Tuesday, September 11, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [18] 'स्वामी विवेकानन्द तथा युवा समस्याएँ- ' त्रय दुर्लभं ' (स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज),

'अज्ञानता (हिप्नोटाइज्ड स्टेटऑफ़ माइंड) ही युवा समस्या का मूल कारण है ! '
प्रसिद्द ग्रीक दार्शनिक प्लेटो से पूछा गया, कि आप वास्तविक या सर्वश्रेष्ठ शिक्षा किसे समझते हैं ? तो उन्होंने कहा था, वास्तविक या सर्वश्रेष्ठ शिक्षा वह है जो, ' मनुष्य को उसके शरीर और आत्मा को उतना अधिक माधुर्य और दोषशून्यता प्रदान कर सके, जितने परिमाण में वह उसे ग्रहण करने में सक्षम हो।' यदि हम इस परिभाषा के साथ स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा की परिभाषा को मिलाकर कर देखें, तो पायेंगे कि वह बिल्कुल सटीक ही नहीं, बल्कि और अधिक स्पष्ट तथा सारगर्भित है। स्वामीजी कहते हैं- "मनुष्य के भीतर जो पूर्णता (perfection) पहले से विद्यमान है, उसकी अभिव्यक्ति (manifestation) को शिक्षा कहते है। "
'मनुष्य को उसके शरीर और आत्मा को उतना अधिक माधुर्य (gracefulness) और दोषशून्यता (पूर्णता) 
प्रदान कर सके, जितने परिमाण में वह उसे ग्रहण करने में सक्षम हो।' -इस कथन की अपेक्षा,"मनुष्य के भीतर जो पूर्णता पहले से विद्यमान है, उसकी अभिव्यक्ति को शिक्षा कहते है।" शिक्षा की यह परिभाषा सत्य को - और अधिक गहराई में जाकर स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करती है।
प्रथम परिभाषा में शिक्षा प्राप्त करने की पद्धति या उसे ग्रहण करने की समस्या के समाधान का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता, किन्तु शिक्षा की दूसरी परिभाषा में शिक्षा प्राप्त करने की वैज्ञानिक पद्धति का संकेत हम स्पष्ट रूप में देख सकते हैं। क्योंकि शिक्षा कभी बाहर से भीतर नहीं आयेगी । क्योंकि शिक्षा यदि बाहर से भीतर आएगी, तो किस वाहन के माध्यम से आयेगी, और विद्यार्थी उस शिक्षा को धारण कैसे करेगा ? इन सभी असंगत प्रश्नों को यह परिभाषा क्षण भर में शान्त कर देती है। दूसरी बात ' पूर्णता ' शब्द, सौन्दर्य को अलग से उल्लेख करने की कमी को भी मिटा देता है, क्योंकि उसके भीतर ' सत्य,शिव और सुन्दर ' का भाव अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। 
किन्तु कोई पूछ सकता है, कि अन्य समस्याओं के रहते हुए भी अचानक शिक्षा की बात क्यों हो रही है? यह इसी कारण से हो रही है, कि शिक्षा अपने आप में तथा विशेषरूप में युवाओं के लिए- बहुत महत्वपूर्ण विषय है; तथा युवावस्था ही जीवन गठन का सबसे उत्कृष्ट समय है, और उसका उपाय है-शिक्षा।
श्रीरामकृष्ण के कथन-' जावत बाँची तावत सिखी ', का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि -आजीवन शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। इस कथन के भीतर इस बात का संकेत भी मिलता है, कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य ही शिक्षा-प्राप्त (ज्ञान प्राप्त करना) है। स्वामी विवेकानन्द जब यह कहते हैं, ' यह जगत एक अध्यात्मिक व्यायामशाला है'- तो उनके इस कथन में भी इसी जीवनोद्देश्य का संकेत प्राप्त होता है। किन्तु ," यह मनुष्य-जीवन हमलोगों को किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिये मिला है",[वह भी कि यह मनुष्य-जीवन (त्याग की) शिक्षा ग्रहण करने के लिये मिला है- इसे बात को युवावस्था में ही समझ लेना तो तो दूर की बात है] - यह बोध (अहसास) तो अधिकांश लोगों में जीवन-संध्या में पहुँच जाने के बाद तक भी उत्पन्न नहीं हो पाता है। और विशेष करके युवा जीवन की समस्या का प्रारम्भ भी यहीं से होता है।
हम जानते हैं कि किसी लक्ष्य या उद्देश्य में पहुँचने के सिवा, किसी गति या प्रवाह का कोई अर्थ नहीं होता।और बिना किसी लक्ष्य या उद्देश्य के ही यदि जीवन-यात्रा शुरू हो गयी हो, जो अधिकांश क्षेत्रों में तो अब समाप्त होने को भी है- वैसा जीवन यदि बुढ़ापा आते आते कई प्रकार की कठिन समस्यायों से घिर जाये, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ?
यदि युवा जीवन की समस्त-समस्याओं को हल करना चाहते हों, तो सभी युवाओं में मनुष्य-जीवन को बहुमूल्य क्यों कहा जाता है (हीरा जनम अमोल था-कौड़ी बदले जाय) ? इस मूल्य-बोध के विषय में जागृत होना होगा। [ ' त्रय दुर्लभं ' -इस कथन के मर्म को समझना होगा !सभी युवाओं को समझना होगा कि यह जीवन एक महान अवसर है, यह जैसे-तैसे बिता देने की वस्तु नहीं है। यह मनुष्य-शरीर प्राप्त हो जाना, मनुष्य- जीवन मिल जाना ही एक महान सम्भावना है। इस सम्भावना को अभिव्यक्त कर देना ही जीवन का उद्देश्य है, और जीवन की सम्भावना को प्रस्फुटित करने का उपाय है-शिक्षा ! 
श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा (परमहंस-गुरु-शिष्य परम्परा) आधारित विचारों का विश्लेषण करने से हम समझ पाते हैं कि, ' शिक्षा, धर्म और आध्यात्मिकता ' में मूलतः कोई अन्तर नहीं है। इसीलिये किसी युवा में यदि धर्म या आध्यात्मिकता को जानने के प्रति कोई आग्रह नहीं हो, उसके मन में इसकी अवधारणा भी नहीं हो, किन्तु यदि वह शिक्षा के प्रति आग्रही हो, तो उसका भी परिणाम एक जैसा (सत्य वस्तु या ईश्वर की प्राप्ति) होगा। स्वामीजी कहते हैं- 'जो व्यक्ति जिस स्तर पर खड़ा है, उसके स्तर पर उतर कर, उसका हाथ पकड़ कर यदि संभव हो, तो उसको भी थोड़ा उपर खींच लो।' यदि, किसी प्रकार युवाओं के मन में, देवदुर्लभ-मनुष्य-जीवन के प्रति केवल श्रद्धा उत्पन्न कर दी जाय, तो उतने से भी बहुत बड़ा लाभ होगा। 'यह जीवन अति मूल्यवान है!' --ऐसा बोध उत्पन्न होते ही,उसके मन में अपनी अनन्त शक्ति (अन्तर्निहित दिव्यता) को अभिव्यक्त करने की 'आकूति' (उत्कंठा,Ardor) पैदा हो जाएगी। इस चेष्टा का नाम ही शिक्षा है।(किसी परमहंस शिक्षक=नेता का यही कार्य है !) 
किन्तु शिक्षा के मूल उद्देश्य -'मनुष्य में अन्तर्निहित पूर्णता (सत्य-शिव-सुन्दर की अनन्त संभावना) को अभिव्यक्त कर लेना है" -- को भूल कर, हमलोग अंततोगत्वा शिक्षा को परीक्षा पास करके नगद-नारायण  कमाने वाली शिक्षा या 'अर्थकरी विद्या'  में परिणत कर देते हैं। इसके परिणाम स्वरूप जो शिक्षा जीवन की मौलिक समस्याओं (भोजन-वस्त्र-आवास-मृत्यु ?) को हल करने में सहायक हो सकती थी, वह न होकर उल्टे कई प्रकार की नयी नयी समस्याओं को उत्पन्न करने का कारण बन जाती है। यहाँ एक पाश्चात्य विचारशील लेखक की कुछ बातों का उल्लेख करना, अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है -" किसी बच्चे के लिये सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात यह होगी, कि वह ऐसे परिवेश में पले-बढ़े जहाँ - मानवोचित गरिमा  के प्रति प्रेम नहीं हो, जहाँ केवल धन-लोलुपता (cupidity) का ही मनोभाव हो, जहाँ उसको बचपन से ही जीवन में सबसे अधिक मूल्यवान वस्तु- अतिरिक्त (excess) मनुष्यत्व, अधिक महानता, सामान्य मनुष्यों से अतिरिक्त आकर्षणशीलता (gracefulness) कैसे प्राप्त हो सकती है ? यह सब बातें न सिखाकर, केवल यही सिखाया जाता हो कि, किस उपाय से अतिरिक्त (excess) धन, एक्सेस शान-शौकत (splendor)
प्राप्त किया जाता है? इस प्रकार की कू-शिक्षा के द्वारा यदि किसी नवजात जीवन को उसके अध्यात्मिक केन्द्र से उसको बाहर खींच लाने का प्रयास करके, ईश्वराभिमुखी (पूर्णताभिमुखी) कार्यक्षेत्र (orbit) से जबरदस्ती खीँच कर, उसे मूल्यहीन साधारण सांसारिक लक्ष्य की ओर ठेल देने की शिक्षा देना बहुत ही निर्दयता का कार्य है। क्योंकि जब तक बच्चे का मन कोमल रहता है, केवल तभी तक उसे अच्छे-बुरे किसी भी साँचे में आसानी से ढाल कर गढ़ा जा सकता है।"
यदि हमलोग श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा (परमहंस गुरु-शिष्य परम्परा) की शिक्षाओं में समाहित उनके उपदेशों की समग्रता को बहुत सरल रूप से समझने की चेष्टा करें, तो प्रतीत होता है,उनकी शिक्षाओं के सार को निम्नोक्त भाषा में व्यक्त करना गलत नहीं होगा ( तथापि उनकी शिक्षाओं के सार को और भी कई प्रकार से अभिव्यक्त किया जा सकता है): " मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है, अपने अन्तर्निहित सत्य की दिशा में, अन्तर्निहित सत्ता की ओर, पहले से विद्यमान पूर्णता की दिशा में अग्रसर होते रहना, 'काँचा आमी'(कच्चे मैं) को- पाका आमी' (परिपक्व मैं) परिवर्तित कर लेना।अपने 'क्षूद्र अहं-बोध' (नामरूपात्मक मैं-पन) को - 'सर्वगत अहंकार' (अस्ति-भाति-प्रिय) में डुबो (submerged) देना। परार्थता के लिये अपने क्षूद्र स्वार्थपरता को बिल्कुल त्याग देना, अपने क्षूद्र व्यक्तित्व को एकमात्र अखण्ड व्यक्तित्व (Integrated personality) के साथ अभिन्न बना लेना, अपनी समस्त प्रेरक शक्तियों (Persuasive powers) को प्रेम में रूपान्तरित कर लेना।"
अर्थात अपने अहंकार (शरीर को मैं समझना) और स्वार्थबोध को जीत कर, हमारे हृदय में जो ' सत्य- मंगल-प्रेममय सत्ता' (सत्य-शिव-सुन्दर या होली ट्रायो -पवित्र त्रिमूर्ति) हैं, अपने जीवन के समस्त कर्मों में उन्हीं को अभिव्यक्त करने का प्रयत्न करते जाना। जो लोग ऐसा पूर्णतया कर पाते हैं, उन्हें अवश्य ईश्वर की प्राप्ति हुई है। बाकी लोग, जो जिस परिमाण में ऐसा जीवन जी पाते हैं, उन्होंने उसी परिमाण में देवत्व या मनुष्यत्व अर्जित किया है। मनुष्य-जीवन की समस्त समस्याओं के समाधान का यही एकमात्र पथ है, इसके सिव अन्य कोई पथ नहीं है।
तथा युवा भी कोई मनुष्येतर अन्य कोई प्राणी नहीं है, इस लिये युवा-समस्या के समाधान का भी यही एकमात्र पथ है। बल्कि कहा जा सकता है कि युवावस्था में ही इस पथ को  ग्रहण कर लिया जाय तो, मनुष्य-जीवन की अनगिनत समस्याओं के समाधान का मार्ग आसन हो जायेगा। किन्तु यदि ऐसा होता भी हो, तो भी सवाल उठता है कि- हमलोग किस प्रकार इस कठिन प्रयास (रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा) के व्रती (अनुयायी या votary) किस प्रकार बन सकते हैं ? इसका उपाय श्रीरामकृष्ण द्वारा निर्देशित एक छोटे से उपदेश-'जेमन भाव तेमन लाभ'(जैसी भावना वैसी सिद्धि)-अर्थात जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि मिलती है- में सन्निहित है! अर्थात जो कुछ भी हम पाना चाहते हैं, उपलब्धी करना चाहते हैं, उसके भाव को (बर्निग डिज़ायर को ) पहले हमें अपने हृदय में उपयुक्त तरीके से (आँखो का तारा समझने जैसा) सँजो कर रखना होगा। जैसा पहले चर्चा हो रही थी, जब तक मन कोमल है, उसको किसी प्रकार के साँचे में ढाला जा सकता है। जिस प्रकार भावादर्श के साँचे में मन को ढाला जायेगा, मन उसी भाव से भावित होगा (मन रंगरेज का कपड़ा है, उसे जिस रंग में रंगोगे उसी रंग में रंग जायेगा।) तथा उसी भाव के अनुरूप (पवित्र या अपवित्र) विचार उसमें प्रविष्ट होने लगेंगे। [चाणक्य नीति में कहा गया है - 
"देवे तीर्थे द्विजे मन्त्रे दैवज्ञे भेषजे गुरौ । 
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ।।"

अर्थः---देवता, तीर्थस्थल, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, वैद्य और गुरु---इनके प्रति मनुष्य की जैसी भावना होती है, वैसी ही उसको सिद्धि (सफलता) प्राप्त होती है ।]
इस विषय में एक पाश्चात्य मनीषी कहते हैं, " अपने मन की आँखों के सामने तुम जिस प्रकार की कल्पना की तस्वीर हमेशा देखने की चेष्टा करोगे, अपने हृदय के सिंहासन पर जिस आदर्श को आसीन रखोगे, वही आदर्श तुम्हारे जीवन का गठन करने लगेगा, और तुम स्वयं भी वही बन जाओगे। " बिल्कुल वही बात यहाँ भी कही जा रही है। 
मनुष्य का जीवन-गठन बाह्य सामग्रियों के द्वारा नहीं होता। हमारा मन ही, (अर्थात मन की प्रकृति स्वाभाव या Attitude of mind) ही अपने को आदर्श, किसी वैशिष्ट आदर्श के साँचे में ढाल कर मनुष्य-निर्माण कर देता है। स्वामीजी कहते थे- ' या मतिः सा गतिर्भवेत।' इस प्रकार हम यह देख सकते हैं- कि मन के भाव (उठने वाले प्रमुख विचार) या आदर्श के उपर ही जीवन का गठन निर्भर करता है। अतः मनुष्य बनने या जीवन-गठन करने के लिये दो कार्य करने होंगे।
पहला, मन को अपने वश में रखते हुए (चरित्रवान-मनुष्य बनने और बनाने के) कार्य में नियोजित करना होगा। दूसरा, भाव या आदर्श का चयन करते समय भी सही-सही निर्णय (विवेक-प्रयोग द्वारा ) करना होगा। वैसे तो मन का स्वाभाव अत्यन्त चंचल है, किन्तु मन के शक्ति की कोई सीमा नहीं है। सच तो यह है कि हमलोग मन की सहायता के बिना कोई भी कार्य नहीं कर सकते। इसीलिये, चाहे जिस प्रकार  हो, मन को एकाग्र और नियंत्रित रखते हुए, उसकी शक्ति की सहायता से हमलोगों को सभी कार्य करने पड़ते हैं। हमारा मन ही किसी  पवित्र-भाव या आदर्श को धारण करता है। मन में जो छवी बस जाती है, कल्पना में हम जिस छवि को निहारते रहते हैं, जिन तीव्र-इच्छाओं (बर्निंग डिज़ायर्स) को हम क्रियान्वित करना चाहते हैं,वे सभी मन की चिन्तन-शक्ति द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं। किन्तु मन यदि सदैव चंचल बना रहे तो, वह छवि विकृत हो जाती है, तथा उसे उचित रूप से समझने की चेष्टा में ही मन की सारी शक्ति नष्ट हो जाती है। और वैसा मन फिर उस आदर्श को वास्तविकता के धरातल पर उतारने में असमर्थ हो जाता है। इसीलिये मन को एकाग्र और नियंत्रित करने का अभ्यास करते रहना विशेष रूप से आवश्यक है। मन को मन के द्वारा ही शासन करना पड़ता है। (डबल प्रेजेंस ऑफ़ माइंड -मन अपने को ही द्रष्टा  मन और दृश्य मन में बाँट लेता है। ) उसे वश में रखने का एकमात्र उपाय है, निरन्तर अभ्यास करते रहना। निरंतर अभ्यास करते रहने से मन धीरे धीरे नियन्त्रण में आने लगता है, और वशीभूत मन एकाग्र-चित्त होकर किसी  भाव या आदर्श को मूर्तरूप देने लगता है।
ऐसा कहा जाता है कि मन को एकाग्र रखने में 'वैराग्य'( अर्थात लालच को कम करते जाना ) बहुत सहायक सिद्ध होता है। मन स्वभावतः रूप-रस आदि इन्द्रिय-विषयों में बिना चाहे ही आकृष्ट हो जाता है, किसी विशेष भोग्य विषय में मन यदि अत्यंत आकृष्ट रहे, उन्हीं विषयों के चिन्तन से चिपका रहना चाहे, तो इसमें ही मन की सारी शक्ति व्यर्थ में खर्च हो जाती है। अतः हम यदि किसी भी प्रयोजनीय विषय में मन को एकाग्र करना चाहते हों, या उसको नियन्त्रित करके उसकी शक्ति को बढ़ाना चाहते हों, तो (निवृत्तिमार्गी संन्यासियों के जैसा नहीं, फिर भी) यथासंभव वैराज्ञपरायण  होना आवश्यक है। (अली-मृग-मं-पतंग-गज  समान विषयों को विषवत समझकर) जैसे ही मन भोगों में आसक्ति को त्याग देता है; स्वतंत्रता पूर्वक (freely) किसी उच्चतर तत्व या सिद्धान्त में अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ प्रयुक्त (व्यवहृत) होकर, वह एकदम सही परिणाम (१०० % मार्क्स) दे सकता है। 
इस प्रकार नियंत्रिरित किये हुए मन को (अर्थात भोगों में अनासक्त पवित्र मन को ) पूरी एकाग्रता के साथ, किसी आदर्श में नियोजित करने मात्र से ही उस आदर्श को,हमलोग अपने जीवन में रूपायित कर सकते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है, कि किसी विशिष्ट आदर्श (विशिष्ट मानक, Specific Standard) को अपने जीवन में रूपायित कर पाने से ही हमलोगों का जीवन-गठन या चरित्र-गठिन हो सकता है। अब प्रश्न है, कि आदर्श क्या है ? कोई आदर्श वह भाव-समष्टि (mindset) है, जिसमें बहुत सारे परस्पर-सम्बद्ध भाव ग्रथित होकर हर दृष्टि से आदर्श रूप में इस प्रकार  जमा हो जाते हैं, कि उन भावों को कार्यान्वित 
करने से व्यक्ति या समाज के सभी पहलु पूर्ण मात्रा में विकसित हो सकते हैं। इसलिये इस प्रकार का आदर्श किसी व्यक्ति या समाज को पहले तो - उपहारस्वरूप एक सामग्रिक जीवन-दृष्टि प्रदान करता है, फिर जीवन-मार्ग की प्रदक्षिणा (जन्म-मरण ) के ज्ञातव्य तथ्य प्रदान करके जीवन-पथिक की सहायता करता है, तथा मार्ग पर चलते समय यदि पैर डगमगा जायें तो तत्काल सहायता भी प्रदान करता है।  
आदर्श के दो पहलु हैं। पहला, कोई निराकार भावमूर्ति। दूसरा, किसी साकार आदर्श में रूपायित एक जीवन। निराकार भाव-मूर्ति रूपी कोई आदर्श, किसी व्यक्ति की उच्चतम पूर्णता (दोषरहित- faultless) की धारणा का वहन करता है। यह आदर्श एक ऐसी काल्पनिक आकृति (माँ भवतारिणी) है, जो किसी वास्तविक वस्तु के समान ही हमलोगों के मन के समक्ष रहती है, और जिसका अनुकरण करके हमलोग
आसानी से अपने जीवन को विकसित कर सकते हैं।
किन्तु ऐसे साकार आदर्श में रूपायित कोई जीवन बहुत विरले ही देखने को मिलता है। किन्तु, निराकार भाव-मूर्ति रूपी किसी काल्पनिक आदर्श की अपेक्षा ऐसा कोई जीवन बहुत अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। वास्तविक जीवन की उष्णता से कल्पनालोक में चित्रायित आदर्श की विचार-मूर्तियों में प्राण स्पन्दित होने लगते हैं, तथा वे विचार आसानी से शिष्य के मन में भीतर तक प्रविष्ट हो जाते हैं। मनुष्य का मन स्वभावतः आदर्श (अमूर्त विचारों) की अपेक्षा, व्यावहारिक उदाहरण (मिसाल-मोडेल) के द्वारा अधिक प्रभावित होता है। (जैसे जीवन्त दृष्टान्त - नवनी दा को देखकर मन में त्याग और सेवा के प्रति अधिक आस्था भाव उत्पन्न होता है।) स्वामी विवेकानन्द ने मानव-महिमा (Human glory-'ब्रह्म को जानने का सामर्थ्य') तथा मनुष्य-जीवन की संभावनाओं के जिस महान आदर्श का प्रचार किया था, वे स्वयं उसके एक जीवन्त प्रतिमूर्ति हैं। हमलोग इस जीवन्त आदर्श के माध्यम से - एक असाधारण जीवन-दर्शन, जीवन का एक महान उद्देश्य, उस उद्देश्य को प्राप्त करने का एक आलोकित पथ, तथा फिसलन भरे मार्ग पर रपट पड़ने की शंका को दूर करने वाला, बज्र जैसे मजबूत हाथों का सहारा-एक साथ प्राप्त कर सकते हैं। दुर्गम यात्रा-पथ पर साहस पूर्वक चलने का-आत्मविश्वास, उत्साह और इसी जीवन में पूर्णता के आनन्द का आस्वादन  करने का आशीर्वाद - यह सब कुछ हम विवेकानन्द से  प्राप्त कर सकते हैं। आज, नश्वर शरीर में नहीं रहने पर भीउनका (नवनी दा का)  आदर्श उनकी भावमूर्ति  चिर-अपरिवर्तनीय (अविनाशी) होकर, पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रेरणास्पद तथा माननीय हो उठी है।
$$$ अब हमलोग युवा-जीवन की समस्याओं के भीतर थोड़ी और अधिक गहराई में प्रविष्ट होकर,  यह देखने की चेष्टा करेंगे कि स्वामीजी की दृष्टि (परमहंस श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में प्रशिक्षित नेता की दृष्टि) से इस समस्या का समाधान किस प्रकार संभव हो सकता है ? 
युवा-जीवन प्राण-उर्जा से भरपूर रहता है; इस अवस्था में उत्साह और उत्कण्ठा का कोई आभाव नहीं होता। क्रियाशीलता की पराकाष्ठा बनी रहती है। किन्तु इस उम्र में श्रेय-प्रेय विवेक (या बेहतर निर्णय लेने की क्षमता) पर्याप्त मात्रा में क्रियाशील नहीं रहती है। युवा काल में जीवनी शक्ति (vitality) बेलगाम घोड़ों की तरह यथेच्छ (ad-libitum,ऐड लिबिटम, बिना पूर्व तैयारी के) गतिशील रहती है। आदर्श, उद्देश्य --में से किसी की आवश्यकता भी सही रूप में उपलब्ध नहीं होती। परन्तु, यदि युवा काल में ही तीव्र उत्साह, उत्कण्ठा, क्रियाशीलता के साथ- आदर्श, उद्देश्य और उपाय को ग्रहण कर लिया जाय,यदि सफलता की सम्भावना और आत्मविश्वास में अटल आस्था रहे, यदि दृढ संकल्प, धैर्य और अध्यवसाय में पवित्रता का सहयोग रहे, तो युवा जीवन केवल समस्या मुक्त ही नहीं होता, बल्कि श्री-वृद्धि से सम्पन्न (Mr Don-अगुआ-नेता) भी बन सकता है। किन्तु युवा काल में इन विषयों के बारे में अक्सर सुनने को नहीं मिलता है, इसलिये इस ओर ध्यान भी नहीं जाता है। जिसके फलस्वरूप युवा-जीवन समस्याओं से संक्षुब्ध हो उठता है। 
युवा समस्या का मूल कारण स्वाभाविक अज्ञानता है (हिप्नोटाइज्ड स्टेटऑफ़ माइंड है) है, जो मुक्ति की अवधारणा को धुँधला कर देती है, और वह संयमहीनता को ही अन्तर्निहित शक्ति (ब्रह्मत्व या डिविनिटी) की अभिव्यक्ति का पर्याय समझने लगता है। यह 'मुमुक्षा' (डी -हिप्नोटाइज्ड होने की इच्छा) या मुक्ति की भावना प्राणों के साथ जुड़ी हुई प्रत्येक वस्तु में रहती है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य इसी मुक्ति की समग्रता का (स्वयं को विसम्मोहित करने की पद्धति का) अनुसन्धान करना है। जब तक मुक्ति का रहस्य उद्घाटित नहीं हो जाता, जीवन कभी स्थिर नहीं रह सकता। युवा-समुदाय विविध प्रकार की चंचलताओं (क्रिकेट,सिनेमा,अड्डेबाजी) के माध्यम से सर्वदा मुक्ति का ही अनुसन्धान कर रहा होता है। " मुक्ति यहाँ नहीं, यहाँ नहीं, कहीं और है, किसी दूसरे जगह देखो '- उसका जीवन इसी प्रकार भागता रहता है। यही है युवा जीवन की समस्याओं का वास्तविक कारण। उपर-ऊपर से युवाओं के जीवन में जो समस्यायें (आज्ञालंघन, मोबाईल-इंटरनेट का दुरूपयोगआदि दुर्गुण) दिखायी देती हैं, वे सभी आम तौर पर बाहरी हैं या गौण हैं। किन्तु मुख्य और मूल समस्या युवा-जीवन की आन्तरिक समस्या है। (यौवन की ऊर्जा का विवेक-प्रयोग के साथ सदुपयोग नहीं कर पाने की असमर्थता है।) और उसका मूल कारण अज्ञान (अविद्या माया) है, जो उसको उसके यथार्थ मुक्ति के स्वरूप को देखने नहीं देती। (डी-हिप्नोटाइज्ड होकर 'अहं ब्रह्मSस्मि' का अनुभव नहीं करने देती) और वह संयमहीन जीवनीशक्ति की सनसनाहट (जोश या Zing) में ही मुक्ति की पहेली या गोरखधन्धे (conundrum) को देखता रहता है। [आचार्य शंकर ने कहा है, त्रय दुर्लभं -' मनुष्यत्वं,मुमुक्षत्वं, महापुरुष संश्रयः ' या चार पुरुषार्थ में अंतिम - 'मोक्ष' (डी-हिप्नोटाइज्ड हो जाने की इच्छा) भी रहे तो किसी ऐसे महापुरुष का आश्रय मिलना दुर्लभ है, जो उसको ५ अभ्यास के द्वारा डी -हिप्नोटाइज्ड होने की पद्धति का प्रशिक्षण दे सके। ]
युवाओं के प्रति जिन कटाक्ष और अपशब्दों का प्रयोग, युगों युगों से किया गया हैं, आज के युवा यदि उन पर ध्यान देने लगें तो अपने आप पर से उनकी श्रद्धा ही समाप्त जाएगी। किन्तु यदि भारत के युवा  सचमुच अपने जीवन में एक युगान्तकारी परिवर्तन लाने के लिए वचनबद्ध (committed-प्राणजाइ पर वचन न जाइ) हो जाएँ, (ऑटो सजेशन पद्धति से-अब लौं नसानी अब न नसैहौं) का संकल्प-ग्रहण कर लें, तो स्वामी विवेकानन्द को युवा-आदर्श के रूप में ग्रहण करके, एक बार 'मनुष्य -निर्माणकारी' जीवन पथ पर एक बार चल कर देख सकते हैं। किन्तु एक शर्त है -- युवाओं को अपनी एक आम धारणा का त्याग करना होगा, कि दूरस्थ धुँधले कल्याण (विवेकज आनन्द  प्राप्त करने) की सम्भावना की अपेक्षा, वर्तमान में अस्थि-चर्म के माध्यम से (दाद-दिनाय को खुजलाने से) अनुभूत होने वाला सुख ही बड़ा होता है। यह भूलना नहीं चाहिए कि बंगला कवि रामप्रसाद के सुर से सुर मिलते हुए एक पाश्चात्य कवी ने भी गाया है- ' मनुष्य का सबसे बुरा काम (सबसे बड़ी गलती) है, जो सृष्ट हुआ है उसका दुरूपयोग (misuse) करना, तथा सम्पूर्ण अतीत (डिविनिटी) को अर्थहीन वर्तमान में डुबो देना।' इसीके गलती के फलस्वरूप हम जर्मन साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना फ़ाउस्ट (Faust) 
के प्रसिद्द जंगल के एकान्त में स्वगत-गान में सुनते हैं  -
" অহো ! হের মনুষ্যের হেন ভগ্ন দশা !
    এবে জানি আমাদের অপূর্ণতা কোথা । "
(अहो ! हेर मनुष्येर हेन भग्न दशा ! एबे जानि आमादेर अपूर्णता कोथा।) - अर्थात अरे देखो, मानवों की ऐसी भग्न दशा, और जानने की चेष्टा करो कि हमारी अपूर्णता कहाँ है? क्या मनुष्य अपनी अपूर्णता को पूर्णता में परिणत नहीं कर सकता ? जो सृष्ट हुआ (तुमने नहीं बनाया ) है, उस शक्ति का दुरूपयोग करना क्या हम बन्द नहीं कर सकते ? (क्या हमलोग संयम के द्वारा अपने इच्छाशक्ति के प्रवाह  और विकास को फलप्रसू नहीं बना सकते ?)  क्या मनुष्य दूरस्थ कल्याण (विवेकज आनन्द की प्राप्ति) के अस्पष्ट सम्भावना को, अनुभूत विश्वास (आत्मसाक्षात्कार) में परिणत नहीं कर सकता है ? निश्चय ही कर सकता है ? किन्तु, इसके लिए पहले यौवन की उत्ताल जीवनी-शक्ति को अनुशासित करना होगा। मुक्ति के स्वरूप पर अज्ञान का जो आवरण पड़ा है, उसे क्रमशः उन्मोचित करते हुए (स्वयं को विसम्मोहित करते हुए), पुर्णतः अनावृत्त करने के साथ ही साथ स्पष्ट रूप से (हाथ पर रखे आँवले के समान) देख लेना होगा
मन को नियंत्रित करके प्रकृति के उपर प्रभुत्व स्थापित करना होगा। तब केवल स्वस्थ और पवित्र विचार ही हमारे मन को उत्प्रेरित कर सकेंगे, जीवन का एक नया दर्शन खुल जायेगा। जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित हो जायेगा, मार्ग पर लगे मील के पत्थर (विविध रंग?) दिखाई देने लगेंगे, एषणायें (वित्तैषणा, पुत्रैषणा तथा लोकैषणा) उपयोगी होकर काम में आएँगी, उनको नियंत्रण में रखने का सामर्थ्य भी प्राप्त हो जायेगा। अर्थात अन्तःकरण (मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार) आदि के उपर सक्रीय  नियंत्रण प्राप्त होगा, और बाहरी व्यवहार में भी उसकी अभिव्यक्ति प्रतिबिंबित होने लगेगी। इसके परिणाम स्वरुप चरित्र-बल आएगा, जीवन गठित होने लगेगा। और क्रमशः सुगठित जीवन में ही समस्त समस्याओं का समाधान दिखाई देने लगेगा।
वर्तमान युवा-समस्या का विश्लेषण, स्वामी विवेकानन्द के विचारों के आलोक में  करने से उसके समाधान का ऐसा मार्गदर्शन प्राप्त होता है। किन्तु सामान्य प्रचलित विचार-धारा की अपेक्षा यह मार्गदर्शन इतना भिन्न है, कि हर कोई आसानी से इस विचार का स्वागत करने साहस नहीं कर पायेगा। इसका कारण यह है कि हमलोग अपने को चाहे कितना भी क्रान्तिकारी कह कर क्यों न जाहिर करें,किन्तु किसी नये विचार को स्वीकार करने में हमें बहुत भय होता है। वास्तव में 'परमहंस'श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द विचारधारा जीवन के समस्त पहलूओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने में सक्षम है।
किन्तु उनकी नई क्रान्तिकारी आह्वान के प्रतिउत्तर में,जो जन-कल्याण के कार्यों में अपने जीवन तक को न्योछावर कर सके, ऐसे क्रान्तिकारी मन का बहुत बड़ी संख्या में मिलना संभव नहीं है। किन्तु, जो भी थोड़े से लोग हों, अब उनके सामने आ जाने का समयआ गया है। वे लोग भी स्वामीजी के जैसा कहने का साहस रखकर कहेंगे, " सारी दुनिया भी हाथों में तलवार लेकर मेरे विरुद्ध क्यों न खड़ी हो जाये, किन्तु मैं एक बार जिसे सत्य,शिव और सुन्दर समझ कर ग्रहण कर लिया हूँ, उसको छोड़ नहीं सकता।" 
" हमलोग इस देव-दुर्लभ मनुष्य जीवन की उपेक्षा करके इसे नष्ट नहीं होने देंगे। तात्कालिक (क्षणिक) देह-सुख के बदले हम भूमानन्द पाने की सम्भावना को धूल में फेंकना नहीं चाहेंगे। करोड़ो करोड़ भुखमरी के शिकार मनुष्यों के आर्तनाद को अनसुना करके,व्यक्तिगत सुख-भोग पाने की खोज नहीं करेंगे, जीवन्त देवता की अनदेखी करके उसकी अनन्त अभिव्यक्ति का अपमान नहीं होने देंगे।"
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(Faust, Dante, and Changing Human Consciousness)
Where ordinary consciousness discriminates the many, the seer experiences the One, all-encompassing, all-embracing Beingness:
Eternal light, You only dwell within
Yourself, and only You know You: 
Self-knowing, Self-known, You love and smile upon Yourself!
This vision, however, is not simply given to Dante. He attains to it only after his long and arduous journey through Hell and Purgatory. In order to go through the necessary transformation and purification willingly -- one has to engage a tremendous amount of will to pit against life-long habits -- the objective truth of the goal one strives for must be absolutely certain. One may reach the goal or one may fall short, but there is no question about its existence and reality.
[with thanks sourced from:http://www.knottinginto.org/faust.html]
१. ह्रदय को शिक्षित किये बिना मन को शिक्षित करना, किसी भी प्रकार से कोई शिक्षा ही नहीं है।
Educating the mind without educating the heart is no education at all.- Aristotle अरस्तू
२. प्लेटो शिक्षा के बारे में कहता है कि शिक्षा का काम आत्मा की आंखों को प्रकाश दिखाना है, उसकी स्वतंत्र आध्यात्मिक गतिशालता को बाधित करना नहीं. यानि शिक्षा का काम आत्मा के आंतरिक गुणों के निखारने का माहौल प्रदान करना है, आत्मा अपना विषय तथा उसका रास्ता खुद खोज लेगी. शिक्षा से मेरा तात्पर्य, युवास्था से ही वह उत्कृष्ट प्रशिक्षण है - जो एक इंसान के अन्दर एक आदर्श नागरिक बनने की तीव्र लालसा उत्पन्न कर दे, और उसे न्याय के साथ शासन करना और आज्ञा मानना सिखाये।'
By education I mean that training in excellence from youth upward which makes a man passionately desire to be a perfect citizen, and teaches him to rule, and to obey, with justice. This is the only education which deserves the name.- Plato प्लेटो 
गुरु सुकरात की भांति प्लेटो ने भी आदर्श समाज का सपना देखा था. जहां कानून का राज हो. मगर कानून का कर्तव्य अपने नागरिकों को अनुशासन में बांधने तक सीमित नहीं है. बलप्रयोग से जेलखाना तो चलाया जा सकता है, समाज नहीं. समाज को चलाने के लिए नैतिक बल की जरूरत पड़ती है. वह चाहता था कि व्यक्ति का नैतिक स्तर इतना ऊंचा हो कि समाज में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून की आवश्यकता ही नहीं पड़े. चरित्र-निर्माण में शिक्षा की महत्ता को समझते हुए वह बच्चों को बहुआयामी शिक्षा दिए जाने के पक्ष में था, ताकि उनका बहुमुखी विकास हो सके. वह चाहता था कि बच्चों को गीत-संगीत की शिक्षा मिले, ताकि उनमें थोड़ी संवेदनशीलता हो और वे सुहृदय नागरिक की भांति व्यवहार कर सकें.
नियमित व्यायाम को उसने शिक्षा के अनिवार्य हिस्से के रूप में उल्लिखित किया है. प्लेटो नागरिकों को शारीरिक और मानसिक रूप से हृष्टपुष्ट देखना चाहता थाधैर्यअनुशासन और साहस को उसने शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य के रूप में लिया था. अपनी पुस्तक ‘लाज’ में उसने लिखा है कि किशोरावस्था में कदम रखने के साथ ही बालक को एक कुशल स्वास्थ्य प्रशीक्षक के सुपुर्द कर देना चाहिए. शरीर को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए उनको व्यायाम की भी शिक्षा दी जाए. इसके साथ-साथ गणित और विज्ञान की शिक्षा भी अनिवार्यतः दी जानी चाहिए, ताकि वे प्रकृति में होने वाले बदलावों को भली-भांति समझ सकें. 
प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य के सर्वोच्च शासनाधिकारी के रूप में ‘दार्शनिक नेता (सम्राट) ’ को रखा है. दार्शनिक सम्राट वह बन सकता है जो बुद्धि, विवेक, साहस, ज्ञान, समानता, दयालुता, निष्पक्षता आदि मानवीय गुणों से संपन्न हो. उनमें भौतिक वस्तुओं, विशेषकर विलासितापूर्ण सामग्री के प्रति कोई आकर्षण नहीं होना चाहिए, इसलिए कि ऐसी वस्तुएं निरर्थक स्पर्धा और आपसी ईष्र्या को बढ़ाती हैं. इसलिए उन्हें इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि उनमें विलासिता की सामग्री के प्रति स्वतः अनाकर्षण हो.उन्हें गंभीर और मननशील होना चाहिए, ताकि वे निजी आकांक्षाओं से बच सकें प्लेटो के दो प्रमुख ‘संवाद’ ‘रिपब्लिक’ एवं ‘दि स्टेट्समेन’ में जहां दार्शनिक सम्राट का उल्लेख होता है, वहीं ‘लॉज‘ में वह संरक्षक वर्ग में से चुने गए प्रतिनिधि–मंडल को राज्य की बागडोर सौंपने का समर्थन करता है. ‘लॉज‘ प्लेटो के अंतिम दिनों की रचना है। ‘लॉज‘ तक आते–आते प्लेटो को लगने लगा था कि कुछेक व्यक्तियों, चाहे वे दार्शनिक ही क्यों न हों, के हाथ में सत्ता का सिमटना घातक हो सकता है, इसके निदान के लिए वह दार्शनिक मंडल के हाथों में सत्ता सौंपने का विचार प्रस्तुत करता है, जो गणतंत्र की भावना के अपेक्षाकृत निकट है.प्लेटो का यह भी मानना था कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति स्वयं को समाज के लिए उपयोगी बना सकता है. शिक्षा की महत्ता को समझते हुए उसने ‘अकादमी’ की स्थापना की थी. प्लेटो का शिक्षा–दर्शन उसकी संवाद–पुस्तकों ‘रिपब्लिक’ तथा ‘लॉज‘ में विस्तारपूर्वक सामने आया है.यह पूछे जाने पर शिक्षा का लाभ क्या है, प्लेटो इसी संवाद में एक एथेंसवासी के माध्यम से स्पष्ट करता है—‘यदि तुम यह जानना चाहते हो कि शिक्षा का सामान्य लाभ क्या है, तो इसका उत्तर बहुत आसान है—शिक्षा मनुष्य को सदगुण–संपन्न करती है; और सद्गुण–संपन्न व्यक्ति विनम्रतापूर्ण व्यवहार करता है. अपनी विनम्रता के बल पर वह युद्ध में अपने शत्रुओं का दिल भी जीत लेता है.’
प्लेटो यहां निर्दिष्ट करता है शिक्षा का दायित्व मंत्री स्तर के उस व्यक्ति को सौंपा जाना चाहिए तो उदार, गुणी और भेदभाव रहित हो. वह किसी प्रतिष्ठित परिवार में जन्मा हो तथा उसकी उम्र ‘कम से कम पचास वर्ष’ होनी चाहिए.उसके अनुसार मां और नर्स का कर्तव्य है कि वे बच्चों को केवल साहस, धैर्य और कर्तव्यपरायणता से भरपूर कहानियां सुनाएं.प्लेटो के अनुसार किशोरों को पढ़ाया जाना चाहिए कि बुराइयां कभी भी ईश्वर की ओर से नहीं आतीं. सृष्टि में व्याप्त ‘शुभ–अशुभ’ में से केवल ‘शुभ’ ही ईश्वर की निर्मिति है. ‘अशुभ’ या तो भ्रांति है अथवा मानवीय लालच और अज्ञानता की उपज.शिक्षा का उद्देश्य बालकों में जोश भरना, वीरता और युद्धक्षेत्र में शहीद हो जाने की भावना पैदा करना भी है. अतः किशोरों को सिखाया जाना चाहिए कि दासता मृत्यु से कहीं बदतर है. इसलिए उन्हें रोने–धोने वाले मनुष्य की कहानी सुनाने से बचना चाहिए। 
[साभार https://omprakashkashyap.wordpress.com]

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