Saturday, May 31, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (11)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
११. 
श्रीरामकृष्ण परमहंस जीवनमुक्त और आचार्य दोनों थे ! 

(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
 [ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ] 

 
श्री श्री माँ सारदा  

नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |


वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||


नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति | 


सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||


सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||


सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||


विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्
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हिन्दी अनुवाद की भूमिका 

यह महामण्डल पुस्तिका मेरे हाथों में १९९३ के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में आई थी। तब से मैंने इसको अनगिनत बार पढ़ा है। किन्तु इस पुस्तिका में स्वामी जी द्वारा अंग्रेजी में कहे गये जिन उक्तियों को उद्धरण के भीतर (within quotes) रखा गया है, वहाँ इन उक्तियों को 'Complete Works of Swami Vivekananda' के किस खण्ड से लिया गया है, इस सन्दर्भ को सूचित नहीं किया गया है। तत्वज्ञान से परिपूर्ण इस पुस्तिका का अनुवाद करने के लिये स्वामी जी ने किस प्रसंग में इन उक्तियों को कहा होगा, इसे समझना बहुत जरुरी था। 

'गूगल बाबा' के कृपा से नेट पर अंग्रेजी में सारे प्रसंग और सन्दर्भ मिल गये, किन्तु अद्वैत आश्रम, कोलकाता तथा मायावति से हिन्दी में प्रकाशित 'विवेकानन्द साहित्य' अभी तक नेट पर उपलब्ध नहीं है। इसका क्या कारण है, यह मुझे नहीं पता। इसीलिये मैंने स्वामी विवेकानन्द द्वारा अंग्रेजी में कथित उक्तियों को हिन्दी में अनुवाद करते समय अपने सन्तोष के लिये विवेकानन्द साहित्य से लगभग पूरे निबंध को ही फिर लिख दिया है, और जहाँ आवश्यक लगा है, कुछ पन्नों को स्वयं भी अनुवादित किया है।

जिस प्रकार आधुनिक भौतिक विज्ञान (modern physics ) में, पहले तथ्यों को बड़े धैर्य के साथ प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental method) के द्वारा परिक्षण करने के बाद, उससे उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर सिद्धान्त (theory) को सत्यापित किया जाता है।  ठीक उसी प्रकार हम स्वामी विवेकानन्द के व्याख्यान ' मनोविज्ञान का महत्व ' को गहराई से अध्यन करके यह समझ सकते हैं कि विज्ञानों का विज्ञान- (Science of Sciences) 'मनोविज्ञान' या (दी साइन्स अव साइकालजी) ही है! महामण्डल पुस्तिका 'मनःसंयोग' में वर्णित प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental method) के द्वारा परिक्षण करने के बाद, उससे प्राप्त आंकड़ों के आधार पर स्वयं इस सिद्धान्त को परख कर देख सकते हैं, कि ' अपने चित्त की गहन से गहन गहराई में यथार्थ मनुष्य है-आत्मा !' (Deep, deep within, is the soul, the essential man, the Âtman.) 
इसलिये इस सर्वश्रेष्ठ विज्ञान 'मनोविज्ञान' (साइकालजी) को भारत में 'मनःसंयम' (Mental Concentration) 'मानसिक एकाग्रता' कहते हैं। इस विज्ञान का अध्यन भी 'Modern Physics' के अनुरूप पहले प्रयोग (experiment) करके उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर और बाद में सिद्धान्त (theory) को सत्यापित किया जा सकता है। अन्य पार्थिव विज्ञानों की ही तरह, जिस किसी जाति, धर्म या देश में जन्मा जो भी व्यक्ति महर्षि पतंजलि (मनोविज्ञान सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है इसलिये इसके सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक को महर्षि या ऋषि कहते हैं) द्वारा आविष्कृत 'पातंजल योग सूत्र' में दिये गये निर्देशों के अनुसार प्रयोग  करने की 'पात्रता' (eligibility:यम-नियम का पालन) अर्जित कर लेगा, उसे मनःसंयोग (आसन,प्रत्याहार,धारणा) का अभ्यास (एक्सपेरीमेन्ट) करके, अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करने से जो तथ्य और आँकड़े उपलब्ध होंगे, उसका परिणाम होगा -अपने सच्चे स्वरुप (ब्रह्मत्व) की उपलब्धि !
जिस प्रकार विश्व भर के भौतिक शास्त्री (Physicists) प्रायः एक ही परिणाम पर पहुँचते हैं, उन्हें जिन सामान्य प्राकृतिक नियमों (general facts) का पता लगता है, और उनके अनुगामी बाद में उसी पद्धति से प्रयोग करके जिस निष्कर्ष (सिद्धान्त) पर पहुँचते हैं, उनके विषय में उनमें कोई मतभेद नहीं होता। उसी प्रकार मनःसंयोग के अभ्यास (एक्सपेरीमेन्ट) करने की पात्रता रखने वाले सभी संभावित मनोवैज्ञानिक (ऋषि या पैग़म्बर) भी एक ही निष्कर्ष (सिद्धान्त) पर पहुँचते हैं- जिन्हें भारत में महावाक्य या सार्वभौमिक तथ्य (universal facts) कहा जाता है। वैदिक ऋषियों के द्वारा अविष्कृत चार प्रमुख  महावाक्य इस प्रकार हैं -
१. प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय उपनिषद ३/५/३)
ब्रह्म शुद्ध ज्ञान स्वरूप है
२. अहम् ब्रह्मास्मि (शतपथ ब्राह्मण ४/३/२/२१)
मै ब्रह्म हूँ
३. तत् त्वमसि (छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७)
वह ब्रह्म तुम भी हो
४. अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्योपनिषद २)
यह आत्मा ब्रह्म है
ये महावाक्य ही ऐसे तथ्य तथा आँकड़े हैं, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ विज्ञान मनोविज्ञान के महान वैज्ञानिकों ने अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करके, स्वानुभूति द्वारा जाना है या प्रत्यक्ष दर्शन किया है, उनमें भी कोई मतभेद नहीं होता। इसलिये फिलासफी को भारत में दर्शन-शास्त्र कहा जाता है, एवं उसके आविष्कारक वैज्ञानिकों को दार्शनिक या तत्त्ववेत्ता-'महर्षि' (पैग़म्बर-मानवजाति के मार्गदर्शक 'नेता') कहा जाता है।
वैसे विभिन्न समय में विभिन्न ऋषियों के द्वारा आविष्कृत सत्य के रूप में अन्य कई महावाक्य वेदों में संचित हैं। जिन्हें कोई भी भावी मनोविज्ञान का छात्र अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करके, स्वानुभूति से सत्यापित कर सकता है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं- जैसे - 'नेति नेति' (यह भी नही, यह भी नहीं), 'यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे' ( जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है), 'वसुधैव कुटुंबकम' ( पूरी दुनिया ही मेरा परिवार है) , ' मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अतिथि देवो भव' (माता,पिता और अतिथि देवता समान होते हैं, स्वामीजी ने इसमें जोड़ दिया है -मूर्ख देवो भव, दरिद्र देवो भव), 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' (सत्य ही शिव है और सत्य ही सुंदर है; सत्, चित्त और आनन्द -'सच्चिदानन्द' का भी यही अभिप्राय है।)
उसी प्रकार महामण्डल के अध्यक्ष श्रीनवनीहरण ने विवेकानन्द साहित्य के दसों खण्ड का गहन अध्यन और विश्लेषण करने के बाद, आधुनिक भारत के सबसे महान ऋषि विवेकानन्द द्वारा आविष्कृत महावाक्यों को ' छोटे छोटे उद्धरणों ' के अन्दर, श्लोकों के रूप में पिरोकर प्रकार गागर में सागर भर दिया है।  इस महामण्डल पुस्तिका ' विवेकानन्द - दर्शनम् ' को 'विवेकानन्द-वचनामृत' के रूप में पान करके स्वयं अमर हो सकते हैं, और दूसरों को भी अमर बनने में सहायता कर सकते हैं !  


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 विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्

 ' विवेकानन्द - वचनामृत '

११. 
जगति सति सत्ये तु न लाभश्चेत् किमु क्षतिः।
प्रपञ्चस्यापि देहस्य प्रयोगे पुरुषार्थता ॥ 

1. What is the gain or loss by kicking up a row over the reality of this world ? 

2. Objects of human life are attained by making the best use of human body and the visible world.

3. ' The Acharya has to take a stand between the two states. He must have the knowledge that the world is true, or else why should he teach ? Again if he had not realized the world as a dream, then he is no better than an ordinary man, and what could he teach ?' 

१. इस जगत के सच्चाइयों की जो लम्बी कतार (स्वप्नवत) है, उसके ऊपर दुलत्ती मारते रहने (या असन्तोष प्रकट करते रहने) में लाभ क्या और हानी क्या

२. इस मूर्खता को छोड़कर, देवदुर्लभ मानव शरीर एवं दृष्टिगोचर जगत का सर्वोत्तम उपयोग करने से मनुष्य जीवन का उद्देश्य (लक्ष्य) सिद्ध हो जाता है ! 

३. मुक्त पुरुषों को यह जगत स्वप्नवत जान पड़ता है, किन्तु आचार्य ( नचिकेता के गुरु यमाचार्य जैसा) को मानो स्वप्न और जाग्रत, इन दोनों अवस्थाओं के बीच खड़ा होना पड़ता है। उसे यह ज्ञान रखना ही पड़ता है कि जगत सत्य है, अन्यथा वह शिक्षा किसे और क्यों  देगा ? फिर, यदि उसे यह अनुभूति न हुई हो कि जगत स्वप्नवत है, तो उसमें और एक साधारण आदमी में अन्तर ही क्या ? - और वह शिक्षा भी क्या दे सकेगा ?
" देवगण ( यम, वरुण , इन्द्र, वायु, अग्नि ?)  और कोई नहीं उच्च अवस्थाप्राप्त दिवंगत मानव हैं। हमें उनसे  सहायता मिल सकती है। पर हर कोई आचार्य या गुरु  नहीं हो सकता, किन्तु मुक्त (liberated) बहुत से लोग हो सकते हैं।
गुरु को शिष्य के पापों का बोझ वहन करना पड़ता है; और यही कारण है कि शक्तिशाली आचार्यों (दीक्षा देने में समर्थ गुरु) के शरीर में भी रोग प्रविष्ट हो जाते हैं। यदि गुरु अपूर्ण हुआ, तो शिष्य के पाप उसके मन पर भी प्रभाव डालते हैं, और इस तरह उसका पतन हो जाता है। अतः आचार्य  होना बड़ा कठिन है।… श्री रामकृष्ण जीवन्मुक्त भी थे और आचार्य (teacher of mankind- मानवजाति का मार्गदर्शक नेता ) भी !  " ३/२६१
'भक्तियोग' के आचार्य श्रीरामकृष्ण !
द्वैतवादी सोचते हैं, जब तक हाथ में डंडा लिये दण्ड देने को सदैव प्रस्तुत, आसमान में सिंहासन पर बैठे किसी ईश्वर की कल्पना न की जाय, तब तक मनुष्य सदाचारी (नैतिक) नहीं हो सकता। यह कैसे? जैसे मान लो कोई घोड़ा, टमटम का ऐसा निकम्मा घोड़ा, जो चाबुक की मार खाये बिना अपनी जगह से हिलता भी नहीं हो, और मार खाते खाते उसका आदि हो चुका हो; हमें नैतिकता पर भाषण देने के लिये खड़ा हो जाय ! तो वह अपने भाषण का प्रारंभ यह कहते हुए करेगा, " सचमुच, मनुष्य बड़े ही अनैतिक हैं।" क्यों?- " इसीलिये कि, मुझे पता है- उन पर नियमित रूप से कोड़ों की मार नहीं पड़ती।" किन्तु सच बात तो यह है, कि कोड़ों का डर ही लोगों को और भी अधिक अनैतिक बना देता है।  
तुम सभी कहते हो कि ईश्वर है और वह सर्वव्यापी है ! अब जरा आँखें बन्द करो और सोचो, तो वह क्या है? तुम्हें क्या ज्ञात होता है ? यही की मन में सर्वव्यापकता का भाव लाने के लिये तुम्हें या तो सागर की कल्पना करनी पड़ती है, या नील गगन, विस्तृत मैदान अथवा अन्य किसी वस्तु की, जिसे तुमने अपने जीवन में देखा है। यदि ईश्वर की सर्वव्यापकता का अर्थ तुम्हारे लिये इतना ही है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि तुम उस विषय में कुछ नहीं समझते हो। ऐसी ही कठिनाई ईश्वर की अन्य उपाधियों का अर्थ समझने में भी होती है।
जैसे, ईश्वर के लिये सर्वशक्तिमान या सर्वज्ञ का जो विशेषण लगाया जाता है, उसके विषय में हमारी धारणा क्या है ?--कुछ भी नहीं। अनुभूति ही धर्म का सार है, और मैं तुम्हें ईश्वर का उपासक तभी मानूँगा, जब तुम उसके 'सच्चिदानन्द' स्वरुप अनुभव कर सकोगे। जब तक तुम्हें यह अनुभूति नहीं होती, तब तक तुम्हारे लिये 'अल्ला, ईश्वर या ब्रह्म' कुछ अक्षरों से बना एक शब्द मात्र है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। यह अनुभूति ही धर्म का सार है; तुम चाहे जितने भी सिद्धान्तों, दर्शनशास्त्रों या नीतिशास्त्रों को अपने मस्तिष्क में ठूँस लो, पर इससे कुछ विशेष लाभ नहीं होगा। धर्मलाभ केवल तभी होगा जब तुम स्पष्ट रूप से यह जान लोगे कि ' what you are and what you have realised.' वास्तव में तुम स्वयं कौन हो ? क्या हो? और तुमने क्या अनुभव किया है?
जब निर्गुण ब्रह्म (परम तत्व-सच्चिदानन्द) को हम माया के कुहरे में से देखते हैं, तो वही सगुण ब्रह्म या ईश्वर (इष्टदेव 'The Personal God' या ठाकुर) कहलाते हैं ! जब हम परम-तत्व को पंचेन्द्रियों के माध्यम से पाने की चेष्टा करते हैं, तो उसे हम सगुण ब्रह्म  के रूप में ही देख सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि 'Self cannot be objectified.' अर्थात आत्मा को मन-वाणी का विषय नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि आत्मा इन्द्रियगोचर वस्तु है ही नहीं ! How can the Knower know Itself ? जो  ज्ञाता है, वह स्वयं अपना ज्ञेय कैसे हो सकता है ?
किन्तु किसी प्रशान्त चित्त में उसका मानो प्रतिबिम्ब पड़  सकता है - चाहो तो इसे आत्मा का विषयीकरण कह सकते हो। इसी प्रतिबिम्ब का सर्वोत्कृष्ट रूप, ज्ञाता को ज्ञेय रूप में लाने का महत्तम प्रयास - यही सगुण ब्रह्म (ठाकुर या Personal God) कहलाते हैं। आत्मा शाश्वत ज्ञाता है, और हम निरंतर उसे ज्ञेय रूप में ढालने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसी संघर्ष से इस जगत-प्रपंच की सृष्टि हुई है, इसी प्रयत्न से जड़ पदार्थ (पंचभूत) आदि की उत्पत्ति हुई है। 
पर ये सब आत्मा के निम्नतम रूप हैं, और हमारे लिये आत्मा का सर्वोच्च सम्भव ज्ञेय रूप तो वह है, जिसे हम 'ईश्वर' कहते हैं। विषयीकरण का यह प्रयास हमारे स्वयं अपने स्वरुप के प्रकटीकरण का प्रयास है। सांख्य के अनुसार, प्रकृति यह सब खेल पुरुष को (शरीर के साथ तादात्म्य में बाँधे रखने के लिये) दिखला रही है, और जब पुरुष को यथार्थ अनुभव हो जायगा (मैं मरणधर्मा शरीर नहीं हूँ !!), तब वह अपना स्वरुप जान लेगा। अद्वैत वेदान्ती के मतानुसार, जीवात्मा अपने को अभिव्यक्त करने का प्रयत्न कर रही है। लम्बे संघर्ष के बाद जीवात्मा जान लेती है कि ज्ञाता तो ज्ञाता ही रहेगा, ज्ञेय नहीं हो सकता, तब उस जीवात्मा को वैराग्य हो जाता है, और वह मुक्त हो जाती है। 
जब मनुष्य उस पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, तब उसका स्वाभाव ईश्वर जैसा हो जाता है। जैसे ईसा ने कहा है, " मैं और मेरे पिता एक हैं !" तब वह जान लेता है कि वह ब्रह्म से. निरपेक्ष सत्ता से-- एकरूप है, और वह ईश्वर के समान लीला करने लगता है। जिस प्रकार बड़े से बड़ा सम्राट भी कभी कभी खिलौने से खेल लेता है, वैसे ही वह भी खेलता है। 
कुछ कल्पनायें ऐसी होती हैं, जो अन्य दूसरी कल्पनाओं से उद्भूत होने बंधनों को छिन्न-भिन्न कर देती हैं। यह समस्त जगत ही कल्पनाप्रसूत है, परन्तु यहाँ एक प्रकार की कल्पना दूसरे प्रकार की कल्पनाओं से उत्थित होने वाली बुराइयों को नष्ट कर देती हैं। जो कल्पनायें हमें यह बतलाती हैं कि यह संसार पाप, दुःख और मृत्यु से भरा हुआ है, वे बड़ी भयानक हैं; परन्तु जो कहती हैं, कि ' तुम पवित्र हो; ईश्वर है; दुःख का अस्तित्व ही नहीं है ' वे सब अच्छी हैं, और प्रथमोक्त कल्पनाओं से होने वाले बंधन का खण्डन कर देती हैं। सबसे ऊँची कल्पना, जो समस्त बंधन-पाशों को तोड़ सकती है-सगुण ब्रह्म या ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) की है। 
भगवान से यह प्रार्थना करना कि ' प्रभु, अमुक वस्तु मुझे दो, अमुक वस्तु की रक्षा करो, मेरे सिर दर्द को अच्छा कर दो' आदि आदि --यह सब भक्ति नहीं है। ये तो धर्म के हीनतम रूप हैं, कर्म के निम्नतम रूप हैं। यदि मनुष्य शारीरिक वासनाओं की पूर्ति में ही अपनी समस्त मानसिक शक्ति खर्च कर दे, तो तुम भला बताओ तो, उसमें और पशु में अंतर ही क्या है ? भक्ति एक उच्चतर वस्तु है, स्वर्ग की कामना से भी ऊँची।
स्वर्ग का अर्थ असल में है क्या ? --तीव्रतम भोग का एक स्थान। वह (इन्द्र) ईश्वर कैसे हो सकता है ? केवल मूर्ख ही इन्द्रियसुखों के पीछे दौड़ते है, इन्द्रिय भोगों में लगे रहना बिल्कुल आसान है। इसीलिये आजकल के कुछ बाबा लोग, शिक्षा देते हैं, जीवन में मौज उड़ाते रहो, उस पर थोड़ी सी धर्म की छाप भी लगा दो। इन आशारामों के चेले बनने में बहुत बड़ा खतरा है। इन्द्रिय भोगों में रचे-पचे रहना ही मृत्यु है। आत्मा के स्तर पर का जीवन ही सच्चा जीवन है; अन्य मन -इन्द्रिय के स्तरों का जीवन मृत्यु स्वरूप है। यह सम्पूर्ण जीवन एक व्यायामशाला के जैसा है। यदि हम सच्चे जीवन का आनन्द लेना चाहते हैं तो हमे मन-इन्द्रियों से परे जाना ही होगा। 
जब तक मुझे 'मुझे मत छू-वाद' युम्हारा धर्म है और रसोई की पतीली तुम्हारा इष्टदेव है, तब तक तुम्हें आध्यात्मिक मनुष्य नहीं कहा जा सकता, तुम्हारी कोई आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। धर्म धर्म के बीच जो क्षुद्र मतभेद हैं, वे सब केवल शाब्दिक हैं, उनमें कोई अर्थ नहीं। हर व्यक्ति (अहमक) सोचता है, ' यह मेरा मौलिक-मत है' और वह अपने मन-माने ढंग से ही काम करना चाहता है। इसीसे संघर्षों की उतपत्ति होती है। 
दूसरों की आलोचना करने में हम सदा यह मूर्खता करते हैं कि किसी एक विशेष गुण हम अपने जीवन का सर्वस्व समझ लेते हैं, और उसी को मापदण्ड मानकर दूसरों के दोषों को खोजने लगते हैं। इस प्रकार दूसरों को पहचानने में हम भूलें कर बैठते हैं। 
इसमें सन्देह नहीं कि कट्टरता (fanaticism) और धर्मान्धता (bigotry) द्वारा किसी धर्म का प्रचार बहुत तेजी से किया जा सकता है, किन्तु नींव उसी धर्म की दृढ़ होती है जो हर एक को अपना अभिमत व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है, और इसतरह उसे उच्चतर मार्ग पर आरूढ़ कर देता है; भले ही इससे धर्म-प्रचार की गति धीमी हो। 
भारत को पहले आध्यात्मिक विचारों से आप्लावित कर दो, फिर अन्य विचार अपने आप ही आ जायेंगे। आध्यात्मिकता और आध्यात्मिक ज्ञान (spiritual knowledge) का दान सर्वोत्तम दान है, क्योंकि यह हमें संसार के आवागमन से मुक्त कर देता है; इसके बाद है लौकिक ज्ञान ( secular knowledge) का दान, क्योंकि यह आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमारी आँखें खोल देता है; इसके बाद अत है जीवन-दान, और चौथा है अन्न दान।
यदि  साधना (मनः संयोग- ' austerities for realisation' अपने ब्रह्मस्वरूपता की अनुभूति करने के लिये तपस्या ) करते करते शरीरपात भी हो जाय, तो होने; इससे क्या ? सर्वदा साधुओं की संगति (सत्संग)  में रहते रहते समय आने पर आत्मज्ञान तो होकर रहेगा ! एक ऐसा समय भी आता है, जब मनुष्य की समझ में यह बात आ जाती है कि किसी दूसरे व्यक्ति के लिये चिलम भरकर उसकी सेवा करना लाखों बार के ध्यान से कहीं बढ़कर है। जो व्यक्ति ठीक ठीक चिलम भर सकता है, वह ध्यान भी ठीक तरह से कर सकता है।
देवगण ( यम, वरुण , इन्द्र, वायु, अग्नि ?)  और कोई नहीं उच्च अवस्थाप्राप्त दिवंगत मानव हैं। हमें उनसे  सहायता मिल सकती है। हर कोई आचार्य या गुरु  नहीं हो सकता, किन्तु मुक्त (liberated) बहुत से लोग हो सकते हैं।
मुक्त पुरुषों को यह जगत स्वप्नवत जान पड़ता है, किन्तु आचार्य ( नचिकेता के गुरु यमाचार्य जैसा) को मानो स्वप्न और जाग्रत, इन दोनों अवस्थाओं के बीच खड़ा होना पड़ता है। उसे यह ज्ञान रखना ही पड़ता है कि जगत सत्य है, अन्यथा वह शिक्षा क्योंकर देगा ? फिर, यदि उसे यह अनुभूति न हुई हो कि जगत स्वप्नवत है, तो उसमें और एक साधारण आदमी में अन्तर ही क्या ? - और वह शिक्षा भी क्या दे सकेगा ? गुरु को शिष्य के पापों का बोझ वहन करना पड़ता है; और यही कारण है कि शक्तिशाली आचार्यों (दीक्षा देने में समर्थ गुरु) के शरीर में भी रोग प्रविष्ट हो जाते हैं। यदि गुरु अपूर्ण हुआ, तो शिष्य के पाप उसके मन पर भी प्रभाव डालते हैं, और इस तरह उसका पतन हो जाता है। अतः आचार्य  होना बड़ा कठिन है। 
आचार्य या गुरु  होने की अपेक्षा जीवन्मुक्त (free in this very life) होना सरल है। क्योंकि जीवन्मुक्त संसार को स्वप्नवत मानता है और उससे कोई वास्ता (concern) नहीं रखता; पर आचार्य को यह ज्ञान होने पर भी कि जगत स्वप्नवत है, (करुणा से वशीभूत होकर) उसमें रहना और कार्य करना पड़ता है। हर एक के लिये आचार्य होना सम्भव नहीं है। आचार्य तो वह है, जिसके माध्यम से दैवी शक्ति कार्य करती है ! आचार्य का शरीर अन्य मनुष्यों के शरीर से बिल्कुल भिन्न प्रकार का होता है ! उस (आचार्य के) शरीर को निर्दोष-अवस्था (perfect state या आदर्श अवस्था) में बनाये रखने का एक विज्ञान (मनःसंयोग या पातंजल योग-सूत्र) है! उसका शरीर बहुत ही कोमल (मक्खन के समान), उसका हृदय अत्यंत संवदेनशील (seismograph भूकंप- सूचक यंत्र के समान) - तीव्र खुशी और तीव्र पीड़ा के कंपन को महसूस करने में सक्षम होता है ! वह असाधारण होता है।
जीवन के सभी क्षेत्रों में हम यही देखते हैं, कि हृदयस्थ सच्चे व्यक्तित्व (person within) की ही विजय होती है; और वह यथार्थ व्यक्तित्व (that personality : ब्रह्म-स्वरुपता की उपलब्धि) ही समस्त सफलता का रहस्य है। 
नदिया के पैग़म्बर ' चैतन्य महाप्रभु ' (या भगवान श्री कृष्ण चैतन्य) के ह्रदय में संवेदनशीलता का विकास (unfoldment) जिस सीमा तक हुआ था, वैसा उद्दात विकास अन्यत्र कहीं देखने में नहीं आता।
श्री रामकृष्ण एक महान दैवी शक्ति हैं। तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिये कि उनका सिद्धान्त यह है या वह। बल्कि यही सोचना चाहिये कि वे एक महान शक्ति हैं, जो अब भी उनके शिष्यों में वर्तमान है और संसार में कार्य कर रही है ! मैंने उनको, उनके विचारों के रूप में (अपने ही भीतर) विकसित होते हुए देखा है। वे आज भी कई मनुष्यों के भीतर विकसित हो रहे हैं। 'Shri Ramakrishna' was both a Jivanmukta and an Acharya. श्री रामकृष्ण जीवन्मुक्त भी थे और आचार्य (teacher of mankind- मानवजाति का मार्गदर्शक नेता ) भी !
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Friday, May 30, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' (10) - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित ) 

 [ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
 

इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ] 
हिन्दी अनुवाद की भूमिका 
यह महामण्डल पुस्तिका मेरे हाथों में १९९३ के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में आई थी। तब से मैंने इसको अनगिनत बार पढ़ा है। किन्तु इस पुस्तिका में स्वामी जी द्वारा अंग्रेजी में कहे गये जिन उक्तियों को उद्धरण के भीतर (within quotes) रखा गया है, वहाँ इन उक्तियों को 'Complete Works of Swami Vivekananda' के किस खण्ड से लिया गया है, इस सन्दर्भ को सूचित नहीं किया गया है। तत्वज्ञान से परिपूर्ण इस पुस्तिका का अनुवाद करने के लिये स्वामी जी ने किस प्रसंग में इन उक्तियों को कहा होगा, इसे समझना बहुत जरुरी था। 
'गूगल बाबा' के कृपा से नेट पर अंग्रेजी में सारे प्रसंग और सन्दर्भ मिल गये, किन्तु अद्वैत आश्रम, कोलकाता तथा मायावति से हिन्दी में प्रकाशित 'विवेकानन्द साहित्य' अभी तक नेट पर उपलब्ध नहीं है। इसका क्या कारण है, यह मुझे नहीं पता। इसीलिये मैंने स्वामी विवेकानन्द द्वारा अंग्रेजी में कथित उक्तियों को हिन्दी में अनुवाद करते समय अपने सन्तोष के लिये विवेकानन्द साहित्य से लगभग पूरे निबंध को ही फिर लिख दिया है, और जहाँ आवश्यक लगा है, कुछ पन्नों को स्वयं भी अनुवादित किया है।
जिस प्रकार आधुनिक भौतिक विज्ञान (modern physics ) में, पहले तथ्यों को बड़े धैर्य के साथ प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental method) के द्वारा परिक्षण करने के बाद, उससे उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर सिद्धान्त (theory) को सत्यापित किया जाता है।  ठीक उसी प्रकार हम स्वामी विवेकानन्द के व्याख्यान ' मनोविज्ञान का महत्व ' को गहराई से अध्यन करके यह समझ सकते हैं कि विज्ञानों का विज्ञान- (Science of Sciences) 'मनोविज्ञान' या (दी साइन्स अव साइकालजी) ही है! महामण्डल पुस्तिका 'मनःसंयोग' में वर्णित प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental method) के द्वारा परिक्षण करने के बाद, उससे प्राप्त आंकड़ों के आधार पर स्वयं इस सिद्धान्त को परख कर देख सकते हैं, कि ' अपने चित्त की गहन से गहन गहराई में यथार्थ मनुष्य है-आत्मा !' (Deep, deep within, is the soul, the essential man, the Âtman.) 
इसलिये इस सर्वश्रेष्ठ विज्ञान 'मनोविज्ञान' (साइकालजी) को भारत में 'मनःसंयम' (Mental Concentration) 'मानसिक एकाग्रता' कहते हैं। इस विज्ञान का अध्यन भी 'Modern Physics' के अनुरूप पहले प्रयोग (experiment) करके उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर और बाद में सिद्धान्त (theory) को सत्यापित किया जा सकता है। अन्य पार्थिव विज्ञानों की ही तरह, जिस किसी जाति, धर्म या देश में जन्मा जो भी व्यक्ति महर्षि पतंजलि (मनोविज्ञान सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है इसलिये इसके सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक को महर्षि या ऋषि कहते हैं) द्वारा आविष्कृत 'पातंजल योग सूत्र' में दिये गये निर्देशों के अनुसार प्रयोग  करने की 'पात्रता' (eligibility:यम-नियम का पालन) अर्जित कर लेगा, उसे मनःसंयोग (आसन,प्रत्याहार,धारणा) का अभ्यास (एक्सपेरीमेन्ट) करके, अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करने से जो तथ्य और आँकड़े उपलब्ध होंगे, उसका परिणाम होगा -अपने सच्चे स्वरुप (ब्रह्मत्व) की उपलब्धि !
जिस प्रकार विश्व भर के भौतिक शास्त्री (Physicists) प्रायः एक ही परिणाम पर पहुँचते हैं, उन्हें जिन सामान्य प्राकृतिक नियमों (general facts) का पता लगता है, और उनके अनुगामी बाद में उसी पद्धति से प्रयोग करके जिस निष्कर्ष (सिद्धान्त) पर पहुँचते हैं, उनके विषय में उनमें कोई मतभेद नहीं होता। उसी प्रकार मनःसंयोग के अभ्यास (एक्सपेरीमेन्ट) करने की पात्रता रखने वाले सभी संभावित मनोवैज्ञानिक (ऋषि या पैग़म्बर) भी एक ही निष्कर्ष (सिद्धान्त) पर पहुँचते हैं- जिन्हें भारत में महावाक्य या सार्वभौमिक तथ्य (universal facts) कहा जाता है। वैदिक ऋषियों के द्वारा अविष्कृत चार प्रमुख  महावाक्य इस प्रकार हैं -
१. प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय उपनिषद ३/५/३)
ब्रह्म शुद्ध ज्ञान स्वरूप है

२. अहम् ब्रह्मास्मि (शतपथ ब्राह्मण ४/३/२/२१)
मै ब्रह्म हूँ

३. तत् त्वमसि (छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७)
वह ब्रह्म तुम भी हो

४. अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्योपनिषद २)
यह आत्मा ब्रह्म है
ये महावाक्य ही ऐसे तथ्य तथा आँकड़े हैं, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ विज्ञान मनोविज्ञान के महान वैज्ञानिकों ने अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करके, स्वानुभूति द्वारा जाना है या प्रत्यक्ष दर्शन किया है, उनमें भी कोई मतभेद नहीं होता। इसलिये फिलासफी को भारत में दर्शन-शास्त्र कहा जाता है, एवं उसके आविष्कारक वैज्ञानिकों को दार्शनिक या तत्त्ववेत्ता-'महर्षि' (पैग़म्बर-मानवजाति के मार्गदर्शक 'नेता') कहा जाता है।
वैसे विभिन्न समय में विभिन्न ऋषियों के द्वारा आविष्कृत सत्य के रूप में अन्य कई महावाक्य वेदों में संचित हैं। जिन्हें कोई भी भावी मनोविज्ञान का छात्र अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करके, स्वानुभूति से सत्यापित कर सकता है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं- जैसे - 'नेति नेति' (यह भी नही, यह भी नहीं), 'यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे' ( जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है), 'वसुधैव कुटुंबकम' ( पूरी दुनिया ही मेरा परिवार है) , ' मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अतिथि देवो भव' (माता,पिता और अतिथि देवता समान होते हैं, स्वामीजी ने इसमें जोड़ दिया है -मूर्ख देवो भव, दरिद्र देवो भव), 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' (सत्य ही शिव है और सत्य ही सुंदर है; सत्, चित्त और आनन्द -'सच्चिदानन्द' का भी यही अभिप्राय है।)
उसी प्रकार महामण्डल के अध्यक्ष श्रीनवनीहरण ने विवेकानन्द साहित्य के दसों खण्ड का गहन अध्यन और विश्लेषण करने के बाद, आधुनिक भारत के सबसे महान ऋषि विवेकानन्द द्वारा आविष्कृत महावाक्यों को ' छोटे छोटे उद्धरणों ' के अन्दर, श्लोकों के रूप में पिरोकर प्रकार गागर में सागर भर दिया है।  इस महामण्डल पुस्तिका ' विवेकानन्द - दर्शनम् ' को 'विवेकानन्द-वचनामृत' के रूप में पान करके स्वयं अमर हो सकते हैं, और दूसरों को भी अमर बनने में सहायता कर सकते हैं !  

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श्री श्री माँ सारदा  

नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |

वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||

नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति | 

सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||

सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||

सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||

[शक्ति का उपासक अन्यान्य साधना-मार्गियों, मेडिकल साइंस में शरीर क्रिया विज्ञान (physiology) का  अध्यन करने वाले पाश्चात्य वैज्ञानिकों की तरह शक्ति (महाविद्या-माँ सारदा देवी) को 'माया' (अर्थात जड़ प्रकृति) नहीं मानता बल्कि अपनी 'माँ' समझता है जिसकी गोद में रहकर वह सदैव निर्भय रहता है। क्योंकि उसकी माँ तो 'कोटि ब्रह्माण्ड नायिका' है जो प्रतिक्षण उसकी रक्षा तथा पालन करती है। वह इतनी प्रकाशमयी है कि मायारूपी अन्धकार स्वत: ही नष्ट हो जाता है।]


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विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम
 

' विवेकानन्द - वचनामृत '
१०.
'मनःसंयोग' एक सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है।

मन एव महच्छत्रुर्बन्धुरपि तदेव हि। 
मनोदासः प्रभुस्तस्य यदेकोSसि तथा भवेत्॥ 

1. Mind is a great enemy and may also be the best friend.

2. You may be a servant or the master of your mind.

3. If you are a servant, it will pose as an enemy; if you master it, it will become a trusted friend.

4. ' The mind uncontrolled and unguided will drag us down...,and guided will save us, free us.' 
 

१. (अनियंत्रित) मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है और यही मन जब वशीभूत हो जाता है- मनुष्य का सबसे अच्छा दोस्त भी बन सकता है। 

२. तुम अपने के गुलाम हो सकते हो, और तुम यदि चाहो तो अपने मन के मालिक भी हो सकते हो। 

३. यदि तुम अपने मन के दास बने रहोगे, तो यह तुम्हारे एक दुश्मन के रूप में तुमसे बहुत बुरा व्यव्हार करेगा। यदि तुम इसे वशीभूत कर लोगे तो यही मन तुम्हारा सबसे विश्वसनीय मित्र बन जायगा। 

४. " अनियंत्रित और अनिर्दिष्ट मन हमें सदैव उत्तरोत्तर नीचे की ओर घसीटता रहेगा -हमें चींथ डालेगा, हमें मार डालेगा; और नियंत्रित तथा निर्दिष्ट मन हमारी रक्षा करेगा, हमें मुक्त करेगा। इसलिये वह अवश्य नियंत्रित होना चाहिये, और मनोविज्ञान सिखाता है कि इसे कैसे करना चाहिये।"
आधुनिक युग में किसी पार्थिव विज्ञान (material science) के अध्यन और विश्लेषण के लिये बहुत से यंत्रों के आविष्कार हो चुके हैं, जिनके माध्यम से पर्याप्त आँकड़े जुटाये जाते हैं। इन तथ्यों का अध्यन और विश्लेषण किया जाता है और परिणाम होता है, उस विज्ञान (बी.पी, हार्ट ब्लॉकेज) की जानकारी। किन्तु मन के अध्यन और विश्लेषण के लिये कोई आँकड़े नहीं हैं, बहार से उपलब्धि के लिये कोई ऐसे तथ्य नहीं हैं, जो समान रूप से सर्वसुलभ हों। क्योंकि मन का विश्लेषण किसी बाह्य यंत्र के द्वारा नहीं, स्वयं मन के द्वारा ही हो सकता है। इसीलिये 'मनःसंयोग' (दी साइन्स अव साइकालजी) मन का विज्ञान या मनोविज्ञान एक सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है।" (हिन्दी ४/११२)
मनोविज्ञान का महत्व 
(THE IMPORTANCE OF PSYCHOLOGY)

(मनःसंयोग) 'मनोविज्ञान' विज्ञानों का भी विज्ञान है, किन्तु पाश्चात्य देशों में इसे अत्यन्त निम्न कोटि का स्थान दिया गया है, उसे अन्य विज्ञानों की भाँति एक ही धरातल पर रखा गया है; अर्थात उसे परखने के लिये भी वही कसौटी रखी गयी है-- उपयोगिता। मानवता का इससे कितना व्यावहारिक लाभ होगा ? शीघ्रता से बढ़ने वाले हमारे सुखों में इससे कितनी वृद्धि होगी? तेजी से बढ़ने वाले हमारे कष्टों में इससे कितनी कमी होगी? 
यही वह कसौटी है, जिस पर पश्चिम में प्रत्येक वस्तु को परखा जाता है।  प्रायः हम यह भूल जाते हैं कि हमारी वैज्ञानिक जानकारियों के लगभग ९० % अंश का स्वतः कोई ऐसा व्यावहारिक उपयोग नहीं हो सकता, जिससे हमारे सांसारिक सुखों में वृद्धि हो और दुःखों का ह्रास हो। हमारे दैनन्दिन जीवन में हमारे वैज्ञानिक ज्ञान के अल्पतम, मात्र ५-१० % अंश का ही ऐसा कोई व्यावहारिक उपयोग किया जा सकता है। 
इसका कारण यह है कि हमारे चेतन मन का बहुत छोटा सा अंश ही संवेद्द्य या ऐन्द्रिक धरातल पर रहता है। हमारी ऐन्द्रिक धरातल पर रहने वाली चेतना होती तो है रंच मात्र ही; लेकिन हम सोच लेते हैं, कि चेतना का यही अंश हमारा सम्पूर्ण मन और जीवन है। किन्तु वास्तविकता यह है कि वह ऐन्द्रिक धरातल पर रहने वाली चेतना (sensuous consciousness) या सवेद्द्य-चेतना हमारे अवचेतन मन (subconscious mind) के अपार समुद्र के एक बूँद के समान है। हमलोग वस्तुतः 'जो' कुछ हैं; यदि वह इन्द्रिय-जन्य ज्ञान (sense-perceptions) की गठरी मात्र होता, तो हम इन्द्रिय-ग्राह्य जगत का जो कुछ ज्ञानार्जन करते, उनका उपयोग ' gratification of our sense-pleasures' इन्द्रिय-सुखों की तृप्ति में हो सकता था। परन्तु सौभाग्य से -हम पशु नहीं मनुष्य हैं। 
हम ज्यों ज्यों पाशविक-अवस्था (animal state) से दूर होते जाते हैं, त्यों त्यों विषय-सुखों में हमारी आसक्ति कम होने लगती हैं ! और उसी तीव्रता के साथ वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक ज्ञान-अर्जन के आनन्द में आस्वादन लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। और तब "knowledge for the sake of knowledge"--( '५' विभिन्न दुकानों में बने दिल्ली का लड्डू खाने में हमारे मन-इन्द्रियों को कितना सुख मिलता है? यह ज्ञान लेने के लिये नहीं, बल्कि सिर्फ) ' ज्ञान के वास्ते ज्ञान ' प्राप्त करना मन के लिये 'supreme pleasure' सर्वाधिक आनन्द- दायक हो जाता है; चाहे उससे इन्द्रिय-सुख मिले या नहीं इस ओर ध्यान भी नहीं जाता। किन्तु मनोविज्ञान की श्रेष्ठता की परख के लिये उपयोगिता की पाश्चात्य कसौटी को स्वीकार कर लेने पर भी, या उस मानदण्ड के अनुसार भी यही सिद्ध होगा, कि मनःसंयोग या 'मनोविज्ञान' ही विज्ञानों का विज्ञान- 'Science of Sciences' है ! 
क्यों ? इसीलिये कि, हम सब अपनी इन्द्रियों के गुलाम हैं, अपने चेतन तथा अवचेतन (conscious and subconscious) मन के दास हैं। कोई अपराधी (या बलात्कारी) इसलिये अपराधी नहीं है कि वह वैसा बनना चाहता है, वरन इसलिये है कि उसका मन उसके वश में नहीं है। और इसीके परिणामस्वरूप वह अपने चेतन तथा अवचेतन मन का तथा अन्य प्रत्येक व्यक्ति के मन का (या वस्तु का जिससे उसको विषय-सुख मिले का) दास है। उसे झख मारकर अपने चित्त की बलवती प्रवृत्तियों का अनुसरण करना पड़ता है, ('प्रबल इन्द्रियाँ उसके मन को मथ देती हैं') उसे वह रोक नहीं सकता। उसका विवेक, उसकी अन्तरात्मा उसे भी अच्छी सलाह या सद्प्रेरणा ही देते हैं, फिर भी वह अपने मन के प्रबल-आदेश (dominant mandate या चित्त की गहराई में संचित संस्कारों का हुक्म) के अनुसार चलने को विवश हो जाता है; और अपराध कर बैठता है। वह बेचारा (Poor-man लाचार-इंसान) अपने को रोक नहीं सकता।
हम इसे अपने जीवन में भी लगातार घटित होते हुए देख सकते हैं। हम अपनी सत्प्रवृत्तियों के विपरीत- अपनी अन्तरात्मा या विवेक (better side of our nature) की अवहेलना करके, लगातार कार्य कर रहे हैं, और बाद में इस करनी के लिये स्वयं को कोसते हैं। आश्चर्य भी करते हैं कि भला हम ऐसी बात सोच भी कैसे सकते थे, फिर भी हमने इस तरह का काम किया ! फिर भी हम उसे बार बार करते हैं, उसके कारण बार बार कष्ट झेलते हैं, और अपने को कोसते हैं। उस समय शायद हम यह सोचते हैं, कि वैसा करने की हमारी इच्छा है, किन्तु वास्तव में उस प्रकार की इच्छा हमारे मन में इसीलिये उठी, क्योंकि हम उसके लिये इच्छा करने को विवश थे। हमें जानबूझकर भी गलत हरकत करने पर, बाध्य होकर अग्रसर होना पड़ता है,क्योंकि  हम लाचार हो चुके हैं। हम सभी लोग अपने मन के और अन्य सभी लोगों के मन के गुलाम ही हैं, हम चाहे भले हों या बुरे, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हमें यहाँ-वहाँ नाचना पड़ता है, क्योंकि हम अपने मन को वश में नहीं रख पाते। 
हम कहते हैं, कि हम सोचते हैं; हम करते हैं; आदि। पर बात ऐसी नहीं है। हम सोचते हैं, क्योंकि हमें सोचना ही पड़ता है; हम कार्य करते हैं क्योंकि हमें करना ही पड़ता है। 'We are slaves to ourselves and to others.' हम राम-किंकर या 'रामदास' नहीं है, (गूटका-दास, खैनी दास हैं) हम 'सबसुख-दास' हैं-हम अपने इन्द्रिय-सुखों के दास हैं, और दूसरों के भी। 
हमारे अवचेतन मन (subconscious mind) या चित्त की गहराइयों में केवल इसी जन्म के ही नहीं, वरन भूत काल के सभी जन्मों के (मत्स्यावतार, वराहावतार से लेकर विष्णु तक) विचार तथा कर्म संचित हैं। हमारे इस आत्मनिष्ठ मन (subjective mind) का यह बृहत असीम सागर, भूतकाल के सभी विचारों और कर्मों से भरपूर है। इनमें से प्रत्येक विचार अपनी मान्यता के लिये प्रयत्न कर रहा है। बाहर की ओर व्यक्त होने के लिये जोर मार रहा है, उद्वेलित हो रहा है, एक तरंग के बाद दूसरे तरंग के रूप में विषयाश्रित मन (objective mind) या चेतन-मन (conscious mind) के धरातल से टकरा रहा है। इन विचारों, इस संचित शक्ति को ही हम किसी व्यक्ति-विशेष की स्वाभाविक इच्छाशक्ति (natural will), कौटिल्य-प्रतिभा (talents) आदि समझते हैं।
यह इसलिये है कि हमें अपनी स्वाभाविक इच्छाशक्ति के सच्चे उद्गम या आदि कारण (true origin) की अनुभूति नहीं है। हम बिना चूँ-चपड़ किये आँख मूँदकर अपने मन के आदेशों का पालन करते हैं; और दासता, निकृष्टतम कोटि की गुलामी -हमारे मत्थे पड़ती है; फिर भी हम अपने को आजाद, स्वाधीन, 'मुक्त' कहते हैं ! हम एक क्षण तो स्वयं अपने मन पर शासन नहीं कर सकते, यही नहीं, किसी विषय पर उसे स्थिर नहीं रख सकते, तथा अन्य सब इन्द्रिय-विषयों से अपने मन को खींचकर किसी एक बिन्दु पर उसे क्षणभर के लिये भी केन्द्रित नहीं कर सकते ! फर भी हम अपने को मुक्त कहते हैं !!
ज़रा इस बात पर गौर तो करो ! काल की अत्यन्त लघु अवधि तक भी हम उसे (इम्तहान के समय पढाई) नहीं कर पाते, जिसे हम जानते हैं कि हमें करना चाहिये। क्यों ? अचानक कोई विषय-वासना (चलो क्रिकेट या सिनेमा) हमारे मन में उत्पन्न हो जाती है और हमें तुरंत उसकी आज्ञा का पालन करना पड़ता है। ऐसी दुर्बलता पर हमारी अन्तरात्मा (विवेक या ज़मीर, conscience) हमें ताड़ित करती है, किन्तु हम पुनः पुनः वही करते हैं, हम सदा वही कर रहे हैं। लाख कोशिश करने पर भी हम, जीवन के किसी उच्च मानक पर खरे नहीं उतर पाते हैं। चित्त की गहन परतों में संचित पूर्व जन्मों के संस्कार, तथा अतीत के विचारों का प्रेत हमें नीचे गिराये रखते हैं।
 समस्त सांसारिक दुखों का कारण है, इन्द्रियों की दासता ! इन्द्रियपरायण जीवन से उपर उठने में हमारी असमर्थता- शारीरिक भोगों के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहना ही संसार के समस्त संत्रास ( horrors) तथा दुःखों का कारण है।  
यह मनोविज्ञान या मनःसंयोग का विज्ञान ही है, जो हमें मन के प्रचण्ड घूर्णन-वृत्ति (दी वाइल्ड जाइरेशन 'gyrations' अव माइन्ड) को संयमित करने, उसे अपनी संकल्प-शक्ति के नियंत्रण में रखने, और इस प्रकार उसके क्रूर आदेशों (tyrannous mandates) से अपने को मुक्त करना सिखाता है। अतएव हम कह सकते हैं कि मनोविज्ञान ही सब विज्ञानों का विज्ञान है, और उसके बिना अन्य सारे विज्ञान एवं दूसरे सभी ज्ञान व्यर्थ हैं। अनियंत्रित और अनिर्दिष्ट मन हमें सदैव उत्तरोत्तर नीचे की ओर घसीटता रहेगा -हमें चींथ डालेगा, हमें मार डालेगा; और नियंत्रित तथा निर्दिष्ट मन हमारी रक्षा करेगा, हमें मुक्त करेगा। इसलिये वह अवश्य नियंत्रित होना चाहिये, और मनोविज्ञान (मनःसंयोग) सिखाता है कि इसे कैसे करना चाहिये।
शरीर क्रिया विज्ञान (physiology) या भौतिक-विज्ञान के अध्यन और विश्लेषण के लिये, अपने मन को पवित्र रखने, यम-नियम का पालन करने या चरित्र-निर्माण करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि स्थूल शरीर और मस्तिष्क में उत्पन्न किसी खराबी को स्कैन करके बारीकी से जाँचने के लिये बहुत से यंत्रों के आविष्कार हो चुके हैं। जिनके माध्यम से स्कैनिंग मशीन या MRI मशीन में शरीर को डालकर कोई चरित्रहीन या दुराचारी वैज्ञानिक भी पर्याप्त आँकड़े जुटा सकता है। फिर उन तथ्यों का अध्यन और विश्लेषण करके शरीर या दिमाग में आये किसी खराबी- ब्रेनट्यूमर, बी.पी, शुगर, हार्ट ब्लॉकेज को पहचान कर, उस विज्ञान की जानकारी द्वारा इलाज करना सुगम हो जाता है। किन्तु मन के अध्यन और विश्लेषण (मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार) के लिये कोई आँकड़े नहीं हैं, बहार से उपलब्धि के लिये कोई ऐसे तथ्य नहीं हैं, जो समान रूप से सर्वसुलभ हों। क्योंकि मन का विश्लेषण किसी बाह्य यंत्र के द्वारा नहीं, स्वयं मन के द्वारा ही हो सकता है। फिर जो मन जितना पवित्र निर्मल और शान्त होता है,वही अपने चित्त की गहराइयों में जन्म-जन्मान्तर से बैठे संस्कारों,या पाशविक प्रवृत्ति के विरुद्ध संग्राम करके उसे वशीभूत कर सकता है। इसीलिये मनःसंयोग, या मनोविज्ञान का विज्ञान- (दी साइन्स अव साइकालजी) ही सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है !
पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति यह नहीं जानती कि -प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ! इसीलिये अपने अन्तर्निहित ब्रह्मत्व या दिव्यता को प्रकट करने के लिये- पवित्र जीवन जीने का कोई प्रयास नहीं करती। खाओ-पीओ-मौज करो की पाशविक प्रवृत्ति या प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करके यथार्थ मनुष्य बनने और बनाने के महत्व को नहीं समझती, और कामिनी-कांचन भोग में लिप्त होकर मनःसंयोग के विज्ञान या आध्यात्मिकता को अन्धविश्वास या मजाक की वस्तु समझती है। इसीलिये पश्चिम में मन की शक्तियों, विशेषतः असाधारण शक्तियों (unusual powers) को जादू-टोने और रहस्यवाद (witchcraft and mysticism) के घेरे में रखकर देखा जाता है। 
पश्चिम में उच्चतर मनोविज्ञान के अध्यन को मात्र तथाकथित अतीन्द्रिय घटनायें (साइकिक फिनामनान) जैसी कुछ चमत्कार दिखने वाले हिन्दू फ़क़ीर करते हैं; की श्रेणी में डालकर देखा जाता है, इसलिये यह विषय वहाँ पिछड़ गया है। जबकि विश्व भर के भौतिक शास्त्री (Physicists) प्रायः एक ही परिणाम पर पहुँचते हैं। उन्हें जिन सामान्य प्राकृतिक नियमों (general facts) का पता लगता है, और उनके अनुगामी बाद में जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, उनके विषय में उनमें कोई मतभेद नहीं होता। इसका कारण यह है कि भौतिक विज्ञान संबंधी आँकड़े सर्वसुलभ हैं और उन्हें सार्वभौम मान्यता प्राप्त है तथा सार्वभौम मान्य नियमों के आधार पर तर्कसंगत परिणाम (logical conclusions) ही निकाले गये हैं।
[ नई दिल्ली से प्रकाशित 'दी टाइम्स नाउ' समाचार पत्र में मई 28, 2014 में मॉडर्न फ़िजिक्स के बारे एक बहुत ही ज्ञान-वर्धक समाचार छपा है- " हिन्दू कॉलेज, दिल्ली के प्रिंसिपल तथा भौतिक विज्ञान के शिक्षक श्री प्रद्युम्न कुमार का कहना है कि आजकल भौतिक विज्ञान उस पद्धति से नहीं सिखाया जाता, जैसे पहले सिखाया जाता था। आज के भौतिकविदों को सिद्धान्त से पहले परीक्षण (experiments) सिखाया जाता है। कुमार कहते हैं, " इससे पहले, भौतिकविद कोई सिद्धान्त (theory) पहले प्रस्तावित कर देते थे, जिसे दशकों बाद प्रमाणित किया जाता था। अब वे पहले ही विज्ञान संबंधी परीक्षण करके, उपलब्ध आँकड़ों का विश्लेषण करते हैं; तत्पश्चात उसके आधार पर अकाट्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं ।"] 
किन्तु मनस्तात्विक क्षेत्र में इससे भिन्नता है-(यह अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष-दर्शन का क्षेत्र है )। यहाँ न तो कोई आँकड़े हैं, न भौतिक इन्द्रियों के द्वारा पर्यवेक्षण या सत्यापित करने योग्य कोई तथ्य हैं, और इसिलिये सार्वभौम मान्यता प्राप्त कोई सामग्री (प्रमाण) भी नहीं है, जिसके आधार पर मनोविज्ञान की एक व्यवस्थित प्रणाली का निर्माण की जा सके। इसीलिये मनोराज्य के अध्यन के लिये पाश्चात्य शिक्षा जगत के पास ऐसी कोई निर्दिष्ट प्रणाली नहीं है, जिसका मन का अध्यन करने वाले सभी संभावित मनोवैज्ञानिक (भावी ऋषि) समान रूप से प्रयोग करके या अनुसरण करके एक ही परिणाम प्राप्त कर सकें।
किन्तु जगतगुरु भारत यह जानता है, कि ' अपने चित्त की गहन से गहन गहराई में यथार्थ मनुष्य है-आत्मा !'  मन को अन्तर्मुख कर लो और उससे संयुक्त हो जाओ । (मन को इन्द्रिय-विषयों में जाने से रोक कर उसे अन्तर्मुखी बनने के लिये प्रशिक्षित करो, विषयाश्रित मन को जीत कर उसे ब्रह्मनिष्ठ मन में रूपान्तरित कर लो।) उस आत्मनिष्ठ मन (standpoint of stability) की स्थिर दृष्टि या साक्षी भाव से मन के घूर्णन (gyrations) का निरिक्षण और उसमें उठने वाले विचारों का पर्यवेक्षण किया जा सकता है; यह क्षमता प्रत्येक मनुष्य में पायी जाती है। किन्तु जिनका एकाग्र मन, चित्त की सबसे गहरी परतों तक को भेद सकता है, केवल उन्हीं व्यक्तियों (ऋषियों या मनोवैज्ञानिकों) को इन तथ्यों और और इन आंकड़ों का पता लग सकता है।
 सम्पूर्ण विश्व के बहुसंख्यक स्वघोषित रहस्यवादियों (self-styled mystics) में मन, उसका स्वभाव और उसकी शक्ति आदि के बारे में बड़ा मतभेद है। इसका कारण यही है कि 'ऐसे' (स्वघोषित रहस्यवादी) लोग  चित्त की सबसे गहरी परत तक प्रविष्ट नहीं हो पाते। उन्होंने अपने तथा दूसरों के मन की केवल कुछ छोटी-मोटी गतिविधियों का ही अवलोकन किया है, और इस तरह के सतही अभिव्यक्तियों के वास्तविक स्वरुप को जाने बिना ही,उन्होंने इन सबको सार्वभौमिक तथ्य के रूप में प्रकाशित कर दिया है। और प्रत्येक सनकी धार्मिक या रहस्यवादी यह दावा करता है कि उसके पास जो तथ्य और आँकड़े हैं, वे ही मनस्तात्विक अनुसन्धान के लिये सबसे विश्वसनीय मापदण्ड है; लेकिन वास्तव में वे उनकी (किसी अफ़ीमची की) कोरी कल्पना के सिवा और कुछ नहीं हैं। यदि तुम सचमुच मन के अध्यन का इरादा रखते हो, तो तुमको मनःसंयोग का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त करना ही चाहिये। 
तुम्हें अपने मन को नियंत्रण में लाने के लिए ' यम-नियम-आसान-प्रत्याहार-धारणा' का ऋषि पतंजलि-निर्दिष्ट प्रणाली के अनुसार नियमित अभ्यास करना ही चाहिए। उस अतिचेतन अवस्था को प्राप्त करने के लिये, तुम्हें मन को वश में करने का अभ्यास अवश्य करना होगा। जहाँ से तुम अपने चेतन-अवचेतन समग्र मन का अध्यन करने में समर्थ हो जाओगे, और उसके प्रबल घूर्णन (wild gyrations) को देखकर भी अविचलित रह सकोगे। 
अन्यथा सतही तौर पर देखे गए तथ्य विश्वसनीय नहीं होंगे; वे सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू नहीं होंगे; और इसीलिये वे सही अर्थों में मनस्तत्विक तथ्य या आँकड़े हो ही नहीं सकते। जिस श्रेणी (ईश्वर कोटि) के लोगों ने मन के अध्ययन की गहराई में प्रवेश किया है, उनके द्वारा निरीक्षित तथ्य सर्वत्र एक जैसे रहे हैं; (I and My father are One) चाहे इस तरह के व्यक्ति (धर्म-गुरु) दुनिया के किसी भी में क्यों न जन्म लिया हो, या किसी भी धर्म के अनुयायी क्यों न रहे हों। जो लोग मन की गहराई में काफ़ी भीतर तक घुसते हैं, उन्हें जो निष्कर्ष उपलब्ध होते हैं, वे एक जैसे ही होते हैं। 
हम जानते हैं कि मनुष्य के तीन प्रमुख उपादान '3H' - शरीर,मन और ह्रदय हैं। तदनुसार हमारे कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं - शारीरिक, मानसिक और वाचिक ! उछलना, कूदना, नाचना आदि शारीरिक कर्म हैं। हमलोग आँखों से देखते हैं, इसलिये समझते हैं कि देखना (या घूरना), सुनना, छूना भी शारीरिक कर्म हैं। किन्तु गहराई से देखने पर पता चलेगा ये सभी जितना शारीरिक कर्म हैं, उससे  अधिक मानसिक कर्म हैं! 
हमारा मन प्रत्यक्ष अनुभव एवं आघात (perception and impulsion) के द्वारा क्रियाशील होता है। उदाहरण के लिए, प्रकाश की किरणें मेरे नेत्र-गोलकों में प्रवेश करती हैं, संवेदक नाड़ियाँ उसे मस्तिष्क अवस्थित नाड़ी-केन्द्र (दर्शन-इन्द्रिय) तक ले जाती हैं, फिर भी यदि मन उस नाड़ी केन्द्र से जुड़ा हुआ न हो, तो मैं उस प्रकाश को नहीं देख पाता। (ऑंखें खोले बेसुध होकर सोये हुए व्यक्ति इसके उदाहरण हैं) जागने या सचेत होते ही, मन में प्रतिक्रिया होती है, और प्रकाश मस्तिष्क के इस पार से उस पार तक कौंध जाता है। मन की प्रतिक्रिया वह प्रेरक शक्ति (impulsion) है जिसके परिणामस्वरुप आँख को वस्तु का बोध होता है। 
मन को वश में करने के लिये तुमको अवचेतन मन की गहराई में अवश्य जाना पड़ेगा, चित्त की गहराइयों में जितने भी विभिन्न प्रकार के संस्कार, विचार आदि संचित हैं, उन्हें क्रमबद्ध करना पड़ेगा तथा उन पर नियंत्रण रखना पड़ेगा। यह प्रथम सोपान है। ' By the control of the subconscious mind you get control over the conscious.' अवचेतन मन पर नियंत्रण हो जाने के बाद, चेतन मन भी तुम्हारा नियंत्रण स्थापित हो जायगा।

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जैसा स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, यदि सचमुच विश्वगुरु बनना भारत के ही भाग्य में लिखा हुआ है, तो मोदी-सरकार को स्वाधीनता प्राप्ति के ६५ वर्ष बाद ही सही, भारत की अपनी शिक्षा नीति अवश्य बननी चाहिये जिसमें अन्य पार्थिव विज्ञानों के साथ साथ, सर्वश्रेष्ठ विज्ञान 'मनोविज्ञान' की पढाई भी भारतीय पद्धति-पतंजलि योग सूत्र के आधार पर, मनःसंयोग का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था होनी चाहिये।
मनःसंयोग के छः दिवसीय पशिक्षण पाठ्यक्रम को तीन स्तर (प्राथमिक विद्यालय-कक्षा ७ तक, उच्चतर माध्यमिक विद्यालय-कक्षा ८से १२तक, और महाविद्यालय -१२वीं कक्षा के बाद ) का बनाकर योग्य शिक्षकों द्वारा (जो महामण्डल के  नेतृत्व-प्रशिक्षण में उत्तीर्ण होने का प्रमाण पत्र ले चुके हों) उनके निर्देशानुसार प्रत्येक जिले में योग्यता के आधार पर प्रशिक्षण शिविर का निरंतर आयोजन होना चाहिये। 
महामण्डल द्वारा आयोजित ' अखिल भारत युवा प्रशिक्षण शिविर' में भाग लेने (विशेषरूप से नेतृत्व प्रशिक्षण) का आवेदन पत्र भविष्य में दिल्ली विश्‍वविद्यालय में फिज़िक्स में ऐड्मिशन लेने के लिये जैसी पात्रता आवश्यक होती है - (हंसराज कॉलेज के लिये उच्चतम कट ऑफ मार्क  - पी.सी.एम में कुल प्राप्तांक 97% था, और श्याम लाल कॉलेज के लिये सबसे कम - 70% था।)]
क्या इन कॉलजों में मनःसंयोग या सर्वश्रेष्ठ विज्ञान 'दी साइन्स अव साइकालजी'-(पांतजलि योग सूत्र) को पढ़ाने में समर्थ शिक्षकों (नेता) के प्रशिक्षण की व्यवस्था ' मदनमोहन मालवीय शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम' के  माध्यम से नहीं होनी चाहिये ?
अखिलभारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने का आवेदन पत्र  में भी चारित्रिक-गुणों (श्रद्धा और धैर्य आदि २४ गुणों) के कुल प्राप्तांक के आधार पर ही नेतृत्व-प्रशिक्षण में भाग लेने की अनुमति देने का प्रावधान किया जाना चाहिये।  'मनःसंयोग' या दी साइन्स अव साइकालजी-पांतजलि योग सूत्र' के पाठ्यक्रम (सिलेबस) का प्रारूप निम्न-लिखित समाचार के आधार पर तैयार किया जा सकता है।
[नई दिल्ली: 'दी टाइम्स नाउ', मई 28, 2014 को उपरोक्त समाचार का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार होगा - 
" अब भौतिक विज्ञान की तरह ही 'दी साइन्स अव साइकालजी' में, 'मनःसंयोग'
 का प्रयोग पहले करना होगा !"
" हिन्दू कॉलेज, दिल्ली के प्रिंसिपल तथा भौतिक विज्ञान के शिक्षक श्री प्रद्युम्न कुमार का कहना है कि आजकल भौतिक विज्ञान उस पद्धति से नहीं सिखाया जाता, जैसे पहले सिखाया जाता था। आज के भौतिकविदों को सिद्धान्त (theory) से पहले प्रयोग करना (experiments) सिखाया जाता है।
कुमार कहते हैं, " इससे पहले, भौतिकविद कोई सिद्धान्त (theory) पहले प्रस्तावित कर देते थे, जिसे दशकों बाद तक प्रमाणित किया जा सकता था। किन्तु अब वे पहले ही विज्ञान संबंधी परीक्षण करके, उपलब्ध आँकड़ों का विश्लेषण करते हैं; तत्पश्चात उसके आधार पर अकाट्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं ।"
उनकी उम्मीद है, कि "  भौतिक विज्ञान के संभावित छात्र अब अपने पाठ्यक्रम के प्रत्येक पेपर में प्रयोग करके देखने तथा आँकड़ों का उपयुक्त विश्लेषणात्मक और कम्प्यूटेशनल कौशल (हूनर) सीखने के लिये, अपने तार्किक मन और अच्छे गणित कौशल का भी इस्तेमाल कर सकेंगे।" उनका यह भी मानना है कि आधुनिक भौतिक-विज्ञान में एक साथ मिलकर काम करने की भावना (टीम्वर्क) भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है; क्योंकि इन दिनों सर्वाधिक प्रयोग 'collaborative computing ' (सहयोगी अभिकलन प्रणाली) से किये जाते हैं। 
आगे का रास्ता (Road ahead) : श्री कुमार कहते हैं, " अवसर तो कई हैं, किन्तु भौतिकी के क्षेत्र में अपने आप को स्थापित करने में थोड़ा विशेष समय लगता है, इसलिये पदार्थ-विज्ञान का अध्यन एवं  प्रयोग करते समय आप को विशेष रूप धैर्य भी रखना अनिवार्य होगा।"
" हिग्स बोसॉन (Higgs Boson) एवं सर्न (CERN) प्रोयगशाला ने छात्रों में भौतिक विज्ञान पढ़ने के लिये उत्तेजना पैदा कर दी है। इन दिनों भारत भी परमाणु ऊर्जा में निवेश कर रहा है, उपग्रहों पर तेजी से काम कर रहा है। इसलिये आजकल के छात्र, नैनो प्रौद्योगिकी (nanotechnology), नाभिकीय भौतिकी (नूक्लीअर फिज़िक्स) अंतरिक्ष भौतिकी (space physics) आदि विषयों के साथ घनिष्ट रूप से सम्बद्ध हो रहे हैं। एक बार फिर से रिसर्च या अनुसन्धान के प्रति रुझान उन्हें भौतिक विज्ञान पढ़ने के लिये प्रेरित कर रही है।
क्योंकि इन विद्यार्थियों को आगे चलकर -- 'भारतीय विज्ञान संस्थान' (आई.आई.एससी),बंगलुरु (भारतीय विज्ञान संस्थान भारत का वैज्ञानिक अनुसंधान और उच्च शिक्षा के लिये अग्रगण्य शिक्षा संस्थान है।) ' रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन' (डी.आर.डी.ओ), ' वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद' (सी.एस.आई.आर), 'भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र' (बी.ए.आर.सी), 'टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान' (टी.आई.एफ.आर), आदि में आसानी से वैज्ञानिक के पद पर नियुक्ति मिल जाती है। 

पात्रता (Eligibility): केवल वैसे उम्मीदवार ही आवेदन करने के पात्र हैं, जिन्होंने १२ वीं कक्षा तक विज्ञान से पढाई की हो, तथा भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और गणित (पी.सी.एम) में अंकों के कुल प्राप्तांक के आधार पर प्रवेश देने का विचार किया जायगा। दिल्ली विश्वविद्यालय के २० से अधिक कॉलेजों भौतिकी सिखाने की व्यवस्था है।
पाठ्यक्रम सामग्री (Course Content):  
विनियम (Discipline 1): भौतिकी के छात्र को २० विषयों (20 papers) का अध्यन करना होगा, जिसमें एक विषय होगा 'अनुसंधान-प्रणाली' (research methods), दूसरे में एक 'शोध-प्रबंध' (डिसर्टेशन या dissertation) भी शामिल रहेगा। भौतिक विज्ञान के छात्रों को गणितीय भौतिकी, यांत्रिकी, भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला -1 में उन्हें थर्मल भौतिकी, बिजली और चुंबकत्व, डिजिटल सिस्टम और अनुप्रयोगों, लहर-तरंगों और प्रकाशिकी, आधुनिक भौतिक विज्ञान के तत्वों, क्वांटम यांत्रिकी तथा तत्सम्बन्धी प्रयोगों और एनालॉग सिस्टम तथा अनुप्रयोग आदि विषयों का अध्ययन करना होगा
विनियम -२ (Discipline 2) : इस शंकाय में थर्मल भौतिकी, यांत्रिकी, बिजली और चुंबकत्व, डिजिटल और एनालॉग सर्किट और इंस्ट्रूमेंटेशन, प्रकाशिकी और आधुनिक भौतिकी आदि छह विषयों की पढाई होगी।
एप्लाइड पाठ्यक्रम (Applied Courses) : कम्प्यूटेशनल भौतिकी पर दो पत्र, एम्बेडेड सिस्टम, micro-controller का परिचय एवं प्रकाशिकी के विषय शामिल होंगे। 
कट ऑफ मार्क (cut-off mark): विगत वर्ष दिल्ली विश्‍वविद्यालय में फिज़िक्स में ऐड्मिशन लेने के लिये उच्चतम कट ऑफ मार्क हंसराज कॉलेज के लिये - पी.सी.एम में कुल प्राप्तांक 97% था, और श्याम लाल कॉलेज के लिये सबसे कम - 70% था।  
हिन्दू कॉलेज की रुपरेखा (प्रोफाइल)  
हिन्दू कॉलेज 1899 में स्थापित किया गया था, यह दिल्ली का एकमात्र कॉलेज है जहाँ 1935 से ही एक छात्र संसद कार्यरत है। स्थान: विश्वविद्यालय एन्क्लेव, दिल्ली-11007 Location : University Enclave, Delhi-11007
प्रस्तावित पाठ्यक्रम (Courses Offered) : इलेक्ट्रॉनिक्स में बीटेक, और रसायन विज्ञान में स्नातक, भौतिक विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, गणित, अंग्रेजी, राजनीति विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, हिंदी, वाणिज्य
सुविधाएंपूरी तरह से वातानुकूलित और कम्प्यूटरीकृत एक पुस्तकालय है। क्रिकेट, टेबल टेनिस, लॉन टेनिस और बास्केटबॉल के रूप में विभिन्न खेलों के लिए सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसका एन सीसी विंग दिल्ली नेवल यूनिट के साथ जुड़ा हुआ है. लड़कों के लिये परिसर में ही होस्टल की व्यवस्था है। संपर्क: 011-27667184 
 सेंट स्टीफंस कॉलेज का प्रोफाइल
1881 में स्थापित, सेंट स्टीफंस दिल्ली का सबसे पुराना कॉलेज है. यह चांदनी चौक में कटरा खुशहाल राय में एक छोटे से घर में सिर्फ 5 छात्रों और तीन शिक्षकों के साथ शुरू हुआ था। 1941 में, कॉलेज विश्वविद्यालय एनक्लेव में अपने वर्तमान साइट में स्थानांतरित कर दिया गया है।  
प्रस्तावित पाठ्यक्रम : अर्थशास्त्र, अंग्रेजी, इतिहास, दर्शन, संस्कृत, गणित, रसायन शास्त्र, भौतिकी आदि विषयों में स्नातक तक पढाई की जाती है।  
सुविधाएं: 90,000 से अधिक पुस्तकों के साथ एक पुस्तकालय. आउटडोर खेलों के लिए पुराने शहर की दीवार के बाहर कश्मीरी गेट और मोरी गेट के बीच के क्षेत्र में व्यवस्थित है। परिसर में टेनिस और बास्केटबॉल खेलने की सुविधा है। फ्रांसिस मोंक व्यायामशाला, महिलाओं के कॉमन रूम में ही जिम्नास्टिक, बैडमिंटन, स्क्वैश, टेबल टेनिस और अन्य इनडोर खेलों के लिए सुविधाएं प्रदान करते हैं। लड़कों और लड़कियों दोनों के लिए परिसर में होस्टल भी है। संपर्क: 011-27667271}
क्या इन कॉलजों में मनःसंयोग या सर्वश्रेष्ठ विज्ञान 'दी साइन्स अव साइकालजी-पांतजलि योग सूत्र' को पढ़ाने में समर्थ शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था ' मदनमोहन मालवीय शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम '  माध्यम से नहीं होनी चाहिये ? 
{ The Times Now, may 28, 2014 New Delhi :

" In physics, experiments come first "
 
Physics isn't now taught the way it used to be, Hindu College principal and physics teacher, Pradyumn Kumar, says that for physicists today, experiments come before the theory. " Earlier, physicists would propose theories that would be proved decades later," says Kumar. " Now, they experiment first and analyse the data." He expects potential physics students to bring the relevant skills to class--" analytical and computational skills because every paper includes experiments, a logical mind and good math skills." He thinks teamwork is important too, as most experiments these days are collaborative. 

Road ahead:  Says kumar," The Opportunities are many, But you have to be a little patient. It takes some time to establish yourself in physics." Research is drawing students of physics again-" The Higgs Boson and CERN experiment have created some excitement," He says. " Students get involved in nanotechnology, nuclear physics--India is investing in nuclear power, space physics which is essentially working on satellites, and material design," he explains. Students are also absorbed by organizations such as DRDO, ISRO, CSIR, BARC, TIFR and IISc.


Eligibility : Only candidates who have done science till class 12th are eligible to apply and the aggregate of marks scored in physics, chemistry and maths (PCM) is considered. Over 20 colleges teach physics.

Course Content : Discipline 1: Students of Physics will have to study of 20 papers including one on research methods and another that will consist of a dissertation. Students of physics will study mathematical physics, mechanics, physics lab-1, thermal physics, electricity and magnetism, digital systems and applications, waves and optics, elements of modern physics, quantum mechanics and applications and analog systems and applications.

Discipline 2: There are six papers covering thermal physics, mechanics, electricity and magnetism, digital and analog circuits and instrumentation, optics and modern physics.


Applied Courses :  Two papers on computational physics, embedded system, introduction to micro-controller, applied optics.


cut-off mark: The highest first cut-off mark was at Hansraj-97 % , and Shyam Lal had the lowest --70 %. 
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Hindu College Profile 

Hindu College was founded in 1899. It is the only college in Delhi to have a students' Pasrliyament since 1935. Location : University Enclave, Delhi-11007


Courses Offered : B Tech in electronics, and bachelor in chemistry, physics, botany, mathematics, English, Political Science, History, Economics, Philosophy, Hindi, Commerce.


Facilities : A fully air-conditioned and computerized library. Facilities for various sports such as cricket, table tennis, lawn tennis and basketball. Its N CC wing is associated with Delhi Naval Unit. Boys hostel on campus. Contact : 011-27667184

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St. Stephens's College Profile

Founded in 1881, st Stephens is the oldest college in Delhi. It began with just 5 students and three teachers in a small house in Katra Khushal Rai in Chandni Chowk. In 1941, the college shifted to its present site in University Enclave.


Courses Offered : Bachelor in economics, English, History, Philosophy, Sanskrit, Mathematics, Chemistry, Physics.


Facilities : A library with more than 90,000 books. Fields for outdoor games are situated outside Old City Wall, between Kasmere Gate and Mori Gate, tennis and basketball on the campus. Francis Monk gymnasium, junior common room and ladies common room provide facilities for gymnastics, badminton, squash, table tennis and other indoor games. Hostels for both boys and girls. Contact: 011-27667271 } 

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