Sunday, November 17, 2013

ब्रह्मचर्य के प्रति समर्पित महात्मा गाँधी के कुछ प्रिय भजन !

 " मात्र पाशविक कामुकता के नियंत्रण को ही ब्रह्मचर्य का पर्याय मान लिया गया है। मुझे ऐसा लगता है कि यह अवधारणा अधूरी और गलत है। मेरे विचार में ब्रह्मचर्य का अर्थ है, समस्त इन्द्रियों का संयम। गाँधीजी को निम्नलिखित आंतरिक परिज्ञान की उपलब्धि हुई, " .... तात्पर्य यह है कि मन में विषय-भोग के प्रति विरक्ति आनी चाहिये । विषय की जड़े मन मे रहती हैं। ब्रह्मचर्य का प्रयत्न करनेवाले बहुतेरे लोग विफल होते हैं , क्योकि वे खाने-पीने , देखने-सुनने इत्यादि मे अब्रह्मचारी की तरह रहना चाहते हुए भी ब्रह्मचर्य पालन की इच्छा रखते हैं। आँख का उपयोग दोनो करते हैं । ब्रह्मचारी देव-दर्शन करता हैं , भोगी नाटक-सिनेमा मे लीन रहता है । दोनो कान का उपयोग करते हैं । पर एक ईश्वर- भजन सुनता हैं , दूसरा विलासी गाने सुनने मे रस लेता हैं । दोनो भोजन करते हैं । पर एक शरीर-रूपी तीर्थक्षेत्र को निबाहने -भर के लिए देह को भाड़ा देता हैं, दूसरा स्वाद के लिए देह मे अनेक वस्तुए भरकर उसे दुर्गन्ध का घर बना डालता हैं । ब्रह्मचर्य का अर्थ हैं , मन-वचन से समस्त इन्द्रियो का संयम । जब तक विचारो का इतना अंकुश प्राप्त नही होता कि इच्छा के बिना एक भी विचार मन मे न आये, तब तक ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण नही कहा जा सकता । विचार-मात्र विकार हैं , मन को वश मे करना; और मन को वश वायु को वश मे करने से भी कठिन हैं ।फिर भी यदि हम आत्मा हैं, तो यह वस्तु भी साध्य है ही । हमारे मार्ग मे कठिनाइयाँ आकर बाधा डालती हैं, इससे कोई यह न माने कि वह असाध्य हैं । और परम अर्थ के लिए परम प्रयत्न की आवश्यकता हो तो उसमे आश्चर्य ही क्या । प्रयत्नशील ब्रह्मचारी (विवेक-प्रयोगी) अपनी त्रुटियों का नित्य दर्शन करेगा , अपने अन्दर ओने-कोने में छिपकर बैठे हुए विकारो को पहचान लेगा और उन्हे निकालने का सतत प्रयत्न करेगा । जब तक मन  पर इतना अंकुश प्राप्त नही होता कि इच्छा के बिना एक भी कामुक-विचार मन मे न आये, तब तक ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण नही कहा जा सकता ।" 
गाँधीजी के लिये ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ इन्द्रिय-निग्रह का वह अभ्यास है, जो हमें ईश्वर के साथ सम्पर्क में रखता है, और जो तपस की शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
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भारतीय संस्कृति के इसी पहलू को जनमानस में बैठा देने के लिये गाँधीजी के आश्रम में बहुत सारगर्भित भजन गए जाते थे, उनमें से कुछ भजन नीचे दिये जा रहे हैं -
आश्रम – भजनावलि:
 काका कालेलकर:१-१-’५०  નવજીવન
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर
अहमदाबाद – १४

                              ‘स्वधर्म’ के तत्वका पालन करते हुए हमारे आश्रमने सब धर्मो और पन्थोंके प्रति आदर रखनेका व्रत लिया है । उसके अनुसार आश्रममें उभय सन्ध्याकालको जो उपासना या प्रार्थना की जाती है उसका यह संग्रह है । आश्रमका जीवन जैसा समृद्द होता गया, वैसा यह भजन-संग्रह भी बढता गया है । हम प्रार्थना करते हैं कि हमारी यह वाङमयी उपासना प्रभुको प्रिय हो ।
सत्याग्रहाश्रम – साबरमती – नारायण मोरेश्वर खरे

नत्वहं कामये राज्यं न स्वर्ग नापुनर्भवम
न त्वहं कामये राज्यम् न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कामये दुःख-तप्तानाम् प्राणिनाम् आर्ति-नाशनम् ।। 

अपने लिए न मैं राज्य चाहता हूं, न स्वर्गकी ईच्छा करता हूं । मोक्ष भी मैं नहीं चाहता । मैं तो यही चाहता हूं कि दुःखसे तपे हुए प्राणियोंकी पीडाका नाश हो ।

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
            तत्त्वं पूषन्नपातृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥15॥
(ईशावास्योपनिषद)

इसका अर्थ यही है कि परब्रह्म सूर्यमण्डल के मध्य स्थित है, किन्तु उसकी अत्यन्त प्रखर किरणों के तेज से हमारी ये भौतिक आंखें उसे नहीं देख पातीं।सच्चाई का मुख (ऊपरी भाग) तो स्वर्ण के आवरण से आच्छादित है, हे ईश्वर तुम इस आवरण को मेरी दृष्टि के सामने हटा दो, ताकि मैं सत्य की ज्योति का दर्शन कर सकूँ ! जो परमात्मा वहां स्थित है, वही मेरे भीतर विद्यमान है। मैं ध्यान द्वारा ही उसे देख पाता हूं। हे अग्ने! हे विश्व के अधिष्ठाता! आप कर्म-मार्गों के श्रेष्ठ ज्ञाता हैं। आप हमें पाप कर्मों से बचायें और हमें दिव्य दृष्टि प्रदान करें। यही हम बार-बार नमन करते हैं।

श्रेयश्च पेयश्च मनुष्यमेतः
मनुष्य के सामने हमेशा श्रेय (कल्याणकारी) और प्रेय (रमणीय) दोनों मार्ग आते रहते हैं। अनुभवी परामर्शदाता दोनों में अवश्य अन्तर देखेंगे और कल्याणकारी मार्ग का ही चयन करेंगे, जबकि मुर्ख व्यक्ति व्यक्ति रमणीय मार्ग के आकर्षण को लाभदायक मानकर उसी पर चलना चाहेंगे।
सर्वें वेदा यत्पदं आमनन्ति
जिसको समस्त वेदों ने प्रमाणित किया है, जिसको प्राप्त करने के लिये ऋषि मुनि तपस्या करते हैं, तथा जिसको प्राप्त करने के लिये भक्त लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं; उस राज्य के विषय में मैं तुमको एक शब्द में बताऊँगा, वह ॐ है ! 
न तत्र सूर्यो भाति न चद्रतारकम्
उस राज्य को सूर्य,चन्द्र या नक्षत्रों की किरणे भी प्रकाशित नहीं करती हैं, यहाँ तक कि मेघविद्युत् भी वहाँ प्रविष्ट नहीं हो सकते, क्योंकि ये सभी अपना अपना प्रकाश वहीँ से प्राप्त करते हैं, यह समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड उसकी ही ज्योति से प्रकाशित हैं।   

आत्मानं रथिनं विद्घि शरीरं रथमेव तु
इस शरीर को रथ और आत्मा को रथी समझो, बुद्धि को सारथी और मन को लगाम मानो, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, इन्द्रिय विषय घास के मैदान हैं, ज्ञानी-जन कहते हैं कि आत्मा मन,बुद्धि और इंद्रियों के माध्यम से ही कार्य करते हैं।  
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः
वह व्यक्ति जिसका विवेक एक अनुभवी सारथी की तरह है, जिसका मन एक लगाम की तरह उसके नियंत्रण में है, वह  मनुष्य अपनी यात्रा सुरक्षित रूप से समाप्त करके विष्णु के परमपद तक पहुँच ही जाता है। 
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान्
कर्मों के द्वारा जो कुछ भी पद-प्रतिष्ठा प्राप्त किया जा सकता है, उसकी नश्वरता का अनुभव हो जाने के बाद, ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञ) को अनासक्ति में स्थित होने का प्रयत्न करना चाहिये। कर्म से कभी धैर्य की प्राप्ति नहीं होती। उस अविनाशी पद (ॐ) को जानने के लिये मनुष्य को बहुत आदर के साथ एक ऐसे गुरु के पास जाना चाहिये जो वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञ हैं।
 तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक्
प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच
तां तत्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥
॥ मुण्डकोपनिषत् ॥
उसी मनुष्य के पास श्रद्धा के साथ मन की शांति आती है, जिसको ब्रह्मज्ञ गुरु यह दिव्य ज्ञान देते हैं कि मनुष्य-रूप में श्रीरामकृष्ण परमहंस ही सत्य के अवतार हैं। 
प्रणवो धनु शरोह्यात्मा ब्रह्यतल्लक्ष्यमुयते
प्रणव () धनुष है, आत्मा तीर और ब्रह्म जिसका लक्ष्य है, इसलिए मनुष्य को बिना चुके तीर (आत्मा) को इस प्रकार छोड़ना चाहिये ताकि आत्मा ब्रह्म के साथ उस प्रकार एक हो जाना चाहिये जैसे तीर लक्ष्य के साथ हो जाता है।
भिद्यते ह्नदयग्रथः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः
जब कोई व्यक्ति भगवान श्रीरामकृष्ण के ब्रह्मत्व की अनुभूति कर लेता है, उसके ह्रदय की ग्रंथि छिन्न-भिन्न हो जाती है, सारे संदेह दूर हो जाते हैं, और कर्म उसको बाँध नहीं पाते। 
ब्रह्मैवेदं अमृतं पुरस्तात्
यह शाश्वत [ब्रह्म] से पहले और पीछे है, सही और बाएँ में है नीचे और ऊपर है, हर जगह व्याप्त है, जगत है, सब से परे है. 
सत्यमेव जयते नानृतम्

केवल सत्य की ही विजय होती है, असत्य की कभी नहीं। यही वह मार्ग है जिससे ज्ञानी पुरुष,जिसका उद्देश्य पूर्ण हो गया है, वह संसार-सागर को पार कर लेता है, जो कि देवताओं का मार्ग है, और जहाँ सत्य का परम धाम है, वह सत्य के रास्ते पर चलने से ही खुल जाता है।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः  
यह आत्मसाक्षात्कार उन लोगों के लिए संभव नहीं है, जो दुर्बल, आलसी या अर्थहीन तपस्या की सहायता लेते हैं। किन्तु जो व्यक्ति इन दोषों को सुधार लेता है, उस विवेकी पुरुष की आत्मा 
आत्मा ब्रह्मपद में प्रविष्ट हो जाती है। 
संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः 
ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५॥  

मुण्डकोपनिषत् ॥
वैसे सभी लोग जो वेदान्त और विज्ञान के माध्यम से जीवन के अर्थ (जीवन ही ईश्वर हैं) को 
अच्छी तरह से समझ चुके हैं, जिनका ह्रदय अविनाशी को प्राप्त करने के उद्देश्य से सन्यास के द्वारा शुद्ध हो गया है, वे मृत्यु के बाद ब्रह्मलोक में पहुँचकर मुक्त हो जाते हैं। 
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे
जिस प्रकार समुद्र की ओर बहती हुई नदियाँ, उनके नाम और रूपों छोड़ कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति अपने नाम और रूप को छोड़ कर सर्वोच्च ईश्वर में लीन हो जाते हैं।
  स यो ह वै तत् परमं ब्रह्मविद, ब्रह्मैव भवति
जो मनुष्य उस परब्रह्म परमेश्वर को जान लेता है, वह ब्रह्म हो जाता है, उसके परिवार में कोई भी व्यक्ति ब्रह्म से अनभिज्ञ नहीं रहता। वह दुःख और पाप से परे हो जाता है। उसके ह्रदय कि ग्रंथि खुल जाती है, और वह अमर हो जाता है। 
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह
जो मनुष्य उस ब्रह्म को जान लेता है, जहाँ से वाणी और मन भी लौट आते हैं, वह भय मुक्त हो जाता है। वह इस बात की चिन्ता में जलता नहीं रहता कि ' हाय मैंने अमुक अच्छे कर्म क्यों नहीं किये ? या मुझसे वैसा पाप क्यों हो गया ?
युवा स्यात् साधु युवाध्यायकः आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठः
 प्रत्येक युवक को चरित्रवान बनना चाहिये, उसे आशावादी, दृढ़ संकल्प और अध्ययनशील होना चाहिये। उसके लिए यह सम्पूर्ण पृथ्वी धन से भरपूर होती है। 

ऋग्वेद कहता है- ' मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव:'। 
हे ईश्वर ! हम सबों के लिये हवा, पानी, पौधे का जीवन, प्रातः और संध्या, पृथ्वी की धूल, स्वर्ग की छाँव पिता के जैसे हों, और वृक्ष, सूर्य और गायों हमारे लिए एक वरदान की तरह हों।

 


श्रूयतां धर्म-सर्वस्वम्, श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
     आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।। ८ ।। 


८. धर्मका यह रहस्य सुनो और सुनकर ह्रदयमें धारण करो जिसे तुम अपने लिए बुरा समझते हो, उसे दूसरोंके लिए मत करो ।।


श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः
  परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम् ।। ९ ।।
 


९. करोडों ग्रंथोमें जो कहा गया है, उसे मैं आधे श्लोकमें कहूंगा - दूसरोंका भला करनेसे पुण्य होता है और बुरा करनेसे पाप ।। 
आदित्यचद्रावनिलोनलश्च
आदित्य-चन्द्रावनिलोनलश्च
धौर् भूमिर् आपो ह्रदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये
      धर्मोपि जानाति नरस्य वृत्तम् ।। १० ।।
 
१०. सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, ह्रदय, यम, दिन और रात, सांझ और सवेरा और स्वयं धर्म मनुष्यके आचरणको जानते है, यानी मनुष्य अपना कोई विचार या कर्म ईन से छिपा नहीं सकता ।।

द्वादश-पंजरिका-स्तोत्रके कुछ श्लोक
अर्थम् अनर्थं भावय नित्यम् नास्ति ततः सुख-लेशः सत्यम् ।
पुत्राद् अपि धन-भाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ।।
हमेशा खयाल रख कि धन अनर्थका कारण है । सचमुच उसमें जरा भी सुख नहीं, धनवानोंको पुत्रसे भी डरना पडता है । सब जगह यह रीति पायी गयी है ।।
मूढ ! जहीहि धनागम-तृष्णाम् कुरू सद् बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल् लभसे निज-कर्मोपात्तम् वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ।।
हे मूर्ख ! धन पानेकी तृष्णा छोड दे । मनमें तृष्णारहित सत्य-संकल्पको धारण कर । अपनी मेहनतसे जितना धन मिल जाय, उससे अपने दिल को खुश रख ।।
कामं क्रोधं लोभं मोहम् त्यक्त्वात्मानं भावय कोहम् ।
आत्म-ज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरक-निगूढाः ।।
काम, क्रोध, लोभ, मोहका त्याग करके अपने विषयमें सोच कि ‘ मैं कौन हूं ’ जिन्हें आत्मज्ञान नहीं, ऐसे मूढ लोग नरकमें पडे घोर यातना भोगते रहते है ।।
 त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि सर्व-सहिष्णुः ।
सर्वंस्मिन्नपि पश्यात्मानम् सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ।।
तुझमें, मुझमें और दूसरोंमें सब-कुछ सहनेवाला एक ही विष्णु है, फिर भी तू नाहक गुस्सा होता है । तु सबमें आत्माको ही देख, और भेदभावरूपी अज्ञानको छोड दे ।।
नलिनी-दल-गत-सलिलं तरलम् तद्वज्-जीवितम् अतिशय-चपलम् ।
विद्धि व्याध्यभिमान-ग्रस्तम् लोकं शोक-हतं च समस्तम् ।।
कमलके पत्ते पर पडे हुए तरल पानीकी तरह जीवन बहुत ही चंचल है । तू यह समझ ले कि यह सारा संसार बीमारियों, अभिमान और शोकसे धिरा हुआ है ।।
 प्रह्लादः नाथ ! योनिसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहम् ।
तेषु तेष्वचलाभक्तिर् अच्युतास्तु सदा त्वयि ।।
या प्रीतिर् अविवेकानां विषयेष्वनपायिनी ।
त्वाम् अनुस्मरतः सा मे ह्रदयान् मापसर्पतु ।।

प्रह्लाद –  हे नाथ ! हे अच्युत ! हजारों योनियोंमें जहां-जहां मैं जन्म लूं, वहां-वहां तुझमें मेरी भक्ति सदा अचल रहे ।
अविवेकी पुरूषोंकी जैसी गाढ प्रीति विषयोंमें होती है, वैसी ही किन्तु कल्याणकारी प्रीति तेरा स्मरण करनेवाले मेरे ह्रदयसे कभी दूर न हो ।।
 भरद्वाजः लाभस् तेषां जयस् तेषां कुतस् पराजयः ।
येषाम् ईनदीवरश्यामो ह्रदयस्थो जनार्दनः ।।
भरद्वाज – जिनके ह्रदयमें नील कमल-सा सांवला, कमलापति, जनार्दन बैठा है, उन्हें लाभ ही लाभ, जय ही जय है, उनके लिए पराजय कहांसे ?
 शौनकः भोजनाच्छादने चिन्तां वृथा कुर्वन्ति वैष्णवाः ।
योसौ विश्वम्भरो देवः स भक्तान् किम् उपेक्षते ।।
शौनक –  विष्णुके भक्त व्यर्थ ही अन्न और वस्त्रकी चिन्ता करते है । जो भगवान सारी दुनियाको पालता है, वह क्या अपने भक्तकी उपेक्षा करेगा ? ।।
 सनत्कुमारः आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।
सर्व-देव-नमस्कारः केशवं प्रति गच्छति ।।
सनत्कुमार –  जिस प्रकार आकाशसे गिरनेवाला पानी अन्तमें समुद्रमें ही जाता है, उसी प्रकार सब तरहके देवोंको किया हुआ नमस्कार परमात्मा केशवको ही पहुंचता है ।।
कृष्ण ! त्वदीय पद-पङ्कज-पञ्जरान्तम्
अद्यैव मे विशतु मानस-राजहंसः ।
प्राण-प्रयाण-समये कफ-वात-पित्तैः
कण्ठावरोधन-विधौ स्मरणं कुतस् ते ।। ५ ।।
५. हे कृष्ण ! मेरा चित्तरूपी मानस-हंस आज ही तेरे चरण-कमलरूपी पिंजरेमें बन्द हो जाय । क्योंकि प्राण निकलनेके वक्त, वात और पित्तसे कण्ठ रूंध जायगा, तब तेरा स्मरण कैसे हो सकेगा ? ।।
( सोरठा )
जेहि सुमिरत सिधि होई, गण-नायक करिवर-वदन ।
करो अनुग्रह सोई, बुद्धि-रासि शुभ-गुण-सदन ।।
मूक होई वाचाल, पंगु चढै गिरिवर गहन ।
जासु कृपासु दयालु, द्रवौ सकल कलि-मल-दहन ।।
हे हाथी के सिर वाले गणों के नेता गणेशजी, जिनका चिंतन करने से मनुष्य मुक्त हो जाता है और जो ज्ञान और गुणों के भण्डार हैं, आपका अनुग्रह मुझपर हो, हे दयालु ! आपकी दया से गूँगा बोलता है, लंगड़ा खड़े पहाड़ पर चढ़ जाता है, और जिनकी कृपा से कलिकाल की समस्त गंदगी दूर हो जाती है।
( राग देस – ताल दादरा )
तु दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी ।
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप- पुंज-हारी ।। १ ।।
नाथ तू अनाथको, अनाथ कौन मोसो ?
मो समान आरत नहि, आरत-हर तोसो ।। २ ।।
ब्रह्म तू, हौं जीव, तू ठाकुर, हौं चेरो ।
तात, मात, गुरू, सखा तू, सब विधि हितु मेरो ।। ३ ।।
तोहिं मोहिं नाते अनेक मानियै जो भावै ।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु चरन-सरन पावै ।। ४ ।।


(राग आसावरी या तोडी – तीन ताल )
There is no one like Him !
ऐसो को उदार जग माहीं
बिनु सेवा जो द्रवे दीन पर, राम सरिस कोउ नाहीं ।।
जो गति योग विराग जतन करी, नहिं पावत मुनि ग्यानी ।
सो गति देत गीध सबरी कहं, प्रभु न बहुत जिय जानी ।।
जो संपति दस सीस अरपि करि, रावन सिव पहं लिन्ही ।
सो संपदा बिभीषण कहं अति, सकुच सहित हरि दीन्ही ।।
तुलसिदास सब भांति सकल सुख, जो चाहसि मन मेरो ।
तौ भजु राम काम सब पूरन, करहि कृपानिधि तेरो ।।
 
इस दुनिया में श्रीरामकृष्ण के इतना उदार और कौन है ? जो बदले में किसी भी सेवा की अपेक्षा किये बिना ही दीनदुखियों पर दया करते हैं, रामकृष्ण के जितना उदार दूसरा कोई नहीं है, (जो २०/= में २००/= कि दवा देते हैं!) उस परमपद को जिसे सन्त लोग भक्ति और आत्मोसर्ग करने के बाद भी प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं, उसे गिद्धराज जटायु और भीलनी शबरी को प्रदान करने के बाद भी सोचते हैं, कि मैं तो उनके लिये कुछ और अधिक नहीं कर सका ? लंकापति रावण ने जिस राज्य को शिवजी से अपना शीश काटकर तपस्या करने के बाद पाया था, उसे उन्होंने विभीषण को वैसे दे दिया जैसे वह मानो कुछ भी न हो। तुलसीदास जी कहते हैं, ओ मेरे मन तू यदि वास्तव में सच्चा सुख पाना चाहता है, तो श्रीराम(कृष्ण) की पूजा करो वे अपनी कृपा से तुम्हारे सभी कार्यों को पूर्ण कर देंगे।  
( राग खमाज – तीन ताल )
कुटुंब तजि शरण राम ! तेरी  आयो,
तजि गढ लंका, महल औ ’ मंदिर, नाम सुनत उठि धायो ।।
भरी सभामें रावण बैठ्यो, चरण प्रहार चलायो ।
मूरख अंध कह्यो नहिं मानै, बार बार समझायो ।। १ ।।
आवत ही लंका-पति कीनो, हरि हंस कंठ लगायो ।
जन्म जन्मके मिटे पराभव, राम-दरस जब पायो ।। २ ।।
हे रघुनाथ ! अनाथके बंधु ! दिन जान अपनायो ।
तुलसिदास रघुवरकी शरणा, भक्ति अभय पद पायो ।। ३ ।।
९ (P-73)
(राग खमाज – तीन ताल )
जाके प्रिय न राम वैदेही ।
सो छांडिये कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।।
तज्यो पिता प्रहलाद, भिभीषण बन्धु, भरत महतारी ।
बलि गुरू तज्यो, कंत व्रजबनितनि, भये मुद-मंगलकारी ।।
नाते नेह रामके मनियत, सुह्रद सुसेव्य जहां लौं ।
अंजन कहा आंखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहां लौं ।।
तुलसी सो सब भांति परमहित, पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों होय सनेह रामपद, एतो मतो हमारो ।।


जो व्यक्ति श्रीराम और सीता (ठाकुर-माँ-स्वामीजी) के प्रति समर्पित नहीं हैं, उसे अपना दुश्मन मानकर त्याग दो, चाहे वे तुम्हारे अच्छे दोस्त भी क्यों न हों। प्रहलाद ने अपने पिता का, विभीषण ने उसके भाई का, भरत ने अपनी मां का, बाली अपने गुरु का, और व्रज की गोपियों ने अपने पति का भी त्याग कर दिया था, किन्तु उसके बावजूद उस त्याग से परम आनन्द का उपभोग किया था। जब तक कोई व्यक्ति राम से जुड़ा हुआ है, तभीतक उसके साथ अपना रिश्ता रखना चाहिये चाहे वह बहुत पुराना मित्र भी क्यों न हो। और अधिक कहने की क्या जरुरत है, जिस काजल को लगाने से आँख ही फूट जाये, वैसे काजल का क्या उपयोग है ? सन्त तुलसीदासजी कहते हैं, मेरी राय में तो जिसका ह्रदय राम-चरण में समर्पित है, केवल वही व्यक्ति मेरे प्रेम का अधिकारी है, और स्वयं जीवन के जितना प्रिय है। 
 (राग पीलु – तीन ताल )
रघुवर ! तुमको मेरी लाज ।
सदा सदा मैं सरन तिहारी, तुम बडे गरीबनिवाज ।।
पतित-उधारन बिरूद तिहारो, स्रवनन सुनी अवाज ।।
हौं तो पतित पुरातन कहिये, पार उतारो जहाज ।।
अध-खंडन, दुख-भंजन जनके यही तिहारो काज ।।
तुलसिदास पर किरपा करिये, भक्ति-दान देहु आज ।।

हे रघुवीर, अब मेरी लाज तेरे हाथों में है ! आप तो पतितों के उद्धारक रूप में विख्यात हैं, मैं आपके ही संरक्षण में रहना चाहता हूँ, क्योंकि आप दुर्बल को बचाने वाले हैं। मैंने यह सुना है कि 
आपने सभी पापियों को बचाने का वचन दिया है, इसलिये आप अपने वचन कि रक्षा अवश्य करेंगे, मुझ जैसे पुराने पापी की नौका को भवसागर से पार कर देंगे। अपने भक्तों के पाप को नष्ट करना और उनके संकट को दूर करना यही तुम्हारा एकमात्र कार्य है, हे प्रभु, आज तुलसीदास के ऊपर भी दया कीजिये, और उसे आपकी भक्ति करने का वरदान दीजिये। 
(राग भैरवी – तीन ताल )
भज मन राम-चरण सुख-दाई…
जिहि चरननसे निकसी सुर-सरी, संकर-जटा समाई ।

जटासंकरी नाम पर्यो है, त्रिभुवन तारन आई ।। १ ।।
जिन चरननकी चरन-पादुका भरत रह्यो लव लाई ।
सोई चरन केवट धोय लीने, तब हरि नाव चलाई ! ।। २ ।।
सोई चरन संतन जन सेवत, सदा रहत सुखदाई ।
सोई चरन गौतम-ऋषि-नारी, परसि परम-पद पाई ।। ३ ।।
दंडक-वन प्रभु पावन कीन्हो, ऋषियन त्रास मिटाई ।
सोई प्रभु त्रिलोकके स्वामी, कनक-मृगा संग धाई ।। ४ ।।
कपि सुग्रीव बंधु-भय-व्याकुल, तिन जय-छत्र धराई ।
रिपुको अनुज बिभीषण निसिचर, परसत लंका पाई ।। ५ ।।
सिव-सनकादिक अरू ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख गाई ।
तुलसिदास मारूत-सुतकी प्रभु, निज मुख करत बडाई ।। ६ ।। 

हे  मेरे मन राम के सुखदायी चरणों की भक्ति करो ! इन्हीं चरणों से गंगा निकली है, जिसे शिवजी ने अपनी जटा में बाँध लिया था. इसलिये गंगा नदी का एक नाम जटाशंकरी हो गया है, वह तीनों लोकों की भलाई के लिए धरती पर आयी थी। जिन चरणों की चरण-पादुका को भरत ने प्रेम से सिर पर धारण किया था, उन्ही चरणों को निषाद-राज ने धोने के लिए अनुमति दिये जाने के बाद ही राम को नाव पर चढ़ने दिया, उन्हीं चरणों की भक्ति सन्त लोग सदैव करते हैं, जिनके स्पर्श से गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को मोक्ष प्राप्त हो गया था। उन्हीं चरणों से राम ने दण्डक वन को पवित्र किया था और ऋषियों के संकट को दूर कर दिया था। फिर यह सुनकर कितना आश्चर्य होता है कि तीनों लोकों के स्वामी श्रीराम स्वर्ण के हिरण के पीछे दौड़ गए थे ? जो बानर-राज सुग्रीव अपने भाई के डर से पीड़ित था, उनके सिर पर मुकुट रख दिया, उन्हीं चरणों की शरण में आने से उनके दुश्मन ( रावण ) के भाई विभीषण को श्रीलंका का राज्य प्राप्त हुआ। जिन चरणों की स्तुति शिवजी, सनक आदि ऋषि, ब्रह्माजी और शेषनाग हजार मुखों से करते हैं, तुलसीदास कहते हैं- वैसे महान श्रीरामचन्द्रजी भी अपने मुख से हनुमान जैसे बानर की प्रशंसा करते हैं ! 

( राग गौड सारंग – तीन ताल )
अब लौं नसानी, अब न नसैहौं ।
रामकृपा भवनिसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं ।।
पायो नाम चारू चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित्त कंचनहिं कसैहौं ।।
परबस जानि हंस्यो ईन ईंद्रिन, निज बस व्है न हंसैहौं ।
मन मधुपहि प्रन करि, तुलसी, रघुपति-पद-कमल बसैहौं ।।
 

मैं अभी तक स्वयं को नश्वर शरीर मान कर, जन्म-मृत्यु के चंगुल में फंस कर नष्ट हो रहा था, पंच-भूतों के फन्दे में फँस कर ब्रह्म रो रहा था ? लेकिन अब ऐसा नहीं होगाभगवान श्रीरामकृष्ण देव की कृपा से, भव-निसा (जन्म-मृत्यु का दोनों पहिया) मैं-पन रूपी रात्रि या अज्ञान का अँधेरा दूर हो चूका है। मैं मोहनिद्रा से जाग चूका हूँ, अब मृत्यु-सर्प मुझे डस नहीं सकती। क्योंकि मेरे पास भगवद नाम-रूप की गुरु-प्रदत्त ताबीज है, चतुर्भुजी माँ जगद्धात्री (माँ सारदा) का  उज्ज्वल मुखड़ा मेरे ह्रदय से कभी अदृष्ट नहीं हो सकता है ! ठाकुर-देव का पवित्र मुखड़ा ही पारस-पत्थर है, जिससे मेरे ह्रदय का स्वर्ण परखा जायेगा। पहले के जीवन में मन और इन्द्रियों के ऊपर कोई नियंत्रण नहीं था, इसलिये इन्द्रियाँ मेरा मुँह चिढ़ाती थीं। अब मैंने स्वयं पर नियंत्रण रखना या आत्मसंयम करना सीख लिया है, वे इन्द्रियाँ अब मेरा मजाक नहीं उड़ा सकती हैं।  तुलसी कहते हैं: जैसे मधुमक्खी कमल के ऊपर बैठती है और उसका रसपान करती है, वैसे ही मेरा मन मधुप श्रीरामकृष्ण के चरण कमलों का रसपान करता है।
( राग पूर्वी – तीन ताल )
मन पछितै है अवसर बीते ।
दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, वचन अरू हीतें ।। १ ।।
सहस-बाहु दस-वदनादि नृप, बचे न काल बलीतें ।
हम-हम करि धन-धाम संवारे, अंत चले उठि रीते ।। २ ।।
सुत-वनितादि जानि स्वारथ-रत, न करू नेह सब ही तें ।
अंतहुं तोहिं तजेंगे, पामर ! तू न तजै अब ही तें ।। ३ ।।
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड, त्यागु दुरासा जीतें ।
बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुं, विषय-भोग बहु धीतें ।। ४ ।।
हे मेरे मन, यह अवसर भी यदि चला गया, तो बाद में पश्चाताप करने से भी क्या होगा ? जब यह देव-दुर्लभ मनुष्य शरीर प्राप्त हो गया है, तो श्रीहरि के चरणों में अपने मन, वचन कर्म को समर्पित करो. सह्रबाहु अर्जुन, रावण और दूसरे बड़े बड़े सूरमा लोग भी शक्तिशाली मौत के पंजे से खुद को नहीं बचा सके। तू धन-सम्पत्ति को, यह मेरा है, वह मेरा है, कहकर उसकी रक्षा करने के लिए मरा जा रहा है, किन्तु अन्त में तुमको सबकुछ यहीं छोड़ कर खाली हाथ जाना पड़ेगा। यह समझ लो कि पत्नी और बच्चों का शरीर मांस-हड्डियों से बना हुआ है,उनके मोहजाल में मत फंसो। अरे मुर्ख मन यदि तूने इनको अभी ही नहीं त्याग दिया तो, अन्त समय में ये सब तुम्हें अवश्य त्याग देंगे। इसीलिये अभी से अनासक्त होने का अभ्यास क्यों नहीं करते ? हे मुर्ख, कम से कम अब तो व्यर्थ कि आशाओं का त्याग करके प्रभु की भक्ति करो, तुलसीदास कहते हैं, काम-वासना की आग्नि विषयभोगों के द्वारा कभी शान्त नहीं होती है।   
( राग हमीर – ताल केरवा )
श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन, हरण भव-भय दारूणम्,
नव-कंज-लोचन कंज-मुख, कर कंज, पदकंजारूणम् ।। १ ।।
कंदर्प अगणित अमित छबि, नव नील नीरज सुन्दरम्,
पट-पीत मानहु तडित रूचि शुचि, नौमि जनक-सुतावरम् ।। २ ।।
भज दीन-बन्धु दिनेश दानव, दैत्यवंश निकंदनम्,
रघुनन्द आनन्द-कंद कौशल-चंद, दशरथ-नंदनम् ।। ३ ।।
शिर मुकुट कुण्डल तिलक चारू, उदार अंग विभूषणम्,
आजानु भुज शर चाप-धर, संग्राम-जित खर-दूषणम् ।। ४ ।।
ईति वदति तुलसीदास शंकर, शेष मुनि-मन रंजनम्,
मम-ह्रदय-कुंज निवास करू, कामादि खल-दल गंजनम् ।। ५ ।। 
 
( राग आसा – ताल दादरा )
दीनन दुख-हरन देव, सन्तन हितकारी… ।।
अजामील गीध व्याध, ईनमें कहो कौन साध ।
पंछीको पद पढात, गणिका-सी तारी… ।। १ ।।
ध्रुवके सिर छत्र देत, प्रह्लादको उबार लेत ।
भक्त हेत बांध्यो सेत, लंक-पुरी जारी… ।। २ ।।
तंदुल देत रीझ जात, साग-पातसों अघात ।
गिनत नहिं जूठे फल, खाटे मीठे खारी… ।। ३ ।।
गजको जब ग्राह ग्रस्यो, दुःशासन चीर खस्यो ।
सभा बीच कृष्ण कृष्ण, दौपदी पुकारे… ।। ४ ।।
ईतने हरि आय गये, बसनन आरूढ भये ।
सूरदास द्वारे ठाढो, आंधरो भिखारी… ।। ५ ।।

हे भगवान रामकृष्ण देव, तू पीड़ित लोगों के मुसीबतों को दूर करने वाला है, और सन्तों का कल्याण करने वाला है, किन्तु अजामिल, गिद्ध और व्याध में साधु कौन है ? जिस वैश्या ने एक तोता को तेरा नाम पढ़ना सिखाया उसको भी तूने तार दिया। बालक ध्रुव को राज्य दे दिया, प्रहलाद को हर संकट से उबारा, तेरे भक्तों की खातिर तूने एक पुल का निर्माण किया और श्रीलंका को जलाकर राख कर दिया, एक मुट्ठी कच्चे चावल देने वाले पर तुमने कृपा की है, तू साग-पात खाकर भी संतुष्ट हो जाता है, खट्टे-मीठे और जूठे बेर खाकर संतुष्ट हो गया, मगरमच्छ ने जब हाथी को ग्रस लिया और दुशासन ने जब भरी सभा में द्रौपदी को नग्न करना चाहा और उसने कृष्ण, कृष्ण, कहकर तुझको पुकारा, तो तुम उसके वस्त्र में प्रविष्ट हो गये, हे प्रभु, अंधा भिखारी सूरदास भी तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक देता है, द्वार खोल दो !
( राग भैरवी – पंजाबी ठेका, तीन ताल )
सुने री मैंने निर्बलके बल राम ।
पिछली साख भरूं संतनकी, आडे संवारे काम ।।
जबलग गज बल अपनो बरत्यो, नेक सरो नहिं काम ।
निर्बल व्है बल राम पुकार्यो, आये आधे नाम ।।
द्रुपद-सुता निर्बल भई ता दिन, गहलाये निज धाम ।
दुःशासनकी भुजा थकित भई, वसन रूप भये श्याम ।।
अप-बल, तप-बल और बाहु-बल, चौथा है बल दाम ।
सूर किशोर कृपासे सब बल, हारेको हरिनाम ।।
हम भक्तन के भक्त हमारे!
I belong to my devotees—and they to me.
मैंने सुना है कि राम असहायों की सहायता करते हैं। मैं ऐसे कई प्रमाण दे सकता हूँ कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में सन्तों की सहायता की थी. जब तक हाथी को अपनी ताकत पर भरोसा था, उसको छुटकारा नहीं मिला, लेकिन अपने को असहाय देखकर उनके आधे नाम को ही पुकारा तो दौड़े चले आये थे, दौपदी ने असहाय होकर दोनों हाथ उठाकर तुम्हें पुकारा तो तुम वस्त्र में अवतरित होगये, और दुशासन की भुजा थक गयी किन्तु वस्त्र कभी खत्म नहीं हुआ. मनुष्य या तो अपने स्वयं के बल पर अभिमान करता है, या अपनी तपस्या या बाहों की ताकत पर भरोसा करता है या चौथे बल अपने धन पर निर्भर करता है। किन्तु सूरदास कहते हैं, कोई व्यक्ति जब अपने सभी संसाधनों को लगाकर भी समस्या का हल नहीं कर पाता, और भगवान के नाम का आह्वान करता है, तब आपकी कृपा उस असहाय व्यक्ति पर उतर आती है। 
( राग काफी – ताल दीपचंदी )
अबकी टेक हमारी । लाज राखो गिरिधारी ।।
जैसी लाज राखी अर्जुनकी, भारत-युद्ध मंझारी ।
सारथि होके रथको हांको, चक्र-सुदर्शन-धारी ।।
भक्तनकी टेक न टारी ।। १ ।।
जैसी लाज राखी दौपदीकी, होन न दीनि उधारी ।
खैंचत खैंचत दोउ भुज थाके, दुःशासन पचिहारी ।।
चीर बढायो मुरारी ।। २ ।।
सूरदासकी लाज राखो, अब को है रखवारी ?
राधे राधे श्रीवर प्यारो, श्रीवृषभान-दुलारी ।।
शरण तक आयो तुम्हारी ।। ३ ।।
हे प्रभु, अब मेरे मन में यह संकल्प दृढ हो चूका है, कि केवल तू ही मेरी लाज बचा सकता है ! जिस प्रकार महाभारत के युद्ध में, सुदर्शन-चक्र धारण करने के बाद भी अर्जुन के रथ के सारथि बनकर अर्जुन की लाज रखी थी, और अपने भक्त के सम्मान को बचा लिया था, जैसे तूने द्रौपदी के लाज कि रक्षा कि थी और उसे नग्न होने से बचा लिया था, हे प्रभु, आप इस सूरदास के सम्मान की भी रक्षा करें, क्योंकि उसका कोई दूसरा रक्षक नहीं है। राधा के रूप में लक्ष्मी और श्रीबृषभान की पुत्री राधा के प्यारे आप कृपा करके सूरदास की लाज रखिये वह आपकी शरण में आया है। 
( राग केदार – तीन ताल )
मो सम कौन कुटिल खल कामी ।
जिन तनु दियो ताहि बिसरायो, ऐसो निमकहरामी ।।
भरि भरि उदर विषयको धावौं, जैसे सूकर ग्रामी ।
हरिजन छांड हरी-बिमुखनकी, निसि-दिन करत गुलामी ।। १ ।।
पापी कौन बडो है मोतें, सब पतितनमें नामी ।
सूर पतितको ठौर कहां है, सुनिये श्रीपति स्वामी ।। २ ।।
मुझसे बढ़कर दूसरा और कौन कुटिल, बुरा या लम्पट हो सकता है? मैं तो इतना बड़ा विश्वासघाती हूँ कि जिसने कृपा करके मुझे मानव-शरीर में जन्म दिया है, मैं उसी भगवान को भुला दिया हूँ।   यहां तक ​​कि गांव के कुत्ते की तरह मैं पेट भरने के लिये मैं इन्द्रिय भोगों के पीछे भागता फिर रहा हूँ। मैं भगवान के भक्तों को छोड़ कर दिन-रात उन लोगों की गुलामी कर रहा हूँ, जो भगवान से विमुख होकर संसार को पाने के लिये दौड़ रहे हैं। मुझसे बड़ा पापी और कौन होगा, मैं ही सभी पापियों में मुख्य हूँ, सूरदास कहते हैं:हे भगवान, सुनो, मेरे जैसे एक पापी के लिए विश्राम की जगह आपके सिवा कहाँ है? 
( राग सिंध-काफी – तीन ताल )
प्रभु ! मोरे अवगुण चित्त न धरो ।
सम-दरशी है नाम तिहारो, चाहे तो पार करो ।।
एक नदिया एक नार कहावत, मैलो ही नीर भरो ।
जब मिलकरके एक बरन भये, सुरसरि नाम पर्यो ।।
इक लोहा पूजामें राखत, इक घर बधिक पर्यो ।
पारस गुण अवगुण नहिं चितवत, कंचन करत खरो ।।
यह माया भ्रम-जाल कहावत, सूरदास सगरो ।
अबकी बेर मोहिं पार उतारो, नहिं, प्रन जात टरो ।।

हे प्रभु, मेरे दोषों को ह्रदय में मत रखना, तुम्हारा नाम के साथ समदर्शी विशेषण लगा हुआ है, तू अगर चाहो तो मुझे भी भवसागर से पार कर सकते हो, जल की एक राशी को नदी कहा जाता है, और जिस जल में गंदगी होती है, उसको नाली कहा जाता है। लेकिन वह नाला जब वे मिलकर एक हो जाते हैं, उन्हें गंगा कहा जाता है। लोहे का एक टुकड़ा चाहे पूजा के घर में रखा हो, या किसी व्याध के घर में रखा हो, पारस पत्थर को इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता, अपने स्पर्श से वह दोनों को स्वर्ण में परिणत कर देता है। सूरदास कहते हैं: यह सब ब्रह्म की माया है, हे प्रभु इस बार आप मेरा उद्धार कर दें, और यह दिखा दें कि आपकी प्रतिज्ञा कभी व्यर्थ नहीं हो सकती है।
( राग जयतिश्री – तीन ताल )
सबसे उंची प्रेम सगाई ।
दुर्योधनको मेवा त्यागो, साग विदुर घर पाई ।।
जूठे फल सबरीके खाये, बहुविधि प्रेम लगाई ।।
प्रेमके बस नृप-सेवा कीन्हीं, आप बने हरि नाई ।। १ ।।
राजसुयज्ञ युधिष्ठिर कीनो, तामें जूठ उठाई ।।
प्रेमके बस अर्जुन-रथ हाँक्यो, भूल गये ठकुराई ।। २ ।।
ऐसी प्रीति बढी वृन्दावन, गोपिन नाच नचाई ।।
सूर क्रूर ईस लायक नाहीं, कहं लगि करौं बडाई ।। ३ ।।

सर्वश्रेष्ठ बँधन प्यार का बँधन हैभगवान ने दुर्योधन के घर का छपपन-भोग त्याग दिया, और विदुरजी के घर का साग प्रेम से खाया था। शबरी भीलनी थी, उसके जूठे बेर को भी भगवान ने बहुत स्वाद ले ले कर खाते थे।  प्रेम के वशीभूत होकर उन्होंने राजा युधिष्ठिर के राजसु-यज्ञ में जूठी पत्तलों को उठाकर एक सेवक के रूप में कार्य किया था। अपने उच्च पद (ईश्वरत्व) का कोई ध्यान रखे बिना उन्होंने अर्जुन के रथ का सारथि बनना भी स्वीकार किया था। वृन्दावन के साथ तो उनका प्रेम इतना अधिक था कि उन्होंने गोपियों के साथ नृत्य भी किया था। सूरदास कहते हैं: हे प्रभु, मैं तो नीच व्यक्ति हूँ और इस तरह के प्यार के अयोग्य हूं, फिर मैं आपकी कितनी प्रशंसा कर सकता हूँ ?
 ( राग जोगी – तीन ताल )
अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल ।
काम क्रोधको पहिरि चोलना, कंठ विषयकी माल ।।
महा मोहके नूपुर बाजत, निन्दा सब्द रसाल ।
भरम भर्यो मन भयो पखावज, चलत कुसंगति चाल ।।
तृस्ना नाद  करत घट भीतर, नाना बिधि दै ताल ।
मायाको कटि फेटा बांध्यो, लोभ तिलक दै भाल ।।
कोटिक कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहिं काल ।
सुरदासकी सबै अविद्या, दूर करो नंदलाल ।।
हे गोपाल, भोगासक्ति (self-indulgence) के वशीभूत होकर मैं जीवन भर नाचता रहा हूँ.
काम और क्रोध मेरे परिधान थे, कामोन्माद मेरे गले की माला थी, और मोह में अँधा होना मेरे पैरों में घुँघरू के समान थे, पीठपीछे किसी की निन्दा करना मेरे लिये मधुर ध्वनि थी, मेरा मन जहर से भरा मृदंग था, गन्दे बुरे लोगों के साथ मेरी मित्रता रखना ही मेरा कार्य था। विभिन्न विषयों के लिये मैं अतिलोलुप हो गया था, और माया ही मेरे कमर की मेखला थी, महत्वाकांक्षा मेरे माथे का तिलक बन गये थे, किन्तु उसको छुपाने के लिये बहुत तरह की चालाकी करता था, यहाँ तक कि मैं देश-काल को भी भूल जाता था, सूरदास कहते हैं- हे नन्दलाल, आप मेरे इन समस्त अज्ञान को दूर कर दें। 
( राग बागेश्री – तीन ताल )
सब दिन होत न एक समान ।
एक दिन राजा हरिश्चन्द्र गृह, संपति मेरू समान ।
एक दिन जाय स्वपच गृह सेवत, अंबर हरत मसान ।। १ ।।
एक दिन दूलह बनत बराती, चहुं दिसि गढत निसान ।
एक दिन डेरा होत जंगलमें, कर सूधे पगतान ।। २ ।।
एक दिन सीता रूदन करत है, महा विपिन उद्यान ।
एक दिन रामचन्द्र मिलि दोउ, विचरत पुष्प विमान ।। ३ ।।
एक दिन राजा राज जुधिष्ठिर, अनुचर श्री भगवान ।
एक दिन द्रौपदि नगन होत है, चीर दुसासन तान ।। ४ ।।
प्रगटत है पूरबकी करनी, तज मन सोच अजान ।
सूरदास गुन कहं लगि बरनौ, बिधिके अंक प्रमान ।। ५ ।।
( राग काफी – तीन ताल )
उधो, कर्मनकी गति न्यारी … उधो ।।
सब नदियां जल भरि-भरि रहियां, सागर केहि बिध खारी ।।… उधो ।।
उज्ज्वल पंख दिये बगुलाको, कोयल केहि गुन कारी ।
सुन्दर नयन मृगाको दीन्हे, बन-बन फिरत उजारी ।।… उधो ।।
मूरख मूरख राजे कीन्हे, पंडित फिरत भिखारी ।
सूर श्याम मिलनेकी आशा, छिन-छिन बीतत भारी… उधो ।।
( राग देस – ताल दादरा )
हे गोविन्द, हे गोपाल, हे गोविन्द राखो शरण,
अब तो जीवन हारे ।। हे गोविन्द ।।
नीर पीवन हेतु गयो, सिन्धुके किनारे,
सिन्धु बीच बसत ग्राह, चरन धरि पछारे ।। १ ।।
चार प्रहर जुद्ध भयो, लै गयो मंझ धारे,
नाक-कान डुबन लागे, कृष्णको पुकारे ।। २ ।।
द्वारकामें शब्द गयो, शोर भयो भारे,
शंख-चक्र-गदा-पद्म, गरूड लै सिधारे ।। ३ ।।
सूर कहै श्याम सुनो, शरण है तिहारे,
अबकी बार पार करो, नंदके दुलारे ।। ४ ।।
( राग काफी – तीन ताल )
रे मन ! मूरख जनम गंवायो ।
करि अभिमान विषय-रस राच्यो, स्याम-सरन नहिं आयो ।।
यह संसार फूल सेमरको, सुन्दर देखि भुलायो ।
चाखन लाग्यो रूई गई उडि, हाथ कछू नहिं आयो ।।
कहा भयो अबके मन सोचे, पहिले नाहिं कमायो ।
कहत सूर  भगवंत भजन बिनु, सिर धुनि पछितायो ।।
मेरे मूर्ख मन, तूने इस जीवन को व्यर्थ में गँवा दिया है। तूने अपने अभिमान के कारण जीवन को अतिव्यस्त बना लिया था और जीवन-दाता को ही भूल गये थे। यह संसारी जीवन ऊपर से सेमर के फूल जैसा आकर्षक दीखता है, जिसके चक्कर में पड़ कर तूने अपनी आत्मा के सौन्दर्य को भुला दिया है। जब तूने उसे चख कर देखना चाहा तो, रुई का कोई स्वाद नहीं मिल सका। अतीत के विषय में अब सोचने से क्या लाभ होगा, जब पहले से नहीं चेते ? सूरदास कहते हैं: तू ने भगवान का भजन या मनुष्य रूपी भगवान की सेवा नहीं की है, इसीलिये अभी सिर धुन कर पछताना पद रहा है।

( राग दरबारी कानडा – तीन ताल )
घूंघटका पट खोल रे ! तोको पीव मिलेंगे ।
घट घटमें वह सांईं रमता, कटुक वचन मत बोल रे ।।
धन-जोबनको गरब न कीजै, झूठा पचरंग चोल रे ।।
सुन्न महलमें दियना बारिले, आसनसों मत डोल रे ।।
जाग जुगुतसों रंग-महलमें, पिय पायो अनमोल रे ।।
कहै कबीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद ढोल रे ।।
तू अपने अहंकार की गाँठ को काट डाल - तुझे अपने प्रीतम के दर्शन होंगे। इसीलिये किसी से भी कड़वे बचन मत बोल। अपने धन या यौवन पर गर्व मत करो, यह पंचतत्व का चोला एक दिन तुमको धोखा देकर चला जायेगा। अपने ह्रदय के अँधरे घर में उजाला करो, और अपने जीवन के लक्ष्य पर अटल रहो। तुम अपने ह्रदय मन्दिर में झाँको, वहाँ अनमोल खजाने के रूप में ठाकुर विद्यमान हैं। कबीरदास जी कहते हैं, तुम आनन्द मनाओ कि अंदर से प्रभु की वाणी सुनायी दे रही है। 

( राग कालिंगडा – तीन ताल )
मन मस्त हुआ तब क्यों बोले ? ।।
हीरा पायो गांठ गठियायो ।
बार बार वाको क्यों खोले ?… ।। १ ।।
हलकी थी जब चढी तराजू ।
पूरी भई तब क्यों तोले ?… ।। २ ।।
सुरत कलारी भई मतवारी ।
मदवा पी गई बिन तोले … ।। ३ ।।
हंसा पाये मान सरोवर ।
ताल तलैया क्यों डोले ?… ।। ४ ।।
तेरा साहिब है घट मांही ।
बाहर नैना क्यों खोले ?… ।। ५ ।।

कहे कबीर सुनो भाई  साधो ।
साहिब मिल कये तिल ओले … ।। ६ ।।
जब मेरा मन पवित्र आत्मा के साथ एक होकर संतृप्त हो चूका है, तब भाषण देने की कोई जरूरत नहीं हैजैसे किसी आदमी को हीरा मिल जाता है, तो उसको वह अपनी तिजोरी में डालकर निश्चिन्त हो जाता है, और उसे देखने के लिये वह बार बार अपनी तिजोरी को नहीं खोलता। जब किसी व्यक्ति को किसी वस्तु के वजन पर सन्देह होता है, तो वह उस वस्तु को तौल कर देखता है; लेकिन जो वस्तु खुद ही वजनदार हो जाये, तो उसे अन्य वस्तु को तौलने की क्या आवश्यकता है ? वह बुद्धि  जो प्रभु-प्रेम में मतवाली हो जाती है, वह उन प्रेम-बूंदों को बिना तराजू में तौले ही पी जाती है। जब कोई राजहंस ईश्वरीय झील (श्रीरामकृष्ण रूपी मानस -सरोवर) तक पहुँच गया हो, तो वह छोटे  -मोटे  तालाबों (आशाराम) की खोज में कैसे भटक सकता है ? तेरा प्रभु तो तेरे ह्रदय के भीतर ही बैठा है, उसे बाहर देखने के लिये अपनी आँखों को क्यों कष्ट दे रहा है ? सन्त कबीर कहते हैं- सज्ज्न भाई लोग, सुनो - मैंने भगवान को अपने भीतर ही ढूँढ निकला है!  

( राग कालिंगडा – तीन ताल )
मन लागो मेरो यार फकीरीमें ।
जो सुख पायो राम भजनमें, सो सुख नाहिं अमीरीमें ।। १ ।।
भला बूरा सबका सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबीमें ।। २ ।।
प्रेम-नगरमें रहनि हमारी, भलि बनि आई सबूरीमें ।। ३ ।।
हाथ में कूंडी, बगलमें सोटा, चारों दिसि जागीरीमें ।। ४ ।।
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहा फिरत मगरूरीमें ? ।। ५ ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरीमें ।। ६ ।।
हे मित्रों, मेरा मन अब एक त्यागियों के बादशाह (श्रीरामकृष्ण) के जीवन-लीला पर दृढ़ता के साथ स्थिर-अचल हो गया है। किसी मनुष्य को जितना सुख राम की स्तुति (अर्थात शिव-ज्ञान से जीव सेवा) करने में प्राप्त होता है, उतना सुख विषय-भोगों में कभी प्राप्त नहीं हो सकता है। ठाकुर तुम्हें भले या बुरे जिस परिस्थिति में भी रखें, या गरीबी आ जाये तो उसे भी कृपा मानकर स्वीकार करो। हम तो दूसरों की सेवा करने वाली मानसिकता रूपी प्रेम-नगर में रहते हैं, धैर्य के साथ सेवा करते रहना बहुत कल्याणकारी होगा। जब कोई जगतधातृ  का पुत्र, माँ की आज्ञा लेकर एक हाथ में भीख का कटोरा और बगल में लाठी लेकर पृथ्वी-भ्रमण पर निकल पड़ता है, तो  यह सम्पूर्ण जगत उसका ही साम्राज्य बन जाता है ! जब यह बात समझ में आ गयी कि इस शरीर को तो बहुत जल्द ही जल कर राख हो जाना है, तो फिर किस बात का गर्व करना ठीक है ? कबीर कहते हैं: हे सब अच्छे लोग सुनो, सन्तोष ही आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है।  
४७ (P-99)
( राग भैरवी –  ताल रूपक )
मत कर मोह तू, हरि-भजनको मान रे ।
नयन दिये दरसन करनेको, श्रवण दिये सुन ज्ञान रे ।।
वदन दिया हरिगुण गानेको, हाथ दिये कर दान रे ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे ।।
जब मानव-तन मिल ही गया तो, सज्ज्नों आप स्वयं को ही धोखा देने की चेष्टा मत कीजिये, और श्रीरामकृष्ण की स्तुति कीजिये। ये आँखें हमें मानव-मात्र में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने को मिली हैं, और कान उनके उपदेशों का श्रवण करने को मिला है, मुख उनकी शिक्षाओं का प्रचार करने को मिला है, और हाथ मिला है शिव-ज्ञान से जीव सेवा करने के लिये। कबीर कहते हैं: हे सज्ज्नों सुनो, सोना भी खानों से निकलता है, धूल और कंकड़ में खोजने से नहीं मिलता। 


( राग भैरवी – ताल केरवा )
बीत गये दिन भजन बिना रे ।।
बाल-अवस्था खेल गंवाई, जब जोबन तब मान घना रे ।। १ ।।
लाहे कारन मूल गंवायो, अजहुं न गई मनकी तृस्ना रे ।। २ ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, पार उतर गये सन्त जना रे ।। ३ ।।
( राग भैरवी – तीन ताल )
झीनी झीनी बिनी चदरिया ।।
काहे कै ताना, काहे कै भरनी, कौन तरासे बिनी चदरिया ।।
ईंगला पिंगला ताना बरनी, सुष्मण तारसे बिनी चदरिया ।।
आठ कंवल दस चरखा डोलै, पांच तत्त, गुन तिनी चदरिया ।।
सांईंको सीयत मास दस लागै, ठोक ठोकके बिनी चदरिया ।।
सो चादर सुर नर मुनि ओढी, ओठीके मैली कीनी चदरिया ।।
दास कबीर जतनसे ओढी, ज्योंकी त्यों धरि दीनी चदरिया ।।

यह चद्दर (आवरण) जिसे शरीर कहा जाता है, बहुत महीन धागों से बुना हुआ है। इसमें ताना और बाना क्या है ? वह धागा किस वस्तु का बना हुआ है ?  Ida and Pingala (nerves invisible recognized by Hinduism) are respectively warp and woof. हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार इड़ा और पिंगला ही वे अदृश्य नाड़ियाँ हैं, जो क्रमशः ताना और बाना जैसा कार्य करती रहती हैं। और सुषुम्ना नाड़ी के अदृश्य धागे से उस चद्दर को बुना गया है। नाभि में स्थित अष्टदल कमल के चरखे से धागा को काता जाता है, चादर में पृथ्वी-जल-अग्नि-वायु और आकाश रूपी पाँच तत्वों और तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) भी मिले हुए हैं। इसके निर्माता को चादर बुनने में दस महीने लगे हैं, और धागे के संकुल को भली-भाँति बनाया गया है। देवताओं, मनुष्यों, यहां तक ​​कि संतों को भी यह चादर ओढ़ना पड़ता है, किन्तु वे जैसे ही इसे ओढ़ते हैं, चादर गंदा हो जाता है। दास कबीर कहते हैं: मैंने बहुत सावधानी से इस चादर को ओढ़ा है, और उसे ज्यों के त्यों लौटा भी दूंगा। 

( राग खमाज – धुमाली )
भजो रे भैया राम गोविन्द हरी ।।
जप तप साधन कछु नहिं लागत, खरचत नहिं गठरी ।। १ ।।
संतत संपत सुखके कारण, जासे भूल परी ।। २ ।।
कहत कबीर जा मुख राम नहिं, वो मुख धूल भरी ।। ३ ।।

हे भाईयों, राम, गोविंद, हरि का भजन करो। जप तप करने की अवश्यकता नहीं है, इसके लिये कुछ खर्च भी नहीं करना है, सन्तति या धन-दौलत आदि एक प्रकार की सन्तुष्टि प्रदान करते हैं, किन्तु अधिकांश लोग इसे पाकर पथभ्रष्ट ही हो जाते हैं, दास कबीर कहते हैं: वह मनुष्य जिसके होठों पर ठाकुर का नाम नहीं है, उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। 

( राग आसावरी – दीपचंदी )
मन ! तोहे केहि विध कर समझाऊं ।।
सोवा होय तो सुहाग मंगाऊं, बंकनाल रस लाऊं ।
ग्यान शब्दकी फूंक चलाऊं, पानी कर पिधलाऊं ।। १ ।।
घोडा होय तो लगाम लगाऊं, ऊपर जीन कसाऊं ।
होय सवार तेरे पर बैठुं चाबूक देके चलाऊं ।। २ ।।
हाथी होय तो जंजीर गढाऊं, चारों पैर बंधाऊं ।
होय महावत तेरे पर बैठूं, अंकुश लेके चलाऊं ।। ३ ।।
लोहा होय तो एरम मंगाऊं, ऊपर दुवन धुवाऊं ।
धूवनकी घनघोर मचाऊं, जंतर तार खिंचाऊं ।। ४ ।।
ग्यानी होय तो ज्ञान सिखाऊं, सत्यकी राह चलाऊं ।
कहत कबीर सुनो भाई साधू, अमरापुर पहुंचाऊं ।। ५ ।।
हे मेरे पाजी मन, मैं तुमको कैसे समझाऊँ ? अगर तुम सोना होते तो तुमको पिघला कर तरल बना लेता, यदि तुम घोड़ा होते तो मैं तुमको लगाम लगा देता और तुम्हारे पीठ पर जीन कास देता और उस पर बैठकर तुम्हारी सवारी करता, और कोड़े से मार कर कार्य करवाता, यदि तुम एक हाथी होते तो, मैं तुम्हारे पैरों में जंजीर डाल देता और तुम पर सवार होकर अंकुश मारकर निर्देश देता, यदि तुम लोहा होते तो, तो तुमको निहाई बनाकर इतने हथौड़ा मारता कि तुम तार बना देता। कबीर कहते हैं: तू यदि बुद्धिमान है, तो मैं तुझे ज्ञान सिखाकर सत्य के मार्ग पर चलाऊंगा और तुमको अमरत्व के लोक में भेज दूंगा। 

( राग दुर्गा – ताल केरवा )
रे मन ! रामसो कर प्रीत ।।
श्रवण गोविन्द-गुण सुनो, अरू गाउ रसना गीत ।। १ ।।
कर साधु-संगत सुमिर माधो, होय पतित पुनीत ।। २ ।।
काल व्याल ज्यों पर्यो डोलै, मुख पसारे मीत ।। ३ ।।
आजकल पुनि तौहि ग्रसिहै, समझ राखो चीत्त ।। ४ ।।
कहे नानक राम भज ले, जात अवसर बीत ।। ५ ।।
हे मेरे मन, ठाकुर के प्रति समर्पित हो जाओ, अपने कानों से ठाकुर के गुण सुनो, और मुख से उनकी प्रशंसा करो। सत्संगत की कमाई करो और ठाकुर का स्मरण करो; ऐसा करने सारे पाप धुल जायेंगे। हे मित्र, मौत का समय अजगर की तरह तुझे निगलने के लिए मुख खोले दौड़े आ रहा है, आज हो या कल वह तुमको अवश्य ग्रस लेगा। नानक कहते हैं: समय क्षणभंगुर है, इसलिए तू ठाकुर का स्मरण करता रह ! 

( राग कौशिया – विलंबित, तीन ताल )
सुमरन कर ले मेरे मना ।
तेरि बिति जाति उमर, हरिनाम बिना ।।
कूप नीर बिनु, धेनु छीर बिनु, धरती मेह बिना ।
जैसे तरूवर फल बिन हीना, तैसे प्राणी हरिनाम बिना ।।
देह नैन बिन, रैन चन्द्र बिन, मन्दिर दीप बिना ।
जैसे पंडित वेद बिहीना, तैसे प्राणी हरिनाम बिना ।।
काम क्रोध मद लोभ निहारो, छांड दे अब संतजना ।
कहे नानकशा, सुन भगवंता, या जगमें नहिं कोई अपना ।।
हे मेरे मन, ठाकुर का नाम जाने बिना तेरी उम्र बीतती जा रही है, जिस प्रकार जल से रिक्त कुआँ, दूध के बिना गाय, वर्षा के बिना धरती, फल के बिना वृक्ष, शोभा नहीं देते उसी प्रकार ठाकुर के नाम को जाने बिना मनुष्य अपनी महिमा को नहीं जान सकता है। आँख के बिना शरीर, चन्द्रमा विहीन रात्रि, दीपक के बिना मन्दिर, वेद ज्ञान से रहित ब्राह्मण, वैसे ही ठाकुर के नाम को जाने बिना मनुष्य शोभा नहीं पाते। हे भले मनुष्य, तुम अपनी इच्छाओं, क्रोध, गर्व और लोभ को देखो और उनका त्याग कर दो. गुरुनानक देवजी कहते हैं, हे मनुष्य देहधारी भगवान सुनो, इस जग की कोई भी वस्तु या व्यक्ति अपनी नहीं है।  
( राग बिहाग – तीन ताल )
नाम जपन क्यों छोड दिया ?
क्रोध न छोडा, झूठ न छोडा, सत्यवचन क्यों छोड दिया ? ।।
झूठे जगमें दिल ललचा कर, असल वतन क्यों छोड दिया ?
कौडीको तो खूब सम्हाला, लाल रतन क्यों छोडड दिया ? ।। १ ।।
जिहि सुमिरनते अति सुख पावे, सो सुमिरन क्यों छोड दिया ?
खालस ईक भगवान भरोसे, तन, मन, धन क्यों न छोड दिया ? ।। २ ।।

( राग देस या पूर्वी – तीन ताल )
नहिं ऐसो जन्म बारंबार ।
क्या जानूं कछु पुन्य प्रकटे, मानुसा अवतार ।।
बढत पल पल, घटत छिन छिन, चलत न लागे बार ।
बिरछके ज्यों पात टूटे, लागे नहिं पुनि डार ।। १ ।।
भवसागर अति जोर कहिये, विषम ओखी धार ।
सुरतका नर बांधे बेडा, बेगि उतरे पार ।। २ ।।
साधु संता ते महंता, चलत करत पुकार ।
दासि मीरां  लाल गिरिधर, जीवना दिन चार ।। ३ ।।
इस मनुष्य शरीर में जन्म किसी को बारम्बार प्राप्त नहीं होते। मुझे यह मानव-शरीर मेरी किस योग्यता को देखकर ईश्वर ने दिया होगा, उसे मैं कैसे जान सकता हूँ ? ऐसा प्रतीत होता है कि हमारा शरीर पल पल बढ़ रहा है, किन्तु बढ़ने के साथ साथ उसका क्षरण भी हो रहा है। जिस प्रकार किसी वृक्ष के पत्ते अपनी टहनी से टूट कर गिर जाते हैं, तो दुबारा उसे किसी उपाय से टहनी के साथ जोड़ा नहीं जा सकता, उसी प्रकार इस शरीर को भी नष्ट होने में कोई समय नहीं लगता। इस संसार सागर में जन्म और मृत्यु रूपी उत्ताल तरंगे, सदैव उठती गिरती रहती हैं। किन्तु यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर रूपी नाव को इस भवसागर के उस पार ले जाना चाहता हो, तो उसे ठाकुर के नाम-रूप का चिन्तन करना चाहिये। सभी महान सन्त और ऋषि-मुनि जो स्वयं इस भवसागर से पार हो चुके हैं, यही घोषणा कर रहे हैं।  श्रीकृष्ण की सेविका मीरा बाई कहती हैं,  मनुष्यों जल्द से जल्द जाग जाओ - क्योंकि धरती पर हमें यह मनुष्य देह चार दिनों के लिये ही मिला है।  
( राग काफी – तीन ताल )
राम-नाम-रस पीजै, मनुआ राम-नाम-रस पीजै ।
तज कुसंग सत-संग बैठ नित, हरि-चरचा सुनि लीजै ।।
काम क्रोध मद लोभ मोहकूं, बहा चित्तसों दीजै ।
मीरांके प्रभु गिरधर नागर, ताहिके रंगमें भीजै ।।

( राग कौशिया – तीन ताल )
प्रभुजी ! तुम चंदन, हम पानी । जाकी अंग अंग बास समानी ।।
प्रभुजी, तुम घन बन, हम मोरा । चैसे चितवत चंद चकोरा ।। १ ।।
प्रभुजी, तुम दीपक, हम बाती । जाकी जोति बरै दिन राती ।। २ ।।
प्रभुजी, तुम मोती, हम धागा । जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।। ३ ।।
प्रभुजी, तुम स्वामी, हम दासा । ऐसी भक्ति करै रैदासा ।। ४ ।।
हे ईश्वर, तू चन्दन है, और मैं जल हूँ; तेरी मीठी खुशबू मेरे अंग-प्रत्यंग में व्याप्त हो रही है। प्रभुजी आप घने बादल हैं, और मैं वन का मयूर हूँ, चकोर जिस प्रकार चन्द्रमा को देखने के लिये टकटकी लगाय रहता है, उसी प्रकार भी आपकी और दृष्टि लगाये रखता हूँ कि आप की दया मुझपर कब बरसेगी ? आप दीपक हैं, मैं उस दीपक की बत्ती हूँ, जिसकी ज्योति रात दिन जलती जा रही है। प्रभुजी तुम मोती हो और हम धागे के समान हैं, और हम दोनों आपस में मिलकर ऐसे एक हो गये हैं, जैसे सुहागा सोने के साथ मिलकर एक हो गया हो। भक्त सन्त रयदास कहते हैं, तू मेरा मालिक है, और मैं तेरा सेवक हूँ !
 ( राग भैरवी – तीन ताल )
नरहरि ! चंचल है मति मेरी, कैसे भगति करूं मैं तेरी ? ।।
तू मोहिं देखै, हौं तोहिं देखूं, प्रीति परस्पर होई ।
तू मोहिं देखै, तोहिं न देखूं, यह मति सब बुधि खोई ।।
सब घट अंतर रमसि निरंतर, मैं देखन नहिं जाना ।
गुन सब तोर, मोर सब औगुन, कृत उपकार न माना ।।
मैं तैं तोरि मोरि असमझि, सों कैसे करि निस्तारा ?
कह रैदास  कृष्ण करूणामय, जै जै जगत-अधारा ! ।।
( राग बिभास – तीन ताल )
अकल कला खेलत नर ज्ञानी !
जैसे हि नाव हिरे फिरे दसों दिश, ध्रुव तारे पर रहत निशानी ।।
चलन वलन यअवनी पर वाकी, मनकी सुरत अकाश ठहरानी ।।
तत्व-समास भयो है स्वतंतर, जैसे हिम होत है पानी…अकल…।। १ ।।
छुपी आदि अन्त नहिं पायो, आई न सकत जहां मन बानी ।।
ता घर स्थिती भई है जिनकी, कहि न जात ऐसी अकथ कहानी…अकल…।। २ ।।
अजब खेल अदभुत अनुपम है, जाकू है पहिचान पुरानी ।।
गगनहि गेब भया नर बोले, एहि अखा जानत कोई ज्ञानी…अकल…।। ३ ।।
 श्रीरामकृष्ण देव ही ब्रह्म हैं, जो मनुष्य शरीर में अवतरित हुए थे, जो इस गुप्त रहस्य को जान लेता है, वह व्यक्ति अपने ज्ञान का उपयोग उसी प्रकार करता है, जैसे सभी दिशाओं में घूमता हुआ कोई जलपोत हमेशा ध्रुव तारा के द्वारा ही निर्देशित होता है। उसी तरह वह ब्रह्मज्ञ व्यक्ति भी सम्पूर्ण जल-थल का भ्रमण करते समय उसकी दृष्टि ठाकुर के चरणों में ही न्यस्त रहती है। और जिस प्रकार बर्फ पिघल कर जल के साथ एक हो जाता है,उसी प्रकार वह व्यक्ति भी स्वयं को ठाकुर में विलीन करके आकृति (नाम-रूप) से स्वतंत्रता प्राप्त कर लेता है ! उस परब्रह्म परमात्मा 'ठाकुर' के निवास-स्थान का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ मन वाणी कि भी पहुँच नहीं है- कहा से प्रारम्भ हुआ, और कहाँ उसका अन्त होता है, उसे कोई नहीं जान सकता ससीम देह में भी वे असीम अनन्त हैं। उनकी यह दिव्य लीला अद्भुत और अतुलनीय है! जो उनकी लीला को प्राचीन काल से ही जानते हैं, अर्थात यह जानते हैं कि जो राम बने थे जो कृष्ण बने थे, वही इस युग में श्रीरामकृष्ण बने हैं, उनके उपदेश ऐसे होते हैं, मानो ईश्वर ही आकाशवाणी करते हों। गुजरात के सन्त अखा भगत कहते हैं- कोई कोई विरला मनुष्य ही ठाकुर को या मनुष्य रूपी ईश्वर को पहचान पाता है ! 
अखा भगत ने (सत्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध गुजराती कवि) कोई पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन उन्होंने ही कहा कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म का दूषण है। सम्भवतः वह कभी समाज की अवनति के दिनों में कुछ काल के लिए आपद्धर्म के रूप में आरम्भ की गयी एक व्यवस्था थी। वह अव्यापक है और शास्त्रों में इसका समर्थन नहीं किया गया है। इसके समर्थन में जिन श्लोकों को उद्धृत किया जाता है, वे क्षेपक हैं अथवा उनके अर्थ के विषय में मतभेद हैं। वैष्णवों ने अस्पृश्यता का धर्म के रूप में वर्णन नहीं किया है।''

( राग बहार – तीन ताल )
अब हौं कासों बैर करौं ?
कहत पुकारत प्रभु निज मुखते । “ घट घट हौं बिहरौं “ ।।
आपु समान सबै जग लेखौं । भक्तन अधिक डरौं ।।
श्रीहरिदास कृपाते हरिकी । नित निर्भय विचरौं ।। १ ।।
 अब मैं किसी भी व्यक्ति के प्रति नफरत या घृणा की भावना कैसे रख सकता हूँ ? स्वयं भगवान यह घोषणा करते हैं कि - " मैं कण कण में व्याप्त हूँ, और प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय में विराजित हूँ, अपने ही जैसा समस्त जगत को देखता हूँ; और अपने भक्तों से मैं सबसे अधिक डरता हूँ !"
श्री हरिदास कहते हैं: भगवान की कृपा से मैं निरन्तर निर्भय होकर विचरता रहता हूँ।


( राग भैरवी – तीन ताल )
हे जग-त्राता, विश्व-विधाता, हे सुख-शान्ति-निकेतन हे !
प्रेमके सिन्धो, दीनके बन्धो, दुःख-दरिद्र-विनाशन हे ! ।।
नित्य, अखंड, अनंत, अनादि, पूरण ब्रह्म, सनातन हे !
जग-आश्रय, जग-पति, जग-वंदन, अनुपम, अलख, निरंजन हे !
प्राणसखा, त्रिभुवन-प्रतिपालक, जीवनके अवलंबन हे ! ।। १ ।।
( राग पहाडी मांड – ताल कव्वाली )
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोवत है ।।
जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है ।। १ ।।
टुक नींदसे अंखियां खोल जरा, ओ गाफिल, रबसे द्यान लगा ।
यह प्रीत करनकी रीत नहीं, रब जागत है तू सोवत है ।। २ ।।
अय जान, भुगत करनी अपनी, ओ पापी, पापमें चैन कहां ?
जब पापकी गठरी सीस धरी, फिर सीस पकड क्यों रोवत है ? ।। ३ ।।
जो कल करे सो आज कर ले, जो आज करे सो अब कर ले ।
जब चिडियन खेती चुगि डाली, फिर पचताये क्या होवत है ? ।। ४ ।।
  ( राग गझल )
है बहारे बाग दुनिया चंद रोज ! देख लो इसका तमाशा चंद रोज ।।
ऐ मुसाफिर ! कूचका सामान कर । इस जहांमें है बसेरा चंद रोज ।।
पूछा लुकमांसे, जिया तू कितने रोज ? दस्ते हसरत मलके बोला ‘ चंद रोज ’ ।।
बाद मदफन कब्रमें बोली कजा । अब यहांपे सोते रहना चंद रोज ।।
फिर तुम कहां औ ’ मैं कहां, ऐ दोस्तो ! साथ है मेरा तुम्हारा चंद रोज ।
क्यों सताते हो दिले बेजुर्मको । जालिमो, है ये जमाना चंद रोज ।।
याद कर तू ऐ नजीर कबरोंके रोज । जीन्दगीका है भरोसा चंद रोज ।।
( राग गझल )
अगर है शौक मिलनेका, तो हरदम लौ लगाता जा ।
जलाकर खुदनुमाईको, भसम तन पर लगाता जा ।।
पकडकर इश्ककी झाडू, सफा कर हिज्र-ऐ दिलको ।
दुईकी धूलको लेकर, मुसल्ले पर उडाता जा ।।
मुसल्ला छोड तसबी तोड, किताबें डाल पानीमें ।
पकड दस्त तू फरिश्तोंका, गुलाम उनका कहाता जा ।।
न मर भूखा, न रख रोजा, न जा मस्जिद, न कर सिजदा ।
वजूका तोड दे कूजा, शराबे-शौक पीता जा ।।
हमेशा खा, हमेशा पी, न गफलतसे रहो इकदम ।
नशेमें सैर कर अपनी, खुदीको तू जलाता जा ।।
न हो मुल्ला, न हो बम्मन, दुईकी छोडकर पूजा ।
हुकम है शाह कलंदरका, ‘ अनलहक ’ तू कहाता जा ।।
कहे मंसूर मस्ताना, हक मैंने दिलमें पहचाना ।
वही मस्तोंका मयखाना, उसीके बीच आता जा ।।
अगर तुम सत्य का साक्षात्कार करना चाहते हो, तो हर साँस के साथ सत्यस्वरुप ठाकुर से प्रेम करता जा. अपने अहं को जीते-जी मार कर जला दे, और अपने शरीर पर उसकी रख मल ले। हाथों में प्रेम की झाड़ू पकड़ ले और अपने-पराये का भेद को मिटा दे। भेद-बुद्धि या द्वैत-भावना कि गर्दे को झाड़ दे, और प्रार्थना की कालीन बिछा दे। जप की माला को तोड़ दे, शास्त्रों को नदी में विसर्जित कर दे, ईशदूतों से मदत मांगो और उनके सेवक बन जा, न तू रोजा रख, न तू मस्जिद जा, और न घुटने टेक कर सिजदा कर, वजू के बदने को तोड़ दे, और प्रभु के साथ एकत्व के आनन्द के नशे में झूमता जा, खाओ-पीओ,आनन्द से मतवाला हो जाओ, पर अपने मैं-पन को हर समय जलते रहो। न मुल्ला बन और न ही ब्राह्मण, भेद-बुद्धि को त्याग दे और अद्वैतत्व की पूजा कर,शाह कलंदर की घोषणा है: 'मैं वही हूं', निरन्तर तू कहता जा। पागल मंसूर कहते हैं: सत्य मेरे ह्रदय में है, एकत्व की अनुभूति में मदहोश भक्तों के लिये वही शराब की दुकान है, उसी मयखाने में आते-जाते रहो।
प्रातःस्मरणम्
प्रातःस्मरामि ह्नदिसंस्फुरदान्मतत्त्वम्
प्रातः स्मरामि ह्रदि संस्फुरद् आत्म-तत्वम्
सत्-चित-सुखं परमहंस-गतिं तुरीयम ।
यत् स्वप्न-जागर-सुषुप्तम् अवैति नित्यम्
         तद् ब्रह्म निष्कलम् अहं न च भूत-संघः ।। १ ।।

प्रातःकालकी प्रार्थना १. मैं सवेरे अपने ह्रदयमें स्फुरित होनेवाले आत्मतत्वका स्मरण करता हूं । जो आत्मा सच्चिदानन्द ( सत्, ज्ञान और सुखमय ) है, जो आत्मा सच्चिदानन्द ( सत्, ज्ञान और सुखमय ) है, जो परमहंसोंकी अन्तिम गति है, जो चतुर्थ अवस्थारूप है, जो जाग्रति, स्वप्न और निद्रा, तीनों अवस्थाओंको हमेशा जागता है और जो शुद्ध ब्रह्म है, वही मैं हूं – पंचमहाभूतोंसे बनी हुई यह देह मैं नहीं हूं । प्रातःस्मरणके तीन श्लोक रखे तो सहीं, किन्तु उनके बारेमें उन्होंनेकहा कि ‘‘अद्वैत सिद्धान्तको मैं मानता हुं. लेकिन ‘तद् ब्रह्म निष्कलमहम् न च भूतसंघः’ कहते संकोच होता है, क्योंकि उतनी साधना अभी पूरी नहीं हुई है । ’’


7
गुरुर्बह्या गुरुविष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
      गुरूः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। ७ ।।
 

७. गुरू ही ब्रह्मा है, गुरू ही विष्णु है, गुरू ही महादेव है, गुरू साक्षात् परब्रह्म है, उन श्रीगुरूको मैं नमस्कार करता हूं ।

मूकं करोति वाचालं, पंगुं लंघयते गिरिम् ।
     यत्कृपा तमहं देवं, कृष्णं वंदे जगद् गुरूम् ।। ११ ।।

 
११. जिसकी कृपा गूंगेको वक्ता बनाती है और लंगडे को भी पहाड लांघने की शक्ति देती है, उस जगद् गुरू श्रीकृष्णको मैं वन्दन करता हूं ।।


( राग बिंद्रावनी सारंग – तीन ताल (जलद) अथवा धुमाली )
रहना नहिं देस बिराना है ।।
यह संसार कागदकी पुडिया, बूंद पडे धुल जाना है ।।
यह संसार कांटेकी बाडी, उलझ मरि जाना है ।।
यह संसार झाड औ’ झांखर, आग लगे बरि जाना है ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है ।।
  
यह संसार हमारी स्थायी निवास-भूमि (मुल्क) नहीं है, हम यहाँ लंबे समय तक रहने के लिए नहीं आये हैं, हम तो रामकृष्णधाम के निवासी हैं, यह पृथ्वीलोक या मृत्युलोक तो हमारे लिये मानो एक परदेश जैसा है। यह दुनिया कागज की गठरी जैसी है, इसके ऊपर थोडा भी जल ढालने से यह लुगदी जैसी घुल जाती है, या यह उन कटीली झाड़ियों के जैसी है, जिसमें उलझ कर मर जाना होता है, या यह जगत उस चरागाह के जैसा है, जो झाड़-झंखार से भरा हुआ है, जो आग लगने के बाद थोड़े ही देर में जल कर राख हो जाता है। कबीर कहते हैं, सज्ज्नों, मेरी बात मानो केवल सद्गुरु से ठाकुर के नाम को जानलेना, और उनकी शरण में रहना ही सबसे सुरक्षित निवास भूमि है। 

( राग शंकरा – तीन ताल )
काहे रे ! बन खोजन जाई ।
सर्व-निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई ।।
पुष्प मध्य ज्यों बास बसत है, मुकुर माहिं जस छाई ।
तैसे ही हरि बसैं निरंतर, घट ही खोजो भाई ।। १ ।।
बाहर भीतर एकै जानौ, यह गुरू ज्ञान बताई ।
जन नानक  बिन आपा चीन्हे, मिटै न भ्रमकी काई ।। २ ।।

मेरे मित्र, तू ईश्वर को खोजने जंगल में क्यों जाता है ? वह जो सर्वव्यापक सत्ता है, तुम्हारे भीतर भी समायी हुई है। फिर भी सबसे निर्लिप्त रहता है। जिस प्रकार फूल में सुगन्ध और दर्पण में सादृश्य रहता है, उसी प्रकार ठाकुर तुम्हारे भीतर हमेशा विदयमान हैं, अपने ह्रदय में ही उनको खोजो मेरे भाई। सदगुरु यह ज्ञान देते हैं कि जो ठाकुर तुम्हारे भीतर हैं, वही सबके भीतर हैं, इसलिए मनुष्य को ही साक्षात् शिवजी समझकर उनकी सेवा करो। नानक कहते हैं: हे मनुष्य, बिना स्वयं को पहचाने भ्रम की मृगमरीचिका रूपी अँधेरे को दूर नहीं किया जा सकता हैं।

( राग तिलक कामोद – तीन ताल )
पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो ।।
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरू, किरपा कर अपनायो ।। १ ।।
जनम जनमकी पूंजी पाई, जगमें सभी खोवायो ।। २ ।।
खरचै न खुटै, वाको चोर न लूटै, दिन दिन बढत सवायो ।। ३ ।।
सतकी नाव, खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो ।। ४ ।।
मीरांके प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस गायो ।। ५ ।।

( राग मालकंस – तीन ताल )
मोरी लागी लगन  गुरू-चरननकी ।।
चरन बिना मुझे कछु नहीं भावे, झूठ माया सब सपननकी ।। १ ।।
भवसागर सब सूख गया है, फिकर नहीं मुझे तरननकी ।। २ ।।
मीरां कहे प्रभु गिरिधर नागर ! उलट भई मोरे नयननकी ।। ३ ।।
मेरा मन गुरु के चरणों में अचल हो गया है। उन चरणो के आलावा और कुछ मुझे अच्छा नहीं लगता, बाकी जो कुछ भोग-वस्तुयें दिखती हैं, वे सब सपने में देखि गयी वस्तुओं के सामान एक कुछ एक भ्रम, या मृगमरीचिका हैं-विषयों में सुख दीखता है, किन्तु है नहीं। Everything else is like a mirage, a dream. इस सच्चाई को जान लेने के बाद जन्म-मृत्यु का सागर सूख गया है, अब इसको पार करने की कोई चिन्ता मुझे नहीं है। मीरा कहती हैं,हे मेरे प्रभु, अब मेरी अन्तर्दृष्टि (अभेद-दृष्टि) या प्रज्ञा-चक्षु खुल चुके हैं!
 

( राग मल्हार – तीन ताल )
साधो मनका मान त्यागो ।
काम क्रोध संगत दुर्जनकी, ताते अहनिस भागो ।।
सुख दुख दोनों सम करि जानै, और मान अपमाना ।
हर्ष शोक ते रहै अतीता, तिन जग तत्व पिछाना ।। १ ।।
अस्तुति निन्दा दोऊ त्यागे, खोजै पद निरवाना ।
जन नानक यह खेल कठिन है, कोऊ गुरू-मुख जाना ।। २ ।।
हे भले आदमी, अपने मन के अभिमान का त्याग कर दो! काम, क्रोध, कुसंग से रात दिन दूर रहो। सुख और दुख, प्रशंसा और अपमान मिले तो दोनों को बराबर समझो, न तो उत्तेजित हो जाओ, और न उदास बनो. जो व्यक्ति हर्ष और विषाद से परे रह सकता है,वही जीवन के रहस्य को जानता है। नानक कहते हैं: हे मनुष्य, प्रशंसा या अपमान पाकर भी अप्रभावित रहना और केवल सत्य के मार्ग पर चलते रहना बहुत कठिन है, इसके उपाय को बहुत थोड़े से मनुष्य, जो गुरु-मुख (सद्गुरुदेव के मुख से भगवान का नाम सुने हैं) हुए हैं- जान पाते हैं ! 
( राग भैरवी – तीन ताल )
संत परम हितकारी, जगत मांही ।।
प्रभुपद प्रगट करावत प्रीति, भरम मिटावत भारी ।। १ ।।
परम कृपालु सकल जीवन पर, हरि सम सब दुखहारी ।। २ ।।
त्रिगुणातीत फिरत तन त्यागी, रीत जगतसे न्यारी ।। ३ ।।
ब्रह्मानन्द संतनकी सोबत, मिलत है प्रगट मुरारी ।। ४ ।।
इस जगत का सबसे अधिक कल्याण केवल सन्त लोग ही करते हैं। वे हमारे देह के मिथ्या अभिमान और अज्ञान को दूर हटाकर, हमें अपनी अन्तर्निहित बरह्मत्व को अभिव्यक्त करने का मार्ग दिखाते हैं। वे सभी मनुष्यों के प्रति ईश्वर के जैसा ही करुणा का भाव रखते हैं, और संकट आने पर हमारी सहयता करते हैं। वे संसारी मनुष्यों से अलग होते हैं, अपने शरीर के सुख पर कोई ध्यान नहीं देते और तीनो गुणों से ऊपर उठकर,भगवान की तरह हमारे दुखों को दूर करते हैं। 
ब्रह्मानन्द कहते हैं, सन्तों की संगति करने से भगवान हमारे समक्ष प्रकट हो जाते हैं।

 (राग खमाज – तीन ताल )
माधव ! मोह-पास क्यों  टूटै ?
बाहर कोटि उपाय करिय अभ्यन्तर ग्रन्थि न छूटै ।।
धृतपूरन कराह अन्तरगत ससि-प्रतिबिम्ब दिखावै ।
ईंधन अगन लगाय कल्पसत औंटत नास न पावै ।।
तरू कोटर महं बस विहंग तरू काटे मरै न जैसे ।
सादन करिय विचार-हीन मन,सुद्ध होई नहिं तैसे ।।
अंतर मलिन विषय मन अति, तन पावन करिय पखारे ।
मरई न उरग अनेक जतन बलमीक बिविध बिधि मारे ।।
तुलसिदास हरि गुरू-करूना बिनु, बिमल विवेक न होई ।
बिनु विवेक संसार-घोर-निधि पार न पावै कोई ।।
 
हे माधव, मोह के इस बंधन को कैसे तोड़ा जा सकता है? यहां तक ​​कि करोड़ों बाहरी औषधि खाने से यह आंतरिक रोग दूर नहीं हो सकता है। आग की थोड़ी भी राशि  घी से भरी कड़ाही में परिलक्षित चाँद को नष्ट कर देगा. किसी वृक्ष की कोटर में रहने वाले पक्षी को वृक्ष को ऊपर से काटने पर नहीं मारा जा सकता। उसी प्रकार मनःसंयोग (यम-नियम) के अभ्यास से रहित मन किसी भी बाहरी उपचार से शुद्ध नहीं हो सकता। (शौच) जब हमारे अंतर-ह्रदय में राग-द्वेष भरा हुआ हो, तो बाहर से शरीर पर चाहे कितना भी साबुन लगाएंगे वह शुद्ध नहीं होगा। क्या किसी मिट्टी के ढेर में छुपे साँप को 
मिट्टी के टिले को कई प्रकार से पीट कर मारा डाला जा सकता है? तुलसीदास कहते हैं, भगवान रूपी गुरु की कृपा के बिना किसी को स्पष्ट विवेक प्राप्त नहीं होता, और विवेक के बिना कोई भी ब्रह्मांड नामित गहरे समुद्र को पार करने की उम्मीद कैसे कर सकता है।
( राग हमीर – तीन ताल )
गुरू बिन कौन बतावे बाट ? बडा विकट यमघाट ।।
भ्रांतिकी पहाडी नदिया बिचमों । अहंकारकी लाट ।। १ ।।
काम क्रोध दो पर्वत ठाढ । लोभ चोर संघात ।। २ ।।
मद मत्सरका मेह बरसत । माया पवन बहे दाट ।। ३ ।।
कहत  कबीर सुनो भाई साधो । क्यों तरना यह घाट ।। ४ ।।
(विचार करें, स्वयं ब्रह्म ही श्रीरामकृष्ण के रूप में, स्वामी विवेकानन्द के गुरु बन कर अवतरित हुए थे, इसीलिये स्वामीजी भवसागर को पार होगये।) समर्थ गुरु के सिवा, ऐसा कौन है जो हमें इस यम-घाट (मृत्यु लोक) से बाहर निकलने का सही मार्ग दिखा सकते हैं? मार्ग बहुत कठिन है, छुरे की धार पर चलने के समान। क्योंकि   इस सन्देह रूपी पहाड़ी नदी को पार करते समय, अहंकार रूपी शिलाखण्ड सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ा हो जाता है। नदी के दोनों किनारों पर काम और क्रोध दो बड़े पहाड़ों की तरह खड़े हैं, और ऐसी महत्वाकांक्षा कि मुझे लोग महात्मा कहें, बापूजी कहें या चाचाजी कहें, चोर के जैसे हैं। घमण्ड और महात्मा दिखने का ढोंग ऊपर से बरसने वाले बादलों की बारिश है,  आत्मप्रवंचना  झंझावात बनकर हमें इधर-उधर घुमाती रहती है। कबीर कहते हैं: सज्ज्नों सुनो, बिना किसी योग्य गुरु को गाइड के रूप में पाये बिना रास्ता कैसे पार कर सकते हैं?


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