Monday, October 28, 2013

" राजयोग पर छः पाठ " -स्वामी विवेकानन्द (6)

षष्ठ पाठ 
{प्रकाशकीय:  १८९५ में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर, अमेरिका में  उनके अमेरिकी शिष्यों के लिये आयोजित एक ‘चरित्र-निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर‘ में स्वामी विवेकानन्द  द्वारा दिए गए वर्ग-वार्ता के नोटों पर यह रचना आधारित है।    
जिन्हें स्वयं श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था और बहुत संभाल कर रखा था। इन भाषणों को बाद में, सन् १९१३  में अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के बीच निजी वितरण के लिये एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था।}
सुषुम्णा : सुषुम्णा का ध्यान करना अत्यन्त लाभदायक है। तुम इसका चित्र अपने भाव-चक्षुओं के सामने लाओ, यह सर्वोत्तम विधि है। इस लिये देर तक उसका ध्यान करो। “ It is a very fine, very brilliant thread, this living passage through the spinal cord, this way of salvation through which we have to make the Kundalini rise.” 
 सुषुम्णा एक अति महीन, अति तेजोमय तार जैसी है, जो मेरुदण्ड से होकर हुई एक प्राणवंत मार्ग है, जिसके द्वारा हम कुंडलिनी जाग्रत कर सकते हैं, मुक्ति का द्वार है।
 
योगियों की भाषा में सुषुम्णा के दोनों छोरों पर कमल हैं। निचे वाला कमल कुंडलिनी के त्रिकोण को आच्छादित किये हुए है, और उपर वाला ब्रह्मरंध्र या सहस्रार ( brain surrounding the pineal gland) को ढके हुए है। इन दोनों के बीच भी चार कमल हैं, जो इस मार्ग के विभिन्न सोपान हैं : 
षष्ठ --सहस्रार।
पञ्चम ---नेत्रों के मध्य --आज्ञाचक्र।
चतुर्थ--कण्ठ के नीचे --विशुद्ध।
तृतीय --ह्रदय के समीप --अनाहत।
द्वितीय--  नाभिदेश में --मणिपुर।
प्रथम ---मेरुदण्ड के नीचे --मूलाधार।
प्रथम कुंडलिनी को जगाना चाहिये, फिर उसे एक कमल से दूसरे कमल की ओर उपर लेते हुए अन्त में मस्तिष्क में पहुँचाना चाहिये। प्रत्येक सोपान मन का एक नूतन स्तर है।
============

No comments: