स्वतन्त्र परिभ्रमण न कर पाएं- एकत्व की अवस्था को प्राप्त हो जायें।
काल का अस्तित्व सूर्य, पृथिवी और चन्द्रमा की परस्पर गतियों से है । यदि पृथिवी सूर्य की परिक्रमा न करे तो अकाल की स्थिति होगी, काल से रहित। एक फिल्म बनी थी 'जो बोले सो निहाल सत्‌ श्री अकाल''। उसमें दिखाया गया है कि वह सच्चा सिख नहीं जो ' सत्‌ श्री अकाल' कहकर वाक्य पूरा नहीं करता। इसका अर्थ यह हुआ कि 'जो बोले सो निहाल' पूर्ण नहीं है। पूर्णता के लिए या गुरू का सच्चा शिष्य बनने के लिये - 'सत्‌ श्री अकाल' बोलना होगा। किन्तु सच्चे सिख (शिष्य) के लिये केवल मुख से बोल देना ही काफी नहीं, उसे अपने अपने अनुभव से यह जान लेने के बाद-कि कालातीत सत्ता या इन्द्रियातीत ब्रह्म ही सत्य है- स्वीकार करना चाहिये ! निहाल वही है जो यह जान जाता है कि ' सत्‌ श्री अकाल' अर्थात्‌ सत्य वह है जिसे काल नहीं खा सकता अर्थात्‌ जो समाप्त नहीं हो सकता। जिसे शस्त्र नहीं काट सकते, जिसे अग्नि जला नहीं सकती, जिसे वायु उड़ा नहीं सकता, जो शास्वत है, जो सदा से था और सदैव रहेगा। "सत्‌ श्री अकाल'' अर्थात्‌ सत्य (या आत्मा) अविनाशी है।
हम जानते हैं कि भौतिक जगत में जो कुछ दिखता है वह नाशवान है। हर वस्तु, जिसका भी 'नाम-रूप' है- उसे काल का ग्रास बनना है, अर्थात नश्वर है। चाहे वह राम हो, कृष्ण हो, ईसा हो,मुहम्मद साहिब हों, गौतम हों, महावीर हों, चाहें गुरू नानक देव। और वह अविनाशी 'अकाल' क्या है? क्या वह आत्मा नहीं जो सदैव सर्वदा वस्त्रों की भाँति शरीर को बदलता रहता है और शास्वत बना रहता है। जिसको काल नहीं खा सकता है। सत्य काल से परे हैं। वही शास्वत है, हमारे अंदर का आत्मा ही सत्य है। जो सत्‌ पुरख का अंश है। इस प्रकार एक सत्‌ पुरख सत्य है, जो शास्वत है। वही अविनाशी सत्य है चाहे उसे किसी भी- अल्ला,राम,गॉड या ' वाहे गुरु ' के नाम से पुकारें। सिख धर्म के अनुयायी गुरूग्रंथ साहिब को सम्पूर्ण ज्ञान या सम्पूर्ण गुरू मानते हैं। अर्थात्‌ उसके लिए यही वह तत्व हैं जो उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
शंकराचार्य के दर्शन पर जड़वादियों (materialist) ने तमाम सवाल उठाए गए कि संसार मिथ्या कैसे हो सकता है ? तब शंकर ने अपने मायावाद के सिद्धांत से उनका जवाब दिया। मायावाद के अनुसार, ब्रहम के अलावा जो कुछ भी है, वह माया या अविद्द्या है। माया ब्रहम की ही शक्ति है, जो सत्य को ढक लेती है। उसकी जगह पर किसी दूसरी चीज के होने का भ्रम पैदा कर देती है। यह जगत ब्रह्म का विवर्त है, परिणाम नहीं। जैसे दूध का दही परिणाम बन जाता है, वैसे ब्रह्म यह जगत नहीं बना है। मसलन रस्सी से सांप का भ्रम हो जाता है।
माया ब्रहम की शक्ति तो है पर ब्रहम पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता। ठीक जादूगर की तरह, जो अपनी कला से दर्शकों को भ्रमित तो कर सकता है पर खुद भ्रमित नहीं होता। क्योंकि जिसने इसे अपने अनुभव से जाना है, उसके लिए यह 'ब्रह्म' (अकाल-पुरख) सत्य है, और जो सिर्फ बुद्धि से या पूर्वाग्रह से कह रहा है- 'जो बोले सो निहाल ' - उसके लिए वह सर्वसाक्षी ब्रह्म 'असत्य' है। जो युवा जीवन-गठन या '3H-निर्माण पद्धति' में प्रशिक्षित नहीं हुए हैं, वे इस ऋषियों के देश में जन्म लेकर भी, जीवन भर पाश्चात्य जड़वादीयों  के समान प्रत्यक्ष प्रमाणवादी होते हैं, उन्हें वही सत्य लगता है जो प्रत्यक्ष दिखाई दे। ब्रह्म को ना देख पाने के कारण वे ब्रह्म  को सत्य और जगत को मिथ्या कैसे मान सकते हैं ? अतः नहीं मानते। नश्वर शरीर-मन को ही यथार्थ मैं या अविनाशी आत्मा समझने के भ्रम में पड़े सिंह-शावकों (कर्मसंगिनाम्) को विसम्मोहित या  डीहिप्नोटाइज करने के लिये, इन महत्त्व पूर्ण प्रश्नों का उत्तर- 'सत्य क्या है, मिथ्या क्या है? तथा जीव और ब्रह्म में परस्पर क्या संबंध है ? '---इन बातों को समझाते हुए, उन्हें  क्रमशः मूर्त से अमूर्त की ओर ले जाना होगा। इसीलिये गीता में भगवान श्रीकृष्ण गीता ३/२६ में कहते हैं -

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम्।
     जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन् ॥

विद्वान् = ज्ञानी पुरुष (को चाहिये कि) ; कर्मसंगीनाम् = कर्मोंमें आसक्तिवाले ; अज्ञानाम् = अज्ञानियोंकी ; बुद्धिभेदम् = बुद्धिमें भ्रम अर्थात् कर्मोंमें अश्रद्धा ; न जनयेत् = उत्पन्न न करे (किन्तु स्वयं); युक्त: = परमात्माके स्वरूपमें स्थित हुआ (और) ; सर्वकर्माणि = सब कर्मोको ; समाचरन् = अच्छी प्रकार करता हुआ (उनसे भी वैसे ही) ; जोषयेत् = करावे ;

परमात्मा स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिये कि वह कर्मफल में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे तथा स्वयं (अनासक्त होकर ) समस्त कर्मों- ' Be and Make ' (कर्म और उपासना) को भलीभांति (साथ-साथ) करता हुआ दूसरों को भी वैसा ही करने की प्रेरणा दे। सन्त तुलसीदास जी भी कहते हैं -

' गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥'
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥

इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो। एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यंत दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसार रूपी कुएँ में पड़ा हुआ है और एक (विद्या) जिसके वश में गुण है और जो जगत्‌ की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नही है।
रात को आप नींद में चले जाते हैं। नींद में दो तत्त्व रहते है नींद और नींद का बोध करने वाला।  यही सृष्टि का रहस्य है। इसे आप ज्ञान (विद्या) और अज्ञान (अविद्या) समझ सकते हैं। अब इस अज्ञान रुपी नींद के सीने से स्वप्न उदय होता है यह ही जगत है जो असत् है पर जो नींद और स्वप्न में जो एक सा था जिसे बोध कहते हैं वह सत् है। 

इन दोनों ज्ञान अज्ञान की एक स्थिति अव्यक्त ब्रह्म कही जाती है। इस अज्ञान के साथ रहते हुए इसके गुणों से आकर्षित हुआ बोध इनकी कामना करने लगता है और वह शुद्ध चैतन्य 'मैं' इस के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है। और जब शुद्ध चैतन्य (सिंह-शावक) शरीर-मन के साथ तादात्म्य करके अपने ब्रह्म स्वरुप को भूल जाता है, तब वह और जीव कहलाता है। वह इस जगत से आकर्षित हुआ अपनी इन्द्रिय-भोगों की आसक्ति में मस्त अपने शुद्ध स्वरुप को भूल जाता है। इस जीव (भेंड़त्व) को चेताने के लिए, विवेक-जाग्रत करने के लिये आचार्य शंकर (सिंह-गुरु)  कहते हैं-- 'ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या' ! 
इसीलिये विवेकानन्द दर्शनम् श्लोक -११ में कहा गया है आचार्य (नेता) बनना बड़ा कठिन है। आचार्य को केवल भगवान् के ध्यान में ही रत नहीं रहना चाहिए। उसे ध्यान के प्रति भी उतनी ही निष्ठा रखनी चाहिये जितनी धनोपार्जन में। आचार्य को केवल एकतरफा (एक-पक्षीय) जीवन नहीं जीना चाहिए। माँ सारदा की कृपा प्राप्त, आचार्य की महत्ता उसके दो विरोधी विचारों और विरोधाभासों को संभालने की क्षमता में है। उसे संसार में रहते हुए, विदेह की अवस्था में रहकर 'निरासक्त-आसक्ति' के साथ जी कर दिखाना पड़ता है। अधिकाँश व्यक्ति केवल तभी परिश्रमपूर्वक काम करते हैं, जब उन्हें कर्मफल के भोग या आर्ष ध्येय की प्राप्ति की प्रवर्तक शक्ति ऐसा करने की प्रेरणा देती है। ऐसे व्यक्तियों को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए, न उनकी भर्त्सना करना ज़रूरी है।
संपत्ति (कामिनी-कांचन) के प्रति अत्यधिक आसक्ति दुःख कारण है, न कि स्वयं संपत्ति (कामिनी-कांचन) दुःख का कारण बनती है। जिस प्रकार आचार्यों के लिए पूजा, प्रार्थना आदि करने में पूर्ण एकाग्रता ज़रूरी है, उसी प्रकार  के लिए सांसारिक कर्तव्यों की पूर्ती में भी मन को पूर्णतःलगाना  या सम्पूर्णत: ध्यानावस्थित होना आवश्यक है। आचार्यों को सदैव यह स्मरण रखना पड़ता है कि -ईश्वर ही जगत बने हैं ! इसलिये पूरी तरह यह भी जानते हुए कि संसार और इसके क्रियाकलाप क्षणिक हैं, संचारी हैं; उसे अपने सांसारिक कर्तव्यों की अवहेलना किये बिना 'बनो और बनाओ '-आन्दोलन के माध्यम से ' कर्म और उपासना' साथ-साथ करते रहना चाहिये।
वास्तव में सारे संसार के कार्य 'माता प्रकृति ' के गुणरुपी परमेश्वर की शक्ति के द्वारा किये जाते हैं, परन्तु अज्ञानवश मनुष्य अपने आपको ही कर्ता समझ लेता है, और कर्मफल की आसक्ति रुपी बन्धनों से बंध जता है। गीता ३/२७ में वेदान्त के आचार्य श्रीकृष्ण कहते हैं -

प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।
 अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।।

सर्वश: = संपूर्ण ; कर्माणि = कर्म ; प्रकृते: = प्रकृति के ; गुणै: = गुणोंद्वार ; कि्यमाणानि = किये हुए हैं (तो भी) ; अहंकारविमूढात्मा = अहंकारसे मोहित हुए अन्त:करणवाला पुरुष ; अहम् = मैं ; कर्ता = कर्ता हूं ; इति = ऐसे ; मन्यते = मान लेता है ;

सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्त:करण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी (भेंड़ बना सिंह-शावक)  'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है । हमीं कर्ता हैं ,हमीं भोक्ता हैं ,ऐसा विचार कर्म बंधन को जन्म देता है।आचार्य (नेता या आत्मज्ञानी-व्यक्ति) और साधारण व्यक्ति के द्वारा किया गया एक ही काम भिन्न भिन्न परिणाम देता है। आत्मज्ञानी द्वारा किया गया कर्म आध्यात्मिक हो जाता है और कर्मबंधन को जन्म नहीं देता है,क्योंकि आत्मज्ञानी स्वयं को कर्ता या भोक्ता नहीं मानता। सामान्य -जन द्वारा किया गया काम कर्मबंधन (अहंकार) को जन्म देता है।
वास्तव में ईश्वर सब कर्मों का कर्ता है। सब कुछ माँ जगदम्बा की इच्छा के अधीन है। व्यक्ति स्वयं की मृत्यु के प्रति भी स्वतन्त्र नहीं है। श्रीरामकृष्ण के गुरु तोतापुरी जी भी गंगाजी में डूबने लायक पानी नहीं पा सके थे। व्यक्ति तब तक प्रभुदर्शन नहीं कर सकता, जब तक वह यह सोचता है कि मैं ही कर्ता हूँ। माँ सारदा देवी की कृपा से किसी साधक को जब यह अनुभूति हो जाती है कि वह कर्ता नहीं है ,तभी वह जीवन मुक्त व्यक्ति आचार्य या नेता का चपरास प्राप्त कर सकता है।

सभी प्राणी 'परम शक्ति ' प्रकृति (आदत-अभ्यास-प्रवृत्ति-चरित्र या 'चित्तवृत्ति') के हाथ की कठपुतली मात्र है। आहार-निद्रा-भय-मैथुन की प्रवृत्ति पशु और मनुष्य में सामान रूप से रहती है; किन्तु मनुष्य में यह विशेषता है कि वह विवेक-प्रयोग (धर्म-पालन) करने की क्षमता रखता है। पशु प्रकृति के विरुद्ध संग्राम नहीं कर सकता, किन्तु मनुष्य यदि संकल्प कर ले तो वह प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करके (विवेक-प्रयोग करके) इसे जीत लेने या इस चित्त-वृत्ति को बदलने का सामर्थ्य भी रखता है।

कोई सामान्य युवा कम उम्र से ही 'विवेक-प्रयोग', 'चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया' तथा 'चरित्र के गुण' को सीख कर मनुष्य पशु-मानव से देव-मानव में रूपान्तरित हो सकता है। वह परमात्मा (ब्रह्म) जो सर्वव्याप्त सत्ता है, जो सृष्टि में अनुस्यूत है ! उसे मन और इन्द्रियों के माध्यम जाना ही नहीं जा सकता। उसको जानने के लिये इसकी पूर्वशर्त (precondition) है- मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव (3H) 'शरीर-मन-ह्रदय' को योग्य शिक्षक (सच्चे नेता) के पथप्रदर्शन में प्रशिक्षित कर उस ब्रह्म वस्तु (अपने यथार्थ स्वरुप) का अनुभव करने योग्य बना लेना।

और वह प्रशिक्षण पद्धति जिसे स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस से सीखा था, वह आधुनिक युग के अंग्रेजी-पद्धति में पढ़े लिखे युवाओं के लिये द्वारा 'राज-योग' पर अंग्रेजी में लिखित भाष्य के रूप उपलब्ध है। किन्तु बिना किसी योग्य पथ-प्रदर्शक (नेता) के निर्देशन में उस योगसूत्र में वर्णित, 'यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि' का करना खतरनाक हो सकता है। '3H-निर्माण पद्धति' या चरित्र-निर्माण के लिये मन को प्रशिक्षित करने का अभ्यास बिना योग्य पथप्रदर्शक के केवल पुस्तक पढ़ कर करने से दिमाग बिगड़ भी सकता है। इसीलिये योग्य मार्गदर्शक या नेता के निर्देशन में अष्टांग का अभ्यास करने के लिये महामण्डल का 'युवा प्रशिक्षण-शिविर' एवं 'पाठचक्र' भारत के हर प्रान्त के प्रत्येक जिले में आयोजित होना आवश्यक है।

विवेकानन्द के गुरु श्री रामकृष्ण कहते थे- " जो मनुष्य सर्वदा ईश्वर-चिन्तन करता है, वही जान सकता है कि उनका स्वरूप क्या है। वही मनुष्य जानता है कि वे अनेकानेक रूपों में दर्शन देते हैं, अनेक भावों में दीख पड़ते हैं- वे सगुण हैं और निर्गुण भी। दूसरे लोग केवल वादविवाद करके कष्ट उठाते हैं। कबीर कहते थे;- ‘ निराकार मेरा पिता है और साकार मेरी माँ। ’
एक वृक्ष पर एक गिरगिट था। एक व्यक्ति ने देखा हरा, दूसरे ने देखा काला, और तीसरे ने पीला, इस प्रकार अलग-अलग व्यक्ति अलग अलग रंग देख गए। बाद में वे आपस में विवाद कर रहे हैं। एक कहता है, वह जन्तु हरे रंग का है। दूसरा कहता है, नहीं लाल रंग का, कोई कहता है पीला, और इस प्रकार आपस में सब झगड़ रहे हैं। उस समय वृक्ष के नीचे एक व्यक्ति बैठा था, सब मिलकर उसके पास गए। उसने कहा, ‘‘मैं इस वृक्ष के नीचे रात दिन रहता हूँ, मैं जानता हूँ, यह बहुरुपिया है। क्षण क्षण में रंग बदलता है, और फिर कभी इसके कोई रंग नहीं रहता। "

स्वामीजी एक ओर जहाँ आचार्य शंकर के अद्वैतवाद के प्रवक्ता हैं, उपनिषदों के ऊपर उनकी अटूट श्रद्धा है; वहीँ दूसरी ओर वे श्रीरामकृष्ण को अवतारवरिष्ठ भी कहते हैं। स्वामी विवेकानन्द अद्वैतवादी थे या भक्त ? जैसे भगवान शंकर श्री रामचन्द्र के सबसे बड़े भक्त हैं, वैसे ही श्री रामकृष्ण के सबसे बड़े भक्त स्वामी विवेकानन्द हैं। क्योंकि उन्होंने श्रीरामकृष्ण को बहुत निकट से देखा था। तो फिर स्वामी विवेकानन्द अमेरिका जाकर अद्वैत के प्रवक्ता क्यों बने?
अगर आप लोग कहें कि स्वामी विवेकानन्द गलत रहे होंगे। न न, वे स्वयं भगवान शंकर के अवतार हैं। (यदि हम स्वयं को सचमुच स्वामी विवेकानन्द के गुरुभाई समझते हैं तो) हमें ऐसा सोचना भी नहीं चाहिये। उस समय स्वयं श्रीरामकृष्ण ने कह रखा था- मुझे प्रकट न करना संसार में छुपा कर रखना। मेरा दूसरा रूप जो है ब्रह्म वाला, निराकार वाला उसको प्रकट करना। मेरा सगुण साकार रूप प्रकट न करना।  श्रीरामकृष्ण के आदेश को स्वामी जी ने पालन किया। क्योंकि श्रीरामकृष्ण के सबसे बडे़ भक्त हैं स्वामी विवेकानन्द जी। ठाकुर ने स्वामी जी को वैसा आदेश क्यों दिया होगा ? इसका उत्तर बृहदारण्यक उपनिषद के निम्न श्लोक में प्राप्त होता है -  २**. " Brahman has two states of existence, said the Brihadaranyaka Upanishad (2.3.1)"

द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे - मूर्तं चैवामूर्तं च ।
मर्त्यं चामृतं च । स्थितं च यच्च । सच्च त्यच्च ।।

बृहदारण्यक उपनिषद  (२.३.१)
अर्थात ब्रह्म दो रूपों वाला है, वह एक साथ मूर्त भी है और अमूर्त भी; स्थूल भी है और सूक्ष्म भी, नश्वर भी है और अविनाशी भी, ससीम और असीम भी, परिभाषित भी है और अपरिभाषित (defined and undefined) भी ।
सभी सत्यद्रष्टा ऋषियों का कहना है कि ' ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या' पूर्ण ब्रह्म या ईश्वर- निराकार हैं। वह अपरिवर्तनशील परम-तत्व न स्थूल है और न सूक्ष्म है। किन्तु यहाँ, वृहदारण्यक (२.३.१) में ब्रह्म को जो दो स्वविरोधी रूपों वाला - स्थूल और सूक्ष्म बतलाया जा रहा है, वे प्राण (Energy) के ही भौतिक रूप (material form) हैं। प्राण-शक्ति ही भौतिक गुणों या विशेषताओं (material attributes) को धारण किया हुआ नाम-रूपात्मक जगत बन गया है। क्योंकि जड़ को ही हम भ्रमवश ईश्वर की इच्छा (will of the Divine) का प्रतिनिधित्व करने वाला समझ बैठते हैं। नतीजतन ब्रह्म के लिये प्रयुक्त शेष समस्त विशेषण भी, प्राण (जीवनी शक्ति) के भीतर रहने वाली सृजन की इच्छा के लिये प्रयुक्त हुए हैं।

आइन्स्टाइन ने एक बार कहा था - आकाश और काल (time and space) में कोई कण एक समय पर एक ही जगह अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा सकता है। वह एक समय में एक ही जगह पर हो सकता है, एक साथ दो जगह नहीं हो सकता या तो वह यहाँ है या फिर वहां। स्टीवन हाकिंग्स ने कहा था -यदि कोई ईश्वर है तो वह कार्य -कारण सम्बन्ध से मुक्त नहीं हो सकता।

किन्तु जब हमलोग ईश्वर को सर्वशक्तिमान, सब कारणों का कारण, और स्वयंम उसका कोई कारण नहीं है- कहते हैं। तो वे अपनी योगमाया से एक साथ एक ही समय पर अलग -अलग जगहों  पर अलग- अलग नाम रूपों में क्यों नहीं हो सकते ? और यदि हम कहें कि वह ऐसा नहीं कर सकता फिर हमें यह भी मानना पड़ेगा कि वह बाकी सब काम कर सकता है लेकिन अपनी रूपाकृति नहीं रच सकता। यानी तब उसकी एक शक्ति कम हो जाएगी वह सर्वशक्तिमान नहीं रह जाएगा। लेकिन यदि हम ऐसा मानते ही हैं कि नहीं वह सर्वशक्तिमान तो है फिर यह भी मान लेना पड़ेगा वह स्वयं भी किसी रूप प्रगट हो सकता है। वह सब जगह मौजूद है सारी सृष्टि में व्यापक है। उसके इस सर्वव्यापकत्व को बनाए रखने के लिए उसका निर्गुण  निराकार होना भी ज़रूरी है। 
भारतवर्ष एक शाश्वत सनातन धर्म का देश है. आध्यात्मिकता उसकी अमूल्य सम्पत्ति है. स्वामी विवेकानन्द ने भारत के इस आध्यात्मिक-सम्पदा को वहन करके विश्व-सभा (रंगमंच) तक पहुंचा दिया था। एवं उनके गुरुभाई स्वामी अभेदानन्द जी ने उसको द्वार द्वार तक पहुंचा दिया था. पाश्चात्य देशों के शिक्षित एवं  तर्कशील मनुष्यों के बीच वेदान्त का प्रचार करना कोई आसन कार्य नहीं था. क्योंकि वे लोग अकस्मात् प्रज्वलित वैज्ञानिक-प्रकाश के आलोक में आलोकित थे. इसलिए वैसे लोगों के द्वारा प्राचीन भारतीय- दर्शन एवं वेदान्त प्रचार के एक नवीन भावधारा को ग्रहण कर लेना जितना आश्चर्य जनक था, ठीक उसी प्रकार इस प्रचार कार्य में सफलता प्राप्त करना भी कम आश्चर्य जनक नहीं था. स्वामी अभेदानन्दजी के प्रचार-साफल्य से अभिभूत हो कर एक बार स्वामी प्रेमानन्दजी ने स्वामीजी से बहुत आग्रह पूर्वक कहा था कि, - " कोलकाता में वेदान्त की शिक्षा प्रदान करने के लिए, काली-भाई (अभेदानन्द ) को उस देश (अमेरिका) से यहाँ बुलवा लो। क्योंकि काली-भाई ही यहाँ के शिक्षित लोगों को वेदान्त समझाने में समर्थ व्यक्ति है।
उसके उत्तर में स्वामीजी ने कहा था- " काली को यहाँ बुला लूँगा तो जानते हो क्या होगा ?- वह क्षेत्र (पाश्चात्य जगत) बिल्कुल अँधेरे में डूब जायेगा... उसने अपने अथक प्रयास से न्यूयॉर्क जैसे विशाल और आधुनिक शहर में एक हाल भाड़े पर लेकर, वेदान्त-सोसाईटी को एक firm footing (दृढ नींव ) पर प्रतिष्ठित कर दिया है। और चारो तरफ भ्रमण करते हुए लेक्चर देकर ऐसा प्रभाव जमा दिया है कि, वहाँ के बड़े बड़े विद्वान् साहेब लोग उसकी प्रशंसा करते नहीं अघाते। नवधनाड्य अमेरिका वासियों से वाहवाही (स्वीकृति ) प्राप्त कर लेना कोई छोटी बात नहीं है ! चपरास (प्रभु का आदेश ) नहीं हो, तो उस देश में वेदान्त-प्रचार कर पाना क्या ऐसे-वैसे लोगों का कर्म है ! " ( ' स्मृतिसंचय ' : विश्ववाणी, चैत्र १३५१, पृष्ठ २१)
पाश्चात्य देशों में वेदान्त-प्रचार का कार्य  स्वामी विवेकानन्द-कर्मधारा के उत्तरसाधक स्वामी अभेदानन्द के माध्यम से कितना साफल रूप में सम्पादित हुआ था - उस सम्बन्ध में एक प्रत्यक्ष-प्रतिवेदन में भगिनी निवेदिता इस प्रकार लिखती है-" These two  names Vivekananda and Abhedananda are names as inseparable as is the confluence of stream, as are revers sides of a single coin. "

- अर्थात " विवेकानन्द और अभेदानन्द - ये दो नाम ऐसे नाम हैं, जो भिन्न होने पर भी अभिन्न थे, मानों दो नदियाँ संगम में पहुँचकर एक और अविभाज्य हो गयी हों। ये दोनों नाम वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं! "
 इस समबन्ध में प्रत्यक्ष दर्शी अध्यापक बिनय कुमार सरकार कहते हैं - " इन दो बंग-वीरों के माध्यम से भारतमाता सम्पूर्ण जगत में अपने रक्त-मांस में गुंथे हुए स्वधर्म, शक्तियोग की दिग्विजय साधना का निर्यात कर रही थी. विवेक-अभेद उस समय भारत से विदेश गए कोई सौदागर नहीं थे; बल्कि ये दोनों बंगवीर अभिनव रक्त-मांस वाले कर्मनिष्ठ-जीवन के भारतीय प्रतिनिधि थे."
किसी पत्र में स्वयं स्वामीजी ने कालीभाई (अभेदानन्दजी) की प्रशंसा की है- यह सुन कर लाटुमहाराज (अद्भुतानन्दजी) आनन्द से झूम कर बोल उठे- " जानते हो, काली-भाई अक्सर वराहनगरमठ से पैदल ही शांखारी-टोला स्थित डाक्टर महेंद्र सरकार के घर पुस्तकों का अध्यन करने जाया करता था, और कभी कभी तो वहाँ से गट्ठर की गट्ठर पुस्तकें उठा कर मठ में ले आता और घंटों पढ़ता रहता था।  किसी के भी साथ अधिक मेल-जोल नहीं बढ़ाता था, व्यर्थ की बातें नहीं करता था, व्यर्थ की गप्पबाजी उसे पसंद नहीं थी। काली इतना अधिक गहन-गम्भीर मुद्रा में रहता था कि जब भक्त लोग मठ में आते थे तो उनके नजदीक व्यर्थ में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। वह अपने कमरे में बैठ कर घंटों केवल पढ़ाई-लिखाई करने या ध्यान-धारणा करने में ही डूबा रहता था। इसी प्रकार से उसने कितने दीर्घ काल तक अपना समय व्यतीत किया था, तभी तो आज लोग काली का महत्व समझ पा रहे हैं ! काली ने कठिन परिश्रम से अपना जीवन इतना सुन्दर रूप में गठित कर लिया था कि, बड़े बड़े विद्वान् भी आज उससे प्यार करते हैं ! " ( ' स्मृति- संचयन ' : विश्ववाणी, चैत्र १३५१, पृष्ठ २२ )

 स्वामी अभेदानन्द का एक और नाम है- ' काली-वेदान्ती '. बचपन से ही उनके भीतर वेदान्त-दर्शन के प्रति तीव्र आकर्षण था. वेदान्त मत का उन्होंने गम्भीर-निष्ठा एवं अध्यवसाय के साथ अध्यन किया था, और आत्मसात भी कर लिया था. सांसारिक स्थूल बातों (नून-तेल-लकड़ी की चिन्ता ) को छोड़ कर, वे सदैव सूक्ष्म-वेदान्तिक तत्वों के गहन चिन्तन-मनन में ही डूबे रहते थे. जिसका मन सदैव वेदान्त के सूक्ष्म आत्मतत्व में ही निमग्न रहता हो, उसके भीतर शरीर की असारता का बोध उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है.

काली-महारज भी इसी ज्ञान-मार्ग के पथिक थे. इस पथ में युक्ति-तर्क के आधार पर यह सिद्ध किया जाता है कि - ' ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या '. दिन-रात इसी विचार मग्न रहने के कारण सभी लोग उनको नास्तिक समझने लगे थे. एक बार उनके संगीसाथी साथियों ने श्रीरामकृष्ण के पास अभियोग भी लगाया था कि-' काली-वेदान्ती ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार कर रहा है. ' यह सब सुनकर अद्वैत-ज्ञानी श्रीरामकृष्ण धीरे से मुस्कुरा दिए और बोले- ' तुम लोग देख लेना एक दिन वह सबकुछ मानने लगेगा, सबकुछ जान जायेगा. '
वेदान्त के मतानुसार यह जगत मायामय स्वप्नवत होने के कारण मिथ्या (असत नहीं ) है. यह तो तात्विक-सत्य है; किन्तु क्या किसी ने अपने जीवन में इसका प्रयोग किया है ? प्रयोगात्मक वेदान्तवादी कहाँ है ? ऐसा वेदान्तविद व्यक्ति कहीं मिल सकता है, जो अद्वैत-वेदान्त के तत्वों को अपने जीवन में प्रयोग कर सचमुच वेदान्त-मूर्ति बन चुका हो ? शिवसंहिता आदि योगशास्त्र में, स्पष्ट कहा गया है कि पुस्तक पढ़ कर योगसाधना करना उचित नहीं है, किसी उपयुक्त सिद्ध-योगिगुरु के सानिध्य में रहते हुए योगशिक्षा का अभ्यास करना जरूरी होता है.

पुनः सोंच में पड़ गए, कहाँ से किसी सिद्ध-योगि गुरु का पता खोजा जाय ? आहार-निद्रा सब कुछ त्याग दिए, मन में केवल एक ही विचार था, दिन-रात पद्मासन में बैठ कर कैसे समाधिस्त रहा जाये. अपने मन की बात किसी से कह भी नहीं सकते थे, क्योंकि यह सुनकर सभी हँसते और मजाक उड़ाते थे. योगी होने की बात सुन कर चारो ओर से बाधाएँ भी आने लगी. शास्त्र-वचन मूर्तमान हो उठा- ' श्रेयांसि बहुबिघ्नानी '. इसी समय एक दिन सहपाठी यज्ञेश्वर भट्टाचार्य के साथ मुलाकात हो गयी. सैकड़ो बाधाओं से अवसन्न कालीप्रसाद को देख कर मित्र ने पूछा- तुम्हारी समस्या क्या है ?

कालीमहाराज बोले, ' देखो, मेरी तीव्र इच्छा योगसाधना करने की है. किन्तु केवल पुस्तक पढ़ने और अपनी चेष्टा से ही तो यह सब हो नहीं सकता. गुरु की आवश्यकता होती है. क्या तुम बता सकते हो कि वैसा योगिगुरु कहाँ मिल सकते हैं ? 'कालीप्रसाद की व्याकुलता को देख कर यज्ञेश्वर ने कहा-' बता सकता हूँ, दक्षिणेश्वर में रानी रासमणि के काली-मन्दिर में एक अद्भुत योगी हैं- परमहंस हैं. सभी लोग ऐसा कहते हैं कि उनमे कोई ढोंग-ढकोसला नहीं है. वे एक यथार्थ योगी ही नहीं- महायोगी हैं. कोलकाता के बहुत से सम्भ्रान्त लोग भी उनके पास आते-जाते हैं.वे भी बीच बीच में कोलकाता आते रहते हैं. तुम यदि उनसे अपनी योगशिक्षा ग्रहण करने की ईच्छा उनको सुनोगे तो लगता है, वे तुम्हारी इस ईच्छा को पूर्ण कर सकते हैं. '
अपने बाल-सखा यज्ञेश्वर की बातें सुन कर, कालीप्रसाद का ह्रदय उत्साह, आनन्द, आत्मविश्वास से भर उठा. उन्होंने तय कर लिया कि, अपने गुरु के रूप में मुझे केवल परमहंसदेव को ही वरण करना है. जैसे भी हो, मुझे  एक बार दक्षिणेश्वर के काली-मन्दिर में जाना ही होगा, एवं उनके साथ अवश्य ही भेंट करनी होगी.परमयोगी परमहंसदेव से मिलने की व्याकुलता क्रमशः बढती चली गयी.एक दिन बिना किसी को बताये अकेले ही- चल पड़े दक्षिणेश्वर की ओर. काली-मन्दिर पहुँच कर किसी से पूछे - परमहंसदेव हैं क्या ? एक आगन्तुक युवक ने बताया नहीं वे तो कोलकाता गए हैं. वह युवक थे उस समय के शशिभूषण चक्रवर्ती जो आगे चल कर स्वामी रामकृष्णानन्द हुए.
कालीप्रसाद भूख-प्यास और पैदल चलने की थकान से बहुत अवसन्न अनुभव कर रहे थे; यह देख कर शशिभूषण ने उनको परामर्श दिया कि,' गंगा में स्नान कर के माँ काली का प्रसाद ग्रहण करके थोडा विश्राम कर लो; जब उनके साथ मुलाकात करने के लिए इतना कष्ट सह कर आये हो, तो मिलने के बाद ही कोलकाता जाना.' परमहंसदेव का दर्शन करने की ईच्छा से उनके परामर्श के अनुसार कालीप्रसाद इंतजार करने लगे. दोपहर बीत जाने के बाद शाम हो गयी. उसके बाद रात्रि के समय बरामदे में चटाई बिछा कर तीन-जन विश्राम कर रहे थे. इसी समय रामलाल दादा ने समाचार दिया कि परमहंसदेव बग्घी पर सवार होकर आ रहे हैं. कालीप्रसाद उठ खड़े हुए. उनकी धड़कने तेज हो गयीं. परमहंसदेव ने गुरुगम्भीर स्वर से तीन बार ' काली ' नाम का उच्चारण करके अपने कमरे में प्रविष्ट हुए, और छोटी सी चौकी पर बैठ गए.
कालीप्रसाद पलक झपकाए बिना परमहंसदेव का दर्शन करने लगे, सोच रहे हैं- योगी-सन्यासी का अर्थ तो जटाजूट-धारी, लाललाल-आँखों वाले, पूरे शरीर पर राख मले किसी रूद्र मूर्ति होना चाहिए. किन्तु इनको तो एक अति सहज, सरल, शान्त, सौम्यमूर्ति के रूप में देखता हूँ. अब उन्होंने श्रद्धापूर्वक भक्तिपूर्ण ह्रदय से प्रणाम किया. परमहंसदेव ने उनको स्नेहपूर्वक बैठने को कहा, तथा पूछा- ' तुम कौन हो? तुम्हारा घर कहाँ है ? तुम किस लिए इतना कष्ट सह कर यहाँ आये हो ? क्या चाहते हो ? '
भक्ति में गदगद कंठ से कालीप्रसाद उत्तर दिए- ' योगशिक्षा ग्रहण करने की मेरी तीव्र ईच्छा है. क्या आप दया करके मुझको योग-शिक्षा प्रदान करेंगे ? इसी आशा को लेकर मैं यहाँ आया हूँ. '

 श्रीरामकृष्ण थोड़ी देर मौन रहकर सोचे, उसके बाद बोले- ' इतने कम उम्र में ही, तुम्हारे अन्दर योगशिक्षा ग्रहण करने की इच्छा हुई है- यह तो बड़ा ही शुभ लक्ष्ण है. तुम पूर्वजन्म में एक बड़े योगी थे. थोडा बाकी रह गया था, यही तुम्हारा अंतिम जन्म है. आज रात्रि में यहीं विश्राम करो, कल सुबह में फिर आना.' दुसरे दिन प्रातः काल में कालीप्रसाद गंगा स्नान करके, श्रीरामकृष्ण परमहंस के चरणों में बैठ गए. उन्होंने पूछा - तुमने कौन कौन सी पुस्तकें पढ़ी हैं ? कालीप्रसाद ने कहा- रघुवंश, कुमारसम्भव, गीता, पातन्जल-दर्शन, शिव-संहिता आदि. सुन कर श्रीरामकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिए. उसके बाद सस्नेह बोले- ' योगासन में बैठ कर अपनी जीभ बाहर निकालो '. कालीप्रसाद ने जिह्वा को प्रसारित कर दिया. तब उनकी जिह्वा के बीच में दाहिने हाथ के बीच वाली ऊँगली से श्रीरामकृष्ण ने मूलमंत्र लिख दिया. साथ ही साथ उनके सम्पूर्ण अंगों में एक अद्भुत शक्ति संचारित हो गयी. कालीप्रसाद का वाह्यज्ञान जाता रहा और वे गम्भीर ध्यान में समाधिस्त हो गए !

 योगशिक्षा का जितना बाकी रह गया था, उतना योगिराज श्रीरामकृष्ण ने दे दिया. उनकी आजन्म-आकांक्षित वह समाधी परम योगी के परम स्पर्श से घटित हो गयी. इसी योग-समाधि में तो वे निमग्न रहना चाहते थे. कुछ समय के बाद सर्वयोग-सिद्ध श्रीरामकृष्ण ने कालीप्रसाद के ह्रदय का स्पर्श करके, कुण्डलिनी शक्ति को निचे उतार दिया, और स्वाभाविक अवस्था में वापस लौटा दिया. महायोगी श्रीरामकृष्ण विशाल-योगशक्ति के अधकारी थे, योगीगण जिस योगबल को आजीवन तपस्या करने के बाद भी नहीं प्राप्त कर सकते थे, उसे वे केवल स्पर्श-मात्र से प्रदान कर सकते थे. योग्शास्त्रों में कहा गया है,- परमात्मा के साथ जीवात्मा के मिलन को ' योग ' कहा जाता है. यहाँ श्रीरामकृष्ण रूपी परमात्मा के साथ कालीप्रसाद रूपी जीवात्मा घुल-मिल कर एकाकार हो गये, - और उत्तरण हुए योगी अभेदानन्द !

और सिद्धगुरु के रूप में उन्होंने अद्वैताचार्य श्रीरामकृष्ण को प्राप्त कर लिया; जो अद्वैतवाद के प्रबल-पक्षधर थे. अद्वैत-वेदान्त के ' नेति नेति ' विचार-पद्धति को काली-महाराज भी बहुत पसन्द करते थे. इसको वेदान्त का ज्ञान मार्ग कहा जाता है. यहाँ पर ईश्वर का अस्तित्व अन्ध-विश्वास के उपर प्रतिष्टित नहीं है. इसमें न्याय-विचार करके सभी मतों का खण्डन कर दिया जाता है. इस अद्वैत-वाद में युक्ति-तर्क की सहायता से एक परम-सत्य तक पहुँचना होता है. यह मार्ग चरम विवेक-विचार के उपर प्रतिष्ठित है.काली-महाराज के जिज्ञासु मन में उठते रहने  वाले प्रश्नों का कोई अन्त नहीं था. किन्तु जब तक कोई प्रत्यक्ष-प्रमाण नहीं मिलजाता वे अपनी खोज बन्द करने वालों में से नहीं थे. क्योंकि, अपनी आँखों के सामने जिस जगत को बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ, वह जगत वेदान्त-मत के अनुसार मिथ्या कैसे हो जाता है ?                   
इस प्रश्न का उत्तर तत्वज्ञ श्रीरामकृष्ण से इस प्रकार दिया- " ' नेति नेति ' करते हुए आत्मा की उपलब्धी करने का नाम ज्ञान है. पहले ' नेति नेति ' विचार करना पड़ता है. ईश्वर पंचभूत नहीं है, इन्द्रिय नहीं हैं, मन, बुद्धि, अहंकार नहीं हैं, वे सभी तत्वों के अतीत हैं; - और यह होते ही यह सब स्वप्नवत हो जाता है. विचार दो प्रकार से किया जाता है- अनुलोम और विलोम . पहले के द्वारा मनुष्य जीव-जगत से नित्य ब्रह्म में जाता है और दूसरे के द्वारा देखता है कि, ब्रह्म ही जीव-जगत के रूप में लेलायित है. छत पर चढ़ने के लिए एक एक कर सब सीढ़ियों का त्याग करते हुए जाना होता है. सीढियाँ छत नहीं हैं. किन्तु छत पर जा पहुँचने के बाद दिखाई देता है कि जिन ईंट, चुना, सुर्खी आदि वस्तुओं से छत बनी है, उन्हीं से सीढ़ियाँ भी बनी हैं. जो परब्रह्म है, वही यह जीव-जगत बना है, चौबीस तत्व बना है. जो आत्मा है, वही पंचभूत बना है. तुम कहोगे, मिट्टी अगर आत्मा से ही बनी है तो वह इतनी कड़ी कैसे है ? उनकी इच्छा से सब कुछ सम्भव हो सकता है. क्या रज-वीर्य से हड्डी और मांस का निर्माण नहीं होता है ?
 अनुलोम और विलोम. ' नेति नेति ' करते हुए समाधी में पहुँचकर तुम्हारा ' अहं ' ब्रह्म में विलीन हो जाता है. फिर जब तुम समाधी से उतरकर नीचे आते हो तब तुम्हें दिखाई देता है कि ब्रह्म ही तुम्हारे
' अहं ' के रूप में तथा सारे जगत के रूप में व्यक्त हो रहा है....इसी प्रकार नित्य ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन करने के पश्चात् विचार आया- ' जो नित्य हैं, वे ही लीला में जगत बने हैं.'..यदि कहो- अखण्डस्वरुप आत्मा खण्डित जीवात्माओं में कैसे विभक्त हुआ ? कोई अद्वैत-वादी तार्किक विचार-बुद्धि के बल पर इसका उत्तर नहीं दे सकता. उसे यही कहना पड़ता है कि- ' मैं नहीं जानता '. ब्रह्मज्ञान होने पर ही इसका योग्य उत्तर मिल पाता है.
जब तक मनुष्य कहता है, ' मैं जानता हूँ ' या ' मैं नहीं जानता ' तब तक वह स्वयं को एक व्यक्ति (M /F ) समझता है. तब तक उसे इस विविधता ( जगत-प्रपंच ) को सत्य ही मानना पड़ता है- वह इसे भ्रम नहीं कह सकता. परन्तु जब व्यक्तित्व-बोध का;' मैं '-पन का सम्पूर्ण विनाश हो जाता है, तब- 'समाधी ' में ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है. अहंकार के दूर हो जाने पर जीवत्व का नाश हो जाता है.तब जीव नहीं आत्मा ही परमात्मा (ब्रह्म) का साक्षात्कार करता है.  इस अवस्था में समाधी में ब्रह्म का साक्षात्कार होता है.
 समाधी अवस्था में उपलब्ध ब्रह्म मानो दूध है, साकार-निराकार ईश्वर मानो माखन हैं, और चौबीस तत्वों से बना जगत मानो छाछ. जब तक तुम माया के राज्य में हो तब तक तुम्हें माखन और छाछ - ईश्वर और जगत - दोनों स्वीकार करना होगा. ...जब तक ' अहं ' है, तब तक साकार ईश्वर भी सत्य हैं; जीव-जगत के रूप में उनकी लीला भी सत्य है.यथार्थ ज्ञान होने पर अहंकार नहीं रहता. समाधी हुए बिना ठीक-ठाक ज्ञान नहीं होता. भरे दोपहर में सूरज जब ठीक माथे के उपर रहता है; उस समय मनुष्य चारों ओर देखता है, पर उसे अपनी छाया नहीं दिखाई देती वैसे ही, यथार्थ ज्ञान होने पर, समाधी होने पर अहंकाररूपी छाया नहीं रहती. यदि ठीक-ठाक ज्ञान होने के बाद भी किसी में ' अहं ' दिखाई पड़े, तो ऐसा जानना कि वह ' विद्या का अहं ' है, ' अविद्या का अहं ' नहीं.
..समाधी में अद्वैतबोध का अनुभव करने के पश्चात् पुनः नीचे उतर कर ' अहं ' बोध का अवलम्बन कर रहा जाता है.  ईश्वरदर्शन या आत्मज्ञान हो जाने के बाद सब कुछ चिन्मय लगने लगता है. काली के मन्दिर में जाकर देखता हूँ - प्रतिमा चिन्मय, पूजा कि वेदी, कोषा-कुशी, मन्दिर का चौखट, मार्बल पत्थर सबकुछ ही चिन्मय है. उस समय बिल्ली को देखने से भी बोध होता है कि, चिन्मयी माँ ही यह सब बनीं है. "
वेदान्त-वादी काली-महाराज ने श्रीरामकृष्ण के अद्वैत-अनुभूति की बातों को बहुत ध्यान से सुना. किन्तु तब भी उनका तार्किक वेदान्ती-मन इसे मानने को तैयार नहीं था. वे स्वयं द्रष्टा होना चाहते थे- जगत के जड़-जीव आदि समस्त वस्तुओं में एकमात्र परमात्मा ही ओतप्रोत हैं, तो वे उस परमात्मा को प्रत्यक्ष करना चाहते थे. वे वेदान्त के उस सर्वोच्च-शिखर पर पहुँचना चाहते थे, - जहाँ से सबकुछ ( जड़-जीव ) के साथ एकात्मबोध की अनुभूति होती है.
यही आत्म-साक्षात्कार या आत्मबोध हो जाने पर मनुष्य सर्वत्र ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव करने में समर्थ हो जाता है. जबतक यह अभेदानुभूती नहीं हो जाती, तबतक नेति नेति विचार करना होता है. इस प्रकार ' नेति नेति ' विचार करके जिन्होंने ' ईति ' कर लिया है, वे ही सच्चे अद्वैत-वेदान्ती हैं.वहाँ पहुँच जाने के बाद, फिर (ज्ञाता और ज्ञेय ) दो नहीं रह जाता, सबकुछ एक हो जाता है. सभी वस्तुओं के भीतर ' एक ' को प्रत्यक्ष कर लेने को ही अद्वैतानुभूती कहते हैं.आध्यात्म-मार्ग का यह सर्वोच्च स्तर (शिखर) है. यहाँ पहुँच जाने पर वेदान्त-विचार (ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ) बोध (अनुभूति ) में परिणत हो जाता है. इसीलिए हमें समझना चाहिए कि अद्वैत-वेदान्त केवल तार्किक विचार-बुद्धि उपर ही प्रतिष्ठित नहीं है. बल्कि तर्क-युक्ति से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही इसका उद्देश्य है. वेदान्तोक्त तात्वि-सत्य को व्यवहारिक सत्य में परिणत कर लेने के लिए ही वेदान्त-साधना की जाती है. ज्ञान-विचार करते करते ज्ञान की चरम सीमा पर पहुँच जाना ही अद्वैतवेदान्त की ईति है.
अनुभूति-प्राप्त करने के लिए ही काली-महाराज की वेदान्त-साधना चल रही थी. दिन रात वे ज्ञान-विचार में निमग्न रहने लगे. जब तक वे ज्ञान की चरम पराकाष्ठा में उपनीत नहीं हो जाते वे साधना से विरत नहीं हो सकते थे. अद्वैत तत्व के अनुसन्धान कर अभेददर्शन के उद्देश्य से वे पुनः गम्भीर ध्यान में डूब गए.
अध्यवसायी, आत्मज्ञान के इच्छुक- काली-महाराज के लिए वेदान्त एक अन्वेषण था. उनके प्राणों की भूख थी. उनका मन उस व्याकुलता के आवेग से आर्तनाद से भरा हुआ था. वे श्रीरामकृष्ण के दिव्यसनिध्य में उपविष्ट थे. उनकी ज्ञानान्वेषी वेदान्तिक तर्कशील मानसिकता अंतर की व्याकुलता को अवदमित कर रही थी.उनके प्राणों में यह प्रश्न बार बार उठ रहा था- ' क्या सचमुच, किसी को अभिन्न-दृष्टि प्राप्त हो जाती है ? सर्वभूतों में क्या, किसी को सचमुच आत्मदर्शन होता है ? क्या कोई मुझे 'ज्ञानांजन ' प्रदान करके मेरी  आत्मदृष्टि को भी उन्मोचित करने में समर्थ है? यदि कोई समर्थ गुरु हैं, तो वह अद्वैत-ज्ञानी साधक कहाँ मिलेंगे ?

वे इस प्रकार सोच ही रहे थे कि, सिद्धान्त को व्यवहार रूपांतरित होते देखने का समय उपस्थित हो गया. शायद अन्तर्यामी अद्वैतवादी श्रीरामकृष्ण ने अपनी अद्वैतानुभूती के द्वारा काली-महाराज की आन्तरिक वासना (तीव्र इच्छा) को अपने ह्रदय में अनुभव कर लिया था. इसीलिए उन्होंने काशीपुर-उद्यानबाड़ी में स्वयं इसके दृष्टान्त-स्वरुप बन कर, काली-महाराज को आवेगपूर्ण शब्दों में आदेश दिया- " बाहर जा कर देखो, जो आदमी मठ की हरी-हरी घासों पर टहल रहा है, उसको घास पर चलने से मना कर दो. मुझे बहुत कष्ट हो रहा है. ऐसा महसूस हो रहा है, मानो वह मेरी छाती के उपर ही चल रहा हो.

काली-महाराज अवाक् रह गए. मन में उठा प्रश्न मन में ही रह गया. सोचने लगे- ' इन्होंने मेरे मन की बात को जान कैसे लिया ? स्तम्भित काली-वेदान्ती ठाकुर के निर्देशानुसार शीघ्रता से बाहर निकल कर देखे- अरे बिलकुल सच ! बाहर एक व्यक्ति मठ की हरी हरी दूबों के उपर टहल रहा था. जल्दी से वहाँ पहुँच कर उसको घास के उपर उस प्रकार चहल-कदमी करने से मना किया.आदेश को सुन कर, उस व्यक्ति ने घास के उपर चलना जैसे ही बन्द किया, उन्होंने देखा कि, ठाकुर श्रीरामकृष्ण थोड़ा स्वस्थ अनुभव करने लगे हैं. अब आश्चर्य-चकित होकर, काली-महाराज अवाक् हो गए और अपलक-दृष्टि से श्रीरामकृष्ण को देखते रह गए; मानो अद्वैत-विज्ञान किसे कहते है, उसके प्रत्यक्ष-प्रमाण स्वरुप जीवन्त वेदान्त-मूर्ति को देख कर मिला रहे हों.
अद्वैतानुभूती को, आज उन्होंने अपनी आँखों के सम्मुख प्रमाणित होते देख लिया था. विचार कर रहे हैं- इसको ही आत्मज्ञान कहते हैं, इसको ही आत्मदृष्टि कहते है. तृणादि जड़-चेतन, जीव-जगत, सबकुछ के भीतर अपने को देखना ही तो ' अभेदज्ञान ' है. यही तो अद्वैत-वेदान्त का चरम तत्व है- जिसको निज-अनुभव से जानने के लिए साधक को साधनारुपी सोपानों से होकर गुजरना होता है.
काली-वेदान्ती इसी आत्मानुभूति को प्राप्त करना चाहते थे. श्रीरामकृष्ण ने आज उसीको दृष्टान्त-सापेक्ष प्रमाण द्वारा दिखा दिया था. उन्होंने अभेदतत्व को प्रयोग-द्वारा वास्तविकता में परिणत कर दिया था. जड़-पदार्थों के प्रति अभिन्न दृष्टि को व्यवहारिक रूप से दृष्टिगोचर करा दिया था. यही सत्य हजारों वर्ष पूर्व ऋषि कन्ठ से घोषित हुआ था- " यदिदं किञ्चित जगत सर्वं प्राण एजति निःसृतम "| - अर्थात जीव-जगत सभी कुछ के भीतर एक ही प्राणसत्ता चैतन्य (स्पंदन) रूप में निहित है.
भौतिक विज्ञान में 'श्रोडिंगर समीकरण' की सहायता से जड तन्त्र (Matter) में ऊर्जा (Energy) का सामञ्जस्य दिखया जाता है। जिसके अनुसार स्थैतिज ऊर्जा व गतिज ऊर्जा के योग को एक स्थिरांक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है । स्थिरांक का अर्थ होगा कि यदि किसी जड तन्त्र की स्थैतिज ऊर्जा में वृद्धि होती है तो उसकी गतिज ऊर्जा में ह्रास हो जाएगा । यदि गतिज ऊर्जा में वृद्धि होगी तो स्थैतिक ऊर्जा में ह्रास हो जाएगा ।

लेकिन वैदिक साहित्य में ऊर्जा के दो रूप नहीं, अपितु तीन रूप निर्धारित किए गए हैं - इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ज्ञान को स्थैतिक ऊर्जा तथा क्रिया को गतिज ऊर्जा माना जा सकता है। लेकिन आज के भौतिक विज्ञान में इच्छा के लिए अभी कोई स्थान नहीं है। नाम, रूप व कर्म के संदर्भ में नाम को ज्ञान के समकक्ष, इच्छा को रूप के समकक्ष और क्रिया को कर्म के समकक्ष माना जा सकता है। शिव पुराण के अनुसार तो ज्ञान, क्रिया व इच्छा रूपी दृष्टि-त्रय द्वारा ही रूप का निर्धारण होता है।

बृहदारण्यक उपनिषद १.४.१ का यह कथन प्राप्त होता है कि नाम, रूप व कर्म यह तीन हैं । इनमें नामों का 'उक्थ्य'= उत्थान करने वाला है वाक्, रूपों का चक्षु और कर्मों का आत्मा है। फिर इससे आगे कहा गया है कि प्राण विकल्प से अमृत है ( अर्थात् प्राण को प्रयत्न द्वारा अमृत बनाया जा सकता है ) और 'नाम-रूप' सत्य हैं ( अर्थात् नाम व रूप को प्रयत्न से सत्य बनाया जा सकता है )।

नाम-रूप प्राण को आच्छादित किए हुए हैं । नाम के विषय में कहा गया है कि नाम वह है जो सोते हुए प्राणों को जगा दे। जैसा नाम लिया (जपा या पुकारा) जाएगा, वैसे ही प्राणों को वह जाग्रत करेगा। यहां प्राण को कर्म के तुल्य माना जा सकता है जिसका उक्थ्य आत्मा कहा गया है । नाम, रूप व कर्म के इस त्रिक के अन्य रूप भी उपलब्ध होते हैं। लौकिक रूप में जिसे निधन या मृत्यु कहते हैं, योग मार्ग या भक्ति मार्ग में समाधि की अवस्था को निधन कहते हैं। समाधि से व्युत्थान के पश्चात् प्रथम अवस्था अस्ति, दूसरी भाति, तीसरी प्रिय, चौथी नाम और पांचवीं रूप की होती है।   'सरस्वती-रहस्य उपपनिषद' (३.२३-२४) में कहा गया है -

अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्।
आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ।। 

संसार की हर वस्तु के पाँच अंश होते है- अस्तित्व, चेतना, प्रियता, रूप ( form) और नाम. इन अंशपंचकों में से पहले तीन परमात्मा की ओर संकेत करते है, और आख़री दो जगत् की ओर। जब हम दुनिया (M/F) की ओर देखते है तब सिर्फ वस्तु के बाह्य रूप और नाम से मतलब रखते है।  इसलिए हमारे मन में संसार की वस्तुओं के लिए या तो लालच पैदा हो जाती है या नफ़रत. और यही दुःख का मूल है। जब तक समत्व की दृष्टि से हम नही देखते, संसार दुःखमय ही प्रतीत होगा. दृष्टि गोचर जगत में जिस किसी वस्तु या व्यक्ति को देखो उसमें से ब्रह्म  के अंतिम दो पहलु (नाम और रूप) को द्रष्टा-दृश्य विवेक प्रयोग के द्वारा अलग कर लो, और उनके पहले वाले तीन पहलु ' अस्ति = सत् (being)', 'भाति = चित् (Shining)', 'प्रिय = आनन्द (loving)' को अपने ह्रदय में अथवा बाहर देखने के लिये, निरंतर तत्पर होकर एकाग्रता (concentration) का अभ्यास करो! 
अस्तित्व, चेतना, प्रियता जिन्हें सच्चिदानन्द भी कहा जाता है- यही परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है, जो वस्तु का अंतरंग है।अतः यह कहा जा सकता है कि 'अस्ति, भाति और प्रिय'- प्राण के तुल्य हैं। तैत्तिरीय संहिता में यज्ञ में आयु को ध्रुव कहा गया है और आयु को ही प्राणों में उत्तम कहा गया है । पुराणों में उत्तानपाद - पुत्रों ध्रुव व उत्तम के रूप में साधना के दो पक्षों का उदय हुआ है - एक तो यम- नियम - तप आदि के द्वारा ध्रुव स्थिति प्राप्त करना तथा दूसरे यम - नियम आदि से रहित केवल आनन्द की स्थिति, उत्तम एक स्थिति का नाम है । उस स्थिति में - रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव - बृहदारण्यक उपनिषद २.५.१९  अर्थात् कण - कण में दिव्य रूप के दर्शन हो रहे हों , यही मधु अवस्था है।
ऋग्वेद ६.४७.१८ की प्रसिद्ध ऋचा रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव है जिसकी व्याख्या बृहदारण्यक उपनिषद २.५.१९ में उपलब्ध है । इस व्याख्या के अनुसार जब यह पृथिवी सब भूतों के लिए मधु बन जाए और सब भूत इस पृथिवी के लिए मधु बन जाएं तो वह मधु विद्या है । दूसरे शब्दों में, जहां उच्चतर और निम्नतर में संघर्ष की स्थिति समाप्त हो जाती है, वह मधु विद्या है और मधु विद्या की स्थिति ही रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव की स्थिति है । दधीचि ऋषि मधु विद्या के ज्ञाता हैं जो अश्विनी कुमारों को मधु विद्या का उपदेश देते हैं - रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव अर्थात् कण - कण में दिव्य रूप के दर्शन हो रहे हों , यही मधु अवस्था है । दधीचि ऋषि ने देवों के अस्त्रों के तेज को पीकर उन्हें अपनी अस्थियों में आत्मसात् कर लिया था। इस कथा का मूल स्रोत ऋग्वेद १.८४.१३ की सार्वत्रिक ऋचा है।

 डा. फतहसिंह के शब्दों में अस्ति अर्थात् समाधि में केवल अस्तित्व मात्र । फिर समाधि से व्युत्थान पर भाति, भासता है। प्रह्लाद समाधि से व्युत्थान की कोई अवस्था हो सकती है। प्रह्लाद को भगवन्नाम स्मरण में बहुत रुचि थी ।  एक स्थिति ऐसी है जब रूप स्पष्ट नहीं हुआ है, एकरूप है । वह नाम की स्थिति है । दूसरी स्थिति में रूप प्रकट हुआ है।

पुराणों में मृ्त्यु पश्चात् गंगा में अस्थि प्रवाह का जो वर्णन है, वैदिक साहित्य में उसका रूप इस प्रकार है कि अस्थियां यज्ञ की समिधाएं हैं। यज्ञ में कुछ काष्ठ खण्डों पर आज्य/घृत का लेप करके उनके बीच में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। इसी प्रकार अस्थि रूपी समिधाओं पर अस्थियों के अन्दर स्थित मज्जा रूपी आज्य का लेप करके इनके बीच अग्नि को प्रज्वलित करना है। यह अग्नि कौन सी है, इसके विषय में शतपथ ब्राह्मण का कथन है कि आत्मा ही अग्नि है। शतपथ ब्राह्मण  के अनुसार प्राण जो अमृत है, वही अग्नि है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार मज्जा के लिए अग्नि प्राण है, अस्थि के लिए अग्नि अपान, स्नायु के लिए व्यान, मांस के लिए उदान और मेद के लिए समान है। अस्थि स्वयं में निर्जीव है, उसमें प्राण नहीं है। प्राणों द्वारा, अग्नि द्वारा अमेध्य अस्थि आदि को मेध्य बनाते हैं।

अतः ईश्वर को समझने से पूर्व भूत शब्द को समझना होगा। "अस्थि" = अस्थि शब्द अस्ति का द्योतक है। हरेक जीव की चेतना अस्थि/अस्ति है। - फतहसिंह।  अस्थि और समाधि के संदर्भ को समझने में शतपथ ब्राह्मण १०.४.१.१७ का उल्लेख सहायक होगा। इसके अनुसार लोम, त्वक्, असृक्, मेद, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा यह सब २-२ अक्षरों वाले हैं। इन्हें मिलाकर १६ कलाएं बनती हैं। इनमें विचरने वाला प्राण प्रजापति कहलाता है जो १७वां है। यह १६ कलाएं प्राण प्रजापति के लिए अन्न का आहरण करती हैं। वैदिक साहित्य में अस्थियों का अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी, दोनों अवस्थाओं से सम्बन्ध जोडा गया है। अस्थियों को इष्टकाएं/ईंट कहा गया है जो इष्ट कामना की पूर्ति करती हैं।

यह याद रखते हुए, और यह समझते हुए कि सारा साकार जगत् ही उस ब्रह्म का रूप है, सामान्य जन को क्रमशः इस मूर्त-रूप की ओर ले जाना उचित ही है इसलिये मूर्ति-पूजा की आत्यंतिक निन्दा करना अनुचित है।
पुराणों में दक्ष यज्ञ की कथा में दक्ष को ईश्वर शिव की सत्ता का ज्ञान नहीं हो पाता, वह शिव की कल्पना घोर रूप में ही करता है । लेकिन दधीचि ऋषि को ईश्वर की सत्ता का ज्ञान है , वह दक्ष को समझाने का प्रयत्न करते हैं लेकिन असफल रहते हैं । शतपथ ब्राह्मण के आधार पर ऐसा अनुमान है कि दक्ष से तात्पर्य प्राणों की दक्षता प्राप्त करना है - श्वास के अंदर जाते हुए भी आनन्द की अनुभूति और बाहर आते हुए भी आनन्द की अनुभूति । समाधि से व्युत्थान पर पहले अहंकार स्थिति प्रकट होती है , फिर शब्द , स्पर्श , रूप , रस व गन्ध नामक पांच तन्मात्राओं की और उसके पश्चात् आकाश , वायु , अग्नि , जल व पृथिवी नामक पांच महाभूतों का प्राकट्य होता है । इन्हीं भूतों के प्रकट होने से मनुष्य में विभिन्न इन्द्रियों का विकास होता है ।
सन्त तुलसीदास जी भक्ति और ज्ञान के विषय में कहते हैं - 

' ग्यानहिं  प्रभुहिं बिसेसि पियारा।
भागितिहि ज्ञानहिं नहीं कछु भेदा।'

सगुनहिं अगुनहिं नहीं कछु भेदा। गावहिं मुनि पूरान  बुध वेदा।
अगुन सगुन दुई ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।

जब जब होई  धर्म कै हानी। बाढ़ै असुर अधम अभिमानी।
तब तब प्रभु धरी विविध सरीरा। हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।।

सगुन और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है। जो निर्गुण ,अरूप(निराकार ),अलख (अव्यक्त )और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण 'श्रीरामकृष्ण' के रूप में प्रकट हो जाता है। जब परमात्मा अनन्त रूपाकारों में इस संसार की रचना कर सकता है तब क्या अपनी स्वयं की  रूपाकृति नहीं गढ़ सकता ?

ईश्वर तो सर्व शक्ति मान है सब कारणों का कारण है किन्तु स्वयं उसका कोई कारण नहीं है।
इसलिए वह अपनी योगमाया से एक साथ एक ही समय पर अलग -अलग जगहों  पर अलग- अलग नाम रूपों में हो सकता है।

और यदि हम कहें कि वह ऐसा नहीं कर सकता फिर हमें यह भी मानना पड़ेगा कि वह बाकी सब काम कर सकता है लेकिन अपनी रूपाकृति नहीं रच सकता यानी तब उसकी एक शक्ति कम हो जाएगी वह सर्वशक्तिमान नहीं रह जाएगा। लेकिन यदि हम ऐसा मानते ही हैं कि नहीं वह सर्वशक्तिमान तो है फिर यह भी मान लेना पड़ेगा वह स्वयं भी किसी रूप प्रगट हो सकता है।  वह सब जगह मौजूद है सारी सृष्टि में व्यापक है। उसके इस सर्वव्यापकत्व को बनाए रखने के लिए उसका निर्गुण  निराकार होना भी ज़रूरी है।

‘बृहदारण्यक’ उपनिषद् में वर्णन आता है कि बह्मविद् लोग संसार का पुनः निर्माण करते हैं। जीवात्मा भी इन दो स्वरूपों में प्रकट है। आत्मा निराकार है तथा गोचर शरीर भी धारण करता है एक नहीं अनेक बार। फिर परमात्मा तो सर्व-आत्माओं का प्रभु है, वह क्यों नहीं ऐसा कर सकता?  इसीलिए वेद परमात्मा के दोनों स्वरूपों की पुष्टि करते हैं। दोनों सत्य हैं। जगत भी सत्य, ब्रह्म भी सत्य। जगत है ब्रह्म की देह, ब्रह्म है जगत का प्राण। दोनों साथ-साथ हैं। और दोनों हैं, इसलिए जीवन अति सुंदर है! फलतः निष्काम भाव से किया हुआ कार्य न तो आत्मा को बाँधता है न ही उसे मलिन करता है। जब तक उस ब्रह्माण्डीय प्रक्रिया की समाप्ति नहीं हो जाती तब तक जीवन-मुक्त पुरुष भी विश्वात्मा के लिए कार्य करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में जब कर्म का क्षेत्र भी यह दृश्यमान जगत है, तो उसको मिथ्या मानकर चलना अविवेकपूर्ण है। ब्रह्म सत्य तो है किन्तु उस सत्य तक पहुँचने के लिए जगत को भी सत्य मानकर चलना होगा। निष्काम भाव से कर्म करते हुए तभी परम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

यदि जगत अथवा सृष्टि से ज्ञान निकल जाए तो पदार्थ बिना आधार का हो जाएगा और सृष्टि तत्काल नष्ट हो जायेगी।  इसलिये भविष्य का मनुष्य वैज्ञानिक और धार्मिक साथ-साथ होगा। अर्थात जो धार्मिक होगा (या श्रीरामकृष्ण का भक्त होगा) वह साथ ही साथ वैज्ञानिक (ऋषि या पैग़म्बर) भी  होगा।  "हरि ॐ" शब्द रूप दोनों स्वरूपों की स्मृति है "हरि" (श्रीरामकृष्ण) सगुन रूप विष्णु हैं तो "ॐ" निराकार ब्रह्म हैं।यह अभेदतत्व अभी तक केवल वेदान्त-शास्त्रों के पन्नों में निबद्ध था. श्रीरामकृष्ण ने स्व-अनुभूत आचरण के द्वारा - शास्त्रोक्त सत्यतत्व को ' तथ्य ' में परिणत कर दिखाया था. काली-महाराज के सत्यार्थी मन ने वेदान्त के जिस सारतत्व का अन्वेषण किया था, श्रीरामकृष्ण ने उसे दिव्य-दृष्टि की सहायता से उन्मोचित कर दिया था. पवित्र-सानिध्य प्रदान कर परम-प्राप्ति को वास्तविकता में परिणत कर दिया था.
श्रीरामकृष्ण स्वयं अद्वैत-वेदान्ती थे, वे कहते थे-' अद्वैतज्ञान को आँचल में बाँध कर जो चाहो करो, तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा. ' इसीलिए वे काली-वेदान्ती के अद्वैत साधना का असमर्थन नहीं कर सकते थे. परन्तु यदि कोई जानना चाहता तो उसको, वे तत्व और तथ्य (सिद्धान्त और व्यव्हार दोनों ) की सहायता से प्रमाणित कर कर के दिखला देते थे.

इसीलिए वेदान्त के जो तात्विक-सिद्धान्त हजारों वर्ष पूर्व,उपनिषद-कारों के ध्यान-नेत्र या ऋषि-दृष्टि के सामने उद्भाषित हो उठे थे, आज वही तत्व श्रीरामकृष्ण के जीवन से प्रमाणित हो रहे थे, एवं काली-

महाराज ने स्वयम अपने आँखों से परख कर देख लिया था. उनकी अद्वैत-वेदान्त की साधना सार्थक हो गयी थी; और उसके साथ ही साथ गुरुभाइयों द्वारा दिया गया - ' काली-वेदान्ती ' नाम का सही मुल्यांकन भी हो गया था.
कालीमहाराज तपस्वी थे, वे बहुत कठोर तप करते थे. इसीलिए बड़ानगर मठ में उनका एक अलग कमरा था. उस कमरे को ' काली- तपस्वी ' का कमरा कहा जाता था. फिर वे वेदान्त की भी गहराई (नsआसीत, नsअस्ति, नsभविष्यति ) में भी प्रवेश कर जाते थे, वेदान्त-चर्चा करने में बड़े पारंगत थे, इसीलिए कोई कोई उनको ' काली-वेदान्ती ' भी कहा करते थे.

एकदिन अमेरिका के एक हाल में ' मनःसंयोग ' के विषय पर अभेदानन्दजी का व्याख्यान चल रहा था. श्रोतागण पुरे मनोयोग के साथ ' मनसंयम ' के उपर अभेदानन्दजी के व्याख्यान को सुनने में निमग्न थे. उन्ही श्रोताओं में से एक विख्यात दार्शनिक ने दूसरे दिन महाराज को कहा था- ' आपका मनःसंयोग के ऊपर दिया गया व्याख्यान सार्थक सिद्ध हुआ है. क्योंकि आप जब हमलोगों का मनसंयोग विषय पर क्लास ले रहे थे, उसी समय निकट के रस्ते से बैंड बजाते हुए एक शोभायात्रा निकली थी, किन्तु हममें से किसी को उसका पता नहीं चला. ' अभेदानन्दजी भी व्याख्यान देने में इतने तल्लीन थे कि, उनको भी इसका पता न चल सका था, इसीलिए उन्होंने पूछा- ' ऐसा क्या ?'

उन्होंने कहा- ' हाँ, व्याख्यान चलते समय एक शोभायात्रा हाल के बिलकुल निकट से होकर गुजरी थी. किन्तु हममें से किसी को इसका पता नहीं चला. इस से यह सिद्ध होता है कि आपका ' मनः संयोग ' के विषय में दिया गया व्याख्यान हमलोगों के लिए सार्थक हो गया है, क्योंकि आपके ' मनःसंयोग ' - क्लास में हम सभी लोग इतनी तल्लीनता से सुन रहे थे, कि हमारा मन उसके भावों में बहते हुए एक दूसरे ही लोक में पहुँच गया था.'

स्वामी अभेदानन्दजी एक ही आधार में वक्ता, दार्शनिक, लेखक एवं मनोवैज्ञानिक भी थे. वे एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे. उन्होंने पाश्चात्य देशों में विभिन्न विषयों पर जितने भी व्याख्यान दिए थे, वह आज पुस्तकों में लिपिबद्ध है. उदहारण के लिए, मृत्यु के पार, मृत्यू रहस्य, पुनर्जन्म-वाद, मनोविज्ञान और आत्मतत्व आदि कुछ प्रमुख पुस्तकों का नाम लिया जा सकता है.  पश्चात्यवासी उनके प्रतिभा को देख कर मुग्ध हो गए थे।

अभेदानन्दजी के साथ पाश्चात्य देशों के विख्यात ज्ञानी-गुणि मनीषियों यथा- अध्यापक मैक्समुलर, पाल डायसन, विलियम जेम्स, जोसिया रयेस, राल्फ ओयलेंडो, लायनमैन, हडसन आदि के घनिष्ट सम्बन्ध था. यहाँ तक कि ग्रामोफोन के आविष्कारक टॉमस आलवा एडिसन के साथ भी उनकी गहरी मित्रता थी. उन्होंने उनको अपने द्वारा आविष्कृत प्रथम ग्रामोफोन उपहार में दिया था, जो रामकृष्ण वेदान्त मठ में आज भी चालू हालत में संरक्षित है.

स्वामी अभेदानान्दजी हावर्ट, कोलम्बिया, इयेल, कर्नेल, केम्ब्रिज, वर्कले, क्लार्क, कैलिफोर्निया आदि यूनिवर्सिटी में नियमित व्याख्यान दिया करते थे. इसके अतिरिक्त वे दर्शन और विज्ञान के सम्बन्ध में अमेरिका, कनाडा, अलास्का, मेक्सिको, तथा यूरोप के बड़े बड़े यूनिवर्सिटी में भी नियमित भाषण देते थे. 

वे एक सफल प्रचारक थे. भारत के वेदान्त-दर्शन को उन्होंने ही विश्व के समक्ष उजागर किया था. वेदान्त प्रचार करने के लिए १७ बार आटलनटिक महासगर को पार किया है. अमेरिका में उनके द्वारा दिए गए व्याख्यान- ' India and her people ' ने सभी का ध्यान आकर्षित कर लिया था. इस व्याख्यान का बंगला अनुवाद  ' भारत और उसकी संस्कृति ' के नाम से बंगला में छपा था; उस समय यह पुस्तिका भारतप्राण व्यक्तियों की पाठ्यवस्तु बन गयी थी. इसीलिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तिका पर प्रतिबन्ध लगा दिया था. उनका कहना था कि यह पुस्तक स्वाधीन चेता भारतियों को स्वाधीनता संग्राम के लिए उद्बुद्ध कर रहा था.

स्वामी अभेदानान्दजी अमेरिका पच्चीस वर्षों तक रहने के दौरान १९०९ ई० में छ' महीनों के लिए भारतवर्ष आये थे. भारत आकर स्वाधीनता-संग्रामियों को उद्दीप्त किये थे. इसके बाद वे पुनः अमेरिका लौट गए एवं दीर्घ २५ वर्षों तक अमेरिका में भारतीय-दर्शन एवं वेदान्त का प्रचार किये थे. १९२१ ई० में वे भारत लौट आये थे. वापस लौटते समय चीन, जापान, फिलिपाईन्स, सिंगापूर, कोयलालमपूर, रंगून आदि देशों में भी उन्होंने भारत के वेदान्त को वहाँ की जनता के समक्ष उजागर किया था.  १९२२ ई० में वे रामकृष्ण मठ एवं मिशन के उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए, उसके बाद भारत के प्राण-केन्द्र कोलकाता में भी वेदान्त-प्रचार करने के लिए एक अस्थायी ' वेदान्त समिति ' गठित किये. इस समय भी उनके पास भारत के महान महान व्यक्ति आया करते थे. भिन्न भिन्न समय पर सर सी. भी. रमन, महात्मा गाँधी, चितरंजन दास, सुभाषचन्द्र बोस, जैसे महापुरुष-गण उनके निकट सानिध्य में आये थे एवं उनकी ज्ञान-गर्भित वार्ताओं को सुन कर मुग्ध हुए थे.

 १९२१ ई० में भारत लौट आने के बाद २५ दिसम्बर को कोलकाता में उनके लिए  विशेष अभ्यर्थना और अभिनन्दन सभा आयोजित की गयी थी. परिव्राजक स्वामी अभेदानन्दजी १९२२ ई० में पुनः तिब्बत और काश्मीर का पर्यटन करने निकल पड़े. वहाँ से बौद्ध-दर्शन एवं तिब्बतीय सामाजिक-तत्वों के सम्बन्ध में बहुत से तथ्यों का संग्रह किये थे. 

 तत्पश्चात १९२३ ई० में ' वेदान्त समिति ' को स्थापित किये एवं दार्जलिंग में ' रामकृष्ण वेदान्त आश्रम' की स्थापना १९२५ ई० में किये. स्वामी अभेदानन्दजी ने १९२७ ई० में मासिक मुखपत्र के रूप में 'विश्व-वाणी ' पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया; एवं १४ मार्च १९३१ को ' रामकृष्ण वेदान्त मठ ' की स्थापना की थी. एवं १९३१ ई० के मार्च महीने में ही आयोजित श्रीरामकृष्ण के शतवार्षिकी ( सौवाँ जन्मोत्सव ) महासभा की अध्यक्षता स्वामी अभेदानन्द जी ने ही की थी. किसी विशाल समारोह में दिया गया, यही उनके जीवन का आखरी व्याख्यान था.

८ सितम्बर १९३९ को विश्वविजयी वेदान्तिक भारत माता की कीर्ति को दुनिया भर में प्रचारित करने वाले इस योग्य भारत-सन्तान ने महासमाधि प्राप्त की. उनकी अन्तिम इच्छा के अनुसार ' काशीपुर-महाश्मशान ' में उनके गुरुदेव श्रीरामकृष्ण की समाधी के निकट ही उनको भी भष्मीभूत करके समाहित कर दिया गया।  

=============

१९.

क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान ( ऑलमाइटी पर्सन) व्यक्तिविशेष  है ?


 श्लोक-१९ :  ईशावास्यमिदं सर्वमलोकं तत् कथं भवेत् । यतः सर्वप्रपञ्चोSयं ब्रह्मैवास्ति न चेतरत्॥ 

- अर्थात सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जगत् जीवन-उसी ईश का आवास है। 'संसार शून्य (The world is not zero) नहीं है, उसमें कुछ वास्तविकता है।' संसार (स्थूल शरीर) केवल इसीलिये 'प्रतीयमान' होता है कि इसके पीछे ब्रह्म का 'अस्तित्व' (अस्थि) है। "सर्वं खल्विदं ब्रह्म — All this is verily Brahman" सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन॥ — यह विश्व ही 'ब्रह्म' है, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है !
प्रसंग : [ ईशावास्योपनिषद् के पहले मंत्र में ही कम्युनिज्म की बुनियाद है, आत्मा का साक्षात्कार ही सर्वोत्तम श्रेयस् (highest good) है- वि० सा० ख ६/२५३, स्वामी निर्मलानन्द के साथ वेदान्त शास्त्र की चर्चा -वि० सा० ख० ६/१६२]
विषयवस्तु १९-१ : ईशावास्योपनिषद् (All this is the abode of God.) भारतीय संस्कृति में कण-कण में प्रभु का अंश देखना अति प्राचीन विचार है। इसी अनुभूति से उतपन्न - प्रेम, भारतीय आध्यात्मिकता का एक ऐसा 'प्राणतत्त्व' है, जिसके कारण भारत ने अपनी सर्वाधिक सामर्थ्य के दिनों में भी स्वार्थवश कभी भी किसी भी राष्ट्र पर पहले हमला नहीं किया! क्योंकि इस समस्त जगत को ईश्वर से व्याप्त देखने वाला पुरुष ही- सच्चा कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट, या समतावादी हो सकता है।

जब सब कुछ परमात्मा का ही है तो फिर उसे अपना समझ कर भोगने की बात ही कहाँ रह गई ? और जिसका इस प्रकार का “अहंभाव” समाप्त हो जाता है वह स्वयम् ईश्वर का हो जाता है। उस स्थिति में वह कुछ करता नहीं – न त्याग न ही भोग, उस स्थिति में तो जो कुछ होता है वह प्रारब्धवश अनिच्छा या परेच्छा से घटित होता है।

१९.२ : ' ज्ञानयोग पर प्रवचन '

यह जगत क्या है ? दुनिया को कई तरह की उपमाएं मिलती रहती हैं। किसी के लिए दुनिया एक तमाशा है तो किसी के लिए खुदाई तोहफ़ा। कोई इस मिट्टी का खिलौना कहता है, कोई जादू का तो कोई बच्चों का, मगर है यह खिलौना ही। निदा फ़ाज़ली फर्माते हैं-

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है।
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

किन्तु स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " संसार शून्य नहीं है- उसमें कुछ वास्तविकता है। यह संसार ' ईश्वर की अभिव्यक्ति और प्रकृति का विकास है'।  संसार (स्थूल शरीर) केवल इसीलिये 'प्रतीयमान' होता है कि इसके पीछे ब्रह्म का 'अस्तित्व' (अस्थि) है। जब हम प्रकृति में होने निरंतर होने वाले परिवर्तनों को नहीं समझ पाते हैं, तो उसे अनंत कह देते हैं ! 'जगत' -' गच्छति इति जगत्‌’ । यह ब्रह्म या निरपेक्ष की हमारी वह व्याख्या है, जिसे हम माया या नाम-रूप के माध्यम से देखने के बाद व्यक्त करते हैं।
[ सिवाय बदलनेके संसारमें और कुछ तत्व ही नहीं है‒‘सम्यक् प्रकारेण सरति इति संसारः’, जो (शरीर- मन) हरदम बदलता है, उसको तो आप स्थायी मानते हैं; और जो (आत्मा) कभी बदलेगा नहीं, कभी बदल सकता नहीं, उसकी प्राप्ति को कठिन मानते हैं । यह जो, ‘संसार है’ ऐसा दीखता है, संसार का यह ‘है’-पना क्या  है ? अगर संसारका है तो फिर बदलता क्या है ? सत्‌का तो अभाव होता नहीं और संसारका अभाव प्रत्यक्ष हो रहा है। अवस्थाका, परिस्थिति का, घटनाका, देशका, कालका, वस्तुका, व्यक्तिका, इन सबका परिवर्तन होता है‒ यह प्रत्यक्ष हमारे अनुभवकी बात है । विचार करें, आपके होनापन में कौन-से करण की सहायता है ? किस कारक की सहायतासे आपका 'होना-पन' है ? आपका होनापन करण-निरपेक्ष है । अपने होनापन में रहते हुए भी आप उससे (शरीर-अहं) से चिपकते हैं, जो 'नहीं' है ।]

वास्तवमें आप अनंत काल तक नश्वर शरीर-मन से कभी चिपक ही नहीं सकते। नश्वर पदार्थ (अहं) या मैटर (शरीर-मन) को ही मैं मानने की सत्यता और विश्वास (सम्मोहन) से अपने को पूर्णतया पृथक कर लेना ही ज्ञान है। हम यथार्थतः क्या हैं? आत्मा का साक्षात्कार ही सर्वोत्तम श्रेयस् (highest good) है। 

ॐ तत् सत् ! ॐ का ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रहस्य का ज्ञान प्राप्त कर लेना है। ज्ञानी-भक्त को अपने मन में निरन्तर जपते रहना चाहिये - - " हरिः ॐ तत् सत् ! " (श्रीरामकृष्ण या) ॐ ही एकमात्र वास्तविक सत्ता है । यह तात्विक एकता - (अर्थात शारीरिक दृष्टि से मैं श्रीरामकृष्ण का दास हूँ, किन्तु तत्वतः जो वे हैं-वही मैं हूँ !) ज्ञानयोग की नींव है। उसे ही अद्वैतवाद (द्वैत से रहित) कहते हैं। वेदान्त दर्शन की यह आधारशिला है, उसका आदि और अन्त है। " केवल ब्रह्म (श्रीरामकृष्ण) ही सत्य है, शेष सब मिथ्या और मैं (तत्वतः वही) ब्रह्म हूँ!" ज्ञानयोगी को अवश्य ही उतना प्रखर अवश्य होना चाहिये, जितना कि संकीर्णतम संप्रदायवादी किन्तु उसका हृदय उतना ही विस्तीर्ण भी होना चाहिये जितना कि आकाश।
संसार-भ्रम एक बार टूट जाने (निधन=समाधी) के बाद, वह हमारे पास पुनः लौट आता (व्युत्थान)  है, किन्तु तब हमारे लिये उसमें कोई वास्तविकता नहीं रह जाती। हम उसे एक मृगतृष्णा के रूप में ही ग्रहण करते हैं। इस मृगतृष्णा के परे पहुँचना ही सभी धर्मों का लक्ष्य है। किन्तु बहुत कम लोग इस नाम-रूप के पर्दे (माया) के पीछे प्रवेश कर पाते और परम सत्य (जिसका बिना प्रचार के प्रचार है वो भगवान है) की उपलब्धि कर पाते हैं। क्योंकि विवेक-वैराग्य के महत्व को नहीं समझ पाते हैं, इसीलिये आचार्य शंकर मनुष्य को मानसिक-व्यायाम करने के लिये प्रतिदिन मोह-मुद्गर भांजने की सलाह देते हुए लिखते हैं -
यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्ता पृच्छति कोऽपि न गेहे॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

जब तक मनुष्य धन कमा-कमा कर परिवार के जमा करता रहता है, तभी तक उसके कुटुंब-परिवार भी उससे प्रेम करते हैं ! किन्तु जब शरीर बूढ़ा और जर्जर हो जाता है, कोई उसका हाल पूछने भी नहीं आता। इसको समझो और धर्म-पूर्वक धन कमाकर परिवार का पालन-पोषण तो करो किन्तु सदा भज

गोविन्दम् भज गोविन्दम्...कहते रहो !

अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृध्दो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

जैसे जैसे शरीर बूढ़ा होता जाता है, सारे अंग भी शिथिल होते जाते हैं, सिर के बाल झड़ जाते हैं, सारे दाँत टूट जाने पर मुख-तुंडा (पोपला) हो जाता है। वृद्ध हुए तब दंड उठाया, किंतु न छूटी आशा-माया॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्...

जब हम 'नेति नेति' कर के अस्वीकार करना प्रारम्भ करें, तो जब तक हम उस परम वस्तु पर न पहुँच जायें जिसे अस्वीकार किया या हटाया नहीं जा सकता -- जो कि यथार्थ 'मैं' है, शेष सब हटा ही देना चाहिये। मनुष्य 'द्वा-सुपर्णा' में वर्णित दो पक्षियों में नीचे वाले पक्षी के समान है। लेकिन यदि वह अपनी सर्वश्रेष्ठ कल्पना के अनुसार किसी मनुष्य देहधारी सर्वोच्च आदर्श (अवतार-वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण) तक पहुँचने के प्रयत्न में निरन्तर लगा रहे; तो एक समय ऐसा आयेगा, जब वह भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि वह सदैव-'अजर-अमर-अविनाशी' आत्मा ही था, अन्य सब जितनी भी घटनायें उसके जीवन में घटित हो रही थीं- सब मिथ्या या स्वप्न था। (विवाह भी मेरी इच्छा से नहीं T की इच्छा से ही होता है!) वस्तुत: ज्ञानी और भक्त की स्थिति में कोई अन्तर नहीं होता । अर्जुन जब कृष्ण के विश्वरूप (Universal Form) का दर्शन कर आत्मसंस्थ हुए--तभी वे ज्ञानाग्नि-दग्धकर्मा (bondages of Karma burnt) बने- और उन्होंने युद्ध किया।

१९.३ शुद्ध अद्वैतवाद का असल सार है - "सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन" ब्रह्म, ईश्वर, जीव-

जगत — All this is verily Brahman"
क्या ईश्वर कोई सर्वशक्तिमान व्यक्तिविशेष ( almighty Person) है? अधिकांश लोग लोग किन्तु वैसे ही ईश्वर में विश्वास रखते हैं। इसीलिये सद्गुरु ईश्वर को 'कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' या व्यक्तिविशेष बताकर बात का प्रारम्भ करके, शिष्य के मन में धीरे धीरे वेदान्तवाद की नींव को सुदृढ़ करना चाहते हैं।
जीव में अविद्या प्रबल है; ईश्वर विद्या और अविद्या की समष्टिरूपी माया को वशीभूत करके विराजमान है और स्वाधीन भाव से उस स्थावर-जंगमात्मक जगत को अपने भीतर से बाहर निकाल रहा है। परन्तु ब्रह्म उस व्यष्टि-समष्टि अथवा जीव और ईश्वर से परे है। ब्रह्म पूर्ण है, ब्रह्म का अंशांश भाग नहीं होता। समझने के लिये उनके त्रिपाद, चतुष्पाद आदि की कल्पना मात्र की गयी है। जिस पाद में सृष्टि-स्थिति-लय का अध्यास हो रहा है, उसी को शास्त्र में 'ईश्वर' कहकर निर्देश किया गया है। अपर त्रिपाद कूटस्थ है, जिसमें द्वैत कल्पना का आभास नहीं, वही ब्रह्म है। इससे तू ऐसा न मान लेना कि ब्रह्म जीव-जगत से कोई अलग वस्तु है।
विशिष्टाद्वैतवादी कहते हैं, ब्रह्म (T) ही जीव-जगत के रूप में परिणत हुआ है। अद्वैतवादी कहते हैं,
 ' ऐसा नहीं, ब्रह्म में जीव-जगत अध्यस्त मात्र हुआ है। जीव-जगत ब्रह्म का परिणाम नहीं है, विवर्त है।'  अद्वैतवाद का कहना है कि जगत केवल नाम-रूप ही है। जब तक नाम-रूप है, तभी तक जगत है। ध्यान-धारणा द्वारा जब नाम-रूप लुप्त हो जाता है, उस समय एकमात्र ब्रह्म ही रह जाता है। उस समय तेरी, मेरी अथवा जीव-जगत की स्वतंत्र सत्ता का अनुभव नहीं होता। उस समय (अहं को नहीं आत्मा को ) ऐसा अनुभव होता है, " मैं ही नित्य-शुद्ध-बुद्ध शाश्वत चैतन्य अथवा सच्चिदानन्द ब्रह्म हूँ!- जीव का स्वरुप ही ब्रह्म है। ध्यान-धारणा द्वारा नाम-रूप का आवरण हटते ही यह भाव प्रत्यक्ष अनुभव में आता है-बस इतना ही। यही है शुद्ध अद्वैतवाद का असल सार।
शिष्य - तो फिर ईश्वर सर्वशक्तिमान कोई व्यक्तिविशेष (almighty Person) है -यह बात फिर कैसे सत्य हो सकती है ?
स्वामीजी - मनरूपी उपाधि को लेकर ही मनुष्य है; ( क्योंकि मन की चहारदिवारी जहाँ तक है, वहीं तक मनुष्य के सोचने की सीमा है, उसकी सीमा से परे निकलने का उपाय उसने किसी सद्गुरु से नहीं सीखा है) इसीलिये मन के द्वारा ही उसे सभी विषय समझना पड़ रहा है। परन्तु जो कुछ सोचता है, वह सीमित होगा ही। इसलिये अपने व्यक्तित्व के अनुरूप किसी ईश्वर की कल्पना करना, जीव का स्वतः सिद्ध स्वाभाव है, क्योंकि मनुष्य अपने सर्वोच्च आदर्श (T) को भी मनुष्य के रूप में ही सोचने का सामर्थ्य रखता है।
इस जरा-मृत्युपूर्ण जगत में आकर मनुष्य जब दुःख की ताड़ना से 'हा हा हतोsस्मि रोदिति विष्णुशर्मा' के जैसा 'हाय-हाय यह जरा-मृयु तो मुझे भी मार डालेगी ' सोचकर अश्रुपात करने लगता है; तब वह किसी ऐसे व्यक्ति का आश्रय लेना चाहता है, जिस पर निर्भर रहकर वह चिन्ता मुक्त हो सके। परन्तु ऐसा ससीम आधार है कहाँ; जो हमे जरा-मृत्यु भय से मुक्त कर सके ? तब उसे समझ में आता है कि वह सर्वव्यापी आत्मा ही उसका एकमात्र आश्रयस्थल हो सकती जिसका स्वयं कोई आधार नहीं है!!

[ तब वह भी शंकराचार्य के समान ब्रह्मभाव-को उपनीत हो जाता है-" आनीदवातं स्वधया तदेकं" -प्राणनार्थक 'अन' धातु का 'आनीत्' यह रूप है ( अवातम् ) वायुरहित। बिना वायु का वह एक ब्रह्म विद्यमान था, केवल वह अकेले ही नहीं था , किन्तु स्वधा भी उसके साथ थी। क्योंकि स्व = निज सत्ता | जो निज सत्ता को धा = धारण किये हुये विद्यमान हो , उसे स्वधा कहते हैं; को समझकर प्रार्थना करता है  -" निरालम्बो लम्बोदर जननी कामयामी शरणम ! कहकर माता पार्वती देवी दुर्गा की शरण में जाने की कामना करता है।" ]

ब्रह्मज्ञान ही सब जीवों का एकमात्र लक्ष्य है, किन्तु उसे पाने के अनेक पंथ -अनेक मत हैं। जीव का परमार्थिक स्वरुप ब्रह्म होने पर भी मनरूपी उपाधि (देह को अहं मानना)  में अभिमान रहने के कारण, वह तरह तरह के सन्देह, संशय, सुख-दुःख आदि भोगता है। परन्तु अपने स्वरुप की प्राप्ति लिये आब्राहमस्तम्ब सभी गतिशील (एजति) हैं। जब तक 'अहं ब्रह्म' तत्व प्रत्यक्ष न होगा, तब तक इस जन्म-मृत्यु की गति के पंजे से किसी का छुटकारा नहीं है। मनुष्य-जन्म प्राप्त करके आवा-गमन या जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की (या सत्य को जानने की) इच्छा  प्रबल होने तथा किसी सच्चे महापुरुष की कृपा प्राप्त होने पर ही मनुष्य की आत्मज्ञान की आकांक्षा बलवती होती है; नहीं तो काम-कांचन में लिप्त व्यक्तियों  के मन की उधर प्रवृत्ति ही नहीं होती। लेकिन वैसे सन्त दुर्लभ हैं, भगवन्त दुर्लभ नहीं हैं !
जिसके मन में स्त्री, पुत्र, धन, नाम-यश प्राप्त करने का संकल्प है, उनके मन में ब्रह्म को जानने की इच्छा कैसे हो ? और वह किसी सच्चे महापुरुष को पहचाने कैसे ? उसे तो आशाराम जैसे क्षद्म सन्त ही मिलते हैं। जो व्यक्ति अपना सब कुछ त्यागने को तैयार है, जो सुख-दुःख, भले-बुरे के चंचल प्रवाह में धीर-स्थिर, शान्त तथा दृढ़चित्त रहता है, वही आत्मज्ञान (सत्य का ज्ञान) प्राप्त करने में अविराम श्रम करने को तत्पर होता है। और वही ' निर्गच्छति जगज्जालात् पिंजरादिव केसरी ' --महाबल से जगद्रूपी जाल को तोड़ कर माया की सीमा (मन की चहार दिवारी) को लांघकर सिंह की तरह बाहर निकल जाता है। किन्तु पूर्ण वैराग्य न आने तक , या त्याग न होने तक , अर्थात भोग-स्पृहा के प्रति आसक्ति का - पूर्ण त्याग न होने तक यह सिंहत्व प्राप्त नहीं होता । इस (भेंड़त्व का त्याग और)  सिंहत्व की प्राप्ति (जो शक्ति का वाहन बना दे) बच्चे के हाथ का लड्डू तो है नहीं, जिसे भुलावादेकर या छीन कर खा सकते हो ? 

पहले पहल मनुष्य इस सत्य को समझ नहीं सकता। विवेक-वैराग्य आने पर ध्यान-धारणा करते करते धीरे धीरे यह बात समझ में आती है! परन्तु कोई किसी भी भाव की साधना क्यों न करे, सभी जाने-अनजाने में अपने भीतर स्थित उस ब्रह्मभाव को ही जगा रहे हैं। हाँ आलम्बन अलग अलग हो सकते हैं। जिसका ईश्वर के सगुण होने में विश्वास हो, उसे उसी भाव  पकड़ कर जप-ध्यान आदि करना चाहिये। एकान्तिक भाव आने पर इसीसे समय आने पर ब्रह्मरूपी सिंह उसके भीतर जाग उठता है। 

शिष्य - परन्तु साधना करते करते धीरे धीरे त्याग (renunciation) तो आ सकता है न ?
स्वामीजी - जिसे धीरे धीरे आसक्ति का त्याग करना आता हो, उसे आये। परन्तु तुझे क्यों बैठे रहना चाहना चाहिये ? अभी से नाला काटकर जल लाने में लग जा ! (नेति नेति करते हुए मिथ्या देहाध्यास के अहंकार के आरी को काट कर हृदय में अन्तर्निहित दिव्यता -प्रेम के झरने को निचले खेत तक स्वतः पहुँच जाने दो।) श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "  हो रहा है, होगा, सब आलसी लोगों की भाषा है। " तीव्र प्यास लगने पर क्या कोई बैठा रह सकता है ? या पानी कहाँ मिलेगा इसके लिये दौड़-धूप करता है ? प्यास नहीं लगी, इसलिये बैठा है ज्ञान की इच्छा अभी तक प्रबल नहीं हुई है, इसीलिये स्त्री-पुरुष लेकर गृहस्थी कर रहा है ?   सदा विवेक-प्रयोग किया कर--' यह शरीर, घर, जीव-जगत सभी सम्पूर्ण मिथ्या है --स्वप्न की तरह है, सदा सोचा कर कि यह शरीर एक जड़-यंत्र मात्र है। इसमें जो सच्चिदानन्द स्वरुप आत्मा है, वही तेरा वास्तविक स्वरुप है।

मन (अर्थात अहंकार से ग्रस्त सूक्ष्म शरीर ) रूपी उपाधि ही आत्मा का प्रथम और सूक्ष्म आवरण है। उसके बाद देह में आसक्ति उसका स्थूल आवरण बना हुआ है। निष्कल, निर्विकार, स्वयंज्योति वह पुरुष इन सब मायिक आवरणों से ढका हुआ है, इसलिये तू अपने स्वरुप को जान नहीं पाता। रूप-रस की ओर दौड़ने वाले इस मन की गति को अन्दर ओर लौटा देना होगा। मन को मारना होगा। देह तो स्थूल है। यह मरकर पंचभूतों में मिल जाती हैं, परन्तु संस्कारों की गठरी मन (चित्त या सूक्ष्म-शरीर) शीघ्र नहीं मरता। बीज की भाँति कुछ दिन रहकर फिर वृक्ष के रूप परिणत होता है, फिर स्थूल शरीर धारण करके जन्म-मृत्यु के पथ में आया-जाया करता है। जब तक आत्मज्ञान नहीं हो जाता, तब तक यही क्रम चलता रहता है। इसीलिये कहता हूँ- (अष्टांग) ध्यान, धारणा और विवेक के बल पर मन को सच्चिदानन्द-समुद्र में डुबो दे। मन के मरते ही सभी गया समझ। बस फिर तू  ब्रह्मसंस्थ हो जायेगा।

शिष्य - महाराज, अभी हमारे मन की अवस्था तो उसी उद्दाम उन्मत्त बंदर के समान है, जिसके विषय में कहा गया है - ' मर्कटस्य सुरापानं तत्र वृश्चिकदंशनम् । तन्मध्ये भूतसंचारो यद्वा तद्वा भविष्यति' है। ऐसे मन को ब्रह्म में डुबो देना बहुत ही कठिन है। 

स्वामीजी - वीर (हीरो) के सामने कठिन या असम्भव नाम की कोई चीज़ होती है क्या ? कापुरुष लोग ही ऐसी बातें कहा करते हैं। "वीराणामेव करतलगता मुक्तिः न पुनः कापुरुषाणाम् — Mukti is easy of attainment only to the hero — but not to cowards." केवल शूरवीर (हीरो) लोगों के लिये ही मुक्ति हाथ पर रखे आँवले को प्राप्त करने जैसा आसान है- कोई कायर उसे कभी प्राप्त नहीं कर सकता। गीता ६/३५ में कहा है- "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। तू भी उस मन को   अभ्यास और वैराग्य के बल से संयत कर !

मन का उपादान है ' चित्त '। यह चित्त या 'मन-वस्तु' ( जिससे मन बना है मांइड स्टफ) मानो एक शान्त निर्मल सरोवर है। जब उसके ऊपर रूप-रस आदि विषयों के ढेले गिरते हैं, उसके आघात से उसमें जो तरंग उठ रही है, उसी का नाम है मन । इसीलिये मन का स्वरुप संकल्प-विकल्पात्मक या प्रश्न करने वाला है। उस संकल्प-विकल्प से ही वासना उठती है। उसके बाद वह मन ही क्रियाशक्ति (will इरादा) के रूप (या सूक्ष्म-शरीर) में परिणत होकर स्थूल देहरूपी यंत्र के द्वारा कार्य करता है। फिर कर्म भी जिस प्रकार अनन्त है, कर्म का फल भी वैसा ही अनन्त है। अतः लाखों असंख्य कर्मफल रूपी तरंग में मन सदा झूला करता है। उस मन को वृत्तिशून्य बना देना होगा। उस मन को पुनः एक स्वच्छ पारदर्शी सरोवर में परिणत करना होगा, जिससे उसमें फिर वृत्ति रूपी एक भी तरंग बाकी न बचे। चित्त-वृत्तियों का निरोध होते ही- मन (अहं) मर जायेगा, और आत्मा का परमात्मा के साथ योग हो जायेगा। तभी ब्रह्म-तत्व प्रकट होगा। शास्त्रकार उसी स्थिति का आभास इस रूप में दे रहे हैं - भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ मुण्डक उप॥ आदि --समझा ?

'त्रिपुटी भेद' की प्रक्रिया : 'नेति' 'नेति' करके इन्द्रियातीत 'प्रत्यक् चैतन्य' रूपी अपने यथार्थ स्वरुप में मन (सूक्ष्म-शरीर) को विसर्जित कर दे। इस प्रकार अपने शाश्वत चैतन्य स्वरुप में  मन को (अपने नश्वर सूक्ष्म शरीर को) बार बार डुबो डुबो कर मार डाल। तभी ज्ञानस्वरूप का बोध या स्व-स्वरूप में स्थिति होगी।जैसे ही सत्य का अहसास होगा, उस समय  दृश्य-दृष्टा-दृक अर्थात ज्ञेय, ज्ञान व ज्ञाता; सब एक हो जायेंगे।  सभी अध्यासों की निवृत्ति हो जायेगी। इसी को शास्त्रों में 'त्रिपुटी भेद' कहा है। इस स्थिति में जानने, न जानने का प्रश्न ही नहीं रह जाता। आत्मा ही जब एकमात्र विज्ञाता है, तब उसे फिर जानेगा कैसे ?

आत्मा ही ज्ञान -आत्मा ही चैतन्य (Intelligence)  - आत्मा ही सच्चिदानन्द है। जिसे सत् या असत् कुछ भी कहकर निर्देश नहीं किया जा सकता, उसी अनिवर्चनीय मायाशक्ति (नाम-रूप) के प्रभाव से जीवरूपी ब्रह्म के भीतर ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान का भाव आ गया है। इसे ही सामान्य जन चेतन अवस्था कहते हैं। और वह अवस्था जिसमें  सापेक्षिक अस्तित्व का यह द्वैत भाव शुद्ध ब्रह्म में एकत्व को प्राप्त हो जाता है, उसे ही शास्त्रों में अतिचेतन अवस्था (superconscious state) कहते हैं। इस अवस्था का वर्णन करते हुए आचार्य शंकर
(विवेक-चूड़ामणि ४११) कहते हैं -
' अजरममरमस्ताभाववस्तुस्वरूपं स्तिमितसलिलराशिप्रख्यमाख्याविहीनम्।'

जिस अवस्था में अजर, अमर, अभावशून्य, वस्तुस्वरूप, निश्चल या पूरी तरह से शान्त समुद्र जैसी अवस्था जिसका कोई नाम नहीं है - उस अद्वितीय पूर्ण ब्रह्म का विद्वान् समाधि-अवस्था में ह्रदय में साक्षात् अनुभव करते हैं।

किन्तु अतिचेतन अवस्था में या इन्द्रियातीत भूमि पर अनुभूत होने वाला वस्तु (परमसत्य) कैसा है, उसे कोई भी मानवीय मन या भाषा पूरी तरह से व्यक्त नही कर सकती। इसीको ठाकुर कहते थे ' ब्रह्म आज तक जूठा नहीं हुआ है ! ' दर्शन, या विज्ञान के आविष्कार आदि केवल आंशिक रूप से सत्य हैं पूर्ण सत्य नहीं;  इसलिये वे कभी भी  अतीन्द्रिय सत्य ( transcendent Reality) की समुचित व्याख्या करने वाले माध्यम नहीं बन सकते। क्योंकि जितने भी दर्शन और शास्त्र आदि निकले हैं, वे सभी ज्ञाता और ज्ञेय या आत्मा और अनात्मा (subject and object) के सापेक्षिक भूमि से ही निकले हैं।

इसलिये इन्द्रियातीत भूमि पर खड़े होकर देखने से जगत की हर वस्तु मिथ्या ( unreal) प्रतीत होती है-" धर्म मिथ्या, कर्म मिथ्या, मैं मिथ्या हूँ, तू मिथ्या है, विष-ब्रह्माण्ड का सबकुछ मिथ्या है।"  फिर उस अवस्था में पहुँचने बाद ही यह अनुभूत होता है कि - " केवल मैं ही सत्य हूँ, सिर्फ मैं हूँ ! मैं ही सर्वव्याप्त आत्मा हूँ; और अपने अस्तित्व का प्रमाण मैं स्वयं हूँ ! " मेरे अस्तित्व के प्रमाण के लिये, अलग से किसी दूसरे प्रमाण की आवश्यकता कहाँ हैं ? आचार्य शंकर (
वि ० चू ० ४०९ ) कहते हैं उस 'अकाल पुरख ' को प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं -
" निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ ॥

आकाश के समान निःसीम, कलारहित, निर्विकल्प पूर्ण ब्रह्म का विद्वान् समाधि-अवस्था अपने अन्तःकरण में साक्षात् अनुभव करते हैं ! और जैसा कि शास्त्रों ने कहा है-" नित्यमस्मत्प्रसिद्ध -निधन या समाधि में जाने वाले विद्वान को सर्वदा यह ज्ञात रहता है -कि ' मैं '(स्वरूपतः) - शाश्वत आत्मा हूँ!  

" मैंने वास्तव में स्वयं उस इन्द्रियातीत अवस्था को प्रत्यक्ष किया है, आत्मसाक्षात्कार किया है, उस परमसत्य को अपने अनुभव से जाना है। तुम लोग भी देखो और उसकी अनुभूति करो - और इस ब्रह्म-तत्व का उपदेश सभी युवाओं को सुनाओ। तब तो शान्ति पाओगे ! इस सर्वमतग्रासिनी, सर्वधर्म-समन्वयकारी ब्रह्मज्ञान का इसी जीवन में स्वयं अनुभव कर - और जगत में प्रचार कर ! ( " Be and Make !) स्वयं इस ब्रह्म-विद्या का प्रचारक (नेता या पैग़म्बर ) बन और दूसरों को भी (पैग़म्बर बनने) में सहायता कर ! इससे अपना तो कल्याण होगा ही, दूसरों का भी कल्याण होगा। तुझे आज सारी बात बता दी। इससे बढ़कर बात और दूसरी कोई नहीं । "

" असल बात यह है कि ब्रह्मज्ञ (ऋषि या पैग़म्बर) बनना ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है -परम पुरुषार्थ है। परन्तु कोई मनुष्य हर समय तो इन्द्रियातीत सत्य या ब्रह्म में अवस्थित तो नहीं रह सकता?  व्युत्थान होने बाद कुछ लेकर तो रहना पड़ेगा ? उस समय ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे लोगों का कल्याण हो। इसीलिये तुम लोगों से कहता हूँ, अभेदबुद्धि से जीव की सेवा (जीवशिव-वाद) के भाव से कर्म करो।

परन्तु भैया कर्म में ऐसे दाँव-घात हैं कि बड़े बड़े साधु भी आबद्ध हो जाते हैं, और फल में (नाम-यश में ) आसक्त हो जाते हैं! इसीलिये फल की आकांक्षा से शून्य होकर कर्म करना चाहिये । गीता में यही बात कही गयी है। परन्तु इतना समझ लो कि ब्रह्मज्ञान होना किसी प्रकार के कर्म पर निर्भर नहीं है, इन्द्रियातीत सत्य की अनुभूति होने में कर्म का अनुप्रवेश भी नहीं है ! हाँ निष्काम कर्म से किसी किसी को ब्रह्मज्ञान हो सकता है ! यह भी एक उपाय अवश्य है, किन्तु उद्देश्य है ब्रह्मज्ञान या 'ऋषित्व' की प्राप्ति ! इस तथ्य को भली भाँति समझ लो कि 'विवेक-विचार का मार्ग' ( path of discrimination = ज्ञानयोग) तथा अन्य सभी मार्गों से साधना करने का उद्देश्य है - ब्रह्मज्ञता (realisation of Brahman अथवा पैग़म्बरी का चपरास=ऋषित्व) प्राप्त करना।      

(महामंण्डल पद्धति में अन्नदान-विद्यादान-ज्ञानदान यज्ञ या युवा प्रशिक्षण शिविर के -' शिव ज्ञान से जीव सेवा वाले ' Be and Make ' आन्दोलन में सक्रीय सहयोग देना, वह उपाय है जिसके माध्यम से बड़ी संख्या में ब्रह्मवेत्ता मनुष्यों या मानवजाति के मार्गदर्शक नेताओं का निर्माण किया जा सकता है।) शिष्य - महाराज, ज्ञानयोग और कर्मयोग तो स्पष्ट हो गया, अब भक्तियोग और राजयोग की  उपयोगिता बताकर मेरी जिज्ञासा शान्त कीजिये।

स्वामीजी - उन सब पथों में साधना करते करते भी किसी किसी को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। भक्ति-मार्ग के द्वारा धीरे धीरे उन्नति होकर फल देर में प्राप्त होता है -परन्तु यह मार्ग सरल अवश्य है। किन्तु योग (अष्टांग योग या राजयोग) में अनेक विघ्न हैं। सम्भव है कि 'मनःसंयोग' का अभ्यास मन सिद्धियों (psychic powers-मानसिक शक्तियाँ) में चला जाय और इस प्रकार तुम्हें अपने असली स्वरूप (जिसके भय से सूर्य तपता है, ऋतुओं में परिवर्तन होता रहता है) को जानने से भटका दे। एकमात्र ज्ञान-मार्ग ही त्वरित फल देने वाला, तथा अन्य समस्त धर्ममतों (creeds) में सर्वाधिक तर्कपूर्ण है, इसीलिये यह मार्ग सर्व काल में और सभी देशों में समान रूप से सम्मानित है। परन्तु इस 'नेति नेति'-मार्ग में चलते चलते भी मन ऐसे तर्क-जाल में निबद्ध हो सकता है, जिससे निकल पाना अत्यंत कठिन हो।

इसीलिये इसके साथ ही साथ जप-ध्यान का अभ्यास भी करते रहना चाहिये। हमें विवेक-विचार (यम-नियम का पालन) और एकाग्रता (आसन -प्रत्याहार-धारणा) का अभ्यास करते करते ध्यान के बल पर उद्देश्य तक अथवा ब्रह्म-तत्व (अतीन्द्रिय अवस्था) में पहुँचना होगा। इस प्रकार-  (महामण्डल पुस्तिका मनःसंयोग-पद्धति  के अनुसार) साधना करने से गन्तव्य स्थल पर ठीक-ठाक (प्राणायाम के चक्कर में पड़कर पागल हुए बिना ) पहुंचा जा सकता है। यही मेरी सम्मति में सरल तथा शीघ्र फलदायक मार्ग है।
शिष्य - अब मुझे 'अवतारवाद' ( अर्थात किसके नाम-रूप का जप और ध्यान किया जाय?) के विषय में कुछ बताइये।
स्वामी जी - जान पड़ता है, तू एक ही दिन में  सभी कुछ मार लेना चाहता है !
शिष्य - महाराज, मन का सन्देह एक ही दिन में मिट जाय तो बार बार आपको तंग भी न करना पड़े।  स्वामी जी - वैसे  'पुरुषोत्तम' लोग जिनकी कृपा से उस आत्मा का ज्ञान,  जिस आत्मा की इतनी महिमा शास्त्रों में की जाती है- एक मुहूर्त में प्राप्त होता है; वे ही सचल तीर्थ -अवतार पुरुष है ! वे जन्म से ही ब्रह्ज्ञ हैं और ब्रह्म तथा ब्रह्मज्ञ में कुछ भी अंतर नहीं है - "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति - ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।"  (मुण्डक उपनिषद् ३।२।९) मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि आत्मा को मन (अहं) के द्वारा जाना नहीं जा सकता- क्योंकि यह आत्मा ही ज्ञाता है। इसीलिये मनुष्य का जानना उसी अवतार तक है --जो सदा आत्मसंस्थ हैं ! मानव-बुद्धि ईश्वर के संबन्ध में जो सबसे उच्च भाव ग्रहण कर सकती है, वह अवतार को जानने तक ही है। उसके बाद और जानने का प्रश्न नहीं रहता। उस प्रकार के ब्रह्मज्ञ जिनको जन्म से ही अपने ब्रह्मत्व का ज्ञान हो- कभी कभी ही इस धरती पर जन्म लेते हैं; और बहुत थोड़े से लोग ही उन्हें समझ पाते हैं। वे ही शास्त्र-वचनों के प्रमाण-स्थल हैं; भवसागर  के आलोकस्तम्भ (श्रीरामकृष्ण)  हैं ! इन अवतारों  के सत्संग तथा कृपादृष्टि से एक क्षण में ही हृदय का अंधकार दूर हो जाता है--और एकाएक ब्रह्मज्ञान का स्फुरण हो जाता है। क्यों होता है, अथवा किस उपाय से होता है, इसका निर्णय नहीं किया जा सकता, परन्तु होता अवश्य है। मैंने वैसा होते देखा है।
श्री कृष्ण ने आत्मसंस्थ होकर गीता कही थी। गीता में जिन जिन स्थानों में 'अहं' शब्द का उल्लेख है, वह 'आत्मपर' जानना। ' मामेकं शरणं व्रज ' का अर्थ है --तुम स्वयं ' आत्मसंस्थ बनो '  "Be established in the Atman" और दूसरों को भी आत्मसंस्थ बनने में सहायता करो ! " Be and Make !" यह आत्मज्ञान ही गीता का  अन्तिम लक्ष्य है !

जिन्हें यह आत्मज्ञान नहीं होता वे 'आत्मघाती' हैं । वे मिथ्या रूप-रस आदि इन्द्रिय-विषयों में आसक्त होकर स्वयं की ही फाँसी लगाकर हत्या कर देते हैं। (तुलसी वे कैसे जीयें जिन्हें जरावे पाँच?) तू भी तो मनुष्य है - दो दिनों के तुच्छ भोग की उपेक्षा नहीं कर सकता ? क्या तू भी जायस्व-म्रियस्व के दल में जायगा ? जो घोर अज्ञान में ही जन्म लेते और मरते रहते हैं ?

(वेद में एक अधमाधम 'जायस्व भ्रियस्व' गति का भी उल्लेख मिलता है जिसमें अतीव क्षुद्र प्राणी एक ही दिन में कीट - पतंग आदि के रूप में कई-कई बार उत्पन्न होता और मरता रहता है। यही कर्मानुसार जीवन की विविध गतियों का रहस्य है।)

निरन्तर विवेक-प्रयोग करते रहो-'श्रेय' को ग्रहण करो -और 'प्रेय' का त्याग कर दो। फिर सिंहनाद करते हुए इस आत्मतत्व की महिमा चाण्डाल आदि --सभी को सुना। सुनाते सुनाते तेरे हृदय की वक्रता भी सीधी हो जायेगी, तेरी बुद्धि भी निर्मल हो जायेगी। "तत्वमसि ", " सोऽहमस्मि", "सर्वं खल्विदं ब्रह्म — All this is verily Brahman" आदि महावाक्यों का सदा उच्चारण कर (जप-ध्यान) और हृदय में सिंह की तरह बल रख। 

भय क्या है ? भय ही मृत्यु है --भय ही महापातक है। नररूपी अर्जुन को भय हुआ था, इसीलिये नारायण श्री कृष्ण ने आत्मसंस्थ होकर उन्हें गीता का उपदेश दिया; फिर भी उपदेश सुनने से क्या अर्जुन भय चला गया था?  नहीं, अर्जुन जब कृष्ण के विश्वरूप (यूनिवर्सल फॉर्म) का दर्शन कर आत्मसंस्थ हुए--तभी वे ज्ञानाग्नि-दग्धकर्मा (bondages of Karma burnt) बने और उन्होंने युद्ध किया।

शिष्य - महाराज, आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाने के बाद (after realisation)  भी क्या कर्म रह ही जाते हैं ?

स्वामी जी - ज्ञान-प्राप्ति के बाद साधारण लोग जिसे कर्म कहते हैं, वैसा कर्म नहीं रहता। उस समय कर्म  'बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय' हो जाता है। आत्मज्ञानी की सभी बातें केवल जीव-कल्याण के लिये होती हैं। हमलोगों ने श्री रामकृष्ण (नवनी दा) को बहुत निकट से देखा है - "देहस्थोऽपि न देहस्थ: — In the body, but not of it!"
 [देहस्थोsपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद्यथोत्थितः। भागवत११.११.८] देह में रहते हुए भी वे देह के होकर नहीं रहते ! ऐसा भाव ! वैसे पुरुषों के कर्म के उद्देश्य के संबन्ध में केवल यही कहा जा सकता है- "लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् — (ब्रह्म-सूत्र २,१.३३) जो कुछ वे करते हैं, वे लोक में रहकर लीला करने जैसा होता है।

===========

२०.

क्या 'वेदान्त' समस्त सार्वभौम प्रजातान्त्रिक देशों का राष्ट्रीय धर्म नहीं हो सकता ?

(सर्व-समावेशी वेदान्त का प्रतिपाद्य है- 'विश्व का एकत्व', विश्वबन्धुत्व नहीं)

श्लोक-२० : अहमस्म्येव सर्वत्र नास्ति यन्न भवाम्यहम्। कथं दुःखं परेषां यत् न मे तत् दुःखकारणम् ॥

1. 'In everybody I reside.'There is nothing that I am not.

2. ' The universe is my body.' How can the woes of others not be the cause of my suffering ?'

3. ' We are bound to feel in other bodies than this one.' 

२०.१ :  सारे मन मेरे मन हैं। सबके पैरों से मैं ही चलता हूँ। सबके मुँह से मैं ही बोलता हूँ। सबके शरीर में मेरा ही निवास है ! ऐसा कुछ नहीं है जो मैं न होऊँ !

२०.२ : हम अजन्मा हैं, और अमर हैं ! और हमारा एक मात्र कर्तव्य प्रेम करना है ! ‘ यह समस्त विश्व हमारा शरीर है। तो फिर मैं दूसरों को दुःख में गिरा देखकर भी मैं स्वयं सुख में रह सकता हूँ ? 

२०. ३ :' कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं ', निज को सब में, सबको निज में जानने, समस्त मन से देखने की ही संज्ञा अमरता है। हम इस एक के शरीर के अलावा अन्य शरीरों में भी स्वयं को महसूस करने के लिए बाध्य हैं।

प्रसंग : [ २०.२ ' राजयोग पर चौथा पाठ'>२०.१,३ क्या वेदान्त भावी युग का धर्म होगा ? ९/७७ ८ अप्रैल, १९०० को सैन फ़्रान्सिस्को में दिया भाषण]

विषयवस्तु : संसार भर में प्राचीनतम धर्म-दर्शन है वेदान्त, लेकिन वह लोकप्रिय हुआ है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसलिये ' क्या वेदान्त भावी युग का धर्म होगा ?'  इस प्रश्न का उत्तर दे सकना बड़ा कठिन है। वेदान्त क्या नहीं है, इससे आरम्भ करते हुए, बाद में वेदान्त क्या है, इसका परिचय दूंगा।

वर्तमान में प्रचलित नाम वाले सभी धर्मों (=सम्प्रदायों) के तीन मुख्य स्तम्भ हैं - १. ग्रन्थ - तर्कवाद और लम्बी-चौड़ी बातों के बावजूद मानवता ग्रंथों से चिपकी हुई है। ग्रन्थ मानवीय श्रद्धा के ध्रुव केन्द्र हैं। २. अवतार या पैग़म्बर के प्रति पूज्य भाव। ३. विश्वबन्धुत्व के सम्बन्ध में इतनी बातें होते रहने पर भी अपने- उपास्य और ग्रन्थ के प्रति घोर कट्टरता; जो सम्प्रदाय अन्य सम्प्रदायों से जितनी अधिक घृणा करता है, उस सम्प्रदाय में धर्मान्तरण के द्वारा के अन्य सम्प्रदाय के अनुयायियों की संख्या बढ़ाने की होड़ उत्तरोत्तर होती रहती है। उदारवादिता (Liberalism) मानव मन में कट्टरपन (fanaticism-धर्मान्धता) को जगा नहीं पाती; औदार्यवाद (लिबरलिज्म) को बार बार पराभूत होना पड़ेगा। उसका प्रभाव भी इने-गिनों तक ही सीमित रहता है। इसका कारण भी स्पष्ट है-उदारवादिता हमें स्वार्थरहित बनाने की चेष्टा करती है! गरीब जनतंत्रवादी (democrat) होता है, धनी बनते ही वह सामन्तवादी (feudal) बन जाता है। मानव-स्वभाव की यही प्रवृत्ति धर्म-क्षेत्र में भी दिखाई पड़ती है। किसी पैग़म्बर का आविर्भाव होता है। वह अपने अनुयायियों को ज़न्नत में जाने का प्रलोभन और हर तरह के पुस्कारों की गारंटी देता है, और अनुसरण न करने वालों को चिरंतन नरक भोगने की धमकी देता है। और इस प्रकार वह अपने पंथ का प्रचार करता है। वर्तमान सारे प्रचारशील धर्म घोर कट्टरपंथी हैं।मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि विश्वबन्धुत्व के सम्बंध में (राजनीतिज्ञों की इफ़्तार पार्टी और गंगा-जमुनी तहज़ीब) इतनी बातें होते रहने पर भी प्रस्तुत स्थिति चलती ही रहेगी।

वेदान्त इन तीनों नहीं मानता। वह कहता है- नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन !" Not by the reading of books can we realise the Self." कि दुनिया का कोई ग्रन्थ यह दावा नहीं कर सकता कि ईश्वर, जीव, जगत सम्बन्धी सारे सत्य केवल उसी में हैं-अन्यत्र कहीं नहीं है। एकेश्वरवादी (Unitarian त्रिदेव-विरोधी दर्शन) आन्दोलन के उत्थान और पतन के इतिहास को लो। वह तुम्हारे राष्ट्र के सर्वोच्च चिन्तन का प्रतीक है। इतर ईसाई सम्प्रदायों की भाँति, एकेश्वरवादी-चर्च (Unitarian Church) का उतना प्रचार क्यों नहीं हो सका ? कारण स्पष्ट है - उसका अपना कोई ग्रंथ न था ! यहूदी पारसी और जैनी केवल अपने धर्मग्रंथों की बदौलत आज भी जीवित हैं ?

वेदान्त में किसी अपने ही जैसे किसी मनुष्य को उद्धारक मानकर मुक्ति के लिये गिड़गिड़ाना मनुष्य की महिमा को कम करना माना जाता है। वेदान्त प्रजातान्त्रिक ईश्वर का ही उपदेश करता है। लोकतन्त्र की यथार्थ शक्ति वहां के प्रजाओं में रहती है, हर व्यक्ति ही वह शक्ति है। जबकि द्वैतवादी लोग मानवदेह-धारी ईश्वर को देखना चाहते हैं, जिससे सभी भयभीत हों और जिसको चढ़ावा चढ़ाकर प्रसन्न रखा जाय। वे उसके सामने दीप जलाते हैं और नाक रगड़ते हैं। लोकतान्त्रिक देश में राजा प्रत्येक मनुष्य में निहित हो गया है। यहाँ तुम सब लोग राजा हो। यही वेदान्त का भी ध्येय है। वेदान्त सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक ईश्वर का निरूपण करता है।

स्वर्गस्थ ईश्वर की धारणा क्या है ? कोरा भौतिकवाद ! इसकी निरी ईश-तिरस्कारिता (ईशनिन्दा) पर विचार करो।  मनुष्य मिट्टी का पुतला है, केवल स्थूल रूप में जानने योग्य इन्द्रियगोचर विषय है,उसका प्रत्येक अंश मिट्टी है,कोरी मिट्टी। यह सुन सुन कर मनुष्य अपनी महिमा को ही भूल जाता है ! यह भी कोई धर्म है ? अफ्रीका के मम्बो-फम्बो 'धर्म' की भाँति यह भी कोई धर्म नहीं है।  No book, no person, no Personal God. शेष मनुष्य जाति से पृथक कोई मनुष्य नहीं,'तुम कीट मात्र और मैं जगदीश्वर' --ऐसा कुछ नहीं है। यदि तुम जगदीश्वर प्रभु हो तो मैं भी जगदीश्वर प्रभु हूँ। अतः वेदान्त पाप नहीं मानता। भूलें जरूर हैं, लेकिन पाप नहीं। बीते जीवन का सिंहावलोकन करो, आत्मसमीक्षा करके देखो। यदि (महामण्डल से जुड़ जाने के बाद), तुम्हारी आज की हालत पहले से अच्छी हुई है, प्रकृति या पाशविकता के विरूद्ध संघर्ष करके तुम यदि पहले से बेहतर मनुष्य बन सके हो; तो उसका श्रेय तुम्हारे परिश्रम की पराकाष्ठा के साथ साथ पिछली भूलों को भी मिलना चाहिये। तो क्या ईश्वर से डरने वाला मनुष्य ही यथार्थ में सबसे बड़ा अन्धविश्वासी नहीं है ? ईश्वर की कृपा कहो कि हम सब पागलखाने में नहीं हैं। किन्तु यदि हममें से अधिकांश पागल नहीं हो गये होते, तो हम ' ईश्वर से डरो ' जैसी धारणा का आविष्कार ही कैसे किये होते ? इसीलिये भगवान बुद्ध ने कहा था कि -'न्यूनाधिक मात्रा में सारी मानवता विक्षिप्त है।' मुझे तो प्रतीत होता है कि उनका यह कथन बिल्कुल सत्य है !

ईश्वर ने एक बार धरती पर शूकरावतार लिया। उनकी एक शूकरी भी थी। कालान्तर में उनके कई शूकर सन्ताने हुईं। अवैयक्तिक भगवान (Impersonal God) की चर्चा सुनते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया होती है कि ' मेरे व्यक्तित्व का क्या होगा ? मेरा तो व्यक्तित्व (शूकरत्व-M/F) ही लुप्त हो जायेगा। ' फिर कभी ऐसा विचार मन में उठे तो उस शूकर की दशा याद कर लेना। 

इस राष्ट्र (अमेरिका ) से तो राजराजेश्वर की विदाई चुकी है। लेकिन वेदान्त से तो स्वर्ग का साम्राज्य सहस्रों वर्ष पूर्व ही लुप्त हो गया था। फिर भी भारत गुलामी  कारण सार्वभौमिक प्रजातान्त्रिक देश नही बन सका, इसीलिये किसी लौकिक परम भट्टारक की धारणा का परित्याग नहीं कर सकता। लेकिन अमेरिका तो एक समृद्ध सार्वभौम प्रजातान्त्रिक देश है; इसी कारण वेदान्त इस राष्ट्र का धर्म हो सकता है !

अब सुनो कि वेदान्त क्या है, उसकी शिक्षा क्या है ?  ' In everybody I reside.' सबके शरीर में मेरा ही निवास है ! मैं इसका अनुभव क्यों नहीं कर पाता हूँ ? इसका कारण है वही व्यक्तित्व भाव, वही शूकरपना (that piggishness.)  कल फाँसी पर लटकाया जाने वाला हत्यारा भी ईश्वर है,पूर्ण ब्रह्म है। (इन्द्रियातीत सत्य को जाने बिना) अवश्य ही यह विषय जटिल है, पर बोधगम्य हो सकता है। इसीलिये वेदान्त का प्रतिपाद्य है,'विश्व का एकत्व', विश्वबन्धुत्व नहीं। जब तुम यह सोचते हो कि तुम अतीत को जानते हो, तो तुम केवल वर्तमान ही अतीत की कल्पना करते हो। वर्तमान में ही सब कुछ है, केवल वही 'एक' है-एकमेवाद्वितीयम्! जो कुछ है, था और होगा, सब इसी वर्तमान में है। यदि मैं इन्द्रिय-मन की सीमा पार करलूँ, तो तुम सब आत्मरूप तथा ईश्वर-रूप दिखोगे। जगत का दृस्य रूप सत्य नहीं है !!!

अमरत्व ( immortality) क्या है?" समस्याओं का समाधान 'मैं' निकालूँ -और ईश्वर उसके गौरव का भागी बने। यह ठीक नहीं। मैं कदापि ऐसा नहीं करने का। कड़ा परिश्रम करो तुम, और गुणगान करो दूसरे की! यह इसलिये कि तुम अन्धविश्वासी हो, डरपोक हो। (एक बार जब तुमने आत्मसाक्षात्कार कर लिया है !) तो अब हजारों वर्षों से पाले-पोसे अन्धविश्वास की अब कोई आवश्यकता नहीं। बादलों में बैठे किसी सगुण पुरुष के सामने गिड़गिड़ाने की क्या आवश्यकता है? (आत्मा ही ईश्वर है! इसे निरंतर याद रखने में) या आध्यात्मिक बन जाने में थोड़ा विशेष परिश्रम लगता है- 'परिश्रम की पराकाष्ठा' करनी पड़ती है।   विश्व-मन को अपने जीवन का नित्य आधार जानकर भी लोग शैतान,अँधेरा, झूठ आदि पर ही ज्यादा सोचते हैं। तुम उन्हें सही बताओ, उन्हें विश्वास नहीं होता। उन्हें अँधेरा ही ज्यादा पसन्द है।  It is this very existence of ours!"- ' वह हमारा यह जीवन ही है! आत्मा अन्धविश्वास से निर्लेप है, यह इन्द्रिय-विषयों की क्षुद्र वासनाओं से परे है! लोगों का यह प्रिय विषय सा हो गया है, कि मरने के बाद भी उनके सगे सम्बन्धी उसी पुराने सुपरिचरित शरीर में जी रहे हैं, और प्रेतात्मवादी उनके अन्धविश्वास का फायदा उठाते हैं। मुझे बड़ा दुःख होगा कि मेरे स्वर्गीय पिता अपने उसी गन्दे शरीर को अभी भी धारण किये हुए हैं।एक बैठक में तो ईसा मसीह को मेरे सामने हाजिर करवा दिया गया! मैं पूछ बैठा-" प्रभो, आप कैसे हैं ? -Lord, how do you do?" यदि वह सन्त महापुरुष अभी तक शरीरधारी ही है, तो हम बेचारे जीवधारियों क्या होगा ? मैं सोचने लगा -'"Mother, Mother! atheists-  माँ ! माँ ! इनको क्षमा करो -ये नास्तिक लोग हैं !   अन्धविश्वास भी भौतिकवाद (चार्वाक मत : materialism) का ही छद्म रूप है; क्योंकि उसका अस्तित्व ही देहाध्यास अर्थात इस भावना पर टिका हुआ है कि मैं शरीर, शरीर और केवल शरीर मात्र हूँ (consciousness of body) ! वेदान्त का लक्ष्य 'देह-भाव-त्याग' नहीं, 'देह-भाव-अतिक्रमण' है।

वेदान्त का ईश्वर क्या है ? वेदान्त का ईश्वर तो अनन्त है, निर्विशेष सत्ता है --सच्चिदानन्द है, निर्विकार है, अमर है,अभय है, और तुम सब उसके अवतार हो, उसके मूर्त रूप हो! वेदान्त का ईश्वर वह है, जिसका स्वर्ग सर्वत्र ही है। मुझसे प्रायः पूछा गया है, ' मैं इतना अधिक हँसता और व्यंग-विनोद क्यों करता हूँ ?' क्योंकि मेरा स्वरुप ईश्वर है, और ईश्वर केवल आनन्दपूर्ण है। तुम मेरी राय मानो तो किसी भी गिरजाघर में कदम न रखो। बाहर निकलो, और जाकर अपने को प्रक्षालित कर डालो। जब तक कि युग युग से चिपके-जमे तुम्हारे अन्धविश्वास बह न जायें, तब तक  बारम्बार प्रक्षालित करते रहो। तुम-हम, चूहे-बिल्ली, भूत-प्रेत आदि सभी उसके रूप हैं, सभी सगुण (Personal Gods) ईश्वर हैं।

तुम्हारी प्रार्थना का ध्येय क्या है ? तुम तो यह कल्पना करते कि एक ईश्वर है, जिसके तुम विशेष कृपा-प्राप्त हो, जो तुम्हारी मनौतियाँ पूरी करता है; और तुम उससे समस्त मानव, सभी प्राणियों पर कृपा करने का अनुरोध नहीं करते, बल्कि निज के लिये, निज परिवार के लिये, अपनी बिरादरी भर के लिये उसके अनुग्रह का आग्रह करते हो। यदि कहीं कोई हरिजन, आदिवासी या मुसलमान, या ईसाई भूखा है, तो तुम्हें उसकी कोई चिन्ता नहीं होती। उस समय तुम यह विचार नहीं करते कि हिन्दुओं का राम ही मुसलमानों अल्ला है, और ईसाईयों का गॉड है। प्रभो ! मुझे भोजन खूब मिले, दूसरा भले ही भूखा रहे।" सारे काम हमें स्वयं करने होंगे, और कभी भी किसीने यह सब हमारे लिये नहीं किया। यही स्पष्ट सत्य है। पर तुम शायद ही कभी इन बातों का विचार करते हो।

हमें विचारशील अवश्य बनना चाहिये। किसी भी योनि में जन्म दुःखदायी है। हमें भौतिकता से ऊपर उठना ही होगा ! ' My Mother (?) would not let us get out of Her clutches; nevertheless we must try. (Try का अर्थ है उद्द्योग करना : स्वयं को केवल शरीर नहीं समझना होगा '3H' का विवेक निरंतर जाग्रत रखकर,पशु भाव से ऊपर उठना होगा। अर्थात '3H' को विकसित करने के लिये जितना -आहार, निद्रा, भय और वंशविस्तार करने की इच्छा अनिवार्य हो, उतने से ही संतुष्ट रहना होगा। मेरे ह्रदय में ही ईश्वर का आवास है, यह विवेक जाग्रत रखते हुए त्याग पूर्वक भोग करना सीखना होगा। हमें निरंतर देहात्मबोध से उपर रहना होगा।

' मेरी ' माँ ' हमें अपनी वज्र-मुष्टिका से मुक्त होने नहीं देना चाहेंगी; फिर भी हमें प्रयत्न करना होगा। (पाशविक) प्रकृति के विरुद्ध यह संघर्ष ही उपासना है, अन्य सब कुछ भ्रम मात्र है।  पशु प्रकृति (आहार,निद्रा,भय, मैथुन) के विरुद्ध संघर्ष नहीं कर सकता; तुम एक सगुण ईश्वर हो; और इस समय मैं अपने प्रवचनों के द्वारा तुम्हारी उपासना कर रहा हूँ। यही महत्तम प्रार्थना है। इसी जीव-शिववाद के अर्थ में सम्पूर्ण विश्व की उपासना करो-उसकी सेवा करते हुए। मेरा ऊँचे मंच पर खड़ा होना (व्यासपीठ पर बैठना), मैं जानता हूँ, उपासना जैसा नहीं प्रतीत होता है। किन्तु यदि इसमें (अन्य कोई स्वार्थ नहीं केवल) सेवा-भाव है, तो यही उपासना है।

वह जो विश्व का प्रभु है, जन जन में है। मन्दिर केवल एक है, वह है देह-मन्दिर। यही अकेला सनातन देव-मन्दिर है। इसी देह में उसका, परमात्मा का, राजराजेश्वर (the King of kings) का निवास है। किन्तु हम उसे (अस्ति-भाति-प्रिय) को नहीं देख पाते (केवल नाम-रूप ही दीखता है), इसीलिये हम उसकी पाषाण प्रतिमायें बनाते हैं, उनपर ऊँचे मन्दिर खड़े करते हैं। भारत में सदा से वेदान्त रहा है, लेकिन भारत ऐसे मंदिरों से भरा पड़ा है। केवल मन्दिर ही नहीं, किन्तु मूर्तियों से भरी अजन्ता-एलोरा की गुफाएँ भी हैं। इसी को कहते हैं -" गंगा किनारे रहने वाला मूर्ख व्यक्ति नहाने के लिये कुआँ खोदते हैं"। 'सगुण-ईश्वर रूप में सबकी उपासना करो--सारे आकार उसके मन्दिर हैं।' बाकी सब कुछ भ्रम है। सत्य (ईश्वर) को खोजने के लिये हमेशा भीतर की ओर देखो, बाहर की ओर कदापि नहीं। वेदान्त-प्रतिपादित ईश्वर यही है और उसकी उपासना भी यही है!

किसी नये ज्ञान का सृजन नहीं होता:

[ यहाँ तो एक  धर्म मानने वालों के भीतर सैकड़ों जातियाँ हैं ! यदि कोई किसी की थाली छू दे, तो वह चिल्ला उठता है -' परमात्मा मुझे उबार लो, मैं जाति-च्यूत गया !' (मुझे अमुक जाति में जन्मे शरीर से स्पर्श हो गया, मैं तो भ्रष्ट हो गया, अब मुझे फिर से गंगाजी में नहाना होगा) पहली विदेश-यात्रा से लौटकर जब मैं (स्वामी विवेकानन्द) भारत गया (१८९७ ई० में), तो अनेक सनातनी हिन्दुओं ने पाश्चात्यों के साथ मेरे सम्पर्क और कट्टरता के नियमों के भंग करने को, हिन्दू-सम्प्रदाय विरोधी ठहरा कर खूब हो-हल्ला मचाया। पाश्चात्य लोगों (भिन्न मतावलम्बी ईसाई, मुसलमान लोगों) को मेरा वैदिक-सत्य की शिक्षा देना उन्हें बहुत नागवार या अप्रिय लगा। लेकिन इतने भेद और अन्तर रहेंगे कैसे ? जब हम सभी, हिन्दू- मुसलमान- ईसाई आत्मस्वरूप हैं, समान हैं! अब पूर्णतया आज़ाद भारत में अमीर गरीब को, पण्डित अज्ञानी को, (ब्राह्मण शूद्र को, मुसलमान हिन्दू को, हिन्दू ईसाई को, सिख मोना को) देखकर नाक-भौं कैसे सिकोड़ पायेगा? यदि समाज की रुपरेखा न बदले, तो वेदान्त-धर्म के सदृश धर्म प्रभावशाली कैसे हो ? सम्पूर्ण विश्व में विवेकी यथार्थ विचारशील मानवों की संख्या विपुल होने में हजारों साल लगेंगे। मानव को नयी बातें सुझाना, उन्हें उच्च विचार प्रदान करना बड़ा ही श्रमसाध्य है। रूढ़िगत-विश्वासों का उन्मूलन तो और भी दुष्कर है -बहुत ही दुष्कर। ये शीघ्र विनष्ट नहीं होते, पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी अँधेरे में काँप उठता है, बचपन में सुनी कहानियाँ याद हो आती हैं, और वे प्रेत देखने लगते हैं।

शिष्य bk  : जिस देश में हजारों वर्ष पहले वेदान्त का जन्म हुआ, वहाँ इतना कट्टर जाति-वाद कैसे आ गया ?

S.V : १००० वर्षों की गुलामी और कुछ स्वार्थी राजाओं के कारण। सनातन धर्म की वर्ण व्यवस्था में मनुष्य के जन्मजात चार प्रकार के गुणों के कारण मानव-जाति चार वर्ण -ब्राह्मण,क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र में विभक्त किया गया था। इसके पीछे हमारे आचार्यों का उद्देश्य घृणा फैलाना नहीं था, बल्कि मनुष्य निर्माण की शिक्षा -पाशविक प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष करके ब्रह्म को जानकर ब्राह्मण बनना, अर्थात स्वयं मनुष्य (ब्राह्मण-ब्रह्मवेत्ता मनुष्य) बनना और दूसरों को भी (ब्रह्मवेत्ता मनुष्य या ब्राह्मण) मनुष्य बनने में सहायता करना था। किन्तु दुर्भाग्य वश भारत इसी बीच गुलाम बन गया। और हमारा जातीय-प्रासाद, अर्थात वेदान्त की बुनियाद पर मनुष्य-निर्माण की पद्धति, या चरित्र-निर्माण की पद्धति द्वारा राष्ट्र-निर्माण का सपना अधूरा ही रह गया। इसी कार्य को पूरा करने के लिये श्रीरामकृष्ण अपने लीला-पार्षदों के साथ अवतरित होना पड़ा। और आज वही शक्ति महामण्डल के रूप में आविर्भूत होकर सम्पूर्ण भारत में क्रियाशील हो रही है। इसीलिये भारत गुलामी के बाद भी अपने वेदान्ती विरासत को नहीं भूला क्योंकि ठीक समय पर - मैकाले की शिक्षा-पद्धति आने के साथ ही साथ ठाकुर आविर्भूत हो गये ! और आजाद भारत में अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल आविर्भूत हो गया। बहरागोड़ा, राँची, जमशेदपुर, तिलैया, जनिबिगहा, फुलवरिया, बरही, हजारीबाग, छपरा, जैसे नये नये स्थानों में इसकी शाखायें निरंतर खुलती ही जा रही हैं ! किन्तु अब २०१४ में ' काँग्रेस-मुक्त और पूर्णतः आज़ाद भारत' में भी धर्म-जाति के नाम पर इतने भेद और अंतर कैसे बने रह सकते हैं ? अर्थात शीघ्र ही समाप्त हो जायेंगे। वास्तव में वेदान्ती धर्म का अर्थ है असाम्प्रदायिक धर्म, किन्तु काँग्रेस और मुल्ला मुलायम, लालू, नीतीश, ममता जैसे लोग हिन्दू (वेदान्ती) को भी साम्प्रदायिक कहकर यूपी-बंगाल में धर्म-परिवर्तन, और दंगा करवाते रहते हैं, इसलिये सबसे पहले साम्प्रदायिक-दंगा विरोधी बिल लाकर एक सच्चा वेदान्ती धर्म-निरपेक्ष प्रजातान्त्रिक संविधान (नेपाल+ भारत १२५ करोड़+ ३ करोड़ =१२८ करोड़) में लागु करना ही होगा। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को केवल अनावृत किया था, ईश्वरीय शक्ति के रूप में वह गुरुत्वाकर्षण धरती में पहले से विद्द्य्मान था। क्योंकि जिसको हम वैज्ञानिक आविष्कार कह रहे हैं, वह भी एक प्रकार का अन्धविश्वास ही है। गुरुत्वाकर्षण के नियम को तोड़कर चन्द्रमा पर पहुँचा जा सकता है। किन्तु ऋषियों द्वारा आविष्कृत वेदान्तिक नियमों (महावाक्यों) को तोड़ने का सामर्थ्य किसी में नहीं है। भौतिक जगत के ज्ञान को अनावृत करने वाले आविष्कारक को वैज्ञानिक कहते हैं, किन्तु -'न्यूटनप्रसाद त्रिपाठी ' के आगे शीश झुकाने की हम कोई चिन्ता नहीं करते। क्योंकि जिसको हम वैज्ञानिक आविष्कार कह रहे हैं, वह भी एक प्रकार का अन्धविश्वास ही है। यह बिल्कुल ही वेदान्त नहीं। यह कोरा भौतिकवाद या जड़-जगत पर लागु होने वाला नियम है-'जायस्व म्रियस्व' किन्तु मनुष्य तो जड़ शरीर मात्र नहीं है-वह जन्म-मरण के नियम को तोड़ कर अमर या बंधन मुक्त हो सकता है ! इस आध्यात्मिक ज्ञान  अविष्कारक को, प्रकार के अन्य आध्यात्मिक जगत के ज्ञान- ' वेदान्त' (महावाक्यों) को अनावृत करने वाले आविष्कारक को ऋषि कहते हैं, पशुपतिनाथ के १०८ वेदपाठी इसी ऋषि मन की सहायता से इस बार नेपाल को इस बार नेपाल का सर्वसमासी वेदान्ती धर्म-निरपेक्ष प्रजातान्त्रिक संविधान तैयार करना ही होगा। तभी विश्व बचेगा, इसीलिये मोदीजी ने कहा कि सम्पूर्ण विश्व की नजरें नेपाल पर टिकी हुई हैं। (८ अगस्त २०१४,८am  - क्या स्वामीजी आज भी कार्य नहीं कर रहे हैं ?) ]

ज्ञान का अन्वेषण मात्र होता है। आवृत का अनावरण मात्र होता है :  वेदान्त शब्द 'वेद' से बना है और 'वेद' का अर्थ है -ज्ञान। वेद संस्कृत भाषा के महान ग्रन्थ हैं। हम अपने देश में वेदपाठी (पशुपतिनाथ में भी १०८ वेदपाठी) के सामने नतमस्तक होते हैं,लेकिन किसी भौतिक शास्त्र के विशेषज्ञ -'न्यूटन-चतुर्वेदी ' के आगे शीश झुकाने की हम कोई चिन्ता नहीं करते। क्या तुमने कभी ज्ञान का सृजन होते देखा है? ज्ञान सदा यहीं है, क्योंकि वह स्वयं ईश्वर है। इसलिये ज्ञान का अन्वेषण मात्र होता है। तुम या कोई मनुष्य अज्ञानी नहीं है, भले ही ऐसा दिखाई पड़े। तुममें से प्रत्येक ईश्वरावतार है। तुम सर्वशक्तिमान, सर्वान्तर्यामी, दिव्यस्वरूप के अवतार हो। हो सकता है, मेरी बातों पर तुम्हें हँसी आये, किन्तु वह समय दूर नहीं, जब तुम इसे समझ सकोगे। तुम्हें समझना पड़ेगा। कोई पीछे नहीं रहने पायेगा।

इस वेदान्त का लक्ष्य क्या है ? एकत्व की अनुभूति-अपनापन, ही ज्ञान है। और परायापन या विभेद देखना ही अज्ञान है। इस ज्ञान पर तुम सबका जन्मसिद्ध अधिकार है। चाहें या न चाहें, हम सभी मुक्ति के अधिकारी हैं। हम सभी अन्त में बन्धन-मुक्त होकर रहेंगे, क्योंकि मुक्त होना तुम्हारा स्वभाव है। जिस वेदान्त की चर्चा मैंने अभी की है, वह कोई नया धर्म नहीं। बाह्य प्रकृति का कण कण इसी लक्ष्य की ओर, अन्तर्निहित दिव्यता को अविष्कृत करने की ओर धावित हो रहा है। तुम क्या सोचते हो कि परिशुद्ध अनंत आत्मायें इस परम सत्य के दर्शन से वंचित हैं? नहीं, वह सर्वसुलभ है, क्रमशः सभी इसी लक्ष्य पर पहुँच हैं --अन्तर्निहित दिव्यता (अमरत्व या मुक्ति) की ओर ! सनकी, हत्यारा, रूढ़िवादी, या जिनको इस देश में भीड़ द्वारा संगसार कर दिये जाता है; सभी इसी लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। हम तो मुक्त हैं ही, केवल हम यह जानते भर नहीं और हमें पता नहीं कि हम क्या करते रहे हैं। संसार के सभी धर्म एक ही ध्येय, एक ही नैतिक मानदण्ड का प्रचार कर रहे हैं -" सबके प्रति स्वार्थरहित बनो, दूसरों से पेम करो (Be unselfish, love others.)"।

साम्प्रदायिक झगड़ों का कारण क्या है ? किन्तु सभी सम्प्रदाय अपने अपने पैग़म्बरों या अवतारों द्वारा बताये ईश्वर के नाम को लेकर झगड़ा करते हैं। कोई कहता है, 'यह जेहोवा का आदेश है।' दूसरे चिल्लाये, "मसीहा का है!" कोई कहता है, 'यह आदेश अल्ला ने केवल उसके ही ग्रन्थ में दिया है।' अगर यह जेहोवा का आदेश होता, तो जेहोवा से अपरिचित सम्प्रदाय वालों को यह उपदेश कैसे प्राप्त हुआ? यदि यह केवल ईसा मसीह का सन्देश है, तो उन्हें न जानने वालों को वह कैसे प्राप्त हुआ ? अगर केवल विष्णु ही ऐसा कर सके तो उनको न जानने वाले एक यहूदी का यह जीवन-ध्येय कैसे बन गया ? एक अन्य प्रेरणा-स्रोत है, जो इन सब से महत्तर है ! वह प्रेरणा-स्रोत कहाँ है ? वह स्रोत मानवदेह-रूपी इसी सनातन मन्दिर में है, क्षुद्र से लेकर महान तक की आत्मा में है! अनन्त निःस्वार्थता, असीम त्याग, अनन्त के साथ एकात्मबोध प्राप्त करने की असीम व्याकुलता- मानवमात्र के ह्रदय में ही छिपी हुई है!

What is human love?: मानवीय प्रेम क्या है ? (इश्क इंसान को हिन्दू-मुसलमान नहीं इंसान बना देता है-ताजमहल इसी बात का प्रतीक है) समग्र अस्तित्व का एकत्व ('The unity of all existence' सह-अस्तित्व की भावना) तुममें पहले से ही विद्यमान है। ससुराल-नैहर के लोगों के प्रति विशेष-प्रेम दर्शाकर तुम केवल अनजाने इस अभिन्नता का अनुमोदन कर रही  हो। ' कभी किसी ने पति से पति के नाते नहीं, अपितु पति में निवसित आत्मा के हेतु प्रेम दर्शाया है।'

वास्तव में धर्म क्या है ? वेदान्त - जो स्वयं के शाश्वत चैतन्य होने का ज्ञान है, जिसे केवल अपने अनुभव से जाना जाता है, कि सभी आत्मा एक है, चारों ओर फ़ैल जाय तो सारी मानवता आध्यात्मिक हो जायेगी। परन्तु क्या यह सम्भव है ? मैं नहीं जानता; हजारों वर्षों से ऐसा सम्भव नहीं हुआ है। फिर भी पुरानी रूढ़ियों और अन्धविश्वास को एक न एक दिन विदा लेना ही होगा। तुम सभी आज भी अपने पुराने अन्धविश्वासों को अभी भी चिरस्थायी बनाने की फ़िराक में लगे रहते हो।

वोट बैंक की राजनीती ही वेदान्त को अन्तरराष्ट्रीय धर्म बनने में बाधक है: विश्व भर में धर्मक्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तियों में अधिकांश वास्तव में राजनीतिक कार्यकर्ता ही रहे हैं। यही मानव इतिहास रहा है। इनमें से शायद ही किसी ने समझौता न करने वाले ढंग से, केवल सत्य की कसौटी पर खरा उतरने की चेष्टा किया हो। इन लोगों ने हमेशा से कबीलाई अन्धविश्वास (कुर्मी-यादव-मुस्लिम-गठबंधन) या जनसमूह (वोटबैंक) नामक ईश्वर की उपासना की है। उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों या समाज में प्रचलित दुर्बलताओं को दूर हटाने का प्रयास न कर, अधिकतर उनका समर्थन ही किया है।(जबरन, डराकर या लालच देकर मुल्ला मुलायम के राज्य में अभी भी धर्म-परिवर्तन चल रहा है ? काँग्रेसियों को स्वार्थवश यह दिखाई नहीं देता।)

श्रीरामकृष्ण का चपरास इसी वेदान्त-प्रचार के लिये मिलता है: मैं यहाँ वेदान्त मत की शिक्षा दे रहा हूँ, किन्तु तुममें से कितने हैं, जो विवेक-विचार पूर्वक इसे समझने या स्वीकार करने को तैयार होंगे ? किन्तु वेदान्त के महावाक्य ही पूर्णतया केवल सत्य पर आधारित हैं, और (मुझे प्राचीन ऋषियों या पैग़म्बरों द्वारा आविष्कृत इन सार्वभैमिक सत्यों की व्याख्या करने का कार्यभार, जगतगुरु श्रीरामकृष्ण के द्वारा मुझे सौंपा गया है।) और मुझे तुम्हारे लिये इसका प्रतिपादन करना ही होगा।

वेदान्ती शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रम: द्वैत के सम्पूर्ण रूढ़ि-विश्वासों से दूर आत्मनिर्भर बनने के लिये भारत में मैं दोनों मार्गों से कार्य करता हूँ।

कोलकाता में: (ऑर्डिनरी कैम्पर्स) द्वैतवाद धर्म का किंडरगार्टन : ईश्वर के सभी रूपों की आराधना करने के लिये, काली-मन्दिर, शिव-मन्दिर, राम-मन्दिर, कृष्ण-मन्दिर या बेलुड़ में श्रीरामकृष्ण-मन्दिर के साथ ही साथ वेद, बाइबिल, कुरान, ईसा, बुद्ध, मोहम्मद की शिक्षाओं पर आधारित अनेकों उपासना-गृह मिल जायेंगे। इन्हें चलने दो, मन्दिर-प्रतिमा आदि तोड़ने की आवश्यकता नहीं है। कभी कभी मैं यह स्वीकार करता हूँ कि द्वैत-मार्ग में भी कुछ अच्छाई अवश्य है, जो दुर्बल हैं- उनकी यह सहायता करता है। यदि कोई तुमसे ध्रुव तारे (polar star) को दिखा देने का अनुरोध करे, तो पहले तुम उसे उसके निकटवर्ती उज्ज्वल नक्षत्र, बाद में क्षीण प्रकाश का नक्षत्र, तत्पश्चात और अधिक धुँधला नक्षत्र और सबसे अन्त में ध्रुव-नक्षत्र दिखाओ। इस प्रकार क्रमशः अधिक उज्ज्वल नक्षत्रों को दिखलाने की पद्धति से उसके लिये ध्रुव-तारा को देखने-समझने में आसानी होगी। समस्त साधनायें (मनःसंयोग का अभ्यास -शारीरिक व्यायाम- बौद्धिक प्रशिक्षण आदि), दीक्षा-विधियाँ, धर्मग्रन्थ, ईश्वर का मूर्त रूप आदि धर्म के आरम्भिक रूप हैं, धर्म की शिशुशालायें (किंडरगार्टन) मात्र हैं। इस क्रमिक प्रशिक्षण-प्रणाली (gradual training process) : तदुपरान्त मैं इस प्रशिक्षण के दूसरे पहलु का भी विचार करता हूँ। यदि संसार इस धीमी चाल, क्रमिक प्रशिक्षण-प्रणाली का अनुसरण करता है, तो सत्य-साक्षात्कार में उसे कितनी लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ? कितनी देर हो जाएगी ?

क्या द्वैत-मार्ग असत्य पर आधारित नहीं है? आखिरकार क्रम से हो,या क्रमरहित, दुर्बल मनुष्य के लिये सरल हो या जटिल - क्या सारे प्रचलित धार्मिक अनुष्ठान ज्यादातर कमजोरी बढ़ाने वाले, इसीलिये दोषपूर्ण नहीं हैं? ये गलत सिद्धान्त मानवों की भ्रामक धारणा पर आधारित हैं। दो गलतियों से कभी एक सत्य का निर्माण होता है? मिथ्या नाम-रूप कभी सत्य सिद्ध किया जा सकता है? अँधेरा कभी उजाला होगा ?

विशिष्टाद्वैत : मैं एक दिवंगत व्यक्ति (T-मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) का सेवक हूँ ! उनका मैं एक सन्देश वाहक मात्र हूँ। मैं प्रयोग करना चाहता हूँ। वेदान्त-शिक्षा, जिसे मैंने अभी अभी तुमको दिया है; उस पर कोई ठोस प्रयोग पहले कभी नहीं हुआ है। यद्द्पि वेदान्त विश्व का प्राचीनतम दर्शन है, फिर भी कुछ स्वार्थी तत्वों ने अन्धविश्वास आदि समस्त विकारों को इसमें मिला दिया है।

मायावती में : (लीडर्स ट्रेनीज): मेरे जीवन का ध्येय सत्यार्थीओं या सत्यसाधकों (seekers of truth) का प्रशिक्षण, शैशव-किशोरा वस्था से ही निर्भीक, अन्धविश्वास रहित मनुष्यों (नरश्रेष्ठों) का निर्माण करना रहा है। वे वहाँ ईसा, बुद्ध, शिव एवं विष्णु, आदि नामों को सुनने नहीं पायेंगे।-इनमें से किसी का भी नहीं। आरम्भ से ही उन्हें आत्मनिर्भर (चरित्रवान मनुष्य They shall learn, from the start, to stand upon their own feet. ) बनने की शिक्षा दी जायेगी। शैशव अवस्था से ही वे सीखेंगे कि ' ईश्वर आत्मा है, आत्मा और सत्य के द्वारा ही उसकी आराधना होनी चाहिये।'सबको आत्मा के रूप में देखना होगा। यही आदर्श है। इसकी सफलता का मुझे कोई अनुमान नहीं। आज मैं अपने प्रिय विषय का प्रचार कर रहा हूँ। यदि द्वैत के सम्पूर्ण रूढ़ि-विश्वासों से दूर ऐसे ही आदर्श के अनुरूप मेरा भी लालन-पालन हुआ होता, तो कितना भला होता !

क्या ईसा-मूसा-बुद्ध मानवों के मुक्तिदाता- वे ईश्वर और हम कीड़े हैं ?  ईसामसीह ने कहा था- "मैं और मेरे पिता एक हैं" और तुम इसे दुहराते रहते हो, फिर भी साधारण ईसाई इसका क्या अर्थ समझता है? यह महावाक्य उनके लिये कैसे सहायक सिद्ध हो सकता है? लगभग बीस सदियों तक मानव-जाति इस महावाक्य के मर्म को न समझ सकी। ईसा मानवों के मुक्तिदाता (saviour) ठहराये गये। वे ईश्वर हम कीड़े हैं ! यही हाल भारत में भी है। हर देश में यही धारणा प्रत्येक सम्प्रदाय-विशेष की रीढ़ है। सैंकड़ों, हजारों वर्षों से दुनिया में लाखों-करोड़ों की संख्या में जगदीश्वर (Lord of the world), अवतारी पुरुष, उद्धारक, पैग़म्बर आदि की आराधना व्यक्ति को प्रेरित करती आई है। लोगों को यही सिखाया गया है कि साधारण गृहस्थ लोग असहाय हैं, दुःखी जीव हैं और मुक्ति के लिये किसी व्यक्ति-विशेष या व्यक्ति समूह पर ही उनको आश्रित रहना है। इन विश्वास -भावनाओं में अद्भुत तत्व अवश्य हैं। किन्तु वे अपनी चरम अवस्था में भी धर्म की शिशुशालायें मात्र हैं। और उनसे किसी को कोई खास सहायता नहीं मिली। मानव (सिंह-शावक) एक प्रकार के सम्मोहन के द्वारा स्वयं को नश्वर शरीर (भेंड़) मात्र समझने लगा है।

हाँ, इस दशा में भी कुछ ऐसे स्थितप्रज्ञ (सिंह-गुरु) लोग हैं, जो इस मोह-जाल को काट फेंकते हैं। मेरा विश्वास है कि विश्व की गली गली में लाखों-करोड़ों ऋषियों या पैग़म्बरों के आविर्भाव का अनुकूल समय  आएगा; और उनके अथक प्रयास से धर्म की ये शिशुशालाएँ विनष्ट हो जाएँगी और यथार्थ धर्म --' आत्मा से आत्मा की आराधना' अधिक सजीव और शक्तिशाली हो सकेगा।

सिंह-गुरु बनने और बनाने का पाठ्यक्रम:  ' राजयोग पर चौथा पाठ' ४/९०

मन को वश में करने की शक्ति प्राप्त करने के पूर्व हमें उसका भली प्रकार से अध्यन और विश्लेषण करना चाहिये। इच्छाशक्ति द्वारा मन को विषयों (आहार-निद्रा-भय-मैथुन) में जाने से रोककर, प्रबल इच्छाशक्ति से उसकी क्रियाओं को रोक कर, मन को वश में करके-नित्य सुबह शाम हृदयस्थ ईश्वर की महिमा का चिन्तन करना चाहिये।
 मन को स्थिर करने का सबसे सरल उपाय है, चुपचाप बैठ जाना और उसे देखते रहना। और उसे  कुछ क्षण के लिये वह जहाँ जाय, उसे जाने देना। दृढ़तापूर्वक इस भाव का चिन्तन करो,"I am the witness watching my mind drifting.’- “ मैं मन नहीं हूँ; मैं मन को विचरण करते हुए देखने वाला साक्षी हूँ !“ Then see it think as if it were a thing entirely apart from yourself. इसके बाद, ऐसी कल्पना करो मानो मन सोच रहा हो कि वह तो, तुमसे (द्रष्टा या साक्षी) से बिल्कुल ही भिन्न है। अपने को ईश्वर (सच्चिदानन्द) से अभिन्न मानो, मन अथवा जड़ पदार्थ के साथ एक करके कदापि न सोचो।

प्रत्येक ध्वनि का अपना अर्थ होता है। हमारी प्रकृति में ध्वनि ' ॐ ' और उसका अर्थ (T)- इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध है। हमारा उच्चतम आदर्श ईश्वर है। उसका चिन्तन करो। यही नहीं कि हम ज्ञाता को जान सकते हैं, अपितु हम तो वही हैं। अशुभ को देखना तो उसकी सृष्टि ही करना है। जो कुछ हम हैं, वही हम बाहर भी देखते हैं, क्योंकि यह जगत हमारा दर्पण है। यह छोटा सा शरीर हमारे द्वारा रचा हुआ एक छोटा सा दर्पण है, बल्कि समस्त विश्व हमारा शरीर है। इस बात का हमें सतत चिन्तन करना चाहिये, तब हमें ज्ञान होगा कि न तो हम मर सकते हैं और न दूसरों को मार सकते हैं, क्योंकि प्रत्येक शरीर मेरा ही स्वरुप तो है ! हम अजन्मा हैं, और अमर हैं और प्रेम ही हमारा कर्तव्य है ! 

मन विचार की विस्तृत परिधि में घूमता है और ये परिधियाँ विस्तृत होकर निरन्तर बढ़ने वाले वृत्तों में फैलती रहती हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी सरोवर में ढेला फेंकने होता है। हमारा उद्देश्य इस क्रिया को उलट देना है, बहिर्मुखी या केंद्रापसारी वृत्तों को केन्द्राभिमुखी वृत्तों में परिणत करना है। बड़े वृत्तों से प्रारम्भ करके उन्हें छोटा बनाते चले जाते हैं--यहाँ तक कि अन्त में हम मन को एक बिन्दु पर स्थिर करके उसे वहीँ रोक सकें।

इतनी सफलता प्राप्त करने के बाद मन तुम्हारा दास हो जायेगा, और उसके उपर इच्छानुसार शासन कर सकोगे। “The first stage of being a Yogi is to go beyond the senses. “ इन्द्रियों से परे हो जाना योगि की प्रथम अवस्था है। जब वह मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब सर्वोच्च स्थिति प्राप्त कर लेता है।

चूँकि विचार एक प्रकार के चित्र हैं, अतः हमें उनकी रचना नहीं करनी चाहिये। हमें अपने मन से सारे विचार दूर हटाकर रिक्त कर देना चाहिये। जितनी शीघ्रता से विचार आयें, उतनी ही तेजी से उन्हें दूर भगाना जरुरी है, नहीं तो पुराने संस्कार पशुभाव में ले जायेंगे। इसे कार्यरूप में परिणत करने के लिये हमें जड़-तत्व और देह के परे जाना परमावश्यक है। वस्तुतः मनुष्य का समस्त जीवन ही इसको सिद्ध करने का प्रयास है। यदि कल्पना का सदुपयोग करें, तो वह हमारी परम हितैषिणी है। यह युक्ति के परे जा सकती और वही एक ऐसी ज्योति है, जो हमें सर्वत्र ले जा सकती है। अंतःस्फुरण प्रदान करनेवाली शक्ति हमारे भीतर है। हमें स्वयं अपनी उच्च मनःशक्तियों से प्रेरित होना  होगा। --'तो फिर मैं दूसरों को दुःख में गिरा देखकर भी मैं स्वयं सुख में रह सकता हूँ ? दूसरों की मुसीबतें मेरे दुख का कारण क्यों नहीं हो सकतीं ?

3. ' We are bound to feel in other bodies than this one.'
 अमरता मर कर स्वर्ग जाने से नहीं मिलती, बल्कि अपने मिथ्या व्यक्तित्व, केवल इसी एक क्षुद्र (देह-मन) में स्वयं आबद्ध कर लेने वाली शूकर-प्रवृत्ति (piggish individuality) को त्याग देने से प्राप्त होती है। ' कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं ', निज को सब में, सबको निज में जानने, समस्त मन से देखने की ही संज्ञा अमरता है। हम इस एक के शरीर के अलावा अन्य शरीरों में भी स्वयं को महसूस करने के लिए बाध्य हैं।

==========

२१.

' गुरुपरम्परा या नेतृत्व-परम्परा'-- ही वेदान्त का आधार है !

श्लोक २१: परेषां वै हितार्थाय स्वदेहस्य वरं क्षयः। जाड्यालस्यप्रसुप्तानां जीवितं यन्न तादृश॥   

1.' The good live for others alone.

  The wise man should sacrifice himself for others.'

2. 'When death is so certain, it is better to die for a good cause.'

3. What use living a hundred years for those slumbering in inertia and laziness ? 

१. 'सत्पुरुषों का जीवन (जो उसे दुबारा मिला है) परोपकार के लिए ही होता है।' 'स्थितप्रज्ञ मनुष्य को दूसरों के कल्याण के निमित्त अपना जीवन न्योछावर कर देना चाहिये।'

२. " मृत्यु जब अवश्यम्भावी है, तब सत्कार्य के लिये प्राणत्याग करना ही श्रेय है !   

३. " जो लोग जड़ता और आलस्य में ऊँघते हुए १०० वर्षों का निष्क्रिय जीवन बिता देते हैं, उस जीवन की उपयोगिता क्या है ?"

प्रसंग : [स्वामी ब्रह्मानन्द को १८९५ में लिखित पत्र  ४/३०५> स्वामी विवेकानन्द द्वारा १८९४ में अपने गुरुभाइयों को लिखित पत्र]

विषयवस्तु : विवेक-अंजन त्रैमासिक पत्रिका के विषय में क्या हुआ ? मैंने सुना था कि सही समय पर प्रकाशित नहीं हो रही है, इसको चलाने में तुमलोग इतना घबड़ा क्यों रहे हो? आगे बढ़ो ! अपनी बहादुरी तो दिखाओ। प्रिय भाई, मुक्ति नहीं मिली, तो न सही, दो-चार बार नरक ही जाना पड़े, तो हानि ही क्या है ? मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः - मुझसे नहीं होगा-मुझसे नहीं होगा, यह कैसी बच्चों की सी बकवास ? राम राम ! `नहीं है', 'नहीं है' कहने से साँप का जहर भी उत्तर जाता है। क्या यह सत्य नहीं है ? ' मैं कुछ नहीं जानता', ' मैं कुछ भी नहीं हूँ '--ये किस प्रकार के वैराग्य और विनय हैं भाई ? मैं कहता हूँ, यह तो छद्म-वैराग्य (pseudo-renunciation) एवं बनावटी विनम्रता (mock modesty) है।  हम सब कुछ कर सकते हैं और करेंगे; जिनका सौभाग्य है, वे गर्जना करते हुए हमारे साथ निकल आयेंगे और जो भाग्यहीन हैं, वे बिल्ली की तरह एक कोने बैठकर म्याऊँ म्याऊँ करते रहेंगे। केवल वेद-वेदान्त की लम्बी-चौड़ी बातें करने से कुछ होने-जाने वाला नहीं है। जिसके मन में अदम्य साहस तथा हृदय में प्यार है, वही मेरा साथी बने--मुझे और किसी की आवश्यकता नहीं है। जगन्माता की कृपा से मैं अकेला ही एक लाख के बराबर हूँ तथा स्वयं ही बीस लाख बन जाऊँगा। अब एक कार्य समाप्त होने से मैं निश्चिन्त हो जाता। भाई राखाल, तुम उत्साहपूर्वक उसे कर दो। वह है माता जी के लिये जमीन खरीदना।

यहाँ पर पण्डितों का संग है, वहाँ मूर्खों का- यही स्वर्ग-नरक का भेद है। यहाँ के लोग मिल-जुलकर कार्य करते हैं और हम लोगों के तमाम कार्यों में तथाकथित वैराग्य यानी आलस्य है, ईर्ष्या आदि के कारण सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। हरमोहन बीच बीच में बहुत ही लम्बा-चौड़ा पत्र लिखते हैं, कि अमुक व्यक्ति अमुक की दुकान पर बैठकर मेरे विरुद्ध इस प्रकार की बातें बना रहा था, जो उनके लिये असहनीय हो गया और इसी बात पर उससे झगड़ा हो गया आदि। मेरे पक्ष के समर्थन के लिये उनको अनेक धन्यवाद। किन्तु मुझे कौन क्या कह रहा है, उसे ध्यानपूर्वक सुनने में मुख्य बाधा यही है कि ' स्वल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः – समय अत्यन्त कम है और विघ्न अनेक हैं । '  अतः जो सारभूत है उसका ही सेवन करना चाहिए जैसे हंस जल और दूध के मिश्रण में से दूध को ग्रहण कर लेता  है। मद्रासियों से परामर्श लेकर कार्य करना उनमें कार्य करने की महान क्षमता है। प्रभावशाली ढंग से कार्य करने के लिये, 'सबतरफा-बुद्धि' (all-sided intellect) रहनी चाहिये। काश कि मुझे अपने ही जैसा एक दूसरा भूत भी मिल जाता ! यदि किसी को आध्यात्मिक-शक्ति प्राप्त हो गयी हो, तो उसे उस शक्ति को अपने क्रियाकलापों के माध्यम से अवश्य प्रकट करनी चाहिए. ... मुक्ति-भक्ति के लिये अश्रुपात करने वाली मूर्खताओं को त्याग दो !

[हमें धीरे धीरे 'हरि-सभाओं' और ऐसे अन्य संगठनों (तिलैया में निखिल बोंगो) को आत्मसात (absorb) कर लेना चाहिये ! .… तुम भगवान  हो, मैं भगवान हूँ, प्रत्येक मनुष्य ही भगवान है। यही वह भगवान है, जो स्वयं को मानव के रूप में प्रकट करके दुनिया में सब कुछ कर रहा है। क्या मनुष्य से इतर कोई अन्य भगवान भी है, जो किसी गुफा में बैठकर तुम्हारे द्वारा खीर-जलेबी चढ़ाये जाने की प्रतीक्षा में बैठा हुआ है ? अतः कार्य संलग्न हो जाओ। निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन, कोडरमा जिला इकाई; को आत्मसात करने में संलग्न हो जाओ। २०१४-१६ के पदाधिकारी -अध्यक्ष डॉक्टर ओमियो विश्वास, उपाध्यक्ष- सुनील देवनाथ, सुकान्त मजूमदार, ताप्ती चक्रवर्ती, सुतपा भट्टाचार्य, सचिव- विपुल गुप्ता, संयुक्त सचिव- मौसमी मल्लिक, सह सचिव- अरूप मित्रा, आलोक चक्रवर्ती, कोषाध्यक्ष - स्वप्न विश्वास, राज्य समिति सदस्य- डॉ. भवानी चक्रवर्ती, आलोकनाथ चक्रवर्ती, सोमा घोष, सांस्कृतिक समिति संयोजक -संदीप मुखर्जी, अभिजीत मल्लिक, अंकेक्षक -चण्डीचरण चक्रवर्ती, संरक्षक -डॉ. कल्याण चौधरी, डॉ अधिरकुमार विश्वास, चित्रा मुखर्जी, सृजनी पत्रिका संपादक- कल्याण मजूमदार, संपादक मण्डल सदस्य- मोनी माला माइती, इन्द्रजीत गुप्ता, इन्द्राणी मुखर्जी, कार्यकारिणी समिति - मंजुश्री मुखर्जी, काकोली मजूमदार, वीरव्रत नाग, मिली मित्रा, तुषार राय चौधरी। बंगाली कवि इन्द्रजीत गुप्ता की रचनाओं पर आधारित काव्यसंकलन के प्रकाशन का निर्णय हुआ। बैठक में संस्था के सचिव विपुल गुप्ता ने गतिविधियों पर प्रकाश डाला। कोषाध्यक्ष -अलोक चक्रवर्ती ने गत वर्ष के आय-व्यय का व्योरा प्रस्तुत किया।)]

शशि (सान्याल) को यह ज्ञान प्राप्त हुआ है कि इस दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी अपवित्र हैं, तथा उन लोगों के संस्कार ही इस प्रकार हैं कि उनसे धर्म अनुष्ठान हो ही नहीं सकता। भारत में केवल मात्र कुछ ब्राह्मण लोग ही धर्मानुष्ठान करने के लिये अधिकृत हैं। उनमें भी शशि (सान्याल) और विमला चन्द्र-सूर्य-स्वरुप हैं। शाबाश, कितना अद्भुत धर्म है! खासकर बंगाली-ब्राह्मणों के लिये ऐसा एकाधिकार प्राप्त होना, सबसे सहज है। यही तो उनके जप-तप का मुलभूत सिद्धान्त है- कि मैं पवित्र हूँ, बाक़ी सब लोग अपवित्र हैं। यही तो क्रूरतापूर्ण, आसुरी और नारकीय धर्म है!  .… भोग करते समय गैर ब्राह्मण वर्गों को छूने में कोई बुराई नहीं है; किन्तु भोग समाप्त होते ही स्नान आवश्यक है, क्योंकि नॉन-नानब्राह्मिंस ऐज अ क्लास आर अनहोली ? इसलिये अन्य समय में उससे स्पर्श हो जाना भी धार्मिक-अपराध है ! नॉन-ब्राह्मिंस से उपहार लेना हो तो ले लेंगे, सर्वनाश करेंगे, साथ साथ यह भी कहेंगे कि हमें न छूना। वह कैसे कैसे महान सत्यों का आविष्कार वे नहीं कर रहे हैं ! " -यदि आलू का बैगन से स्पर्श हो जाय,तो कितने समय के अन्दर यह ब्रह्माण्ड रसातल को पहुँच जायगा ? " चौदह बार मिट्टी से हाथ न धोया जाय, तो उसके पूर्वजों के चौदह पुश्त नरकगामी होंगे अथवा चौबीस ?  तथाकथित पण्डे-पुरोहितों एवं ब्राह्मण दुष्टों ने देश को रसातल में पहुँचा दिया है। एक लड़की का विवाह यौवन प्राप्त करने से पहले ही कर देना चाहिए। समस्त गृह्यसूत्रों में यही आदेश दिया गया है। वैदिक अश्वमेध यज्ञानुष्ठान की ओर ध्यान  दो - तदन्तरं महिषीं अश्वसन्निधौ पातयेत् --जैसे वाक्य देखने को मिलेंगे। होता, ब्रह्मा, उद्गाता इत्यादि नशे में चूर होकर कितना घृणित आचरण करते थे। अच्छा हुआ कि जानकी  के वन-गमन  के बाद राम ने अकेले ही अश्वमेध यज्ञ किया, इससे चित्त को बड़ी शान्ति मिली। तातपर्य यह हुआ कि प्राचीन काल में बहुत सी चीजें अच्छी भी थीं और बुरी भी।

यदि अमेरिकी लोग धर्मानुष्ठान के अयोग्य हैं, इसलिये इस देश में वेदान्त का प्रचार करना उचित नहीं है- तो फिर इन लोगों से आर्थिक सहायता माँगना कैसे न्यायोचित है? इस तरह के एक रोग का क्या उपाय हो सकता है? शशि (सान्याल) को मालाबार जाने के लिए बोलो। वहाँ के राजा ने अपनी प्रजा की 'जमीन छीन कर' ब्राह्मणों के चरणों में समर्पित कर दिया है। वहाँ के हर गाँव में बड़े बड़े मठ हैं, जहाँ शानदार रात्रि-भोज दिया जाता है, ऊपर से सभी ब्राह्मणों को भारी नकद दान-दक्षिणा भी दिया जाता है। त्रावनकोर-कोचीन राज्य तथा मालाबार को मिलाकर १ नवंबर, १९५६ को केरल राज्य बनाया गया। आज के केरल राज्य में शामिल होने वाले अन्य प्रमुख राज्य कोच्चि और मालाबार थे। दोनों राज्यों पर हिन्दू राजा राज करते थे। श्री पद्मनाभ के सेवक के रूप में त्रावणकोर के महाराजा मार्तंड वर्मा द्वारा शुरू की गई थी। वहां धर्म- परिवर्तन की पूरी छूट थी। आज केरल में 20 प्रतिशत ईसाई और उतने ही मुसलमान हैं। कापड़ बीच है, जहां २१ मई, १४९८ को वास्को दा गामा ने पहला कदम भारत की भूमि पर रखा था। भारत में सबसे पहले ५२ ई. में ईसाई धर्म प्रचारक सेंट थामस- का प्रवेश मालाबार में हुआ था। 

" Believers are Heroes ! ": उत्तम वस्तुओं की रक्षा करनी होगी, किन्तु जो भारत अभी बनने वाला है -भविष्य का भारत;  (Future India), वह निश्चय ही प्राचीन भारत ( Ancient India) से अत्यन्त महान होगा! जिस दिन (१८ फ़रवरी १८३६ को ) श्री रामकृष्ण का आविर्भाव हुआ, उसी दिन से वर्तमान भारत (Modern India) तथा सतयुग ( Golden Age) का विकास होने लगा है ! और तुम लोग इस सत्ययुग को साकार करने वाले प्रतिनिधि हो ! इसी विश्वास को ह्रदय में धारण करके कार्य में कूद पड़ो ! इसीलिये जब एक ओर तो तुम श्री रामकृष्ण को अवतार-वरिष्ठ कहकर स्वीकार करते हो, फिर एक ही सांस में दृढ़तापूर्वक कहते हो - मुझसे नहीं होगा; अर्थात इस प्रकार तुम अपनी अज्ञानता की वकालत भी करते हो ?
यही कारण है कि मैं बिना संकोच के, तुम लोगों को "You are false to the backbone!" रीढ़ की हड्डी तक झुट्ठा-लबरा कहता हूँ ! यदि श्रीरामकृष्ण परमहंस 'सत्य-स्वरुप' हैं, तो तुमलोग भी 'वही' हो ! लेकिन केवल मुख से 'I am He, I am He' करने से नहीं होगा अपने सत्यस्वरूप होने की शक्ति, (आध्यात्मिक शक्ति) को प्रकट भी करना होगा। मैं जानता हूँ, तुम लोगों में अद्भुत शक्ति विद्यमान है! जो नास्तिक हैं (अपने को सत्य-स्वरुप को स्वीकार नहीं करते हैं) उनके पास कोई शक्ति नहीं- भुस्सा भरा है। जो लोग आस्तिक हैं, अपने-आप पर विश्वास करते हैं, वे हीरो हैं! वे अपनी जबरदस्त शक्ति को इस प्रकार प्रकट करेंगे -कि उसकी बाढ़ में सम्पूर्ण विश्व बह जायगा। " दीन-दुःखियों के प्रति सहानुभूति रखना और उनकी सहायता करना ही ईश्वर की पूजा है;अज्ञानी, पददलित, तथा दरिद्र- इनको अपना ईश्वर समझो ! "The poor, the downtrodden, the ignorant, let these be your God." एक भयानक दलदल तुम्हारे सामने है- ध्यान रखना; कई लोग (ग्रामोन्नयन करने गये) उसमें गिरकर दफ्न हो जाते हैं।  प्रत्येक वैसा कर्म -जिस से अपने दिव्य-स्वरुप को अधिक से अधिक प्रकट करने में सहायता मिलती हो, वही सत्कर्म है; और वैसा प्रत्येक कर्म जिसे करने से उसमें बाधा पहुँचती है-बुरे कर्म हैं। "
अपने ब्रह्मस्वरूप को अभिव्यक्त करने का एकमात्र उपाय यही है, कि इस विषय में दूसरों की सहायता की जाय।" (इसी का सूत्र है -' Be and Make!') " शिक्षक या नेता को यह विचार करना चाहिये, कि यदि प्रकृति में असामनता है, तो भी सब के लिये बराबर का मौका होना चाहिये। फिर भी यदि (सामाजिक-न्याय के बहाने) किसी को अधिक किसी को कम सुविधा देनी हो, तो बलवान (अमीर) की अपेक्षा दुर्बल (गरीब) को अधिक अवसर दिया जाना चाहिये। हाँ, शिक्षा के मामले में, चाण्डाल को जितनी शिक्षा की आवश्यकता है, उतनी ब्राह्मण के लिये नहीं। हिन्दुओं का वर्तमान धर्म- न तो वेदों में है, न ही पुराणों में, और न ही भक्ति में, और न ही मुक्ति में है; धर्म तो भात की हांड़ी में समा चूका है। वर्तमान हिन्दू धर्म न तो ज्ञान-मार्गी है, न विवेक-विचार करने में है -'मुझे न छूना, मुझे न छूना', इस प्रकार की अस्पृश्यता ही उसका एकमात्र अवलम्ब है,हिन्दू धर्म की दौड़ बस यही आकर समाप्त हो जाती है। " आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः"--क्या यह वाक्य केवल मात्र पुस्तकों में निबद्ध रहने के लिये है? जो लोग गरीबों को रोटी का एक टुकड़ा नहीं दे सकते, वे फिर वह विद्या कैसे दे सकते हैं; जो मनुष्य को मुक्त कर दे!

श्री रामकृष्णवतार में ज्ञान, भक्ति तथा प्रेम -तीनों ही विद्यमान हैं ! उनमें अनन्त ज्ञान, अनन्त प्रेम, अनन्त कर्म तथा सभी प्राणियों के लिए अनन्त दया है ! अभी तक तुम्हें इसका अनुभव नहीं हुआ है। श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् -(गीता २.२९) श्रीरामकृष्ण परमहंस ही परम-ब्रह्म हैं ! यह अनुभव करने के बाद कोई एक महापुरुष इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है; और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है; तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है ! और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता । सम्पूर्ण हिन्दू जाति ने जिस परमात्म-तत्व को समझने में युग-युगान्तर तक प्रयत्न किया था, उसे उन्होंने एक ही जीवन में जीकर दिखला दिया ! उनका जीवन समस्त राष्ट्रों के ' वेदों ' (आधायत्मिक सत्यों ) का जीवन्त भाष्य है ! अन्य लोगो को धीरे धीरे ही इस सत्य की अनुभूति होगी !  मेरा तो वही पुराना आह्वान है - struggle, struggle up to light! Onward! संघर्ष करते रहो, अपनी पूरी शक्ति साथ आत्मज्योति का अनुभव करने की दिशा में अग्रसर रहो ! आगे बढ़ो !
ठाकुर के भक्तों की सेवा में  -दास नरेन्द्र !

विषयवस्तु २ : किसी के मस्तिष्क में कोई मौलिक विचार तो कभी कौंधता ही नहीं है, सब उसी पुराने घिसे-पिटे राग को अलापने में लगे हैं -कि रामकृष्ण परमहंस ऐसे थे और वैसे थे,--वही मुर्गा और बैल की कथा जैसी बेसिर-पैर की कहानियाँ हाँकते जा रहे हैं।-वही चक्र,गदा,शंख, पद्म या पहले शंख-गदा-पद्म-चक्र में उलझे रहते हो, ये सब नीरा पागलपन नहीं तो और क्या है ? इसी को अंग्रेजी में 'इम्बिसिलिटी' (imbecility)- मन्दबुद्धिता कहा जाता है। 

यदि अपना और देश का कल्याण करना चाहते हो, तो घंटा आदि को गंगाजी में सौंपकर ईश्वर के ब्रह्माण्डीय विराट-रूप के अतिरिक्त उनके वैयक्तिक पहलु (पिण्ड) - मानव देहधारी प्रत्येक 'मनुष्य', साक्षात् नारायण, जाग्रत ईश्वर- 'मानव-भगवान' की पूजा में तत्पर हो जाओ ! बम्बई के बनिया लोग खटमलों के लिये अस्पताल बनवा रहे हैं, किन्तु मनुष्यों की ओर उनका कुछ भी ध्यान नहीं है। मनुष्यमात्र (पिण्ड) में वही असीम (आल्हादिनी ) शक्ति अन्तर्निहित है, जो शक्ति सम्पूर्ण जगत (ब्रह्माण्ड) को संचालित कर रही है;-- इस भाव का प्रचार करो जो कभी हमारे देश में नहीं हुआ है ! गाँव गाँव तथा घर घर में जाकर इन्हीं भावों का प्रचार करो, तभी तो यथार्थ में कर्म का कर्म का अनुष्ठान होगा। प्रभु की इच्छा से लाखों तन्त्र, वेद, पुराणादि सब कुछ तुम्हारी वाणी से अपने आप निःसृत होंगे। यदि कुछ करके दिखा सको, एक वर्ष के अन्दर यदि 'बिहार-झाड़खंड राज्य स्तरीय युवा प्रशिक्षण शिविर ' का आयोजन कर सको, तब मैं तुम्हारी बहादुरी समझूँगा।

परमगुरु श्रीरामकृष्ण की गुरुपरम्परा के वर्तमान ध्वजवाहक या जिनके माध्यम से अब भी ठाकुर-माँ-स्वामीजी की शक्ति कार्यरत है; उस गुरु-परम्परा की अटूट श्रृंखला में श्रद्धा रखते हुए, उनसे दीक्षित हुए बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता है। क्या यह बच्चों का खेल है? अटूट गुरु-परम्परा में किसी माध्यम के सहारे ठाकुर के साथ जुड़े बिना, कोई अपने को श्रीरामकृष्ण का शिष्य कैसे कह सकता है ? नेतृत्व-परम्परा को मानकर न चलना चाहे, तो उसे संगठन से निकाल बाहर करो। मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ, कि शिष्यत्व की श्रृंखला, अर्थात जो शक्ति 'प्रथमगुरु' या जगतगुरु से उनके शिष्य में आती है, तथा उनसे उनके शिष्यों में संक्रमित होती है--के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। कोई लड़का यदि एकदम गुरु (नेता) ही बनना चाहता हो !  यदि वह स्थापित गुरु-परम्परा का पालन न करे  तो उसे अलग कर देना।

गाँव गाँव तथा घर घर में जाकर मनुष्यों उनके यथार्थ स्वरुप के प्रति जाग्रत करने की चेष्टा करने, एवं लोकहित के ऐसे कार्यों में आत्मनियोग करो, जिससे कि जगत का कल्याण हो सके। चाहे अपने को नरक में क्यों  न जाना पड़े, दूसरों की मुक्ति हो।  मुझे अपनी मुक्ति की  चिन्ता नहीं है। [ अ + विमुक्त = काशीविश्वनाथ  से जो मुक्त होना न चाहे = शिव के गुरु 'अविमुक्तेश्वर नाथ'  (अर्थात भगवान श्रीरामचन्द्र महाभारत) काशी  का प्राचीन अद्भूत अविमुक्तेश्वर मंदिर आज जनमानस की विस्मृति में चला गया है।  

जब तुम स्वयं के लिये सोचने लगोगे --तभी  मानसिक अशान्ति आकर उपस्थित होगी। मेरे बच्चे तुम्हें शान्ति की क्या आवश्यकता है ? जब तुम सब कुछ छोड़ चुके हो । आओ अब शान्ति तथा मुक्ति की अभिलाषा  त्याग दो। अपने लिये किसी प्रकार की चिन्ता अवशिष्ट न रहने पाये, स्वर्ग-नरक, भक्ति अथवा मुक्ति --किसी चीज की परवाह न करो। और जाओ, मेरे बच्चे, घर घर जाकर भगवन्नाम (शिव के गुरु 'अविमुक्तेश्वर नाथ'श्रीरामकृष्ण देव --  के नाम का ) का प्रचार करो।

निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखो -

१. हम लोग संन्यासी हैं, भक्ति तथा मुक्ति तथा कोई भी भोग --सब कुछ हमारे लिये त्याज्य है।

२. जगत का कल्याण करना, प्राणिमात्र का कल्याण करना हमारा व्रत है, चाहे उससे मुक्ति मिले अथवा नरक, स्वीकार करो।

३. जगत के कल्याण के लिये श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का आविर्भाव हुआ है। अपनी अपनी दृष्टि के अनुसार तुम उन्हें -मनुष्य, ईश्वर या अवतार कुछ भी कह सकते हो। जो रूप तम्हें अच्छा लगता हो उसी रूप मेंअपनी स्वयं की बुद्धि के प्रकाश में उन्हें  पहचानो और स्वीकार करो  !

४. श्रीरामकृष्ण के समक्ष चाहे जैसा भी मनुष्य अपने सिर को झुका देगा, वह तत्काल ही  २४ कैरेट शुद्ध-स्वर्ण जैसा सच्चा (चरित्रवान) मनुष्य बन जायगा।  मेरे बच्चों, इसी सन्देश को लेकर तुम घर घर जाओ तो सही--देखोगे कि तुम्हारी सारी अशान्ति दूर हो गयी है !

विषयवस्तु ३. पुरुष तथा नारी, दोनों ही आवश्यक हैं । आत्मा में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है; केवल श्रीरामकृष्ण को अवतार घोषित करते रहने से काम नहीं चलेगा, यदि तुम्हारे हृदय में वे अवतरित हो चुके हैं-तो तुम्हारे माध्यम से उस शक्ति का विकास भी दिखाई पड़ना चाहिये ! गौरी माँ, योगिन माँ एवं गोलाप माँ कहाँ हैं ? हजारों की संख्या में पुरुष तथा नारी चाहिये, जो अग्नि की तरह हिमालय से कन्याकुमारी तक तथा उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक तमाम दुनिया में फ़ैल जायेंगे।

==============

२२.

भारतवर्ष के सभी बुराइयों की जड़ है- गरीबों की दुर्दशा। 

श्लोक २२ : जीवन्ति केवलं ते ये प्रार्थैकान्तजीविताः । अन्येsवरा  मृतेभ्योsपि जीवितं यन्न तादृशम्॥

' They alone live who live for others, the rest are more dead than alive.' 4/361 'Our duty to the masses'

* यह जीवन क्षणस्थायी है, संसार के भोग-विलास की सामग्रियाँ भी क्षणभंगुर हैं। यथार्थ रूप से वही जीवित है जो दूसरों का हितसाधन करने कि ईच्छा से जीवन धारण करता है,(जैसे स्वामीजी बटवृक्ष बन करदूसरों को छाया देने के लिये जीवन धारण किये हैं) बाकी लोगों का जीना तो मरने ही के बराबर है।

 प्रसंग : [ स्वामीजी द्वारा २४ जून १८९४ को शिकागो से मैसूर के महाराज- को लिखित पत्र]

विषयवस्तु :  ' Royal son of India' महाराज आप क्षत्रिय-राजा हैं, आप जैसे एक उन्नत, महामना भारत के राजपूत लोग भारत को फिर से अपने पैरों पर खड़ा कर देने के लिये बहुत कुछ कर सकते हैं।

 पाश्चात्य देश के लोग भारत की जाति-प्रथा की चाहे जितनी निन्दा करें, किन्तु उनके यहाँ (अमेरिका) का जाति-भेद तो हमारे यहाँ से भी खराब है, क्योंकि वहाँ का समाज धन के आधार पर उंच-नीच में विभक्त है। धर्म के विषय में यहाँ के लोग या तो पाखण्डी होते हैं या कट्टरपंथी।

समझदार लोग अपने अंधविश्वासी धर्मों से घृणा करने लगे हैं, और नये प्रकाश के लिये भारत की ओर देख रहे हैं। यहाँ के विचाशील और शिक्षित लोग चर्च के पादरियों के - ' अभाव से भाव, अर्थात शून्य से सृष्टि का सृजन हुआ है', ' आत्मा एक सृष्ट पदार्थ है' 'स्वर्ग नामक स्थान में ईश्वर किसी अत्याचारी राजा के समान सिंहासन पर बैठा है, और क़यामत के दिन नरक की आग में जला डालेगा'; ऐसे-ऐसे बे सिर पैर के सृष्टि-सिद्धान्तों पर विश्वास करना छोड़ चुके हैं। परमात्मा हमारी आत्मा में ही अवस्थित है' आदि को वे लोग किसी न किसी रूप में बहुत तेजी के साथ आत्मसात करते जा रहे हैं। केवल पचास वर्षों के भीतर संसार की सभी शिक्षित लोग- 'सृष्टि और आत्मा की नित्यता या सनातनत्व' एवं ' मनुष्य का यथार्थ स्वरुप सर्वोच्च और पूर्ण ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) है' आदि हमारे पवित्र वैदिक सिद्धान्तों पर विश्वास करने लगेंगे। उनके विद्वान् पादरियों ने तो अभी से ही बाइबिल की व्याख्या करते समय वेदान्ती महावाक्यों तथा श्रीरामकृष्ण के जीवन एवं उपदेशों का उल्लेख करते हुए करना प्रारम्भ कर दिया है।

अपने निम्न वर्ग के लोगों के प्रति हमारा एक मात्र कर्तव्य है- उनको शिक्षा देना, उनके खोये हुए व्यक्तित्व (आत्मश्रद्धा) का विकास करना। पुरोहितों की शक्ति और विदेशी विजेतागाण सदियों से उन्हें कुचलते रहे हैं, जिसके फलस्वरुप भारत के गरीब बेचारे भूल गये हैं- कि वे भी 'मनुष्य' हैं। हमारे देश के युवाओं तथा अधिकारी पुरुषों के सम्मुख, देश की आमजनता के प्रति यही एक बहुत बड़ा काम- उन्हें यथार्थ मनुष्य में रूपान्तरित करने का काम- पड़ा हुआ है ! किन्तु अब तक (आजादी के ६५ साल बाद तक) मनुष्य बनने और बनाने (Be and Make), अर्थात मनुष्य- निर्माणकारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार की दिशा में कुछ भी नहीं हो रहा है।

हमें केवल रासायनिक पदार्थों को इकठ्ठा भर कर देना है, (अर्थात '3H' के विषय में उनकी आँखों को खोल देने वाले प्रशिक्षकों का निर्माण करना है) क्रिस्टलीकरण रवा बंध जाना (चरित्र-गठन य़ा ) तो साहचर्य के प्राकृतिक नियम (Law of Association) से ही साधित हो जायेगा। हमारा कर्तव्य है, उनके दिमागों में विचार भर देना- बाकी वे स्वयं कर लेंगे। वर्तमान भारत-सरकार को बस इतना ही काम करना है।

अगर पहाड़ मुहम्मद के पास न  आये, तो मुहम्मद को ही पहाड़ के पास जाना पड़ेगा। अर्थात अगर गरीब लड़का शिक्षा ग्रहण करने के लिये 'ऋषियों' तक न आ सके, तो शिक्षा को ही (ऋषियों या महामण्डल-नेताओं को) उसके पास जाना पड़ेगा। (अर्थात गाँव-गाँव में युवा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करना होगा।)

========

विवेकानन्द दर्शनम्

२३. 
ब्रह्मचर्य मानवजाति  का मार्गदर्शक नेता बनने की पूर्वशर्त है !

श्लोक २३: प्रार्थे जीव धीमन्  त्वं परसेवापरायणः । जुहुयात् शरीरं कर्तुं सार्थकं नरजीवनम् ॥

O, intelligent one ! Live for others alone and in their service give up your body.

ओ, इंटेलीजेंट वन ! अर्थात हे भारत (भा-रत) ! --हे पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता-संस्कृति में अनुप्राणित भारत ! मत भूलना कि इस समाज में ऐसी समस्यायें वर्तमान हैं जिनका अर्थ तक अभी तुम या तुम्हारे पाश्चात्य गुरु समझ नहीं पाये हैं- मीमांसा करना तो दूर की बात है ! केवल दूसरों का कल्याण के जीना सीखो, और उनकी सेवा में अपने प्राणों को  न्योछावर कर दो !

प्रसंग : [ ' सामाजिक सम्मलेन भाषण' ९/ २८८ एवं विवेकानन्द चरित- पृष्ठ २९२ (THE SOCIAL CONFERENCE ADDRESS Volume 4,Writings: Prose गृहस्थ शिष्य डॉ. नंजुन्दा राव को   ३० नवम्बर १८९४ का पत्र ]

विषयवस्तु :  १९०० ई० के लाहौर-सम्मेलन के सभापति के रूप में जस्टिस श्री रानाडे ने जो भाषण पढ़ा था उसे आपत्ति-जनक मानकर स्वामीजी  उसका निर्भीक प्रतिवाद करते हुए ' प्रबुद्ध भारत ' में सामाजिक सभा में 'जस्टिस श्री रानाडे के भाषण की समालोचना ' शीर्षक एक निबन्ध लिखा था ।

बंगाल के ब्राह्म समाज-सुधारकों की ही तरह श्री रानाडे [महादेव गोविन्द रानाडे 1842- 1901]  त्याग (संन्यासाश्रम) के विरोधी थे और मौका देखते ही वे संन्यासियों पर आक्षेप किया करते थे। रानाडे ने कहा कि वैदिक युग में संन्यासी सम्प्रदाय नहीं था, अतः स्त्री-पुरुष सभी स्वतन्त्रता (?) का उपभोग करते थे। कठोर संयम का पालन धर्मसाधना का आवश्यक अंग नहीं था; अतः मानव-जीवन की मधुरता का सभी लोग परिपूर्ण तृप्ति के साथ उपभोग कर सकते थे। विवाहित ऋषिगण समाज के नेता व धर्माचार्य होते थे। उनका तर्क यह था कि परमात्मा ने हमें सभी इन्द्रियाँ किसी न किसी उपयोग के लिये ही दीं हैं; और  ' संन्यासी अगर वंशवृद्धि नहीं कर रहे हैं,' तो वे अन्याय कर रहे हैं- वे भगोड़े हैं।

उनके इन कुतर्कों का प्रतिवाद करते हुए स्वामीजी ने ' सामाजिक सम्मलेन भाषण' ९/ २८८ एवं विवेकानन्द चरित- पृष्ठ २९२ (THE SOCIAL CONFERENCE ADDRESS Volume 4,Writings: Prose) में लिखा है -

सबसे पहले प्रोटेस्टेन्ट सम्प्रदाय ने जो आरोप यूरोप के संन्यासी सम्प्रदाय के उपर यूरोप में लगाया था, " कि संन्यासी अपने ब्रह्मचर्य के कारण जीवन की परिपूर्ण और विविध अनुभूतियों से वंचित रह जाता है। " उसी आरोप को बाद में बंगाल के ब्रह्मसमाजी समाज-सुधारकों ने उनसे उधार ले लिया था। और अब हमारे बम्बई के बन्धु उसी की हाँ में हाँ मिलते हुए कहते हैं कि -' संन्यासी अगर वंशवृद्धि नहीं कर रहे हैं, तो वे अन्याय कर रहे हैं - वे पापी हैं। बहुत अच्छा, तब तो ईश्वर ने मनुष्य को -काम, क्रोध, चोरी-डकैती, ठगी आदि कई प्रवृत्तियाँ भी दीं हैं; -इनके बारे में क्या किया जाय ? क्या इन्हें भी पूर्ण प्रवेग से प्रचलित रहने देना चाहिये?

समाज के सिरमौर सर्वत्यागी संन्यासियों ने ही सदा से जाति को उन्नति के मार्ग में परिचालित किया है। संन्यासियों की कठोर संयत जीवन-यापन प्रणाली तथा भोग-वितृष्णा ने युग युग में कितने ही मनुष्यों को इन्द्रिय-भोगों की उच्छृंखल लालसा को संयमित रखने के लिये अनुप्रेरित किया है। भारतवर्ष में जो कुछ भी उदार भाव, प्राणप्रद, वीर्यप्रद तथा उच्च चिन्तन है उनका अधिकांश संन्यासियों के ब्रह्मचर्य द्वारा पुष्ट मस्तिष्कों से ही निसृत हुआ है। भारत के प्राचीन और आधुनिक इतिहास में संन्यासियों की इस निःस्वार्थ चेष्टा की महिमामय कहानियाँ स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं।

संन्यासी गुरु (निवृत्ति-मार्ग के सप्तऋषि) व् गृहस्थ गुरु (आकाश में दिखने वाले प्रवृत्तिमार्गी  सप्तर्षि मण्डल) - कुमार ब्रह्मचारी व् विवाहित धर्माचार्य दोनों प्रकार के आचार्य उतने ही प्राचीन हैं, जितने वेद। इस समय यह निश्चित करना कठिन है कि पहले सब प्रकार के अनुभव से युक्त सोमपायी विवाहित ऋषि का आविर्भाव हुआ था अथवा मानव-अनुभव से शून्य ब्रह्मचारी ऋषि ही इस परम्परा का आदिम रूप था? जब तक अंग्रेजों के अनुयायी इसका कोई उत्तर न दे हमारे लिये तो पहले अण्डा हुआ या मुर्गी?  जैसी पुरानी पहेली ही बनी रहेगी।

पर उत्पत्ति-क्रम कुछ भी हो, श्रुतियों और स्मृतियों के ब्रह्मचारी गुरु, गृहस्थ गुरुओं से सर्वथा पृथक धरातल पर थे; और यह पार्थक्य था पूर्ण पवित्रता का, ब्रह्मचर्य का ! और इसीलिये वे उपनिषदों के वक्ता तथा ब्रह्मज्ञान के अधिकारी हुए । हमें क्या उन सोमपायी विवाहित ऋषियों का अनुसरण करना चाहिये जिनमें से अधिकांश - जब कभी और जहाँ कहीं सम्भव हुआ, तब वहाँ बच्चे उत्पन्न करने में उतने ही प्रख्यात थे, जितने प्रसिद्द वे ऋचा-गान के लिये थे ?  अथवा उन त्यागी गृहस्थ ऋषियों तथा निवृत्ति-मार्गी सप्तर्षियों का अनुगमन करना चाहिये, जो ब्रह्मचर्य को आध्यात्मिकता की अनिवार्य आवश्यकता मानते थे ?

हिन्दू अपनी माँ के दूध के साथ ही यह धारणा ग्रहण कर लेता है कि सामान्य मनुष्यों के लिये ('अवतार' या पैग़म्बर को छोड़कर कर) ' ब्रह्मवेत्ता मनुष्य' बन जाने में - 'One Life is not Enough'- " एक ही जीवन पर्याप्त नहीं है !" पुनर्जन्म में विश्वासी हिन्दू (सनातन-धर्मावलम्बी) यह जनता है कि-

'आखिरकार यह जीवन बदलते हुए चित्रों की श्रृंखला मात्र ही तो है, इसीलिये एक स्वप्न जैसा है! 'After all, this world is series of pictures.' इसके माध्यम से मनुष्य पूर्णत्व की प्राप्ति करने के लिये अग्रसर हो रहा है- ' Man is marching towards perfection !'

पाश्चात्य लोग पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते, इसीलिये इस जीवन के परे नहीं देखते और उनका निष्कर्ष चार्वाक का निष्कर्ष है -' बहती गंगा में हाथ धो लेना। ' यह संसार तो दुःख-सागर है, तो फिर सुख के जो भी अंश उपलब्ध हों, उनका भरपूर उपभोग कर लिया जाय। ' इसके विपरीत हिन्दू (वेदान्ती) की दृष्टि में केवल ईश्वर और आत्मा ही सत्य हैं, इस दृष्टिगोचर जगत से अनन्त गुना अधिक सत्य; और इसीलिये वह परमसत्य (ईश्वर) को प्राप्त करने के लिये, इस नश्वर संसार का त्याग करने के लिये सदैव तत्पर रहता है। अतः " जितने दिन समग्र हिन्दू जाति का मनोभाव इस प्रकार रहेगा-और हम श्री भगवान से यह प्रार्थना करते हैं कि यही भाव चिरकाल तक स्थायी रहे -तब तक हमारे देश के आंग्लिकृत या पाश्चात्य सभ्यता की नकल करने वाले समाज-सुधारक बन्धु, क्या भारतीय स्त्री-पुरुषों को संन्यासियों  आदर्श वाक्य ' आत्मनो मोक्षार्थं जग-द्धिताय च ' एवं त्यागी गृहस्थों के आदर्श वाक्य ' Be and Make' के लिये सर्वस्व त्याग देने की प्रवृति के समाप्त हो जाने की आशा रख सकते हैं? "

धर्म के विषय में क्या सोचते हो ? वह रहना चाहिये या बिल्कुल ही लुप्त हो जाना चाहिये ? यदि यू.पी. में चलने वाले अपराध से बचना चाहते हो तो धर्म साधना में विशेष रूप से अभिज्ञ एक दल मार्गदर्शक नेताओं या आचार्यों की आवश्यकता है -धर्मयुद्ध के लिये योद्धा की आवश्यकता है। संन्यासी ही धर्म के विशेष रूप से अभिज्ञ व्यक्ति हैं, क्योंकि उन्होंने धर्म-प्रचार को ही अपने जीवन का मूल लक्ष्य बनाया है। वे ही ईश्वर के सैनिक हैं। जब तक एक  एकनिष्ठ संन्यासियों का सम्प्रदाय जीवित है, तब तक धर्म के विनाश का भय कैसा ? प्रोटेस्टेन्ट इंग्लैण्ड व् अमेरिका, कैथोलिक सन्यासियों के प्रबल प्लावन से कम्पित क्यों हो रहे हैं ?

 " जीवित रहे रानाडे तथा समाज सुधारकों का दल या आधुनिक लेफ्टिस्ट ! परन्तु हे भारत ! --हे पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता-संस्कृति में अनुप्राणित-आंगलीभूत भारत ! मत भूलना कि इस समाज में ऐसी समस्यायें (जुबलाइन-कोर्ट ?) वर्तमान हैं जिनका अर्थ तक अभी तुम या तुम्हारे पाश्चात्य गुरु समझ नहीं पाये हैं- मीमांसा करना तो दूर की बात है ! "

अतः भावी भारत के उद्बोधन के लिये सर्वप्रथम समाज के मार्गदर्शक नेता, नियन्ता और राष्ट्र के चालक के रूप में ' ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य' में दीक्षित एक दल के रूप में शक्तिशाली आचार्यों की आवश्यकता है। और इनमें से प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह ऊपर से गृहस्थ ही क्यों न हो, भीतर से सर्वत्यागी संन्यासी होगा ! इसीलिये उन्होंने कम से कम एक सहस्र शक्तिमान चरित्रवान तथा बुद्धिमान त्यागी - प्रचारकों को तैयार करने का संकल्प लिया था-जो आचार्य (मानवजाती के मार्गदर्शक नेता) बनकर समग्र भारत का भ्रमण करते हुए - मुक्ति,सेवा, सामाजिक जीवन के उन्नततर आदर्श 'समता' या 'आत्मवत सर्वभूतेषु ' के सन्देश का द्वार द्वार पर प्रचार करने के साथ साथ उन्हें उन्हें लौकिक और अर्थकरी विद्या की शिक्षा भी देंगे।

भगवान ने गीता में एक वादा किया है- ' संभवामि युगे युगे!' उसी प्रकार माँ दुर्गा ने भी दुर्गा-सप्तशती में वादा किया है-

“ॐ इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
                        तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्ॐ।।” (अ॰११, श्लो॰५५)

देवी ने स्वयं ही कहा है कि जब-जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब-तब अवतार लेकर मैं शत्रुओं का संहार करूंगी। अर्थात हर युग में भारत की स्त्रियों के ह्रदय दुष्ट दलन तथा धर्मस्थापना के लिए देवी दुर्गा स्वयं अवतीर्ण होती हैं!

इसीको कहते हैं- ' ऐतिहासिक अनिवार्यता। ' जिस समय धर्म अपने स्थान से च्युत हो जाता है, स्त्रियों-पुरुषों में समान रूप से इसी प्रकार के एक आविर्भाव की आवश्यकता होती है। प्रबुद्ध भारत-वासी यह जानते हैं कि इतिहास यात्रा के घूर्णन पथ में इस तरह की अनिवार्यता बार बार दृष्टिगोचर हुई है। जिस समय धर्म अपने स्थान से च्युत हो जाता है, अधर्म का सिर ऊँचा उठ जाता है, उस समय धर्म को पुनः स्थापित करने के लिये एक महान आविर्भाव अनिवार्यता बन जाती है। वह चाहे किसी अवतार के द्वारा हो या जैसे भी हो, एक विशिष्ट भाव मूर्तमान होता अवश्य है।

ठाकुर (परमहंस जी) ने स्पष्ट रूप से यह अनुभव किया था कि मेरे अति अल्प जीवन काल में मैं जितना सकता था, कर दिया किन्तु उसके बाद जो वास्तविक कार्य है, वह यही है कि बहुत अल्प समय के भीतर कुछ युवाओं के जीवन को इस प्रकार से गठित कर देना होगा कि वे इस भाव को थोड़े समय में ही सम्पूर्ण जगत में दावानल की तरह फैला देने में सक्षम हो जायें। और इसी कार्य के लिये उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में 'ब्रह्मतेज और क्षत्रवीर्य ' में दीक्षित युवा आचार्यों के एक दल को संगठित किया है- जिसमें ब्रह्मचारी आचार्य (जन्मजात निवृत्ति-मार्गी स्वामी विवेकानन्द) और विवाहित युवा आचार्य ( प्रवृत्ति मार्ग का त्याग करके संन्यासी वेश धारण करने वाले स्वामी ब्रह्मानन्द) भी थे।

वैसा करने के बाद अवतारवरिष्ठ श्रीरामकृष्ण ने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया था, तथा उनके श्रेष्ठ शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने भी अपने गुरु द्वारा सौंपे हुए कार्य को मात्र ७ वर्षों के भीतर प्राच्य से पाश्चात्य तक फैला कर दिखा दिया था। स्वामी जी ने अपने जीवन के उद्देश्य के विषय में अनेक स्थानों पर अनेक प्रकार से कहा है। एक स्थान पर वे कहते हैं- " मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य युवाओं को संगठित करना है।" किन्तु आजीवन ऐसे त्यागी, चरित्रवान युवक दल को संगठित करने का प्रयास करने के बाद भी, स्वामी जी केवल मुट्ठीभर युवक-युवतियों को ही श्रीरामकृष्ण की पताका के नीचे एकत्रित कर सके थे।

इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने उसी समय महामण्डल के आविर्भाव की भविष्यवाणी, तथा महामण्डल के युवा प्रशिक्षण शिविर में ' लीडरशिप ट्रेनिंग ' या मानवजाति के मार्गदर्शक नेताओं के निर्माण की 'प्रशिक्षण-प्रक्रिया' में 'कुटीचक अवस्था' की अनिवार्यता को एक पूर्व-शर्त " Precondition to be a Mahamandal Leader" के रूप में रेखांकित करते हुए अपने गृहस्थ शिष्य डॉ. नंजुन्दा राव को   ३० नवम्बर १८९४ को एक पत्र में लिखा था -" मैं जानता हूँ; और ठीक जानता हूँ कि बड़े बड़े काम बिना बड़े स्वार्थ-त्याग के नहीं हो सकते। मैं अच्छी तरह जानता हूँ, भारत-माता अपनी उन्नति के लिये अपनी श्रेष्ठ सन्तानों की बलि चाहती है, और मेरी आन्तरिक अभिलाषा है कि तुम उन्हींमें से एक सौभाग्यशाली होगे। मेरी राय में तुम्हें कुछ दिनों के लिये ब्रह्मचारी बनकर रहना चाहिये। अर्थात कुछ काल के लिये स्त्री-संग छोड़कर अपने पिता के घर में ही रहो; यही 'कुटीचक अवस्था' है। संसार की हित-कामना लिये अपने महान स्वार्थ-त्याग के संबन्ध में अपनी पत्नी (मोदी-जशोदा बेन) को सहमत करने की चेष्टा करो। अगर तुममें ज्वलन्त विश्वास, सभी को जीतने वाला- प्रेम और सर्वशक्तिमयी पवित्रता है, तो तुम्हारे शीघ्र सफल होने में कुछ भी सन्देह नहीं।"

'कुटीचक अवस्था' : आश्रमोपनिषद् में चार प्रकार के संन्यासी कहे गये हैं, - कुटीचक, बहूदक, हंस , परमहंस (परमहंस के दो प्रकार – विद्वतपरमहंस , विविदिशु- जो हर तरफ देश-विदेश में घूम कर लोगों को मोह निद्रा से जगाने में समर्थ अधिकारी हो। ) । 'अवस्था' शब्द को एक संकेत के रूप में समझना चाहिये। जिस प्रकार शास्त्रों में कई कई बार आत्मा को जीवात्मा और परमात्मा आदि के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। यह तो विदित ही है कि नेति नेति करते हुए तुरीयावस्था में पहुँचा जा सकता है।

'तुरीयावस्था का अनुभव' मुहुर्मुहु करने के कारण ही प्रथम युवा नेता श्रीरामकृष्ण के जीवन में  पूर्ण साम्य प्रतिष्ठित हुआ है ! समस्त मानव जाति, समस्त जीवों यहाँ तक कि जड़ वस्तुओं के साथ भी उन्होंने अभिन्नता का साक्षात्कार किया है! उन्होंने इन्हीं जन-साधारण दीन-दुःखियों के दारुण वेदना का अनुभव अपने ह्रदय में करके , मानवमात्र को दुःख-कष्ट से मुक्त करने का प्रयास किया है, उन्हें संगठित करने की चेष्टा है। तभी तो वे स्वामी विवेकानन्द सदृश्य प्रखर-मेधासम्पन्न युवाओं के ह्रदय सम्राट बन सके थे ! महामण्डल के प्रत्येक नेता  ' intelligent one !' या भारत को भी मनःसंयोग (यम्, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा,ध्यान, समाधि (अर्थात सिद्धि-तृप्ति-तुष्टि-शांति- या तुरीयावस्था।) सीखना होगा तभी वह 'Be and Make' आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम नेता बन सकता है।

सामान्य मनुष्य के चैतन्यता की तीन अवस्थायें होती हैं - १. मनुष्य जागृत होता है, २. मनुष्य  स्वप्न अवस्था में जाता है, ३. मनुष्य सुषुप्ती की अवस्था में जाता है l ये तीनो अवस्थाएं तो सभी आम मनुष्यों को भी अनुभव हो जाती हैं, लेकिन तुरीय अवस्था योग की ऐसी परम अवस्था है जिसमें, पहुँचकर मनुष्य जागृत, स्वप्न और सुषुप्ती इन तीनो से परे जाकर अपने यथार्थ स्वरुप का साक्षात्कार कर लेता है। जब घटाकाश महाकाश में लीन होता है, जब बूँद वापिस सागर में मिल जाती है उसे समाधि का सबसे उंचा स्तर कहते हैं l जीव की तुरीयावस्था भेदज्ञान शून्य शुद्धावस्था है ! इस अवस्था में भेद का लेश भी नहीं है क्योंकि भेद द्वैत में होता है! तैत्तरीय उपनिषत् में आत्मा या चैतन्य के पाँच कोशों की चर्चा की गयी प्रथम अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा आनन्दमय कोश। आनन्दमय कोश से ही आत्मा के स्वरूप की अभिव्यक्ति की गयी है यही तुरीयावस्था है।

शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ स आत्मा स विज्ञेयः...मांडूक्य ७

' ॐ' कार- मात्रा- अ, उ, म, अर्धमात्रा अर्धचन्द्रबिन्दु. वस्तुत: तुरीयावस्था निराकार अवस्था ही है जिसे मांडूक्य उपनिषद् में अ उ म् इन तीनों को साकार- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति बताया है। और इसी ओम् के निराकार स्वरूप चौथे पाद को निराकार, तुरीयावस्था बताया है।   अद्वैत वेदान्त के अनुसार सर्वोच्च स्तर की जो समाधि की अवस्था होती है उसमें  जीवात्मा अपने वास्तविक रूप को पहचानता है। यह निर्विकल्प समाधी की वह अवस्था है जिसको केवल सिद्ध योगी ही अनुभव कर पाते हैं।  क्यूंकि यह अवस्था परमात्मा के ज्ञान और आनन्द का अनुभव करवाती है इसलिए युवा-नेता को तुरीय अवस्था में जाना आवश्यक हो जाता है, और परमात्मा भी तुरीय अवस्था में ही जानने का विषय है l तभी वह दूसरों का मार्गदर्शन करने में सक्षम नेता बन सकता है, तथा अन्य युवाओं को भी ऐसा नेता बनने के लिये अनुप्रेरित कर सकता है।

तुरीयातीतोपनिषद् में इस अवस्था की व्याख्या की गई है। अवस्था- जागृती, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या।  -यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण बनता है। पूर्ण में से पूर्ण ले लेने पर पूर्ण ही शेष रहता है l अपने पिता भगवान नारायाण के पास जाकर पितामहब्रह्मा ने कहा--तुरीयातीत अवधूत का मार्ग क्या है और उनकी स्थिति कैसी होती है ? 

तब भगवान नारायण ने कहा-- अवधूत के मार्ग पर चलने वाले पुरूष दुर्लभ है, वे बहुत नहीं होते l अगर वैसा एक भी हो तो वह नित्य पवित्र, वैराग्य पूर्णमूर्ति, ज्ञानाकार और वेद पुरूष होता है, ऐसी विद्वानों की मान्यता है l ऐसा महापुरूष अपना चित्त मुझमें रखता है और मैं उसके अन्तर में स्थित रहता हूँ। वह आरम्भ में कुटीचक होता है, फिर बहूदक की श्रेणी में आता है l बहूदक से हंस बनते हैं और फिर परमहंस होते हैl

कुटीचको बहूदको हंसश्चैव तृतीयकः |
चतुर्थः परहंसश्च यो यः पश्चात् स उत्तमः ||

वे निज स्वरूपानुसन्धान से समस्त जगत-प्रपंच के रहस्य को जान जाते है। वे लौकिक और वैदिक कर्मो का पुण्य और अपुण्य का ज्ञान और अज्ञान का भी त्यागकर देते हैं l उनके लिऐ सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, मानापमान नहीं होता l वे तीनोंवासनाओं (ईषणा- लोकेषणा, वित्तेषणा, दारेषणा) सहित निन्दा-अनिन्दा, गर्व, मत्सर, दम्भ, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ,मोह, हर्ष, अमर्ष, असूया, आत्म संरक्षण की भावना को ज्ञान की आग में झोंक देते हैं और अपनी देह को ही देवालय के सदृश्य समझते है।

वे प्रयत्न, नियम, लाभालाभ की भावना से शुन्य होते है l गौ की तरह जो कुछ मिल जाता है उसी से प्राण धारण करते है, और सब प्रकार के लालच से रहित होते है l वे विद्या, पांडित्य को प्रपञ्च समझ कर विष्ठा की तरह त्याग देते है। अपने स्वरूप को छिपाकर रखते है और इसलिये दिखलाने के लिये छोटे-बड़े की भावना को पूर्ववत् मानते रहते है। सर्वोत्कृष्ट और अद्वैत रूप की कल्पना करते है l वे मानते है कि मेरे अतिरिक्तअन्य कुछ भी नही है' ( अर्थात् मैं ही पूर्ण ब्रह्म हूँ !) वे देव और गुरूरूपी सम्पत्ति का आत्मा में उपसंहार करके न तो दुःख से दुखी होते है और न सुख से प्रसन्न होते है l वे राग से पृथक रहते है और शुभाशुभ किसी बात से कभी स्नेह नहीं रखते l उनकी सब इन्द्रियाँ उपराम को प्राप्त होती है l

वे अपने पूर्व-जीवनके आश्रम, विद्या, धर्म, प्रभाव आदि का स्मरण नही करते और वर्णाश्रम के आचारका त्याग कर देते है l उनको दिन तथा रात समान होता है, इसलिये सोते नहीं (अर्थात कभी

असावधान नही होते ) सदा विचरण करते है l उनका देहमात्र ही अवशिष्ट रहता है l  वे सदैव उन्मत्तता से रहित होते हैं, पर बाहर से बालक, उन्मत्त अथवा पिशाच के समान बनकर एकाकी रहते है l किसी से संभाषण नही करते वरन सदैव स्वरूप के ध्यान में ही रहते है l वे निरालम्ब का अवलम्बन करके आत्मनिष्ठा के अतिरिक्त और अपने लिये भौतिक सुख पाने की इच्छा को पूर्णतः त्याग देते है l उसे इराक में ५०० यज़ीदियों को जिन्दा गाड़ देने का समाचार सुनकर बहुत पीड़ा होती है - इसीलिये इस प्रकारका तुरीयातीत अवधूत सदैव अद्वैत-निष्ठा में तत्पर रहता है और प्रणव के भाव में -अर्थात विश्व-मानवता के कल्याण में निमग्न होकर देहत्याग करता है l


=============
 ' विवेकानन्द  दर्शनम् '
२४.
प्रेम ही मैदान जीतेगा !  

 श्लोक २४ : न मन्येsस्ति तस्य भावो न शक्नोति यदीश्वरः। दातुं क्षाममुखे चान्नमनार्थिन्य श्रुमोचनम्॥ 

' I do not believe in a God or religion which cannot wipe the widow's tears or bring a piece of bread to the orphan's mouth.'

'मैं उस भगवान या धर्म पर विश्वास नहीं करता, जो न विधवाओं के आँसू पोंछ सकता है और न अनाथों के मुँह में एक टुकड़ा रोटी ही पहुँचा सकता है।' ३/३२२  


प्रसंग : [स्वामी जी द्वारा २७ अक्तूबर, १८९४ को श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखित पत्र स्वामीजी के
महावाक्य - " योर कंट्री रीक्वाइरर्स हीरोज; बी हीरोज!"  " तुम्हारे देश के लिये वीरों की आवश्यकता है-'वीर' बनो !" " बीलीवर (believer)=आस्तिक= वीर =हीरो !" " चरित्र की ही सर्वत्र विजय होती है!"  " सत्ता का नशा और ईर्ष्या से सावधान!"]


विषयवस्तु : प्रिय आलासिंगा, तुम्हें मेरा  शुभाशीर्वाद ! 
मेरे बच्चे, मैं ईश्वर से प्यार करता हूँ, साथ ही मनुष्य से भी प्यार करता हूँ-'आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ ! दुःखी लोगों की सहायता करने में मैं विश्वास करता हूँ और दूसरों को बचाने के लिये, मैं नरक तक जाने को भी तैयार हूँ।  
 प्रेम कभी निष्फल नहीं होता मेरे बच्चे, कल हो या परसों या युगों के बाद, पर सत्य की जय अवश्य होगी। प्रेम ही मैदान जीतेगा। क्या तुम अपने भाई-मनुष्य जाति को प्यार करते हो ? ईश्वर को ढूँढने कहाँ चले हो- ये सब गरीब, दुःखी, दुर्बल मनुष्य (अपराध-हिंसा-बलत्कार करना जिनकी प्रवृत्ति बन चुकी है) क्या ईश्वर नहीं हैं ? इन्हीं की पूजा पहले क्यों नहीं करते ? गंगा-तट पर कुआँ -खोदने क्यों जाते हो ?
'चरित्र ' की ही सर्वत्र विजय होती है: प्रेम की असाध्य-साधिनि शक्ति (omnipotent power) पर विश्वास करो। क्या तुम्हारे पास प्रेम है ? तब तो तुम सर्वशक्तिमान हो ! क्या तुम सम्पूर्णतः निःस्वार्थ हो ? यदि हो ? तो फिर तुम्हें कौन रोक सकता है ? चरित्र की ही सर्वत्र विजय होती है। भगवान (श्रीरामकृष्णदेव) समुद्र के तल में भी अपनी सन्तानों की रक्षा करते हैं।  " Your country requires Heroes; be Heroes!"  " योर कंट्री रीक्वाइरर्स हीरोज; बी हीरोज! "

अब तो तुम जान ही गये हो कि तुम कितनी असीम शक्ति छुपी हुई है, तुम क्या कर सकते हो; क्योंकि ' तुम मद्रासवासी युवको, तुम्हीं ने वास्तव में सब कुछ किया है; मैं तो चुपचाप खड़ा रहा। इससे लाभ उठाओ, इसीके सहारे बढ़ चलो। आगे बढ़ो; जिसे तुम अपना धर्म मानकर गर्व का अनुभव करते हो, उसे अपने आचरण में उतार कर दिखाओ! और ईश्वर कृपा करते ही हैं।
PS. Take care of these two things — love of power and jealousy. Cultivate always "faith in yourself".
पुनश्च. ' सत्ता का नशा और ईर्ष्या ' --इन दो बातों से सावधान रहना ! सदा आत्मश्रद्धा में स्थित रहने का अभ्यास करते रहना ! 

 ===========
' विवेकानन्द - दर्शनम् '
२५. 

आधुनिक मनुष्य को त्याग- वैराग्य की बातें समझाना अत्यन्त कठिन है !

श्लोक २५ : मुक्तिर्हेया न मुक्तेहा भक्तिः किञ्चिद्विलम्बताम्। सर्वमुक्तिं कामयेsहमुदार श्रुतिसम्मताम्॥ 

1. Enjoyment is trash.

2. ' Whenever we struggle to get a little enjoyment, a mass of misery falls upon us.'

3. ' I have given up all hope for my own salvation.'

4. Devotion may wait a little.

5. ' There is no time to care for name, or fame, or Mukti, or Bhakti. we shall look to these some other time.'

6. What I desire is salvation of all, as contemplated in the Vedas. (Rig Veda.

10.12.4)

7.  ' There is no Mukti on earth to call my own.'

8. ' Do you think, so long as one Jiva endures in bondage, you will have any liberation ?

9. ' There is a class of Vedantists who hold such a view.'

१. विषय-भोग में सुख खोजना कूड़े-कचरे में पनीर ढूँढ़ने जैसा है।

२. " जब कभी हम थोड़ा सा सुख प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, तभी दुःख का पहाड़ हमारे सिर पर टूट पडता है।"

३. 'मैं अपने स्वयं की मुक्ति के लिए (किसी से सहायता पाने की ?)  सब उम्मीद छोड़ दी है ! ' 

४. भक्ति थोड़ा इंतजार कर सकती है ! 

५. "  आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! नाम के लिये समय नहीं है, न यश लिये, न मुक्ति के लिये, न भक्ति के लिये समय है; इनके बारे में फिर कभी देखा जायेगा। "

६. जैसा कि वेदों में कहा गया है; मेरी भी यही कामना है कि- " सभी लोग मुक्त हो जायें !"

७. इस पृथ्वी पर कोई मुक्ति ऐसी नहीं जो मुझे अपने लिये चाहिये !

८.  तू क्या समझता है कि एक भी जीव (पशु-मानव) के बन्धन में रहते हुए तेरी मुक्ति होगी ?

९. एक श्रेणी के वेदान्तीयों का ऐसा ही मत है --वे कहते हैं " व्यष्टि की मुक्ति, मुक्ति का वास्तविक स्वरूप नहीं है। समष्टि की मुक्ति ही मुक्ति है। '


प्रसंग : [ MAYA AND ILLUSION (Delivered in London)  ' माया और भ्रम ' (लन्दन में 
स्वामी विवेकानन्द का भाषण २/४३) ३. व्यवहारिक जीवन में वेदान्त -२./४-५ आलमबाजार मठ के गुरुभाइयों को लिखित पत्र १८९४ ग्रीष्म ऋतू/६-७ गुरुभाइयों को लिखित पत्र १८९४ (३/३००)/८-९  वार्ता एवं संलाप /३८/ वर्ष १९०१/ ६/१९४]
विषयवस्तु : आधुनिक (मॉडर्न-डिग्रीधारी) मनुष्य से वैराग्य की बात कहना अत्यन्त कठिन है : मेरे बारे में अमेरिका के लोग कहते थे, कि मैं यहाँ उस देश से आकर वैराग्य का उपदेश दे रहा हूँ, जो मृत है और जिसे पाँच हजार वर्ष पूर्व ही दफना दिया गया है। इंग्लैण्ड के दार्शनिक भी शायद मन ही मन ऐसा ही सोचते हों ? पर यह भी सत्य है कि मानवजाति का मार्गदर्शक नेता बनने का एकमात्र पथ ब्रह्मचर्य ही है! 
इन्द्रिय-विषयों को विषवत् जानकर उनको त्याग दो, और विरक्त जाओ। ईसा मसीह ने क्या कहा है ? 
" मेरे निमित्त जो अपने जीवन का त्याग करेगा, वही जीवन को प्राप्त करेगा !" बार बार उन्होंने यही उपदेश दिया है कि -'पूर्णता की प्राप्ति के लिये त्याग ही एकमात्र साधन है।'
[ केवल किसी बाहरी वेशभूषा को धारण कर लेना ही संन्यास नहीं है। ' एषणात्रयस्य त्यागः सन्यासः'- पुत्र-दारा ऐषणा, वित्त ऐषणा और लोक ऐषणा। इन तीनों ऐषणाओं से अनासक्त हो जाना ही संन्यास है।] ऐसा समय आता है, जब अन्तरात्मा इस लम्बे विषादमय स्वप्न से जाग उठती है, बच्चा मिट्टी के खिलौनों से खेलना छोड़कर अपनी माता की गोद जाने के लिये अधीर हो उठता है। उसे कभी न कभी यह अनुभव अवश्य हो जाता है कि --(श्रीमद्भा॰ ९/१९/१४; मनु॰ २/९४)
 न जातुः कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा   कृष्णवर्त्मेव   भूय    एवाभिवर्धते ॥

 -वासना के उपभोग से कभी वासना की निवृत्ति नहीँ होती, वरन जैसे आग में घी डालने से अग्नि नहीं बुझती, बल्कि और अधिक भड़क उठती है। यही बात सभी प्रकार के बौद्धिक आनन्दों, इन्द्रिय-विषय भोगों, तथा उन सभी प्रकार के सुखों जिसकी कल्पना मानव मन कर सकता हो- के लिये सत्य है। ये सभी ऐषणायें मिथ्या हैं, सभी माया के अधीन हैं। सभी कारण-कार्य बंधन के अधीन हैं, जिसके परे हम नहीं जा सकते। हम उसके अन्दर भले ही अनन्त काल तक दौड़ते फिरें, पर उसका अन्त नहीं पा सकते, और जब कभी हम थोड़ा सा सुख प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, तभी दुःख का पहाड़ हमारे सिर पर टूट पडता है। कितनी भयानक अवस्था है यह ! जब इस पर मैं विचार करता हूँ, तब मुझे प्रतीत होता है कि यह कथन- ' सब कुछ माया है', मायावाद ही एकमात्र सही व्यख्या है। 

 'बड़ा धमाका सिद्धान्त' है -बहुत कुछ उसी से मिलता जुलता सिद्धान्त वैदिक दर्शन में भी पाया जाता है। वह यह कि जीवन अन्य ग्रहों से संक्रमित होकर पृथ्वी पर आता है। कतिपय वैदिक दार्शनिकों का भी यह निश्चित मत है कि पृथ्वी पर जीवन इसी प्रकार चन्द्रलोक से संक्रमित होकर आता है। 
भगवान बुद्ध राजमहल की विलासिता में अपने जीवन के उद्देश्य को ही भूल गये: यहाँ मुझे भगवान बुद्ध की जीवनी 'ललित विस्तार' का एक प्रसिद्द गीत याद आता है। वर्णन इस प्रकार है कि बुद्ध ने मनुष्य-जाति के उद्धारक (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) के रूप में जन्म लिया, किन्तु जब राजमहल की विलासिता में अपने को भूल गये, तब उनको जगाने के लिये कुछ स्वर्गदूत आये, और उनको जगाने के लिये एक गीत गया। जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है - ' हम जीवन-नदी के प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं, हम निरन्तर परिवर्तित हो रहे हैं- कहीं निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है। किसी नदी की निरंतर-प्रवाह के समान हमारा जीवन भी विराम नहीं जानता-अविरत चलता ही रहता है।' तब फिर उपाय क्या है ? जिसके पास प्रचूर धन-दौलत है, वह तो आशावादी हो जाता है, कहता है-' बुढ़ापे के बाद क्या होगा ? इस पर सोचने के लिये भी मत कहो, भय उत्पन्न करनेवाली दुःख की बातें मत कहो, संसार के दुःख-कष्ट की बातें मत सुनाओ।' उसके पास जाकर यदि कहो- 'all is well' (सब कुछ ठीक है!), तो वह कहेगा, ' सचमुच, मैं तो मजे में हूँ; देखो कितने आलीशान भवन में रहता हूँ, यहाँ मुझे भूख या गर्मी-सर्दी का कोई भय नहीं- टी.वी. पर कपिल शर्मा शो देखकर मजे में रहता हूँ ! अतएव मेरे सम्मुख ऐसे भयावह चित्र मत लाओ।' पर दूसरी ओर कितने ही ऐसे लोग हैं, जो शीत और अनाहार के कारण मर रहे हैं। उनके पास यदि जाकर कहो-'आल इज वेल !', तो वे तुम्हारी बात सुनेंगे भी नहीं। जो स्वयं जीवन भर दुःख-कष्ट सहते आ रहे हैं, वे भला दूसरों के लिये कैसे खुश रहने की कामना कर सकते हैं ? बस, इसी प्रकार हमलोग आशावाद और निराशावाद के मध्य झूलते रहते हैं।
इस देश (इंग्लैण्ड-अमेरिका) में वैराग्य-वान होना बहुत कठिन है। इस जगत में जो कुछ हो रहा है, उसके तथ्यात्मक वर्णन का नाम माया है:  सधारणतया लोग यह बात सुनकर भयभीत जाते हैं। हमें साहसी होना पड़ेगा। तथ्यों को छिपाने के लिए उस पर परदा डालना रोग का प्रतिकार नहीं है। कुत्तों द्वारा पीछा किये जाने पर जिस प्रकार खरगोश अपने मुँह को टाँगों में छिपाकर अपने को सुरक्षित समझ बैठता है, उसी प्रकार हमलोग भी आशावादी होकर ठीक उस खरगोश के समान आचरण करते हैं। पर यह कोई उपाय नहीं है। दूसरी ओर, जिनके पास प्रचूर मात्रा में भोगने के लिये धन-दौलत है, वे इस मायावाद के सम्बन्ध में बड़ी आपत्तियां उठाते हैं।  सभी मुझसे कहते हैं--' वाह, संसार का सारा कारोबार कितने शानदार ढंग से चल रहा है, संसार कितना प्रगतिशील है !' किन्तु वे अपने जीवन को ही सारे संसार का जीवन समझ बैठते हैं।
पुराने प्रश्न उठते हैं- ईसाई धर्म को ही दुनिया का एकमात्र सच्चा धर्म होना चाहिए; क्यों ? इसलिये कि ईसाई धर्म मानने वाले सभी राष्ट्र समृद्धिशाली हैं। किन्तु ऐसा दावा अपने-आप में विरोधाभासी है, क्योंकि ईसाई राष्ट्रों की समृद्धि गैर-ईसाई देशों के दुर्भाग्य पर निर्भर करती है। गैर-ईसाई देशों का खून चूसे बिना ईसाई राष्ट्र इतने समृद्धिशाली नही बन सकते थे। यदि सारी पृथ्वी ही ईसाई धर्म को मानने लग जाये, तब तो भक्ष्य-स्वरूप शिकार करने योग्य कोई गैर-ईसाई राष्ट्र न रहने के कारण ईसाई राष्ट्र स्वयं दरिद्र हो जायेगा। अतः यह युक्ति अपना ही खण्डन कर लेती है। पशु वनस्पति खाकर जीवित रहते हैं, मनुष्य पशुओं पर, और सबसे ख़राब बात तो यह कि मनुष्य एक दूसरे पर जीवित रहते हैं, बलवान अपने से दुर्बल मनुष्यों का शोषण करके जीवित रहता है। बस, ऐसा ही सर्वत्र हो रहा है। और यही माया है।

तीक्ष्ण बुद्धि वाले कुछ शीघ्र समझ जाते हैं और मन्द बुद्धिवाले कुछ देरी में: वेदान्त कहता है कि एक समय ऐसा अवश्य आयेगा, जब हम पीछे नजर डालेंगे और उन आदर्शों पर हँसेंगे, जिनके कारण अपने इस क्षुद्र व्यक्तित्व का त्याग करते हममें भय का संचार होता है। सभी अपने अपने शरीर की रक्षा करने में व्यस्त हैं। कोई भी उसे छोड़ना नहीं चाहता। हम सोचते हैं कि इस देह की अनियत समय तक रक्षा कर लेने से हम अत्यन्त सुखी होंगे; पर समय आने पर हम इस बात पर भी हँसेंगे। अतएव, यदि सच्चाई यही है, इसी निराशाजनक विरोधाभास की अवस्था में जीना हमारी मजबूरी है- जो न तो सत् है न असत् है, न दुःख है न सुख है, बल्कि दोनों का मिक्स्चर है; तो फिर वेदान्त अथवा अन्य दर्शनशास्त्र या धर्म आदि की क्या आवश्यकता है ? और खास कर के, शुभ कर्म आदि करने की क्या आवश्यकता है? यही प्रश्न मन में उठता है।  
Beat a Retreat (अन्तर्मुख होना वैराग्य है): दूसरी ओर वेदान्त यह कहता है, ' यह ठीक है कि निरपेक्ष या असीम अपने को ससीम रूप में व्यक्त करने की चेष्टा कर रहा है, किन्तु एक समय ऐसा आयेगा, जब वह समझ जायेगा कि असीम आनन्द को ससीम इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त करना असम्भव है, इस प्रयत्न को ही न्यायविरुद्ध जानकर उसे पीछे लौटना पड़ेगा; अर्थात अन्तर्मुख होना पड़ेगा। यह पीछे लौटना (या इन्द्रिय विषयों से मन को खींच लेना) ही धर्म का यथार्थ प्रारम्भ है, जिसका अर्थ है वैराग्य ! 
सतीत्व राष्ट्र की जीवन-रेखा है। हिन्दुओं ने अपने देश में सतीत्व के ऊच्च स्तर को बनाए रखने के लिये 'बाल-विवाह' को स्वीकृति दी थी; किन्तु इससे हमारे लड़के-लड़कियाँ शारीरिक रूप से दुर्बल होन लगें। फिर भी मैं अस्वीकार नहीं कर सकता कि बाल-विवाह ने हिन्दू जाति को सतीत्व-धर्म से विभूषित किया है। क्या तुमने इतिहास में नहीं पढ़ा कि किसी राष्ट्र की मृत्यु का पहला चिन्ह उसकी नारियों में फैलता व्याभिचार या असतीत्व है? जब किसी राष्ट्र में व्याभिचार प्रविष्ट कर जाता है, तो समझना कि उस राष्ट्र का विनाश निकट आ गया है। इन दुःखजनक प्रश्नों का समाधान कहाँ मिलेगा ? यदि माता-पिता अपनी सन्तान के लिये वर-वधु का निर्वाचन करें, तो यह दोष कम हो सकता है। The daughters of India are more practical than sentimental. भारत की बेटियाँ भावुक होने की अपेक्षा अधिक व्यवहारिक होती हैं। किन्तु उनके जीवन में फिर कविता बहुत कम रह जाती हैं। (जो युवा फ़िल्मी चक्कर में पड़कर स्वयं पति और पत्नी का निर्वाचन करते हैं, तो इससे भी उन्हें कोई अधिक सुख नहीं मिलता है।) भारतीय नारियाँ जो अपने माता-पिता की आज्ञा से विवाह करती हैं, साधारणतः अधिक सुखी हैं। पति-पत्नी के बीच कलह अधिक नहीं होता, तलाक लेने की नौबत नहीं आती। दूसरी ओर, अमेरिका में जहाँ स्वाधीनता अधिक है, सुखी परिवार बहुत कम देखने में आते हैं। दुःख यहाँ, वहाँ सभी जगह है। इससे क्या सिद्ध होता है ? यही कि इन सब आदर्शों के द्वारा शाश्वत सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। हम सभी सुखी होने के के लिये उत्कट संघर्ष कर रहे हैं, पर एक ओर थोड़ा सुख प्राप्त होने के पहले ही दूसरी ओर दुःख भी आकर खड़ा हो जाता है। 
जीवन से तुम क्या समझते हो ? (Essence of life is going towards 'Perfection') :मैं पुनः दुहराता हूँ कि वेदान्त का दृष्टिकोण न तो आशावादी है और न निराशावादी ही। वह ऐसा नहीं कहता कि संसार केवल शुभ ही शुभ है, या यह भी नहीं कहता कि सब कुछ अशुभ ही अशुभ है। यह कहता है कि हमारे जीवन में अशुभ का मूल्य, शुभ के मूल्य से कम नहीं है; शुभ का मूल्य भी अशुभ के मूल्य से अधिक नहीं है। दोनों एक दूसरे से बन्धे हुए हैं। संसार इसी का नाम है, यह समझकर तुम धैर्यपूर्वक कर्म करो। पर क्यों ? क्यों हम कर्म करें ? यदि घटनाचक्र ही इस प्रकार का हो, तो हम क्या कर सकते हैं ? हम अनीश्वरवादी (agnostics) क्यों न बन जायें? आजकल के अज्ञेयवादी भी तो कहते हैं कि  समस्या का कोई समाधान नहीं है; वेदान्त की भाषा में कहेंगे कि इस मयापाश से छुटकारा नहीं है। अतएव चार्वाकी लोग कहते हैं, सन्तुष्ट रहो और जीवन का भोग करो। ऐसा दृष्टिकोण भी बिल्कुल गलत है, एक भयंकर भूल है, अतार्किक भ्रम है। और वह यह है -जीवन से तुम क्या समझते हो ? क्या तुम इसका अर्थ केवल पंचेन्द्रियों में आबद्ध जीवन को ही मनुष्य-जीवन समझते हो ? यदि यही सोचते हो तो फिर, पशु और मनुष्य में क्या अन्तर रह जाता है?
माया (प्रकृति)  के पार जाने का मार्ग प्रकृति के ऊपर विजय प्राप्त  करने में है।(The way is not with Maya, but against it) : मैं मानो अपने मनश्चक्षु के सामने भारत के उन प्राचीन आचार्यों को अरण्यस्थित आश्रम में इन्हीं सब प्रश्नों पर विचार-विमर्श करते देख रहा हूँ; वयोवृद्ध और अत्यन्त पवित्र महर्षि भी इन प्रश्नों का समाधान करने में असमर्थ हो रहे हैं,
पर एक युवक उनके बीच खड़ा होकर घोषणा करता है-माया के जाल से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग है-'सत्य का अनुभव करना'। मान लो, जब आत्मा ने जगत के प्रत्येक वस्तु का स्वरुप समझ लिया, और उसे यह अनुभव होने लगा कि प्रत्येक वस्तु ही ब्रह्ममय है; तब वह स्वर्ग में जाय अथवा नरक में, या और कहीं चली जाय -इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। मैं पृथ्वी पर जन्मूँ अथवा स्वर्ग में जाऊँ इससे कोई अंतर नहीं होता। मेरे लिये ये सब निरर्थक हैं, क्योंकि मेरे लिये सभी स्थान भगवान के मन्दिर हैं, सभी स्थान पवित्र हैं, कारण स्वर्ग,नरक अथवा अन्यत्र मैं केवल भगवत्-सत्ता का ही अनुभव कर रहा हूँ। भला-बुरा अथवा जीवन-मरण मुझे कुछ दिखाई नहीं देते, एकमात्र ब्रह्म का ही अस्तित्व है। वेदान्त-
मत में मनुष्य जब ऐसी अनुभूति प्राप्त कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है और वेदान्त कहता है - केवल वही व्यक्ति संसार में रहने के योग्य है, दूसरा नहीं। मनुष्य-देह में स्थित मानव-आत्मा ही 
एकमात्र उपास्य ईश्वर है। 
पवित्रता ड्रिलिंग मशीन (मनःसंयोग पद्धति) में डाल दो। श्रीरामकृष्ण के चरित्र, उनकी शिक्षा एवं उनके सर्वधर्म समन्वय को इस समय चारों ओर फैलाते जाओ- यही साधन है, यही भजन है, यही साधना है, यही सिद्धि है। उठो, उठो, बड़े जोरों की तरंग आ रही है, आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, स्त्री, पुरुष, चाण्डाल सब उनके निकट पवित्र हैं । आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! नाम के लिये समय नहीं है, न यश लिये, न मुक्ति के लिये, न भक्ति के लिये समय है; इनके बारे में फिर कभी देखा जायेगा। 
मानवजाति का शिक्षक-प्रशिक्षण देने की चुनौती, उन्हें 'भक्ति और मुक्ति का मार्ग' दिखाने की चुनौती (ठाकु-नाम; मनुष्य बनो और बनाओ) को स्वीकार कर लो; अपने स्वयं को भूल जाओ, इस अद्भुत सिद्धान्त को समझकर उन्मत्त हो जाओ। जिस प्रकार श्रीरामकृष्ण तुमसे प्रेम किया करते थे, मैं तुमसे करता हूँ- तुम भी सम्पूर्ण विश्व के साथ वैसा ही प्रेम करने में समर्थ हो जाओ !
जो कोई उन्हें प्रणाम करेगा, वह तत्काल कनवर्टेड (धर्मान्तरित) होकर शुद्ध स्वर्ण जैसा पवित्र बन जायेगा। इस (भक्ति और मुक्ति के) सन्देश को लेकर तुम घर घर जाओ तो सही-देखोगे कि तुम्हारी सारी अशान्ति दूर हो गयी है। डरने की जरूरत नहीं-डरने का कारण ही कहाँ है ? तुम्हारी किसी व्यक्ति से अपने लिये कुछ भी पाने की अपेक्षा-आकांक्षा तो है नहीं - अब तक तुमने, अपने चरित्र के अनुसार, श्रीरामकृष्ण के नाम का जैसा प्रचार किया है; वह ठीक है। अब संगठित होकर प्रचार करो, प्रभु तुम्हारे साथ हैं, डरने की कोई बात नहीं। 
" यह देख प्रत्यक्ष ब्रह्म ! इनकी उपेक्षा करके जो लोग संसारी विषयों की चर्चा करते हैं, उन्हें धिक्कार ! हाथ पर रखे आँवले की तरह यह देख ब्रह्म ! देख नहीं रहा है ? --यही, यही ! स्वामीजी ने इन बातों को इतने हृदयस्पर्शी ढंग से उच्चारित किया कि वहाँ उपस्थित सभी लोग, '  चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे '-- तस्वीर की तरह स्थिर खड़े रह गये ! प्रहार करने के लिए उद्यत, नखों की कांति से प्रकाशित राजा दिलीप के दायें हाथ की अंगुलियां कंकपत्रो से सुशोभित तूणीर में स्थित बाणों के मूलप्रदेश में रखे हुये (बाण निकालने के उद्योग में) चित्रवत (जड़) स्थिर हो गया,  उनका हाथ तरकस से चिपक गया, झटका पटका, पर निकला ही नहीं।
महाकवि कालिदास कृत रघुवंश ग्रंथ का बीजांकुर राजा दिलीप की निःसंतान होने की व्यथा से प्रारंभ होता है। महाकाव्य के द्वितीय सर्ग में राजा दिलीप के द्वारा नन्दिनी गौ की सेवा, नन्दिनी गौ के द्वारा राजा दिलीप की परीक्षा और पुत्रोत्पत्ति के वर प्राप्ति का वर्णन है।  कथा के अनुसार भू-मंडल का स्वामी होते हुये भी राजा दिलीप पुत्र विहीन होने के कारण संतप्त होकर राजकाज मंत्रियों को सौंपकर तपोवन में वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुंचकर उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। महर्षि वशिष्ठ ने तपोबल से इसका कारण जानकर राजा दिलीप को बताया कि कामधेनु की पुत्री नंदिनी गौ की आराधना करने से यह मनोरथ पूर्ण हो सकता है। अपने गुरू की आज्ञा स्वीकार कर राजा दिलीप अपनी धर्मपत्नी सुदक्षिणा के साथ नंदिनी गौ की सेवा-आराधना में तत्पर हो गये। 
शिष्य - पहले मुझे अनुभव् हो, तब तो कुछ लिखूँगा। श्री रामकृष्ण कहा करते थे - 'चपरास' (badge of authority)  मिले बिना कोई उस नेता या शिक्षक की बात नहीं सुनता।

स्वामी जी -- तू जिन सब साधनाओं तथा विचार -भूमिकाओं (3H - मनुष्य-निर्माण ओर चरित्र-गठन) मे से होकर अग्रसर हो चुका है, जगत मे ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जो अभी उन्हीं स्थितियों ( 1H- देहाध्यास) मे अटके पड़े हैं, उन्हें पार कर वे अग्रसर नहीं हो पा रहे हैं। तुम्हारे अनुभव ओर चिन्तन-प्रणाली लिखे होने पर उनका भी तो उपकार होगा। मठ में साधुओं के साथ जो चर्चा करता  है, उन विषयों को लिखकर रखने से बहुतों का उपकार हो सकता है।

जिस व्यक्ति के  साधन-भजन या आत्मानुभूति से दूसरों का उपकार नहीं होता, महा-मोह (अविद्या और देहाध्यास) में फँसे हुए जीवों (जीव रूपी मनुष्यों) का कल्याण नहीं होता, विवेक-प्रयोग और मनःसंयोग का अभ्यास सीख कर जीव (आदमी) को काम-कांचन की सीमा (देहाध्यास) से बाहर नहीं निकल कर मनुष्य (इन्सान) बनने में सहायता नहीं मिलती ; ऐसे साधन-भजन का क्या लाभ ? Do you think, so long as one Jiva endures in bondage, you will have any liberation? So long as he is not liberated — it may take several lifetimes — you will have to be born to help him, to make him realise Brahman.  तू क्या समझता है कि एक भी जीव (पशु-मानव) के बन्धन में रहते हुए तेरी मुक्ति होगी ? जीतने दिन जीतने जन्म तक उस जीव का उद्धार नहीं होगा, जब तक तुम्हारी तरह वह भी ' पशु-मानव से देव-मानव' में रूपान्तरित नहीं हो जाता, उसकी सहायता करने उसे अपने ब्रह्म-स्वरूप का अनुभव कराने के लिये,  उतनी बार तुझे भी जन्म लेना पड़ेगा। प्रत्येक जीव तो तेरा ही अंग है। इसिलिए इस ' तुव जीवभाव त्याग कर स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को भी जीव से मनुष्य बनने में सहायता करो' -- 'Be and Make !' के लिए कर्म करो। 

There is a class of Vedantists who hold such a view. एक श्रेणी के वेदान्तीयों का ऐसा ही मत है --वे कहते हैं " व्यष्टि की मुक्ति, मुक्ति का वास्तविक स्वरूप नहीं है। समष्टि की मुक्ति ही मुक्ति है। ' 
========
  ' विवेकानन्द - वचनामृत '
२६.

 " दुराग्रह प्रेम का विरोधी है "

 संसार एष शुन एव पुच्छ:

कौटिल्यदोषो न तु याति नूनम् ।

तथापि पुंसः प्रयतः स्वभाव

 इत्थं शनैर्याति प्रसादमार्गम् ॥  

1. ' This world is like a dog's curly tail, and people have been striving to straighten it out for hundreds of years; but when they let it go, it has curled up again. How could it be otherwise?'

2. You ' can never straighten the world ' ' In helping the world we really help ourselves.'

3. ' This world will always continue to be mixture of good and evil. Our duty is to sympathies with the weak and to love even the wrong-doer. The world is a grand moral gymnasium wherein we have all to take exercise so as to become stronger spiritually.' (Volume 1, Karma-Yoga/CHAPTER V 'WE HELP OURSELVES, NOT THE WORLD) 

१. हमारा यह संसार भी बस कुत्ते की टेढ़ी पूंछ के समान है। सैकड़ों वर्षों से लोग इसे सीधा करने का प्रयत्न कर रहे हैं; परंतु ज्यों ही वे इसे छोड़ देते हैं, त्योंही यह फिर टेढ़ा का टेढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त और हो भी क्या सकता है? 

२. दुराग्रही, कट्टर या धर्मान्ध व्यक्ति मूर्ख और सहानुभूति शून्य होता है। वह न तो कभी संसार रूपी कुत्ते की दुम को ही सीधा कर पाता है, न कभी उसके अपने हृदय की वक्रता ही सीधी हो पाती है।  

३.तीसरी बात यह कि हमें किसी से घृणा नहीं करनी चाहिये। यह संसार सदैव ही शुभ और अशुभ का मिश्रण-स्वरूप रहेगा। हमारा कर्तव्य है कि हम दुर्बल के प्रति सहानुभूति रखें और एक अन्यायी के प्रति भी प्रेम रखें। यह संसार तो चरित्र-गठन के लिये एक विशाल नैतिक व्यायामशाला (grand moral gymnasium)है। इसमें हम सभी को ह्रदय-विस्तार अभ्यासरूप कसरत करनी पड़ती है, जिससे हम आध्यात्मिक बल से अधिकाधिक बलवान बनते रहें।  
प्रसंग :  [ कर्मयोग ३/४७ ]
विषयवस्तु : प्रत्येक व्यक्ति को पहले यह सीखना चाहिये कि संसार में रहते हुए भी कैसे आसक्ति-
रहित होकर कर्म किया जा सकता है? जब कोई व्यक्ति यह जान लेता है कि " यह संसार कुत्ते की 
टेढ़ी पूंछ के समान है; जिसे कभी सीधा नहीं किया जा सकता!" तो वह सभी प्रकार के दुराग्रह और मतान्धता से परे हो जाता है। जब हमें भी "मनुष्य बनो और बनाओ " का कार्य करते करते यह ज्ञात हो जायेगा, " संसार कुत्ते की दुम की तरह है, जो कभी भी सीधा नहीं हो सकता"--  तब हम भी इस बात के लिये दुराग्रही नहीं होंगे कि सम्पूर्ण विश्व को हमलोग मिलकर भी आज ही क्यों नहीं चरित्रवान मनुष्य बना सके ?"  यदि संसार के विभिन्न सम्प्रदाय के प्रचारकों में यह दुराग्रह, यह कट्टरता न होती, तो धर्मान्तरण की चेष्टा और धर्म के नाम पर आतंकवाद भी न होता। और इस संसार के अधिकांश आदमी अपने अपने धर्म का पालन करते हुए ही, इस समय तक सच्चे इन्सान या चरित्रवान मनुष्य बन चुके होते। 
अतएव जब कभी तुममें दुराग्रह का यह भाव आये, तो सदैव कुत्ते की टेढ़ी पूंछ का दृष्टान्त स्मरण कर लिया करो। The fanatic is foolish and has no sympathy; he can never straighten the world, nor himself become pure and perfect.

क्योंकि दुराग्रह प्रेम का विरोधी है। बहुधा दुराग्रहियों को तुम यह गाल बजाते सुनोगे, " हमें  पापी से घृणा नहीं है, हमें तो घृणा पाप से है। " परन्तु यदि कोई मुझे ऐसा मनुष्य दिखा दे, जो सचमुच पाप और पापी में भेद कर सकता हो, तो ऐसे मनुष्य को देखने के लिये मैं कितनी भी दूर जाने को तैयार हूँ, ऐसा कहना सरल है। किन्तु यदि हम सचमुच वास्तविक सत्ता और उसके गुण (कोटि या quality) में भली-भाँति भेद कर सकें, तो हम पूर्ण हो जाएँ। (अर्थात मनुष्य ही भगवान है पर वह जीव-कोटि है या ईश्वर कोटि ? इसे विवेक-प्रयोग से पहचान लें तो हम पूर्ण हो जाएँ।) पर इसे व्यवहार में लाना इतना सरल नहीं। हम जीतने ही शान्तचित्त होंगे और हमारे स्नायु जीतने संतुलित रहेंगे, हम उतने ही अधिक प्रेमसंपन्न होंगे और हमारा कार्य भी उतना ही उत्तम होगा। 

सारा ब्रह्माण्ड ही ईश्वर का प्रतिरूप है !  और उसके पीछे मूल तत्वरूप में ईश्वर विराजमान है। इस प्रकार की प्रतीक-विद्या (symbology) किसी मनुष्य द्वारा उत्पन्न नहीं हुई है। और न ऐसा ही है कि किसी धर्म के अनुयायियों ने एक जगह बैठकर कुछ प्रतीकों की कल्पना कर डाली है। धर्म के प्रतीकों की उत्पत्ति स्वाभाविक रूप से होती है। नहीं तो ऐसा क्यों है कि लगभग सभी मनुष्यों के मन में कुछ विशेष विचारों के साथ कुछ विशेष प्रतिक सदा से जुड़े रहे हैं? कुछ प्रतिक तो सर्वत्र प्रचलित हैं। तुममें से अनेकों की यह धारणा है कि क्रॉस का चिन्ह सर्वप्रथम ईसाई धर्म के साथ प्रचलित हुआ; परन्तु वास्तव में वह ईसाई धर्म के बहुत पहले से, मूसा के जन्म से भी पहले, वेदों के आविर्भाव के भी पहले से विद्यमान था।
 स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का 'अस्तित्व' और 'क' का अर्थ 'कर्त्ता' या करने वाले से है। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द का अर्थ हुआ 'अच्छा' या 'मंगल' करने वाला। बाद में इसी भावना के साथ रेडक्रॉस सोसायटी ने भी अपनाया। जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही 'वामावर्त स्वस्तिक' अंकित था। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है।
इस सबसे क्या प्रकट होता है? यही कि ये सब ये सब प्रतीक रूढ़िजन्य मात्र नहीं हो सकते, इसके पीछे कोई कारण अवश्य रहा होगा। उन प्रतीकों और मानव मन के बीच कुछ प्राकृतिक साहचर्य अवश्य रहा होगा।

शब्द की इस शक्ति के स्वरुप को जानना : 'शब्द' के उच्च दार्शनिक तथा धार्मिक महत्व के अतिरिक्त हमारे इस जीवन नाटक में भी शब्द का विशेष स्थान है। भला सोचो तो, इससे अधिक आश्चर्यजनक बात और क्या हो सकती है ? एक मनुष्य दूसरे को बेवकूफ कह देता है, और बस- इतने से ही वह दूसरा मनुष्य उठ खड़ा होता है और अपनी मुट्ठी बाँधकर उसके नाक पर एक घूसा जमा देता है। देखो तो, शब्द में कितनी शक्ति है ! रोती हुई स्त्री सान्त्वना के कुछ शब्द सुनकर शान्त हो जाती है, उसका दुःख दूर हो जाता है और वह मुस्कुराने लगती है। शब्द की इस शक्ति के स्वरुप को जानना तथा उत्तम रूप से उपयोग करना भी कर्मयोग का एक अंग है। 
जातक अपने साथ दो प्रकार के संस्कार लेकर आता है। एक प्रकार के संस्कार को वह जन्म-जन्मान्तरों से अपने साथ लाता है और दूसरे प्रकार के संस्कार को वह माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और वंश परम्परा से प्राप्त करता है। वैदिक संस्कृति में मानव जीवन के लिए सोलह संस्कारों का विधान है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन में सोलह बार मानव को सुधारने का, उसके जीवन को नव-निर्मित करने के भरसक प्रयास किया जाता है। 
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
देखिअहीं रूप नाम अधीना। रूप ज्ञान नहीं नाम बिहीना।।
-इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता। 
मनुष्य की सहायता द्वारा ईश्वर की  उपासना करना क्या परम सौभाग्य नहीं है ? हमें यह निश्चित जान लेना चाहिये कि हमारे बिना भी यह संसार बड़े मजे में चलता जायेगा। परन्तु फिर भी हमें सदैव परोपकार ही करना चाहिये। परोपकार करने की इच्छा हमारी सर्वोच्च प्रेरक शक्ति है, किन्तु तब जब हमें सदा स्मरण रहे कि दूसरों की सहायता करना हमारा परम सौभाग्य है। छत की बॉलकोनी पर खड़े हाथ में दो रूपये का सिक्का लेकर यह मत कहो-" ऐ भिखारी, ले यह मैं तुझे देता हूँ!' परन्तु तुम स्वयं इस बात के लिये कृतज्ञ होओ कि तुम्हें वह निर्धन व्यक्ति मिला, जिसने तुम्हारे दान को स्वीकार कर लिया। नहीं तो तुम्हारा ह्रदय विशाल नहीं हो पाता। दान देकर तुमने अपना ही उपकार किया है। धन्य पाने वाला नहीं होता, देने वाला होता है। समस्त भले कार्य हमें शुद्ध बनने तथा पूर्ण होने में सहायता करते हैं। और देखा जाय तो हम  अधिक से अधिक क्या कर सकते हैं? या तो एक स्पताल बनवा देते हैं, सड़कें बनवा देते हैं, दातव्य औषधालय खुलवा सकते हैं; या जाड़े में कंबल बाँट देते हैं --बस यही सब तो ? हम गरीबों के लिये एक ' राहत-कोष योजना' खोल देते हैं, दस-बीस लाख डॉलर इकट्ठा कर लेते हैं, उसमें से पाँच लाख का एक स्पताल बनवा देते हैं, पाँच लाख नाच-तमाशे, शैम्पेन पीने में फूँक देते हैं, और शेष का आधा कर्मचारी-अधिकारी-नेता मिलकर लूट लेते हैं, बाकी जो १५ % बचता है, वही किसी तरह गरीबों तक पहुँचता है। फिर कोई भी दैवी आपदा तुम्हारी तमाम सड़कों, अस्पतालों, या केदार-बदरी जैसी आपदा - मन्दिर के अतिथिशाला को भी नष्ट कर सकती है। अतएव इस प्रकार की संसार की सहायता करने की खोखली बातों को हमें छोड़ देना चाहिये। भोगों के संग्रह और लालच के कारण ही इस शरीर की प्राप्ति हुई। विवेक-वैराग्य की प्राप्ति गुरु-परम्परा ही उपाय है। किसी के अणुव्रत हो जाओ।
सन्त का पूरा जीवन ही एक लम्बी प्रार्थना होती है। वह स्वयं के देखे को, आत्मसाक्षात्कार एवं अनुभव को ही प्रमाण मानता है। यह अनुभूति ही परम-आत्मा है। इस सूक्ष्म, ब्रह्माण्ड में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से परिव्याप्त, जल-तत्तव की भाँति पूरित, ब्रह्मचेतना को स्वयं देखता भी है और सबको दिखाता भी है। उसका मार्ग अति कठिन है। दुर्गम ही नहीं, अगम है। सन्त दु:साहसी, विपरीत धारा के तैराक होते हैं। युगों युगों की अन्धकार-काराओं को अन्तर के प्रकाश से आलोकित करने वाले प्रकाश-स्तम्भ हैं। सन्त मरजीवड़े हैं। मृत्यु के मुख से अमरता की मणि को जबरन निकालकर अपनी सिर-मुकुट में मणि के जैसा बना लेते हैं। 

कलि श्यानों भवति संजिहानस्तु द्वापर:।
उतिष्ठंस्त्रोता भवति कृतं संपद्यते चरन॥
चरैवेति। चरैवेति। -(ऐतरेय ब्राह्मण)


अर्थात् कलयुग का अर्थ है सोए होना। जग जाना द्वापर है। उठकर खड़े हो जाना त्रोता है। और चल देना कृतयुग-सतयुग है। अत: व्यक्ति, देश जाति को जागृत होकर चलते रहना चाहिए।

परमात्मा ही जगत बने हैं, कोई कहता है-परमात्मा ने माया की सहायता से सृष्टि की है - दोनों में सही क्या है ? सनत सुजात महर्षि बोले -माया भी ठाकुर से भिन्न नहीं है। नाम-रूप-लीला-धाम किसी एक को पकड़ लो। नाम ही तीर्थ है, देहाभिमानी पुरुष को पाप-पुण्य दोनों का फल भोगना पड़ता है। ज्ञान होने पर संचित-क्रियमाण-प्रारब्ध तीनों कर्म नष्ट हो जाते हैं। संचित कर्म तो ठाकुर के सम्मुख होते ही नष्ट हो जाता है, क्योंकि अब वह ठाकुर से प्रेम करता है कर्म करने के बाद फल उन्हीं को समर्पित कर देता है। ठाकुर की प्रसन्नता के लिये कर्म करने और फल को समर्पित कर देने से क्रियमाण पवित्र हो जाता है।

विषयों के प्रति आसक्ति केवल ठाकुर का साक्षात्कार करने से ही नष्ट होती है। इन्द्रियाँ मन को मथ देती हैं, ठाकुर की शरण में जाना ही उपाय है। प्रारब्ध का सम्बन्ध मात्र इस शरीर से है, इसको ठाकुर के भक्त प्रसाद मानकर भोग लेते हैं। प्रारब्ध भोग मेरा अपना किया हुआ है, कुछ बाकी रह जायेगा तो फिर आना पड़ेगा। जगन्नाथ जी १५ दिन बीमार क्यों रहते हैं ? अपने भक्त के १५ दिन के भोग को उन्होंने अपने उपर ले लिया था। भक्ति तीनों प्रकार के कर्म से मुक्ति दिल देती है। जो भगवान के सिवा और कुछ नहीं चाहता, ठाकुर उसके प्रारब्ध के समय को फ़ास्ट-फॉरवर्ड करने की शक्ति दे देते हैं।
===========
  

No comments: