Wednesday, May 14, 2014

शिक्षक : विश्व के महान मार्गदर्शक नेता

(स्वामी विवेकानन्द द्वारा ३ फ़रवरी, १९०० ई० को शेक्सपियर क्लब, पसाडेना, कैलिफोर्निया में दिया गये अंग्रेजी भाषण का भावानुवाद
हिन्दुओं के सिद्धान्त अथवा ' भारतीय-परिकल्पना' के अनुसार, यह ब्रह्माण्ड 'cycles of wave forms'  तरंगाकर-विधि में गतिमान हैयह एक बार उठता है और उन्नति की पराकाष्ठा ( zenith-चरम बिन्दु) को प्राप्त कर लेता है; तदन्तर उसका पतन आरम्भ होता है --कुछ काल तक वह इसी प्रकार, अवनति के गर्त में पड़ा रहता है, मानो पुनः उत्थान के लिये शक्ति-संग्रह कर रहा हो ! जिस प्रकार समुद्र में निरन्तर भीमकाय  लहरें उठती और गिरती रहती हैं-उत्थान और पतन, पतन और उत्थान-यही विश्व की गति है! जो नियम ब्रह्माण्ड के सत्य है, वही नियम इसके हर हिस्से पर भी लागु होता है। अथवा यूँ कहें कि जो विधान समष्टि के लिये सत्य है, वही व्यष्टि के लिये भी सत्य है ! The march of human affairs is like that. मनुष्य-समाज के सभी व्यापारों में भी यही तरंगवत् उत्थान और पतन का विधान लागु होता है। राष्ट्रों के इतिहास भी इसी उत्थान और पतन की कहानियाँ हैं, वे उठते हैं और गिरते हैं--उत्थान के बाद पतन-काल आता है और पतन के पश्चात् पहले की अपेक्षा और भी अधिक शक्ति के साथ पुनरुत्थान होता है। निरन्तर यही उत्थान और पतन का चक्र चलता रहता है। 
 विश्व के धार्मिक जगत में भी अनवरत रूप से यही क्रिया चल रही है। सम्पूर्ण मनुष्य जाति निरंतर प्रगति-अभियान, 'पूर्णत्व' (perfection) प्राप्ति के पथ पर अग्रसर है ! भौतिक जीवन के समान, प्रत्येक राष्ट्र के आध्यात्मिक जीवन में भी पतन और उत्थान के युग आते हैं। जब किसी राष्ट्र (या उसके नागरिकों) की आध्यात्मिक अवनति होती है, (या विदेशी आक्रमण कारियों द्वारा उसे गुलामी की जंजीरों में जकड़ दिया जाता है), तो प्रतीत होता है कि उसकी जीवन-शक्ति नष्ट हो गयी -वह छिन्न-भिन्न हो गयी है। किन्तु वह राष्ट्र पुनः बल संग्रह करता है-उन्नति करने लगता है - जाग्रति की एक विशाल लहर उठती है, और सदैव यही देखा जाता है कि इस विशालकाय तरंग के सर्वोच्च शिखर पर कोई चमकती हुई आत्मा (shining soul)- कोई महान सन्देशवाहक, कोई देवदूत या पैग़म्बर (कबीर, तुलसी, रहीम, अमीर खुशरो, मलिक मोहम्मद जायसी, गुरु नानक, चैतन्य - के बाद आधुनिक युग में श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द के रूप में) विराजमान हैं। 
एक ओर जहाँ वे उस राष्ट्रिय अभ्युत्थान (the nation rise-अर्थात उसके नागरिकों का चरित्र-निर्माण) के शक्तिदाता (impetus-आवेगदाता) होते हैं, वहीं दूसरी ओर वे स्वयं उस आद्दाशक्ति के फलस्वरूप (- माँ भवतारिणी से जगतगुरु बनने के लिये चपरास प्राप्त उसके लाड़ले पुत्र) होते हैं, जो (शक्ति-माँ भवतारिणी) उस अभ्युदय - उस तरंग का मूल  हैं। वे एक ओर अपनी अद्भुत विद्युत् शक्ति (tremendous power) से जहाँ वे जड़ हो चुके समाज को जाग्रत और सचेतन (conscious) करते हैं, वहीं वह समाज ही उनकी इस प्रचण्ड शक्ति के आविर्भाव का कारण होता है। इस प्रकार वे एक दूसरे पर क्रिया-प्रतिक्रिया करते रहते हैं- {जनता में से जनार्दन (नेता) बनने की प्रक्रिया के अनुसार}, परस्पर के स्रष्टा एवं सृष्ट हैं - जनक एवं जन्य (Creator and created) हैं। वे ही संसार के महान विचारक एवं मनीषी होते हैं, ये ही दुनिया के पैग़म्बर (Prophet), शास्वत जीवन के सन्देश-वाहक ऋषि और ईश्वर के अवतार कहलाते हैं। 
कुछ व्यक्तियों की धारणा है कि दुनिया में केवल एक ही ईश्वरावतार, एक ही पैग़म्बर (ईशदूत या नबी) या एक ही धर्म, हो सकता है, किन्तु यह धारणा सत्य नहीं है। इन सब ईशदूतों या महान नबियों के जीवन का अध्यन और मनन करने पर हमें ज्ञात होगा कि उनमें से प्रत्येक को विधाता ने मानो केवल एक -बस एक स्वर का अभिनय करने के लिये ही निर्दिष्ट किया था। वहाँ हम यह भी देख पाते हैं कि सब स्वरों के समन्वय से ही एकलयता उतपन्न होती है, किसी एक स्वर से नहीं। विभिन्न राष्ट्रों और जातियों के इतिहास भी यह बतायेंगे -कोई जातिविशेष सदा के लिये संसार का उपभोग करने की अधिकारी नहीं रह सकती। Each race has its mission to perform, its duty to fulfill. 
समस्त मानवजाति की इस ईश्वरनिर्दिष्ट एकलयता -(या पूर्णत्व की प्राप्ति) में विश्व के सभी जाति और धर्म के लोगों को अपने अपने स्वर को मिलाना पड़ता है, सभी राष्ट्रों को अपना अपना जीवनोद्देश्य प्राप्त करना पड़ता है, अपने अपने कर्तव्य की पूर्ति करनी पड़ती है। इन समस्त राष्ट्रों के जीवनोद्देश्य की समष्टि ही उस महान समन्वय -उस महान एकलयता का निर्माण करती है। So, not any one of these Prophets is born to rule the world for ever. (जिस प्रकार विश्वमानवता में समन्वय लाने के लिये प्रत्येक राष्ट्र को अपना अपना कर्तव्य या जीवनोद्देश्य निभाना पड़ता है,) जाति सम्बन्धी यही बात प्रत्येक जाति के ईश्दूतों,अवतारों या नबियों पर भी लागू होती है। उनमें से कोई भी अवतार, ईश्दूत, ऋषि या नबी सारे विश्व पर सदा के लिये शासन करने के लिये नहीं जन्मा है। ऐसा न तो आज तक हुआ है और न भविष्य में कभी होगा। उनमें से प्रत्येक ने मानवता को आध्यात्मिक पूर्णता करने की शिक्षा में अपनी अपनी भूमिका निभायी है, और समय प्राप्त होने पर हर ईशदूत या नबी उस भागीदारी के रूप में विश्व के शासक बनेंगे तथा उसकी नियति को नियंत्रित करेंगे। 
हममें से अधिकांश लोग जन्मतः सगुण धर्म (personal religion), अवतारवाद में श्रद्धा रखते हैं। हम मूल तत्व, आदि हेतु (principles) की चर्चा करते हैं, सूक्ष्म तत्वों और उपपत्तियों (अनुमानों या theories) पर विचार-विमर्श करते हैं। यह ठीक है, किन्तु हमारे प्रत्येक कार्य, प्रत्येक विचार से यही प्रकट होता है कि हम किसी तत्व को केवल तभी समझ पाते हैं, जब वह हमें किसी व्यक्ति विशेष के माध्यम से  प्राप्त होता है केवल किसी सगुण साकार दृष्टान्त की सहायता से ही हम उपदेशों को समझ पाते हैं किसी सूक्ष्म तत्व की धारणा में हम तभी समर्थ होते हैं, जब वह किसी पुरुषविशेष (मानवजाति के मार्गदर्शक नेता -ईसा, बुद्ध या श्रीरामकृष्ण) के रूप में साकार रूप धारण कर लेता है। केवल दृष्टान्त(रोल मॉडल) की सहायता से ही हम उपदेशों को समझ पाते है काश ! ईश्वरेच्छा से हम सभी इतने उन्नत होते कि हमें तत्वविशेष की धारणा करने में दृष्टान्तों एवं आदर्श पुरुषों के माध्यम की आवश्यकता न पड़ती। किन्तु हम उतने उन्नत नहीं हैं, और इसीलिये स्वभावतः अधिकांश मनुष्यों ने इन असाधारण व्यक्तियों - ईसाईयों, बौद्धों और हिन्दुओं द्वारा पूजित किसी न किसी पैगम्बरों और अवतारों को आत्मसमर्पण कर दिया है। मुसलमानों ने आरम्भ से ऐसी उपासना का विरोध किया है, पर इस कट्टर विरोध के बावजूद हम हम देखते हैं कि पैगम्बर की उपासना तो दूर रही, वे प्रत्यक्षतः सहस्रों पीरों की पूजा करते देखे जा सकते हैं। तथ्यों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। We cannot go against facts!
व्यक्तिविशेष की पूजा-अर्चना करने के लिए हम विवश हैं, और वह हितकारी है। जब ईशदूत ईसा से लोगों ने पूछा -'प्रभु, हमें परम पिता परमेश्वर के दर्शन कराइये।' तो ईसा ने कहा - "He that hath seen me hath seen the Father." अर्थात ' जिसने मुझे देख लिया है, उसने उस परम पिता को भी देख लिया है।' उनके इस उत्तर पर तुम चिंतन-मनन करो। हम ईश्वर को केवल मानवीय भाव में ही दर्शन कर सकते हैं। हममें ऐसा कौन है, जो ईश्वर को मानव (स्त्री या पुरुष) के अतिरिक्त अन्य रूप में कल्पना कर सकता है ? केवल मनुष्य-रूप में, केवल मानवीय भावों (सद्गुणों) के माध्यम से ही हम ईश्वर-दर्शन कर सकते हैं। इस कमरे में सर्वत्र प्रकाश का स्पंदन वर्तमान है, किन्तु हम उसे सर्वत्र देखने में क्यों समर्थ हैं ? (हम सर्वत्र प्रभु को न देखकर विभिन्न वस्तुओं या व्यक्तियों के रूप में क्यों देखते है?) हम केवल किसी दीपक (lamp) में ही उसे (प्रकाश को) देख सकते हैं। 
उसी प्रकार ईश्वर (परमसत्य, सत्यसार या प्रेम) भी सर्वव्यापी, निराकार एवं निर्गुण तत्व है, but we are so constituted at present, किन्तु वर्तमान में (जब तक हम अपने मन की चाहरदिवारी को तोड़ कर बाहर नहीं निकल सके हैं, तब तक) हमारी प्रकृति ही ऐसी है कि हम केवल किसी नररूपधारी अवतार के माध्यम से ही उसकी उपलब्धि कर सकते हैं, उसका साक्षात्कार कर सकते हैं। जब इन महानज्योतिर्मय आत्माओं का विश्व में आविर्भाव होता है, तभी मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार होता है। और हम जिस प्रकार धरती पर जन्म लेते हैं, वे उस प्रकार नहीं आते। 
हम विश्व में आते हैं भिक्षुकों और अकिंचनों की भाँति, पर उनका आगमन होता है सम्राटों की भाँति, मानव ह्रदय पर युगों तक राज्य करने। We come as beggars; they come as Emperors.हम उन अनाथों (orphans या लावारिसों या यतीमों) की तरह आते हैं, as people who have lost their way and do not know it. जो यह नहीं जानते कि (हमारे उद्गम का श्रोत कहाँ है) हमें जाना कहाँ है ? What are we to do? देव-दुर्लभ मनुष्य शरीर प्राप्त कर लेने के बाद अब हमें क्या करना है ? हम नहीं जानते कि हमारे जीवन का अर्थ क्या है, इसका चरम लक्ष्य क्या है ? अपने इस उद्देश्यहीन जीवन में (आर्थिक-सुरक्षा प्राप्त करने के लिये) हम आज तो एक काम करते हैं, और कल दूसरा। हम लोग (जन्म-मृत्यु के) प्रवाह में पड़े हुए तिनकों की भाँति लहरों के थपेड़े खाते इधर-उधर बहते जाते हैं, तथा झंझा में उड़ते सूखे पत्तों की भाँति इतस्तः गिर पड़ते हैं।
किन्तु हम देखेंगे कि मानव जाति के इतिहास में विश्व के कल्याण के लिये जो अवतार हुए हैं, उनका जीवन-कार्य प्रारम्भ से ही निश्चित रहा है। उनके जीवन का सारा नक्शा, सारी योजना उनके आँखों के सामने थी, और उससे वे एक इंच भर भी न डिगे। Because they come with a mission, they come with a message, they do not want to reason. चूँकि उनका एक निश्चित जीवन-लक्ष्य होता है, अपने जीवन के लिये एक कार्य (मिशन) लेकर आते हैं, अतः वे एक सन्देश भी लाते हैं; और उसके संबन्ध में तर्क-वितर्क नहीं करते। 
क्या तुमने ऐसे किसी ऋषि, पैग़म्बर या अवतार के बारे में सुना या पढ़ा है, जिसने अपने उपदेशों (महावाक्यों) को युक्ति का आधार दिया हो ? नहीं, उनमें से किसी ने ऐसा नहीं किया है। (वेदों के महावाक्यों को सिद्ध करने के लिये) उन ऋषियों को तर्क करने की क्या आवश्यकता है ?  They speak direct. वे सीधा और सरल बोलते हैं । क्योंकि वे सर्वत्र परम सत्य (महावाक्यों) को देखने में समर्थ होते हैं, और न केवल वे स्वयं उस परमसत्य को देख सकते हैं, बल्कि उनमें दूसरों को दिखाने का सामर्थ्य भी रहता है। 
यदि तुम मुझसे पूछो कि ईश्वर है या नहीं, और मैं कह दूँ, कि हाँ ईश्वर है ! तो तुम झट मुझे अपनी युक्तियाँ बताने के लिये बाध्य करोगे, और मुझ बेचारे को कुछ युक्तियाँ पेश करने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा देनी पड़ेगी। किन्तु यदि कोई ईसा से यही प्रश्न पूछता, तो ईसा तत्काल उत्तर देते -' हाँ, ईश्वर है।' और यदि तुम ईसा से इसका प्रमाण माँगते, तो निश्चय ही ईसा ने कहा होता, ' लो, यह ईश्वर तुम्हारे सम्मुख खड़ा है, दर्शन कर लो।' इस प्रकार हम देखते हैं कि इन अवतारों या ईशदूतों की ईश्वर (या या स्वयं के सच्चे स्वरुप) विषयक धारणा अनुभूतिजन्य उपलब्धि, प्रत्यक्ष दर्शन (direct perception) पर आधारित है, तर्क जन्य नहीं। वे अन्धकार में नहीं टटोलते, उनके कथन में अनुभूति जन्य उपलब्धि का बल होता है। मैं लकड़ी से बने इस टेबल को देखता हूँ, किसी भी प्रकार का युक्ति तर्क मेरे इस विश्वास (प्लास्टिक नहीं) को डिगा नहीं सकता। इसीको कहते हैं प्रत्यक्ष दर्शन! इसी प्रकार इन महान अवतारों, ऋषियों, ईशदूतों या नबियों का अपने आदर्शों, अपने जीवन के चरम लक्ष्य (मिशन) और सर्वोपरि स्वयं अपने आप पर अटल श्रद्धा होती है। 
उन ऋषियों (The great shining Ones) में जितना आत्मविश्वास होता है, उतना अन्य किसी को भी नहीं! लोग आपस में चर्चा करते हैं - क्या तुम ईश्वर में विश्वास रखते हो ? क्या तुम पुनर्जन्म या परलोक के अस्तित्व को मानते हो? या तुम इस मत (अद्वैत या विशिष्टाद्वैत- doctrine) में या उस धर्मसिद्धान्त (dogma) में श्रद्धा रखते हो या नहीं? But here the base is wanting: this belief in oneself. किन्तु यहाँ तो मूलभित्ति ही गायब है, अर्थात आत्मश्रद्धा का ही घोर अभाव हो गया है। (पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाववश हम स्वयं को मरण धर्म शरीर से भिन्न अन्य कुछ, 'अजर-अमर-अविनाशी' आत्मा के रूप में सोच ही नहीं सकते हैं।) 
जिसे स्वयं पर विश्वास नहीं है, उसे अन्य सूक्ष्म तत्वों में विश्वास रखने की आशा कैसे की जा सकती है ? मुझे स्वयं अपने अस्तित्व तक में पूरा विश्वास नहीं है, एक क्षण मैं सोचता हूँ -मैं हूँ ! मेरा अस्तित्व है और कुछ भी मुझे नष्ट नहीं कर सकता। किन्तु दूसरे ही क्षण (सामने से आती हुई मृत्यु को देखकर) मृत्यु-भय से मैं काँपने लगता हूँ। अभी हम सोचते हैं कि हमतो अजर-अमर अविनाशी आत्मा हैं, और पल भर बाद अपनी ही कल्पना का कोई भूत देखकर (साँप जैसा घातक कोई शत्रु- की द्वैतबुद्धि वश) हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, हमारा विवेक छुप जाता है, हमें यह भी ध्यान नहीं रहता कि हम कौन हैं, और कहाँ हैं, जीवित हैं या मृत हैं। कभी सोचते हैं कि हम तो अत्यंत धार्मिक और पवित्र (ब्रह्म-M/F नहीं) हैं, किन्तु दूसरे ही क्षण एक धक्का लगता है, और हम चारों खाने चित हो जाते हैं। इसका कारण ? — I have lost faith in myself, my moral backbone is broken. कारण यही है कि हमारा आत्मविश्वास मर गया है, इसीलिये हमारी नैतिकता (ब्रह्मचर्य) की रीढ़ टूट गयी है; (चरित्र ढीला है, इसीलिये विदेशों से इकोनॉमिक्स की ऊँची डिग्री लेने के बाद भी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना पड़ता है।)
किन्तु मानव जाति के इन महान मार्ग-दर्शक नेताओं, ऋषियों, आचार्यों (great Teachers) या बुद्ध पुरुषों में तुम्हें यह एक लक्षण सर्वत्र दिखेगा कि उनमें प्रचण्ड आत्मविश्वास भरा होता है। उनका यह आत्मविश्वास इतना अद्वितीय होता है कि हम उसे पूर्णतया नहीं समझ सकते। इसीलिये इन महान आचार्यों या नबियों के द्वारा स्वयं के विषय में कथित वचनों की कई प्रकार से व्याख्या करके उन्हें उड़ा देने का प्रयत्न करते हैं, तथा उन्होंने अपने आत्मसाक्षात्कार या ईश्वरोपलब्धि के संबन्ध में जो बातें कहीं हैं, उनका अर्थ लगाने के लिये सहस्रों मतवादों (-'अल्ला परवर दिगार है, जबकि राम-ईसा-बुद्ध-मोहम्मद तो बन्दा है !')  की सृष्टि कर लेते हैं।  
हम अपने विषय में उन ऋषियों, नबियों या अवतारों के समान (अहं ब्रह्मास्मि) नहीं सोच सकते, और इसीलिये स्वभावतः, हम उन्हें समझ भी नहीं पाते। जब इन महापुरुषों के मुख से शब्द निकलते हैं, तो सारे विश्व को विवश होकर सुनना पड़ता है। जब वे बोलते हैं, तो एक एक शब्द सीधे हृदय में प्रवेश करता है, वह बम के समान फूट पड़ता है और सुनने वाले पर अपना असीम प्रभाव जमा लेता है। What is in the word, unless it has the Power behind?(खोखले नारों) निरी वाणी (महावाक्यों -बनो और बनाओ में भी) में क्या है, यदि वाणी के पीछे वक्ता की प्रचण्ड शक्ति -अपना जीवन वैसा अनुकरणीय (exemplary -दृष्टांत योग्य) न हो ! 
तुम किस भाषा में बोलते हो और किस प्रकार अपनी भाषा में शब्द-विन्यास करते हो, इससे किसी को क्या मतलब ? तुम अलंकार युक्त, व्याकरण सम्मत, लच्छेदार भाषा का प्रयोग करते हो या नहीं, इससे भी किसी का क्या प्रयोजन ? प्रश्न तो है-तुम्हारे पास लोगों को देने के लिये कुछ है या नहीं ? यहाँ केवल कहानी-किस्से सुनने की बात नहीं है, बात है देने और लेने की। It is a question of giving and taking, and not listening. क्या तुम्हारे पास देने के लिये कुछ है ? यदि है, तो दो । Words but convey the gift: it is but one of the many modes. शब्द तो केवल तुम्हारे दान (gift) को लोगों तक पहुँचा देंगे, ये तो केवल एक माध्यम हैं।
 कभी कभी हम देखते हैं कि मौन रहकर भी एक व्यक्ति दूसरे में भाव (सत्य का -त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि) संचारित कर देता है। वे देने के लिये आते हैं। जो (चपरास प्राप्त) ईशदूत, ऋषि या नेता होते हैं- वे आदेश देते हैं- Be and Make !; और हमारा कार्य है उनके आदेशों को ग्रहण करना। ' मुझे जगत को कोई विशेष सन्देश देना है' -इस बात में प्रचण्ड विश्वास उन सब मानव जाति के मार्गदर्शक नेताओं में मिलेगा, जिन्हें दुनिया पैग़म्बरों और अवतारों के रूप में पूजती आ रही है। ये महान शिक्षक या ऋषि इस पृथ्वी पर जीवंत ईश्वरस्वरुप है। इनके अतिरिक्त हम और किनकी उपासना करें ? मैं अपने मन में ईश्वर की धारणा करने का प्रयत्न करता हूँ -और अंत में पाता हूँ कि मेरी धरणा अत्यंत क्षुद्र और मिथ्या है। फिर जब मैं अपनी आँखें खोलकर पृथ्वी की इन महान आत्माओं या पैग़म्बरों के जीवन-चरित्र (रमा-कृष्ण-बुद्ध-ईसा के actual life) को देखता हूँ, तो मुझे प्रतीत होता है कि ईश्वर विषयक मेरी मेरी उच्च से उच्च धारणा (अल्ला या सच्चिदानन्द) से भी वे कहीं उच्चतर और महान हैं। 
मेरे जैसा (तथाकथित राष्ट्रभक्त) व्यक्ति, जो किसी बंगलादेशी घुसपैठिये को कारावास की यातनाएँ सहने के लिये बाध्य करता है, बुद्ध के दया की कल्पना -उस असीम दया की धारणा क्या कभी कर सकेगा? क्षमा-दया संबंधी मेरी उच्चतम कल्पना कहाँ तक पहुँच सकती है ? अपनी भौतिक सीमाओं (जाति-धर्म-राष्ट्र संबंधी पूर्वाग्रहों) को कौन लाँघ सकता है ? अपनी मानसिक चहारदिवारी को कौन पार कर सकता है ? Which of you can jump out of your own minds? हम अपने इस शारीरिक स्तर (M/F) के जीवन में आपस में जो प्रेम करते हैं, उसकी अपेक्षा प्रेम की उच्चतर धारणा हम कर ही कैसे सकते हैं ? जिसका (सम्पूर्ण मानवता के प्रति निःस्वार्थ प्रेम का) हमने कभी अनुभव ही नहीं किया, उसकी कल्पना भला हम कैसे कर सकेंगे? 
किन्तु इन बुद्ध जैसे अवतारों के जीवन की प्रत्यक्ष घटनाएँ हमारे सामने हैं-उनकी दया, प्रेम एवं पवित्रता से भरे ऐसे प्रत्यक्ष कार्य हैं, जिनकी हम कल्पना तक नहीं कर सकेंगे। तब फिर क्या आश्चर्य है, यदि मैं इन महापुरुषों के चरणों में गिरकर ईश्वर के रूप में उनकी अर्चना करूँ ? निराकार तत्व (अल्ला परवर दिगार ) के बारे में लम्बी लम्बी बातें करना सरल है, पर मुझे एक तो ऐसा व्यक्ति बताओ, जो उपर्युक्त साकार उपासना (किसी बन्दे - राम या मोहम्मद रूपी नबी) के अतिरिक्त और कुछ कर सके? Talking is not actuality.करने और कहने में बहुत भेद है। निराकार ईश्वर, निर्गुण तत्व के विषय में चर्चा करना कठिन नहीं है -और कोई करे तो मुझे आपत्ति नहीं, किन्तु ये नरदेव -बुद्ध पुरुष, ऋषि, सदा से, सभी जातियों एवं सभी राष्ट्रों के यथार्थ में ईश्वर रहे हैं। ये सकल देव-मानव चिर काल से पूजित होते आ रहे हैं, और तब तक पूजित होते रहेंगे, जब तक मानव मानव बना रहेगा। मनुष्य मात्र ही ऋषित्व, यथार्थ धर्म-जीवन (बुद्धत्व) या ईश्वरत्व की उपलब्धि कर सकता है- यह विश्वास उन्हीं जीवंत पैग़म्बरों को देखकर हमलोग कर पाते हैं। केवल अस्पष्ट रहस्यमय तत्वों को सुनते रहने से क्या लाभ ?
मैंने अपने जीवन में सभी राष्ट्रों और जातियों के सब अवतारों की उपासना कर सकना सम्भव पाया है, तथा
' Be and Make' आन्दोलन के कारण भविष्य में होने वाले अनेक अवतारों, ऋषियों, पैग़म्बरों या नबियों की उपासना करने को प्रस्तुत हूँ। एक माँ अपने पुत्र को किसी भी वेश में पहचान सकती है -और यदि कोई स्त्री यह नहीं कर सकती, तो वह निश्चय ही उस व्यक्ति की माँ नहीं हो सकती है ! [आशिक (प्रेमी) है ? तो माशूक (प्रेमास्पद) को हर रूप में पहचान ! ] अतः तुममें से जो व्यक्ति (ऋषि) नेता होने का दावा करे, किन्तु किसी एक राष्ट्र के एक ही विशेष अवतार में सत्य एवं ईश्वर की अभिव्यक्ति देखते हैं और दूसरों में नहीं, उनके विषय में मेरा स्वाभाविक निष्कर्ष यही है कि वे किसी भी अवतार या नबी (शाहिद आलम के ईश्वरत्व (बुद्धत्व या ऋषित्व ) को नहीं जानते। 
जिस प्रकार राजनितिक दलबन्दी (party politics) के वशीभूत व्यक्ति सत्यासत्य की चिन्ता न कर किसी एक दल (गाँधी-नेहरू वंशवाद या यादव वंशवाद) की राजनीति का साथ देने लगते हैं, उसी प्रकार इन  कट्टर कठमुल्लों ने भी एक सम्प्रदाय विशेष को ही अपना सर्वस्व मान लिया है। पर यह धर्म नहीं है। संसार में ऐसे अंधे और मूढ़ भी कई हैं, जो समीप में शुद्ध और मीठे पानी का कुआँ होने पर भी खारे कुएँ का ही पानी पिएंगे, क्योंकि उस कुएँ को उसके पूर्वजों ने खुदवाया था ! 
अतएव, अपने अल्प अनुभव से मैंने यही सीखा है कि धर्म में जो दोष एवं त्रुटियाँ लोग देखते हैं, उसमें धर्म का कोई दोष नहीं है। धर्म ने कभी मनुष्यों पर अत्याचार करने की आज्ञा नहीं दी, धर्म ने कभी स्त्रियों को चुड़ैल और डाइन कहकर जीवित जला देने का आदेश नहीं दिया, किसी धर्म ने कभी इस प्रकार अन्यायपूर्ण कार्य करने की शिक्षा नहीं दी। तो फिर धर्म के नाम पर अत्याचार, अनाचार होने का कारण क्या है? कारण है स्वयं को सेक्युलर और दूसरों को कम्यूनल कहने वाले धूर्त राजनीतिज्ञ लोग ! सच्चे धार्मिक लोग धर्मों में नफरत नहीं फैला सकते। और यदि इस प्रकार की कुटिल राजनीति (लुटेरों, घोटालेबाजों का वंशवाद) धर्म का स्थान ग्रहण करले, हिन्दूत्व को भारत की नागरिकता न समझकर धर्म समझने लगे, तो यह दोष धर्म का नहीं दुष्ट सेक्युलर दलों का है। अतः जब कोई व्यक्ति यह दावा करे कि केवल मेरा धर्म, या मेरा पैग़म्बर ही सच्चा है, तो वह झूठ बोलता है-उसे धर्म का 'क,ख' (alpha of religion) भी नहीं मालूम ! धर्म न तो सिद्धान्तों की थोथी बकवास है, न मत-मतान्तरों का प्रतिपादन और खण्डन है और न बौद्धिक सहमति(intellectual consent) ही है।
धर्म का अर्थ है -ह्रदय के अन्तर्तम प्रदेश में सत्य की उपलब्धि; धर्म का अर्थ है ईश्वर का संस्पर्श प्राप्त करना। इस तत्व की उपलब्धि करना कि मैं केवल शरीर नहीं हूँ, मैं सार्वभौम आत्मा (सच्चिदानन्द) के साथ नित्य संयुक्त एक आत्मा हूँ 'I am a spirit in relation with the Universal Spirit' जो अजर अमर अविनाशी है; एवं उस सच्चिदानन्द के (विभिन्न जातियों और राष्ट्रों में जन्मे) अनेक अवतारों के साथ से मेरा युग युग का अच्छेद्द्य (माँ-बेटे के समान घनिष्ट) संबन्ध है। यदि तुमने यथार्थ में उस माँ भवतारिणी के गृह में प्रवेश किया है, तो अवश्य ही उसके लाड़ले पुत्रों का दर्शन भी किया होगा ! तब फिर यह क्यों कहते हो तुम उन्हें नहीं पहचानते? और यदि तुम वास्तव में उन्हें नहीं पहचानते हो, तो उसीसे यह प्रमाणित हो जाता है,कि अभी तक तुम मृत्यु-स्वरूपिणी माँ काली के गृह में प्रवेश नहीं पा सके हो ! (आशिक अपने माशूक को, कुत्ता अपने मालिक को) जननी अपने वत्स को--- किसी भी वेश में पहचान लेती है; पुत्र का छद्म वेश उसकी आँखों को धोखा नहीं दे सकता। सभी युगों और सभी देशों के इन महान ऋषि नर-नारियों को पहचानो, और यह ज्ञान प्राप्त करो कि उनमें परस्पर में कोई भेद, कोई अन्तर और पार्थक्य नहीं है। 
जिस किसी व्यक्ति में यथार्थ धर्म का विकास हुआ है, उसे दिव्य ब्रह्म का संस्पर्श मिला है, ईश्वर का साक्षात्कार हुआ है, आत्मा द्वारा परमात्मा की उपलब्धि हुई है, वहाँ व्यक्तियों का ह्रदय इतना विशाल एवं उदार बन गया है broadening of the mind which enables it to see the light everywhere. कि वे देश-काल के बन्धनों से मुक्त होकर ईश्वर और उसके अवतारों की परम ज्योति का दर्शन सर्वत्र- सभी धर्मों और सभी देशों के अवतारों में करते हैं।  
Now, some Mohammedans (ओसामा बीन लादेन जैसे) are the crudest in this respect, and the most sectarian. किन्तु कुछ मुसलमान लोग (जो सूफ़ी परम्परा या गंगा-जमुनी तहजीब में नहीं पले-बढ़े है) लोग सर्वाधिक साम्प्रदायिक एवं संकीर्ण होते हैं। उनका मूल मंत्र (watchword ) है : दुनिया में एक ही खुदा (अल्ला परवर दिगार है) और मुहम्मद ही उसका एक मात्र पैग़म्बर (सन्देश-वाहक) है! अतएव जो इस सिद्धान्त को नहीं मानते, जो वस्तुएँ (बुद्ध की मूर्ति,ग्रन्थ या मन्दिर आदि) इस सिद्धान्त की पोषक नहीं हैं,वे केवल खराब ही नहीं, समूल नष्ट कर देने योग्य हैं। जो व्यक्ति इसमें विश्वास नहीं करता, उसे मौत के घाट उत्तर देना चाहिये; जो अन्य उपासना गृह हैं, उन्हें जमींदोज कर देना चाहिये। जो धर्मग्रन्थ कोई भिन्न उपदेश देती हों,(नालन्दा के बौद्ध-विहार) उनको जला देना चाहिये! 
अंध और प्रशान्त महासागर के मध्य (From the Pacific to the Atlantic) स्थित सारे भूमिखण्ड पर पाँच शताब्दियों तक रक्त की धारा बहती रही। यह है इस्लाम ! किन्तु इन मुसलमानों में भी, दार्शनिक प्रकृति की कुछ प्रबुद्ध आत्मायें यदि कभी हुई हैं, तो उन्होंने इस क्रूरता के विरोध में अपनी आवाज उठायी। ऐसा करके उन्होंने (सूफियों ने) यह प्रमाणित कर दिया कि उन्हें भी 'touch of the Divine' ब्रह्म-संस्पर्श (शाश्वत चैतन्य) की उपलब्धि हो गयी है, सत्य के एक अंश (सत्यसार -प्रेम) का लाभ हो गया है! क्योंकि वे अपने धर्म-पद्धति के साथ खिलवाड़ (घुटनों की कवायद: playing with his religion) नहीं कर रहे थे, क्योंकि उन्होंने यह समझ लिया था कि जिस धर्म की बात वे करते हैं, वह केवल उनके ही पूर्वजों का धर्म (his father's religion ) नहीं है, but spoke the truth direct like a man. उन्होंने सत्य का साक्षात्कार यथार्थ मनुष्य के रूप में किया। 
आधुनिक विकासवाद के सिद्धान्त (theory of evolution) के साथ एक अन्य तथ्य भी जुड़ा हुआ है, वह है 'atavism' -ऐटविज़म: पिछली स्थिति में होना,या पूर्वावस्था की ओर पुनरावर्तन (क्रमसंकोच-वृक्ष से बीज के रूप में लौटना)! धार्मिक क्षेत्र में देखा जाता है कि प्राचीन सिद्धान्तों को वापस लाने के लिए हम में एक प्रवृत्ति रहती है। किन्तु वैसा न कर, हमें कुछ नया सोचना चाहिये-चाहे वह गलत ही क्यों न हो। पोंगापंथी बने रहने की अपेक्षा यही श्रेयस्कर है।  Why should you not try to hit the mark? तुम्हें निशाने को (जीवन लक्ष्य को) हिट करने की कोशिश क्यों नहीं करनी चाहिये ? सटीक निशाना लगाने का प्रयत्न हमेशा करते रहना चाहिये, क्योंकि हम विफलताओं के माध्यम से अधिक समझदार बनते जाते हैं। 
 Time is infinite!  -समय अनंत है, (यह जीवन ही अंतिम जीवन नहीं है!) शास्वत जीवन (अनादि वातं तदेकं-ब्रह्म के साथ शक्ति) में अवस्थिति का अवसर हमारे सम्मुख है-फिर हम हताश क्यों हों ? दीवार को देखो-क्या वह कभी झूठ बोलता है? पर उसकी उन्नति कभी नहीं होती -वह सदैव एक दीवार ही बना रहता है। Man tells a lie — and becomes a god too.किन्तु कोई मनुष्य झूठ बोलता है, किन्तु उसकी देवता बनने की संभावना कभी नष्ट नहीं होती। इसलिये हमें (ब्रह्मविद् बन जाने के लिये या सत्य को जान लेने के लिए) सदैव क्रियाशील -प्रयत्नशील बने रहना चाहिये, ('तमाशा घुस के देखेंगे'- यही मेरा सिद्धान्त रहा है)।
कोई परवाह नहीं, यदि हम गलत रस्ते पर जा रहे हों, कुछ न करने से तो यह अच्छा ही है।गाय कभी झूठ नहीं बोलती पर वह सदैव गाय ही बनी रहती है।
इसलिये क्रियाशील बनो, निशाना लगाते रहो (कुछ न कुछ करते रहो)। चिन्तन करना सीखो-नये विचारों को जन्म दो -चाहे वे गलत ही क्यों न हों। Because my forefathers did not think this way, shall I sit down quietly and gradually lose my sense of feeling and my own thinking faculties? चूँकि हमारे खानदान में, हमारे पूर्वजों ने स्वयं कोई नया विचार खोजने की जुर्रत कभी नहीं की -इसीलिये क्या मुझे भी अपने घुटनों पर माथा टेक कर बैठे रहना चाहिये और अपनी भावना-शक्ति (sense of feeling) तथा विचार-शक्ति ( विवेक-प्रयोग करने की शक्ति thinking faculties) खो देनी चाहिये? इस अवस्था से तो मृत्यु अधिक श्रेयस्कर है। And what is life worth if we have no living ideas, no convictions of our own about religion? जीवन का मूल्य ही क्या रहा, यदि धर्म के संबंध में मेरा अपना कोई दृढ़-निश्चय (convictions), मेरे स्वयं की अनुभूति जन्य कोई जीवन्त धारणा (living ideas) ही न बन सकीं ? नास्तिक लोग-जो ईश्वर को नहीं मानते (the atheists) उनसे कुछ आशाएँ रखी जा सकती हैं, क्योंकि दूसरों से उनका मतभेद होने पर भी, वे कम से कम खुद कुछ विचार करते हैं। जो स्वयं विचार (विवेक-प्रयोग) नहीं करते, उन्होंने अभी धर्म-क्षेत्र में अभी उनका जन्म ही नहीं हुआ है। 

"Smart Jellyfish", game character by Staublicht
(jelly-fish existence : मनमोहन सिंह या दिग्बिजय सिंह टाइप नेता)
उनका अस्तित्व बिल्कुल जेली-फ़िश (jellyfish -उम्र तो बढ़ गया अक्ल नाममात्र की नहीं) है! वे स्वयं विचार नहीं करते, वे वास्तव में धर्म का कोई आदर नहीं करते। (किन्तु खुद को पक्के सेक्यूलर समझते हैं !) But the disbeliever, the atheist, cares, and he is struggling. किन्तु अविश्वासी नास्तिक- जिज्ञासु सत्य की खोज तो कर रहा है, उसे पाने के लिये संघर्ष तो कर रहा है! So think something! Struggle Godward! इसलिये स्वयं चिंतन-मनन करो, ईश्वर को निशाना बनाकर, लक्ष्य का संधान करो! 
असफलता की चिन्ता न करो, यदि 'अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो' की चिन्ता करते करते तुम किसी अद्भुत निष्कर्ष या सिद्धान्त (queer theory-वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥- श्वेताश्वतर) पर पहुँच भी जाओ- तो भी क्या ? यदि तुम्हें भय है कि लोग तुम्हें विचित्र और अजीब कहने लगेंगे, तो अपने निष्कर्ष या सिद्धान्त को अपने तक ही सीमित रखो। तुम्हें इस सत्य का उपदेश देने या दूसरों में प्रचार करने की कोई आवश्यकता नहीं!(?)  If you are afraid to be called queer, keep it in your own mind — you need not go and preach it to others. किन्तु चुपचाप मत बैठे रहो, ईश्वरोन्मुख संघर्ष-या लक्ष्य का संधान करते रहो! (Struggle Godward!Light must come.हृदय मंदिर में दीपक जलना ही चाहिये!) किन्तु यदि कोई आदमी रोज रोज अपने हाथ से मुझे भोजन कराता रहे, तो कुछ ही दिनों में मेरे हाथ बेकार हो जायँगे! भेंड़ों की तरह एक दूसरे के पीछे चलने से आध्यात्मिक मृत्यु (Spiritual Death) अवश्यम्भावी है! निश्चेष्टता का फल ही मृत्यु है। अतएव क्रियाशील बनो Be active; और जहाँ क्रियाशीलता है, वहाँ विभिन्नता तो होगी ही।
विभिन्नता ही जीवन का रस (sauce of life) है, विभिन्नता में एकता का दर्शन ही जीने की कला है! विभिन्नता जगत की हर वस्तु को सुन्दर बना देती है। विभिन्नता ही जीवन का चिन्ह है, यही जीवन-प्रवाह का मूल श्रोत है। फिर इसे देखकर हमें भयभीत क्यों होना चाहिये? 
Now, अब, इतना समझ लेने के बाद -we are coming into a position to understand about the Prophets. हम विभिन्न जातियों और धर्मों में जन्मे अवतारों,ऋषियों या पैग़म्बरों के जीवन-चरित का तुलनात्मक अध्यन करने योग्य हो सकेंगे। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि खानदानी धर्म का नाम लेकर जेली मछली की भाँति निश्चेष्ट पड़े रहने की अपेक्षा जिस सत्यार्थी ने लक्ष्य का संधान गहन रूप से किया है, उसी के हृदय में ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम (सत्यसार) प्रवाहित हुआ है, वही आत्मा ईश्वर की और अग्रसर हुई है, और उसे जीवन में, क्षण भर के लिये ही क्यों न हो, even once in its life - उस परम वस्तु की झलक मिली है, उसका साक्षात्कार हुआ है। उस अवस्था का वर्णन करते हुए मुण्डकोपनिषद् (२/२/८) का ऋषि कहता है-
भिद्यन्ते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। 
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ।। 
 उस समय- ह्रदय के कुटिल भावों का नाश हो जाता है, (अपने और जगत के विषय में) सारी शंकाएँ दूर हो जाती हैं, और कर्मों का क्षय हो जाता है, क्योंकि उस समय उस परम तत्व के दर्शन हो जाते हैं, जो दूर से भी दूरतम तथा निकट से भी निकटतम है!'
किसी सत्यार्थी के जीवन में घटित यह घटना ही यथार्थ धर्म है, यही धर्म का सार है। इसके अतिरिक्त अन्य सब केवल मत-मतान्तर है, कोरा सिद्धान्त है! उस परम अवस्था- आत्मसाक्षात्कार (direct perception) तक पहुँचने के भिन्न मार्गों को मज़हब या सम्प्रदाय कहते हैं, और उस अवस्था में जो उपलब्धि होती है वही है धर्म ! 
टोकरी के फल तो कीचड़ में गिर गये हैं, और हम टोकरी को लेकर झगड़ रहे हैं। धर्म पर विवाद करने वाले दो व्यक्तियों से जरा यह पूछकर देखो, 'क्या तुमने ईश्वर को देखा है? क्या तुमने उन सब अतीन्द्रिय विषयों का अनुभव किया है, जिनके लिये तुम झगड़ रहे हो ? कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि -'केवल ईसा मसीह ही सच्चा पैग़म्बर है!' ठीक है। पर उससे पूछो, ' क्या तुमने ईसा को कभी देखा है ? ' क्या तुम्हारे पिता ने कभी ईसा को देखा था ? नहीं, 'क्या तुम्हारे पितामह ने ईसा को देखा था ?' नहीं; 'तब तुम विवाद किस बात पर कर रहे हो ? ' फल तो ज़मीन पर गिर गये हैं और तुम टोकरी के लिये विवाद कर रहे हो ?' (कल -१४/५/२०१४ को बुद्ध भी है बुद्ध-पूर्णिमा भी है !) समझदारों (बुद्धों-Sensible men and women) और सभ्य (ऋषि) स्त्री-पुरुषों को इस प्रकार झगड़ते हुए शर्म आनी चाहिये। These great Messengers and Prophets (बुद्ध,ईसा,मोहम्मद या श्रीरामकृष्ण) are great and true. ये सभी पैग़म्बर और ईशदूत यथार्थ में महान और सच्चे थे। क्यों ?
इसलिये कि उनमें से हर एक ने अपने जीवन-काल में एक एक महान भाव का-एक एक महान सिद्धान्त का प्रचार किया है। उदाहरण के लिये भारत के महान अवतारों को ही लो। ये धर्म के प्राचीनतम संस्थापक हैं। पहले हम श्रीकृष्ण के जीवन को देखें। उनकी मुख्य शिक्षा गीता में है-' अनासक्त रहो ! तुम्हारे हृदय के प्रेम पर केवल एक व्यक्ति का अधिकार है-केवल उस व्यक्तिगत ईश्वर का अधिकार है, जो कभी बदलता नहीं।' वह कौन है ? वह केवल ईश्वर ही है। इसलिये अपना ह्रदय किसी परिवर्तनशील वस्तु या व्यक्ति को समर्पित मत करो, इसका अंत दुःखमय होगा। 
यदि तुम किसी व्यक्तिविशेष के शरीर (विवेकानन्द-तत्व को जाने बिना ही ) को अपना ह्रदय अर्पित कर देते हो, तो उसकी मृत्यु के पश्चात् सारा संसार तुम्हारे लिये दुःखपूर्ण बन जायेगा। आज जिसे अपने से अभिन्न मानकर तुम अपना हृदय समर्पित कर चुके हो, सम्भव है कल उसीसे तुम्हारा वैमनस्य हो जाय। यदि उसे पत्नी को देते हो, तो कल उसकी मृत्यु हो सकती है। यही संसार की रीति है। इसीलिये श्रीकृष्ण ने गीता में उपदेश दिया है -'एक मात्र ईश्वर ही ऐसा है जो कभी नहीं बदलता। उनका स्नेह अनंत और अपरिवर्तनशील है, हम कहीं भी रहें और कुछ भी करें, उस कृपा-सिन्धु की कृपा में कोई अंतर नहीं आता। हमारे अधम कार्यों पर भी वह कभी क्रुद्ध नहीं होता। (बुद्ध कभी क्रुद्ध नहीं होता)। 
और वह हमपर क्रुद्ध हो भी तो क्यों ? तुम्हारा नटखट बच्चा कितनी भी शरारत क्यों न करता हो, तुम उसपर कभी नहीं बिगड़ते। हम भविष्य में क्या होने वाले हैं, कितने महान होनेवाले हैं-यह क्या ईश्वर नहीं जानता ? उसे यह ज्ञान है कि हममें से प्रत्येक मनुष्य देर-सवेर पूर्णत्व को प्राप्त कर लेगा ! इसीलिये हममें सैकड़ों दोष रहने पर भी वह विचलित नहीं होता, उसका धैर्य असीम है! अतएव हमें उससे प्रेम करना चाहिये, और जीव मात्र से उसमें ही तथा उसके माध्यम से ही प्रेम करना चाहिये।' यही गीता की शिक्षा का सार है, और इसी को अपने जीवन का मूल मंत्र मानकर जीवन-पथ पर अग्रसर होना चाहिये। अपनी पत्नी को तुम अवश्य प्रेम करो, पर पत्नी के लिये नहीं। You must love the wife, but not for the wife's sake. ' न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।' [-बृहदारण्यक उपनिषद्] -" हे प्रिये, पत्नी को पति प्रिय लगता है, किन्तु वह पति के लिए नहीं। but because the Lord is in the husband." उसका कारण है उस पति में वर्तमान प्रभु (अनंत परमात्मा) !" 
वेदान्त दर्शन कहता है कि पति-पत्नी के बीच प्रेम में, यद्द्पि पत्नी सोचती है कि वह अपने पति को प्रेम कर रही है, किन्तु असली आकर्षण (real attraction) ईश्वर ही है, जो पति में अवस्थित है। वही एकमात्र आकर्षण है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई (व्यक्ति-M/F) उसका स्नेह-भाजन नहीं है। पत्नी अज्ञानवश नहीं जानती कि अपने पति से प्रेम करने में वह केवल ईश्वर (रबजू) को ही प्यार कर रही है, और यह अज्ञान ही भविष्य में उसके दुःख का कारण बन जाता है। ज्ञानपूर्वक किये जाने पर यही प्रेम -मुक्ति का मार्ग बन जाता है। जहाँ भी प्रेम है, आनंद का एक विन्दु भी वर्तमान है, वहीं ईश्वर वर्तमान है ! क्योंकि ईश्वर रस-स्वरुप है, प्रेमस्वरूप है, आनंदस्वरुप है! ईश्वर के आभाव में प्रेम असम्भव है !! कृष्ण का यही उपदेश हिन्दुओं के रग रग में प्रवाहित हो रहा है। 
जब हिन्दू कोई शुभ कार्य करता है, यहां तक कि जब वह पानी भी पीता है, तो कहता है, 'इस कार्य के सभी शुभ फल ब्रह्म को अर्पित है !' एक बौद्ध भी यही संकल्प करता है कि 'इस संसार के सारे शुभ फल संसार को प्राप्त हों, और जगत के दुःख व् कष्ट मुझे मिलें।' (क्या यहाँ बौद्ध और हिन्दू के कथन में क्या कोई विरोधाभास दिखाई देता है?)
 
VASUDEVSARAVAM
 मानव जाति के मार्गदर्शक नेता- 'विष्णु'!
हिन्दू कहता है-" मैं आस्तिक हूँ, ईश्वरविश्वासी हूँ, और ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है, सकल आत्माओं की अन्तरात्मा है। 'वासुदेव सर्वं'-इसलिये यदि मैं अपने कार्यों का पुण्य, उनके शुभ फल 'ब्रह्मार्पणं ' कर दूँ, तो यह सर्वश्रेष्ठ त्याग होगा, क्योंकि अंततोगत्वा मेरे सत्कार्य, मेरे कार्यों के शुभ फल निश्चित ही सारे संसार को प्राप्त होंगे !' इसलिये संसार में रहकर जो व्यक्ति कार्य करता है, और अपने कार्यों का शुभाशुभ फल ईश्वर को अर्पित कर देता है, वह संसार के पापों से निर्लिप्त रहता है। जिस भाँति कीचड़ में जन्म लेकर भी,कमल कीचड़ से निर्लिप्त रहता है, उसी भाँति ऐसा व्यक्ति सांसारिक कर्मों को करते हुए भी, उन्हें ईश्वर को समर्पित कर देने पर दोष-लिप्त नहीं होता।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संग्ङं त्यक्त्वा करोति य: ।
           लिप्तये न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||गीता ५/१० ||
य: = जो पुरुष; कर्माणि = सब कर्मों को; ब्रह्मणि = परमात्मा में; आधाय = अर्पण करके (और); संग्ड़म् = आसक्ति को; त्यक्त्वा =त्यागकर; करोति = कर्म करता है; स: = वह पुरुष; अम्भसा = जल से; पझपत्रम् = कमल के पत्ते की; इव = सदृश; पापेन = पाप से; न लिप्यते = लिपायमान नहीं होता 
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता है! 
प्रबल कर्मशीलता -श्री कृष्ण की एक और महान शिक्षा है। गीता का उपदेश है-कार्यरत रहो, रातदिन कार्य करते रहो! स्वभावतः ही शंका उपस्थित होगी कि निरन्तर कर्म करने से शान्ति कैसे उपलब्ध होगी? यदि मनुष्य दिन-रात, आमरण टमटम के घोड़े की भाँति जीवन की गाड़ी खींचता रहे, और उसे खींचते खींचते ही इहलीला समाप्त कर दे, तो मानव जीवन का मूल्य ही क्या रहा ? भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, ' नहीं, कर्मरत व्यक्ति अवश्य शांति का अधिकारी बनेगा। कार्य-क्षेत्र से पलायन करना शांति का पथ नहीं है। यदि सम्भव हो तो अपने कर्तव्य-कर्म (सामने आये हुए कर्म) छोड़ दो, तथा किसी पर्वत शिखर पर जीवनयापन करो, किन्तु वहाँ भी मन स्थिर नहीं रहेगा, वहाँ भी वह यंत्रवत भ्रमण करता रहेगा। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि श्रीकृष्ण और भगवान बुद्ध के उपदेशों में कोई विरोधाभास नहीं है। 
किसी ने एक बार एक संन्यासी से पूछा था, " आप क्या कोई एकान्त निरुपद्रव स्थान ढूँढ़ने में सफल हो सके हैं ? आप कितने वर्षों से हिमालय की मनोरम घाटियों में भ्रमण कर रहे हैं ? " संन्यासी ने उत्तर दिया " ४० वर्षों से " ' तब अब तक आपने क्यों नहीं किसी स्थान का निर्वाचन किया ? संन्यासी ने कहा," वत्स, इन पूरे चालीस वर्षों में जब तक मैं हिमालय में वास करता रहा, मेरे मन ने मुझे एक बार भी शांत बैठने की अनुमति नहीं दी।" हम सभी इसी प्रकार आजीवन शांति की खोज में लगे रहते हैं, मन में शांति लाभ करने का संकल्प करते हैं, पर हमारा मन हमें शान्ति लेने नहीं देता। हम सब उस सैनिक की कहानी जानते हैं, जिसने एक बार एक तातार (Tartar-क्रोधी व्यक्ति) को पकड़ लिया था। एक सैनिक नगर से लौटकर जब शिविर के समीप आया तो जोर जोर से चिल्लाने लगा-" मैंने एक तातार को कैद कर लिया है, मैंने एक तातार को कैद कर लिया है ।" अंदर से एक आवाज आई, 'उसे भीतर ले आओ '। सैनिक ने कहा-' वह भीतर नहीं आ रहा है'। तब तुम्हीं भीतर आ जाओ ! सैनिक ने कहा - ' वह मुझे भी भीतर नहीं आने देता। ' हम सब ने उस सैनिक की भाँती अपने अपने मन में एक एक 'तातार' को पकड़ रखा है, न तो हम स्वयं उसे वश में कर सकते हैं, और न वह 'तातार' (वस्तु या व्यक्ति विशेष में आसक्ति) ही हमें शान्तिपूर्वक जीवन-यापन करने देता है। हमारी दशा भी उस सैनिक की भाँति हो गयी है। 
हम सब शान्त और स्थिर होने का संकल्प करते हैं। किन्तु यह तो एक शिशु भी कह सकता है और मन में सोचता है कि वह सफल हो जायगा। किन्तु वास्तव में वैसा कर पाना अत्यंत कठिन होता है। मैंने भी ऐसा प्रयत्न किया है। मैं अपने कर्तव्यकर्मों को एकदम ही त्यागकर पर्वत-शिखरों की ओर प्रस्थान कर गया। मैं गहन गुफ़ाओं एवं निविड़ वनों में निवास करता रहा। पर व्यर्थ, क्योंकि मैंने भी एक 'तातार ' पकड़ लिया था। मेरे विचारों का संसार सर्वत्र और सर्वदा मेरे साथ साथ चल रहा था। यह 'तातार' हमारे ही मन में निवास करता है, इसीलिये हमें अन्य व्यक्तियों पर अपनी शान्ति भंग करने का दोषारोपण नहीं करना चाहिये। हम अपनी बाह्य परिस्थितियों को दोष देकर कहते हैं -ये परिस्थितियाँ अनुकूल हैं, ये प्रतिकूल हैं। पर हम भूल जाते हैं कि इन सबका कारण है, वह 'तातार', जो हमारे ही मानस में निवास करता है, और उसे वशीभूत कर लेने पर सब ठीक हो जायगा। 
इसलिये भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा है कि अपने कर्तव्य-कर्म त्याग कर मत भागो, मनुष्य की भाँति उन्हें पूर्ण करने का यत्न करो और उनके फलाफल की चिन्ता न करो। सेवक को 'क्यों '-कहने का क्या अधिकार है ? सैनिक को तर्क-वितर्क करने का अधिकार नहीं। कर्तव्य पथ पर अग्रसर होते जाओ, और इस बात की चिंता न करो कि तुम्हारे कर्तव्य का रूप क्या है। केवल अपने मन से पूछो कि वह निःस्वार्थ भाव से कार्य कर रहा है या नहीं ? यदि तुम सचमुच निष्काम हो, तो विश्व में कोई तुम्हारे मार्ग में बाधा नहीं खड़ी कर पायगा। अपने को कर्तव्य में डूबा दो, जो काम हाथ में आ जाये, उसे करते जाओ। जब तुम इस प्रकार कर्तव्य-रत हो जाओगे, तो धीरे धीरे तुम्हें गीता के इस महान सत्य की प्रतीति होने लगेगी: ' जो कर्मशीलता में शान्ति अनुभव करता है, तथा प्रबल निस्तब्धता एवं शान्ति में कर्मशीलता का दर्शन करता है, वही पूर्ण है, विद्वान है, वही सिद्ध है। ' 
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य: ।
       स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत् ।।४/१८।।

य: = जो पुरुष; कर्मणि = कर्म में अर्थात् अहंकार हित की हुई संपूर्ण चेष्टाओं में अकर्म अर्थात्; अकर्म =अकर्म अर्थात् वास्तव में उनका न होनापना; पश्येत् = देखे; च =और; य: = जो पुरुष; अकर्मणि = अज्ञानी पुरुष द्वारा किये हुए संपूर्ण क्रियाओं के त्याग में (भी); कर्म = त्यागरूप क्रिया को देखे; स: = वह पुरुष: मनुष्येषु = मनुष्यों में; युक्त: = योगी; कृत्स्त्रकर्मकृत् = संपूर्ण कर्मों का करने वाला है। 
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है। श्री कृष्ण के उपदेशानुसार संसार के सभी कर्तव्य-कर्म पवित्र हैं। कोई ऐसा कर्म नहीं जिसे निकृष्ट कहा जाय। भगवान श्री कृष्ण के अनुसार तो सिंहासनारूढ़ सम्राट और साधारण मनुष्य के कर्तव्यों का महत्व समान ही है-'कर्तव्य '-दृष्टि से दोनों में कोई भेद नहीं। 
ह्म देखते हैं कि श्री कृष्ण की शिक्षा का भी हमारे जीवन में कितना महत्व है। बिना इस सन्देश को हृदय में धारण किये, संसार में क्षण भर भी शान्त और अकपट भाव से सानन्द कर्तव्य-रत रहना असम्भव हो जायगा। 
कर्तव्य-पथ पर अग्रसर पुरुष को श्री कृष्ण के उपदेश का एक एक शब्द निर्भीक बनाता रहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं- 
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमति न त्यजेत् । 
                       सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: ।। गीता १८/४८।।
कौन्तेय = हे कुन्तीपुत्री ; सदोषम् = दोषयुक्त ; अपि = भी ; त्यजेत् = त्यागना चाहिये ; हि = क्योंकि ; धूमेन = धूएंसे ; अग्नि: = अग्नि के ; एव = सद्य्श ; सहजम् = स्वाभाविक ; कर्म = कर्म को ; न = नहीं ; सर्वारम्भा: = सब ही कर्म (किसी न किसी) ; दोषेण = दोष से ; आवृता: = आवृत हैं ; 
कर्तव्य-कर्म में कोई दोष होने पर भी भयभीत हो उन्हें त्याग नहीं देना चाहिये, क्योंकि संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो सर्वथा दोषमुक्त हो।  
अब गौतम बुद्ध के महान सन्देश को सुनो। ऐसा कौन पाषाणहृदय है, जो बुद्ध के इन वचनों से प्रभावित न होगा? " जग क्षणभंगुर एवं दुःखमय है। समय तीव्र गति से व्यतीत होता जा रहा है। अपने आमोदपूर्ण जीवन से सन्तुष्ट, अपने सुन्दर प्रासादों में मनोरम वस्त्राभूषणों से विभूषित,अनेकविध भोज्य पदार्थों से तुष्ट, हे मोहनिद्रा में अभिभूत नर-नारियों, क्या जीवन में तुमने कभी दाने दाने के लिए मुहताज उन लक्ष लक्ष नर-कंकालों की भी कोई चिन्ता की है, जो भूख से तड़प तड़प कर दम तोड़ देते हैं? जरा सोचो, जगत के इस महा सत्य पर विचार करो, सर्व दुःखमनित्यम ध्रुवम् -संसार में चारो ओर दुःख ही दुःख है। देखो, संसार में पदार्पण करता हुआ शिशु भी वेदनापूर्ण रुदन करने लगता है। यह एक हृदयविदारक सत्य है। इस दुःखमय जगत में जन्म लेते ही वह क्रन्दन करने लगता है। 
संसार में रुदन के सिवा है क्या ? संसार एक रुदनस्थल है। इसलिये यदि हम तथागत के शब्दों को हृदय में स्थान देना चाहते हैं, तो हमें सम्पूर्णतः स्वार्थरहित होना होगा। उनकी महान वाणी अनायास ही ह्रदय में घर कर लेती है। बुद्ध ने कहा है, 'अपनी स्वार्थपूर्ण भावनाओं का उन्मूलन कर दो, स्वार्थपरता की ओर ले जाने वाली सारी बातें नष्ट कर दो। स्त्री-पुरुष-परिवार आदि बंधनों तथा सांसारिक प्रपंचों से दूर रहो और सम्पूर्णतया स्वार्थ-शून्य बनो।' 
संसारी व्यक्ति मन ही मन निःस्वार्थ बनने का संकल्प करता है, किन्तु पत्नी-मुख अवलोकन करते ही उसका हृदय स्वार्थ से भर जाता है। माँ स्वार्थ-शून्य बनने की इच्छा करती है, पर पुत्र का मुख देखते ही उसके ये भाव लुप्त हो जाते हैं। सबकी यही दशा है। ज्योंही ह्रदय में स्वार्थपूर्ण कामनाओं का उदय होता है, ज्योंही व्यक्ति स्वार्थपूर्ण उद्देश्य से कार्य प्रारम्भ करता है; त्योंही सच्चा मनुष्य लुप्त हो जाता है, तब वह पशु बन जाता है, वासनाओं का क्रीतदास बन जाता है। वह अपने बंधुओं को भी भूल जाता है, अब वह कभी नहीं कहता -'पहले, आप और बाद में मैं'; उसके मुंह से निकलने लगता है, 'पहले मैं, और बाद में सब अपना अपना प्रबंध कर लें।' 
अब तनिक नाजरथ-निवासी ईशदूत ईसा को देखो। उनकी शिक्षा है-'प्रस्तुत रहो, स्वर्गराज्य अत्यन्त समीप है!'  मैंने श्री कृष्ण के उपदेशों पर मनन किया है; मैं अनासक्त होकर कर्म-मार्ग पर अग्रसर होने का यत्न भी करता हूँ, किन्तु कभी कभी इन उपदेशों को भूलकर मैं मोहाभिभूत हो जाता है। तब इस स्थिति में हठात तथागत का सन्देश मुझे सुनायी पड़ता है-'सावधान ! संसार के सकल पदार्थ नश्वर हैं। संसार दुःखमय है। सर्वं दुःखमनित्यमध्रुवम! मैं सुनकर कुछ सम्भलता हूँ; पर मेरे ह्रदय में यह विवाद उठ खड़ा होता है कि मैं कृष्ण और बुद्ध में से किसका अनुगमन करूँ ? तब मेरे कानों में ईसा की यह महान घोषणा गूँजने लगती है,'प्रस्तुत रहो, स्वर्गराज्य अत्यन्त समीप है। एक क्षण का भी विलम्ब न होने दो। कल पर कुछ न छोड़ो और उस महान तथा परम अवस्था के लिये सदा प्रस्तुत रहो, वह तुम्हारे निकट किसी भी क्षण उपस्थित हो सकती है।' ईसा के इस सन्देश का भी हमारे ह्रदय में उच्च स्थान है। हम आदरपूर्वक इस उपदेश को शिरोधार्य करते हैं, और प्रणाम करते हैं, उस महान अवतार को, ईश्वर के उस विग्रह-रूप को, जिसने दो सहस्र वर्ष पूर्व मानव जाति को प्रेम और सदाचार की शिक्षा दी थी। 
इसके पश्चात् हमारी दृष्टि समानता के उस महान संदेशवाहक पैग़म्बर मुहम्मद साहब की ओर जाती है। शायद तुम यह पूछोगे कि उनके धर्म में क्या अच्छाई है ? पर यदि उसमें अच्छाई न होती तो वह आज तक जीवित कैसे रह पाता ? केवल शुभ ही जीवित रह सकता है, केवल वही बच रहता है; क्योंकि जो कल्याणकर है, वही सबल और दृढ है, और इसलिये वही अनंत जीवन का भी अधिकारी होता है। इस जीवन में भी अपवित्र और दुराचारी का जीवन-काल कितना होता है? क्या पवित्र साधु व्यक्ति उसकी अपेक्षा अधिक दीर्घायु नहीं होता ? निश्चित, क्योंकि साधुता ही शक्ति है, पवित्रता ही बल है! 
यदि इस्लाम में कोई अच्छाई, कोई शुचिता न होती तो वह आज तक जीवित कैसे रह पाता ? नहीं, इस्लाम में यथेष्ट अच्छाई है। पैग़म्बर मुहम्मद साहब दुनिया में समता, बराबरी के सन्देश-वाहक थे -वे मानव जाति में, मुसलमानों में भ्रातृ-भाव के प्रचारक थे। उन्होंने अपने जीवन के दृष्टान्त से यह दिखलाया दिया कि मुसलमान मात्र में सम्पूर्ण साम्य एवं आपसी भाईचारा रहना चाहिये। उनके धर्म में जाति, मतामत, वर्ण, लिंग आदि पर आधारित भेदों के लिये कोई स्थान न था। तुर्किस्तान का सुल्तान अफ़्रीका के बाजार से एक हब्शी गुलाम खरीदकर, उसे जंजीरों में बाँधकर अपने देश ल सकता है। किन्तु यही गुलाम यदि इस्लाम को अपना ले और उपयुक्त गुणों से विभूषित हो, तो उसे तुर्की के शाहजादी से निकाह करने का भी हक मिल जाता है। मुसलमानों की इस उदारता के साथ जरा इस देश (अमेरिका ) में हब्शियों (नीग्रो) एवं रेड इंडियन लोगों के प्रति किये जानेवाले घृणापूर्ण व्यवहार की तुलना तो करो। 
और हिन्दू भी क्या करते हैं? यदि तुम्हारे देश का कोई धर्म-प्रचारक (मिशनरी) भूलकर किसी 'सनातनी' हिन्दू के भोजन को स्पर्श कर ले, तो वह उसे अशुद्ध कहकर फेंक देगा। हमारा दर्शन उच्च और उदार होते हुए भी हमारा व्यवहार, हमारा आचार हमारी कितनी दुर्बलता का परिचायक है ! किन्तु अन्य मतावलम्बियों की तुलना में हम इस दिशा में मुसलमानों को अत्यन्त प्रगतिशील पाते हैं। जाति या वर्ण का विचार न कर, सबके प्रति समान भाव -बंधुभाव का प्रदर्शन -यही इस्लाम की महत्ता है, इसीमें उसकी श्रेष्ठता है ! इस प्रकार हम देखते हैं कि हर अवतार, हर पैग़म्बर ने दुनिया को एक न एक महान सत्य का सन्देश दिया है। जब तुम पहले उस सन्देश को सुनते हो और तत्पश्चात उसकी जीवनी का अवलोकन करते हो, तो उस सत्य के प्रकाश में उसका सारा जीवन व्याख्यायित दिखाई पड़ता है । 
अज्ञ एवं बुद्धिहीन व्यक्ति अनेकविध मत-मतान्तरों की कल्पना करते हैं, और अपने मानसिक विकास के अनुसार अपनी कल्पनाओं का समर्थन करने वाली कई व्याख्याओं को आविष्कृत कर इन महापुरुषों पर आरोपित करते हैं। उनकी महान शिक्षाओं को लेकर वे उन पर अपने मतानुसार भ्रान्त व्याख्याएँ करने लगते हैं। With every great Prophet his life is the only commentary.किन्तु हर एक अवतार या पैग़म्बर की जीवनी ही उसके उपदेशों का एकमात्र भाष्य है। किसी भी महान आचार्य (नेता) के जीवन का अवलोकन करो-उसके कार्य उसके उपदेशों का अर्थ स्पष्ट करने लगते हैं। गीता को ही पढ़कर देखो, तुम्हें कृष्ण के जीवन और गीता के एक एक शब्द में सामंजस्य दिखेगा। Will other and greater Prophets come? क्या और भी अवतारी पुरुष, श्रेष्ठतर पैग़म्बर या ईशदूत जन्म ग्रहण करेंगे ? निश्चय ही वे धरा पर अवतीर्ण होंगे। किन्तु उनके आगमन की प्रतीक्षा में मत बैठे रहो।
मैं तो यह पसन्द करूँगा कि तुममें से हर एक व्यक्ति समस्त पूर्व विधानों (Old Testaments) की समष्टिस्वरूप इस यथार्थ नूतन विधान (New Testament) के मसीहा, ऋषि, पैग़म्बर या बुद्ध बनने का प्रयत्न करे ! प्राचीन काल के विभिन्न अवतारों के समस्त सन्देशों को आत्मसात कर उन्हें अपनी अनुभूति, अपनी उपलब्धि के योग से पूर्ण बना लो और इस अंधकार आछन्न युग के, इस त्रस्त मानव जाति के मसीहा -मार्गदर्शक नेता बन जाओ ! ये सभी महान अवतार हैं, प्रत्येक ने हमारे लिये कुछ न कुछ वसीयत छोड़ी है, वे हमारे ईश्वर हैं। हम उनके चरणों में प्रणाम करते हैं ! हम उनके क्षुद्र किंकर हैं। किन्तु इसके साथ साथ हम स्वयं को भी नमस्कार करते हैं, क्योंकि वे यदि ईश्वर-पुत्र और अवतार हैं, तो हम भी वही हैं । उन्होंने पूर्णता पहले प्राप्त कर ली है, और हम भी यहीं और इस जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लेंगे। ईसा के शब्दों का स्मरण करो-'स्वर्ग का राज्य निकट ही है!'  
इसलिये इसी क्षण हम में से प्रत्येक महामण्डल सदस्य (स्वामी विवेकानन्द के सैनिकों) को यह दृढ़ संकल्प- 'staunch resolution 'लेना चाहिये कि- " I will become a messenger of Light, I will become a child of God, nay, I will become a God!" मैं ऋषि बनूँगा, बुद्धत्व को प्राप्त करूँगा, मानवजाति का मसीहा - मैं ईश्वरपुत्र बनूँगा - नहीं, मैं स्वयं ईश्वरस्वरूप (मार्गदर्शक नेता 'विष्णु') बनूँगा !    

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