Monday, October 28, 2013

" राजयोग पर छः पाठ " -स्वामी विवेकानन्द (2)

  द्वितीय पाठ
{प्रकाशकीय:  १८९५ में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर, अमेरिका में  उनके अमेरिकी शिष्यों के लिये आयोजित एक ‘चरित्र-निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर‘ में स्वामी विवेकानन्द  द्वारा दिए गए वर्ग-वार्ता के नोटों पर यह रचना आधारित है।    
जिन्हें स्वयं श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था और बहुत संभाल कर रखा था। इन भाषणों को बाद में, सन् १९१३  में अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के बीच निजी वितरण के लिये एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था।}
इस योग का नाम अष्टांग योग ‘eightfold Yoga’ है, क्योंकि इसको प्रधानतः आठ भागों में विभक्त किया गया है। वे हैं -” यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान और समाधी! " 
प्रथम- यम। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभ्यास है और मनुष्य का सारा जीवन इसके द्वारा शासित होना चाहिये। इसके पाँच विभाग हैं -सत्य,अहिंसा,ब्रह्मचर्य,आस्तेय और अपरिग्रह।
१. सत्य - मन,कर्म और वचन की पूर्ण सत्यता।
२. अहिंसा -मन,कर्म, वचन से किसी की हिंसा न करना।
३. ब्रह्मचर्य - मन,कर्म, और वचन की पवित्रता।
४. आस्तेय - चोरी का आभाव, मन,कर्म,वचन से लोभ न करना, बिना पूछे दूसरे की वस्तु न लेना।
५. अपरिग्रह - किसी से कोई उपहार लेने की इच्छा भी नहीं रखना। (Non-receiving of gifts.)  
द्वितीय- नियम। इसके भी पाँच विभाग हैं-शौच,संतोष,तपः,स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधानम्।
१. शौच- अंतर और बाहर की शुद्धता, नित्य स्नान-शरीर मन को सवच्छ रखना।
२. संतोष - जो भी मिल जाय उतने में संतुष्ट रहना, परिमित आहार।
३. तपः - कुछ शारीरक-कष्ट सहने के लिये तैयार रहना।
४. स्वाध्याय - नित्य सद्ग्रन्थों का पाठ करना या स्वामीजी को पढ़ना।
५. ईश्वर-प्रणिधान - इस सृष्टि को बनाने वाला कोई है या नहीं, इसके अनुसन्धान में लगे रहना।
तृतीय- आसन। मेरुदण्ड के उपर जोर न देकर कमर,गरदन और सिर सीधा रखना। 
चतुर्थ- प्राणायाम। प्राणवायु अथवा जीवन-शक्ति को वशीभूत करने के लिये श्वास-प्रश्वास का संयम।
पंचम- प्रत्याहार। मन को अन्तर्मुख करना तथा उसे बहिर्मुख होकर इन्द्रिय-विषयों में जाने से खींचकर भीतर लाना और जड़-तत्व (शरीर-मन-बुद्धि आदि चेतन द्रष्टा या आत्मा से कैसे भिन्न हैं?) को समझने के लिये उसे मन में घुमाना, अर्थात उस पर बार बार विचार करना।   
षष्ठ- धारणा। शरीर के भीतर किसी एक स्थान पर- (ह्रदय में) ध्यान केन्द्रित करना।
सप्तम- ध्यान।
अष्टम- समाधी: ज्ञानालोक, हमारी समस्त साधना का लक्ष्य ! हमें यम-नियम का अभ्यास जीवन पर्यन्त करना चाहिये। जहाँ तक दूसरे अभ्यासों का संबन्ध है, हम ठीक वैसा ही करते हैं, जैसा कि जोंक बिना दूसरे तिनके को दृढ़तापूर्वक पकड़े पहलेवाले को नहीं छोड़ती है। दूसरे शब्दों में हमें अपने पहले कदम को भली-भाँति समझकर अभ्यास कर लेना है और तब दूसरा उठाना है। 
इस पाठ का विषय प्राणायाम अर्थात प्राण का नियमन है। राजयोग में 'प्राणवायु' चित्त-भूमि (psychic plane) में प्रविष्ट होकर हमें आध्यात्मिक राज्य में ले जाती है। यह समस्त देहयंत्र की मुख्य फ्लाइवील है। प्राण प्रथम फेफड़ा (lungs या फुफ्फुस) पर क्रिया करता है, फेफड़ा ह्रदय को प्रभावित करते हैं, ह्रदय रक्त-प्रवाह को और वह क्रमानुसार मस्तिष्क तथा तथा मस्तिष्क मन पर क्रिया करता है। जिस प्रकार इच्छा बाह्य संवेदन उत्पन्न करती है, उसी प्रकार बाह्य संवेदन इच्छा-शक्ति (will ) या संकल्प शक्ति को जाग्रत कर देता है।
अभी हमारी संकल्प-शक्ति दुर्बल है, हम जड़-पदार्थों (शरीर-मन-इन्द्रिय) के इतने बंधन में हैं, कि हम अपनी ‘संकल्प-शक्ति के महा-तेज’ से परिचित नहीं हैं। हमारी अधिकांश क्रियायें बाहर से भीतर की ओर होती हैं। बाह्य प्रकृति हमारे आन्तरिक साम्य को नष्ट कर देती है, किन्तु जैसा कि हमें चाहिये, हम उसके साम्य को नष्ट नहीं कर पाते। किन्तु यह सब भूल है, वास्तव में प्रबलतर शक्ति तो भीतर की शक्ति है। वे ही महान संत और आचार्य (या नेता) हैं, जिन्होंने अपने भीतर के मनोराज्य को जीता है। और इसी कारण उनकी वाणी में इतनी शक्ति (ओजस्वीता) होती है।
एक ऊँची मीनार पर बंदी किये गये एक मंत्री की कहानी है (१/५४-५५)। वह अपनी पत्नी के प्रयत्न से मुक्त हुआ। पत्नी एक लंबी रस्सी, सुतली, पतले से धागे का और रेशम के धागे का बंडल, एक भौंरा (beetle), और मधु लायी थी। 
यह रूपक इस बात को स्पष्ट करता है कि किस प्रकार हम रेशमी धागे की भाँति प्रथम प्राणवायु का नियमन करके अन्त में एकाग्रता रूपी रस्सी को पकड़ सकेंगे, जो हमें देहरूपी कारागार से निकल देगी और हम मुक्ति प्राप्त करेंगे। मुक्ति प्राप्त कर लेने पर उसके हेतु प्रयुक्त साधनों का हम परित्याग कर सकते हैं। 
प्राणायाम के तीन अंग हैं :१. पूरक-श्वास लेना। २. कुम्भक- श्वास रोकना। ३. रेचक -श्वास छोड़ना।
मस्तिष्क में से होकर मेरुदण्ड के दोनों ओर बहनेवाले दो शक्ति-प्रवाह हैं, जो मूलाधार में एक दूसरे का 
अतिक्रमण करके मस्तिष्क में लौट आते हैं। इन दोनों में से एक का नाम ‘सूर्य’ (पिंगला) है, जो मस्तिष्क के बायें गोलार्ध से प्रारंभ होकर मेरुदण्ड के दक्षिण पार्श्व में मस्तिष्क के आधार (सहस्रार) पर एक दूसरे को लांघकर पुनः मूलाधार पर अंग्रेजी के आठ ‘8’ अंक के अर्ध भाग के आकार के समान एक दूसरे का फिर अतिक्रमण करती हैं।
दूसरे शक्ति-प्रवाह का नाम ‘चन्द्र’ (इड़ा) जिसकी क्रिया उपयुक्त क्रम के ठीक विपरीत है और जो इस आठ ‘8’ अंक को पूर्ण बनती है। हाँ, इसका निम्न भाग उपरी भाग से कहीं अधिक लम्बा है। ये शक्ति-प्रवाह दिन-रात गतिशील रहते हैं, और विभिन्न केन्द्रों में, जिन्हें हम ‘चक्र’ (स्नायुजाल plexuses) कहते हैं, बड़ी बड़ी जीवनी शक्तियों का संचय किया करते हैं। पर शायद ही हमें उनका ज्ञान हो। एकाग्रता द्वारा हम उनका अनुभव कर सकते हैं और शरीर के विभिन्न अंगों में उनका पता लगा सकते हैं। इस श्वास-क्रिया के साथ, ‘सूर्य’ और ‘चन्द्र’ का शक्ति प्रवाह घनिष्ट रूप से संबद्ध है, और इसके नियमन द्वारा हम शरीर पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं।
कठोपनिषद (१/३/३-५) में शरीर को रथ, मन को लगाम, इंद्रियों को घोड़े, विषय को पथ और बुद्धि को सारथी कहा गया है। इस रथ में बैठी हुई आत्मा रथी है। यदि रथी समझदार नहीं है और सारथी से घोड़ों को नियंत्रित नहीं करा सकता तो, वह कभी भी अपने ध्येय तक नहीं पहुँच सकता। अपितु, दुष्ट अश्वों के समान इन्द्रियाँ उसे जहाँ चाहेंगी, खिंच ले जायेंगी। यहाँ तक कि उसकी जान भी ले सकती है।

ये दो शक्ति-प्रवाह सारथी (मन) के हाथों में रोकथाम के हेतु लगाम हैं; और अश्वों (इंद्रियों) को अपने वश में करने के लिये उसे इनके उपर नियंत्रण करना आवश्यक है। हमें नीतिपरायण होने की शक्ति प्राप्त करनी ही होगी। जब तक हम उसे प्राप्त नहीं कर लेते, हम अपने कर्मों को नियंत्रित नहीं कर सकते। नीतिशिक्षाओं (यम-नियम) को कार्यरूप में परिणत करने की शक्ति हमें केवल योग से ही प्राप्त हो सकती है। नैतिक मनुष्य होना योग का उद्देश्य है। जगत के सभी बड़े बड़े आचार्य (मानव-जाति के नेता) योगी थे और उन्होंने प्रत्येक शक्ति-प्रवाह को वश में कर रखा था। योगी इन दोनों प्रवाहों को मेरुदण्ड के तले में संयत करके उनको मेरुदण्ड के भीतर के केन्द्र से होकर परिचालित करते हैं। तब ये प्रवाह ज्ञान के प्रवाह बन जाते हैं। यह स्थिति केवल, योगी की ही होती है। 
प्राणायाम की द्वितीय शिक्षा : प्राणायाम की एक ही पद्धति सभी के लिये नहीं है। प्राणायाम का लयपूर्ण क्रमबद्धता (Rhythmic Regularity) के साथ होना आवश्यक है, और इसकी सबसे सहज विधि ‘easiest way is by counting’ है गणना। चूँकि यह (गणना या जप) पूर्णरूपेण यंत्रवत हो जाती है, हम इसके बजाय एक निश्चित संख्या में पवित्र मंत्र ‘ॐ’ का जप करते हैं।(गुरु के निर्देशानुसार सावधानी नहीं रखने से दिमाग बिगड़ भी सकता है। इसीलिये सद्गुरु के निर्देशानुसार १०८ की माला में नाम-जप करना, प्राणायाम की सबसे सरल पद्धति है,)
प्राणायाम की क्रिया इस प्रकार है : दायें नथुने को अंगूठे से दबाकर चार बार ‘ॐ’ का जप करके धीरे धीरे बायें नथुने से श्वास लो।
तत-पश्चात्, बायें नथुने पर तर्जनी रखकर दोनों नथुनों को कसकर बन्द कर दो और ‘ॐ’ का मन ही मन आठ बार जप करते हुए श्वास को भीतर रोके रहो। पश्चात, अंगूठे को दाहिने नथुने से हटाकर चार बार ‘ॐ’ का जप करते हुए उसके द्वारा श्वास को बाहर निकालो।
जब श्वास बाहर हो जाये, तब फेफड़े या फुफ्फुस से समस्त वायु निकालने ने के लिये पेट को दृढ़तापूर्वक संकुचित करो। फिर बाएं नथुने को बंद करके चार बार ‘ॐ’ का जप करते हुए दाहिने नथुने से श्वास भीतर ले आओ। इसके बाद दाहिने नथुने को अँगूठे से बंद करो और आठ बार ‘ॐ’ का जप करते हुए श्वास को श्वास को भीतर रोको। फिर बाएं नथुने को खोलकर चार बार ‘ॐ’ का जप करते हुए पहले की भाँति पेट को संकुचित करके धीरे धीरे श्वास को बाहर निकालो। इस सारी क्रिया को प्रत्येक बैठक में दो बार दुहराओ अर्थात प्रत्येक नथुने के लिये दो के हिसाब से चार प्राणायाम करो। प्राणायाम के लिए बैठने के पूर्व सारी क्रिया प्रार्थना से प्रारंभ करना अच्छा होगा। एक सप्ताह तक इस अभ्यास को करने की आवश्यकता है।
फिर धीरे धीरे श्वास-प्रश्वास की अवधि को बढ़ाओ, किन्तु अनुपात वही रहना चाहिये। अर्थात तुम यदि श्वास भीतर ले जाते समय छः बार 'ॐ' का जप करते हो, तो उतना ही श्वास बाहर निकलते समय भी करो, और कुम्भक के समय बारह बार करो। इन अभ्यासों के द्वारा हम और अधिक पवित्र, निर्मल और आध्यात्मिक होते जायेंगे। किसी कुमार्ग में जाने (??) से अथवा कोई सिद्धि (??) की चाह से बचे रहो।
प्रेम ही एक ऐसी शक्ति है, जो चिरकाल तक हमारे साथ रहती है और बढ़ती जाती है। राजयोग के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सबल होना आवश्यक है। अपना प्रत्येक कदम इन बातों को ध्यान में रखकर ही बढ़ाओ।
लाखों में कोई बिरला ही कह सकता है, “ मैं इस संसार के परे जाकर ईश्वर का साक्षात्कार करूँगा।” शायद ही कोई 'सत्य' के सामने खड़ा हो सके! (??) किन्तु अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिये हमें मरने (??) के लिये भी तैयार रहना पड़ेगा।
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1 comment:

Harshad Ashodiya said...

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