Saturday, February 2, 2013

$@$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [71] अन्तरराष्ट्रिय महिला दशक(10.विश्वमानव के कल्याण में)

उत्सव मनाना मनुष्यों को स्वाभाविक रूप से बहुत पसन्द है। इन दिनों कई प्रकार के महोत्सव-समारोह आदि आयोजित हो रहे हैं। जैसे किसी भी यादगार घटना की वर्षगाँठ या सालगिरह,जयन्ती आदि मना लिये 
जाते हैं। यहाँ तक कि पुस्तक प्रकाशन की, सत्याग्रह की, या बहुत समय पहले के किसी उपलक्ष्य को केन्द्र में रखकर इन सब को आयोजित किया जाता है। उत्सव मनाने में कोई एक ही महोत्सव मना लेना हमें यथेष्ट नहीं लगता, विभिन्न प्रकार के लगातार उत्सवों के माध्यम से जयंती-महोत्सव आदि होते ही रहना चाहिये। अगर ये महोत्सव पूरे वर्ष भर होते रहते हों, तब तो और भी अच्छा है। इसीलिये आजकल वार्षिकी-समारोह-महोत्सव मनाना एक प्रथा ही बन गयी है। 
कुछ विशेष विशेष महत्वपूर्ण विचारों को लेकर भी इन दिनों 'वर्ष-पालन' मनाया जा रहा है। किन्तु लोग उसके भाव को अक्सर भूल जाया करते हैं। किन्तु 'वर्ष-पालन ' करने की योजना अच्छी ही है। हमलोगों का उद्देश्य शायद जनमानस को जगाना होता है। किन्तु उन सम्मेलनों या समारोहों में यदि कुछ सीखने लायक मिला तो, हम जो कुछ सीख आये थे, उसको भूल जाने में थोड़ा भी समय नहीं लगता है। इसके बावजूद उत्सव-समारोह-सम्मेलन आदि होते रहें, हमलोग ऐसी कामना करते हैं। 
इस समय 'अन्तरराष्ट्रिय महिला वर्ष ' के आयोजन को समाप्त करके हमलोग अब 'अंतरराष्ट्रीय महिला दशक '*का प्रारंभ करने जा रहे हैं। (यह निबन्ध 1976* में प्रकाशित हुआ था) निश्चय ही इसके विषय में पुरुषों को कहने लायक कुछ नहीं है। किन्तु कुछ असहिष्णु बुद्धि जीवी महिला-वर्ष के पालन के विरुद्ध इधर-उधर अपनी उपेक्षा ही अभिव्यक्त करते दिखे थे। हमलोगों की तात्कालीन प्रधानमन्त्री ने उनकी इस असहिष्णुता के लिये सरल इशारे में मीठी झिड़की देते हुए कही थीं, जैसा कि यह पूरा वर्ष ही पुरुषों के लिये अनन्य हो गया है, इसीलिये कम सेकम एक एक वर्ष उनको महिलाओं के लिये उत्सर्ग कर देना चाहिये। हमारी एकमात्र आपत्ति इतनी ही है कि अन्य सभी वर्षों को पुरुषों के लिये छोड़ कर, महिलाओं को अपने लिये सिर्फ एक ही वर्ष क्यों मिलना चाहिए ? 
यदि महिलाओं के बारे में मेरी बातों को अनधिकृत प्रयास न मानें तो मैं प्रस्ताव करूँगा, कि उनको और भी आगे बढ़ कर समाज-निर्माण की योजना मजबूती से अपना योगदान करना उचित होगा। सच कहा जाय तो यह केवल महिलाओं की बात नहीं है। उनके क्रियाकलाप का प्रभाव केवल महिलाओं के उपर ही नहीं पड़ता है। हमलोग यह नहीं कहना चाहते हैं कि उनको और अधिक अनियंत्रित या मुंहजोर हो जाना चाहिये या अपने वेश-भूषा के प्रति लापरवाह हो जाना चाहिये।
 हमलोग केवल यही इतना ही चाहते हैं कि उनकी सत्यनिष्ठा, समान-अधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता,  पवित्रता, चरित्र-बल इतना अधिक शक्तिशाली हो जाये कि समस्त समाज की अधोगति के रास्ते में एक ठोस दीवार बनकर खड़ी हो जाएँ। हाल ही में महिला-वर्ष के अवसर पर आयोजित एक सम्मेलन में किसी राजनीति कुशला नेत्री ने अपनी राय देते हुए कहा था कि, देश के कल्याण के लिये महिलाओं को राजनीति के क्षेत्र में और अधिक संख्या में भाग लेना उचित है। किन्तु उसी सभा में उपस्थित टेम्पलटन पुरुषकार विजयनी, और बाद में जिनको नोबेल पुरुष्कार भी मिला था-मदर टेरेसा; ने प्रस्ताव दिया था कि समाज को बेहतर बनाने के लिये महिलाओं को अन्तःपुर में लौट जाना ही अधिक फायदेमन्द होगा। उनके इस परामर्श को महिलायें किस रूप में लेंगी इस बात का अभीतक खुलासा नहीं हुआ है। किन्तु मन की भावनाओं को दबा देने की रत्ती भर चेष्टा नहीं करके, उन्हें मदर टेरेसा के प्रस्ताव पर आपस में बैठकर गम्भीरता पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। 
इन दिनों जिस प्रकार समस्त पुरुष लोग राजनीतिज्ञ या राजनीतीविद होना चाहते हैं, यदि समस्त महिला समाज भी वैसा ही बन जाता, हमलोग बालक ईशु को अपने गोद में लेकर प्यार करने वाली माँ मेरी या, बालक श्रीकृष्ण को उखल में बांध कर दण्ड देने वाली माता यशोदा को कहाँ से देख पाते ? क्या आज हमारे समाज के घर घर में हजारो हजार रानी मदालसा जैसी माताओं की आवश्यकता नहीं है ? जो ब्रह्मज्ञान को अपने आंचल में बांधकर भावी पुरुष-समाज को यथार्थ रूप में शिक्षित कर सकती हों ? इनदिनों सबसे अधिक चर्चा महिला-मुक्ति आन्दोलन के उपर हो रही है। किन्तु उसका सच्चा स्वरूप क्या है ? 
स्कूल की लड़कियां शराब का सेवन करने को सभ्यता समझ रही हैं, छात्रायें परीक्षा रुकवाने के लिये स्कूल की चाहरदीवारी को लांघ रही हैं, गहना या रुपया का प्रदर्शन कर रही हैं, लड़कियां सरस्वती-प्रतिमा-विसर्जन की शोभायात्रा में 'ट्विस्ट' नाच रही हैं,या लिविंग रिलेशन में रहकर पवित्रता के आदर्श को धूल में मिला रही है। ( ये सब बातें कुछ समाचार पत्रों में छपी हैं।) "क्या इन्हीं को तथाकथित महिला-मुक्ति का प्रमाण समझना चाहिये ? मुक्ति का अर्थ होता है, अंतर्निहित शक्तियों को विकसित करना और पूर्ण आत्म-विकास एवं लोक कल्याण के उद्देश्य से उन सबका सुप्रयोग करना। "-महिला-स्वतंत्रता क्या इसी प्रकार कार्यकारी  होने के मार्ग पर अग्रसर होगी ? 
स्त्री जाति के समक्ष अनेकों आदर्श नारियों के जीवन और चरित्र को आदर्श-नारी का प्रतीक माना जाता है। हमारे देश में सीता, सावित्री, दमयन्ती,, गार्गी, मैत्रेयि, उभय भारती, यहाँ तक की झाँसी की रानी का नाम भी प्रसिद्द है। यह बात अलग है, आज की तरुणी के लिये ये सब उतने परिचित नाम नहीं हैं। यदि हमारे देश की तरुणी उनके जीवन और चरित्र के विषय में जानकर जहांतक संभव हो, इन दृष्टान्त स्वरूप नारियों की समकक्ष बनने का प्रयत्न करतीं, तो बहुत अच्छा होता। अभी हाल ही में सोवियत गणराज्य में रूस की एक छोटी सी लड़की ने बाल-चलचित्र को देखने के बाद यह कहा था,कि वह बड़ी होकर सीता जैसी नारी बनना चाहती है। उसकी इच्छा के अनुसार उसका नाम बदल कर 'सीता' रख दिया गया है। क्या हमारे देश की लड़कियां वैसा नहीं कर सकती हैं ? क्या उपरोक्त समस्त नाम अत्यंत प्राचीन हैं, और इनमें से किसी का भी चरित्र आधुनिक युग के लिये उपयोगी नहीं है ?
 यदि वैसी कोई बात हो भी, तो एक नाम आज भी ऐसा है, जो उतना पुराना नहीं है; बल्कि यह कहना पड़ेगा कि नया होने के कारण ही अधिकांश लड़कियां उनके विषय में नहीं जानती हैं। उस नाम के पीछे जो चरित्र है, वह उपरोक्त नामों में किसी के साथ भी तुलना करने पर कम गौरव शाली नहीं है। बल्कि और अधिक गौरव-शाली हैं। और उनका गौरव केवल आधुनिक समय का ही नहीं है, बल्कि उस चरित्र की पूर्णता में उन सबका चरित्र की विविध महिमाधारा शूरु से लेकर अंत तक मिल गयी है। उनके चरित्र की व्यापकता और गंभीरता इनमें से अधिकांश नारियों के बहुत आगे निकल चुकी है। अतीत के कोहरे में उनका चरित्र अभीतक धुंधला नहीं हुआ है।
उस नारी का जन्म गाँव में रहने वाले साधारण माँ-पिता के घर में ही हुआ था। पढाई-लिखाई कहने से आजकल जो समझा जाता है, वैसी पढाई लिखाई उनकी नहीं हुई थी। उनका विवाह एक ऐसे व्यक्ति के साथ हुआ था, जो ईश्वर का चिन्तन करने में जगत को भूल जाते थे। उस विवाह के फलस्वरूप उनको एक भी सन्तान नहीं थी, फिर भी वे सचमुच की जगत-जननी बन गयी थीं। वे थीं श्रीरामकृष्ण की सहधर्मिणी सारदा देवी। साधारण ग्रामवासियों की प्रत्यक्ष दृष्टि के सामने ही वे विराजित थीं, अपने घर की गौओं और बछड़ों को खिलाने के लिये जलमग्न दलदल में उगे घांस  को काट कर ले आती थीं,परिवार के लोगों तथा अतिथि-आगंतुकों के लिये अपने हाथों से भोजन बनाती थीं। 
जनता के सामने कभी अपने को बेपर्दा नहीं होने देती थीं, कभी अपने को जगत के सामने प्रदर्शन की वस्तु नहीं बनने देती थीं। तब तक अपने को जगत की दृष्टि के सामने नहीं आने दीं , जब एक दिन उनके निकट उपस्थित एक हीनतम व्यक्ति को भी परमज्ञान का दान कर दीं थीं।मदर मेरी केवल ईशु की माँ ही नहीं थीं, वे तो समग्र ईसाई समाज के लिये जननी स्वरुप थीं। माँ सारदा देवी सम्पूर्ण मानव-जाति की माँ थीं। वे जो सचमुच की माँ थीं, जिन्होंने गाँव-घर की सीमा का अतिक्रमण कर  था। वे केवल किसी एक ही सांसारिक-जन्म की माँ नहीं थीं, वे तो अनन्त जन्मों के लिये हमलोगों की माँ बने रहने के लिये धरा-धाम पर अवतरित हुई थीं। वे किसी ईश्वर-पुत्र संन्यासी को या अकुलीन (base born) डाकू दुर्जन को भी एक ही समान अपना पुत्र समझती थीं।
स्वदेशी आन्दोलन के युग में जब मैनचेशटर में बने वस्त्रों को भारत में वर्जित कर दिया गया, और विदेशी कपड़ों की होली जलाई जा रही थी, तब उनको अपने ब्रिटेन में जन्मे जुलाहे संतानों की चिंता होने लगी। क्योंकि वे उनको भी अपनी ही संतान समझती थीं। इसी एक तर्क के आधार पर किसी भी अंग्रेज को मारने की योजना को कभी अनुमति नहीं दी थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने देश को स्वतंत्र करने के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा तरुणों को देती थी। फिर ब्रिटिश सैनिकों के द्वारा नारियों पर अत्याचार करने की बात को सुनकर तीव्र विरोध करती थीं। वे हृदय से चाहती थीं, कि अंगेज लोग भारत छोड़ कर चले जाएँ। एकबार जब एक उन्मादी व्यक्ति उनको स्पर्श करने की कोशिश करने लगा, तो उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया और बहुत जोर का एक थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया, और उसको जमीन पर पटक दिया, और उसकी छति पर बैठकर अपने हाथों से उसकी जीभ खिंच ली। इसी समय उस व्यक्ति को होश आ गया। 
करुणा की सागर होने पर भी, जो गलत थे उसके प्रति कठोर और निर्मम होना भी वे जानती थी।सामान्य दैनंदिन जीवन में जो कोई भी उनके समीप आया है, उसके भीतर जो बुरे भाव थे उसको नष्ट करके सद्भावों को बढ़ा देती थीं। सर्वभूतों के प्रति करुणा और प्रेम -यही उनकी शिक्षा थी। अपने में भी भावान्तर नहीं करके जो सामने आता था, इसीके जैसे उससे व्यव्हार करती थीं। संन्यासी और गृहस्थ, देवोपम और दुरात्मा, पंडित और मूर्ख, धनी और दरिद्र किसी की भी वे उपेक्षा नहीं करती थीं। अपने सिवा अन्य किसी का दोष मत देखना- यही उनका उपदेश था। अपने ही हृदय में इहलोक और परलोक के आननन्द की प्राप्ति के मार्ग उनहोंने दिखाया था, अर्थात मनुष्य जीवन की परिपूर्णता या मुक्ति के मार्ग के अनुसन्धान का मार्ग बताकर गयी हैं। 
विवेकानन्द जब सारदा देवी से भारत भूमि छोड़ कर विदेश-यात्रा की अनुमति लेने गये थे, उस समय श्रीरामकृष्ण की भविष्य वाणी -नरेन् शिक्षा देगा ! उनके भी गले से आदेश के रूप में ध्वनित हुआ था। सारदा देवी के जन्मस्थान से विश्व के दूरतम देशों के अनगिनत नर नारी उनके चरित्र और उपदेशों से मानवजीवन का तात्पर्य और उद्देश्य का पता प्राप्त किये हैं। उनके उपदेश वर्षों से चले आ रहे निःशब्द अनेको लोगों को सन्मार्ग पर ले कर जा रही है। 
श्रीश्री माँ सारदा देवी का पुण्य चरित्र और उपदेश यदि सम्पूर्ण जगत में प्रचारित नहीं किया गया, तो अन्तर राष्ट्रीय महिला-दशक का उद्देश्य असम्पूर्ण ही रह जायेगा। और यदि ऐसा हो सका तो, केवल नारी समाज  ही नहीं, सम्पूर्ण मानव जाति जीवन संग्राम में और महाजीवन में प्रशांति को खोज निकालेगा।   
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