Sunday, June 22, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (23)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
२३.
ब्रह्मचर्य मानवजाति  का मार्गदर्शक नेता बनने की पूर्वशर्त है !

(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
[In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं।]

 
श्री श्री माँ सारदा और आप , मैं ...या कोई भी ... 


नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||


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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्
' विवेकानन्द - वचनामृत '  
२३.
प्रार्थे जीव धीमन्  त्वं परसेवापरायणः । 
जुहुयात् शरीरं कर्तुं सार्थकं नरजीवनम् ॥ 

O, intelligent one ! Live for others alone and in their service give up your body. 
हे भारत ! --हे पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता-संस्कृति में अनुप्राणित भारत ! मत भूलना कि इस समाज में ऐसी समस्यायें वर्तमान हैं जिनका अर्थ तक अभी तुम या तुम्हारे पाश्चात्य गुरु समझ नहीं पाये हैं-मीमांसा करना तो दूर की बात है ! केवल दूसरों का कल्याण के जीना सीखो, और उनकी सेवा में अपने प्राणों को  न्योछावर कर दो !  
प्रसंग :  [ ' सामाजिक सम्मलेन भाषण' ९/ २८८ एवं विवेकानन्द चरित- पृष्ठ २९२ (THE SOCIAL CONFERENCE ADDRESS Volume 4,Writings: Prose गृहस्थ शिष्य डॉ. नंजुन्दा राव को   ३० नवम्बर १८९४ का पत्र ]
विषयवस्तु : [ १९०० ई० के लाहौर-सम्मेलन के सभापति के रूप में जस्टिस श्री रानाडे ने जो भाषण पढ़ा था उसे आपत्ति-जनक मानकर स्वामीजी  उसका निर्भीक प्रतिवाद करते हुए ' प्रबुद्ध भारत ' में  ' सामाजिक सभा में जस्टिस श्री रानाडे के भाषण की समालोचना ' एक निबन्ध लिखा था ।] बंगाल के ब्राह्म समाज-सुधारकों की ही तरह जस्टिस श्री रानाडे [ महादेव गोविन्द रानाडे १८४२ -१९०१]  संन्यासाश्रम के विरोधी थे और मौका देखते ही वे संन्यासियों पर आक्षेप किया करते थे। भाषण के प्रारम्भ में ही श्री रानाडे ने कहा कि वैदिक युग में संन्यासी सम्प्रदाय नहीं था, अतः स्त्री-पुरुष सभी स्वतन्त्रता (?) का उपभोग करते थे। उस समय  विवाहित ऋषिगण समाज के नेता व धर्माचार्य होते थे। कठोर संयम का पालन धर्मसाधना का आवश्यक अंग नहीं था; अतः मानव-जीवन की मधुरता का सभी लोग परिपूर्ण तृप्ति के साथ उपभोग कर सकते थे। श्री रानाडे का मत इस प्रकार का था -
१. सिक्ख धर्म के प्रवर्तक आचार्यगण भी विवाहित थे। अतः हमें भी विवाहित आचार्यों का एक दल संगठित करना होगा। असम्पूर्ण जीवनवाले संन्यासी आचार्य वैदिक युग में नहीं थे व् अभी भी नहीं रहने चाहिये 
२. आर्य समाज के निर्माता स्वामी दयानन्द सरस्वती संन्यासी थे। इसलिए इस समाज को संन्यासी आचार्य के स्थान पर गृहस्थ आचार्यों का निर्माण करना चाहिये। 
३.  उनका तर्क यह था कि परमात्मा ने हमें सभी इन्द्रियाँ किसी न किसी उपयोग के लिये ही दीं हैं; और  ' संन्यासी अगर वंशवृद्धि नहीं कर रहे हैं,' तो वे अन्याय कर रहे हैं- वे पलायनवादी हैं।"
उनके इन कुतर्कों का प्रतिवाद करते हुए स्वामीजी ने ' सामाजिक सम्मलेन भाषण' ९/ २८८ एवं विवेकानन्द चरित- पृष्ठ २९२ में लिखा है -
(क.) स्मरणातीत काल से जगत के प्रत्येक संप्रदाय में सर्वत्यागी संन्यासियों ने ही समाज का सिरमौर रहकर जाति को उन्नति के मार्ग में परिचालित किया है। संन्यासियों की कठोर संयत जीवन-यापन प्रणाली तथा भोग-वितृष्णा ने युग युग में कितने ही मनुष्यों को इन्द्रिय-भोगों की उच्छृंखल लालसा को संयमित रखने के लिये अनुप्रेरित किया है। भारतवर्ष में जो कुछ भी उदार भाव, प्राणप्रद, वीर्यप्रद तथा उच्च चिन्तन है उनका अधिकांश संन्यासियों के ब्रह्मचर्य द्वारा पुष्ट मस्तिष्कों से ही निसृत हुआ है। भारत के प्राचीन और आधुनिक इतिहास में संन्यासियों की इस निःस्वार्थ चेष्टा की महिमामय कहानियाँ स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं।'
प्रत्येक ज्ञात धर्म में संन्यासी होते रहे हैं । हिन्दू संन्यासी हैं, बौद्ध संन्यासी हैं, ईसाई पादरी हैं और इस्लाम को भी अपनी इस प्रथा की कठोर अस्वीकृति छोड़नी पड़ी और भिक्षु, फ़क़ीरों या संन्यासियों की एक सम्पूर्ण श्रृंखला स्वीकार करनी पड़ी। सम्पूर्ण मुण्डित, आंशिक मुण्डित, दीर्घकेशी, अल्पकेशी, जटाधारी और विविध अन्य रुक्ष बालों वाले संन्यासियों की कोटियाँ हैं। दिगम्बर हैं, श्वेताम्बरी हैं, पीताम्बरधारी हैं, चीथड़े लपेटने वाले हैं, गेरुआधारी हैं, काले वस्त्रधारी ईसाई हैं, और नीलाम्बरधारी मुसलमान फ़कीर हैं। प्राचीन काल में प्रत्येक देश में सैनिक वृत्ति के संन्यासी भी होते थे। 
श्री रानाडे भी समाज पर तथा जाति की विचारधारा पर इन सर्वत्यागी सन्यासियों के अमोघ प्रभाव को अस्वीकार नहीं कर सके; फिर भी उन्होंने कहा कि हमारे ' हमारे अविवाहित आचार्यगण किसी नवीन संन्यासी-सम्प्रदाय की स्थापना न करें, क्योंकि उनके पास जीवन की विविध प्रकार की अभिज्ञताओं का रसास्वादन करने का अनुभव ही नहीं है।' त्याग-वैराग्य की ऐसी ही अभिव्यक्तियों में समानान्तर रूप से स्त्रियों में भी -सन्यासिनियाँ हुआ करती थीं । प्राचीन कुमारी ब्रह्मवादिनियाँ,  दूसरे राजदरबार में दार्शनिकों को चुनौती देती घूमती थीं, श्री रानाडे को विधाता की केंद्रीय योजना - ' वंशविस्तार'  को बाधित करती नहीं जान पड़ीं, अतः हम भी प्राचीन तपस्विनियों और उनकी वर्तमान उत्तराधिकारिनियों को परीक्षा में उत्तीर्ण हुई मानकर छोड़ देते हैं । मुख्य अपराधी केवल पुरुष संन्यासियों को ही श्री रानाडे की आलोचना की सारी चोट बरदास्त करनी पड़ती है। आओ, देखें - वह इस चोट से उबर पाता है या नहीं!
(१.) संन्यासी गुरु (निवृत्ति-मार्ग के सप्तऋषि) व् गृहस्थ गुरु (आकाश में दिखने वाले प्रवृत्तिमार्गी  सप्तर्षि मण्डल) - कुमार ब्रह्मचारी व् विवाहित धर्माचार्य दोनों प्रकार के आचार्य उतने ही प्राचीन हैं, जितने वेद। इस समय यह निश्चित करना कठिन है कि पहले सब प्रकार के अनुभव से युक्त सोमपायी विवाहित ऋषि का आविर्भाव हुआ था अथवा मानव-अनुभव से शून्य ब्रह्मचारी ऋषि ही इस परम्परा का आदिम रूप था? जब तक अंग्रेजों के अनुयायी इसका कोई उत्तर न दे हमारे लिये तो पहले अण्डा हुआ या मुर्गी?  जैसी पुरानी पहेली ही बनी रहेगी। पर उत्पत्ति-क्रम कुछ भी हो, श्रुतियों और स्मृतियों के ब्रह्मचारी गुरु  गृहस्थ गुरुओं से सर्वथा पृथक धरातल पर थे; और यह पार्थक्य था पूर्ण पवित्रता का, ब्रह्मचर्य का ! और इसीलिये वे उपनिषदों के वक्ता तथा ब्रह्मज्ञान के अधिकारी हुए । 
 (२.) परमात्मा ने हमें सभी इन्द्रियाँ किसी न किसी उपयोग के लिये ही दीं हैं; और ' संन्यासी अगर वंशवृद्धि नहीं कर रहे हैं,' तो वे अन्याय कर रहे हैं। और इसी तर्क को आधार बनाकर, सबसे पहले प्रोटेस्टेन्ट सम्प्रदाय ने जो आरोप  संन्यासी सम्प्रदाय के उपर यूरोप में लगाया था, " कि संन्यासी अपने ब्रह्मचर्य के कारण जीवन की परिपूर्ण और विविध अनुभूतियों से वंचित रह जाता है। " उसी आरोप को बाद में बंगाल के ब्रह्मसमाजी समाज-सुधारकों ने उनसे उधार ले लिया था। और अब हमारे बम्बई के बन्धु उसी की हाँ में हाँ मिलते हुए कहते हैं कि -' संन्यासी अगर वंशवृद्धि नहीं कर रहे हैं, तो वे अन्याय कर रहे हैं - वे पापी हैं। बहुत अच्छा, तब तो ईश्वर ने मनुष्य को -काम, क्रोध, चोरी-डकैती, ठगी आदि कई प्रवृत्तियाँ भी दीं हैं; -इनके बारे में क्या किया जाय ? क्या इन्हें भी पूर्ण प्रवेग से प्रचलित रहने देना चाहिये? 
क्या हमें भी प्रवृति-मार्गी गृहस्थ गुरुओं के नारि-जाति सम्बन्धी ' परिपूर्ण और व्यापक अनुभव ' का अनुगमन करना होगा ? क्योंकि विवाहित ऋषियों में से अधिकांश जब कभी और जहाँ कहीं सम्भव हुआ, तब वहाँ बच्चे उत्पन्न करने में उतने ही प्रख्यात थे, जितने प्रसिद्द वे ऋचा-गान और सोमपान के लिये थे। अथवा हमें निवृत्ति-मार्गी सप्तर्षियों का अनुगमन करना चाहिये, जो ब्रह्मचर्य को आध्यात्मिकता की अनिवार्य आवश्यकता मानते थे ? प्रोटेस्टेन्ट ईसाई या वर्तमान लेफ्टिस्ट लोग यह क्यों नहीं देख पाते कि इन्हीं संन्यासी और संयासिनियों ने ही अधिकांश ऐसे बच्चों का पालन-पोषण और शिक्षण दिया है, जिनके माता-पिता, विवाहित होते हुए भी, 'जीवन के सर्वांगीण अनुभव ' का स्वाद लेने के सर्वथा अनिच्छुक थे।
(३.) किन्तु श्री रानाडे ने भविष्य के भारत का निर्माण करने के लिये संन्यासियों की अनिवार्यता को सम्पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया, और आशा प्रकट की है कि भारत ने जब गृहस्थ आचार्यों के रूप में -प्राचीन काल में अगस्त्य, अत्रि, वसिष्ठ आदि ऋषियों की तरह -वर्तमान काल में भी 'डॉ. भण्डाकर, दि.ब. रघुनाथ राव, महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर, आचार्य केशवचन्द्र सेन, बाबू प्रतापचन्द्र मजूमदार, तथा पं.शिवनाथ शास्त्री, लाला हंसराज, आदि ऋषियों को प्राप्त किया है, तो इनके आदर्श जीवन और उपदेशों का अनुसरण करते हुए चलने से ही भारत की उन्नति सम्भव हो सकती है। 
(४.) दूसरी ओर स्वामीजी को इस बात पर जरा भी विश्वास नहीं था कि इन सब आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करने वाले, और उनकी सभ्यता-संस्कृति से प्रभावित गृहस्थ आचार्यों या ऋषियों के द्वारा भारत की कोई भी स्थायी उन्नति कभी हुई है, और भविष्य में भी निवृत्ति मार्गी ऋषियों के निर्देशन में चले बिना कभी हो सकती है। इसीलिये उन्होंने कम से कम एक सहस्र शक्तिमान चरित्रवान तथा बुद्धिमान संन्यासी-प्रचारकों को तैयार करने का संकल्प लिया था-जो आचार्य (मानवजाती के मार्गदर्शक नेता) बनकर समग्र भारत का भ्रमण करते हुए - मुक्ति,सेवा, सामाजिक जीवन के उन्नततर आदर्श 'समता' या 'आत्मवत सर्वभूतेषु ' के सन्देश का द्वार द्वार पर प्रचार करने के साथ साथ उन्हें उन्हें लौकिक और अर्थकरी विद्या की शिक्षा भी देंगे। उनके मत में संन्यासी आचार्यों की अवनति के साथ भारत की दुर्दशा का इतिहास अंगांगी रूप से मिला हुआ है। अतः भावी भारत के उद्बोधन के लिये सर्वप्रथम समाज के मार्गदर्शक नेता, नियन्ता और राष्ट्र के चालक के रूप में ' ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य' में दीक्षित एक दल के रूप में शक्तिशाली आचार्यों की आवश्यकता है। और इनमें से प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह ऊपर से गृहस्थ ही क्यों न हो, भीतर से सर्वत्यागी संन्यासी होगा ! 
(५.) सन्यास के उच्चतम आदर्श को धारण करने में असमर्थ होकर किसी किसी ने त्यागपूत पवित्र गैरिक वस्त्र को कलंकित किया है। इस प्रकार के दृष्टान्त विरले नहीं हैं, किन्तु खेद की बात है कि ये पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता-संस्कृति से प्रभावित समाज-सुधारकगण या आधुनकि युग में लेफ्टिस्ट कहे जाने वाले लोग, कुछ आशाराम जैसे दुर्बल तथा असतप्रकृति संन्यासियों या कथावाचकों का उदहारण देकर तमाम संन्यासियों और यहाँ तक कि 'संन्यास-आश्रम' पर ही अनुचित आक्रमण करने में नहीं हिचकते। संन्यास के कठिन मार्ग पर चलते हुए यदि किसी का कभी पैर फिसल जाय -फिर भी वह एक साधारण गृहस्थ से सौ गुना उच्च व् श्रेष्ठ है - क्योंकि कहावत है-'गिरते हैं सहसवार ही मैदाने जंग में'। क्योंकि ' प्रेम ' न करने से कहीं अच्छा है, 'प्रेम' करके भी प्रेमी में प्रेमास्पद को न ढूंढ़ पाना ! ' आशिक है; तो मासूक को हर रूप में पहचान ! यह चुनौती स्वीकार करना आसान नहीं है। जिसने कभी उन्नत जीवन प्राप्त करने की चेष्टा ही नहीं की उस कापुरुष की तुलना में तो वह -संन्यासी (महामण्डल नेता का प्रशिक्षु-JP) वीर ही है। 
(६.) हमारे तथाकथित समाज-सुधारकों या आधुनिक लेफ्टिस्टों की भीतर की बातों की, उनके आन्तरिक जीवन की यदि भलीभाँति खबर ली जाय, तो संन्यासी व् गृहस्थों के बीच प्रतिशत भ्रष्टों की संख्या कितनी है इसकी गिनती देवताओं को भी ध्यान से करनी होगी। जबकि देवता हमारे सभी कार्यों का बारीक़ से बारीक़ हिसाब रख रहे हैं, वे तो हमारे हृदय में ही हैं; परन्तु इधर संन्यासी को देखो -यह एक अद्भुत अभिज्ञता है। अकेला खड़ा है -किसी से कुछ सहायता नहीं चाहता-जीवन में सैकड़ों मुसीबतें आ रही हैं, छाती खोलकर सब का सामना कर रहा है- काम कर रहा है, किसी पुरस्कार की आशा नहीं- यहाँ तक कि कर्तव्य के नाम पर मन-मसोस कर करने का सदा-गला साधारण भाव भी नहीं है। सारे जीवन भर काम चल रहा है, आनन्द के साथ स्वाधीन भाव से काम चल रहा है- क्योंकि, उसे कृतदासों की तरह जूते की ठोकर खा खा कर काम नहीं करना पड़ रहा है-अथवा उसकी निःस्वार्थ सेवा " Be and Make" के मूल में लेफ्टिस्टों वाला दिखावटी मानवप्रेम अथवा उच्च आकांक्षा (नाम-यश की कामना) भी नहीं है। 
(ख) हिन्दू अपनी माँ के दूध के साथ ही यह धारणा ग्रहण कर लेता है कि ' यह जीवन कुछ नहीं है, एक स्वप्न है! ' After all, this world is series of pictures.' इसके माध्यम से मनुष्य पूर्णत्व की प्राप्ति करने के लिये अग्रसर हो रहा है। पर पाश्चात्य लोग इस जीवन के परे नहीं देखते और उनका निष्कर्ष चार्वाक का निष्कर्ष है -बहती गंगा में हाथ धो लेना। ' यह संसार तो दुःख-सागर है, तो फिर सुख के जो भी अंश उपलब्ध हों, उनका भरपूर उपभोग कर लिया जाय। ' इसके विपरीत हिन्दू की दृष्टि में केवल ईश्वर और आत्मा ही सत्य हैं, इस दृष्टिगोचर जगत से अनन्त गुना अधिक सत्य; और इसीलिये वह परमसत्य (ईश्वर) को प्राप्त करने के लिये, इस नश्वर संसार का त्याग करने के लिये सदैव तत्पर रहता है। अतः " जितने दिन समग्र हिन्दू जाति का मनोभाव इस प्रकार रहेगा-और हम श्री भगवान से यह प्रार्थना करते हैं कि यही भाव चिरकाल तक स्थायी रहे -तब तक हमारे देश के आंग्लिकृत या पाश्चात्य सभ्यता की नकल करने वाले समाज-सुधारक बन्धु, क्या भारतीय स्त्री-पुरुषों को ' आत्मनो मोक्षार्थं जग-द्धिताय च ' (या Be and Make) के लिये सर्वस्व त्याग देने की प्रवृति के समाप्त हो जाने की आशा रख सकते हैं? " 
जिनके महावाक्यों को संन्यास के विशेष पक्षपाती जैनी तथा बौद्धों ने और उसके बाद आचार्य शंकर, रामानुज, कबीर, चैतन्य तक ने आकण्ठ पान करके अद्भुत आध्यात्मिक तथा सामाजिक संस्कारों को चलाने की शक्ति प्राप्त की थी, और जो पाश्चात्य देशों में जाकर वहाँ से कई रूपों में रूपान्तरित होकर हमारे वर्तमान समाज-सुधारकों को संन्यासियों की समालोचना करने की शक्ति दे रहा है। यदि वेदों के कर्मकाण्ड का मूलाधार यज्ञ है, तो ज्ञानकाण्ड की आधारशिला ब्रह्मचर्य है । संन्यासियों के नीरव निःस्वार्थ प्रेममय सेवा-कार्य की तुलना में हमारा समाज-सुधारक क्या काम करता है ? पर संन्यासियों ने आत्म-विज्ञापन का आधुनिक ढंग नहीं सीखा ।
(घ) यह केवल संन्यासी में ही सम्भव है, धर्म के विषय में क्या सोचते हो ? वह रहना चाहिये या बिल्कुल ही लुप्त हो जाना चाहिये ? यदि यू.पी. में चलने वाले अपराध से बचना चाहते हो तो धर्म साधना में विशेष रूप से अभिज्ञ एक दल मार्गदर्शक नेताओं या आचार्यों की आवश्यकता है -धर्मयुद्ध के लिये योद्धा की आवश्यकता है। संन्यासी ही धर्म के विशेष रूप से अभिज्ञ व्यक्ति हैं, क्योंकि उन्होंने धर्म-प्रचार को ही अपने जीवन का मूल लक्ष्य बनाया है। वे ही ईश्वर के सैनिक हैं। जब तक एक  एकनिष्ठ संन्यासियों का सम्प्रदाय जीवित है, तब तक धर्म के विनाश का भय कैसा ? 
" प्रोटेस्टेन्ट इंग्लैण्ड व् अमेरिका, कैथोलिक सन्यासियों के प्रबल प्लावन से कम्पित क्यों हो रहे हैं ?"
 " जीवित रहे रानाडे तथा समाज सुधारकों का दल या आधुनिक लेफ्टिस्ट ! परन्तु हे भारत ! --हे पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता-संस्कृति में अनुप्राणित भारत ! मत भूलना कि इस समाज में ऐसी समस्यायें वर्तमान हैं जिनका अर्थ तक अभी तुम या तुम्हारे पाश्चात्य गुरु समझ नहीं पाये हैं-मीमांसा करना तो दूर की बात है ! " 
भगवान ने गीता में एक वादा किया है- ' संभवामि युगे युगे!' उसी प्रकार माँ दुर्गा ने भी दुर्गा-सप्तशती में वादा किया है-
“ॐ इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
                        तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्ॐ।।” (अ॰११, श्लो॰५५)
देवी ने स्वयं ही कहा है कि जब-जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब-तब अवतार लेकर मैं शत्रुओं का संहार करूंगी। अर्थात हर युग में भारत की स्त्रियों के ह्रदय दुष्ट दलन तथा धर्मस्थापना के लिए देवी दुर्गा स्वयं अवतीर्ण होती हैं! 
इसीको कहते हैं- ' ऐतिहासिक अनिवार्यता। ' जिस समय धर्म अपने स्थान से च्युत हो जाता है, स्त्रियों-पुरुषों में समान रूप से इसी प्रकार के एक आविर्भाव की आवश्यकता होती है। प्रबुद्ध भारत-वासी यह जानते हैं कि इतिहास यात्रा के घूर्णन पथ में इस तरह की अनिवार्यता बार बार दृष्टिगोचर हुई है। जिस समय धर्म अपने स्थान से च्युत हो जाता है, अधर्म का सिर ऊँचा उठ जाता है, उस समय धर्म को पुनः स्थापित करने के लिये एक महान आविर्भाव अनिवार्यता बन जाती है। वह चाहे किसी अवतार के द्वारा हो या जैसे भी हो, एक विशिष्ट भाव मूर्तमान होता अवश्य है।
इस युग में श्रीरामकृष्ण परमहंस के भीतर वही भाव मूर्तमान हुआ है। हमारी दृष्टि में श्रीरामकृष्ण ही प्रथम युवा नेता-'युवा ह्रदय सम्राट हैं।' वे सच्चे जननेता हैं, मानवप्रेमी हैं- जो मानवमात्र को ह्रदय से प्रेम करते हैं, जिनके जीवन में पूर्ण साम्य प्रतिष्ठित हुआ है! समस्त मानव जाति, समस्त जीवों यहाँ तक कि जड़ वस्तुओं के साथ भी उन्होंने अभिन्नता का साक्षात्कार किया है! उनके जीवन में प्रतिष्ठित पूर्ण साम्य लेफ्टिस्टों के मंच पर खड़े होकर भाषण देने वाला दिखावटी 'साम्यवाद' नहीं है; अपितु उन्होंने इसे अपने आचरण में उतारकर दिखा दिया है। उन्होंने इन्हीं जन-साधारण दीन-दुःखियों के दारुण वेदना का अनुभव अपने ह्रदय में करके , मानवमात्र को दुःख-कष्ट से मुक्त करने का प्रयास किया है, उन्हें संगठित करने की चेष्टा है। इस तथ्य को समझने के लिये श्रीरामकृष्ण परमहंस के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द के विचारों को गहराई से समझने की आवश्यकता है। 
स्वामीजी कहते हैं, ' मेरे गुरुदेव (श्रीरामकृष्ण) आज भी युवाओं को संगठित करने की चेष्टा कर रहे हैं, वैसे तो वे सभी लोगों को अनुप्रेरित कर रहे हैं, किन्तु युवाओं को अधिक संख्या में आकर्षित कर रहे हैं। उनका लक्ष्य विशेषकर युवाओं को आकर्षित करना था। स्वामी विवेकानन्द स्वयं इस बात के प्रमाण हैं, और इसको स्वीकार भी करते हैं। उनके जीवन को पढ़कर हम भी इसे देख सकते हैं। ठाकुर (परमहंस जी) ने स्पष्ट रूप से यह अनुभव किया था कि मेरे अति अल्प जीवन काल में मैं जितना सकता था, कर दिया किन्तु उसके बाद जो वास्तविक कार्य है, वह यही है कि बहुत अल्प समय के भीतर कुछ युवाओं के जीवन को इस प्रकार से गठित कर देना होगा कि वे इस भाव को थोड़े समय में ही सम्पूर्ण जगत में दावानल की तरह फैला देने में सक्षम हो जायें। और इसी कार्य के लिये उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में 'ब्रह्मतेज और क्षत्रवीर्य ' में दीक्षित युवा आचार्यों के एक दल को संगठित किया है- जिसमें ब्रह्मचारी आचार्य (जन्मजात निवृत्ति-मार्गी स्वामी विवेकानन्द) और विवाहित युवा आचार्य ( प्रवृत्ति
मार्ग का त्याग करके संन्यासी वेश धारण करने वाले स्वामी ब्रह्मानन्द) भी थे।  
और वैसा करने के बाद अवतारवरिष्ठ श्रीरामकृष्ण ने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया था, तथा उनके श्रेष्ठ शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने भी अपने गुरु द्वारा सौंपे हुए कार्य को मात्र ७ वर्षों के भीतर प्राच्य से पाश्चात्य तक फैला कर दिखा दिया था। स्वामी जी ने अपने जीवन के उद्देश्य के विषय में अनेक स्थानों पर अनेक प्रकार से कहा है। एक स्थान पर वे कहते हैं- " मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य युवाओं को संगठित करना है।" 
किन्तु आजीवन युवक दल को संगठित करने का प्रयास करने के बाद भी स्वामी विवेकानन्द स्वयं केवल मुट्ठीभर युवक-युवतियों को ही श्रीरामकृष्ण की पताका के नीचे एकत्रित कर सके थे। किन्तु स्वामी जी ने उसी समय ' लीडरशिप ट्रेनिंग ' या मानवजाति के मार्गदर्शक नेताओं को प्रशिक्षण देने की अनिवार्यता को समझ लिया था। तथा महामण्डल के युवा प्रशिक्षण शिविर की भविष्यवाणी करते हुए, अपने गृहस्थ शिष्य डॉ. नंजुन्दा राव को ३० नवम्बर १८९४ को एक पत्र में लिखा था -" मैं जानता हूँ और ठीक जानता हूँ कि बड़े बड़े काम बिना बड़े स्वार्थ-त्याग के नहीं हो सकते। मैं अच्छी तरह जानता हूँ, भारत-माता अपनी उन्नति के लिये अपनी श्रेष्ठ सन्तानों की बलि चाहती है, और मेरी आन्तरिक अभिलाषा है कि तुम उन्हींमें से एक सौभाग्यशाली होगे। मेरी राय में तुम्हें कुछ दिनों के लिये ब्रह्मचारी बनकर रहना चाहिये। अर्थात कुछ काल के लिये स्त्री-संग छोड़कर अपने पिता के घर में ही रहो; यही 'कुटीचक अवस्था' है। संसार की हित-कामना लिये अपने महान स्वार्थ-त्याग के संबन्ध में अपनी पत्नी (मोदी-जशोदा बेन) को सहमत करने की चेष्टा करो। अगर तुममें ज्वलन्त विश्वास, सभी को जीतने वाला- प्रेम और सर्वशक्तिमयी पवित्रता है, तो तुम्हारे शीघ्र सफल होने में कुछ भी सन्देह नहीं। भारत चिरकाल से दुःख सह रहा है; सनातन धर्म दीर्घकाल से अत्याचार पीड़ित है। परन्तु ईश्वर दयामय है। वह फिर अपनी सन्तानों के परित्राण के लिये आया है, पुनः पतित भारत को उठने का अवसर प्राप्त हुआ है। भारत का उत्थान श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठने से ही हो सकता है ! 
उनकी जीवनी एवं उनकी शिक्षाओं को चारों ओर फैलाना होगा, हिन्दू समाज के रोम रोम में उन्हें भरना होगा। यह कौन करेगा ? श्रीरामकृष्ण की पताका हाथ में लेकर संसार की मुक्ति के लिये अभियान करने वाला है कोई ? 
 " A few young men have jumped in the breach, have sacrificed themselves. They are a few; we want a few thousands of such as they, and they will come." 
--कुछ गिने-चुने युवकों ने  इस कार्य में अपने को झोंक दिया है, अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया है। परन्तु इनकी संख्या थोड़ी है। हम चाहते हैं कि ऐसे ही कई हजार युवक और युवतियाँ आयें; और मैं जानता हूँ कि वे आयेंगे !!"  
यही जो भविष्यवाणी है - 'and they will come.' - वैसे युवा कहाँ से आयेंगे ? वैसे युवा दल तो रामकृष्ण मिशन के माध्यम से भी संगठित हो सकते थे; किन्तु, जो युवा रामकृष्ण मिशन में अपना योगदान करेंगे, उनके जीवन का व्रत होगा -'आत्मनो मोक्षार्थं जग-द्धिताय च।' किन्तु कितने युवा ऐसे हैं जो मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं ? और इसी कारण वैसे अधिकांश युवा जिन्हें स्वामीजी
श्रीरामकृष्ण की पताकाके नीचे एकत्रित करना चाहते थे, वे युवा तो इस भवान्दोलन के बाहर ही छूट जायेंगे। स्वामीजी ने यह भी कहा था कि उनकी दृष्टि में अच्छा-बुरा, आस्तिक या नास्तिक, गृहस्थ या संन्यासी कहकर वहिष्कार कर देने लायक कोई भी मनुष्य नहीं है। 

सभी तरह के लोगों को अंगीकार करना होगा। और यह जो सबको स्वीकार करते हुए, प्राथमिक रूप से स्वामी जी की शिक्षाओं को सुनाने का काम है- इस काम को कौन करेगा ? दावानल की तरह कोने कोने में सर्वत्र जा-जाकर ग्रामों, शहरों, शिक्षितों, अशिक्षितों, छात्रों, नौकरी करने वालों, व्यवसाय करने वालों, बेरोजगारों -समस्त युवाओं के पास स्वामी जी उपदेशों को लेकर जायेगा कौन ? जिनको धर्म, मन्दिर, मठ तथा संन्यासी की तस्वीर भी देखने को नहीं मिलती उन्हें सुनायेगा कौन ? केवल सुनायेगा ही नहीं, उन्हें स्वामी जी की शिक्षाओं से प्रभावित करके- मानवजाती के मार्गदर्शक नेता के रूप में समग्र भारत का भ्रमण करते हुए - मुक्ति,सेवा, सामाजिक जीवन के उन्नततर आदर्श 'बनो और बनाओ' के सन्देश को द्वार द्वार पर प्रचार करने के आन्दोलन में खींचेगा कौन ? क्योंकि कार्य में उतरने से ही तो अपना चरित्र गठित होगा, देश की उन्नति होगी !  
 इसी प्राथमिक कार्य को करने जिम्मेदारी को, युवाओं को 'चरित्र-निर्माण का प्रशिक्षण'  देने के उत्तरदायित्व को -- आगे बढ़ कर महामण्डल ने स्वयं चुन लिया है। इसीलिये बार-बार कहा जाता है कि महामण्डल एक प्राथमिक पाठशाला है, जहाँ 'मनुष्य जीवन ' को प्राप्त करने का अ-आ, क-ख सीखा जाता है। अ-आ, क-ख समाप्त कर लेने के बाद जो लोग आध्यात्मिक जीवन में उन्नत होना चाहेंगे उनके लिये उच्च विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि तो हैं ही। शाश्वत जीवन  पाने के अनेक मार्ग हैं, जो जिस मार्ग से होकर शाश्वत जीवन (अमरत्व) प्राप्त करने के अभिलाषी हों, उसी मार्ग से आगे जा सकते हैं ! स्वामी जी की कल्पना के अनुसार 'रामकृष्ण मठ और मिशन' इसी प्रकार का एक विश्वविद्यालय है। किन्तु उसमें प्रवेश-परीक्षा देने के लिये 'मनुष्य जीवन एवं चरित्र ' की वर्णमाला से युवाओं का परिचय कराने का कार्य ही महामण्डल का उद्देश्य है। 
 अपने कल्याण के लिये और भारत के कल्याण के लिये इसी एकमात्र उद्देश्य को पूरा करने के लिये महामण्डल का आविर्भाव हुआ है। महामण्डल का आदर्शवाक्य है ' Be and Make !" - ` तुम स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता करो। ' स्वामी विवेकानन्द द्वारा युवाओं को सौंपे गये इसी आदर्श को सर्वव्यापी बना देना महामण्डल आन्दोलन का लक्ष्य है। क्योंकि देश में जब तक सच्चे और निःस्वार्थी मनुष्यों का अभाव रहेगा, तब तक कोई भी पंचवर्षीय योजना या म.न.रे.गा आदि योजना सफल नहीं हो सकती है। 
भारत को उसकी नींद से जगाना होगा, किन्तु उसे कोसते हुए नहीं, बल्कि उसको जगाना होगा प्राणप्रद, जीवनप्रद, आशाप्रद, शक्तिप्रद, कर्म-दक्षताप्रद - वेदान्त के महावाक्यों को सुना-सुना कर, तथा केवल उन महावाक्यों का श्रवण ही नहीं, अपितु मनन एवं निदिध्यासन के लिये भी उत्प्रेरित करके।  उसको आदर से पुकारते हुए कहना होगा -[ O, intelligent one ! O=हे, intelligent one != भारत]  हे भारत ! केवल दूसरों का कल्याण के लिये जीना सीखो, और उनकी सेवा में अपने प्राणों को  न्योछावर कर दो ! 
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'कुटीचक अवस्था' : आश्रमोपनिषद् में चार प्रकार के संन्यासी कहे गये हैं, - कुटीचक, बहूदक, हंस , परमहंस (परमहंस के दो प्रकार – विद्वतपरमहंस , विविदिशु- जो हर तरफ देश-विदेश में घूम कर लोगों को मोह निद्रा से जगाने में समर्थ अधिकारी हो। ) । 'अवस्था' शब्द को एक संकेत के रूप में समझना चाहिये। जिस प्रकार शास्त्रों में कई कई बार आत्मा को जीवात्मा और परमात्मा आदि के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। यह तो विदित ही है कि नेति नेति करते हुए तुरीयावस्था में पहुँचा जा सकता है।
'तुरीयावस्था का अनुभव' मुहुर्मुहु करने के कारण ही प्रथम युवा नेता श्रीरामकृष्ण के जीवन में  पूर्ण साम्य प्रतिष्ठित हुआ है ! समस्त मानव जाति, समस्त जीवों यहाँ तक कि जड़ वस्तुओं के साथ भी उन्होंने अभिन्नता का साक्षात्कार किया है! उन्होंने इन्हीं जन-साधारण दीन-दुःखियों के दारुण वेदना का अनुभव अपने ह्रदय में करके , मानवमात्र को दुःख-कष्ट से मुक्त करने का प्रयास किया है, उन्हें संगठित करने की चेष्टा है। तभी तो वे स्वामी विवेकानन्द सदृश्य प्रखर-मेधासम्पन्न युवाओं के ह्रदय सम्राट बन सके थे ! महामण्डल के प्रत्येक नेता  ' intelligent one !' या भारत को भी मनःसंयोग (यम्, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा,ध्यान, समाधि (अर्थात सिद्धि-तृप्ति-तुष्टि-शांति- या तुरीयावस्था।) सीखना होगा तभी वह 'Be and Make' आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम नेता बन सकता है।
सामान्य मनुष्य के चैतन्यता की तीन अवस्थायें होती हैं - १. मनुष्य जागृत होता है, २. मनुष्य  स्वप्न अवस्था में जाता है, ३. मनुष्य सुषुप्ती की अवस्था में जाता है l ये तीनो अवस्थाएं तो सभी आम मनुष्यों को भी अनुभव हो जाती हैं, लेकिन तुरीय अवस्था योग की ऐसी परम अवस्था है जिसमें, पहुँचकर मनुष्य जागृत, स्वप्न और सुषुप्ती इन तीनो से परे जाकर अपने यथार्थ स्वरुप का साक्षात्कार कर लेता है। जब घटाकाश महाकाश में लीन होता है, जब बूँद वापिस सागर में मिल जाती है उसे समाधि का सबसे उंचा स्तर कहते हैं l जीव की तुरीयावस्था भेदज्ञान शून्य शुद्धावस्था है ! इस अवस्था में भेद का लेश भी नहीं है क्योंकि भेद द्वैत में होता है! तैत्तरीय उपनिषत् में आत्मा या चैतन्य के पाँच कोशों की चर्चा की गयी प्रथम अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा आनन्दमय कोश। आनन्दमय कोश से ही आत्मा के स्वरूप की अभिव्यक्ति की गयी है यही तुरीयावस्था है। 
शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ स आत्मा स विज्ञेयः...मांडूक्य ७
' ॐ' कार- मात्रा- अ, उ, म, अर्धमात्रा अर्धचन्द्रबिन्दु. वस्तुत: तुरीयावस्था निराकार अवस्था ही है जिसे मांडूक्य उपनिषद् में अ उ म् इन तीनों को साकार- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति बताया है। और इसी ओम् के निराकार स्वरूप चौथे पाद को निराकार, तुरीयावस्था बताया है।   अद्वैत वेदान्त के अनुसार सर्वोच्च स्तर की जो समाधि की अवस्था होती है उसमें  जीवात्मा अपने वास्तविक रूप को पहचानता है। यह निर्विकल्प समाधी की वह अवस्था है जिसको केवल सिद्ध योगी ही अनुभव कर पाते हैं।  क्यूंकि यह अवस्था परमात्मा के ज्ञान और आनन्द का अनुभव करवाती है इसलिए युवा-नेता को तुरीय अवस्था में जाना आवश्यक हो जाता है, और परमात्मा भी तुरीय अवस्था में ही जानने का विषय है l तभी वह दूसरों का मार्गदर्शन करने में सक्षम नेता बन सकता है, तथा अन्य युवाओं को भी ऐसा नेता बनने के लिये अनुप्रेरित कर सकता है। 
तुरीयातीतोपनिषद् में इस अवस्था की व्याख्या की गई है। अवस्था- जागृती, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या।  -यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण बनता है। पूर्ण में से पूर्ण ले लेने पर पूर्ण ही शेष रहता है l अपने पिता भगवान नारायाण के पास जाकर पितामहब्रह्मा ने कहा--तुरीयातीत अवधूत का मार्ग क्या है और उनकी स्थिति कैसी होती है ?  
तब भगवान नारायण ने कहा-- अवधूत के मार्ग पर चलने वाले पुरूष दुर्लभ है, वे बहुत नहीं होते l अगर वैसा एक भी हो तो वह नित्य पवित्र, वैराग्य पूर्णमूर्ति, ज्ञानाकार और वेद पुरूष होता है, ऐसी विद्वानों की मान्यता है l ऐसा महापुरूष अपना चित्त मुझमें रखता है और मैं उसके अन्तर में स्थित रहता हूँ। वह आरम्भ में कुटीचक होता है, फिर बहूदक की श्रेणी में आता है l बहूदक से हंस बनते हैं और फिर परमहंस होते है l 
कुटीचको बहूदको हंसश्चैव तृतीयकः |
चतुर्थः परहंसश्च यो यः पश्चात् स उत्तमः ||
वे निज स्वरूपानुसन्धान से समस्त जगत-प्रपंच के रहस्य को जान जाते है। वे लौकिक और वैदिक कर्मो का पुण्य और अपुण्य का ज्ञान और अज्ञान का भी त्यागकर देते हैं l उनके लिऐ सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, मानापमान नहीं होता l वे तीनोंवासनाओं (ईषणा- लोकेषणा, वित्तेषणा, दारेषणा) सहित निन्दा-अनिन्दा, गर्व, मत्सर, दम्भ, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ,मोह, हर्ष, अमर्ष, असूया, आत्म संरक्षण की भावना को ज्ञान की आग में झोंक देते हैं और अपनी देह को ही देवालय के सदृश्य समझते है। 
वे प्रयत्न, नियम, लाभालाभ की भावना से शुन्य होते है l गौ की तरह जो कुछ मिल जाता है उसी से प्राण धारण करते है, और सब प्रकार के लालच से रहित होते है l वे विद्या, पांडित्य को प्रपञ्च समझ कर विष्ठा की तरह त्याग देते है। अपने स्वरूप को छिपाकर रखते है और इसलिये दिखलाने के लिये छोटे-बड़े की भावना को पूर्ववत् मानते रहते है। सर्वोत्कृष्ट और अद्वैत रूप की कल्पना करते है l वे मानते है कि मेरे अतिरिक्तअन्य कुछ भी नही है' ( अर्थात् मैं ही पूर्ण ब्रह्म हूँ !) वे देव और गुरूरूपी सम्पत्ति का आत्मा में उपसंहार करके न तो दुःख से दुखी होते है और न सुख से प्रसन्न होते है l वे राग से पृथक रहते है और शुभाशुभ किसी बात से कभी स्नेह नहीं रखते l उनकी सब इन्द्रियाँ उपराम को प्राप्त होती है l
वे अपने पूर्व-जीवनके आश्रम, विद्या, धर्म, प्रभाव आदि का स्मरण नही करते और वर्णाश्रम के आचारका त्याग कर देते है l उनको दिन तथा रात समान होता है, इसलिये सोते नहीं (अर्थात कभी 
असावधान नही होते ) सदा विचरण करते है l उनका देहमात्र ही अवशिष्ट रहता है l  वे सदैव उन्मत्तता से रहित होते हैं, पर बाहर से बालक, उन्मत्त अथवा पिशाच के समान बनकर एकाकी रहते है l किसी से संभाषण नही करते वरन सदैव स्वरूप के ध्यान में ही रहते है l वे निरालम्ब का अवलम्बन करके आत्मनिष्ठा के अतिरिक्त और अपने लिये भौतिक सुख पाने की इच्छा को पूर्णतः त्याग देते है l उसे इराक में ५०० यज़ीदियों को जिन्दा गाड़ देने का समाचार सुनकर बहुत पीड़ा होती है - इसीलिये इस प्रकारका तुरीयातीत अवधूत सदैव अद्वैत-निष्ठा में तत्पर रहता है और प्रणव के भाव में -अर्थात विश्व-मानवता के कल्याण में निमग्न होकर देहत्याग करता है l
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