Monday, October 15, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [28] ' युवा मानसिकता के अनुसार धर्म और नैतिकता ' (धर्म और समाज),

 ' खोज की वस्तु के रूप में धर्म- श्रेष्ठतम व्यायाम है' 
यह प्रश्न युवाओं तथा समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के बीच, चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है कि,वर्तमान युग के परिपेक्ष्य में जहाँ मनुष्य चन्द्रमा और मंगल ग्रह पर जाने बात कर रहा हो, वहाँ  धर्म और नीतिशास्त्र जैसी बातों की कोई उपयोगिता है भी या नहीं ? क्योंकि बहुत से युवा ऐसा मानते हैं कि धर्म तो बुढ़ापे की चीज है, तथा जवानी केवल अर्थ उपार्जन तथा भोग करने के लिये मिलता है। मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थों-धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष में से केवल दूसरे और तीसरे पुरुषार्थ (अर्थ और काम) को ही युवा लोग विशेष महत्व देते हैं। किन्तु मनुष्य जीवन में इनमें से प्रत्येक की आवश्यकता, इनके अनुक्रम के अनुसार होना वांछनीय है, तथा प्रथम पुरुषार्थ धर्म को ही बुनियाद बनाकर ही इसी जीवन में शेष तीनों  को भी प्राप्त करना होगा, नहीं तो जीवन की सार्थकता को खोकर नैराश्य का भोग करना पड़ेगा।
जीवन-गठन या मनुष्यत्व प्राप्ति का मूल उपादान हैं-धर्म और नैतिकता।  किन्तु अधिकांश युवाओं के मन में धर्म या नैतिकता शब्द सुनने मात्र से ही एक प्रतिकूल या अश्रद्धा का भाव जाग्रत हो जाता है; इसके दो कारण हैं। पहला है, पाश्चात्य शिक्षा, जिसके फलस्वरूप युवाओं में आयातित शिक्षा एवं विचारों को नकल करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। चमक-दमक से परिपूर्ण सस्ते मनोरंजन की और मन का झुकाव अधिक रहने के कारण उन्होंने बहुमूल्य मनुष्य-जीवन में श्रद्धा को खो दिया है। किसी गहरे तात्विक सिद्धान्त (वेदान्त के चार महावाक्य आदि) को विवेक की सहयता से विचार-विश्लेषण करने के बाद ग्रहण करने की क्षमता आज के अधिकांश युवाओं में नहीं है। एक वाक्य में कहें तो पाश्चात्य शिक्षा ने हमारे देश के युवाओं के मन को निरन्तर बहिर्मुखी, स्वार्थपर और इन्द्रिय-परायण रहना सिखा दिया है। 
और दूसरा कारण है, कुछ वैसे लोग जो स्वयं धर्म या नीतिबोध में प्रतिष्ठित नहीं हुए है, अर्थात जिनके मन, वचन और कर्म में एकरूपता नहीं है, जिनकी कथनी और करनी एक नहीं है, वैसे लोग TV पर बैठकर आम जनता के सामने जब,धर्म और नैतिकता को समझाने के लिये भागवत-रामायण के ऊपर प्रवचन देने लगते हैं, तो श्रोताओं का मन और भी ज्यादा भ्रमित हो जाता है। एक श्रेणी के तथाकथित शिक्षित और पण्डित श्री-श्री लोग जब तर्क और वाकचातुर्य के कौशल से धर्म पर प्रवचन देकर भी  सामान्य जनता का शोषण करते हैं, तो वह सब देखने-सुनने से युवा मन धर्म के प्रति श्रद्धा रहित हो गया है।  [क्योंकि वे त्याग और सेवा को समझाने के लिये उदाहरण तो देते हैं श्री रामकृष्ण-स्वामी विवेकानन्द का किन्तु ; "आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार श्रीरामकृष्ण परमहंस हैं, जो राम जो कृष्ण वही रामकृष्ण हैं ! इस बार दोनों एक साथ, किन्तु वेदान्त की दृष्टि से नहीं, बिल्कुल साक्षात् !" -इस रहस्य को समझाने के लिये वे लोग वचनामृत-लीलाप्रसंग से वेदान्त के महावाक्यों की व्याख्या करने के बजाय, तथाकथित कथाकार लोग अभी भी वही पुराने -'भागवत-रामायण' सुनाते रहते हैं।] इसके लिये युवाओं के उपर दोषारोपण नहीं किया जा सकता है।
शास्त्र-ग्रंथों का पाठ करना, पूजा, नैवेद्य आदि समर्पित करना ये सब कर्म-काण्ड धर्म के उपरी आवरण हैं।धर्म का वास्तविक अर्थ चरित्र, सत्यनिष्ठा, पवित्रता, स्वार्थ-शून्यता, प्रेम और भय-शून्यता है- किन्तु इन बातों को युवाओं से कोई नहीं कहता। वर्तमान युग में अर्थात उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम भाग में केवल श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द की संयुक्त सत्ता ने अपने जीवन के द्वारा दिखलाया है कि धर्म, आध्यात्मिकता या नीतिबोध किसे कहते हैं! जिस प्रकार कोई वैज्ञानिक लैबोरोट्री में निरिक्षण-परिक्षण करने के बाद किसी तात्विक सिद्धान्त का पर पहुँचते हैं, ठीक उसी प्रकार इस उभय-सत्ता ने भी बुद्धि, हृदय एवं व्यावहारिक कार्यसाधक शरीर के संतुलित विकास के माध्यम से धर्म को अपने जीवन में मूर्तमान बनाकर हमलोगों को दिखलाया है।
वर्तमान समय में कई लोग  ऐसा सोचते हैं कि भारतवर्ष के अधोगति का मूल कारण धर्म है, तथा भारत की उन्नति एवं प्रगति के मार्ग में धर्म ही मुख्य बाधा है। जो लोग ये सब बातें किया करते हैं, शायद उन्होंने भारत के इतिहास को सही ढंग से नहीं पढ़ा है, या सच्चा धर्म या आध्यात्मिकता क्या है, उस सम्बन्ध में उनलोगों की कोई धारणा ही नहीं है। धर्म के नाम पर शोषण अतीत में था, वर्तमान में भी है, और भविष्य में भी रहेगा; किन्तु इसके लिये धर्म को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। जो लोग, धर्म को समझे बिना उसे अपने राजनितिक स्वार्थ को पूरा करने का साधन बना लेते हैं, वे लोग ही असली दोषी हैं। धर्म कितना अधिक महत्वपूर्ण और चरित्रनिर्माणकारी वस्तु है, वह तो केवल ईसा, बुद्ध, चैतन्य, मोहम्मद या श्रीरामकृष्ण के जीवन का तुलनात्मक अध्यन करने से ही प्रमाणित होता है। इनके विचार और उपदेश आज हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी जगत के बहुत से लोगों प्रेरणा दे रहे हैं।
धर्म शब्द धृ -धातु से निकला है, जिसका अर्थ है 'धारण' करना या 'पकड़े रखना'- एक स्व-प्रकाश अखण्ड चैतन्य-शक्ति हमलोगों की व्यक्तिगत सत्ता (अहं या नाम-रूप) को धारण किये हुए है। जब कोई व्यक्ति धर्म का पालन उसके स्वाभाविक, सनातन अर्थ में करेगा, तो यही प्रमाणित होगा कि देवत्व (दिव्यता या ब्रह्मत्व) ही मनुष्य का जन्मजात स्वाभाव है। किन्तु अभी वह मन की गुलामी कर रहा है, इसीलिये उसे इस सत्य का अनुभव नहीं हो रहा है। व्यक्तिगत जीवन में मूल सत्ता की अपने यथार्थ स्वरूप की अनुभूति कर लेना ही धर्म है। जिनकी दृष्टि केवल आहार,निद्रा और वंशविस्तार तक ही सीमित है, तथा जो लोग केवल तूच्छ इन्द्रियसुखों से ही तृप्त हैं, उनके लिये सचमुच धर्म और नैतिकता की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु जिनके मन में जीवन का मूल्यबोध जाग्रत हो चूका है, जो लोग उत्कृष्ट जीवन प्राप्त करने करने की अभिलाषा से भूमा-आनन्द (ब्रह्म या बृहत आनन्द ) का स्पर्श पाना चाहते हैं, वे कभी तुच्छ इन्द्रिय सुखों से तृप्त नहीं हो सकते हैं, उनके मन में धर्म और नैतिकता का प्रश्न उठेगा ही।
स्वामी विवेकानन्द ' धर्म कि आवश्यकता ' विषय पर व्याख्यान देते हुए कहते हैं- " धर्म से हमलोग ठोस सत्यों और तथ्यों को पाने के अतिरिक्त, उससे मिलने वाली सान्त्वना के अतिरिक्त, एक प्योर साइंस और खोज की वस्तु के रूप में धर्म, एक सर्वोत्कृष्ट और श्रेष्ठतम व्यायाम भी है। अनन्त-असीम की खोज करना, असीम को पाने के लिये दिन-रात एक कर देना, मैटर (शरीर-मन) की सीमाओं का अतिक्रमण करके एक अध्यात्मिक-मानव के रूप में विकसित हो जाना -- मानो अनन्त को अपनी सत्ता के साथ एकीकृत करने का यह प्रयास - ही मनुष्य को उसके सर्वोच्च गौरव और महानता में उपनीत कर देता है। " (2/197-98)
स्वामि विवेकानन्द आगे कहते हैं- " ... बाह्य प्रकृति को जीत लेना कितना अच्छा है, कितना भव्य है। किन्तु उससे असंख्य गुना अच्छा और भव्य है, अन्तः प्रकृति पर विजय प्राप्त करना। जिन समस्त नियमों (यम-नियम,प्रत्याहार-धारणा आदि) से मनुष्य के मनोवेग, भावनायें और इच्छायें नियंत्रित होती हैं-को जान लेना, अनंत गुना अच्छा और भव्य है।" २/१९७
यह जो अपरिवर्तनशील सत्य का अन्वेषण करने की शिक्षा-पद्धति है, वह सम्पूर्णतया धर्म के अन्तर्गत ही आती है। इसीलिये मनुष्य-निर्माण तथा चरित्र-गठन करने के लिये धर्म और नैतिकता की अनिवार्यता की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। विवेक-प्रयोग के द्वारा श्रेय-प्रेय का निर्णय लेने की क्षमता, तथा सार्वजनिक कल्याण की भावना का जन्म केवल धर्म और नैतिकता के प्रशिक्षण द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। त्याग की बुनियाद पर ही नैतिकता प्रतिष्ठित है।आज तक,किसी भी काल में ऐसी कोई भी नैतिकता  प्रचलन में नहीं आयी है, जिसके जड़ में त्याग की भावना नहीं हो। श्रीरामकृष्ण का यह उपदेश-  'नाहं नाहं, तुहूँ तुहूँ '- ही नीतिशास्त्र का शाश्वत सन्देश है "
" नीतिशास्त्र सदा कहता है -(परहित सरिस धर्म नहीं भाई !)' मैं नहीं, तू।' इसका उद्देश्य है- ' स्व नहीं, निः स्वः' अर्थात स्वार्थपरता नहीं स्वार्थशून्यता। इसका कहना है असीम सामर्थ्य और असीम आनन्द को प्राप्त करने के चक्कर में मनुष्य जिस निरर्थक व्यक्तित्व की धारणा से चिपटा रहता है, उस आसक्ति का त्याग करना ही पड़ेगा। तुमको अपने को सबसे पीछे रखते हुए, दूसरों को प्रमुखता देनी होगी। हमारी इन्द्रियाँ कहती हैं, ' अपने को आगे रखो ', पर नीतिशास्त्र कहता है- ' नहीं-अपने को सबसे अन्त में रखो।'इस तरह नीतिशास्त्र का सम्पूर्ण विधान त्याग पर (नश्वर संसार के प्रति आसक्ति या लालच को खत्म करने पर) ही आधारित है, लालच को बढ़ाने या स्वार्थ की रक्षा करने के ऊपर नहीं। " (२/१९५-९६)
"इस तरह मिथ्या-अहं का पूर्ण उच्छेदन (डी -हिप्नोटाइजेशन) ही नीतिशास्त्र का आदर्श है। किन्तु लोगों से जब यह कहा जाता है कि तुम अपने मिथ्या व्यक्तित्व का हनन करो, या उसकी कोई चिंता न करो (सिग्नेचर करके उसे रद्दी की टोकरी में फेंकते रहो) तो वे भय से शिहर उठते हैं। उसके विनष्ट होने के प्रति अत्यन्त भयभीत से हो जाते हैं। " 
तथापि, जिन्हें स्वयं अपने यथार्थ स्वरुप का कोई ज्ञान नहीं है,वैसे व्यक्ति भी नीतिशास्त्र के उच्चतम आदर्श (त्याग और सेवा) के उपर भाषण देने लगते हैं, और उसका प्रचार करना चाहते हैं। उनके स्वयं की कथनी और करनी में कोई तालमेल नहीं होता, फिर भी  (९ बच्चों का बाप होकर भी) दूसरों को शिक्षा देते हुए कहते हैं कि- ' तुम्हें नैतिक नियमों (ब्रह्मचर्य आदि यम-नियमों) का पालन करना चाहिये, समाज का कल्याण करना चाहिये।' वे लोग इस बात पर थोड़ा भी विचार नहीं करते, कि समस्त नीतिशास्त्र का लक्ष्य या उनका अन्तर्निहित भाव एक ही है, और वह है- अहं का नाश, उसकी वृद्धि नहीं। "(२ /१९७-९८ )इसी 'अहं' की विलुप्ति का साक्षात् दर्शन हमलोग श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द-(नवनी दा?) के जीवन में कर सकते है। 
स्वामीजी कहते हैं, " धर्म तथा आध्यात्मिकता से उत्पन्न राजनीति और नैतिक नियमों का कार्य-क्षेत्र या परिधि समष्टि मनुष्य के समग्र पहलू हैं, इसीलिए व्यक्तिगत क्षेत्र में प्रयुक्त होने से भी,उसका सम्बन्ध असीम से हो जाता है। समाज भी उसी के अंतर्गत आ जाता है, क्योंकि समाज व्यक्तियों के समूह का ही नाम है। इसलिये जिस प्रकार यह नियम व्यक्ति और उसके अनन्त के सम्बन्ध पर लागू होता है, ठीक उसी प्रकार समाज पर भी लागू होता है। इसलिये समाज किसी भी समय में जैसी भी अवस्था में क्यों न हो, यह सब (शिक्षा,धर्म , नैतिकता) सामाजिक क्षेत्र में -इसी भौतिक संसार में प्रयुक्त होने की वस्तुएं हैं।" 
इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि मानव-जाती के लिये धर्म और नैतिकता की आवश्यकता आज भी है, और सदैव रहने वाली है। वर्तमान युग में तो इसकी प्रयोजनीयता और अधिक बढ़ गयी है, क्योंकि सामाजिक-क्रांति के द्वारा, राष्ट्र-निर्माण का मूल उपादान युवा-शक्ति की भूमिका ही है। 
अतः आज के युवा भी यदि धर्म और नैतिकता को त्याग कर, अर्थात अपना चरित्र-निर्माण किये बिना ही, देश-सेवा और समाज-सेवा के कार्य में कूद गये, तो हमलोग भी, मानव-प्रेमी या देश-प्रेमी नहीं बनकर इन्हीं चन्द तथाकथित राजनैतिक नेताओं के जैसा स्वार्थ-अन्वेषी, दल-प्रेमी, या सम्प्रदाय-प्रेमी बन जायेंगे। क्योंकि केवल सच्चा धर्म और नैतिकता से ही मानव-कल्याण के प्रति सामग्रिक उदार दृष्टि प्राप्त  हो सकती है। 
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हमलोग यह देख सकते हैं, कि " जो प्राणी जितना ही निम्न स्तर का होगा, उसे इन्द्रियजनित  सुखों में उतना ही आनन्द मिलेगा। बहुत कम मनुष्य ऐसे मिलेंगे, जिन्हें भोजन करते समय वैसा ही उल्लास होता है, जैसा किसी कुत्ते या भेड़िये को। किन्तु याद रहे कि कुत्ते और भेड़िये के सारे सुख इन्द्रियों तक ही सीमित हैं। निम्न कोटि के मनुष्यों को इन्द्रियजनित सुखों में ही आनन्द मिलता है। किन्तु जो लोग सुसंस्कृत और सुशिक्षित हैं, उन्हें चिन्तन, दर्शन, कला और विज्ञान में आनन्द मिलता है। "(2/199)

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