Sunday, February 3, 2013

$$@$$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [73] भविष्य का भारत और श्रीरामकृष्ण(10.विश्वमानव के कल्याण में),

स्वामी विवेकानन्द ने एक बार ऐसा कहा था, कि  "श्रीरामकृष्ण के आविर्भूत होने के साथ ही साथ, सत्ययुग का प्रारंभ हो गया है।" उनके इस कथन का तात्पर्य क्या है ? सत्ययुग कहने से हमलोगों को क्या समझना चाहिये? क्या यही कि - श्रीरामकृष्ण आये, और जितनी भी अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अपवित्रता मैलापन आदि भाव समाज में थे, वे सभी समाप्त हो गये-सब कुछ सुन्दर हो गया और मनुष्य सत्य के पुजारी बन गये !  किन्तु हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि युगपरिवर्तन मनुष्यों के विचार-जगत में होता है,
कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् ।
चरैवेति चरैवेति॥

 -सोये रहने का नाम है कलिकाल में रहना, जब नींद टूट गयी तो द्वापर में रहना कहेंगे, जब उठ कर खड़े हो गये तब जीवन में त्रेता युग चलने लगता है; फिर जब चलना शुरू कर दिये, तब उसे सत्ययुग में रहना कहते हैं। इसलिये सत्ययुग का लक्ष्ण है, निरन्तर आगे बढ़ना-"चरैवेति चरैवेति।"  
[जो मनुष्य (मोहनिद्रा में ) सोया रहता है और पुरुषार्थ नहीं करता उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है,  जो पुरुषार्थ करने के लिये खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है. जो आगे बढ़ता जाता है, उसका भाग्य भी आगे बढ़ता जाता है, इसीलिये- " हे मनुष्यों- चरैवेति चरैवेति ! आगे बढो, आगे बढो ! "
सोये रहने का तात्पर्य है, जो मनुष्य सोया हुआ है- "कलिः शयानो भवति" वह अभी ' कलिकाल में वास 'कर रहा है, और स्वामीजी की ललकार -  सुनने से जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, " संजिहानस्तु द्वापरः" वह द्वापर युग में वास कर रहा है।  " उत्तिष्ठ्म स्त्र्रेता भवति "- जो व्यक्ति (पुरुषार्थ करने के लिये ) उठ कर के खड़ा हो जाता है- अर्थात मनुष्य बन जाने के लिये, अपना चरित्र-निर्माण करने के लिये कमर कस कर उठ खड़ा होता है, वह त्रेता युग में वास कर रहा है।  " कृतं संपद्यते चरन् " और अपनी मंजिल की ओर जिसने चलना शुरू कर दिया है,अर्थात जो व्यक्ति मनुष्य बन जाने के लिये तप करना (मन को एकाग्र करने का अभ्यास ) शुरू कर दिया है, वह मानो सत्य युग में वास कर रहा होता है।
हमें ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी विवेकानन्द शास्त्रों के अनुसार यह कहना चाहते हैं, कि श्रीरामकृष्ण के जीवन और सन्देश ने मनुष्यों को संजीवित करके, उन्हें जीवन की महती सम्भावना की ओर आगे बढ़ने के लिये अनुप्रेरित कर दिया है।
 श्रीरामकृष्ण के आविर्भूत होने से पहले मनुष्य गहरी सुषुप्ति में था, अज्ञान-रूपी घोर निद्रा के अँधेरे में मानो वह बेजान मुर्दे के जैसा सोया पड़ा था। तभी श्रीरामकृष्ण का आगमन होता है, और नये युग के लिये उपयुक्त पद्धति से मनुष्य के आत्मस्वरूप की महिमा को पुनः स्थापित करने का संघर्ष शुरू हो जाता है। मनुष्य एक बार फिर से अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाने का संकल्प लेकर चलना प्रारंभ कर देता है-इसी प्रकार उसके जीवन में सत्ययुग का प्रारंभ हो जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि स्वामीजी ने स्वयं उपरोक्त श्रुति (ऐतरेय ब्राह्मण) को अपने जीवन में प्रयोग करके देखा था कि कलि,द्वापर, त्रेता, सत्य इत्यादि युगों की उपमा व्यक्ति की मानसिक अवस्था को निर्धारित करने के उद्देश्य से दी गयी है। चार युगों की व्याख्या उनमें जीने वाले मनुष्य के आन्तरिक जीवन में जो परिवर्तन आता है, उसके संदर्भ में की गई है। अधिकांश युवाओं का मन अपने यथार्थ स्वरूप के प्रति अचेत रहता है, या सोया रहता है, उस समय उसका कलिकाल चल रहा होता है।
[ वे श्रीरामकृष्ण के सन्देश - " मान-हूश तो मानुष !" तथा स्वामी विवेकानन्द की प्रतिध्वनि - ' उठो, जागो!' 
को सुनकर, जब जाग उठते हैं, वह द्वापर युग है। जब कोई व्यक्ति उठ कर खड़ा हो जाता है- तो त्रेता युग में वास करता है। उसके बाद जब वह मन को एकाग्र करने के लिये मन के साथ संघर्ष करना प्रारंभ कर देता है, तो उसके लिये सतयुग प्रारंभ हो जाता है। सतयुग के लोग (पाशविक प्रवृत्ति में ) न तो सोये रहते हैं और न हाथ पर हाथ देकर बैठे रहते हैं। निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं। जो चलता है, अर्थात पुरुषार्थ करता है, वही लक्ष्यसिद्धि (मनुष्य जीवन को सार्थक) कर के  अपने यथार्थ स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। इसलिए श्रुति में कहा गया है- "आगे बढ़ो, आगे बढो !"]
" श्रीरामकृष्ण के आविर्भूत होने के साथ ही साथ सत्ययुग का प्रारंभ हो गया है " -  कहने से स्वामीजी यही बताना चाहते हैं कि, चिरनिद्रा में सोये हुये हमारे देश ने चलना (आगे बढ़ना या प्रगति करना ) शुरू कर दिया है। उनके इस कथन पर हमलोगों को गहराई से चिन्तन करते हुए इसके मर्म को समझने की चेष्टा करनी चाहिये और यह विश्वास भी करना चाहिये, कि हाँ, अब हमलोग सचमुच (अपनी अन्तर्निहित दिव्यता को अभिव्यक्त करने के पथ पर) आगे बढ़ रहे हैं।
"श्रीरामकृष्ण के आगमन के साथ ही साथ एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में रंग-रूप, जाती,भाषा, संप्रदाय, शिक्षित-अशिक्षित, अमीर-गरीब, ब्राह्मण-चाण्डाल यहाँ तक स्त्री-पुरुष के बीच भी समस्त प्रकार अन्तर  समाप्त हो गया है। उन्होंने अपने जीवन से यह दिखा दिया है, कि ईश्वरीय-प्रेम पर सभी मनुष्यों का एकसमान अधिकार है, तथा सत्य की अनुभूति करने की सम्भावना प्रत्येक मनुष्य में पूर्ण मात्रा में विद्यमान है। इसलिये हिन्दू, मुसलमान, ईसाई - सबों के बीच हर प्रकार का अन्तर समाप्त हो गया है। सम्प्रदाय के आधार पर विभेद-जनित आशान्ति का अवसान हो गया है।"
 जब स्वामीजी यह भविष्य-वाणी कर रहे थे, उस समय उनकी समग्र दृष्टि ठाकुर (श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव) के जीवन के भीतर इस प्रकार जुड़ी हुई थी, कि वे अपनी आँखों के सामने साक्षात् इन्हीं दृश्यों को रूपायित होते देख रहे थे।  ठाकुर के जीवन और संदेशों को ठीक से समझकर अनुसरण करने वाले मनुष्यों के जीवन में आगे जो परिवर्तन अवश्यम्भावी रूप से घटित होने वाला है, उसी को वे इस प्रकार देख रहे थे मानो " घटना घट चुकी है! "
इसके अतिरिक्त उनकी ऋषि दृष्टि के सामने भविष्य भी यदि वर्तमान जैसा स्पष्ट रूप में दिखाई देता हो, तो इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं है। क्योंकि स्वामीजी के मतानुसार श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव का जीवन हर दृष्टि से इतना परिपूर्ण और उत्कृष्ट था कि उनके पूर्णता-सम्पन्न चरित्र के सामने श्रीकृष्ण और श्रीरामचन्द्र के चरित्र भी फीके पड़ जाते हैं ! इसीलिये उनकी यह भविष्य-वाणी आज के दिन के नये उभरते हुए भारत की सम्भावना की ओर इशारा करती है।
[भारत के युवा पाश्चात्य राजनीती के चक्कर में पड़कर अपनी संस्कृति को भूल गये है। भारतीय संस्कृति के चार पुरुषार्थ -'धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष' को भूल कर केवल पाश्चात्य संस्कृति के दो पुरुषार्थ -अर्थ और काम का भोग करने में मनुष्य से पशु बनता जा रहा है। शिक्षा को मनुष्य बनाने वाले धर्म से जोड़े बना केवल डंडे का भय दिखाकर या कानून बना कर भारत का पुनर्निर्माण नहीं हो सकता।
भारत में निवास करने वाली प्रजा तो ऋषि-मुनियों की संतानें हैं, इन्हें ऐतेरेय ब्राह्मण के मन्त्र को सुनाकर युवाओं को कलियुग की मोहनिद्रा से जाग्रत करना होगा। यही स्वामीजी की योजना थी, यही वह कार्य है, जिसे पूरा करने के लिये स्वामीजी भारत के युवाओं का आह्वान करते हुए कहते हैं-"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्नी बोधत !" पुरुषार्थ करने का अर्थ कर्तापन का अहंकार त्याग कर,स्वयं को पशु से मनुष्य और मनुष्य से ईश्वर बनते देखना है या स्वामी विवेकानन्द के शुभ-संकल्पों को साक्षी के रूप में साकार होते देखना है ।]
स्वामीजी ने (एतेरेय ब्राह्मण की) श्रुति- 'चरैवेति चरैवेति ' का प्रयोग अपने जीवन पर करके इस बात को निश्चित रूप से जान लिया था, कि हमलोग यदि ठाकुर के जीवन को अपने जीवन का ध्रुवतारा बनाकर उनका यथार्थ अनुसरण करेंगे, तो हमलोगों के जीवन का आमूल परिवर्तन अवश्यम्भावी रूप से घटित हो जायेगा।  
अपनी दृष्टि की विभिन्नता के कारण हमलोग श्रीरामकृष्ण को चाहे जिस-भाव से भी क्यों न देखें, उनके जीवन और संदेशों का प्रभाव हमलोगों के जीवन पर पड़ना निश्चित है। श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव को हमलोग चाहे केवल एक साधारण मनुष्य समझें, नरेन्द्रनाथ के गुरु या कोई महापुरुष समझें, या उनको अवतार समझें, या 'अवतार-वरिष्ठ ' भगवान समझें -जो भी जो कुछ समझें,  हमारे हृदय में उनके प्रति श्रद्धा स्वतः उत्सारित होने को बाध्य है।
 एवं इसी श्रद्धा-बल की दृढ़ता (perseverance) हमलोगों के जीवन के मोड़ को घुमा देगी,(उत्तरायण बना देगी, अधोमुखी प्रवाह को उर्ध्व-मुखी ) और हमलोगों को 'मनुष्य' बनाकर ही छोड़ेगी। श्रीरामकृष्ण को हमलोग अपना  मुक्तिदाता,उद्धारक,रक्षक (Savior) या परित्राता मानें, या उनको अपना गुरु समझें, या एक अनुकरणीय आदर्श व्यक्ति के रूप में ही क्यों न देखें, हर दृष्टि से वे (श्रीरामकृष्ण) सनातन धर्म के अनन्य सिद्धान्त, विश्व के समस्त मनुष्यों के समस्त सदगुणों के अकृतिम समन्वय 'अनेकता में एकता ' -के धारक, वाहक और संस्थापक हैं।
हमलोग सतयुग के आदर्श राष्ट्र की कल्पना करते हैं। हम आशा करते है कि सम्पूर्ण विश्व में एक जाति -'आर्य-जाति' (सभ्य और सुसंस्कृत मनुष्य) का निवास होगा, एक प्राण, एक बोध की प्रतिष्ठा होगी - अर्थात  सभी लोग यह स्वीकार करने लगेंगे कि - 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है !' या 'Each soul is potentially divine !'  फिर चारो ओर शान्ति छा जाएगी, चाहे कोई किसी धर्म-पंथ का अनुसरण क्यों न करता हो, सभी आर्य यानि सभ्य- सुसंस्कृत बन जायेंगे-और विश्व के सभी धर्मों में स्थायी रूप से समन्वय स्थापित हो जायेगा।
स्वामीजी ने कहा था,[ " आचार्य शंकर जैसा वेदान्ती मस्तिष्क, बुध के जैसा करुणा पूर्ण हृदय, और इस्लामी भ्रातृभाव द्वारा गठित शरीर-के द्वारा भावी भारत उठ खड़ा होगा।"]   " ब्राह्मण-युग का ज्ञान, क्षत्रिय-युग की सभ्यता और संस्कृति, वैश्य युग का विस्तार या ज्ञान के प्रचार-प्रसार करने की उद्द्य्म एवं शक्ति, एवं शूद्रों का साम्यभाव -केवल इस प्रकार का समन्वय स्थापित करने से ही उस सतयुग के आदर्श राष्ट्र को गठित किया जा सकता है।"
और इस समन्वय को संभव करने के लिये श्रीरामकृष्ण के जीवन की विवेचना और अनुसरण ही एकमात्र उपाय है। वास्तविक जीवन में हमारे भीतर आज भी विभिन्न कारणों से जो मतभेद, विद्वेष, और उसके फलस्वरूप जो घातक परिणाम, जो असमानता, पंजाब इत्यादि की घटना में देख पा रहे हैं, उसको दूर करने का एकमात्र पथ है श्रीरामकृष्ण के जीवन और सन्देश को ठीक ठीक प्रचार करना। जो लोग ठाकुर के भक्त या अनुगामी होंगे, उनके लिये अन्य धर्म के मनुष्यों से विद्वेष करना, धन के आधार पर किसी मनुष्य को छोटा-बड़ा समझना,या किसी भी मनुष्य को आघात पहुँचाना-बिलकुल असंभव हो जायेगा।
जो लोग ठाकुर को मानने का दावा करेंगे, उनके अनुयायी होने का दावा करेंगे, फिर भी धर्म के आधार पर घृणा फैलायेंगे-तो इसीसे सिद्ध हो जायेगा कि वे भले ही और जो कुछ भी रहें, किन्तु श्रीरामकृष्ण के अनुगामी नहीं हैं। उनको अपने मुख से ठाकुर का नाम लेना शोभा नहीं देता है। जो सत्ययुग के आदर्श-राष्ट्र की परिकल्पना है, वह तभी यथार्थ में बदल सकता है, जब श्रीरामकृष्ण के अनुयायी उनका अनुसरण यथार्थ रूप में करें। और केवल तभी भारतवर्ष तथा सम्पूर्ण विश्व को पुरुज्जिवित किया जा सकेगा। स्वामीजी युवाओं का आह्वान करते हुए कहते हैं-" हे मेरे युवक बन्धुगण ! तुमलोग उठ खड़े हो ! काम में लग जाओ! धर्म एक बार पुनः जाग्रत होगा।"
"अब तुमलोगों का काम है प्रान्त प्रान्त में, गाँव गाँव में में जाकर देश के लोगों को समझा देना होगा कि अब आलस्य के साथ बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। शिक्षा-विहीन, धर्म-विहीन वर्तमान अवनति की बात उन्हें समझकर कहो-'भाई, अब उठो, जागो, मनुष्य बनने और बनाने के काम में लग जाओ !और कितने दिन सोओगे? और शास्त्र के महान सत्यों को सरल करके उन्हें जाकर समझा दो। इतने दिन इस देश का ब्राह्मण धर्म पर एकाधिकार किये बैठा था। काल स्रोत में वह जब और अधिक टिक नहीं सका, तो तुम अब जाकर उन्हें समझा दो कि ब्राह्मणों की भांति उनका भी धर्म में समान अधिकार है। चाण्डाल तक को इस अग्निमन्त्र में दीक्षित करो।"  यहाँ धर्म का अर्थ है-वैदिक धर्म, जिसके अनुसार सभी जीव एक के ही बहुरूप हैं ! जिसका मूल मन्त्र है-  "सर्वं खल्विदं ब्रह्म",  "तत्वमसि" 
"समस्त सृष्टि नामरूपात्मक है; जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में विलीन होकर समुद्र हो जातीं और अपनी सत्ता को नहीं जानतीं, इस तथा अन्य दृष्टांतों से उद्दालक ने श्वेतकेतु को समझा दिया है कि सृष्टि के समस्त जीव आत्म-स्वरूप को भूले हुए हैं, वस्तुत: उनमें जो आत्मा है वह ब्रह्म ही है, और इस सिद्धांत को इस उपनिषद् के महावाक्य "तत्वमसि" में वाग्बद्ध किया है। (छांदोग्य उपनिषद् 6-8-16)"
 उपनिषदों के इसी ज्ञान को अपना संबल बनाकर भारतमाता को पुनः उसके गौरवशाली सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराने के लिये अपने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था- " और फिर एक नवीन भारत निकल पड़े। निकले हल पकड़ कर, किसानों की कुटी भेदकर, जाली, माली, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से. निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।"
अर्थात नया भारतवर्ष प्राचीन धर्म के सार को आत्मस्थ करके समाज के उपेक्षित समझे जाने वाले,आम लोगों के बीच से उभर कर सामने आये । ऐसा हो जाने से क्या होगा ? यह होगा कि सभी मनुष्यों को केवल मनुष्य होने के लिये ही सम्मान दिया जायेगा, सभी जाती-धर्म-भाषा के मनुष्यों के साथ, उनको बिल्कुल अपना समझकर, हर किसी से प्रेम करना संभव हो जायेगा।
 किन्तु जो तथाकथित नेता 'पुरोहित-पण्डे ' अब भी निजी स्वार्थवश इस ज्ञान को जन जन के द्वारा तक ले जाने में बाधा खड़ी करते हैं, उनको बड़े भाई के जैसा झिड़की भरा परामर्श देते हैं-   " अतीत के कंकाल-समूहों ! - देखो तुम्हारा उत्तराधिकारी भविष्य का भारत, तुम्हारे समक्ष खड़ा है। तुमलोगों के पास पूर्व काल की बहुत सी रत्न पेटिकाएँ सुरक्षित हैं, तुम्हारी अस्थिमय अँगुलियों में पूर्वपुरुषों की संचित कुछ अमूल्य रत्न जड़ित अंगूठियाँ हैं, इतने दिनों तक उन्हें दे देने की सुविधा नहीं मिली. अब अबाध विद्या-चर्चा के दिनों में (पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी के दिनों में), उन्हें उत्तराधिकारियों को दो, जितने शीघ्र दे सको, दे दो। फेंक दो इनके बीच; जितना शीघ्र फेंक सको, फेंक दो; और तुम हवा में विलीन हो जाओ, अदृश्य हो जाओ, सिर्फ कान खड़े रखो। " तुम " ( कर्तापन का अहंकार ) ज्यों ही विलीन होगे, वैसे ही सुनाई देगी,
' कोटि जीमूतस्यन्दिनी, त्रैलोक्यकम्पन-कारिणी ' भावी भारत की जागरण-वाणी- "वाह गुरू की फतेह!"
स्वामीजी द्वारा कथित इस प्रकार के सन्देश ही श्रीरामकृष्ण के आविर्भाव के महत्व को सूचित करते हैं। तथा सत्ययुग की स्थापना के संकल्प का वहन करते हैं। हमलोगों के लिये इसे समझना आवश्यक है। एवं उन्हीं के परामर्श के अनुसार कार्य करने के लिये प्रयत्न शील होना होगा। क्योंकि भविष्य के भारत के गौरव मय दिन बस आने ही वाले हैं। " उठो भारत, तुम अपनी आध्यात्मिकता के द्वारा जगत पर विजय प्राप्त करो !"

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