Tuesday, January 15, 2013

$@$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [62-15 A] "युवा आदर्श : स्वामी विवेकानन्द " (ध्रुव-तारे की खोज)(३.स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज),

 [१६] युवा जीवन का आदर्श
इस बात को कहना आवश्यक नहीं है कि युवा वर्ग के उपर ही देश का भविष्य निर्भर करता है। किन्तु युवा वर्ग के ऊपर ऐसा भरोसा इन सभी प्रश्नों के उत्तर जान लेने पर निर्भर करता है, कि आज के युवा इस बहुमूल्य मनुष्य-जीवन को किस दृष्टि से देखना सीख रहे हैं ? क्या उन्हें इस बात का पता है कि मनुष्य जीवन को दुर्लभ क्यों कहा जाता है ? आज के युवा अपने तथा सम्पूर्ण देश के भविष्य का निर्माण करने के बारे में कितना जागरूक हैं? अपनी पसन्द के अनुसार अपने भविष्य का निर्माण करने के बारे में उनका संकल्प कितना दृढ़ है ? अध्यवसाय के द्वारा अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रति उनमें कितनी निष्ठा है?
एक ओर उनके भीतर जहाँ यौवन की स्वाभाविक चंचलता, अपरिपक्व मानसिकता और मानवीय दुर्बलतायें हैं, वहीँ दूसरी ओर उनके ऊपर परिवेश का हानिकारक प्रभाव भी पड़ता है। वर्तमान समय में ' भारतीय शिक्षा'- कहलाने के योग्य कोई सामाजिक व्यवस्था नहीं है, जो उनके पाशविक-वृति (Animality - आहार,निद्रा, भय, मैथुन) को नियंत्रित करने पद्धति भी सिखला सकती हो । उन्हें ऐसी कोई शिक्षा नहीं दी जाती जिससे उनमें मनुष्य-जीवन के प्रति श्रद्धा जाग्रत हो। उनमें जीवनबोध, 'जीवन' क्या है ?- इसका बोध जाग्रत करा दे। तथा अपने अन्तर्निहित 'मनुष्यत्व ' को उद्घाटित करने के लिये जो आवश्यक गुण होने चाहिये, उन गुणों को विकसित करने में सहायक हो सके।
सस्ते साहित्य, सिनेमा, टी.वी., क्रिकेट (IPL),मोबाईल-इंटरनेट आदि मनोरंजन के जितने भी साधन हैं, स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि वे उनके अमूर्त विचारों को पौष्टिकता (nutrition) प्रदान करने की अपेक्षा क्षति ही अधिक पहुंचा रहे हैं। वर्तमान राजनितिक दल अपने राजनीतिक स्वार्थ को सिद्ध करने के लिये युवाओं के जीवन-गठन या यथार्थ कल्याण के उपर ध्यान न देकर, उन्हें पार्टी का छात्र-नेता बनाकर केवल उनका फायदा उठाते हैं। जो कई कारणों से अक्सर उनके पतन का कारण बन जाता है।(कहीं कहीं तो छात्र-नेताओं की हत्या तक हो जाती है।)
इसके फलस्वरूप
दो पाटों -" एक ओर 'यौवन की स्वाभाविक दुर्बलता' तो  दूसरी ओर 'बाह्य-परिवेश का समस्त हानिकारक प्रभाव" के बीच फंसे युवा वर्ग- के लिये रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर अपने पैरों पर खड़े होना, तथा चरित्र-गठन के पथ पर अग्रसर हो पाना भी कठिन हो जाता है। इस कठिन परिस्थिति से बाहर निकलने का मार्ग क्या है ? जिस प्रकार रात्रि के अंधकार में उत्तर दिशा को जानने के लिये आकाश में 'ध्रुव-तारे' की खोज करनी पड़ती है, ठीक उसी प्रकार यदि हमलोग जीवन-गठन करके यथार्थ मनुष्य बन जाने का मार्ग जानना चाहते हों, तो जीवन में धारण करने योग्य किसी युवा-आदर्श की खोज करनी पड़ेगी। 
यदि हमलोग किशोरावस्था में ही किसी सच्चे युवा-आदर्श को अपने जीवन का ध्रुवतारा बना लें, तो हमलोग उनसे पाशविक-प्रवृतियों को दूर हटाकर, एक उन्नत जीवनबोध (या मनुष्य-जीवन के बारे में एक उच्च दृष्टिकोण) का निर्माण कर
यथार्थ मनुष्य बनने में सक्षम हो सकेंगे। हमलोग स्वयं अपने जीवन के लक्ष्य को निर्धारित कर सकेंगे और दृढ निश्चय के साथ लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते रहने में समर्थ भी हो जायेंगे। युवा-आदर्श या 'Role Model ' ---हीरो ! (फ़िल्मी हीरो नहीं ) किसी ऐसे या अनुकरणीय  व्यक्तित्व को, कहते हैं, जो पूर्णता (perfection या सर्वोत्कृष्टता) के विषय में मानव-मन की उच्चतम धारणा का जीवन्त प्रतिबिम्ब हो। यह एक ऐसा परिपूर्ण (सर्वांग सुन्दर) जीवन-शैली या आदर्श उदाहरण है, जिसको वस्तुतः जीवन में उतारा जा सकता हो, एक आदर्श मिसाल के रूप में सामने रखकर जिसका अनुसरण किया जा सकता हो।
यदि हम अपने अतीत के जीवन को ध्यान से देखें, तो यह बात आसानी से समझ में आ जाती है कि - बचपन से लेकर अभी तक हमने जो कुछ भी सीखा है, लगभग सबकुछ अनुकरण के माध्यम से ही सीखा है। हमलोगों ने बात-चित करना,चलना-फिरना सीखा है, मातृभाषा आदि को सीखा है, तो अनुकरण के माध्यम से ही सीखा है। हमलोगों का आचरण, हमारी शालीनता, यहाँ तक कि हमारा जो एक विशिष्ट प्रकार स्वभाव (Nature) बन गया है, वह भी मुख्यतः जाने-अनजाने किसी आदर्श का अनुकरण के माध्यम से ही गठित हो गया है। इसीलिये बचपन से ही ऐसा कोई आदर्श उदाहरण हमारे सामने अवश्य रहना चाहिए जिसे देख कर हमलोग उन्नत चरित्र के समस्त सद्गुणों - सुन्दर स्वभाव, (दिखावटी नहीं) आन्तरिक विनयशीलता, आन्तरिक शालीनता, आदि सद्गुणों को सीख सकते हों, तथा निश्चित रुप से उन्हें अर्जित भी कर सकते हों।

हमें एक ऐसा आदर्श चाहिये जो सर्वप्रथम हमलोगों को उन्नत जीवनबोध (मनुष्य जीवन क्या है, और इसे सार्थक कैसे बनाया जाता है? ) के बारे में सच्चा दृष्टिकोण निर्मित करने में सहायता कर सके। द्वितीयतः उसमें ऐसे कुछ ऐसे उच्च (पवित्र) भाव भी रहने चाहिये जिसका हमलोग अनुसरण कर सकें। और तीसरी बात उस आदर्श में यह होनी चाहिये कि वह हमलोगों के जीवन-नौका के कर्णधार (मार्गदर्शक नेता) बन कर हमें लक्ष्य की दिशा में, धैर्य और दृढ निश्चय के साथ आगे बढने में हमारी सहायता कर सके, तथा मार्ग में आने वाले खतरों से बचकर निकल जाने में सहायक हो सके।
खतरे कई दिशाओं से आ सकते हैं, हो सकता है कि मन के भीतर ही परस्पर विरोधी आदर्शों के बीच संघर्ष होने लगे, जिसके कारण हमारे आत्मविश्वास, निष्ठा या अध्यवसाय में कमी आने लगे या
सुखभोग की स्वार्थ केन्द्रित प्रवृत्तियाँ फिर से अपना सिर उठाने की चेष्टा करने लगे। इसीलिए हमारे जीवन का लक्ष्य बिलकुल मध्याह्न के सूर्य के जैसा प्रखर और देदीप्यमान होना चाहिये और उसे प्राप्त करने की पद्धति भी हमारे कर्णधार ( आदर्श या मार्गदर्शक नेता) के द्वारा सुविचारित अर्थात पूर्ण विवरण के साथ पूर्व निर्धारित होनी चाहिये। तथा जिस आदर्श को एकबार जीवन का ध्रुवतारा (मार्गदर्शक, नेता या गुरु, मित्र,सखा ) मानकर ग्रहण कर लिया हो, उन्हीं को आजीवन पकड़े रहना चाहिये।
आदर्श कभी एकाधिक नहीं होना चाहिये, ( भारत की धरती तो रत्नगर्भा है, यहाँ बहुत से महापुरुष जन्म लिये है, इसलिए उन सबको नमस्कार करते हुए) हमें बहुत तुलनात्मक ढंग से सोच-विचार करने के बाद ही किसी आदर्श को अपना रोल-मॉडल चुन लेना चाहिए। क्योंकि अनगिनत आदर्शों का अनुकरण करने से कोई भी आदर्श प्राप्त नहीं हो सकेगा। किसी एक आदर्श को जीवन में ग्रहण करना, तथा उसी एक आदर्श के लिये अपने सम्पूर्ण जीवन को न्योछावर कर देना ही जीवन में सफल होने का रहस्य है। क्योंकि कोई व्यक्ति यदि अनेक महापुरुषों को अपना आदर्श माने और थोड़ा थोड़ा कर के सबसे लेने की चेष्टा करे, किन्तु एक ही आदर्श के लिये अपना मन-प्राण न्योछावर कर देने के लिये तत्पर नहीं हो, तो ऐसा व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता। इस बात को भूल जाने से सम्पूर्ण जीवन में भी कोई आदर्श मूर्तमान नहीं हो सकेगा। और जीवन में विफल हो जाने के बाद यदि इस सत्य को आविष्कृत करेंगे तो तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इसीलिये यदि जीवन के खेल में पराजित हो जाने के बाद, विफलता की हताशा जनक परिस्थिति से बचना चाहते हों, तो किशोरावस्था में ही किसी से पूछ कर इन बातों को ठीक से समझ लेना चाहिये।
आदर्श ऐसा होना चाहिये जो हमें चिन्तन करना सीखा सके। जो जीवन मिला है, उसका सदुपयोग कैसे कर सकता हूँ ? जीवन का अर्थ क्या है ? जीवन का लक्ष्य क्या होना उचित है ? इन सभी गंभीर प्रश्नों का उत्तर खोजने में मेरे कर्णधार, मेरे आदर्श ही मुझे राह दिखाएंगे, मेरा मार्गदर्शन करेंगे। जब जीवन का सही अर्थ समझ जाऊंगा, तो उस जीवन को सार्थक करने के लिये मेरे आदर्श मुझे प्रयत्न करने की प्रेरणा देंगे। लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होने के मार्ग में यदि कोई खतरा या जोखिम आयेगा, तो वे सच्चे मित्र की तरह हाथ बढ़ाकर मुझे उस खतरे से उबार लेंगे। इसीलिये युवाओं के आदर्श को ध्रुवतारा के जैसा अपरिवर्तनीय (irreversible), और अग्नि के समान सदा देदीप्यमान होना आवश्यक है।
कोई नेता यदि स्वयं अपने जीवन-आदर्श का अनुसरण नहीं करे, किन्तु दूसरों को उनका अनुसरण करने उपदेश देता रहे, या आदर्श की बातों को पुस्तको से रट कर बोले तो उस समय उसका भाषण हमारे मन को उत्तेजित तो कर सकता है, किन्तु अविचल होकर लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आजीवन प्रयत्न करते रहने के लिये, हमें अनुप्रेरित नहीं कर सकता है। कोई वैसा नेता शास्त्रों के सूक्ष्म तत्वों या संस्कृत के उद्धरण को प्रमाण की तरह  बोलने की चेष्टा करे, किन्तु जिसके असली जीवन में उन सबसे दूर दूर तक कोई नाता नहीं हो, तो वैसे व्यक्ति का कथन श्रोताओं के हृदय को कभी स्पर्श नहीं कर सकता है। क्योंकि वक्ता के वास्तविक जीवन से पृथक्कृत (separated) शस्त्रों के सूक्ष्म तत्व या उद्धरणों में वह शक्ति नहीं होती, जो मनुष्य को उच्चतर जीवन के लिये अनुप्रेरित कर सके।
जिस लीडर के जीवन में उसका आदर्श सम्पूर्ण रूप से प्रकटित होता हो, उसी जीवन के माध्यम से हमलोग आदर्श को सबसे अच्छी तरह प्राप्त कर सकते हैं। क्योंकि हमलोगों का उद्देश्य केवल सभा में भाषण देने के लिये आदर्श के कुछ शब्दों को रट कर बोल देना नहीं है, बल्कि अपने जीवन में उस आदर्श को व्यावहारिक रूप से प्रयोग में लाना है। इस प्रकार का अनुकरणीय जीवन हर समय देख नहीं पाते हैं- तथा वह संभव भी नहीं है। किन्तु कुछ जीवन ऐसे भी हुए हैं, जिस जीवन में आदर्श पूर्णतया प्रकटित हुआ है, जिनका
मरणशील शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी, उनका जीवन हमलोगों सामने जीवन्त होकर विराजता है। ऐसा जीवन (जैसे स्वामी विवेकानन्द,नेताजी सुभाष, दादा आदि का) अग्नि के समान ज्योतिर्मय होता है, जो किसी राष्ट्र को पीढ़ी दर पीढ़ी अनुप्रेरित कर सकता है। ऐसा जीवन कभी बदलता नहीं है।
स्वामी विवेकानन्द के रूप में, ऐसा ही आदर्श हमलोग प्राप्त कर सकते हैं। आज हमलोग जिनको महान व्यक्ति के रूप में जानते हैं, कल वे बदल सकते हैं, और किसी अन्य आदर्श का प्रचार कर सकते हैं। या यह भी हो सकता है कि आज जिनको बहुत महान व्यक्ति समझ रहा हूँ, कल उन्हीं के जीवन में कोई प्रतिकूल या घटिया विचार भी प्रतिबिम्बित होता दिखाई दे। किन्तु विवेकानन्द हर युग के पिछड़े, दबे-कुचले मनुष्यों से सहानुभूति रखने वाले, दिन-दलितों के हमदर्द महावीर हैं, जिनके कंठ से बिना किसी शर्त के सम्पूर्ण मानव-जाति के लिये बन्धनों से मुक्त होने का महा-आह्वान (- उत्तिष्ठत, जाग्रत !) ध्वनित हुआ था। सर्वोच्च आदर्श जिनके जीवन में जीवन्त हो उठा है, जिनका निर्भीक सन्देश आज भी ' बहुजनहिताय', मनुष्य-मात्र को उसके उच्चतम जीवन-आदर्श को प्राप्त करने के लिये अनुप्रेरित करता है। सुदूर अतीत के विस्मृत किंवदन्तीयों में वर्णित लोककथाओं में से उनको खोज कर बाहर नहीं निकलना पड़ता। विवेकानन्द तो यज्ञ में आहुति दी जाने वाली ' होम-शिखा सम ' हैं, 'कोटि-भानुकर-दीप्त-सिंह' हैं।
 [उन्होंने कहा था, " हो सकता है, मुझे यह नश्वर चोला उतर देना पड़े किन्तु मैं चरम आदर्श की तरफ आने के लिये, विश्व के सभी मनुष्यों को अनुप्रेरित करने का काम कभी बन्द नहीं करूँगा। "] उनके जीवनप्रद उद्धरण तथा सन्देश उनकी नाभि से प्रवाहित होकर आजभी किसी विद्युत् के झटके जैसा हमलोगों की अस्थि-मज्जा तक को इस प्रकार झकझोर देती है, कि समग्र सत्ता ही सिहर उठती है। उनके संदेशों को सुनने के लिये भूतकाल की लोककथाओं में जाने की आवश्यकता नहीं होती, उनकी उनकी शक्ति और प्रेरणा अभी और इसी समय हमलोगों के भीतर नये जीवन का संचार कर सकती है। पुरुषत्व (manhood) के संदेशवाहक विवेकानन्द, मनुष्यों की दुर्बलता, (इन्द्रिय-विषयों में आसक्ति को नहीं छोड़ पाने की) हताशा और (बाद में पछताने के)  अवसाद के उपर बज्र बनकर टूट पड़ते हैं। (और उनके अनुज तत्काल विवेक-प्रयोग करके अपने को सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त अनुभव करते हैं।)
विवेकानन्द के बादलों की कड़क के सदृश्य ओजस्वी संदेशों में -सम्पूर्ण मानवजाति के लिये  'आत्मश्रद्धा, आत्मविश्वास तथा त्याग और सेवा' - के आदर्श को उद्घोषित होते हैं। विवेकानन्द ने मनुष्य के भीतर ही ईश्वर का दर्शन किया था। वे कहते थे, " मैं उस ईश्वर का दास हूँ, जिसे लोग अज्ञान के कारण मनुष्य कहते हैं ! " किसी उत्कृष्ट आदर्श में जो भी सद्गुण रहने चाहिये वे सभी गुण उनसे प्राप्त किये जा सकते हैं। और वे कभी बदल भी नहीं सकते है, कभी बूढ़े नहीं हो सकते, क्योंकि " चिर-युवा स्वामी विवेकानन्द " ने मात्र 39 वर्ष की आयु में ही अपने शरीर को त्याग दिया था। इसीलिए वे युवाओं के आदर्श हो सकते हैं।
विवेकानन्द जितना हिन्दुओं के हैं, उतने ही मुसलमानों के भी हैं, उतना ही वे विश्व के अन्य देशों के भी हैं।  वे जितना पुरुषों के लिये हैं, उतना ही नारियों के लिये भी हैं। धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित, भारतीय और अभारतीय -सभी मनुष्यों के लिये वे प्रेरणा के श्रोत हैं। स्वामीजी जिस प्रकार वर्तमान पीढ़ी का मार्गदर्शन कर सकते हैं, उसी प्रकार भावी पीढ़ियों को भी उनके मार्गदर्शन की आवश्यकता रहेगी। इसीलिये स्वामीजी को भूतकाल का नहीं, भविष्य का नेता कहा जाता है। स्त्री हो या परुष, जो भी व्यक्ति मनुष्यत्व प्राप्त करना चाहेगा, उन सबों के पथप्रदर्शक हैं, स्वामी विवेकानन्द। वे चाहते थे कि हमलोग दरिद्र और मूर्ख देशवासियों को ही अपना आराध्य देवता मानें। वे कहते थे, ' मैं उसी को महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये रोता है।'
खाली-पेट सो जाने वाले मनुष्यों को धर्म का उपदेश देना उनकी दृष्टि में पाप था। वे अपने को दार्शनिक या धार्मिक व्यक्ति कहलाना पसन्द नहीं करते थे। वे कहते थे मैं गरीब हूँ, और गरीबों से प्यार करता हूँ। वे कहते थे, मैं जितना भारत का हूँ, उतना ही विश्व का भी हूँ। इसके बावजूद अपने देश के गरीबों की दुर्दशा की बात याद करके अश्रु बहते हुए, कितनी ही रातें बिता देते थे। भारतमाता की करोड़ो संताने, जो ऋषि-मुनियों की वंशधर हैं, किन्तु आज पशुओं की श्रेणी में गिर चुके हैं, यह देखकर उनका हृदय दुःख से व्यथित हो जाता था। वे मानवजीवन की अपूर्णता-अधूरापन और हारे-थके मनुष्य की गरिमा के पतन को सहन नहीं कर सकते थे। उन्होंने राष्ट्र के युवाओं से आह्वान किया था, " आओ भाइयों, हममें से प्रत्येक युवा भारत के करोड़ो-करोड़ पददलित मनुष्यों के लिये दिनरात प्रार्थना करें, जो लोग दरिद्रता, पुरिहितों के अत्याचार और  गुलामी के जंजीरों में जकड़ दिए गये हैं, उनके लिए दिनरात प्रार्थना करें- " हे गौरीनाथ, हे जगदम्बे, मुझे मनुष्यत्व दो ! मेरी दुर्बलता और कापुरुषता दूर कर दो।  माँ मुझे मनुष्य बना दो !"
हे भारत के तरुणों ! हमलोग आज, (राष्ट्रिय युवा दिवस के अवसर पर) तुम्हारे सामने विवेकानन्द को युवा-आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते है। स्वयं अपने अधूरेपन और अपने भाई-बहनों की अपूर्णता को ईमानदारी से अपने अपने हृदय में अनुभव करके देखो। जड़ता (स्वयं को केवल शरीर समझने की रुढ़िवादी मानसिकता, या देहाध्यास के अज्ञान), आलस्य और  जस के तस पड़े रहने काहिली को झटक कर दूर हटा दो। उठो वीर्यवान बनो, निर्भीक बनो। यथार्थ मनुष्य बनने का दृढ़संकल्प लेकर कार्य में उतर पड़ो। (मन के साथ) संघर्ष के पथ पर अग्रसर हो जाओ। स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता करो। विवेकानन्द को यह उत्तदायित्व अपने गुरु श्रीरामकृष्ण से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ था, और उसी जिम्मेदारी को, उसी व्रत को तुम युवाओं को सौंप गए हैं।
यदि हमलोग उनको अपने जीवन का आदर्श के रूप में ग्रहण करेंगे, तो वे हमारी अनुभव-शक्ति, बुद्धि शक्ति और कर्म-शक्ति को जाग्रत कर देंगे। इसप्रकार 3H की शक्ति को विकसित कर हमलोग यथार्थ मनुष्य बन सकेंगे, और परिवेश का जो प्रभाव हमारे जीवन को अवनत बनाये रखने (भेंड बनाय रखने) में प्रयत्नशील है, उस वायु-मण्डलीय दबाव या प्रभाव को अस्वीकार हमलोग अपने जीवन की संभावनाओं  (अपने सिंहत्व) को प्रस्फुटित करने में समर्थ हो जायेंगे। इसप्रकार एक योग्य नागरिक बनकर इन शक्तियों के द्वारा देश के करोड़ो करोड़ नर-नारियों के कल्याण में अपने जीवन को न्योछावर कर सकेंगे।
वे हमें एक सुस्पष्ट जीवनबोध (मनुष्य जीवन का लक्ष्य) देंगे, और जीवनगठन की पद्धति हमें देंगे। कोई खतरा या संकट आने पर वे एक सच्चे मित्र की तरह पास में आकर खड़े हो जायेंगे। सामाजिक परिवेश की तरफ से और अपने मन के ही भीतर से अनगिनत बाधा-विघ्न आयेंगे- संशय, गन्दे-अपवित्र विचार, इन्द्रिय-विषयों में सुख पाने की प्रवृत्ति नहीं छोड़ पाने की दुर्बलता- हताशा- अवसाद, नाम, यश, धन-लोलुपता, इनके अतिरिक्त बाहर से आने वाले अन्य कई प्रकार के प्रलोभन (स्वयं को देह समझना -भेंडत्व या M/F का देहाध्यास द्वारा) भी आयेंगे जो हमारी विवेक-शिखा को बुझा देने का प्रयास करेंगे। किन्तु हमलोग यदि स्वामी विवेकानन्द को अपना मित्र- शिक्षक-परामर्शदाता बना लें तो कोई भी शत्रु हमारे सामने अपराजेय बनकर खड़ा नहीं रह सकता। हम सर्वदा अपने लक्ष्य को बिल्कुल स्पष्ट रूप से देख सकेंगे, उस मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ते रहेंगे, तथा क्रमशः हम अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे।
वर्तमान समय में स्वामी विवेकानन्द से उत्कृष्ट युवा-आदर्श और कोई नहीं है। विशेष रूप से जो युवक देश से प्यार करते हैं, जो नया भारत गढ़ने का हौसला रखते हैं, और इसके लिये अपने जीवन को भी न्योछावर कर देना चाहते हैं, जो जंग लगकर मरने के बजाय घिस कर मरना या वीर की तरह लड़ते हुए मर जाना अधिक पसन्द करते हैं, जो मनुष्य जीवन का अर्थ जानना चाहते हैं, जो पशुओं के जैसा बोझा ढोते रहने वाले जीवन से घृणा करते है, जो युवा अनियंत्रित अविनीत, मुंहजोर और धृष्ट होकर बाहरी गंदे परिवेश का गुलाम बने रहने को ही जीवित होने की पहचान नहीं मानते, वैसे युवाओं के लिए यह स्वामी विवेकानन्द रूपी युवा-आदर्श अतुलनीय और अद्वितीय है। इसलिए भाइयों- उठो, जागो! इस आदर्श को जीवन में ग्रहण करो, और अपने लक्ष्य को प्राप्त किये बिना विश्राम मत लो। निर्भीक बनो। सारी धुंध मिट जाएगी। जीवन सूर्य की उज्ज्वल रौशनी से जगमगा उठेगा।
['तमसो मा ज्योतिर्गमय' हे सूर्य! हमें भी अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो,जब सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है, तो बहुत से पर्व प्रारम्भ होने लगते हैं। इन्हीं दिनों में ऐसा प्रतीत होता है कि वातावरण व पर्यावरण स्वयं ही अच्छे होने लगे हैं। कहा जाता है कि इस समय जन्मे शिशु प्रगतिशील विचारों के, सुसंस्कृत, विनम्र स्वभाव के तथा अच्छे विचारों से पूर्ण होते हैं।स्वामी विवेकानन्द का जन्म भी 12 जनवरी 1863 ई., सोमवार, मकर-संक्रांति के दिन प्रात:काल सूर्योदय के किंचित् काल बाद 6 बजकर 49 मिनट पर हुआ था।स्वामीजी का जन्म एक ऐसे समय हुआ जब ऊर्जा का संचार करने वाले महान व्यक्ति की देश में आवश्यकता थी।]  
 यही विशेष कारण है, जो सूर्य की उत्तरायण गति को पवित्र बनाते हैं और मकर संक्रान्ति का दिन सबसे पवित्र दिन बन जाता है।क्रांति का अर्थ है परिवर्तन। पर जब यही परिवर्तन किसी सार्थक दिशा में हो, तो उसे संक्रांति कहा जाता है। किसी ने जुए या शराब की आदत पकड़ ली और इस चक्कर में अपना घर-परिवार बरबाद कर डाला, तो यह भी क्रांति ही हुई; पर यदि उसने इन्हें छोड़ दिया, तो यह संक्रांति हुई।
 आज युवा दिवश है, 12 जनवरी 2013 को हम उनकी 150 वीं जयंती मना रहे हैं, आज का युवा 'दुर्बलता, हताशा और अवसाद ' से ग्रस्त हो चूका है। कौन ऐसा आदर्श है जो उनको इस अवसाद के गर्त से उबार सकता है ? यहाँ सभा में वे बच्चे बैठे हैं, जिन्हों ने रैली में भारत में जन्मे सर्वोत्कृष्ट आदर्श नर-नारियों के रूप में झांकी निकाली थी। यहाँ 'गांधीजी,कोबी गुरु रोबिन्द्र्नाथ, बाला साहेब अम्बेडकर ' और श्रीरामकृष्ण, अमर  सिंह राठौर, भगत सिंह,  नेताजी,और विवेकानन्द,उपस्थित हैं तो दूसरी ओर 'भारत-माता ', कस्तूरबा, झाँसी की रानी, और श्रीश्री माँ सारदा भी उपस्थित हैं। युवादिवस के मौके पर अब - कोई राष्ट्रिय ' युवा- आदर्श ' चुन लेने का समय आ गया है।]

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