Thursday, October 25, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [33] 'शक्ति पूजा और लोकाचार' (धर्म और समाज),

 'क्या दुर्गा पूजा एक त्यौहार मात्र है?'
स्वामी विवेकानन्द द्वारा अमृतत्व (अमरत्व) के विषय पर अमेरिका में दिये गए एक सन्देश को हमलोग थोडा ध्यान पूर्वक सुनें, और मन ही मन इसके उपर चिन्तन करते हुए इसे समझने चेष्टा करें- वे कहते हैं, " तुम, मैं अथवा ये समस्त आत्मायें क्या हैं ? तुम और हम उसी विराट विश्वव्यापी चैतन्य या प्राण या मन के अंश-विशेष हैं, जो हम में क्रमसंकुचित या अव्यक्त अवस्था में हैं। और हम घूमकर, क्रम-विकास की प्रक्रिया के अनुसार उस विश्व-व्यापी चैतन्य में पुनः वापस लौट जायेंगे। लोग उसी विश्व-व्यापी चैतन्य को प्रभु, भगवान, ईसा, बुद्ध या ब्रह्म कहते हैं- भौतिकतावादी उसीकी शक्ति (उर्जा) के रूप में उपलब्धि करते हैं। तथा अज्ञेय वादी लोग उसी की उस अनन्त अनिवर्चनीय सर्वातीत पदार्थ के रूप में धारणा करते हैं, और हम सभी लोग उसी के अंश हैं। "२/१२६ 
हमलोग भौतिक जगत के भोगों में- 'कामुकता और कमाई' में जितना अधिक मदहोश (हिप्नोटाइज्ड)रहेंगे
उस विश्व-व्यापिनी शक्ति से उतना ही अधिक विलग होते जायेंगे । और शक्ति से जितना अधिक विच्छिन्न होंगे, उतने ही अधिक दुर्बल होते जायेंगे। दुर्बल होने के कारण ही हमलोगों की ऐसा दुःख-दारिद्र्य भोगना पड़ रहा है। सुख या आनंद इन्द्रिय-विषयों के भोग करने से प्राप्त नहीं होता, वास्तव में शक्ति ही परमानन्द प्रदान करती हैं। (नशा शराब में होता -तो नाचती बोतल ! ) दुर्बल होने के कारण ही हमलोग परमानन्द प्राप्त करने के अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित हो जाते हैं।
हमलोगों के राष्ट्रीय जीवन के विकास को, भारत के जन-साधारण के निजी जीवन में शक्ति के नाश ने ही, हजारों वर्षों तक रुद्ध किये रखा है। इसीलिये स्वामीजी बार बार कहते हैं, हमलोगों के लिए इस समय शक्ति पूजा की घोर आवश्यकता है। इस शक्ति पूजा का तात्पर्य कोई पौराणिक या या तांत्रिक आचार-अनुष्ठान नहीं है, या इसके साथ 'हिन्दूओं के योग ' वाली बात भी नहीं है। [संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के आग्रह पर २१ जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग-दिवश घोषित कर दिया है। किन्तु योग का अर्थ केवल शरीर का रोग दूर करने वाले विभिन्न आसन ही नहीं है।] योग का वास्तविक अर्थ है, उसी विश्व व्यापिनी शक्ति के साथ योग -'एकत्व की अनुभूति' को बढ़ाने की चेष्टा करना। आज वैसी शक्ति पूजा का आयोजन कहाँ हो रहा है ?
स्वामी विवेकानन्द किस प्रकार की शक्ति पूजा का आयोजन करना चाहते थे ?  यह उन्हीं के मुख से भारती की संपादिका को २४ अप्रैल १८७९७ को लिखित पत्र से सुना जाये, " इसी जीवात्मा में अनन्त शक्ति अव्यक्त भाव से अन्तर्निहित है, चींटी से लेकर ऊँचे से ऊँचे सिद्ध पुरुष तक सभी में वह आत्मा विराजमान है, और अन्तर जो कुछ है वह केवल प्रकाश (अभिव्यक्ति) के तारतम्य में है। कैवल्यपाद में है -'वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत "- किसान जैसे खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दूसरे खेत में चला जाता है , वैसे ही आत्मा भी आवरण टूटते ही प्रकट हो जाती है । उपयुक्त अवसर और उपयुक्त देश-काल मिलते ही उस शक्ति का विकास हो जाता है। परन्तु चाहे विकास हो, चाहे न हो, वह शक्ति प्रत्येक जीव में -ब्रह्मा से लेकर घास तक में - विद्यमान हैं ! इस शक्ति को, सर्वत्र  घर घर जाकर जगाना होगा । " वैसी  शक्ति पूजा कहाँ हो रही है ?
यहाँ क्या हो रहा है ? पुराने ढांचे (frame) के उपर कादो-माटी का नया लेप चढ़ाया जा रहा है। कहा जा रहा है - "दुर्गापूजा का धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है (?), यह तो एक त्यौहार है- आइये हमलोग इसको अपने मन-मर्जी के अनुसार फ़िल्मी भक्ति-गीत आदि के साथ डी.जे. के धुन पर नाचते-गाते मना लेते हैं।" इन दिनों इसी प्रकार की मानसिकता के साथ शक्ति की पूजा करने का आह्वान अधिक सुनाई देती है। किन्तु जिस प्रकार पुराने पोथी-पत्री को निचोड़ने से कोई नई वस्तु प्राप्त करना कठिन होता है,  वैसे ही अपने मनमर्जी के अनुसार दुर्गोत्सव मनाने की इस नई प्रवृत्ति से कोई शक्ति प्राप्त होने वाली नहीं है। यदि हम सचमुच मनुष्य का कल्याण करना चाहते हों, तो इस युग में हमलोगों को नये शास्त्र का अनुसरण करना ही होगा। नये रूप में शक्ति पूजा का आयोजन करना होगा, यह आयोजन किस प्रकार करना होगा ? इसका जो निर्देश विवेकानन्द ने दिया है, उसे हम उनकी रचना 'चिन्तनीय बातें' के अलोक में प्राप्त कर सकते हैं।
" सनातन हिन्दुधर्म का गगनचुम्बी मन्दिर है - उस मन्दिर के अन्दर जाने के मार्ग भी कितने हैं ! और वहाँ है  क्या नहीं ? वेदान्त के निर्गुण ब्रह्म से लेकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, चूहे पर सवार गणेशजी, छोटे देव-देवियाँ- जैसे षष्ठी, सोने की ईंटें इत्यादि तथा और भी न जाने क्या क्या वहाँ मौजूद हैं। फिर वेद, वेदान्त, दर्शन, पुराण, तंत्र, में बहुत सी सामग्री है, जिसकी एक एक बात से भव-बंधन टूट जाता है। 

और लोगों की भीड़ का तो कहना ही क्या, तेंतीस करोड़ लोग उस ओर  दौड़े रहे हैं। मुझे भी उत्सुकता हुई, मैं भी दौड़ने लगा।  किन्तु यह क्या? मैं तो जाकर देखता हूँ एक अद्भुत काण्ड !! 
कोई भी मन्दिर के अन्दर नहीं जा रहा है, प्रवेश-द्वार के सामने ही एक पचास सिर वाली, सौ हाथ वाली दो सौ पेट वाली और पाँच सौ पैर वाली मूर्ति खड़ी है।  उसी के पैरों के नीचे सब लोट-पोट हो रहे हैं। एक व्यक्ति से कारण पूछने पर उत्तर मिला, " भीतर जो सब देवता हैं, उनको दूर से ही लोट-पोट लेने से ही या दो फूल फेंक देने से ही उनकी यथेष्ट पूजा हो जाती है। असली पूजा तो इनकी होनी चाहिये जो दरवाजे पर विद्यमान हैं; और जो वेद, वेदान्त, दर्शन, पुराण, और शास्त्र सब देख रहे हों, उन्हें कभी कभी सुन ले, तो भी कोई हानी नहीं, किन्तु इनका हुक्म तो मानना ही पड़ेगा। " 
तब मैंने फिर पूछा, ' इन देवताजी का भला नाम क्या है ? ' उत्तर मिला, ' इनका नाम है -लोकाचार ' और मुझे लखनऊ के ठाकुर साहब की बात याद आ गयी, " शाबाश ! भई लोकाचार !! ....शबाश ! बाबा येजिद, देवता तो तू ही है ! सरउ  का अस मार मारेउ कि ई सब अबहिन तलक रोवत है !!" 
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" बीज का ही वृक्ष होता है,बालू के कण का नहीं। पिता ही पुत्र होता है, मिट्टी का ढेला नहीं। अब प्रश्न है कि यह क्रमविकास किसका होता है ? बीज क्या था ? वह बीज ही उस वृक्ष के रूप में था । इसीको क्रमसंकोच कहते हैं। जब तुम अनेक को देखते हो, तब तक तुम अज्ञानता (हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड) में हो। ' इस अनेकतापूर्ण जगत में जो उस एक को , इस परिवर्तनशील जगत में जो उस अपरिवर्तनशील को अपनी  आत्मा की आत्मा के रूप में देखता है, अपना स्वरूप समझता है , वही मुक्त है , वही आनंदमय है, उसीने लक्ष्य की प्राप्ति की है। अतएव यह जानलो कि तुम्हीं जगत के ईश्वर हो -तत्त्वमसि ! 
यदि सैकड़ों सूर्य पृथ्वी पर गिर  पड़ें , सैकड़ों चन्द्र चूर चूर हो जाएँ, एक के बाद एक ब्रह्माण्ड विनष्ट होते चले जाएँ , तो भी तुम्हारे लिए क्या ? पर्वत की भांति अटल रहो ; तुम अविनाशी हो । कहो "शिवोSहं ,शिवोSहं-मैं पूर्ण  
सच्चिदानन्द हूँ । " पिंजड़े को तोड़ डालने वाले सिंह की भाँति तुम अपने बन्धन (कामुकता और कमाई में आसक्ति ) को तोड़कर सदा के लिए मुक्त हो जाओ ! " २/१३१ 

" ईश्वर माँ है। हमलोग धन, सम्पत्ति और इन सभी चीजों की खोज में डूबे हुए हैं; किन्तु एक समय ऐसा आएगा, जब हम जाग उठेंगे; और जब यह प्रकृति हमें और खिलौने देने का प्रयत्न करेगी तब हम कहेंगे, ' नहीं, मैंने बहुत पाया, अब मैं ईश्वर के पास जाऊंगा।' (10/42)
" भाई, शक्ति के बिना जगत का उद्धार नहीं हो सकता। क्या कारण है कि संसार के सब देशों में हमारा देश ही सबसे अधम है, शक्तिहीन है, पिछड़ा हुआ है ? इसका कारण यही है है कि वहाँ शक्ति की अवमानना होती है। ...जीती जागती दुर्गा को छोड़ कर मिटटी की दुर्गा पूजने चले हो ? भाई, जीती जागती की पूजा कर दिखाऊंगा, तब मेरा नाम लेना 2/360  
ভালো থাকা ভালোবাশা, ভালো মনে কিছু আশা , বেদোনার দুরে থাকা, সখস্মৃতি ফিরে দেখা, বোধন থেকে বরণ -ডালা , বিজয়া মানে এগিয়ে চলা ! সুভো বিজয়া!]
["One must propitiate the Divine Mother, the Primal Energy, in order to obtain God's grace. God Himself is MahAmAyA, who deludes the world with Her illusion
 and conjures up the magic of creation, preservation and destruction." Sriramakrishna]
 




Tuesday, October 23, 2012

$&$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [32] प्रकृति का प्रतिशोध ( 'क्षमा और अविरोध' )(धर्म और समाज),

  'बदला लेने की प्रवृत्ति का नष्ट होना मनुष्य बनना है'  
[शक्तिशाली (हृदयवान का) क्षमा और अविरोध देवत्व है !]
मनुष्य और पशु दोनों में, प्रतिशोध लेने की एक पाशविक-प्रवृत्ति लगभग एक जैसी ही विद्यमान रहती है। हिन्दी में प्रचलित कहावत है-'जैसे को तैसा '। अंग्रेजी में कहावत है-'दाँत के बदले जबड़ा '। (एक प्रचलित गर्वोक्ति है-"To revenge is mean not mentioned in my policy.") आज कल सुना जा रहा है- " खून के बदले खून।" किन्तु, यह बदला लेने की प्रवृत्ति क्या सचमुच मनुष्यों में भी रहने योग्य है? मनुष्य तो उसे कहते हैं, जो विवेक-पूर्ण निर्णय लेने के बाद कार्य करता हो। यदि हमलोग विवेक-प्रयोग करने के बाद ही कोई कार्य करें, तो क्या करना श्रेय होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। मनुष्य यदि हृदयवान हो, तो वह प्रेम की असीम शक्ति से सम्पूर्ण जगत को अपना बना सकता है। यदि सम्पूर्ण मानवता मेरी हो जाय-सभी मनुष्य मेरे अपने हैं; ऐसा बोध जाग्रत हो जाय तो, तो किसी को बदले की भावना से पहुँचायी गयी क्षति या चोट स्वयं अपने ऊपर लगने जैसी कष्टदायक प्रतीत होगी। जिस मनुष्य ने ऐसी हृदयवत्ता अर्जित कर ली हो,तो भले ही वह स्वयं को चोट सह ले, किन्तु किसी भी परिस्थिति में दूसरे किसी को चोट या क्षति पहुँचाने की बात नहीं सोंच सकता। इसको ही अप्रतिकार या अविरोध कहते हैं। यह अत्यंत उच्च अवस्था है ! जो मनुष्य सचमुच महान और शक्तिशाली होते हैं, वे सर्वदा अविरोध या अप्रतिकार की स्थिति में रहते हैं।
रानी रासमणि जिन्होंने 'दक्षिणेश्वर काली मन्दिर' को स्थापित किया था, वे श्रीरामकृष्ण को गुरु से भी बढ़ कर श्रद्धा करती थीं। उनके दामाद मथुरबाबु जो मन्दिर के संचालक थे, वे माँ भवतारिणी के पुजारी-श्रीरामकृष्ण  को बाबा कहकर बुलाते थे, और उनकी बड़ी सेवा करते थे। यह देखकर मन्दिर के ही एक दूसरे पुजारी हलधारी (उनके चाचा के लड़के)  ईर्ष्या से जल-भुन गये और उनसे डाह करने लगे। एक दिन श्री रामकृष्ण को अकेले में देखकर उनसे पूछा, 'तुमने किस जादू-जन्तर या ताबीज के बल पर उन्होंने मथुरबाबू कोअपने वश में कर लिया है? जब श्रीरामकृष्ण ने कहा कि उन्होंने तो वैसा कुछ भी नहीं किया है!  यह सुनकर हलधारी क्रोध से इतने आवेशित हो गये कि, अपना आपा (होश) खो बैठे और ठाकुर (श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ) पर पैरों से प्रहार कर दिए। श्रीरामकृष्ण गिर पड़े, किन्तु किसी प्रकार उठे और वहाँ से चुपचाप चले गये। इसके बहुत दिनों बाद जब मथुरबाबु ने इस घटना के बारे में सुना, तो कहे, " बाबा, आपने उसी समय मुझसे क्यों नहीं कहा ? हलधारी का सिर ही उड़ा देता !" ठाकुर बोले, " इसीलिये तो नहीं कहा, आहा बेचारे से कैसी गलती हो गयी।" इसको कहते हैं अप्रतिकार (अविरोध)! 
इसी प्रकार की एक अन्य घटना का उदहारण मिलता है, " किसी साधू ने एक बिच्छू को जल में गिर कर तड़फफड़ाते हुए देखा। उनहोंने तुरन्त उसको अपनी हथेली में उठा लिया। उठते ही बिच्छू ने उनको डंक मार दिया और पुनः जल में गिर पड़ा। उन्होंने फिर से उसको उठाया, बिच्छू ने फिर से डंक मारा। बिच्छू के डंक की तीव्र जलन भी उनके मन में क्रोध या बदले की भावना उत्पन्न नहीं कर सकी। वे उसको उठाकर जल से बाहर निकाल ही दिये, प्रेम और क्षमा की ही विजय हुई।
पर जो व्यक्ति जिंगोइस्ट टाइप  (jingoist-अंधराष्ट्र्भक्त,  ) इससे क्या हुआ, 'मैं भी आखिर मनुष्य ही हूँ; यदि कोई व्यक्ति मेरे साथ (मेरे देश के साथ ?) ऐसा-वैसा ही व्यवहार करता रहे (वन्देमातरम न बोले या पाकिस्तानी झण्डा लहराये), तो क्या मुझे उसको यूँ ही छोड़ देना चाहिये?" मन में ऐसा प्रश्न उठाना ही, अपने भीतर की पशुता को समर्थन देने जैसा है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कहा था,  "ठाकुर (नवनी दा ) के भीतर, केवल 'पशु' ही क्यों, 'मनुष्य' भी पूरी तरह से मर चुका था, वहाँ सिर्फ 'देवता' ही जाग्रत थे ! " हमलोगों को भी (धर्म को सीखकर)  पहले इस पशु के स्तर से उपर उठाना होगा, फिर मनुष्य के स्तर का भी अतिक्रमण करते हुए देवत्व के स्तर में उन्नत होना होगा! क्योंकि स्वामी विवेकानन्द ने इसीको धर्म कहा है। वे कहते हैं -" धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है। "इसीलिये यदि हर समय पूर्ण विवेकज ज्ञान का प्रयोग करना संभव न भी हो पाता हो, तब भी मनुष्य को देवत्व में उन्नत करने वाले इस 'अविरोध' के गुण को, यथा-संभव धीरे धीरे बढ़ाने की चेष्टा करनी होगी। थोड़ी भी क्षति पहुँचने या चोट लगने से (या मच्छड़-बिच्छु काटते ही), बदला लेने की प्रवृत्ति को क्रमशः जीतना ही पड़ेगा। यदि ऐसा संभव नहीं हो सका तो मनुष्य शरीर में जन्म लेना (बुद्धत्व प्राप्ति?) व्यर्थ  हो जायेगा।   
केवल इतना ही नहीं, इसका एक वैज्ञानिक आधार भी है।
प्रसिद्द वैज्ञानिक न्यूटन द्वारा आविष्कृत एक अकाट्य वैज्ञानिक नियम है, जिसे 'Law of Motion' या गति का नियम' के नाम से जाना जाता है। न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुसार-  ‘प्रत्येक क्रिया के समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है; तथा यह प्रतिक्रिया परिमाण में कार्य के ठीक बराबर और विपरीत मुखी होती है।'
 [उदाहरणार्थ बन्दूक से जब गोली छोड़ी जाती है, तो हमें पीछे की ओर झटका लगता है। या घोड़ा गाड़ी को खींचते समय अपनी पिछली टाँगों से पृथ्वी को पीछे की ओर ठेलता है, जिससे प्रतिक्रिया स्वरूप पृथ्वी घोड़े को आगे की ओर धक्का देती है, और गाड़ी आगे बढ़ती जाती है। जब एक वस्तु किसी दुसरे वस्तु पर बल का प्रयोग करता है, तत्क्षण ही वह दूसरा वस्तु पहले वस्तु पर वापस बल लगाता है। प्रयोग किए गए दोनों बल परिमाण में बराबर होते है,पर दिशा में विपरीत। इन नियम के सम्बन्ध में दो महत्त्वपूर्ण बातें ध्यान देने योग्य हैं—हम यह नहीं जान सकते हैं कि अमुक बल क्रिया है तथा अमुक बल प्रतिक्रिया है। हम केवल यही जान सकते हैं कि एक बल क्रिया है तथा दूसरी प्रतिक्रिया। क्रिया तथा प्रतिक्रिया सदैव अलग–अलग पिण्डों पर लगती है, एक ही पर नहीं।]
इसीलिये हमलोग जो भी कार्य क्यों न करें, ठीक वही हमलोगों की तरफ वापस लौट कर आ जाता है। प्रेम करते हैं, तो बदले में प्रेम मिलता है। घृणा करते हैं, तो बदले में घृणा ही वापस मिलती है। मेरे प्रति किसी ने गलत किया है, इसीलिये मैं उसका बदला लूँगा। लेकिन बदले में जो कार्य होगा उसके भी बराबर और बिपरीत प्रतिक्रिया मेरे प्रति अवश्य होगी। यही है-' कुदरत का कानून ' या प्राकृतिक नियम ! इस को प्रकृति का प्रतिशोध भी कहते हैं। किसी ने मेरे प्रति कोई अन्यायपूर्ण (अनैतिक या wrongful) कार्य किया है, तो उसके प्रतिशोध का क्या होगा ? उसका दायित्व (प्रकृति के कानून को अपने हाथ में लेने की) मुझे लेने की आवश्यकता ही नहीं है, प्रकृति स्वयं उसका ठीक बदला लेगी। क्योंकि यदि मैंने बदला ले लिया, तो बदले का बदला मुझे भी पाना ही होगा। आधुनिक मनोविज्ञान भी इसे स्वीकार करता है। उनकी भाषा में इसको
'The Law of Retaliation ' या '' प्रतिशोध का नियम' कहते हैं। माता सुनीति द्वारा बालक ध्रुव को दिया गया यह परामर्श आधुनिक मनोविज्ञान का सिद्धान्त  'लॉ ऑफ़ रेटलीएशन ' की स्पष्ट व्याख्या है: 
श्रीमद्भागवत में बालक-ध्रुव की कहानी है। हमलोग इस कहानी को जानते हैं। सौतेली माता सूरुचि के गलत परामर्श से रानी सुनीति का पुत्र ध्रुव कुमार पिता की गोदी में नहीं बैठ सका। इससे ध्रुव के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुँचती है, उसे बहुत दुःख हुआ, और क्रोध-अभिमान से उसको आँखें लाल हो जाती हैं. और  माँ के पास जाकर शिकायत किये-- तो माँ सुनीति ध्रुव को समझाते हुए कहती है -    
  मामङ्गलं तात परेषु मंस्था 
           भुङ्क्ते जनो यत्परदुःखदस्तत् ॥ ०४.०८.०१७ 
बेटे, किसी भी परिस्थिति में दूसरे के अमंगल का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए, दूसरे को अपना अपराधी नहीं समझना चाहिए। मनुष्य दूसरे को जैसा दुःख देता है, उसे बदले में ठीक वैसा ही दुःख प्राप्त होता है।अमेरकी संस्कृत विद्वान एडवर्ड वॉशबर्न हॉपकिंस [E.W. Hopkins-(१८५७-१९३२)] की एक प्रसिद्द पुस्तक है 'Origin and Evolution of Religions' इस पुस्तक में एंथ्रोपोलॉजी (Anthropology या मानवशास्त्र) की दृष्टि में - ट्राइबल लोगों के धर्म से लेकर श्रेष्ठ धर्म तक, प्रत्येक धर्म की उत्पत्ति और विकास का पूर्ण विवरण दिया गया है। इस पुस्तक में श्रीरामकृष्ण के जीवन और सन्देश का उल्लेख भी प्रसंगवश किया गया है। समस्त धर्मों के सार को खोजते खोजते निबन्ध के अन्त में लेखक कहते हैं -जिस नैतिक नियम को आजकल 'एथिक आफ रेसिप्रोसिटी' (पारस्परिकता का  नियम ) या 'गोल्डेन रूल' या  कहते हैं उसी बात कोभारत के महाभारतकार श्री वेद व्यास जी ने ‘धर्म सर्वस्व’ या धर्म का सार बताया है! और समस्त धर्मों के आविष्कृत सार को बहुत संक्षेप में इस प्रकार लिखा  है-  " जैसा व्यवहार प्राप्त होने से तुमको स्वयं दुःख होता है, वैसा व्यवहार किसी दूसरे के साथ मत करना। " महाभारत का मूल श्लोक इस प्रकार है- 
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। 
अर्थात् “धर्म का सार जो है उसको सुनो और सुनकर उसके ऊपर चलो। वह सार यह है- जो 'व्यवहार तुमको अपने लिये प्रतिकूल जान पड़े वैसा दूसरे के लिये न करो।'
विवेक-प्रयोग द्वारा प्रतिशोध के दुर्गुण का त्याग करने से क्षमा रूपी सद्गुण का अर्जन साधक को क्रमशः सत्य और प्रेम के निकट लाने लगता है। ' बदला लेना ' एक पाशविक प्रवृत्ति तो है ही; किन्तु 'प्रकृति प्रतिशोध लेती है' के नियम की ओर टकटकी लगाकर देखते रहना भी महानता का लक्षण नहीं है। सभी परिस्थिति में सभी का कल्याण सोचना ही उचित है। और दूसरों के कल्याण में अपना तन-मन-प्राण न्योछावर कर देना ही मनुष्य-जीवन की चरम सार्थकता है। 
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Monday, October 22, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [31] " जीवात्मा और धर्म " (धर्म और समाज),

 ' प्रत्येक मनुष्य के भीतर अवतार होने की सम्भावना है !'
जब हम किसी नये विषय को,किसी पूर्व-परिचित विषय के साथ मिला कर समझने की चेष्टा करते हैं, तब उसे समझने में आसानी होती है। हमलोग पहले अपनी इन्द्रियों के माध्यम से ही  किसी बाह्य वस्तु को समझने की चेष्टा करते हैं। भौतिक जगत के जिन पाँच विषयों, ' रूप-रस-शब्द-गंध-स्पर्श' आदि का ज्ञान हम अपनी पाँच ज्ञानिन्द्रियों-आँख, जिह्वा, कान, नाक और त्वचा के माध्यम से अनुभूति के द्वारा करते हैं- उसे इन्द्रियज-ज्ञान कहा जाता है। 
किन्तु जो वस्तु बाह्य जगत में दृष्टिगोचर नहीं होती, उसको समझने में हमलोगों को थोड़ी कठिनाई होती है। तब हमलोग बाह्यजगत की वस्तु के जैसा किसी विचार को लेकर उसको समझने की चेष्टा करते हैं। मूर्ति का विचार यहीं से उत्पन्न हुआ है। क्योंकि हमलोग किसी निर्गुण-निराकार वस्तु की कल्पना नहीं कर सकते हैं, इसीलिये इन समस्त गुणों से युक्त किसी वस्तु की कल्पना करके, देश-काल-पात्र आदि विभिन्न गुणों का आरोपण करने के बाद  हमलोग उसे समझने की चेष्टा करते हैं। यदि ऐसा नहीं करें तो किसी गुणातीतभाव की धारणा कर पाना हमलोगों के लिये लगभग असम्भव हो जाता है। चाणक्य-नीति में बहुत सुन्दर ढंग से कहा गया है -
अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदिदैवतम् ।
  प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनः ॥
जो लोग वैदिक ब्राह्मण हैं, उनके आराध्य-देव अग्नि हैं । पूजा होने के बाद अंत में जो होम किया जाता है, वह प्राचीन काल के अग्नि पूजा का ही साक्ष्य है। होमाग्नि को प्रज्ज्वलित करके, जिस देवता का आह्वान करना चाहते हों, उसके नाम का मन्त्र पढ़ कर आहूति दिया जाता हैइसके विपरीत, जो लोग मुनि अर्थात मननशील-विज्ञ व्यक्ति हैं, उनके देवता बाहर में नहीं हैं; उनके देवता उनके हृदय में ही विद्यमान हैं जो लोग अल्प-बुद्धि वाले मनुष्य हैं, वे देवता के प्रतिक की कल्पना करके प्रतिमाओं की पूजा करते हैं। क्योंकि, जो देवता कल्पनातीत हैं, जो वाक्य और मन के भी अगोचर हैं, जिनके अंग, आकर, सीमा या गुण को चिन्हित नहीं किया जा सकता, उनको समझनेमें सुविधा के लिये किसी न किसी रूप की कल्पना कर ली जाती है। किन्तु जो समदर्शी मनुष्य (विवेकज -ज्ञान सम्पन्न) हैं, वे सम्पूर्ण जगत को एक समान भाव से देखते हैं, उनके देवता केवल उनके हृदय में ही नहीं रहते, वे चराचर विश्व में जितने भी जीव-जन्तु, जड़, वृक्ष, लता, नदी, पर्वत, समुद्र आदि हैं, अपने ईष्टदेव को ही वे सर्वत्र कण-कण में विद्यमान देखते हैं।
हमलोग सामान्य-बुद्धि के मनुष्य हैं, इसीलिये किसी वस्तु-प्रतीक (Object-symbol) के बिना हमारा काम नहीं चल सकता है। इसीलिये कहा गया है- ' उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो रुपकल्पना।' भगवान् अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करते हैं। क्योंकि वे पूर्ण स्वतन्त्र हैं। जिन्हें मायाधीश, मायापति आदि नामों से जाना जाता है।
प्रश्न उठता है कि वह कौन (चित्रकार) है जो इन रूपों की कल्पना करता है? क्या  मनुष्य अपनी कल्पना से इन अवतारों के रूपों की कल्पना कर लेता है ? या कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्वयं ब्रह्म (अनंत-असीम) ही उपासक की धारणा में अपने को प्रकट करने के लिये ससीम (सगुण-साकार) रूप धारण कर लेते  हैं ? तंत्र-शास्त्रों में कहा गया है- " मनुष्य भी कल्पना नहीं करता और ब्रह्म भी कल्पना नहीं करते।" बल्कि 'शक्ति' ही कल्पना करती हैं। वे जिस प्रकार अविद्या-माया का रूप धारण करके जीव के बंधन का कारण होती हैं, उसी प्रकार मुक्ति प्रदान करने के लिये विद्या-माया बनकर विभिन्न रूपों (माँ सारदा,सीता राधा के रूप को) को धारण करतीं हैं। कहा गया है- ' साधकानां हितार्थाय अरुपा रूप धारिणी।' - अर्थात साधकों के मंगल के लिये रुपातीता ने रूप धारण कर लिया, निराकार साकार हो गयीं हैं।
स्वामीजी ने भी ईश्वर, जीव और जगत के स्वरुप को समझाने के लिये  एक वस्तु-प्रतीक (object module) की सहायता ली थी। उन्होंने एक कमाल के कवि जैसी कल्पना की सहायता से अपनी अनुभूति को व्यक्त किया है। वे कहते हैं, प्रत्येक आत्मा मानो अलग अलग तारे के जैसा है। जैसे तारा (सूर्य-चन्द्रमा आदि) बहुत बड़े आकार का होता है, किन्तु हमलोग उसको बहुत छोटे आकर में देखते हैं। उसी प्रकार ब्रह्म (बृहद ) भी छोटे से जीव के आकार की सीमा के भीतर अपने को (ससीम रूप में) प्रकट करते हैं, इसीलिये हमलोग आत्मा को भी छोटा समझ लेते हैं। किन्तु कोई जीवात्मा छोटा भी नहीं है,और  एक-दूसरे से भिन्न भी नहीं है। सभी जीवात्माएं एक वृहत एकता के सूत्र में बंधीं हैं, किन्तु यह बात आसानी से समझ में नहीं आती। 
इस नीले आकाश को देखें - उसके ओर-छोर का कुछ पता नहीं चलता, हमलोग कल्पना के द्वारा यह नहीं समझ पाते कि इसका प्रारंभ कहाँ से हुआ होगा या अन्त कहाँ है ? सितारों को असमान में टिमटिमाते देख कर हमें लगता है ये सभी असमान में ही टंगे हुए हैं। इसी प्रकार अनंत नीले आकाश के साथ आत्मा की तुलना की जा सकती है। समस्त प्राणियों के शरीर उसी आत्मा की घनीभूत अभिव्यक्तियाँ हैं। किन्तु केवल जीव और जगत के रूप में अपने को अभिव्यक्त कर देने के बाद आत्मा समाप्त नहीं हो जाता है। इन सब में परिव्याप्त होने के बाद भी आत्मा की अभिव्यक्ति अनन्त शून्य तक सुविस्तृत है। पुरुषसूक्त- (ऋ. १०. ९०. ३ ) में कहा गया है, [यही मन्त्र छान्दोग्य उपनिषद् (३. १२. ६ ) में भी है। ] -
पादोऽस्य विश्वाभूतानि
     त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।३।।
 ब्रह्म का विशिष्ट-वैभव बतलाते हुए कह रहे हैं-  ब्रह्म या परमात्मा के केवल एक चौथाई अंश में ही यह सम्पूर्ण चराचर विश्व स्थित है। उसका अधिकांश भाग इस दृष्टिगोचर जगत के परे अनन्त लोक तक परिव्याप्त है। हमलोगों के इन्द्रियग्राह्य जगत को (अपने मन को ) परिपूर्ण करते हुए उसका भी अतिक्रमण करके उसके बाहर ही इस सत्ता का अधिकांश भाग (३/४वाँ) अवस्थित है।
 [ अस्य = इन सर्वनियन्ता भगवान् का , विश्वाभूतानि = अनन्तानन्त जीव तथा अनन्त लोक, पादः = सम्पूर्ण ऐश्वर्य का चतुर्थ भाग है । और, अस्य = इन भगवान श्रीरामकृष्ण का ,त्रिपादः = तीनो पाद अर्थात् तीनो भाग हैं- अहंकार आदि से युक्त 'बद्ध जीव और मुमुक्षु' , दूसरा पाद नित्यमुक्त = जो कभी संसार में फँसे ही नहीं-नारद आदि, और तीसरे हैं मुक्त जीव = जो भवबन्धन से छूटकर भगवदद्धाम पहुंच गये हैं । अमृतं =अविनाशी हैं। -ये तीनो पाद कहां हैं? इसका उत्तर देते हैं --दिवि। (चिन्मय भगवद्धाम में हैं) दिव् शब्द का अर्थ है परमाकाश,स्वर्ग, भगवद्धाम!  
“इस पुरुष की इतनी महिमा है कि यह सारा ब्रह्माण्ड (मन जहाँ तक जा सकता है) परमेश्वर के एक अंश में है अर्थात् वह ईश्वर इस समस्त ब्रह्माण्ड में समाया हुआ अनन्त है, यह समस्त जगत् परमात्मा के एक भाग में है अन्य तीन भाग तो परमात्मा के अपने स्वरूप में प्रकाशित हैं अर्थात् परमात्मा अनन्त है और सर्वत्र विद्यमान है उसको किसी एक स्थान पर नहीं कह सकते।”]
 गीता में भी कहा गया है- 
 अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
       विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।।१०.४२ ।।
-जगत का किन किन स्थानों में उनका विशेष प्रकाश है, उसका वर्णन करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन कहते हैं; अथवा हे अर्जुन बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।
वे सभी स्थानों में व्याप्त हैं, किन्तु जीवात्मा में में उनका विशेष प्रकाश है। स्वामीजी कहते हैं, मैं जीवन भर ईश्वर को ढूँढ़ता रहा, किन्तु अन्त में मैंने मनुष्य के भीतर ही ईश्वर को देखा है। अन्यान्य जड़ वस्तुओं की तुलना में जीव शरीर में ही ब्रह्मचैतन्य सर्वाधिक अभिव्यक्त हुए हैं। जो लोग समदर्शी होते हैं, वे सर्वत्र उनका अनुभव करते हैं। किन्तु हमलोग तो सर्वदर्शी नहीं हैं, इसीलिये जीवों के भीतर, विशेष तौर से मनुष्य के भीतर ही उनको स्पष्ट रूप से देख पाते हैं। असीमित आकाश में परिव्याप्त ब्रह्मवस्तु हमलोगों की धारणा से परे हैं। किन्तु जिस आकर में घनीभूत होकर ब्रह्म ने स्थूल रूप धारण किया है, वहाँ हमलोग उनके अस्तित्व का अनुभव कर सकते है।
एक स्थान पर स्वामीजी कहते हैं, " प्रत्येक मनुष्य के भीतर यदि अवतार होने की सम्भावना नहीं हो, तो फिर कहना होगा कि अवतार किसी दिन हुए ही नहीं थे। " इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर अवतार होने की सम्भावना अवश्य विद्यमान है। किसी अवतार पुरुष के जीवन और सन्देश की विवेचना तथा उनके जीवन का अध्यन और अनुशीलन (श्रवण-मनन-निदिध्यासन) करने से प्रत्येक व्यक्ति अपने संकीर्ण जीवन-चक्र (जन्म-मृत्यु ) का अतिक्रमण करके, देशकालातीत ब्रह्म की अनुभूति (विवेकज ज्ञान प्राप्त) कर सकता है। और (मुण्ड उ ३ । २ । ९ ) में कहा गया है -ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति !
महर्षि पतंजली कहते हैं, " ईश्वरप्रणिधानम् - पवित्र-जीवन में उपनीत महापुरुषों (श्रीरामकृष्ण) के जीवन और सन्देश का चिन्तन करने वाला मनुष्य, पहले की अपेक्षा अधिक उन्नत-अवश्य हो जाता है।  शंकराचार्य कहते हैं, ' त्रय-दुर्लभं ' -
' मनुष्यत्वं, मुमुक्षुत्वं और महापुरुष संश्रय'- इन तीन चीजों को एक साथ प्राप्त करना दुर्लभ है कितने जन्मों तक साधना करने (विभिन्न योनियों -८४ लाख में भटकने के बाद) के बाद मनुष्य का जन्म प्राप्त होता है। किन्तु मनुष्य जन्म प्राप्त करके भी अधिकांश लोगों को नाम-यश, तथा 'कामुकता और कमाई ' की आसक्ति में बन्ध जाने से मुक्ति की इच्छा नहीं होती। फिर किसी में यदि इन्द्रिय-भोगों में आसक्ति से मुक्त होने की इच्छा हो भी जाय तो किसी महापुरुष (पहुँचे हुए संत) की सहायता प्राप्त करना बहुत दुर्लभ है। यह तीन दुर्लभ संसाधन एक साथ प्राप्त हो जायें, केवल तभी मुक्ति की सम्भावना है, नहीं मिला तो मुक्ति की सम्भावना बहुत कम है।
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[माँ भगवती ने अपना स्वरूप बतलाते हुये स्वयं कहा है- “एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का – ममापरा”।  ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं। मैं ही सब कुछ हूं। मुझ से अलग किसी का वजूद ही नहीं है। मेरे गुण तर्क से परे हैं। मैं नित्य स्वरूपा एवं कार्य कारण रूपिणी हूं।’ अतः मनुष्यमात्र को यदि अपना आत्मकल्याण करना हो अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना हो तो अवश्य ही माँ भगवती की आराधना करें। माँ ममता की मूरत है। इतना तो निश्चित है जो भगवती के शरण में जाता है, उसे माँ अवश्य अपनाती है। यह बात भी स्मरण रहे कि शक्तिमान् की शक्ति अभिन्नरूप से रहती है, सम्पूर्ण पदार्थों में – जैसे –अग्नि में दाहिका शक्ति होती है, विद्वानों के अन्दर विद्याशक्ति, धनवानों में धनशक्ति, ब्रह्मचारियों में ब्रह्मचर्यशक्ति इत्यादि। शक्ति एक होकर भी अनेकरूप में व्यक्त होती है। जीवमात्र में अविद्या शक्ति बनकर रहने वाली माँ जगज्जनी भगवती पराम्बा, विश्वजन-मोहिनी (मनुष्य को हिप्नोटाइज्ड करने वाली शक्ति ?) कहलाती है।]
           



      

Sunday, October 21, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [30] ' विजया-दुर्गोत्स्व ' ( शारदीय नवरात्र)(धर्म और समाज)

' विजया का सच्चा अर्थ है- आत्मविजय!'  
' विजया-दशमी' के अवसर पर हम सभी लोग सर्वांगीन कल्याण तथा मंगलमय जीवन के लिये माँ दुर्गा से प्रार्थना करते हैं, और एक-दूसरे को अपनी शुभकामनायें तथा प्रेम देते हैं। किन्तु दुर्गोत्स्व-विजया केवल परम्परा से चले आ रहे रीति-रिवाज के पालन करने का दिन ही नहीं है। 'विजया' है मंगलमय-जीवन जीने की शक्ति प्राप्त करने के लिये माँ से प्रार्थना करने और संकल्प लेने का दिन। हमारी पौराणिक कथाओं में जो नित्य-नूतन (Perpetual) मार्गदर्शन छुपा है, उसको प्राप्त करने का एक सुअवसर है नौरात्रा !
श्रीरामचन्द्र ने माँ दुर्गा का ' समयपूर्व-आह्वान ' (अकाल बोधन) करके रावण को मार कर, माता सीता को छुड़ा लिया था। उसी विजय-दिवस का स्मरण करना ही विजया-दशमी ! जिसे हमलोग दस दिनों तक दुर्गोत्स्व के रूप में मनाते हैं। पूर्वी भारत में, विशेष रूप से बंगाल में, हिन्दू लोग माँ दुर्गा को बिल्कुल अपने अपने घर की बिटिया जैसी मानते हैं, और दसमी को उनके पती के घर लौट जाने के दुःख को विजया का आनन्द अतिक्रमण कर लेता है। क्योंकि विजया के दिन रावण का वध और सीता की रक्षा भीतर हमें माँ दुर्गा को विदाई देने की वेदना से अधिक आनन्द ही प्राप्त होता है। ऐसा कैसे हुआ? यह एक विचारणीय प्रश्न है।
सत्य का पालन (रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाये पर वचन न जाई!) करने के लिये जब रामचन्द्र ब्रह्मस्वरूपिणी सीता को लेकर वनवासमें गये थे, तो वह पंचवटी का वन था। हम में से प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्मस्वरूप है। विवेक- विद्या के रहते हुए भी जब हमलोग- 'पंचवटी' अर्थात ' पंच-भूतों ' के  पंजे में फंस जाते हैं। तब  माया के द्वारा ठग लिये जाते हैं, माया-मृग (सोने का हिरण- पांच इन्द्रियविषय) हमलोगों मे लालच उत्पन्न कर देता है। और जब हम सीता (विवेक-शक्ति रूपी विद्या) को खो कर दुःख से अभिभूत हो जाते हैं। तब बहुत प्रयास करके माँ-दशभुजा (विवेक-प्रयोग रूपी विद्या) की  पूजा करके  रावण-निधन (हृदय के अंधकार अर्थात मिथ्या-अहं) को मार कर सीता को मुक्त कराकर वापस पाना पड़ता है।  
दस-इन्द्रियों का मूर्तमान रूप ही हमलोगों का दसानन रावण है। पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ -आँख,कान, नाक, जीभ और त्वचा; तथा पाँच कर्म इन्द्रियाँ हैं- मुंह, हाथ-पैर, गुदा और प्रजनन इन्द्रिय। ये सभी अत्यन्त बलवान हैं, इनका प्रबल होना ही रावण का भय दिखाना है और विद्या-हरण का कारण है। देवी-पक्ष की षष्ठी तिथि तक मन को अपने वश लाने के बाद देवी पूजा करने का अर्थ है, मन में छुपे षड-रिपुओं का दमन करने के बाद ही देवी की पूजा में प्रवृत होना। दशानन (दस-इन्द्रियों) का दमन करने के लिए ही दशभुजा देवी का आह्वान करना पड़ता है। देवी के हाथों में जो दस अस्त्र हैं, उन्हीं के सहारे दश इन्द्रियों का दमन करना पड़ता है।
शत्रु का दमन करने के लिये कई  बार शत्रु के घर के लोगों को अपनी ओर मिला लेने से उसको हराना आसान हो जाता है। रामचन्द्र ने रावण के घर के आदमी-विभीषण को अपने पक्ष में मिला लिया था। इन्द्रियों का दमन करने के लिए भी इन्द्रिय के घर के आदमी की जरुरत होती है। दश इन्द्रियों के घर में एक आदमी ऐसा है, जिसका चरित्र शेष दश इन्द्रियों के जैसा नहीं है, उस एकादश इन्द्रिय का नाम है-मन। इसी वशीभूत मन की सहायता से दस इन्द्रियों का दमन करना पड़ता है। यह मन अत्यन्त शक्तिशाली है। यह दशभुजा के दश अस्त्रों को दशानन के दमन या अपने  इन्द्रियों के दमन के लिये प्राप्त कर सकता है। महापराक्रमी सिंह उसी शक्तिशाली मन का प्रतिक है। इसीलिये सिंह को दशभुजा माता का वाहन कहा गया है। अर्थात हमलोग मन की सहयता से दश इन्द्रियों का दमन करने के संग्राम में कूद सकते हैं। किन्तु उससे पहले मन में छुपे षडरिपु- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य आदि को - इनके छहों तिथियों तक काट देना
अत्यंत आवश्यक है
इसीलिये विजया का सच्चा अर्थ है- आत्मविजय। मन की सहायता से आत्म-ग्लानी में फंसे आत्मा का उद्धार, खोई हुई विवेक-प्रयोग की शक्ति रूपी विद्या को वापस प्राप्त करके अपने ब्रह्मत्व में प्रतिष्ठित रहना ही -आत्मा का उद्धार या आत्मविजय है। दुर्गोत्सव या विजया उसी आनन्द की अभिव्यक्ति है। इस आत्म-प्रतिष्ठा में सिद्धि प्राप्त करने के आनन्द का अनुभव करना ही मुख्य बात है, (सिद्धि) भाँग खाकर नशे में चूर हो जाना नहीं।
भारत के युवा वृन्द यदि चन्दे में मोटी रकम इकठ्ठा  कर यदि सार्वजानिक पूजा की चकाचौन्ध को को बढ़ा देने में ही अपनी उर्जा को बर्बाद नहीं करें, तथा आत्म-प्राप्ति के आनन्द में डूब सकें, आत्मग्लानी को विसर्जित करके यदि समाज को कलंक मुक्त बना सकें, तभी उनको पूजा करना शोभा देगा। भारत के समस्त युवा-संगठन यदि इसी सच्ची विजया के मार्ग पर चल सकें, विजया की इस शुभ घड़ी में  युवाओं के अंतर में विराजित महासिंह से हमलोगों (अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल)  की यही प्रार्थना है।
[अतः इस शारदीय नवरात्र में श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के आधार पर परम तत्व स्वरूपा भगवती के स्वरूप (बारे में) पर कुछ चर्चा करके अपनी वाणी पवित्र करें।]
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Wednesday, October 17, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [29] " धर्म का परिणाम : मतभेद या समन्वय ?" (धर्म और समाज),

१. 
"आधुनिक जगत में धर्म "
अविनाशी जीवात्मा और शाश्वत परमात्मा के बीच जो सनातन सम्बन्ध है, उसको अपने अनुभव से जान लेना और  उसके उपर विश्वास करना, तथा उस अनुभूति को सदाचार के नियमों एवं समाज सेवी प्रतिष्ठानों के माध्यम से अभिव्यक्त करना ही धर्म है जिस दृष्टि से भी क्यों न देखें, यह एक ऐसी प्रबल अन्तस्थ प्रेरणा (Intrinsic motivation) है जो किसी व्यक्ति-विशेष के समग्र जीवन को गहराई तक प्रभावित करती है। इसीलिये स्वाभाविक रूप से ही धर्म अक्सर मानव-मन में  तीव्र आवेग और प्रतिक्रिया जाग्रत कर देता है। लेकिन धर्म केवल मनुष्य को ही ईश्वर के साथ ही नहीं जोड़ता, बल्कि-किसी मनुष्य को अन्य सभी मनुष्यों के साथ जोड़ देना भी धर्म का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है। किन्तु, धर्म के इस अति महत्वपूर्ण पक्ष को भूल जाने के कारण ही, यह एक विनाशक-मशीन में परिणत हो जाता है।
धार्मिकता की उत्तेजना (Stimulation of religiosity) को तो समझा जा सकता है, किन्तु धर्म के नाम पर अनुचित व्यवहार करना कभी भी अपेक्षित नहीं है। इसीलिये, विशेष रूप से सभी धार्मिक नेताओं को, अपने भाषणों और निबन्धों के माध्यम से अपने वक्तव्य (statement) का प्रचार करने के पहले, यह विचार करके देखना आवश्यक है, कि मेरा यह स्टेटमेन्ट समाज को विभाजित करेगा,या उनको एकताबद्ध करेगा ? मेरे वक्तव्य से देश के नागरिकों में वैमनस्य बढ़ेगा, या आपसी भाईचारे में वृद्धि होगी ? 
कोई व्यक्ति अपने धर्म के उपर चाहे कितना भी गर्व का अनुभव क्यों नहीं करता हो, उसे इस बात को नहीं भूलना चाहिये, कि मनुष्य आज एक ऐसे विविधता पूर्ण सामाजिक परिवेश में वास करता है, जहाँ किसी प्रकार का ऐक्यभाव सम्भव नहीं है।  विज्ञान और तकनीक, संस्कृति और व्यापार, तथा लोकतंत्रीय समाज के दबाव ने नानाप्रकार (diversified) मनुष्यों को सघन रूप से बंधन-रहित और पेचीदा प्रणाली में इकट्ठा कर दिया है। इन परिस्थितियों में समन्वय और शान्ति को स्थापित करना हमारी सर्वाधिक प्राथमिक आवश्यकता है। 
इस आवश्यकता को पूर्ण करने के लिये सभी धार्मिक-समुदायों को रचनात्मक भूमिका निभाने के लिये आगे आना चाहिये, और यही उचित भी है। इसी प्रसंग में स्वामी निखिलानन्द कहते हैं, " मनुष्य जाति आज एक भयंकर रोग से ग्रस्त है। यह रोग मूलतः आध्यात्मिक है; तथा राजनैतिक विरोध, आर्थिक उत्पीड़न, एवं नैतिक शर्मिंदगी (बलात्कार - भ्रष्टाचार आदि) -तो इसके केवल बाह्य लक्षण मात्र हैं। " आज का मानव अपने पड़ोसी के साथ, प्रकृति के साथ, स्वयं के साथ और अपने सृष्टिकर्ता  के साथ भी युद्ध करने में व्यस्त है। लोभ, सत्ता की कुर्सी का लालच और क्रोध सर्वव्याप्त हो चूका है। अनैतिक (असत) इच्छायें और सन्देह, अन्तर-सांप्रदायिक और अन्तर्देशीय सौहार्द्यपूर्ण संबन्ध के मूल सिद्धान्त को ही विषाक्त कर रहे हैं। अब केवल जाग्रत और रचनात्मक शुभ-शक्तियाँ ही मनुष्य समाज को जाति-धर्म-भाषा के नाम पर विभाजित कर उसे पतन के गर्त में ढकेलने वाली अशुभ-शक्तियों से मुकाबला कर सकती हैं। हमारे विचारों में एक मौलिक (क्रान्तिकारी) परिवर्तन लाना अनिवार्य हो गया है व्यवस्था परिवर्तन करने के लिये अब ' मनुष्य ' के स्वभाव (चरित्र) को ही बदलना आवश्यक हो गया है।
किन्तु यह व्यवस्था-परिवर्तन पाश्चात्य-देशों में प्रचलित विज्ञान और प्रौद्द्गिकी, या मनोविज्ञान को अपनाने से या उनके साथ किसी प्रकार का आणविक, राजनैतिक या आर्थिक समझौते पर हस्ताक्षर करने से भी नहीं लाया जा सकता है। केवल सच्चा धर्म ही मनुष्य-जाति के स्वभाव में परिवर्तन लाकर, इस भ्रष्ट-व्यवस्था को बहुत हद तक बदलने में सक्षम है। तथा जगत के जितने भी श्रेष्ठ धर्म हैं, वे सभी मानव-समाज को ऐसे कार्यों को साकार करने के लिये अनुप्रेरित करने के कर्तव्य से बन्धे हुए हैं। 
धर्म के पास मानव-समाज को निगल लेने के लिये, जैसे विभिन्न प्रकार के खतरे हैं, उसी प्रकार जगत को आनन्दमय बनाने के लिये उसीमें अनन्त संभावनायें भी हैं। अब स्थानिक दूरी बहुत हद तक कम हो चुकी है, सम्पूर्ण जगत एक वैश्विक गाँव (global village ) में बदल चूका है। तथा आज का मनुष्य पहले की अपेक्षा  बहुत अच्छी तरह से अपने देश की सुख-शान्ति के  साथ दूसरे देशों की सफलता और विफलता की तुलना करके  देख सकता है। यथार्थ ज्ञान के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने जन्मसिद्ध  अधिकार को जान कर, उसका प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार करने में सक्षम है। इस शुभ-घड़ी में मनुष्य जाति की शांति और मुक्ति को अपना लक्ष्य मानते हुए, धर्म-समुदाय के निदेशक के रूप में कार्य करना हमारा कर्तव्य है। अवसाद ग्रस्त मनुष्य जाति को उपहार-स्वरूप  एक मधुर गीत के जैसा संगीतमय धर्म देने का प्रयास हमलोगों को अवश्य करना  चाहिये

२.
$$$धर्म-समन्वय का सिद्धान्त  
जगत के विभिन्न विचारधाराओं को आपस में जोड़ने वाली कड़ी, तथा उनके बीच समन्वय और एकत्वबोध स्थापित करने की क्षमता ही हिन्दू-धर्म के अतुलनीय विशेषताओं में से एक प्रमुख विशेषता है अन्य किसी धर्म में यह वैशिष्ट हिन्दू-धर्म के जैसा नहीं है। इसी विशिष्टता के कारण आधुनिक जगत में अन्य धर्मों की अपेक्षा हिन्दू धर्म को बड़ी भूमिका निभानी होगी। प्रसिद्द इतिहासकार आर्नोल्ड टायेनबी इसी सम्भावना की ओर संकेत करते हुए कहते हैं- "  हमलोग इस समय विश्व- इतिहास के एक परिवर्तनशील अध्याय में वास कर रहे हैं। जिस अध्याय का प्रारम्भ पाश्चात्य प्रभाव से हुआ था, इस समय यह स्पष्टरूप से दिखाई दे रहा है कि  यदि समग्र मानव-जाति के आत्म-विनाश से इसकी समाप्ति नहीं करना चाहते हों तो, उसका अन्त भारतीय विचारधारा को अपनाने के द्वारा ही करना होगा। पाश्चात्य वैज्ञानिक-चिन्तन के आलोक में, वर्तमान युग में सम्पूर्ण विश्व भौतिकवाद के नींव पर आपस में जुड़ गया है। किन्तु जब वैश्विक-समाज  एक-दूसरे को मरने-मारने पर आमादा हैं,क-दूसरे को जान-समझकर प्रेम करना सीखे ही नहीं हैं, ऐसे समय में इस  पश्चमी महारत (western proficiency) ने केवल दो देशों के बीच की दूरी को ही कम नहीं किया है, बल्कि उसने समस्त जगत के मनुष्यों के हाथों में शक्तिशाली आणविक-बम भी रख दिया है। मनुष्य जाति के इतिहास के इस अत्यन्त खतरनाक मोड़ पर भारत के द्वारा प्रदर्शित मार्ग ही सम्पूर्ण मनुष्य जाति के लिये मुक्ति का मार्ग होगा।" 
भारत के द्वारा प्रदर्शित मार्ग की व्याख्या करते हुए अर्नाल्ड युसूफ टॉयनबी (१८८९-१९७५ ) आगे कहते हैं, " हिन्दू-चिन्तन के अनुसार जगत के सभी महान धर्म सच्चा दर्शन (True philosophy) हैं, और सत्य तक पहुँचने के सही मार्ग हैं.....। यह जानना अच्छा है, किन्तु इतना जान लेना ही यथेष्ट नहीं है। धर्म केवल अध्यन का विषय ही नहीं है, यह एक ऐसी वस्तु है जिसका स्वयं अनुभव करना (आत्म-साक्षात्कार करना) होगा, फिर उसे अपने जीवन में प्रयोग भी करना होगा, तथा यही वह क्षेत्र है, जिसमे श्रीरामकृष्ण ने अपना वैशिष्ट प्रकट किया है। " 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " उन्होंने (श्रीरामकृष्ण) कभी किसी धर्म की आलोचना नहीं की। वर्षों मैं उनके समीप रहा, परन्तु उनके मुख से किसी दूसरे धर्म-पन्थ के बारे में बुराई नहीं सुनी। सभी धर्म-पंथों पर उनकी समान श्रद्धा थी, और उन सब में उन्होंने ऐक्य भाव ढूँढ़ लिया था। मनुष्य ज्ञान-मार्गी, भक्ति-मार्गी, योग-मार्गी, अथवा कर्म-मार्गी हो सकता है। विभिन्न धर्मों में इन विभिन्न भावों में से किसी एक भाव का प्राधान्य देखा जाता है। परन्तु यह भी संभव हो सकता है कि इन चारों भावों का मिश्रण एक ही व्यक्ति में हो जाय। भावी मानव जाति यही करेगी भी। यही मेरे गुरुदेव की धारणा थी। उन्होंने किसी को बुरा नहीं कहा,बल्कि सभी में अच्छाईयाँ ही देखीं।"  (वि सा ० ७/२५९ )
" दूसरा एक और अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यजनक सत्य मैंने अपने गुरुदेव से सीखा, वह यह है कि संसार में जितने धर्म हैं, वे परस्पर विरोधी या प्रतिरोधी नहीं हैं-वे केवल एक ही चिरन्तन शाश्वत धर्म के भिन्न भिन्न भाव मात्र हैं। यही एक सनातन धर्म चिर काल से समग्र विश्व का आधारस्वरूप रहा है और चिर काल तक रहेगा, और यही धर्म विभिन्न देशों में, विभिन्न भावों में प्रकाशित हो रहा है। अतएव हमें सभी धर्मों के प्रति श्रद्धावान होना चाहिए, और जहाँ तक संभव हो सके, उनके तत्वों को ग्रहण करने की चेष्टा करनी चाहिए। " (7/261) 
धर्मपंथों के मिलन या समन्वय का यही तात्पर्य है, जिसे श्रीरामकृष्ण ने अपने जीवन में प्रयोग किया था, तथा इसी की (अविरोध की) शिक्षा दी थी। आमतौर से लोग इसी सिधान्त को ' सर्वधर्म-समन्वय ' के नाम से जानते हैं। इन दिनों कई राजनैतिक लोग इसके लिये 'सर्वधर्म-समभाव ' शब्द का प्रयोग कर देते हैं, किन्तु यह ठीक नहीं है। सम का अर्थ है समान, किन्तु 'समन्वय' शब्द का अर्थ है सुसंगति या अविरोध (Compatibility) जहाँ विभिन्न धर्मों में विविधता और अन्तर रहने से भी परस्पर अविरोध, सुसंगति एकात्मता बनाये रहने का संकेत मिलता है। जिस प्रकार  संगीत में व्यवहृत एकाधिक स्वर (सरगम ) कर्कशता को उत्पन्न नहीं करते बल्कि मधुरता ही उत्पन्न करते हैं। सर्वधर्म-समन्वय का आदर्श हमलोगों को विभिन्न लयबद्ध ध्वनियों के मिश्रण से उत्पन्न संगीत के जैसा विभिन्न धर्मपंथों के बीच अविरोध के सिद्धान्त को अपनाते हुए 'परस्पर ऐक्य की अनुभूति' का परामर्श देता है। 
'समन्वय' कहने का तात्पर्य केवल एकत्रित करना नहीं है। दर्शनशास्त्रों में इस संस्कृत शब्द 'समन्वय' का सामान्य अर्थ है- 'अविरोध' या सुसंगति। इस समन्वय को अनुभव करने की प्राथमिक अनिवार्यता, इस मुख्य सच्चाई पर अपना ध्यान केन्द्रित रखना है कि विभिन्न धर्म-पन्थ परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के परिपूरक हैं। समन्वय का अर्थ केवल विविध प्रकार के मतों को एकत्रिकृत कर लेना नहीं है। धर्म के क्षेत्र में विविध धर्म-पंथों के सार भाग को संकलित करने का प्रयास पहले भी कई बार विफल हो चुके हैं। क्योंकि समस्त धर्मपंथों के सार भाग को संकलित करने का प्रयास अन्ततोगत्वा परस्पर-बहिष्करण (Boycott) के बीच ही दम तोड़ देता है। इसका मूल कारण है,यह है कि जिस धर्म-पंथ के भीतर अन्य समस्त धर्मपंथों को निगल लेने का रुझान दीखने की संभावना अधिक रहती है, कुछ समय बाद, इस प्रकार की सभाओं में, उसी विशिष्ट नाम या 'ब्राण्ड' वाले धर्मपन्थ का प्रभुत्व स्पष्ट होने लगता है। और इस प्रकार अलग अलग स्वभाव के मनुष्यों के जीवन के स्वाभाविक अध्यात्मिक-प्रवाह को अक्षुण्ण  रखते हुए, समस्त धर्मपंथों को समान रूप से विकसित होने का कोई अवसर नहीं मिलता। यदि एक देशीय कट्टर-विचारधारा को ही सत्य मानने वालों के मत की अपेक्षा, समस्त मानवीय पक्षों के विचार-धाराओं को स्वीकार करना श्रेष्ठ-मत है, तो समस्त मतवादों में अलग अलग प्रकार के विचारों के गुच्छे को देख-समझकर समन्वय का सच्चा अनुभव, उससे कई-गुना उच्च स्तर का है।
कोई पक्षपातपूर्ण (prejudiced) या एकांगी मनुष्य - ज्ञानी, कर्मी, योगी और भक्त इनमें से किसी एक ही मार्ग को सही समझता है, वह केवल अपने स्वधर्म के उपसिद्धांतों, आस्थाओं, और अन्य सभी बातों को धर्म का अद्वितीय सत्य और एकमात्र सिद्धान्त समझता है, तथा अन्य धर्मपंथों को केवल भ्रमात्मक या झूठा ही समझता हो ऐसा नहीं होता, बल्कि वे तो अन्य समस्त धर्मपंथों और उनके अनुयायिओं को अपने से नीच मानकर उनकी निन्दा करने और उनसे घृणा करने को ही अपना धर्म समझने लगता है। स्वधर्म के प्रति उनका प्रेम शायद शुद्ध हो, किन्तु उनका हृदय संकीर्ण हो जाता है, उनकी दृष्टि में कोई गहराई नहीं रहती, तथा अपने अन्य मतावलम्बी भाइयों के प्रति सच्ची-सहानुभूति ही समाप्त हो जाती है। 
[स्वामीजी कहते है, ' प्रत्येक धर्म वाले अपने मतों की व्याख्या करके उसीको एकमात्र सत्य कहकर उसमे विश्वास करने के लिए आग्रह करते हैं। वे सिर्फ इतना ही करके शान्त नहीं होते, वरन समझते हैं कि जो उनके मत में विश्वास नहीं करते, वे किसी भयानक स्थान में अवश्य जायेंगे। कोई  कोई  तो दूसरों को अपने सम्प्रदाय में लाने के लिये तलवार तक का प्रयोग करते हैं। वे ऐसा दुष्टता से करते हों, सो नहीं। मानव-मस्तिष्क से उत्पन्न धर्मान्धता-कैंसर नामक व्यधिविशेष की प्रेरणा से वे ऐसा करते हैं। ये धर्मान्ध सर्वथा निष्कपट होते हैं, मनुष्यों में सबसे अधिक निष्कपट। किन्तु अन्य पागल लोगों की तरह उनमें भी सम्पूर्ण मानव-जाति के प्रति अपने उत्तरदायित्व का बोध नहीं होता। यह धर्मान्धता एक भयानक बीमारी है। मनुष्यों में जितनी दुष्ट बुद्धि है, वह सभी धर्मान्धता के कारण जाग्रत होती है। उसके द्वारा क्रोध उत्पन्न होता है, स्नायु-समूह अतिशय तन जाते हैं, और मनुष्य शेर के जैसा हो जाता है। " (3/141) 
" मैं किसी भी सम्प्रदाय का विरोधी नहीं हूँ, जब तक मनुष्य चिन्तन करेंगे, तब तक सम्प्रदाय भी रहेंगे। वैषम्य ही जीवन का चिन्ह है और यह अवश्य ही रहेगा। मैं तो प्रार्थना करता हूँ कि उनकी  संख्या में वृद्धि होते होते संसार में जितने मनुष्य हैं, उतने ही सम्प्रदाय हो जायें, जिससे धर्म राज्य में प्रत्येक  मनुष्य अपने पथ से अपनी व्यक्तिगत चिन्तन-प्रणाली के अनुसार सत्य की खोज के पथ पर चल सके। " (3/128)]
श्रीरामकृष्ण के जीवन-व्रत के प्रमुख सिद्धान्तों में एक प्रधान सिद्धान्त था मनुष्य के हृदय में धार्मिक सहानुभूति और समन्वय के भाव को जाग्रत कर देना। विशेष रूप से इसी प्रसंग का उल्लेख करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, कि, " सत्य केवल एक है, किन्तु यह भिन्न भिन्न प्रकार से प्रकट हो सकता है, तथा भिन्न भिन्न दृष्टिकोणों से इसका भिन्न भिन्न स्वरूप दिख सकता है, दुनिया के सभी श्रेष्ठ धर्मों  में सन्निहित इसी केन्द्रीय रहस्य से अवगत होना मनुष्य मात्र का अनिवार्य कर्तव्य है ! " 
" फिर हम यह जानते हैं कि एक ही वस्तु  को विरोधी दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है, किन्तु वस्तु वही रहती है।" (सर्वधर्म-समन्वय का मूल इसी केन्द्रीय रहस्य में स्थापित है।) (3/130)
इसी केन्द्रीय रहस्य को जानने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्वामीजी आगे कहते हैं- " तब हम दूसरे के प्रति वैर-भाव रखने के बजाय सबके साथ असीम सहानुभूति रख सकेंगे। जब तक इस संसार में भिन्न भिन्न प्रकृति के मनुष्य जन्म लेंगे, तब तक हमें उसी एक अध्यात्मिक सत्य (I am He) को विभिन्न साँचों में ढालना पड़ेगा; यह समझ लेने पर ही हम विभिन्नता के होते हुए भी एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता रख सकेंगे"
(7/261-62) 
३.
समस्त धर्मों के सामान्य आधारभूत सिद्धान्त 
जगत के सभी श्रेष्ठ धर्म पूरी दृढ़ता के साथ यह घोषणा करते हैं, कि चरम सत्य 'एक और आद्वितीय'  है ! अभिव्यक्ति की भाषा में थोड़ा-बहुत अन्तर रहने से भी प्रत्येक धर्म अपने अनुयायियों को एक ही सत्य की और ले जाता है। प्रत्येक धर्म में उस परम सत्य का साक्षात्कार करने के लिये किसी न किसी रूप में ज्ञान, भक्ति और कर्म के लिये स्थान है। 
सभी धर्मों में ऐसे मनुष्य हैं, जिन्होंने चरम सत्य का साक्षात्कार कर लिया है तथा उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं। (मन की गुलामी से, जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) चाहे जिस किसी धर्म की उपासना पद्धति का अनुसरण करने से सिद्धत्व की प्राप्ति (मन के उपर विजय, अहं का नाश और मृत्यु के भय की समाप्ति) क्यों न हुई हो,  ईश्वर (परम सत्य) का अनुभव सभी को एक ही जैसा होता है। इसके अतिरिक्त लगभग सभी धर्मों में किसी एक ' त्राता'  (या संत-शिरोमणि) को या एकाधिक अवतारों को स्वीकार किया जाता है। उनमे से कोई भी मसीहा(त्राता), पैगम्बर या अवतार  मानव-जाति का विध्वंश करने के लिये कभी अवतरित नहीं हुआ है। उनमें से प्रत्येक अवतार का आविर्भाव एक ही उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हुआ है।
प्रत्येक धर्म-सम्प्रदायों में ईश्वर का साक्षात्कार करने की पद्धति के रूप में मन की प्रवृत्ति (झुकाव, tendency) को बदलने तथा इन्द्रिय सुख-भोगने की इच्छा पर संयम रखने का परामर्श दिया गया है। तथा प्रत्येक धर्मपंथ किसी न किसी रूप में भौतिक जगत (स्थूल)  और अध्यात्मि जगत (सूक्ष्म)  के मध्य  एक सीमा को भी  रेखांकित करता है। जो मनुष्य अध्यात्मिक-पथ का पथिक है, वह अपने को  केवल शरीर और मन से युक्त  किसी कठपुतली (बॉडी-माइंड कम्प्लेक्स) के रूप में ही नहीं देखता बल्कि , इसके अतिरिक्त एक तृतीय वस्तु का अस्तित्व भी देख पाता है;  उसी गूढ़ सत्ता को सामान्य तौर पर 'आत्मा' (स्पिरिट या रूह) कहा जाता है। जिन लोगों ने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है वे सभी इस बात पर एकमत हैं, कि किसी को भी आत्मा का साक्षात्कार या अनुभूति बाहर से प्राप्त नहीं होती है, यह अनुभूति अपने भीतर ही होती है। दर्शन की दृष्टि से प्रत्येक धर्म-सम्प्रदाय ईश्वर के स्वरुप का, जगत और मनुष्य (जीव) और इनके बीच परस्पर सम्बन्ध का ही अनुसन्धान करता है।
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " जब कभी किसी मनुष्य ने आत्मज्ञान को प्राप्त कर लिया तो उसके मुख से यही ज्वलंत शब्द निकले-' हे ईश्वर, तू ही सबका नाथ (मालिक) है, तू ही सबके हृदय में वास करता है, तू ही सबका मार्ग-प्रदर्शक है, तू ही सबका गुरु है और तू ही हम सभी की अपेक्षा अनन्त रूप से इस विश्व का रक्षक है।' (7/263)
प्रत्येक धर्मपंथ में व्यवहारिक मनोविज्ञान के प्रति एक स्पष्ट झुकाव देखा जा सकता है। प्रत्येक धर्मपंथ मनुष्य जीवन के चरम उद्देश्य को स्पष्ट करता है। प्रत्येक धर्मपंथ अतीन्द्रिय जगत में साधकों द्वारा सिद्धि रूप में परमानन्द और परम शान्ति प्राप्त होने की बात कहता है। समस्त धर्मपंथ समाज के लिये जो नैतिक सिद्धान्त अधिरोपित करते हैं, उसके आधार के रूप में  कार्य-कारण सम्बन्ध के उपर स्थापित कर्मफल के विधान को सर्वत्र स्वीकार किया जाता है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " समस्त धर्म-सम्प्रदाय हमलोगों को अपने भ्रातृ-स्वरुप समग्र मानव-जाति के कल्याण के कार्यों में रत रहने की शिक्षा देते हैं।" 
 "चारों पुरुषार्थों में से प्रथम पुरुषार्थ इसी 'धर्म-धन' का उपार्जन करो, किसी में दोष मत ढूँढो, क्योंकि सभी मत, सभी पथ अच्छे हैं। अपने जीवन द्वारा यह दिखा दो कि धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है, न नाम और न सम्प्रदाय, वरन इसका अर्थ होता है- अध्यात्मिक अनुभूति (या आत्म-साक्षात्कार) जिन्हें अनुभव हुआ है, वे ही इसे समझ सकते हैं। जिन्होंने धर्मलाभ कर लिया है, वे ही दूसरों में धर्मभाव संचारित कर सकते हैं, वे ही मनुष्य जाति के श्रेष्ठ आचार्य (नेता या मार्गदर्शक) हो सकते हैं-केवल वे ही ज्योति की शक्ति हैं। "7/267)
"मेरे गुरुदेव का मानव जाति के लिये यह सन्देश है कि -'प्रथम स्वयं धार्मिक बनो और सत्य की उपलब्धी करो।' वे चाहते थे कि तुम अपने भ्रातृ-स्वरुप समग्र मानव जाति के कल्याण के लिये सर्वस्व त्याग दो। उनकी ऐसी इच्छा थी कि भ्रातृ-प्रेम के विषय में भाषण मत देते रहो, वरन अपने शब्दों को सिद्ध करके दिखाओ।"
४ .
सनातन धर्म में धर्म समन्वय की शिक्षा 
उपनिषदों में कहा गया है, गौओं के शरीर का रंग चाहे जैसा भी क्यों न हो, उन सभी गौओं के दूध का रंग सफ़ेद ही होता है मतभेद एवं मिथ्या धारणा की उत्पत्ति ज्ञान की अपूर्णता से होती है। अधुरे ज्ञान से ही मतभेद, मरीचिका या भ्रम जाल, या धर्मान्धता  का उद्भव होता है। धर्मान्धता का कारण तथा उसे दूर करने के उपाय को श्रीरामकृष्ण  स्पष्ट करते हुए कहते हैं- " अज्ञान के कारण ही मनुष्य अपने स्वयं के धर्म को श्रेष्ठ समझते हुए व्यर्थ का शोर मचाता है। जब चित्त में यथार्थ ज्ञान का प्रकाश आ जाता है तो सभी सांप्रदायिक कलह शान्त हो जाते हैं।"
वेदान्त का भी यही सिद्धान्त है, इसे स्पष्ट करने के लिए श्रीरामकृष्ण  कई रंग बदलने वाले गिरगिट की कहानी सुनाया  करते थे। -  दो आदमियों के बीच घोर विवाद छिड़ गया। एक ने कहा, ' उस खजूर के पेड़ पर एक सुन्दर लाल लाल रंग का (साकार ) गिरगिट रहता है।' दूसरा बोला,'तुम भूल करते हो, वह गिरगिट लाल नहीं नीला (निराकार)  है।' विवाद करते हुए जब वे किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सके तो उसी खजूर के पेड़ के निचे रहने वाले एक आदमी (आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति या सद्गुरु देव )  से मिलने पहुंचे। उनमें से एक ने पूछा, ' क्यों जी, तुम्हारे इस इस पेड़ पर एक लाल रंग का गिरगिट रहता है न ! ' वह आदमी बोला, ' जी हाँ '। तब दूसरे ने कहा,' अजी, कहते क्या हो ? वह गिरगिट लाल नहीं, नीला है।' वह आदमी बोला -'जी हाँ' । वह जनता था कि गिरगिट बहुरूपी होता है, सदा रंग बदलता  रहता है, इसलिये उसने दोनों की बात में हामी भरी। सच्चिदानन्द भगवान के भी अनेक रूप हैं। जिस साधक ने उनके जिस रूप का दर्शन किया है,वह उसी रूप को जानता है। परन्तु जिसने (आत्म साक्षात्कारी मनुष्य ने) उनके बहुविध रूपों को देखा है, वही कह सकता है कि ये विविध रूप उस एकही प्रभु के हैं। वे साकार हैं, निराकार हैं, तथा उनके और भी कितने प्रकार हैं यह कोई नहीं जानता।"

(अमृतवाणी /124)
मतान्धता के दोष को स्पष्ट करने के लिये श्रीरामकृष्ण  'चार अन्धे हाथी देखने गये ' की कहानी इस प्रकार सुनाते थे- " एक बार चार अन्धे हाथी देखने गये थे ! उनमें से एक जन हाथी के पैर को ही छू कर वापस आ गया, और कहने लगा ' हाथी खम्भे जैसा है।' दूसरे ने हाथी के सूँड़ को छुआ था, वह कहने लगा, ' हाथी अजगर -जैसा है।' तीसरा अन्धा हाथी के पेट को छू आया था; वह कहने लगा,  " हाथी बड़े नाद की तरह है।' चौथा हाथी के कान को स्पर्श कर आकर कहने लगा-' हाथी तो सूप-जैसा है।' इस तरह चारों हाथी के रूप के बारे में वाद-विवाद करने लगे। उनका शोरगुल सुनकर एक व्यक्ति ने आकर पूछा, ' क्या बात है ? तुम लोग क्यों झगड़ रहे हो ? ' तब उन अन्धों ने उसी को मध्यस्त ठहराकर सब किस्सा कह सुनाया। सुनकर वह आदमी बोला, ' तुममें से किसी ने भी ठीक-ठीक हाथी को नहीं देखा। हाथी खम्भे के जैसा नहीं, उसके पाँव खम्भे-जैसे हैं। वह अजगर के जैसा नहीं उसकी सूँड़ अजगर-जैसी है। वह नांद के जैसा नहीं, उसका पेट नाँद के जैसा है। वह सूप-जैसा नहीं, उसके कान सूप-जैसे हैं। इन सब को मिलाकर ही हाथी बना है।' जिन्होंने ईश्वर  के स्वरूप के एक ही पहलू को देखा है, वे आपस में इसी प्रकार झगड़ते रहते हैं। " (अमृतवाणी-302)
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, " किसी भी चर्च (धर्मपंथ) की चहारदीवारी के भीतर जन्म लेना अच्छा है, किन्तु उसी में मर जाना अच्छा नहीं है।" जब पौधा छोटा हो तो उसके चारों ओर बाड़ से घेर देना अच्छा है, किन्तु जब पौधा बड़ा होकर बरगद के वृक्ष में बदल जाये तो घेरा को तोड़ देना पड़ता है। यदि हमलोग प्राचीन वैदिक ऋषियों के उपदेशों के पर श्रद्धा-विश्वास स्थापित कर सकें तो पाएंगे कि वे लोग भी समन्वय और वसुधैव कुटुम्बकम के भाव का प्रचार प्रसार करने पर विशेष जोर देते थे।
 प्रायः इन्द्र नाम से परिचित उस श्रेष्ठ पुरुष को ऋग्वेद (4:32:13:26) में 'पुरुहूत' ("विवक्मि पुरुहूतम इन्द्रं |"), अर्थात 'सर्वजन-पूजित' कहा गया है, फिर उन्हीं को सभी लिये सामान्य - या 'साधरनस्त्वं' भी कहा गया है। उनको ही कभी कभी वरुण भी कहा गया है। किन्तु अथर्ववेद (4:16:8) में कहा गया है-
" यः संगदेशेया वरुणो यो विदेश्यः। "- हमारे वरुण देव (श्री रामकृष्ण देव) जिस प्रकार इस देश के हैं, उसी प्रकार विदेश के भी हैं। ऋग्वेद (5/85/7 में) के एक ऋषि अपने भाई, साथी, मित्र या विदेशी के प्रति किये गये अपराध के लिये क्षमा प्रार्थना करते हैं।
विश्व-बन्धुत्व का अभूतपूर्व उदहारण शुक्ल यजुर्वेद (36/18) की प्रार्थना में देखि जा सकती है - " मित्रस्याहं चक्षूषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रषा चक्षूषा समीक्षामहे।' - समस्त प्राणियों के प्रति हमलोगों की दृष्टि प्रेम-पूर्ण हो, हमलोग एक दूसरे को मित्रतापूर्ण दृष्टिकोण से देखें। भारतीय मानस की सनातन भावना सभी धर्मों को सामान रूप से मान्यता देने- या 'सर्वधर्म-समभाव' नहीं है, बल्कि 'अनेकता में एकता' को देखना है, "विरोध नहीं, बल्कि सभी धर्मों में समन्वय और अविरोध" है। 'सर्वधर्म समभाव' पोलिटिकल नारा है, किन्तु 'सर्वधर्म-समन्वय' 'हार्मनी ऑफ़ रिलिजन्स' का सिद्धान्त आधुनिक युग के किसी राजनेता या बुद्धिजीवी के मन की उपज नहीं है, बल्कि विशुद्ध रूप में यह भारतवर्ष का ही सिद्धान्त है, जो सैंकड़ों वर्षों से हमारे देश में कान्तिमान और देदीप्यमान बनी हुई है।
अथर्ववेद (12/1/45) में कहा गया है,'जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं, नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्।'-अर्थात विभिन्न देशों के विभिन्न भाषा बोलने वाले, और विभिन्न धर्म के अनुयायियों को यह धरती एक समान धारण करती है।' सुन्दर शास्त्रीय वचनों को कहने वाले ऋषि लोग समन्वय के दृष्टान्त के उपर बार बार जोर देते हैं, ऋग्वेद (10/114/5) में कहा गया है-" सुपर्णं विप्राः कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधाकल्पयन्ति " - एक ही पक्षी को अलग अलग रूप से देखने के कारण कवि या बुद्धिमान ऋषि लोग कई रूप से उसकी व्याख्या करते है।" (The wise seers describe the one existence (एकं सन्तं ) in various words..) ऋग्वेद (1/164/46) के अनुसार " एकं सद विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।" अर्थात एक ही परमसत्य को विद्वान कई नामों से बुलाते हैं। इस विषय में आचार्य सायन की टिप्पणी है,
' चरम सत्ता (सत-ता या अस्तित्व) एक ही है, किन्तु उसे अलग अलग रूपों में चिन्तन (ध्यान) किया जाता है। गीता (4/11) में श्रीकृष्ण के उपदेश में भी हमें यही बात दिखाई पड़ती है-
 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
  मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ।।
हे अर्जुन ! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
उसी प्रकार शिवमहिम्नः स्तोत्रम (7) में जब आचार्य पूष्पदन्त कहते हैं- " रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां।नृणामॆकॊ गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥" 
- ' जिस प्रकार भिन्न भिन्न नदियाँ विभिन्न पर्वतों से निकल कर टेढ़ी-मेढ़ी या सीधी बहकर अन्त में आकर एक ही समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार भिन्न भिन्न दृष्टिकोणों वाले भिन्न भिन्न धर्मपंथ अन्त में तुम्हींमें मिल जाते हैं।' यह एक ऐसा सत्य है जो हम सभी को मान्य होना चाहिए। इस समय वे जो कह रहे हैं, वह वास्तव में मुण्डक उपनिषद (3/2/8) में भी कहा गया है।
यथा नद्द्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- अस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नाम-रूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषम् उपैति दिव्यम् ।।

- जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महापुरुष नाम-रूप से रहित होकर परात्पर दिव्य पुरुष परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो जाता है- सर्वतोभाव से उन्हीं में विलीन हो जाता है।
[भारतवर्ष (राष्ट्र) की उन्नति के लिये वेदों का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। आज आवश्यकता है कि स्कूलों में प्रारंभ से ही वैदिक शिक्षा को जानने के लिए 'संस्कृत-व्याकरण' सिखाने का प्रबन्ध किया जाये। इससे विद्यार्थियों के नैतिक चरित्र में सुधार होगा और आगे जाकर वे भारत माता के सच्चे सेवक बन सकेंगे। ]

५.
श्रीरामकृष्ण और धर्मसमन्वय 
यदि उपरोक्त बातें सत्य हैं तो फिर धर्मों में अनेकता (plurality) और विरोध का उद्भव कैसे हुआ ? श्रीरामकृष्ण के आविर्भूत होने के पहले धार्मिक-जगत की अवस्था कैसी थी, उसका वर्णन करते हुए दर्शन शास्त्र के विद्वान प्राध्यापक डाः सतीशचन्द्र चट्टोपाध्याय लिखते हैं, " विभिन्न धर्मपंथ और विभिन्न धार्मिक-सम्प्रदाय ईश्वर के सम्बन्ध में अलग अलग विचार-धारा का पोषण करते थे। उनके विचार परस्पर विरोधी एवं रुढ़िवादीता से भरे हुए थे, धार्मिक जीवन में सभी लोग अलग अलग आचार-अनुष्ठान का पालन करते थे। प्रत्येक धर्मपंथ ऐसा सोचते थे कि केवल उनका धर्म ही सच्चा है, और मुक्ति प्रदान करने में सक्षम है। तथा शेष जितने भी धर्म हैं, वे सभी  भ्रमात्मक और शाश्वत कारागार (नरक) के द्वार हैं। गंभीर धार्मिक कट्टरता और उन्माद ही विभिन्न धार्मिक संप्रदाय एवं धर्मपंथ की विशेषता बन गयी थी, तथा उस युग का धार्मिक वातावरण पूरी तरह से दूषित हो चूका था। धार्मिक विरोध और संघर्ष से भरे उन्हीं व्यथित दिनों में श्रीरामकृष्ण ने अपनी वाणी में सर्वधर्म-समन्वय के वचनामृत का परिवेषण किया था। "श्रीरामकृष्ण के जीवन और सन्देशों में सभी मतों को सम्मान पूर्वक ग्रहण करने का जो मनोभाव (नजरिया) था उसके बारे में प्रमाण देते हुए दर्शन शास्त्र के एक प्रवीण प्राध्यापक डाक्टर महेन्द्रलाल सरकार कहते हैं, 
" श्रीरामकृष्ण का अति-संवेदनशील हृदय मनुष्य जीवन के मौलिक विश्वास के प्रति भेद-भाव को बिल्कुल स्वीकार नहीं कर पाता था। तथा इस भेद-भाव के समाधान का तरीका बताने के पहले, उन्होंने विभिन्न धर्ममार्गों की प्रचलित प्रथाओं और विश्वासों का परिक्षण करने  के लिये अपने दैनन्दिन जीवन में स्वयं उनका अभ्यास किया था।और साधना द्वारा उसी एक चरम सत्य की उपलब्धी कर संसार के सम्मुख सर्वधर्म-समन्वय का आदर्श प्रस्तुत करते हुए कहा था -   "जितने मत, उतने पथ !"
- " बड़े तालाब में बहुत से घाट होते हैं। किसी भी घाट से उतरने पर एक ही पानी मिलता है। इसलिये 'मेरा घाट अच्छा है, तुम्हारा नहीं '-इस तरह परस्पर झगड़ना निरर्थक है। इसी प्रकार सच्चिदानन्द-सरोवर में भी अनेक घाट हैं। यथार्थ में व्याकुल होकर लगन के साथ इनमें किसी भी एक घाट के साथ आगे बढो, तुम अवश्य ही सच्चिदानन्द-सरोवर में उतर सकोगे। ऐसा कभी न कहो कि मेरा धर्म श्रेष्ठ है।" (अमृतवाणी/122) 
श्री इ. डब्लू .हॉपकीन्स अपनी पुस्तक 'ओरिजिन ऐन्ड एभोलियुशन ऑफ़ रिलीजन्स ' में सम्पूर्ण मानव जाति को एकता के सूत्र में पीरो देने वाले ऐसे दिव्य ' परमहंसों ' के विषय  में कहते हैं, " ऐसे महापुरुष प्राचीन सनातन धर्म के साथ स्वयं को जोड़ कर, उसी प्राचीन धर्म को जब अपनी भावी पीढ़ियों के हाथों में दे जाते हैं, तो  धर्म-संयुक्त जीवन के उदहारण-स्वरुप गठित उनका जीवन ही सच्चे धर्म को समझने का सबसे महत्वपूर्ण साधन बन जाता है। "
स्वामी घनानन्द ने अपनी पुस्तक 'श्रीरामकृष्ण ऐन्ड हिज यूनिक मैसेज ' में दिखाया है कि उस महान शिक्षक ने जीवन के सभी स्तर तथा मनुष्य के उद्द्यम या कर्म के समस्त क्षेत्रों में समन्वय के सिद्धान्त का उपयोग किया था। धर्म समन्वय के प्रसंग में स्वामी घनानन्द कहते हैं, " हिन्दू धर्म के अतिरिक्त इस्लाम, इसाई तथा दूसरे धर्मों के सत्य का साक्षात्कार करके श्रीरामकृष्ण ने विश्व के अध्यात्मिक रहस्यविदों के बीच एक विलक्ष्ण स्थान प्राप्त किया था। विश्व की संस्कृति एवं आध्यात्मिक विचार, मानव-जाति की प्रत्याशा-अभिलाषा तथा आदर्श के क्षेत्र में सबों के स्वीकार करने योग्य समन्वय के सन्देश का प्रचार-प्रसार करने में समर्थ श्रीरामकृष्ण अनुपम स्थान रखते हैं। सत्य- साक्षात्कार के जिस फल को अपने मजबूत मुट्ठी से दबाकर उसका पूरा रस निचोड़ लेने में श्रीरामकृष्ण सफल हुए थे। उस निचोड़ रूपी सिद्धान्त का नाम है- 'सर्वधर्म-समन्वय '। 
' अनेकता में एकता ' तथा ' समन्वय' के सिद्धान्त के महत्व के उपर जितना जोर स्वमी विवेकानन्द ने दिया था, उतना अन्य किसी ने नहीं दिया है। इस सम्बन्ध में उनकी एक ओजस्वी को वाणी को सुनिए- " एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति- आदि ऋचाएं जब पहली बार लिखी गयीं थी, तब वे जितनी सजीव, महान, उत्साहवर्धक और प्राणप्रद थीं उसकी अपेक्षा आज इनका महत्व और अधिक बढ़ गया है। हमलोगों को यह बात आज भी सीखनी होगी, कि धर्म-को हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम या ईसाई किसी भी नाम से क्यों न संबोधित किया जाय सभी धर्मो के ईश्वर एक ही हैं। यदि कोई व्यक्ति इनमें से किसी एक धर्म-सम्प्रदाय का भी उपहास करता है, तो वास्तव में वह नादान है, और अपने ही ईश्वर का उपहास करता है।"
" ईसा मसीह के आविर्भाव होने के ३०० वर्ष पूर्व बौद्ध धर्म प्रचारकों को यह निर्देश दिया गया था कि- किसी दूसरे धर्म की कभी निन्दा मत करना। जिस किसी भी देश का धर्म क्यों न हो, समस्त धर्मपंथों मौलिक आधार एक ही है। इसलिये जितना संभव हो उनकी सहायता करना, जितना हो सके उनको शिक्षा देने का प्रयास करना, किन्तु उनको चोट पहुँचाने की कोशिश कभी मत करना।"
" क्या (वेद, कुरान, बाइबिल दे देने के बाद ) ईश्वर के पुस्तकों का भण्डार समाप्त हो गया है ? -अथवा अभी भी वह क्रमशः प्रकाशित हो रही है ? विश्व की यह आध्यात्मिक अनुभूति एक अद्भुत पुस्तक है। बाईबिल, वेद ,कुरान तथा अन्यान्य धर्मग्रन्थसमूह मानो उसी पुस्तक के एक एक पृष्ठ हैं, और उसके असंख्य पृष्ठ अभी भी अनुद्घाटित हैं। हमलोग वर्तमान में खड़े है,किन्तु अनागत भविष्य की ओर उन्मुख होकर देख रहे हैं। अतीत में जो जहाँ भी जो कुछ अच्छा हुआ था उस सबको हमलोग  ग्रहण करेंगे, वर्तमान में ( श्रीरामकृष्ण रूपी सर्वधर्म-समन्वय की) जो ज्ञान-ज्योति प्रकशित हुई है उसे अपने जीवन में धारण करेंगे तथा भविष्य में मानव-जाति के पथ-प्रदर्शक जो भी नेता (पैगम्बर या अवतार) आयेंगे उन्हें ग्रहण करने के लिये अपने हृदय के दरवाजे को खुला रखेंगे। अतीत के ऋषिकुल को प्रणाम, वर्तमान के मानव-जाति के सच्चे नेताओं (पथ-प्रदर्शकों) को प्रणाम, और भविष्य में जो जो (आत्मसाक्षात्कार करेंगे, ऋषि बनेंगे,पैगम्बर लोग) आयेंगे उन सबको मेरा प्रणाम ! "(3/138)

[ 28 जनवरी,1900 को कैलिफोर्निया के पासाडोना नगर में स्थित सार्वजनिक धर्ममन्दिर में दिये गये  भाषण में स्वामी विवेकानन्द कहते है- " हम अपने दैनिक कर्म, महत्वाकांक्षा और अपने कर्तव्य में कितने ही डूबे क्यों न हों, अपने प्रखर-तम संघर्ष में कभी अचानक ही विराम का एक क्षण आ जाता है, जब मन सहसा रुक कर प्रश्न करता है कि इस जगत-प्रपंच के परे (जन्म-मरण के पार क्या है ) क्या है?  इसे  जानना चाहता है कि मृत्यु के पार क्या है ? (यदि मैं सचमुच आत्मा हूँ, तो सामने से आ रही बस रूपी मृत्यु के धक्के से मरेगा कौन ? मृत्यु का साक्षात्कार करने के लिये जिस क्षण किसी व्यक्ति का  मन - इस क्षण और उसके तुरन्त बाद आने वाले मृत्यु के क्षण के बीच जब मन पूर्ण-रूप से एकाग्र हो जाता है-आत्मसाक्षात्कार या विवेकज -ज्ञान भीतर से अभिव्यक्त हो जाता है । )  कभी कभी वह ( किसी जन्म में माँ की कृपा से) अतीन्द्रिय-राज्य का आभास पाता है, और उसीके फलस्वरूप (मन U-Turn ले लेता है) और उसमें पहुँचने के लिये संघर्ष आरम्भ हो जाता है। ऐसा सभी देशों, सभी कालों में होता रहा है। मनुष्य ने (जन्म-मृत्यु के) उस पार देखना चाहा है, अपना विस्तार करना चाहा  है; और हम जिसे उन्नति या विकास कहते हैं, उसको सदा उसी एक खोज, मानव के भाग्य (अमरत्व) की खोज, ईश्वर की खोज द्वारा ही नापा गया है। "(3/124)]
 जिस युवा-नेता (मानव-जाति के युवा पथ प्रदर्शक) के पास एक आधुनिक अति तीव्र गति से चलने वाला मन या (कुशाग्र-बुद्धि ) होगी वह सदैव विवेक-पूर्ण निर्णय लेने के बाद ही किसी कार्य को करेगा। वैसी   ' विवेक-सम्पन्न ' बुद्धि  होने के बाद वह युवा-नेता  प्राचीन को केवल केवल पुरखों की बातें समझकर उसकी खिल्ली उड़ाने वाले तथाकथित  चतुर आधुनिकता का पक्षपाती नहीं होगा। बल्कि वह  युवा-मन मनुष्य जीवन की अनन्त संभावनाओं में विश्वास करेगा, तथा अदम्य साहस और विश्वास के साथ -' मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ ' के आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिये कृत-संकल्प भी होगा।
आधुनिक युग के प्रथम युवा-नेता  श्रीरामकृष्ण को, जिस आध्यात्मिक प्रेरणा ने  विभिन्न धर्मपंथों की साधना में उद्बुद्ध कर दिया था, वह उनके द्वारा प्रचारित धर्मसमन्वय के सन्देश के समान ही महान थी। स्वामी प्रभवानन्द कहते हैं, " एक बार श्रीरामकृष्ण से  किसी ने पूछा था कि उन्होंने क्यों इतने सारे अलग अलग मार्गों से साधना की थी, चरम लक्ष्य तक पहुँचने के लिये क्या कोई एक मार्ग ही यथेष्ट नहीं था ? इसपर उनका उत्तर था- ' मेरी माँ तो अनन्त हैं, उनके हजारों रंग-रूप हैं, वे स्वयं को कई नाम-रूपों में अभिव्यक्त  करती है। यह जगत उनकी विविध अभिव्यतियाँ ही तो है ! मैं सभी मार्गों से उनका साक्षात्कार  करना चाहता था। इसीलिये उन्होंने समस्त धर्मपंथों में निहित सत्य का दर्शन मुझे करा दिया था।' हालाँकि विभिन्न धर्मपंथों में समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य इन विविध धर्म-मार्गों की साधना नहीं की थी, किन्तु फिर भी उसी के परिणाम स्वरूप,  उनके जीवन में यह समन्वय मूर्तमान हो उठा था।"
इसीलिये आज किसी व्यक्ति या संगठन को धर्म समन्वय पर आधारित किसी नये नाम वाला सार्वभौमिक धर्म को रचने की कोई आवश्यकता नहीं है; बहुत पहले से ही उन श्रेष्ठ धर्मों  अस्तित्व रहा है। इस बात को  स्पष्ट करते हुए  स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-  " सार्वभौमिक धर्म सदा से विद्यमान है। पुरोहित और दूसरे लोग, जिन्होंने विभिन्न नाम वाले अपने अपने धर्मों को, को पूरे विश्व भर में फैला देने का भार इच्छापूर्वक अपने कंधों पर उठा लिया है, यदि वे कृपापूर्वक कुछ देर के लिये प्रचार-कार्य बन्द कर दें, तब हमको यह ज्ञात हो जायेगा कि सार्वभौमिक धर्म पहले से ही वर्तमान है।  तुम देख रहे हो कि सब देश के पुरोहित (धर्म के ठीकेदार नेता या राजनीतिज्ञ लोग) ही कट्टरपंथी हैं। बराबर वैसे ही लोग सर्वधर्म-समन्वय को फलने-फूलने में बाधा डालते आ रहे हैं-कारण उसमें उनका स्वार्थ है।" (3/131)
[ " सर्वधर्म-समन्वय' के स्वाभाविक गति को बराबर रोका गया है और अब भी रोका जा रहा है। प्रत्यक्ष रूप से तलवार न ग्रहण करके अन्य  उपायों से काम लिया जाता है। न्यूयार्क के एक श्रेष्ठ प्रचारक क्या कहते हैं, सुनो- वे प्रचार कर रहे हैं कि 'फिलिपीनवासियों को युद्ध से जितना होगा,  कारण उनको ईसाई धर्म की शिक्षा देने का यही एकमात्र उपाय है।' वे पहले से ही कैथोलिक थे, परन्तु अब वे उनको प्रेसबिटेरियन बनाना चाहते हैं और इसके लिये वे इस रक्तपात-जनित घोर पापराशी को अपनी जाति के कन्धों पर रखने के लिये उद्दत हुए हैं। -कैसी भयानक बात है ! उस पर भी ये नेता अपने को वीटो-पावर रखने वाले नेता मानते हैं। जब इस तरह का मनुष्य (अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के लिये-डोनाल्ड ट्रम्प )  डींगें  मारने में लज्जा का अनुभव नहीं करता, तब संसार की बात एक बार सोचो, विशेषकर जब सुननेवाले तालियाँ बजकर ऐसे नेताओं को उत्साहित करते हैं। क्या यही सभ्यता है ? हमारे भीतर का बाघ अभी केवल सोया भर है- मरा नहीं है। सुयोग उपस्थितहोते ही वह जागकर पहले की तरह दांतों और पंजों का प्रयोग करने लगता है। " (3/129)
" बहुत कम धर्मगुरु- पंडीत, मौलवी ,पादरी का चोंगा  पहने तथा कथित " श्री श्री धर्म-प्रचारक जी"   ऐसे हैं, जो मानव-जाति के सच्चे नेता बनकर जनसाधारण को मार्ग दिखाते हैं; उनमें से अधिकांश धर्म-प्रचारक तो  जनता के इशारों पर ही नाचते हैं, वे भला उनका मार्गदर्शन कैसे कर सकते हैं ? परन्तु यदि अधिकांश जनता शिक्षित हो, उन्नत हों  तो ये धर्मगुरु (या समाज के तथा कथित  नेता ) लोग भी उन्नत होने बाध्य हैं। धर्मगुरुओं  को गाली देना भी आजकल प्रथा हो गयी है- आशाराम या राधे माँ को गाली देने के पहले हमें अपने को ही गाली देना उचित है। तुम जैसे हो, जितने योग्य हो, अपनी योग्यता के अनुरूप  ही ठग गुरुओं द्वारा ठगे जा रहे हो। यदि कोई सच्चा  धर्मगुरु तुमको अकेले केवल अपने बलबूते (संघबद्ध हुए बिना ) तुम्हें - ' मनः संयोग ' की शिक्षा देकर, विवेक-सम्पन्न मनुष्य में परिणत करके  ' सर्व-धर्म समन्वय ' के पथ पर , उन्नति के पथ पर अग्रसर करना चाहे, तो उसकी दशा क्या होगी ? उसके बाल-बच्चों को शायद भूखों मरना होगा और उनको फटे वस्त्र पहन कर ही रहना होगा। (3/132)] "]

 फिर भी ऐसे दो-चार उन्नत और असाधारण लोग होते हैं जो लोकमत (वोट-बैंक) की परवा नहीं करते। वे सत्य-द्रष्टा हैं, तथा केवल सत्य को ही सर्वशक्तिमान मानते हैं। तथा सत्य की ओर दृष्टि रखते हुए एकमात्र सत्य को ही धारण कर जीवन यापन करते  हैं।"  (3/132) 
ऐसे ही एक महान (noble) व्यक्ति थे श्रीरामकृष्ण, उन्होंने अपनी हृदयेश्वरी  श्यामा माँ को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया  था, किन्तु सत्य नहीं दे सके थे। और अपने पास केवल सत्य को ही पकड़े रखे थे। फिर यही सत्य उनकी धर्मान्वेषी दृष्टि के सामने स्वयं को कई विविध रूपों में अनावृत (uncovering) किया था, तथा एक ही सत्य के उन विविध विशेष रूपों से समन्वित धर्म को उन्होंने सम्पूर्ण मानवजाति को उत्तराधिकार के रूप में समर्पित कर दिया था।  
आधुनिक जगत के सामने श्रीरामकृष्ण का परिचय देते हुए प्रसीद्ध साहित्यकार क्रिष्टोफर आयशरउड लिखते हैं- " मैं इस पुस्तक को शुद्ध आस्तिक या घोर नास्तिक के लिये नहीं लिख रहा हूँ। किसी अति आश्चर्यजनक वस्तु या व्यक्ति- भले ही वह चाहे जिस देश में क्यों न उत्पन्न हुए हों, को देखकर, जो व्यक्ति उसे अकल्पनीय मान कर भी उसे स्वीकार करने में कुण्ठित नहीं होते, तथा जो किसी नये अवतार की खोज करने में सर्वदा तत्पर रहते हों, मेरी यह रचना उसी श्रेणी के पाठकों के लिये है। "
किसी नये अवतार या पैगम्बर के आविर्भूत हो जाने के तात्पर्य, या भविष्य में किसी व्यक्ति के पैगम्बर की श्रेणी में उन्नत हो जाने की सम्भावना को पूर्ण रूप से समझने के लिये या उनको पहचान लेने के लिये गहरी अन्तर-दृष्टि या अत्यंतकुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता होती है। जिनके भीतर इन बातों का आभाव होताहै, वैसे लोग ही आधुनिक जगत के अवतारी पुरुषों या पैगम्बरों के जीवन और संदेशों को छोटा करके देखते हैं, या उनकी निन्दा करने की चेष्टा करते हैं। श्री मैक्समूलर ने १८९६  ई० में ' दी नाइनटीन्थ सेंचुरी ' नामक पत्रिका में श्रीरामकृष्ण के जीवन पर आधारित ' ए रीयल महात्मा ' शीर्षक प्रबन्ध लिखा था। अपनी इस रचना के द्वारा उन्होंने इस महान शिक्षक के बारे में कुछ आधारहीन शंकाओं तथा गलत धारणाओं को पाश्चात्य वासियों के मन से दूर करने का प्रयास किया था। क्योंकि किसी भी युग में महान व्यक्तियों को छोटा करके आँकने में ही व्यस्त रहने वाले निंदकों का आभाव नहीं रहता।
स्वामी विवेकानन्द का शरीर चले जाने के बाद श्री गिरिश चन्द्र घोष (जो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं) ने १९०४ ई० स्वामी विवेकानन्द की जन्मतिथि के अवसर पर बेलूड़मठ में आयोजित सभा में कहा था," निन्दक मनुष्य भी ईश्वर की एक अद्भुत रचना होते हैं ! ऐसा प्रतीत होता है कि सभी महान कार्यों (लीला) को पुष्ट बनाने में उनकी आवश्यकता होती ही है। निंदकों ने ही सीता को वनवास दिया था, वृन्दावन में कृष्ण की प्रेम-लीला को पूष्ट करने के लिये जटिला-कुटिला का होना भी जरुरी था, उसी प्रकार विवेकानन्द की लीला में भी निन्दकों का कोई आभाव नहीं था।....निन्दक लोग उनकी चाहे जितनी निन्दा करें,  वैसे लोगो का जीवन इतना पवित्र है, कि कोई उनकी ओर ऊँगली नहीं उठा सकता , न  कोई उनसे ईर्ष्या ही कर सकता है ! "
{ हम अकेले ही चले थे जानिबे मँजिल मगर; (माँ की कृपा से ) लोग जुड़ते गये और कारवाँ बढ़ता गया ! "मैंने ऐसा कोई मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन नहीं देखा, जिसके प्रमुख नेता जरा स्थिर होकर विचार करें कि 'लोग जो हमारी बात नहीं सुनते, इसका कारण क्या है ? (बंगाली भाषा से प्रेम अत्यधिक है, किन्तु ठाकुर-माँ-स्वामीजी  शिक्षाओं को सम्पूर्ण भारत में फैला देने के लिये बंगाली उपदेशकों को हिन्दी में भाषण देने की योग्यता अर्जित करनी ही होगी, यह न सोचकर वे बंगला न जानने वालों को) केवल शाप देते है- और कहते हैं ' बिहारी लोग बड़े
पाजी हैं।' 
वे एकबार भी यह विचार नहीं करते कि ' हिन्दीभाषी ' लोग क्यों हमारी बात पर कान नहीं देते ? क्यों मैं हिन्दी भाषा उन्हें धर्म के सत्य को समझाने में समर्थ नहीं होता ? क्यों मैं उनकी मातृभाषा को सीखकर (या उनके मानसी-स्तर पर उतरकर ) उनके साथ उन्हीं की भाषा में बातचीत नहीं करता ? क्यों मैं उनके ज्ञान-चक्षु उन्मीलित करने में समर्थ नहीं होता ? असल में उन्हींको अच्छी तरह जानने की आवश्यकता है, और जब वे देखते हैं कि लोग उनकी बात पर कान नहीं देते, तब यदि किसी को गाली देने का मन करे, तो उन्हें पहले स्वयं को ही गाली देनी चाहिए। क्योंकि दोष सदैव " Be and Make " आन्दोलन को प्रचारित करने वाले उन नेताओं का है जो सिर्फ 'बंगाली और अंग्रेजी' में ही बोलते हैं, और अपने संगठन का विस्तार करने के लिये 'मनः संयोग' में विश्वासी युवा-संगठन को छात्रों- युवाओं के लिये उपयोगी बनाने की चेष्टा नहीं कर सकते। (3/133) " }
६.
 रचनात्मक व्यक्ति मुट्ठीभर ही होते हैं !
जन-कल्याण के किसी उन्नत एवं नवीन भावादर्श (विचारधारा) को स्वीकार करने से भयभीत हो जाने वाले कुछ मनुष्य समाज में हमेशा रहेंगे। वे लोग अपने संकीर्ण संसकारों से पहले की ही तरह चिपके रहना चाहेंगे। जिनका हृदय विशाल नहीं होता, जिनमें नये विचारों को समझने योग्य बुद्धि नहीं होती, वे अपनी परिवर्तित अवस्था के साथ ताल-मेल नहीं रख पाते। अति उच्च विचार एवं हाल में आविष्कृत कोई वैज्ञानि-सिद्धान्त समूह भी , पहले पहल केवल कुछ चुने हुए 'रचनात्मक -प्रतिभा सम्पन्न' व्यक्तियों द्वारा ही सम्मानित किये जाते हैं। 
किन्तु ये सभी भ्रम-भंजक सत्य जब तक प्रकट होकर साधारण जनता के मन को समता प्रदान करने वाली प्रेरक-शक्ति नहीं बन जाते, तब तक उन थोड़े सर रचनात्मक प्रतिभा सम्पन्न अल्प-संख्यकों को ही विशाल जन-समुदाय के मार्ग-दर्शन का दायित्व अपने कन्धों पर लेकर आगे बढ़ना होता है। और जब तक वे इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करने के लिए स्वयं आगे नहीं बढ़ते, तब तक भ्रम, विरोध, निन्दा, भ्रष्टाचार,  जीवन को हानी पहुँचाने वाले आपसी -झगड़ों में मानव-सभ्यता का अपक्षरण (erosion) होता ही रहेगा।  
सभ्यता के इतिहास के सम्बन्ध में आर्नोल्ड टायनबी की पुस्तकें बहुत विख्यात हैं, उसमें उन्होंने ने भी इसी बात की ओर इशारा किया है।  आर्नोल्ड टायनबी के इसी चिन्ता को आधार बनाकर आधुनिक युग के भौतिक शास्त्री श्री फ़्रीटजोफ़ कापरा कहते हैं, " जीवनीशक्ति से भरपूर होकर शिखर तक उठ जाने के बाद, सभ्यता की संस्कृति भाफ बनकर उड़ना शुरू कर देती है, और सभ्यता में ह्रास होने लगता है। टायनबी के मतानुसार लचीलापन (Flexibility) का अभाव ही संस्कृति के क्षरण के मुख्य कारणों में से एक प्रमुख कारण है। पतनोन्मुख समाज में लचीलापन का अभाव दिखाई देने के साथ ही साथ उसके साथ जुड़े उपादानो (हिन्दू-मुस्लिम) में  एकत्व का अभाव भी व्यापक तौर से दिखने लगता है, जिसका अनिवार्य परिणाम है सामाजिक वैर-भाव और अलगाव-वाद (separatism)।
ऐसा होने से  भी संघर्ष-युद्द के आह्वान के सामने खड़े होकर उसका प्रत्युत्तर देने की क्षमता किन्तु समाज से पूरी तरह लुप्त नहीं हो जाती। रुढ़िवादी विचार तथा आचार अनुष्ठान के दृढ आदर्श से बंधे रहने के कारण जब संस्कृति की मुख्य धारा जब चेतना शून्य हो जाती है, तब वहाँ रचनात्मक-प्रतिभा सम्पन्न कुछ अल्पसंख्यक व्यक्ति प्रकट हो जाते है, जो युद्ध-संघर्ष से परे जाने के प्रयास को आगे बढ़ाते रहते हैं। प्रबल कट्टर-पंथी और प्रभावशाली सामाजिक संगठन, संस्कृति के इन शक्ति-दूतों के हाथों में नेतृत्व की भूमिका देना जरुर अस्वीकार कर देता है, किन्तु वे संगठन स्वयं ही क्रमशः
जीर्ण-शीर्ण होते हुए, अंत में अनिवार्य रूप से समाप्त भी हो जाते हैं। और तब रचनात्मक- प्रतिभा से युक्त कोई न कोई नेता आविर्भूत होता है, जो किसी न किसी  उपाय से  प्राचीन समाज में यथार्थ धर्म को नये रूप में प्रतिस्थापित करने में अवश्य समर्थ होते हैं। " 
इतिहास के ऐसे ही समस्या-ग्रस्त परिवर्तन के युग में, भारतीय मन ने जब  अपना लचीलापन खो दिया था, तथा पाश्चात्य-चिंतन से मनीषा और विद्वता सम्पूर्णतः समाप्त हो चुकी थी, ऐसे ही समय में युद्ध-संघर्ष के घात -प्रतिघात के बीच कुछ रचनात्मक लोगो का समूह जाग्रत हो गया था, जो  जिन्होंने अपने आदर्श एवं केन्द्रीय शक्ति के रूप में श्रीरामकृष्ण के जीवन और सन्देश ग्रहण किया था। रचनात्मक-प्रतिभा सम्पन्न यह दल ही ' रामकृष्ण भाव आन्दोलन ' के अग्रदूत हैं, जो अपने असाधारण प्रयास से भारत की आम जनता की श्रद्धा और विश्वास अर्जित किये हैं। इस ' रामकृष्ण भाव आन्दोलन ' के  सांस्कृतिक परिणाम का महत्व, सामाजिक परिणाम के महत्व से कम नहीं है।
 "रामकृष्ण भाव आन्दोलन ' की विशिष्ट सांस्कृतिक भावना है- "देशव्यापी समन्वय और एकीकरण " जो आधुनिक भारत के विघटनकारी और पृथकतावादी शक्तियों पर लगाम लगाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस सम्बन्ध में स्वामी निर्वेदानन्द की निर्देशात्मक उक्ति देखने योग्य है- " योग्यता और अभिरुचि की विविधता को प्राकृतिक रूप से अमिट घटना स्वीकार करते हुए, अन्तर के अनुसार उपाय ग्रहण करने को तैयार रहना होगा। सच तो यह है कि विभिन्न धर्मपंथों के सूत्रपात के द्वारा यही किया जा रहा है। उनमें से किसी एक धर्मपंथ के साथ दूसरे के झगड़े का कोई कारण नहीं है। ...इस क्षेत्र में ' अनेकता में एकता ' या बहुत्व में एकत्व ' का दर्शन ही निश्चित रूप से साम्प्रदायिक और जातिवादी संघर्ष को मिटाने में समर्थ होगा।"
बहुत वर्षों पूर्व ही स्वामी विवेकानन्द ने अपनी ऋषि-दृष्टि से 
१८९६ में ही इस रचनात्मक-प्रतिभा सम्पन्न इस छोटे से दल  'युवा महामण्डल' को आविर्भूत होते हुए देख लिया था ! और  श्री आलासिंगा को एक पत्र  में लिखा था --" कुछ न कुछ घटित अवश्य होगा। कोई शक्तिशाली व्यक्ति (नवनी दा ) इसे वहन करने के लिये उठ खड़ा होगा। ईश्वर जानता है कि क्या अच्छा है। सम्पूर्ण भारत वर्ष में इस चरित्र -निर्माणकारी आंदोलन को फैला देने के लिए वेदान्त के महावाक्योंपातंजल योग-सूत्र और नवनीदा प्रतिपादित -'विवेकज-ज्ञान'  की व्याख्या करने में सक्षम २० उपदेशकों की आवश्यकता है।"] 
 " हमलोगों का कार्य बड़े सुंदर ढंग से शुरू हुआ है, तथा हम सभी भाइयों में आपसी प्रेम सभी प्रशंसा के उपर है। सच्ची निष्ठा और उद्देश्य की पवित्रता निश्चय ही इस समय विजय प्राप्त करेगी, तथा कोई छोटा सा दल ? भी इन सब गुणों  से भूषित होने पर समस्त विघ्न-बाधाओं के रहने के (नवनी दा के जाने के) बावजूद अपने अस्तित्व को निश्चित रूप से बचाए रखेगी।"
किन्तु इस रचनात्मक लोगों के छोटे से समूह के महत्व को, जो बहुसंख्यक भीड़
 है वह नहीं भी स्वीकार कर सकती है। शायद वे लोग, इन लोगों के प्रभाव या आवश्यक उपदेशों की उपेक्षा भी करें । किन्तु ये लघु संख्यक लोग कभी भयवश या किसी बड़े आदमी की विशेष-कृपा पाने के लालच में, उनसे अपने लिए कभी स्वीकृति पाने की चेष्टा नहीं करते। फिर भी जो घटित होता है, वह यह  कि - ये रचनात्मक लघु संख्यक लोग ही हमेशा दाता  की भूमिका में रहते हैं, और जो बहुसंख्यक हैं वे हमेशा ग्रहीता बने रहते हैं। 
आधुनिक युग के मानव-समाज में, विभिन्न धर्मपंथों का आविर्भाव तथा समय के प्रवाह में उनकी अनिवार्य अधोगति से उत्पन्न जो कैन्सर जैसा रोग दिखाई दे रहा है, उसको ठीक करने में सक्षम कोई दवा अभी तक आविष्कृत या प्रयुक्त नहीं हुआ था। यद्यपि वेदों  में उस दवा का की जड़ी-बुट्टी विद्यमान थी, उस दवा की जड़ी-बुट्टी  को युग की आवश्यकता के अनुसार कठोर तपस्या के कष्ट सहकर, उन्हें पुनः  पुष्पित-पल्लवित करने का कार्य, तथा विभिन्न  धार्मिक-सम्प्रदायों में संघर्ष  के कारण आमजनों का जीवन अधिक प्रदूषित हो गया था, उस जीवन को  मिलन-पुष्प के सुगन्ध से आमोदित बना देने का कार्य श्रीरामकृष्ण के आगमन की ही प्रतीक्षा कर रहा था। उनके अद्वैत तपस्या से प्रस्फुटित उस पुष्प का नाम है 'सर्वधर्म-समन्वय'।

किन्तु, संभव है कि अधिकांश व्यक्ति इस सिद्धान्त के मर्म को शीघ्रता के साथ हृदयंगम नहीं कर सकेंगे। क्योंकि, "आत्म-विश्वास में अचल स्थिति तथा उद्देश्य की पवित्रता" ---जैसे सदगुण मुट्ठीभर रचनात्मक मनुष्यों के भीतर ही रहते हैं, बल्कि यही अच्छा भी है। नहीं तो, यदि बहुत बड़ी संख्या के दबाव में ये सतगुण ही बेस्वाद हो जायेंगे। किन्तु यह वेदान्ती या 'दृढ़-आत्मविश्वासी अल्पसंख्यक-समूह' अपने लिये, कभी किसी प्रकार के विशेषाधिकार का दावा नहीं करता (जीप के सामने सीट पर बैठाओ, या पिछली सीट के बोरा पर); बल्कि उनका तो उद्देश्य ही होता है अपने विशेषाधिकार पाने की कामना को ही उखाड़ फेंकना, -और स्वामी विवेकानन्द के मतानुसार यही वेदान्त का लक्ष्य भी है।
'रामकृष्ण मिशन' द्वारा प्रकाशित आदर्श और उद्देश्य' की अनुज्ञप्ति के अंतर्गत विशेषाधिकार को समाप्त कर की बात का उल्लेख इस प्रकार है- " भारत में सभी दुखों का मूल कारण है उच्च और निम्न श्रेणी के मनुष्यों के बीच बहुत बड़ा अन्तराल। इस विशाल अंतर को यदि नहीं पाटा गया तो जनसाधारण के कल्याण की कोई आशा नहीं है। मानव-समाज के हित के लिये श्रीरामकृष्ण देव ने जिन सब तत्वों की व्याख्या की है, तथा कार्यरूप में उनके जीवन में जो तत्व प्रतिपादित हुए हैं, उनका प्रचार तथा मनुष्य की शारीरिक, मानसिक व पारमार्थिक (3H) उन्नति के लिये जिस प्रकार उन सब तत्वों का प्रयोग ( महामण्डल का ५ अभ्यास), उन विषयों में सहायता करना, इस 'संघ' (मिशन) का उद्देश्य है। " 
तथा जातिगत और धर्मगत समन्वय का सिद्धान्त इस प्रकार अभिलिखित हुआ है- " जगत के सभी धर्ममतों को एक अखण्ड सनातन धर्म का रूपान्तर मात्र समझते हुए सभी धर्मावलम्बियों के बीच आत्मीयता और सौहार्द की स्थापना के लिये श्रीरामकृष्ण देव ने जिस कार्य का प्रारम्भ किया था उसका परिचालन ही इस मिशन का कर्तव्य (व्रत) है ।   
अतः हम देखते हैं कि - इस प्रकार की सार्वजनिक सहानुभूति तथा दूर-दृष्टि केवल, रामकृष्ण मिशन जैसे किसी छोटे से रचनात्मक समूह के पास ही होने की ही आशा की जा सकती है। स्वामी सतप्रकशानन्दजी लिखते हैं- " आधुनिक विश्व के लिये,व्यक्ति या समाज के द्वारा मनुष्य को किसी भी रूप की  सेवा प्रदान करने की जो बुनियाद होगी, वह एकमात्र वही सत्य होगा, जो मनुष्य में अन्तरनिहित देवत्व को निर्धारित करती है। यही भाव रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा का एक विशिष्ट योगदान है,मनुष्य-जाति में आपसी श्रद्धा, प्रेम और एकता को प्रतिष्ठित करना, जिसके उपर मानव जीवन में शान्ति और प्रगति निर्भर करती है। और उसे प्राप्त करने का उपाय है, जो सर्वव्याप्त सत्ता मनुष्य से सम्बद्ध देश, जाती,नस्ल, धर्म,पद एवं प्रतिभा पर आधारित भेद-भाव का अतिक्रम करके सभी में समान रूप में विराजमान हैं, उसी सम्बन्ध के सार्वभौमिक मिलन-स्थल को खोज कर बाहर निकालना । "
७.
इस आन्दोलन के समालोचक-वृन्द
 वर्तमान युग में-- अभी भी, कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि " धर्म की रक्षा तथा उसका प्रचार करने के लिये मानव-समाज में उग्र धार्मिक उन्माद पैदा करना आवश्यक है" - यह सोंचकर भी कितना अजीब सा नहीं लगता ?  स्वामी विवेकानन्द ने इसी प्रसंग में  चेतावनी देते हुए  कहा था, " धर्मान्ध लोगों के बारे में विचार कर के देखो। हर समय गुस्से से उनका चेहरा तमतमाया रहता है। और उनके लिये धर्म का अर्थ ही दूसरों के साथ लड़ना झगड़ना होता है। उन लोगों ने अतीत काल में धर्म के नाम पर क्या किया है, और यदि उनको मौका मिले तो आज भी क्या नहीं कर सकते हैं-जरा विचार कर देखो।"
अकाल पीड़ितों को राहत के लिये यथासंभव सहायता पहुँचाने का परामर्श देते हुए स्वामीजी ने एक पत्र में स्वामी ब्रह्मानन्द को लिखा था, " तुम्हारे साथ मैं यहाँ तक सहमत हूँ कि धार्मिक विश्वास एक अत्यन्त विस्मयकारी अन्तरदृष्टि है, तथा केवल इसी के द्वारा मनुष्य मुक्ति (मन की गुलामी और मृत्यु के भय से) मुक्ति प्राप्त कर सकता है। किन्तु इसमें धर्मान्धता या धार्मिक कट्टरता उत्पन्न हो जाने का खतरा  भी है।" यह बात हमेशा याद रखना कि जो रुढ़िवादी धर्मान्ध लोग, हमलोगों की निन्दा करते रहते हैं, ये समस्त सहायता राहत कार्य ही उन लोगों के प्रति हमारा एकमात्र उत्तर है।"
स्वामी विवेकानन्द ने श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठकर आध्यात्मिक शिक्षा पायी थी, इसीलिये उन्होंने न केवल समस्त धर्मों के प्रति सहनशीलता की शिक्षा पायी थी बल्कि समस्त धर्मों को ही सत्य मान कर  ग्रहण कर सके थे। उन्होंने यह जान लिया था कि समस्त धार्मिक-सम्प्रदाय  ईश्वर-प्रणिधान रूपी अन्तिम लक्ष्य में उपनीत होने का सच्चा पथ है। इसीलिये वे समस्त देशों के समस्त पैगम्बरों तथा अवतारों के प्रति समान रूप से श्रद्धान्वित हो सके थे। किन्तु जब वे किसी भी धर्म के अनुयायिओं को उनके धर्म के सिद्धांतों के विरुद्ध कोई कार्य करते देखते या वैसी बातें कहते सुनते तो कड़ी फटकार लगाते हुए उसकी भर्त्सना करने में कोई संकोच नहीं करते थे। इसीलिये जब कहीं आवश्यक लगा है, तो उन्होंने ईसाईयों एवं मुसलमानों के प्रतिकूल भी समालोचना की है, किन्तु  हिन्दुओं के प्रति समालोचना करते समय उनकी शब्दों के बाण इतने तीखे हो जाते थे कि बहुत से कट्टर हिन्दू क्रोध में उन्मत्त हो जाते थे। वे अपने विचार, कार्य तथा अभिव्यक्ति में निर्भीक थे।
उन्होंने अपने गुरु से यही शिक्षा प्राप्त की थी कि सामान्य जनता की आँखों से छुपा कर न तो कुछ सोचूंगा, न तो कहूँगा, न लिखूंगा, न करूँगा। वे स्वयं जिस बात को सत्य और दूसरों के प्रति कल्याणकारी नहीं समझते, उसे कभी कहते या करते नहीं थे। उनके जीवन और संदेशों के बारे में नये नये तथ्य निरन्तर आविष्कृत हो रहे हैं, तथा उनके जीवन और मस्तिष्क या मनो-आकाश के साथ सपूर्ण विश्व के लोग परिचित हो सकें इसीलिये उनको सामान्य जनता के सामने प्रकाशित किया जा रहा है। उनके जीवन तथा कार्य के सम्बन्ध में छुपाने योग्य कुछ भी नहीं है। 
उनके  द्वारा  रचित विवेकानन्द साहित्य हिन्दी भाषा में १० खंडों में उपलब्ध है, जिसको अत्यन्त गहरी जिज्ञासा लेकर बहुत धैर्य के साथ पढना आवश्यक होता है। वहाँ से थोड़े भी अंश को हटाया नहीं गया है। क्योंकि जब उनके ऐसा (नवनी दा के जैसा) व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ धीमे स्वर  में भी कुछ बातचीत कर रहा होता है, तो वह भी सम्पूर्ण मानव-जाति के कल्याण के लिए ही होता है। किन्तु उनके शब्दों को समझने के लिये उन्हें बहुत एकाग्र होकर सुनना पड़ेगा।
इस महा शक्तिशाली सामाजिक तथा आध्यात्मिक चरित्र-निर्माणकारी-'BE AND MAKE' -आन्दोलन का प्रारम्भ (अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के रूप में ), स्वयं स्वमी विवेकानन्द जी ने ही; समस्त मानव-जाति के जीवन को सुख-शान्ति और सौभाग्य से भर देने तथा एकात्मता स्थापित करने के लिये किया है। इसकी शक्ति तथा अवश्यम्भावी विजय की भविष्यवाणी करते हुए उन्होंने (मैक्स मूलर द्वारा लिखित 'रामकृष्ण :हिज लाइफ़ ऐंड सेइंग्स ' नामक पुस्तक पर लिखी गयी बंगला समालोचना में कहा था- १०/१५६ में ) स्वयं ही कहा है- " जो लोग श्रीरामकृष्ण के नाम की प्रतिष्ठा और प्रभाव को देखकर दास-जाति की तरह ईर्ष्या एवं द्वेष के वशीभूत होकर अकारण तथा बिना किसी अपराध के वैमनस्य प्रकट कर रहे हैं, उनसे हमारा यही कहना है कि 'हे भाई, तुम्हारी ये सब चेष्टायें व्यर्थ हैं। यदि यह दिग्दिगन्तव्यापी महाधर्म-तरंग--(महामण्डल) जिसके शुभ्र शिखर पर इस महापुरुष की मूर्ति विराजमान है--यदि हमारे धन, यश या प्रतिष्ठा या प्रतिष्ठा-लाभ की चेष्टा का फल हो, तो फिर तुम्हारे या अन्य किसीके लिए कोई प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है, महामाया के अलंघनीय नियम के प्रभाव से शीघ्र ही यह तरंग महाजल में अनन्त काल के लिये विलीन हो जायेगी! और यदि जगदम्बा-परिचालित इस महापुरुष की निःस्वार्थ प्रेमोच्छवासरूपी इस तरंग ने जगत  को प्लावित करना प्रारंभ कर दिया हो, तो फिर हे क्षूद्र मानव, तुम्हारी क्या हस्ती कि माता के शक्ति संचार का रोध कर सको ? " 
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