Friday, June 20, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (21)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
 २१.
' गुरुपरम्परा या नेतृत्व-परम्परा'-- ही वेदान्त का आधार है ! 

(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
[In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं।]

 
श्री श्री माँ सारदा और आप , मैं ...या कोई भी ... 

नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||


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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्

' विवेकानन्द - वचनामृत '

२१.
परेषां वै हितार्थाय स्वदेहस्य वरं क्षयः।
जाड्यालस्यप्रसुप्तानां जीवितं यन्न तादृश्म॥ 
1.' The good live for others alone. 
  The wise man should sacrifice himself for others.'

2. 'When death is so certain, it is better to die for a good cause.' 

3. What use living a hundred years for those slumbering in inertia and laziness ? 

१. ' परोपकाराय सतां जीवितं' ' परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्' स्वामी ब्रह्मानन्द को १८९५ में लिखित पत्र के प्रमुख अंश ४/३०५
प्रिय राखाल, जय श्रीरामकृष्ण !  
यह जो सारे देश में खलबली मची हुई है, इसी के आधार पर तुम लोग चारों ओर फ़ैल जाओ अर्थात जगह जगह महामण्डल केन्द्र स्थापित करने की चेष्टा करो। विवेक-अंजन त्रैमासिक पत्रिका के विषय में क्या हुआ ? मैंने सुना था कि सही समय पर प्रकाशित नहीं हो रही है, इसको चलाने में तुमलोग इतना घबड़ा क्यों रहे हो? आगे बढ़ो ! अपनी बहादुरी तो दिखाओ। प्रिय भाई, मुक्ति नहीं मिली, तो न सही, दो-चार बार नरक ही जाना पड़े, तो हानि ही क्या है ? क्या यह बात असत्य है ? 
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः
त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः ।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)
ऐसे सन्तजन कितने हैं, अर्थात विरले हैं -- जिनके मन, वचन व कार्य पुण्यरूपी अमृत से पूर्ण हैं, और जो विभिन्न उपकारों के द्वारा त्रिभुवन में परोपकार की भावना का संचार कर, दूसरों के परमाणु तुल्य अर्थात किंचित सद्गुणों को भी पर्वतप्रमाण बढ़ाकर निरन्तर अपने हृदयों का विकास साधन करते हैं।। तुम्हें यदि मुक्ति न मिले तो कौन सा पहाड़ टूट जायगा ? मुझसे नहीं होगा-मुझसे नहीं होगा, यह कैसी बच्चों की सी बकवास ? राम राम ! `नहीं है', 'नहीं है' कहने से साँप का जहर भी उत्तर जाता है। क्या यह सत्य नहीं है ? ' मैं कुछ नहीं जानता', ' मैं कुछ भी नहीं हूँ '--ये किस प्रकार के वैराग्य और विनय हैं भाई ? मैं कहता हूँ, यह तो छद्म-वैराग्य (pseudo-renunciation) एवं बनावटी विनम्रता (mock modesty) है। 
इस प्रकार के दीन-हीन भावों को दूर करना होगा। यदि मैं नहीं जानता हूँ, तो और कौन जानता है ? पत्रिका प्रकाशन में विलम्ब का कारण यदि तुम नहीं जानते हो, तो अब तक तुमने क्या किया ? ये सब नास्तिकों की बातें हैं, अभागे घुमक्क्ड़ों की विनयशीलता है। हम सब कुछ कर सकते हैं और करेंगे; जिनका सौभाग्य है, वे गर्जना करते हुए हमारे साथ निकल आयेंगे और जो भाग्यहीन हैं, वे बिल्ली की तरह एक कोने बैठकर म्याऊँ म्याऊँ करते रहेंगे। एक महापुरुष लिखते हैं, " आपने प्रचार कार्य बहुत कर लिया, और अधिक की क्या आवश्यकता, अब आपको घर लौटकर यहाँ का कार्य संभाल लेना चाहिये।" मैं तो उनको मर्द तब जानता जब मेरे रहने के लिये कोई मठ बनवाकर मुझे बुलाते। मेरे दस वर्ष के अनुभव ने मुझे पक्का बना दिया है। केवल वेद-वेदान्त की लम्बी-चौड़ी बातें करने से कुछ होने-जाने वाला नहीं है। जिसके मन में अदम्य साहस तथा हृदय में प्यार है, वही मेरा साथी बने--मुझे और किसी की आवश्यकता नहीं है। जगन्माता की कृपा से मैं अकेला ही एक लाख के बराबर हूँ तथा स्वयं ही बीस लाख बन जाऊँगा। 
अब एक कार्य समाप्त होने से मैं निश्चिन्त हो जाता। भाई राखाल, तुम उत्साहपूर्वक उसे कर दो। वह है माता जी के लिये जमीन खरीदना। मेरे पास रूपये-पैसे मौजूद हैं। सिर्फ तुम उद्द्यम के साथ जमीन को देखकर खरीद लेना। जमीन के लिये ३-४ या ५ हजार तक लग जाय, तो कोई हर्ज नहीं है। मेरा भारत लौटना अभी अनिश्चित है। मेरे लिए जैसे यहाँ भ्रमण करना, वैसे यहाँ भी है, भेद केवल मात्र इतना ही है कि यहाँ पर पण्डितों का संग है, वहाँ मूर्खों का- यही स्वर्ग-नरक का भेद है। यहाँ के लोग मिल-जुलकर कार्य करते हैं और हम लोगों के तमाम कार्यों में तथाकथित वैराग्य यानी आलस्य है,ईर्ष्या आदि के कारण सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। 
हरमोहन बीच बीच में बहुत ही लम्बा-चौड़ा पत्र लिखते हैं, उसका आधा भी मैं नहीं समझ पाता, हालाँकि यह मेरे लिये परम लाभजनक ही है। क्योंकि उसमें अधिकांश समाचार इस प्रकार के होते हैं कि अमुक व्यक्ति अमुक की दुकान पर बैठकर मेरे विरुद्ध इस प्रकार की बातें बना रहा था, जो उनके लिये असहनीय हो गया और इसी बात पर उससे झगड़ा हो गया आदि। मेरे पक्ष के समर्थन के लिये उनको अनेक धन्यवाद। किन्तु मुझे कौन क्या कह रहा है, उसे ध्यानपूर्वक सुनने में मुख्य बाधा यही है कि
' स्वल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः – समय अत्यन्त कम है और विघ्न अनेक हैं । '
अनेकशास्त्रं बहुवेदितव्यम‌्, अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः |
यत् सारभूतं तदुपासितव्यं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्भुमध्यात् ||
ये दुनिया अनेको शास्त्रों और जानकारियों से भरी पड़ी है, लेकिन हमारे पास समय बहुत कम और विघ्न बहुत ज्यादा है।  अतः जो सारभूत है उसका ही सेवन करना चाहिए जैसे हंस जल और दूध के मिश्रण में से दूध को ग्रहण कर लेता  है।
एक ' संगठित कार्यकारिणी समिति ' की आवश्यकता है। शशि घरेलू कार्यों का प्रबंधन करे, सान्याल पैसे के मामलों और विपणन का प्रभार संभाले, तथा शरत सेक्रेटरी बने-अर्थात पत्र-व्यवहार आदि कार्य वह करता रहे। एक स्थायी केन्द्र स्थापित करो, जिस प्रकार मनमाने ढंग से तुम लोग अभी काम कर रहे हो, वैसे यादृच्छिक प्रयास (random efforts) से कोई फायदा नहीं होने वाला है, समझते हो भाई ? अखबारी शोरगुल बहुत हो चूका, अब तो कुछ करके दिखाओ। यदि कोई मठ बना सको, तब मैं समझूँगा की तुम 'हीरो' (बहादुर) हो, नहीं तो कुछ नहीं। मद्रासियों से परामर्श लेकर कार्य करना उनमें कार्य करने की महान क्षमता है। 
इस वर्ष श्रीरामकृष्ण जनमोत्स्व को इस शान के साथ सम्पन्न करो कि एक उदहारण प्रस्तुत हो सके। भोजनादि का प्रचार जितना ही कम हो सके, उतना ही अच्छा। यदि पंक्तिबद्ध होकर खड़े भक्तों के हाथों में मिट्टी के कुल्ल्हड़ों में प्रसाद वितरण करने की व्यवस्था हो तो ज्यादा अच्छा होगा। श्री रामकृष्ण देव की एक अत्यन्त संक्षिप्त जीवनी अंग्रेजी में लिखकर मैं भेज रहा हूँ। उसके हिन्दी-अनुवाद के साथ उसे छपवाकर महोत्सव में एक बुकस्टाल लगाकर बेचने की व्यवस्था रखना। मुफ्त में वितरण की हुई पुस्तकों को लोग प्रायः नहीं पढ़ते हैं, इसलिये कुछ मूल्य अवश्य रखना चाहिये। खूब धूम-धाम से महोत्सव करना।
प्रभावशाली ढंग से कार्य करने के लिये, 'सबतरफा-बुद्धि' (all-sided intellect) रहनी चाहिये। जिस किसी भी गाँव या शहर में जाओ, वहाँ श्रीरामकृष्ण (ठाकुर-माँ-स्वामीजी) के प्रति श्रद्धासम्पन्न यदि दस व्यक्ति भी मिल जायें, तो ग्यारवें तुम हुए। बस, उस शहर या गाँव का नाम आगे लिखकर वहाँ ग्यारह सदस्यों की एक 'संगठित कार्यकारिणी समिति' बनाकर 'विवेकानन्द युवा पाठचक्र' के एक केन्द्र को स्थापित कर दो। विभिन्न गाँवो और शहरों में जाकर अब तक तुमने क्या किया ? हमें धीरे धीरे 'हरि-सभाओं' और ऐसे अन्य संगठनों (तिलैया में निखिल बोंगो) को आत्मसात (absorb) कर लेना चाहिये ! .… तुम भगवान  हो, मैं भगवान हूँ, प्रत्येक मनुष्य ही भगवान है। यही वह भगवान है, जो स्वयं को मानव के रूप में प्रकट करके दुनिया में सब कुछ कर रहा है। क्या मनुष्य से इतर कोई अन्य भगवान भी है, जो किसी गुफा में बैठकर तुम्हारे द्वारा खीर-जलेबी चढ़ाये जाने की प्रतीक्षा में बैठा हुआ है ? अतः कार्य संलग्न हो जाओ।
 'if I could but get another demon like me!'- ठीक है, इस समय सभी बातों (समस्त भावी-
योजनाओं) का खुलासा नहीं कर सकता; काश कि मुझे अपने ही जैसा एक दूसरा भूत भी मिल जाता ! समय आने पर ठाकुर मेरी की समस्त आवश्यकताओं की आपूर्ति अवश्य करेंगे;.... महामण्डल कार्य को हिन्दी भाषी प्रदेशों में फैला देने के लिये - मेरे जैसा कोई दूसरा भूत अवश्य जुटा देंगे !! यदि किसी को आध्यात्मिक-शक्ति प्राप्त हो गयी हो, तो उसे उस शक्ति को अपने क्रियाकलापों के माध्यम से अवश्य प्रकट करनी चाहिए. ... मुक्ति-भक्ति के लिये अश्रुपात करने वाली मूर्खताओं को त्याग दो !
' परोपकाराय सतां जीवितं' ' परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्' — "The good live for others alone", "The wise man should sacrifice himself for others". 'सत्पुरुषों का जीवन (जो उसे दुबारा मिला है) परोपकार के लिए ही होता है।' 'स्थितप्रज्ञ मनुष्य को दूसरों के कल्याण के निमित्त अपना जीवन न्योछावर कर देना चाहिये।'    
धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
तन्निमित्तो वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥
 
जब एक न एक दिन धन और जीवन का विनाश निश्चित है, इसलिये समझदार मनुष्य को, दूसरों के कल्याण के निमित्त अपने धन और जीवन का उत्सर्ग कर देना चाहिये।
रत्नाकरः किं कुरुते स्वरत्नैः
विन्ध्याचलः किं करिभिः करोति ।
श्रीखण्डखण्डै र्मलयाचलः किं
परोपकाराय सतां जीवितं  ॥  
समंदर को अपने रत्नों का क्या उपयोग ? विंध्याचल को उसके हाथीयों का क्या काम ? मलयाचल पर्वत को चंदन का क्या उपयोग ? सत्पुरुषों का जन्म परोपकार के लिए ही होता है ।
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः
परोपकाराय सतां विभृतयः ॥ 
नदियाँ अपना पानी खुद नहीं पीती, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल (खुद से उगाया हुआ) अनाज खुद नहीं खाते । सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है। संसार में जीने के लिये यही एक मात्र रास्ता है। अपनी भलाई को मैं केवल तुम्हारी भलाई करके ही सुरक्षित रख सकता हूँ! तुम्हारी भलाई करने में ही मेरी भलाई है; दूसरा कोई उपाय नहीं, बिल्कुल नहीं है।
शशि (सान्याल) द्वारा लिखित एक पुस्तक विमला ने मुझे भेजी है। उस ग्रन्थ का अध्यन कर विमला को यह ज्ञान प्राप्त हुआ है कि इस दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी अपवित्र हैं, तथा उन लोगों के संस्कार ही इस प्रकार हैं कि उनसे धर्म अनुष्ठान हो ही नहीं सकता। भारत में केवल मात्र कुछ ब्राह्मण लोग ही धर्मानुष्ठान करने के लिये अधिकृत हैं। उनमें भी शशि (सान्याल) और विमला चन्द्र-सूर्य-स्वरुप हैं। शाबाश, कितना अद्भुत धर्म है! खासकर बंगाली-ब्राह्मणों के लिये ऐसा एकाधिकार प्राप्त होना, सबसे सहज है। यही तो उनके जप-तप का मुलभूत सिद्धान्त है- कि मैं पवित्र हूँ, बाक़ी सब लोग अपवित्र हैं। यही तो क्रूरतापूर्ण, आसुरी और नारकीय धर्म है! यदि अमेरिकी लोग धर्मानुष्ठान के अयोग्य हैं, इसलिये इस देश में वेदान्त का प्रचार करना उचित नहीं है- तो फिर इन लोगों से आर्थिक सहायता माँगना कैसे न्यायोचित है? इस तरह के एक रोग का क्या उपाय हो सकता है?  
खैर जो हो, शशि (सान्याल) को मालाबार जाने के लिए बोलो। वहाँ के राजा ने अपनी प्रजा की 'जमीन छीन कर' ब्राह्मणों के चरणों में समर्पित कर दिया है। वहाँ के हर गाँव में बड़े बड़े मठ हैं, जहाँ शानदार रात्रि-भोज दिया जाता है, ऊपर से सभी ब्राह्मणों को भारी नकद दान-दक्षिणा भी दिया जाता है।
[मालाबार केरल राज्य मे अवस्थित एक संकीर्ण तटवर्ती क्षेत्र है। जब स्‍वतंत्र भारत में छोटी रियासतों का विलय हुआ तब त्रावनकोर तथा कोचीन रियासतों को मिलाकर त्रावनकोर-कोचीन राज्य तथा मालाबार को मिलाकर १ नवंबर, १९५६ को केरल राज्य बनाया गया। आज के केरल राज्य में शामिल होने वाले अन्य प्रमुख राज्य कोच्चि और मालाबार थे। दोनों राज्यों पर हिन्दू राजा राज करते थे। वहां धर्म- परिवर्तन की पूरी छूट थी। आज केरल में 20 प्रतिशत ईसाई और उतने ही मुसलमान हैं। श्री पद्मनाभ के सेवक के रूप में त्रावणकोर के महाराजा अनेक अनुष्ठानों का पालन करते थे, जिनमें से अधिकांश की प्रथा अठारहवीं शताब्दी के मध्य में मार्तंड वर्मा द्वारा शुरू की गई थी। त्रावणकोर एक ऐसा राज्य था जिसमें गैर-हिन्दुओं की, विशेषकर सीरियाई ईसाइयों की संख्या बहुत थी। 
केरल की अधिकांश आबादी मुस्लिम और ईसाई कैसे बन गयी ? मलावलतम नदी के किनारे पर परासनी कडायू का प्रसिद्ध मंदिर है, जो मुथप्पन भगवान का मंदिर माना जाता है, जो शिकारियों के देवता हैं। इसीलिए इस मंदिर में कांसे के बने हुए कुत्तों की मूर्तियां हैं। यहां ताड़ी तथा मांस का प्रसाद मिलता है तथा यहां के पुजारी दलित वर्ग के होते हैं। केरल की अधिकांश मुस्लिम आबादी, जिन्हें मप्पिला कहते हैं इसी क्षेत्र में निवास करती हैं. मालाबार में कालीकट से १६ कि.मी. दूर कापड़ बीच है, जहां २१ मई, १४९८ को वास्को दा गामा ने पहला कदम भारत की भूमि पर रखा था। 
भारत में सबसे पहले ५२ ई. में ईसाई धर्म प्रचारक का प्रवेश मालाबार में हुआ था। उनका नाम था सेंट थामस। उन्होंने मालाबार के तटीय इलाकों में धर्म प्रचार का काम शुरू किया तथा सात चर्च बनाए। केरल की कम्पनी मालाबार गोल्ड एंड डायमंड 2015 तक छह अरब डॉलर कारोबार के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आभूषण विक्रेता बनना चाहती है।  ]
 .… भोग करते समय गैर ब्राह्मण वर्गों को छूने में कोई बुराई नहीं है; किन्तु भोग समाप्त होते ही स्नान आवश्यक है, क्योंकि नॉन-नानब्राह्मिंस ऐज अ क्लास आर अनहोली ? इसलिये अन्य समय में उससे स्पर्श हो जाना भी धार्मिक-अपराध है ! तथाकथित पण्डे-पुरोहितों एवं ब्राह्मण दुष्टों ने देश को रसातल में पहुँचा दिया है। हर समय चोरी-बदमाशी करना तथा 'देहि, देहि ' की रट लगाना - किन्तु हैं धर्म के प्रचारक! नॉन-ब्राह्मिंस से उपहार लेना हो तो ले लेंगे, सर्वनाश करेंगे, साथ साथ यह भी कहेंगे कि हमें न छूना। वह कैसे कैसे महान सत्यों का आविष्कार वे नहीं कर रहे हैं ! " -यदि आलू का बैगन से स्पर्श हो जाय,तो कितने समय के अन्दर यह ब्रह्माण्ड रसातल को पहुँच जायगा ? " चौदह बार मिट्टी से हाथ न धोया जाय, तो उसके पूर्वजों के चौदह पुश्त नरकगामी होंगे अथवा चौबीस ? 
पिछले दो हजार वर्षों से वे इसी प्रकार के गूढ़ प्रश्नों का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण ढूंढ़ निकालने में लगे हुए हैं; जब कि दूसरी ओर देशवासियों का एक-चौथाई हिस्सा भूख से मर रहा है। आठ साल की लड़की के साथ तीस वर्ष के पुरुष का विवाह करके, कन्या के पिता-माताओं के आनन्द की सीमा नहीं रहती ! और जब कोई इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करता है, तो दुहाई देते हैं कि " हमें धर्मान्तरित करने का दुष्प्रयास किया जा रहा है।" परिपक्वता (puberty यौवन) प्राप्त होने के पहले ही जो अपनी लड़कियों को माँ बनते देखना चाहते हैं, वैसे ही लोग इसके लिये वैज्ञानिक स्पष्टीकरण ढूँढ़ने की चेष्टा करते हैं- उनका धर्म कहाँ का धर्म है ?
बहुत से लोग इस प्रथा के लिये मुसलमानों को दोषी ठहराते हैं। किन्तु क्या वे सचमुच इसके लिये दोषी हैं ? सम्पूर्ण गृह्यसूत्रों [इसमें गृह्य (औपासन)-अग्नि में होने वाले कर्मों एवं उपनयन, विवाह आदि संस्कारों का निरूपण किया गया है। छान्दोग्य ब्राह्मण में कुल 268 गृह्यमन्त्र हैं। ये सभी मन्त्र गोभिल और खादिर गृह्यसूत्रों के अन्तर्गत विभिन्न गृह्यकृत्यों में विनियुक्त होते हैं।] को तो एक बार पढ़कर देखो, हस्तात् योनिं न गूहति--दशा जब तक है, तभी तक कन्या मानी जाती है, इसके पहले उसका विवाह कर देना चाहिये। वहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एक लड़की का विवाह यौवन प्राप्त करने से पहले ही कर देना चाहिए। समस्त गृह्यसूत्रों में यही आदेश दिया गया है। वैदिक अश्वमेध यज्ञानुष्ठान की ओर ध्यान  दो - तदन्तरं महिषीं अश्वसन्निधौ पातयेत् --जैसे वाक्य देखने को मिलेंगे। होता, ब्रह्मा, उद्गाता इत्यादि नशे में चूर होकर कितना घृणित आचरण करते थे। अच्छा हुआ कि जानकी  के वन-गमन  के बाद राम ने अकेले ही अश्वमेध यज्ञ किया, इससे चित्त को बड़ी शान्ति मिली। समस्त ब्राह्मण ग्रन्थों में इनका उल्लेख मिलता है तथा सभी भाष्यकारों ने इसे सत्य माना है, फिर कैसे अस्वीकार किया जा सकता है? तातपर्य यह हुआ कि प्राचीन काल में बहुत सी चीजें अच्छी भी थीं और बुरी भी। 
" Believers are Heroes ! ": उत्तम वस्तुओं की रक्षा करनी होगी, किन्तु जो भारत अभी बनने वाला है -भविष्य का भारत;  (Future India), वह निश्चय ही प्राचीन भारत ( Ancient India) से अत्यन्त महान होगा! जिस दिन (१८ फ़रवरी १८३६ को ) श्री रामकृष्ण का आविर्भाव हुआ, उसी दिन से वर्तमान भारत (Modern India) तथा सतयुग ( Golden Age) का विकास होने लगा है ! और तुम लोग इस सत्ययुग को साकार करने वाले प्रतिनिधि हो ! इसी विश्वास को ह्रदय में धारण करके कार्य में कूद पड़ो ! इसीलिये जब एक ओर तो तुम श्री रामकृष्ण को अवतार-वरिष्ठ कहकर स्वीकार करते हो, फिर एक ही सांस में दृढ़तापूर्वक कहते हो - मुझसे नहीं होगा; अर्थात इस प्रकार तुम अपनी अज्ञानता की वकालत भी करते हो ?
यही कारण है कि मैं बिना संकोच के, तुम लोगों को "You are false to the backbone!" रीढ़ की हड्डी तक झुट्ठा-लबरा कहता हूँ ! यदि श्रीरामकृष्ण परमहंस 'सत्य-स्वरुप' हैं, तो तुमलोग भी 'वही' हो ! लेकिन केवल मुख से 'I am He, I am He' करने से नहीं होगा अपने सत्यस्वरूप होने की शक्ति, (आध्यात्मिक शक्ति) को प्रकट भी करना होगा। मैं जानता हूँ, तुम लोगों में अद्भुत शक्ति विद्यमान है! जो नास्तिक हैं (अपने को सत्य-स्वरुप को स्वीकार नहीं करते हैं) उनके पास कोई शक्ति नहीं- भुस्सा भरा है। जो लोग आस्तिक हैं, अपने-आप पर विश्वास करते हैं, वे हीरो हैं! वे अपनी जबरदस्त शक्ति को इस प्रकार प्रकट करेंगे -कि उसकी बाढ़ में सम्पूर्ण विश्व बह जायगा। 
" दीन-दुःखियों के प्रति सहानुभूति रखना और उनकी सहायता करना ही ईश्वर की पूजा है;"  
" मनुष्य ही जाग्रत देवता है, वही नारायण है" " आत्मा में (हमारे सत्य-स्वरुप में) स्त्री या पुरुष अथवा ब्राह्मण-क्षत्रिय या ऊँच-नीच जैसा कोई पार्थक्य नहीं है", " सृष्टिकर्ता से लेकर तृण के गुच्छे तक, सब कुछ नारायण है !" धरती पर रेंगने वाले कीड़े में वह शक्ति कम प्रकट है, और सिरजनहार में अधिक प्रकट है-बस अंतर केवल इतना ही है ! प्रत्येक वैसा कर्म -जिस से अपने दिव्य-स्वरुप को अधिक से अधिक प्रकट करने में सहायता मिलती हो, वही सत्कर्म है; और वैसा प्रत्येक कर्म जिसे करने से उसमें बाधा पहुँचती है-बुरे कर्म हैं। " 
अपने ब्रह्मस्वरूप को अभिव्यक्त करने का एकमात्र उपाय यही है, कि इस विषय में दूसरों की सहायता की जाय।" (इसी का सूत्र है -' Be and Make!') " शिक्षक या नेता को यह विचार करना चाहिये, कि यदि प्रकृति में असामनता है, तो भी सब के लिये बराबर का मौका होना चाहिये। फिर भी यदि (सामाजिक-न्याय के बहाने) किसी को अधिक किसी को कम सुविधा देनी हो, तो बलवान (अमीर) की अपेक्षा दुर्बल (गरीब) को अधिक अवसर दिया जाना चाहिये। हाँ, शिक्षा के मामले में, चाण्डाल को जितनी शिक्षा की आवश्यकता है, उतनी ब्राह्मण के लिये नहीं। अतः किसी ब्राह्मण के पुत्र के लिये यदि एक शिक्षक की आवश्यकता हो, तो चाण्डाल के पुत्र के लिये दस शिक्षकों की व्यवस्था होनी चाहिये। कारण यह है कि प्रकृति ने जिसे जन्म से ही तीव्र बुद्धि-सम्पन्न नहीं किया हो, उसे तो अधिक सहायता मिलनी ही चाहिये। 'It is a madman who carries coals to Newcastle.' चिकने-चुपड़े पर तेल लगाना पागलों का काम है।  
अज्ञानी, पददलित, तथा दरिद्र- इनको अपना ईश्वर समझो ! "The poor, the downtrodden, the ignorant, let these be your God." एक भयानक दलदल तुम्हारे सामने है- ध्यान रखनाकई लोग (ग्रामोन्नयन करने गये) उसमें गिरकर दफ्न हो जाते हैं ! और वह दलदल यह है- कि हिन्दुओं का वर्तमान धर्म- न तो वेदों में है, न ही पुराणों में, और न ही भक्ति में, और न ही मुक्ति में है; धर्म तो भात की हांड़ी में समा चूका है। वर्तमान हिन्दू धर्म न तो ज्ञान-मार्गी है, न विवेक-विचार करने में है -'मुझे न छूना, मुझे न छूना', इस प्रकार की अस्पृश्यता ही उसका एकमात्र अवलम्ब है,हिन्दू धर्म की दौड़ बस यही आकर समाप्त हो जाती है।
 देखना कि तुम कहीं इस अस्पृश्यता में फँसकर अपने प्राणों से हाथ न धो लेना। " आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः"--क्या यह वाक्य केवल मात्र पुस्तकों में निबद्ध रहने के लिये है? जो लोग गरीबों को रोटी का एक टुकड़ा नहीं दे सकते, वे फिर वह विद्या कैसे दे सकते हैं; जो मनुष्य को मुक्त कर दे! दूसरों के श्वास-प्रश्वासों से जो अपवित्र बन जाते हैं, वे फिर दूसरों को कैसे पवित्र बना सकते हैं?   'मुझे मतछूओ-वाद' एक प्रकार की मानसिक बीमारी है। Beware! All expansion is life, all contraction is death. " सावधान ! ह्रदय का विस्तार ही जीवन है, और उसकी संकीर्णता ही मृत्यु!" जिस ह्रदय में परायों के लिये भी प्रेम है, वहीँ ह्रदय का विस्तार हो रहा है, और जहाँ केवल अपने शरीर से जन्मे या नाते-रिश्तेदारों के प्रति स्वार्थ होगा, वही हृदय क्रमशः संकुचित होता जाता है। अतः प्रेम ही जीवन का एकमात्र विधान है ! जो प्रेम करता है, वही जीवित है; जो स्वार्थी है, वह मृतक है। अतः केवल प्रेम के लिये प्रेम -यह जीवन का वैसा ही एकमात्र विधान है, जैसा जीने के लिये श्वास लेना। निष्काम प्रेम (भक्ति), किष्काम कर्म का यही रहस्य है। 
यदि हो सके, तो शशि (सान्याल) की सहायता करने का प्रयत्न अवश्य करना; व्यापक रूप से वह एक बहुत ही अच्छा और पवित्र मनुष्य है, किन्तु उसका ह्रदय संकीर्ण है। दूसरों के दुःख का अनुभव अपने ह्रदय में करने का सौभाग्य हर किसी को प्राप्त नहीं होता है ! हे प्रभो,अन्य सभी अवतारों में श्री चैतन्य महाप्रभु श्रेष्ठ हैं, किन्तु उनमें प्रेम की तुलना में ज्ञान कम था, किन्तु श्री रामकृष्णवतार में ज्ञान, भक्ति तथा प्रेम -तीनों ही विद्यमान हैं ! उनमें अनन्त ज्ञान, अनन्त प्रेम, अनन्त कर्म तथा सभी प्राणियों के लिए अनन्त दया है ! अभी तक तुम्हें इसका अनुभव नहीं हुआ है। श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् -

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: ।
आश्चर्यवच्चैनमन्य: श्रृणोति
             श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।।गीता २. २९।।

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और  इनके बारे में (श्रीरामकृष्ण परमहंस ही ब्रह्म हैं ) सुनकर भी कोई-कोई इनको जान नहीं पाते हैं ! ' सम्पूर्ण हिन्दू जाति ने जिस परमात्म-तत्व को समझने में युग-युगान्तर तक प्रयत्न किया था, उसे उन्होंने एक ही जीवन में जीकर दिखला दिया ! उनका जीवन समस्त राष्ट्रों के ' वेदों ' (आधायत्मिक सत्यों ) का जीवन्त भाष्य है ! अन्य लोगो को धीरे धीरे ही इस सत्य की अनुभूति होगी !  मेरा तो वही पुराना आह्वान है - struggle, struggle up to light! Onward! संघर्ष करते रहो, अपनी पूरी शक्ति साथ आत्मज्योति का अनुभव करने की दिशा में अग्रसर रहो ! आगे बढ़ो !
ठाकुर के भक्तों की सेवा में
 -दास नरेन्द्र ! 
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२. 'When death is so certain, it is better to die for a good cause.'" मृत्यु जब अवश्यम्भावी है, तब सत्कार्य के लिये प्राणत्याग करना ही श्रेय है ! स्वामी विवेकानन्द द्वारा १८९४ में अपने गुरुभाइयों को लिखित पत्र के मुख्य अंश -
प्रिय भ्रातृवृन्द, जय श्रीरामकृष्ण ! 
इससे पहले भी एक पत्र मैंने तुम लोगों को लिखा था, जो समयाभाव के कारण अधूरा ही रह गया था। राखाल (स्वामी ब्रह्मानन्द) एवं हरि (स्वामी तुरियानन्द) ने लखनऊ से एक पत्र में लिखा था कि हिन्दू समाचारपत्र मेरी प्रशंसा कर रहे थे, और वे लोग बहुत ही खुश थे कि श्रीरामकृष्ण वार्षिकोत्सव पर बीस हजार लोगों ने भोजन किया। यहाँ अमेरिका में मैं इससे कहीं अधिक कार्य कर सकता था, किन्तु ब्राह्म समाजी एवं ईसाई मिशनरियाँ लगातार मेरा विरोध करने में लगी हुई हैं। एवं भारतीय हिन्दुओं ने भी मेरे समर्थन में कुछ नहीं कहा है। मेरा तात्पर्य है कि अगर कलकत्ता या मद्रास के हिन्दुओं ने एक सभा बुलाकर मुझे अपना प्रतिनिधि स्वीकार करते हुए, अमेरिकी लोगों को मेरे उदारतापूर्ण स्वागत के लिये एक धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया होता; तो यहाँ कार्य और भी सुचारू ढंग से किया जा सकता था। लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी, अब तक इस दिशा में कुछ नहीं किया जा सका है। बेशक, इस विषय में मेरा भरोसा बंगालियों पर तो बिल्कुल ही नहीं था, लेकिन मद्रासी लोग भी तो कुछ नहीं कर सके ? 
हमारे देश के लिए कोई उम्मीद नहीं है। किसी के मस्तिष्क में कोई मौलिक विचार तो कभी कौंधता ही नहीं है, सब उसी पुराने घिसे-पिटे राग को अलापने में लगे हैं -कि रामकृष्ण परमहंस ऐसे थे और वैसे थे,--वही मुर्गा और बैल की कथा जैसी बेसिर-पैर की कहानियाँ हाँकते जा रहे हैं। हे भगवान (रामचन्द्र) ! कम से कम तुम लोग तो ऐसा कुछ करके दिखाओ जिससे लगे कि तुम आम लोगों से कुछ अलग हो, तुम्हारे में भी कुछ असाधारणता है- अन्यथा आज घंटा आया, तो कल बिगुल और परसों चमर; आज ठाकुरजी को शयन कराने के लिये एक खाट मिली, कल उसके पायों को चाँदी से मढ़ा गया- आज इतने लोगों को खिचड़ी दी गयी, और इसी प्रकार तुम लोग हजारों लम्बी-चौड़ी कथाओं को बुनते रहते हो। -वही चक्र,गदा,शंख, पद्म या पहले शंख-गदा-पद्म-चक्र में उलझे रहते हो, ये सब नीरा पागलपन नहीं तो और क्या है ? इसी को अंग्रेजी में 'इम्बिसिलिटी' (imbecility)- मन्दबुद्धिता कहा जाता है। जिन लोगों के मन में इस प्रकार की उलजलूल बातों के सिवा और कुछ नहीं है- उन्हीं लोगों को मन्दबुद्धि (बोपदेव) कहा जाता है। घंटा दायीं ओर बजाना चाहिये अथवा बायीं ओर, चन्दन माथे पर लगाना चाहिये या अन्यत्र कहीं, आरती दो बार उतारनी चाहिये या चार बार,-इन प्रश्नों को लेकर जो दिन-रात माथापच्ची किया करते हैं, उन्हीं का नाम भाग्यहीन है, और इसीलिये हम लोग श्रीहीन और जूतों की ठोकरें खाने वाले बन गए, जबकि पश्चिम के लोग सारी दुनिया के स्वामी हैं। मित्रों, आलस्य( idleness) तथा वैराग्य (renunciation) में आकाश-पाताल जितना अन्तर होता है।
यदि अपना और देश का कल्याण करना चाहते हो, तो घंटा आदि को गंगाजी में सौंपकर ईश्वर के ब्रह्माण्डीय विराट-रूप के अतिरिक्त उनके वैयक्तिक पहलु (पिण्ड) - मानव देहधारी प्रत्येक 'मनुष्य',साक्षात् नारायण, जाग्रत ईश्वर- 'मानव-भगवान' की पूजा में तत्पर हो जाओ ! ईश्वर के ब्रह्माण्डीय विराट-रूप का अर्थ है - सम्पूर्ण विश्व; यह जगत ईश्वर का विराट-रूप है, एवं उसकी पूजा का अर्थ है- [ पिण्ड में ब्रह्माण्ड या जीव में शिव- जो शक्ति ब्रह्माण्ड (शिव) को चलाती है वही शक्ति पिण्ड (जीव) को भी चलाती है ] नर रूपी नारायण की सेवा; वास्तव में कर्मयोग इसीका नाम है, निरर्थक विधि-उपासना के प्रपञ्च का नहीं। घंटे के बाद चमर डुलाना है- या पहले; भोजन की थाली भगवान के सामने रखकर दस मिनट बैठना चाहिये या आधा घण्टा; इस प्रकार की क्रियाशीलता का नाम कर्मयोग नहीं है, यह तो पागलपन है। लाखों रूपये खर्च कर काशीविश्वनाथ तथा वृन्दावन के मन्दिरों के कपाट खुलते और बन्द होते हैं। कहीं ठाकुर जी वस्त्र बदल रहे हैं, तो  कहीं भोजन, कहीं श्रृंगार-प्रसाधन अथवा और कुछ कर रहे हैं; जिसका ठीक ठीक तात्पर्य भी हम नहीं समझ पाते; …किन्तु दूसरी ओर जीवन्त नारायण भोजन तथा विद्या के बिना मरे जा रहे हैं! बम्बई के बनिया लोग खटमलों के लिये अस्पताल बनवा रहे हैं, किन्तु मनुष्यों की ओर उनका कुछ भी ध्यान नहीं है --चाहे वे इलाज के बिना मर ही क्यों न जायें। तुम लोगों में इन साधारण बातों को समझने तक की बुद्धि नहीं है, और यही हमारे देश के लिये सबसे बड़ी प्लेग जैसी महामारी है; जिसके फलस्वरूप पूरे देश में मनोरोगी एवं पागलखानों की संख्या बढ़ती जा रही है। 
तुम लोग अग्नि की तरह चारों ओर फ़ैल जाओ, और भगवान (श्रीरामकृष्ण) के विराट रूप, उनके सर्वव्यापी पहलू का- मनुष्यमात्र (पिण्ड) में वही असीम (आल्हादिनी ) शक्ति अन्तर्निहित है, जो शक्ति सम्पूर्ण जगत (ब्रह्माण्ड) को संचालित कर रही है;-- इस भाव का प्रचार करो जो कभी हमारे देश में नहीं हुआ है ! इसके विपरीत मत रखने वालों के साथ विवाद करने से काम नहीं होगा, सभी प्रकार के मतावलम्बियों को अपने साथ लेकर चलना होगा। गाँव गाँव तथा घर घर में जाकर इन्हीं भावों का प्रचार करो, तभी तो यथार्थ में कर्म का कर्म का अनुष्ठान होगा। अन्यथा आत्म-सन्तुष्ट भाव में विभोर होकर चारपाई पर पड़े रहना और बीच बीच में घंटा हिलाना- स्पष्टतया यह तो एक प्रकार का रोग विशेष है। स्वतन्त्र बनो, तथा स्वतन्त्र बुद्धि से महावाक्यों के मर्म के विषय मे निर्णय लेना सीखो। - अन्यथा अमुक तन्त्र के अमुक अध्याय में घंटी के बेंट की मानक लम्बाई क्या निर्धारित की गयी है- इन सब बातों को जानने से हमें क्या लाभ ? प्रभु की इच्छा से लाखों तन्त्र, वेद, पुराणादि सब कुछ तुम्हारी वाणी से अपने आप निःसृत होंगे। यदि कुछ करके दिखा सको, एक वर्ष के अन्दर यदि 'बिहार-झाड़खंड राज्य स्तरीय युवा प्रशिक्षण शिविर ' का आयोजन कर सको, तब मैं तुम्हारी बहादुरी समझूँगा। 
'गुरु-परम्परा' की अनिवार्यता : क्या तुम उस लड़के को जानते हो, जो कि सिर मुड़ाकर तारक दादा के साथ मुम्बई से रामेश्वर गया है? वह अपने को श्रीरामकृष्ण परमहंस का शिष्य कहता है ! (बिना उनसे दीक्षा लिये, वह उनका शिष्य कैसे बन गया ?) तारक दादा उसे पहले दीक्षा दे। उसने अपने जीवन में कभी श्रीरामकृष्ण का दर्शन नहीं किया है, न उनको सुना है; किन्तु फिर भी उनका शिष्य बन गया ! कैसी धृष्टता है ! परमगुरु श्रीरामकृष्ण की गुरुपरम्परा के वर्तमान ध्वजवाहक या जिनके माध्यम से अब भी ठाकुर-माँ-स्वामीजी की शक्ति कार्यरत है; उस गुरु-परम्परा की अटूट श्रृंखला में श्रद्धा रखते हुए, उनसे दीक्षित हुए बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता है। क्या यह बच्चों का खेल है? अटूट गुरु-परम्परा में किसी माध्यम के सहारे ठाकुर के साथ जुड़े बिना, कोई अपने को श्रीरामकृष्ण का शिष्य कैसे कह सकता है ? मूर्ख कहींका ! यदि वह लड़का नेतृत्व-परम्परा को मानकर न चलना चाहे, तो उसे संगठन से निकाल बाहर करो। मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ, कि शिष्यत्व की श्रृंखला, अर्थात जो शक्ति 'प्रथमगुरु' या जगतगुरु से उनके शिष्य में आती है, तथा उनसे उनके शिष्यों में संक्रमित होती है--के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। और यहां, वह आता है और स्वयं को श्रीरामकृष्ण का शिष्य होने का दावा कर देता है --क्या यह कोई तमाशा (टाम्फूलरी) है ? जगमोहन ने पहले मुझसे कहा था कि एक व्यक्ति अपने को मेरा गुरुभाई बतलाता है, अब मुझे प्रतीत हो रहा है, कि यह लड़का कहीं वही तो नहीं है ! अपने को गुरुभाई कहता है क्योंकि शिष्य कहने में लज्जा आती है। एकदम गुरु (नेता) बनना चाहता है !  यदि वह स्थापित गुरु-परम्परा का पालन न करे  तो उसे अलग कर देना। 
सुबोध (स्वामी सुबोधानन्द ) तथा तुलसी (स्वामी निर्मलानन्द ) की मानसिक अशान्ति का कारण यही है कि उनके पास कुछ करने योग्य काम नहीं है।  गाँव गाँव तथा घर घर में जाकर मनुष्यों उनके यथार्थ स्वरुप के प्रति जाग्रत करने की चेष्टा करने, एवं लोकहित के ऐसे कार्यों में आत्मनियोग करो, जिससे कि जगत का कल्याण हो सके। चाहे अपने को नरक में क्यों  न जाना पड़े, दूसरों की मुक्ति हो।  मुझे अपनी मुक्ति की  चिन्ता नहीं है। [ अ + विमुक्त = काशीविश्वनाथ  से जो मुक्त होना न चाहे = शिव के गुरु 'अविमुक्तेश्वर नाथ'  (अर्थात भगवान श्रीरामचन्द्र महाभारत) काशी  का प्राचीन अद्भूत अविमुक्तेश्वर मंदिर आज जनमानस की विस्मृति में चला गया है।  भगवान काशीविश्वनाथ अर्थात मंदिर स्थित अविमुक्त कूप का अति निर्मल, मधुर और ठंडा जल पीते  ही मन शान्त होता है। तीर्थ नगरी गया की मंगलागौरी का विशिष्ट स्थान है। मंगलागौरी मंदिर जमीन तल से तकरीबन 110 फीट ऊंचाई पर भष्मदूत पर्वत शिखर पर शोभायमान मां का मन्दिर का  वास्तु शास्त्रीय प्रभाव है।  जो दो तल विभाज्य पूर्वाभिमुख है। मंगलागौरी के उत्तर में जनार्दन देव (अविमुक्तेश्वर नाथ) तथा पुण्डरीकाक्ष मंदिर जैसे वैष्णव तीर्थ हैं ]
 जब तुम स्वयं के लिये सोचने लगोगे --तभी  मानसिक अशान्ति आकर उपस्थित होगी। मेरे बच्चे तुम्हें शान्ति की क्या आवश्यकता है ? जब तुम सब कुछ छोड़ चुके हो । आओ अब शान्ति तथा मुक्ति की अभिलाषा  त्याग दो। अपने लिये किसी प्रकार की चिन्ता अवशिष्ट न रहने पाये, स्वर्ग-नरक, भक्ति अथवा मुक्ति --किसी चीज की परवाह न करो। और जाओ, मेरे बच्चे, घर घर जाकर भगवन्नाम (शिव के गुरु 'अविमुक्तेश्वर नाथ'श्रीरामकृष्ण देव --  के नाम का ) का प्रचार करो। दूसरों की भलाई से ही अपनी भलाई होती है, भक्ति और मुक्ति  लिये दूसरों का मार्गदर्शन करते रहने से ही अपनी मुक्ति तथा  भक्ति भी सम्भव हो जाती है। अतः उसी में संलग्न हो जाओ, तन्मय रहो तथा उन्मत्त बनो । जिस प्रकार श्रीरामकृष्ण तुमसे प्रेम करते थे, मैं तुमसे  हूँ, आओ, वैसे ही  तुम भी जगत से प्रेम करो। सबको संगठित करो-गुणनिधि कहाँ है ? उसे अपने पास बुलाओ । उससे मेरी अनन्त प्रीति कहना। गुप्ता (सदानन्द) कहाँ है ? यदि वह आना चाहे तो आने दो । मेरे नाम से उसे अपने पास बुलाओ।
निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखो - 
१. हम लोग संन्यासी हैं, भक्ति तथा मुक्ति तथा कोई भी भोग --सब कुछ हमारे लिये त्याज्य है। 
२. जगत का कल्याण करना, प्राणिमात्र का कल्याण करना हमारा व्रत है, चाहे उससे मुक्ति मिले अथवा नरक, स्वीकार करो। 
३. जगत के कल्याण के लिये श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का आविर्भाव हुआ है। अपनी अपनी दृष्टि के अनुसार तुम उन्हें -मनुष्य, ईश्वर या अवतार कुछ भी कह सकते हो। जो रूप तम्हें अच्छा लगता हो उसी रूप मेंअपनी स्वयं की बुद्धि के प्रकाश में उन्हें  पहचानो और स्वीकार करो  ! 
४. श्रीरामकृष्ण के समक्ष चाहे जैसा भी मनुष्य अपने सिर को झुका देगा, वह तत्काल ही  २४ कैरेट शुद्ध-स्वर्ण जैसा सच्चा (चरित्रवान) मनुष्य बन जायगा।  मेरे बच्चों, इसी सन्देश को लेकर तुम घर घर जाओ तो सही--देखोगे कि तुम्हारी सारी अशान्ति दूर हो गयी है ! डरने की जरुरत नहीं --डरने का कारण ही कहाँ है ? नाम-यश या ऐसी किसी तुच्छ सांसारिक वस्तु की कोई आकांक्षा न रखना - तुम्हारे जीवन का अंग बन चूका है। अब तक तुमने उनके नाम तथा अपने चरित्र  का जितना भी प्रचार किया है, वह ठीक ही है; अब संघबद्ध होकर प्रचार करो !
भगवान श्रीरामकृष्ण तुम्हारे साथ हैं -फिर डरने की क्या बात है ? हिम्मत न हारना ! चाहे मैं मर जाऊँ या जीवित रहूँ, भारत लौटूँ या न लौटूँ -तुम लोग उस प्रेम का प्रचार करते रहो -जो असीम है; जिसकी कोई सीमा नहीं, अपने- पराये का कोई बंधन नहीं ! गुप्ता को भी इस  नियोजित कर दो।  किन्तु यह याद रखना कि दूसरों को मारने के लिये अस्त्र-शस्त्र (आध्यात्मिक शक्ति को प्रकट करने ) की आवश्यकता होती है । "सन्निमित्तॆ वरं त्यागॊ विनाशॆ विनाशॆ नियतॆ सति—When death is so certain, it is better to die for a good cause." " मृत्यु जब अवश्यम्भावी है, तब सत्कार्य के लिये प्राणत्याग करना ही श्रेय है !
प्रेमपूर्वक तुम्हारा- विवेकानन्द !
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3.  पुनश्च - पहली चिट्ठी की बात याद रखना -पुरुष तथा नारी, दोनों ही आवश्यक हैं । आत्मा में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है; केवल श्रीरामकृष्ण को अवतार घोषित करते रहने से काम नहीं चलेगा, यदि तुम्हारे हृदय में वे अवतरित हो चुके हैं-तो तुम्हारे माध्यम से उस शक्ति का विकास भी दिखाई पड़ना चाहिये ! गौरी माँ, योगिन माँ एवं गोलाप माँ कहाँ हैं ? हजारों की संख्या में पुरुष तथा नारी चाहिये, जो अग्नि की तरह हिमालय से कन्याकुमारी तक तथा उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक तमाम दुनिया में फ़ैल जायेंगे। यह बच्चों का खेल नहीं है और न उसके लिये समय ही है। जो बच्चों खेल समझकर इस आन्दोलन के सदस्य बनना चाहते हैं, उन्हें इसी समय अलग हो जाना चाहिये, नहीं तो आगे उनके लिये बड़ी विपत्ति खड़ी हो जायेगी । हमें संगठन चाहिये, आलस्य को दूर दो, फैलो ! फैलो ! Spread! Spread! Run like fire to all places.What use living a hundred years for those slumbering in inertia and laziness ?  जो लोग जड़ता और आलस्य में ऊँघते हुए १०० वर्षों का निष्क्रिय जीवन बिता देते हैं, उस जीवन की उपयोगिता क्या है ? ग्नि की तरह चारों ओर फ़ैल जाओ। मुझपर भरोसा न रखो, चाहे मैं मर जाऊँ अथवा जीवित रहूँ -तुम लोग प्रचार करते रहो ! - विवेकानन्द !  
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