Saturday, June 7, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (17)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
 [ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ] 




 
श्री श्री माँ सारदा  




नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||
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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्
 

  ' विवेकानन्द - वचनामृत '
१७.
प्रयत्नं श्रद्धया कुर्यात् धैर्येनैकाग्रचेतसा।
 शुद्धतया च वीर्येण तरिंतु भयमुल्वणम्॥ 
To overcome the great fear (of bondage) one has to strive hard with courage, Shraddha, and one pointed devotion to the ideal. 
1.' Purity, patience and perseverance are the three essentials to success.'
2. ' Upon ages of struggle a character is built. '
भयंकर भय (जन्म-मरण के बन्धन) पर विजय प्राप्त करने के लिये, मनुष्य को अदम्य साहस, श्रद्धा एवं अपने आदर्श के प्रति अनन्य भक्ति के साथ कठोर प्रयास करना पड़ता है।
१. " परन्तु मेरे बच्चे, इस मार्ग में बाधाएं भी हैं। जल्दबाजी में कोई काम नहीं होगा। (3P) are the three essentials to success  पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय, इन्हीं तीनों गुणों से सफलता मिलती है, और सर्वोपरि है प्रेम।"  (३० नवम्बर, १८९४ को डॉ० नंजुन्दा राव को लिखित पत्र)
" तुम श्री रामकृष्ण को समझ सके (कि वे ब्रह्म हैं), यह जानकर मुझे बड़ा हर्ष है। तुम्हारे तीव्र वैराग्य से मुझे और भी आनन्द मिला। ईश्वर-प्राप्ति का यह आवश्यक अंग है। मुझे पहले से ही मद्रास से बड़ी आशा थी और अभी भी विश्वास है कि मद्रास से वह आध्यात्मिक तरंग उठेगी, जो सारे  प्लावित कर देगी। मैं तो केवल इतना ही कह सकता हूँ कि ईश्वर तुम्हारे शुभ संकल्पों का वेग उत्साह के साथ बढ़ाता रहे; परन्तु मेरे बच्चे, यहाँ कठिनाइयाँ भी हैं। 
पहले तो किसी व्यक्ति को अधिक उतावलेपन में कोई कदम नहीं उठाना चाहिये; दूसरे, तुम्हें अपनी माता और स्त्री के सम्बन्ध में सहृदयतापूर्वक विचारों से काम लेना उचित है। सच है, और तुम यह कह सकते हो कि आप श्रीरामकृष्ण के शिष्यों ने संसार त्याग करते समय अपने माता-पिता की सम्मति की अपेक्षा नहीं की। मैं जनता हूँ और ठीक जानता हूँ कि बड़े बड़े काम बिना  त्याग के नहीं हो सकते। मैं अच्छी  जानता हूँ, भारत-माता अपनी उन्नति के लिये अपनी श्रेष्ठ सन्तानों की बलि चाहती है, और यह मेरी आन्तरिक अभिलाषा है कि तुम उन्हीं में से एक सौभाग्यशाली होगे। 
संसार के इतिहास से तुम जानते हो कि महापुरुषों ने बड़े बड़े स्वार्थ-त्याग किये उनके शुभ फल का भोग जनता ने किया। अगर तुम अपनी ही मुक्ति के लिये सब कुछ त्यागना चाहते हो, तो फिर वह त्याग कैसा? क्या तुम संसार के कल्याण के लिये अपनी मुक्ति-कामना तक छोड़ने को तैयार हो ? You are God, think of that. यदि तैयार हो, तब तो तुम स्वयं ईश्वर हो, इस पर विचार करो। मेरी राय में तुम्हें कुछ दिनों के लिये ब्रह्चारी बनकर रहना चाहिये। अर्थात कुछ काल के लिये स्त्री-संग छोड़कर अपने पिता के घर में ही रहो ; यही 'कुटीचक' अवस्था है। संसार की हित-कामना के लिये अपने महान स्वार्थ-त्याग के सम्बन्ध में अपनी पत्नी को सहमत करने की चेष्टा करो। 
अगर तुममें ज्वलन्त श्रद्धा (burning faith), सर्वविजयनि प्रीति और सर्वशक्तिमयी पवित्रता है, तो तुम्हारे शीघ्र सफल होने में मुझे कुछ भी सन्देह नहीं। तन, मन और प्राणों का उत्सर्ग श्री रामकृष्ण की शिक्षाओं का विस्तार करने में लग जाओ, क्योंकि निःस्वार्थ कर्म (Be and Make) पहला सोपान है।  खूब मन लगाकर संस्कृत का अध्यन करो और साधना का भी अभ्यास करते रहो। कारण, तुम्हें मनुष्य जाति का श्रेष्ठ शिक्षक (नेता) बनना है।( और दूसरों को भी मानव जाति का श्रेष्ठ शिक्षक (नेता) बनने में सहायता करना है। ) और जगतगुरु श्री रामकृष्ण (सम्पूर्ण विश्व के मार्गदर्शक नेता) कहा करते थे, कि कोई आत्महत्या करना चाहे, तो वह नहरनी से भी काम चला सकता है, परन्तु दूसरों को मारना हो (अर्थात दूसरों को भी नेता बनने में सहायता करना हो) तो तोप-तलवार (चपरास) की आवश्यकता होती है। 
समय आने पर तुम्हें वह अधिकार (चपरास) प्राप्त हो जायगा, जब तुम संसार त्यागकर चारों ओर उनके पवित्र नाम का प्रचार कर सकोगे। तुम्हारा संकल्प शुभ और पवित्र है। ईश्वर तुम्हें उन्नत करे, परन्तु जल्दी में कुछ न कर बैठना। पहले कर्म और साधना द्वारा अपने को पवित्र करो। भारत चिरकाल से दुःख सह है रहा है; सनातन धर्म दीर्घकाल से अत्याचार पीड़ित रहा है। परन्तु ईश्वर दयामय है। अपने वादे के अनुसार -वह फिर अपनी सन्तानों के परित्राण के लिये आया है, पुनः पतित भारत को उठने का सुयोग मिला है। श्रीरामकृष्ण के पदप्रान्त  बैठने पर ही भारत का उत्थान हो सकता है। उनकी जीवनी एवं उनकी शिक्षाओं को चारों ओर फैलाना होगा, हिन्दू समाज के रोम रोम में उन्हें भरना होगा। यह काम कौन करेगा ?
है कोई, जो श्रीरामकृष्ण की पताका हाथ में लेकर संसार की मुक्ति के लिये अभियान पर निकल पड़े ? है कोई, जो अपने व्यक्तिगत नाम-यश का, ऐश्वर्य-भोग का, यहां तक कि इहलोक और परलोक की सारी आशाओं का बलिदान करके भी, राष्ट्रीय चरित्र में अवनति की बाढ़ रोकने में जुट जाये ? हाँ, कुछ इने-गिने युवकों ने इस कार्य में अपने को झोंक दिया है, अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया है; परन्तु इनकी संख्या अभी बहुत थोड़ी ही है। हम चाहते हैं कि ऐसे ही कई हजार मनुष्य आयें -और मैं जानता हूँ कि वे आयेंगे ! 
(कहाँ से आयेंगे ?-महामण्डल का जन्म इसी लिये हुआ है) मुझे हर्ष है कि हमारे प्रभु ने तुम्हारे मन में उन्हीं में से एक होने का भाव भर दिया है। धन्य हैं वे, जिन्हें प्रभु ने चुन लिया है ! तुम्हारा संकल्प शुभ है, तुम्हारी आकांक्षाएँ उच्च हैं, घोर अंधकार में डूबे हुए हजारों मनुष्यों को प्रभु के ज्ञानलोक के सम्मुख लाने का तुम्हारा लक्ष्य संसार के सब लक्ष्यों से महान है।
परन्तु मेरे बच्चे, इस मार्ग में बाधाएं भी हैं। जल्दबाजी में कोई काम नहीं होगा। Purity, patience, and perseverance (3P) are the three essentials to success and, above all, love. पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय, इन्हीं तीनों गुणों से सफलता मिलती है, और सर्वोपरि है प्रेम। तुम्हारे सामने अनन्त समय है; अतएव अनुचित शीघ्रता आवश्यक नहीं। यदि तुम पवित्र और निष्कपट हो, तो सब काम ठीक हो जायेंगे। हमें तुम्हारे जैसे हजारों (चपरास प्राप्त व्यक्तियों) की आवश्यकता है, जो समाज पर टूट पड़ें और जहाँ कहीं वे जायें, वहीं नए जीवन और नयी शक्ति का संचार कर दें।"
[ 30th November, 1894.DEAR AND BELOVED, (Dr. Nanjunda Rao.)]   
२.' आगे बढ़ो ! सैकड़ों युगों के उद्द्य्म से चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ। ' श्री आलासिंगा पेरुमल को, ५४१, डियरबॉर्न एवेन्यू, शिकागो, से १८९४ में लिखित पत्र के मुख्य अंश -
" प्रिय आलासिंगा,
 प्रत्येक ' दास-जाति' (enslaved race) का मुख्य दोष ईर्ष्या होता है। ईर्ष्या और मेल-मिलाप का अभाव ही पराधीनता उत्पन्न करता है, और उसे स्थायी बनाता है। जो राष्ट्र जितना अधिक निर्बल और कायर होगा, उसमें यह दोष उतने ही स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होंगे।  पाश्चात्य देशों की सफलता का रहस्य यह एक साथ मिलकर कार्य करने (teamwork) की शक्ति ही है; और उसका आधार है पारस्परिक विश्वास और गुणग्राहकता (सराहना करना) !
इसलिये मेरे बच्चे, तुम्हें दासवत् जीवन यापन करने वाली जाति से अपने कार्यों के बदले सराहना या अन्य किसी बात की अपेक्षा रखे बिना ही, कार्य का प्रारम्भ करना होगा। इसमें कोई शक नहीं कि गुलाम-मानसिकता वाली जाति के बीच कार्य करने के लिये अति-साहसिक होना पड़ेगा। मैं चाहता हूँ, कि मेरे सभी कार्यकर्ता इस बात को अच्छी तरह से समझ लेने के बाद ही इस कार्यक्षेत्र- ' Be and Make' आन्दोलन के प्रचार-प्रसार में उतरें।
क्या तुम ऐसे 'मृत-जड़पिण्डों' के भीतर प्राण-संचार कर सकते हो, जिनकी नैतिकता-संबन्धी लगभग समस्त आकांक्षायें मर चुकी है, जो भविष्य में भी अपनी उन्नति की कोई सम्भावना नहीं देखते, और उल्टे भलाई करनेवाले को ही धर दबोचने में हमेशा तत्पर रहते हैं ? क्या तुम उस चिकित्सक की जगह ले सकते हो, जो लातें मारते हुए दुर्दम्य बच्चे के गले में भी दवा उड़ेल देने की कोशिश करता हो ?( क्या तुममें, भारत-निर्माण की ऐसी तड़प और इतना धैर्य है ?)
मैं फिर तुम्हें याद दिलाता हूँ, ' तुम्हें कर्म करने का अधिकार तो है, किन्तु उससे मिलने वाले फल के ऊपर नहीं।' चट्टान की तरह दृढ़ रहो। सत्य की हमेशा विजय होती है ! श्रीरामकृष्ण की सन्तान निष्कपट और सत्यनिष्ठ रहे, शेष सब कुछ ठीक हो जायेगा। कदाचित हम लोग इस मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण आन्दोलन का, फल देखने के लिये जीवित न रहें; किन्तु जैसे इस समय हमें, अपने जीवित होने में कोई सन्देह नहीं, उसी प्रकार देर या सबेर निःसंदेह इस चरित्र-निर्माण कारी आन्दोलन का फल अवश्य प्रकट होगा !
आज भारत को उस नव विद्युत्-शक्ति की आवश्यकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नवीन चेतना का संचार कर सके। यह कार्य हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और आगे भी उसी प्रकार होगा। निःस्वार्थ भाव से काम करने में सन्तुष्ट रहो और अपने प्रति सदा सच्चे रहो। पूर्ण रूप से पवित्र, सत्यनिष्ठ और निष्कपट रहो, शेष सब कुछ ठीक हो जायेगा। यदि तुमने श्रीरामकृष्ण के शिष्यों में कोई विशेषता देखी है, तो वह यह है कि वे सम्पूर्णतया निष्कपट हैं। यदि मैं, ऐसे सौ आदमी भी भारत में तैयार करके मर सकूँ, तो मेरा काम पूरा हो जायगा और मैं शान्ति से मर सकूँगा। कब तक ऐसे लोग मिलेंगे, यह केवल भगवान ही जानते हैं। 
मोहनिद्रा में सोये हुए अज्ञानी मनुष्य, तो अनापशनाप आरोप लगायेंगे ही। ' neither seek aid nor avoid'-- हम न तो सहायता ढूँढ़ते हैं, न उसे अस्वीकार करते हैंहम तो उस परम पुरुष (Most High) के दास हैं। मोहनिद्रा में सोये हुए क्षुद्र मनुष्य इस आन्दोलन के विरुद्ध क्या तुच्छ प्रयत्न कर रहे हैं, उस ओर हमारी दृष्टि भी नहीं जानी चाहिये।  ' Onward! Upon ages of struggle a character is built.' आगे बढ़ो ! सैकड़ों युगों के उद्द्य्म से चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ। सत्य के एक शब्द का भी लोप नहीं हो सकता। वह दीर्घ काल तक कूड़े के नीचे भले ही दबा पड़ा रहे, परन्तु देर या सबेर वह प्रकट होगा ही। 
सत्य अविनाशी है, सद्गुण अनश्वर हैं, पवित्रता अक्षय है ! मुझे सच्चे (अकृत्रिम) मनुष्य की आवश्यकता है; मुझे शंख-ढपोर चेले (जिनका जीवन वैसा न हो जिसका वे उपदेश करते हों)  नहीं चाहिये । मेरे ब्च्चे, दृढ़ रहो। कोई आकर तुम्हारी सहायता करेगा, इसका भरोसा न करो। क्या सब प्रकार की मानव-सहायता की अपेक्षा मोस्ट हाई- 'परमपुरुष' श्रीरामकृष्ण क्या अनन्त गुना शक्तिमान नहीं हैं ? पवित्र बनो, ईश्वर पर विश्वास रखो, हमेशा उनके ऊपर ही निर्भर रहो- फिर तुम्हारा सब ठीक हो जायेगा, कोई भी तुम्हारे विरुद्ध कुछ न कर सकेगा। आओ, हम सब प्रार्थना करें, ' हे कृपामयी ज्योति, पथ-प्रदर्शन करो' --और अंधकार में से एक किरण दिखायी, पथ-प्रदर्शक कोई हाथ आगे बढ़ आयेगा।
जो लोग दारिद्र्य, पुरोहित-प्रपंच तथा प्रबलों के अत्याचारों से पीड़ित हैं, भारत के उन करोड़ो पददलितों के लिये प्रत्येक आदमी दिन-रात प्रार्थना करे। सर्वदा उनके लिये प्रार्थना करे। मैं धनवान ओर उच्च श्रेणी की अपेक्षा इन पीड़ितों को ही धर्म का उपदेश देना पसन्द करता हूँ। मैं न कोई तत्व-जिज्ञासु हूँ, न दार्शनिक हूँ ओर न सिद्ध पुरुष हूँ। मैं निर्धन हूँ ओर निर्धनों से प्रेम करता हूँ। इस देश मे जिन्हें गरीब कहा जाता है, उन्हें देखता हूँ -भारत के गरीबों की तुलना में इनकी दशा अच्छी होने पर भी, यहाँ के कितने ही लोग उनके प्रति सहानुभूति का भाव रखते हैं ! और भारत में, बीस करोड़ नर-नारी जो सदा गरीबी और मूर्खता के दलदल में फँसे हैं, उनके लिये किसका हृदय रोता है ?  पाश्चत्य के लोगों और भारत की सहृदयता में यही महान अन्तर है।  उनके उद्धार का क्या उपाय है ? कौन उनके दुःख में दुःखी है ? वे अंधकार से प्रकाश में नहीं आ सकते, उन्हें शिक्षा नहीं प्राप्त होती --उन्हें कौन प्रकाश देगा ? शिक्षा देने के लिये उनके द्वार द्वार तक कौन घूमेगा ? ये ही तुम्हारे ईश्वर हैं, ये ही तुम्हारे इष्ट बनें। निरन्तर इन्हीं के लिये सोचो, इन्हींके लिये काम करो, इन्हींके लिये निरन्तर प्रार्थना करो--प्रभु तुम्हें मार्ग दिखाएगा। 
उसी को मैं महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये द्रवीभूत होता है, अन्यथा वह दुरात्मा है। आओ, हमलोग अपनी इच्छा-शक्ति को ऐक्य भाव से उनकी भलाई के लिये निरंतर प्रार्थना मे लगायें। हम अनजान, बिना सहानुभूति के, बिना मातमपुर्सी के, बिना सफल हुए मर  जायेंगे, परन्तु हमारा एक भी विचार नष्ट नहीं होगा। वह कभी न कभी अवश्य फल लायेगा। मेरा हृदय भाव से इतना गद्गद हो गया है कि मैं उसे व्यक्त नहीं कर सकता; तुम्हें यह विदित है, तुम उसकी कल्पना कर सकते हो। जब तक करोड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, परन्तु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता !  वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाट-बाट से अकड़कर चलते हैं, यदि उन बीस करोड़ देशवासियों के लिये जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं, कुछ नहीं करते, तो वे घृणा के पात्र हैं। मेरे भाइयों, हम लोग गरीब हैं, नगण्य हैं, किन्तु हम जैसे गरीब लोग ही हमेशा उस परम पुरुष (Most High) के यन्त्र बने हैं! परमात्मा तुम सभी का कल्याण करे।
सस्नेह, विवेकानन्द                       
 541 Dearborn Avenue,
  Chicago, 1894
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