Sunday, September 16, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [23] " सच्ची शिक्षा मिलनी चाहिये " (शिक्षा : समस्त रोगों का रामबाण ईलाज है),

' शिक्षा मनुष्य को यथार्थ मनुष्य में परिणत कर देती है !'
किस आधार पर एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य में अन्तर आ जाता है ? केवल शिक्षा के आधार पर। शिक्षा के द्वारा असंस्कृत मनुष्य, सुसंस्कृत, परिशोधित (refined) मनुष्य में परिवर्तित हो जाता है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य का जीवनबोध, जीव-जगत के प्रति उसका दृष्टिकोण, उसकी अवधारणा और विचार उदार, उन्नत और विस्तृत हो जाते हैं। शिक्षा से मनुष्य को विश्व और जीवन में अन्तर्निहित शक्तिसमूहों का ज्ञान तथा उन शक्तियों का उपयोग करने में दक्षता प्राप्त होती है। आत्म-शक्ति में उसका विश्वास दृढ हो जाता है। ज्ञान की परिधि में विस्तार होने के साथ ही साथ भय की सीमा का चरम बिन्दु (मृत्यु का भय ) भी घट कर छोटा होता जाता है।
सभी के साथ एकात्मता की अनुभूति के फलस्वरूप मनुष्य का स्वार्थबोध (खुदगर्जी) क्रमशः समाप्त होने लगती है। उसके आचार-विचार और व्यवहार में, या सब कुछ में संयम और सहानुभूति अभिव्यक्त होने लगती है। मनुष्य अपने स्वार्थ को भूल कर दूसरे के लिये कार्य करना चाहता है, सज्जनता,प्रेम और मैत्री की भावना के सामने-घृणा,द्वेष, हिंसा पराजित होने लगते हैं। आत्मसुख की इच्छा के अपेक्षा परहित की भावना बड़ी होने लगती है। बाहर में सुख और आनन्द की खोज बन्द हो जाने से -हृदय सर्वदा आनन्द से भरा रहता है। विभिन्न प्रकार के भेदों, अपने-पराये  की सीमारेखा क्रमशः दृष्टि से ओझल हो जाती है। सबों के लिये प्रेम हृदय में हिलोरे मारने लगता है। सुख और आनन्द की पहले वाली धारणा में आमूल परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप हृदय शुद्ध और पवित्र हो जाता है। 
शिक्षा ही किसी व्यक्ति को यथार्थ मनुष्य में परिणत कर सकती है। अशिक्षित मनुष्य और पशु में असमानता (Disparity या विषमता) क्या है ? पशु पूर्ण-पशु के रूप में ही आता है, जबकि मनुष्य असम्पूर्ण होकर आता है,प्रत्येक मनुष्य में कुछ न कुछ कमियाँ रहती हैं,किन्तु शिक्षा मनुष्य को सम्पूर्ण बना देती है। मनुष्य को पूर्णत्व प्राप्त करा देना ही शिक्षा का उद्देश्य है। किन्तु पूर्णता बाहर से नहीं आती है। (बाहर से कुछ ग्रहण करके पूर्ण नहीं हुआ जाता है) बल्कि मनुष्य के भीतर ही पूर्णता है, किन्तु सूप्त अवस्था में है। बाहर से मृदु आघात देकर भीतर की उस सूप्त पूर्णता को जाग्रत करा देना शिक्षक और शिक्षा का कार्य है। [जो मनुष्य विवेक-प्रयोग करके अपनी कमियों को दूर करता जाता है और अच्छाई के साथ जीने लगता है, तथा  अच्छे गुणों को आत्मसात करता जाता है, वह अच्छा मनुष्य बन जाता है। और जो विवेक-प्रयोग का अभ्यास नहीं करता  वह बुरा मनुष्य या पशु जैसा मनुष्य बना रहता है। यही अशिक्षित मनुष्य और पशु में असामनता है ]

मेरे भीतर में पूर्णता विद्यमान है, इस सत्य को स्वीकार कर लेने या विश्वास करने को ही श्रद्धा कहते कहते हैं। इसीलिये मनुष्य बन जाने की साधना में श्रद्धा अत्यन्त आवश्यक वस्तु है । क्योंकि मेरे भीतर पहले से ही पूर्णत्व (perfection) विद्यमान है; इस सत्य को नहीं जानने से, उसको जगाया कैसे जा सकता है? इसीलिये कहा जाता है- श्रद्धावान लभते ज्ञानम। एक मनुष्य (लीडर) से दूसरे मनुष्य (ऑर्डिनरी मैन) में अन्तर केवल इसी श्रद्धा के तारतम्य के कारण होता है। जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, उसको वैसा लाभ मिलता है।
इसी श्रद्धा के साथ संयुक्त होने का प्रयत्न करते करते भीतर की पूर्णता क्रमशः अभिव्यक्त होने लगती है। पूर्णत्व की इसी अभिव्यक्ति को शिक्षा कहते हैं। जिस व्यक्ति जितनी मात्रा में पूर्णत्व विकसित हुआ हो, उसे उतनी ही मात्रा में शिक्षित कहा जा सकता है। इसके साथ ही साथ मनुष्य में जो कच्चापन का भाव (या स्वयं को केवल शरीर मानने का भ्रम या देहाध्यास ) या अपूर्णता  का भाव (स्वयं को केवल शरीर-मन युक्त यंत्र समझने का भाव) रहता है- वह क्रमशः कम होता जाता है। तथा उपरोक्त गुण -(आत्म-श्रद्धा,निर्भीकता, निःस्वार्थपरता,त्याग, सेवा आदि ) उसके चरित्र में क्रमशः प्रस्फुटित होने लगते हैं। 
'कच्चा' या अधूरा (imperfect) रहने का तात्पर्य क्या है ? कच्चापन का अर्थ है, कुछ और (Something else) प्राप्त करने की प्रत्याशा (expectancy) में रातदिन पड़े रहना। मैं यदि पूर्ण होता जाउँगा, तो मेरी कामनायें (चाहतें) क्रमशः कम होती जायेंगी। मेरी स्वार्थपरता कम होती जाएगी, मेरा डर बिल्कुल समाप्त हो जायेगा (मैं खुद देख लूँगा कि-डर के आगे जीत है !) मेरी पर-निर्भरता कम होती जाएगी,  अर्थात मैं दासत्व से मुक्ति की ओर  (emancipation) अग्रसर होता जाऊंगा । परवशता का मनोभाव, गुलामी का मनोभाव, हीन भाव कम होता जायेगा। क्या गुलामी की जंजीर में बंधा व्यक्ति कभी सुख पा सकता है? 'पराधीन सपनेहूं सुख नाहीं'-- दासत्व में सुख कहाँ है ? शिक्षा के द्वारा ही हमलोग यथार्थ सुख (मुक्ति) के अधिकारी बन सकते हैं। 
जैसे जैसे शिक्षा के द्वारा आत्मशक्ति विकसित होने लगती है,उसके साथ साथ आत्मविश्वास या आत्मश्रद्धा भी और अधिक बढने लगती है। यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि समस्त शक्ति का स्रोत मेरे हृदय में ही है। यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आने लगती है, कि दैहिक शक्ति की अपेक्षा मानसिक शक्ति कई गुना अधिक मूल्यवान है। मानसिक शक्ति (मनःसंयम) के विकास के फलस्वरूप ज्ञान की परिधि और अच्छा-बुरा (सदसत) विवेक-प्रयोग करने की क्षमता भी बढती जाती है। जगत और जीवन का अभिप्राय क्रमशः स्पष्टतर और बोधगम्य होने लगता है। स्वार्थपूर्ण विचारों का आवेग कम होता जाता है, दूसरे मनुष्यों के साथ सम्बन्ध में मधुरता आने लगती है।
शिक्षा के फलस्वरूप अपने भीतर ज्ञान और मनन करने की शक्ति जाग्रत होने के साथ साथ, यह आस्था और अधिक दृढ होती जाती है; कि मुझसे भिन्न प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी पूर्णता के विकास की पूरी सम्भावना है। इसीलिये आत्मश्रद्धा सभी मनुष्यों के प्रति श्रद्धा का रूप धारण कर लेती है। सच्ची शिक्षा एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के हृदय के निकट खीँच लाती है। क्रमशः मनुष्य-मात्र  के प्रति प्रेम उमड़ने लगता है, सबों के साथ अपना अभेद या एकत्व की धारणा बढती जाती है।
अब, पशुओं के जैसा अपने को ही केन्द्र में रखकर, सभी कुछ पर अपना अधिकार जमाने की बातें सोचना संभव नहीं होता। शिक्षित व्यक्ति दूसरों के लिये सोचना सीखता है। हृदय की संवेदनाओं का केन्द्र-बिन्दु अपने ही भीतर अचल न रहकर, सार्वजनिक विस्तार को प्राप्त होता है, सभी मनुष्यों के हृदय को स्पर्श करने में समर्थ हो जाता है। पहले के समान अब उसको अपना सुख उतना बड़ा नहीं दीखता है। दूसरों का सुख, आनन्द और कल्याण ही मानो उसको अपना सुख या आनन्द के जैसा महसूस होने लगता है। सुख या आनन्द की धारणा एक नया रूप धारण कर लेती है। यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि भोगों में, या मन की अनियंत्रित शैतानियों (waywardness) में सुख या आनन्द नहीं है; सभी का सुख ही मेरा सुख है, सबों का कल्याण ही मेरा कल्याण है, सबों का आनन्द ही मेरा आनन्द है।
शिक्षा के फलस्वरूप अपने लिये अग्राधिकार को अस्वीकार करके सबों के अधिकार का ध्यान रखने से ही  नैतिकता का जन्म होता है। क्योंकि नैतिकता का मुख्य सिद्धान्त यही है। पूर्णत्व के अभिव्यक्त होने के साथ साथ हमलोग सबों के साथ एक होना सीखते हैं। हमलोग सबो के साथ अभिन्न हैं, इसको जान लेना ही ज्ञान है, अपने को दूसरों से अलग समझना,भेदबुद्धि ही अज्ञान है। शिक्षा के द्वारा हमलोगों के हृदय में ज्ञान की यह ज्योति प्रज्वलित हो जाती है, कि  हमलोगों में से प्रत्येक के भीतर जो पूर्णत्व है, वही सर्वत्र विद्यमान है। 
इसको जान लेना ही पूर्णत्व को जानना है ! इसको जान लेना ही यथार्थ शिक्षा है। वह पूर्णत्व ही हमलोगों की समस्त शक्तियों और ज्ञान का स्रोत है। उसको उद्घाटित करके जीवन के समस्त आचार व्यवहार में अभिव्यक्त करने में सक्षम हो जाने को ही ' शिक्षित होना ' कहते हैं। इस शक्ति और ज्ञान के स्रोत को उद्घाटित करने से ही यथार्थ सुख और आनन्द प्राप्त होता है। 
सच्ची शिक्षा प्राप्त कर लेने से हमलोग मानो एक नया जीवन (डी-हिप्नोटाइज्ड अवस्था) प्राप्त करते हैं। और उस नये जीवन की दृष्टि से एक नया जीवन-बोध प्राप्त करते हैं, हमलोगों की आँखों के सामने, यह जगत मानो एक नये आलोक से उद्भासित हो उठता है। ऐसी शिक्षा से ही हमलोगों के जीवन की सार्थकता, समाज और राष्ट्र का कल्याण, इस शिक्षा के फलस्वरूप ही विश्वभ्रातृत्व की आधारशिला प्राप्त हो सकती है।
हमलोगों को सच्ची  शिक्षा अवश्य  मिलनी चाहिए। इस  शिक्षा को नहीं प्राप्त करने से हमलोग पशु-जीवन में ही पड़े रह जायेंगे, समाज से अनैतिकता, अत्याचार, शोषण, भ्रष्टाचार दूर नहीं हो सकता है, एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र के साथ, एक धर्म का दूसरे धर्म के साथ जो विद्वेष है, वह कभी दूर नहीं होगा, मानव-समाज में एकता की बातें केवल कहने की बातें ही बनी रह जाएगी। 
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$$$पुनश्च $$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [२२] "शिक्षा ही समाधान है" देखने के लिये मेरे नये ब्लॉग 'Mahamandal.blogspot.com' को देखें ! 






Friday, September 14, 2012

$$$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना-[21] ' चरित्र-निर्माण में शिक्षा की भूमिका '' शिक्षा : समस्त रोगों का रामबाण ईलाज है,

'समाज-सेवा के तीन स्तर '
श्रीरामकृष्ण की एक प्रसिद्द उक्ति है- " जावत बाँची तावत सीखी " ( जीवन के अंतिम क्षण तक सीखने की चेष्टा करनी चाहिये।) 'शिक्षा' उस संयम का (मनःसंयम आदि ५अभ्यास का) नाम है, जिसके द्वारा मनुष्य अपनी 'इच्छाशक्ति' के विकास और प्रवाह को नियंत्रित करके उसे फलप्रद बनाने में (मिथ्या अहं को हटाकर आत्मविशास आदि चरित्र के २४ गुणों को अभिव्यक्त करने में) सक्षम हो जाता है। आज हमारे समाज की जो असहनीय परिस्थिति बन गयी है, वह हमलोगों के द्वारा ही बनाई गयी है। हमलोगों ने जैसी शिक्षा प्राप्त की है, उसी शिक्षा ने हमारी इस वर्तमान परिवेश का निर्माण किया है। कोई मनुष्य, किस प्रकार अपना सुन्दर 'चरित्र-गठन ' करके, अपना और दूसरों का कल्याण करने में सक्षम (नेता-समाजसेवी) बन सकता है-- छात्रों को उसका उपाय बता देना ही शिक्षा का अभीष्ट है। 
अतः शिक्षा के अन्तर्गत ' पारस्परिक-सम्बन्ध ' (Correlation) और ' पारस्परिक-श्रद्धा ' (Mutual respect) के उपर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। ये दोनों गुण स्वार्थ-हीनता से प्राप्त हो सकते हैं। नैतिकता का दूसरा नाम ही स्वार्थहीनता है। (अतः मॉरल-एजुकेशन या नैतिक-शिक्षा का अर्थ हुआ, निःस्वार्थपर बनने की शिक्षा।)  स्वार्थ से प्रेरित होकर जो भी कार्य  किया जायेगा, वह कभी नैतिक नहीं हो सकता। क्योंकि जैसे ही व्यक्ति अपने स्वार्थ को प्रश्रय देना चाहेगा, तत्काल बराबरी या प्रतिस्पर्धा (competition) का प्रश्न भी उठ खड़ा होगा। और इसके फलस्वरूप उसकी सम्पूर्ण शक्ति संघर्ष और घृणा में बर्बाद होने लगती है। इसलिये जो शिक्षा उपरोक्त दोनों विषयों का ध्यान नहीं रखती हो, वह शिक्षा-व्यवस्था व्यर्थ है। यथार्थ शिक्षा हमलोगों के चलने, बोलने, कार्य करने, इत्यादि समस्त हावभाव को ' मानवोचित-ढंग ' से निर्देशित करेगी। यथार्थ शिक्षा (इच्छाशक्ति का संयम) ही हमारी समस्त शक्तियों (मानसिक -वाचिक -दैहिक) को सही दिशा -चरित्रवान मनुष्य बनने की दिशा में निर्देशित रख सकती है। 
उपयुक्त शिक्षा (५ दैनन्दिन अभ्यास का प्रशिक्षण) ही हमलोगों के चरित्र-निर्माण में सहायक होती है।क्योंकि यथार्थ शिक्षा की बुनियाद एक सकारात्मक सोच (Positive thinking) पर आधारित होती है। और वह बुनियादी सिद्धान्त यह है, कि यदि हमलोग अपने मन के ऊपर अधिकार रखने में समर्थ मनुष्य नहीं बन सके, तो हम अपने मन में उठने वाले विचारों को अपनी प्रयोजनीयता और इच्छानुसार चित्त पर बने विवेकपूर्ण 'गहरी लकीर' (Rut) से होते हुए निरन्तर प्रवाहित भी नहीं रख पायेंगे। 
मनुष्योचित-चरित्र गठित हो जाने के बाद ही कोई व्यक्ति अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति सही रूप में जागरूक हो सकता है। हर समय केवल अपने अधिकार की बात सोंचते रहने से कोई परिवार, समाज या देश सुचारू रूप में नहीं चल सकता। कर्तव्य की परवाह किये बिना किसी को भी उसका उचित अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता है। हमारे मानवोचित या विवेकपूर्ण कर्तव्य के द्वारा ही समाज में नैतिक-मूल्यों की स्थापना हो सकती है। [ गीता ३/१०-११ में भगवान स्वयं कहते हैं -
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।
केवल स्वयं को लेकर व्यग्र रहने के लिये कोई मनुष्य धरती पर नहीं आया है।हमलोग सभी के लिये हैं और प्रत्येक व्यक्ति दूसरों का हित करने के लिये है। (परस्परम्  भावयन्तः श्रेयः good? परम् the highest? अवाप्स्यथ shall attain.) प्रजापति ब्रह्मा ने मनुष्यों को समाजबद्ध प्राणी के रूप में सृष्टि करने के बाद कहा था- परस्पर की सहायता एवं मनोभावों के आदान-प्रदान के माध्यम से हम लोग स्वार्थी न बनकर समाजकेन्द्रित, देशकेन्द्रित और विश्वकेन्द्रित होने की शिक्षा प्राप्त करते हैं।  
पूरे राष्ट्र या विश्व का कल्याण करने के लिये अनेकों चरित्रवान मनुष्यों की सहायता आवश्यक है। बहुत से लोगों के (शरीर-मन-हृदय '3H' ) की शक्ति के एकत्र होने पर महान कार्य सम्पन्न होता है। इस तरह की संघ-शक्ति वैसे पशुओं में भी दिखाई देती है, किन्तु उनकी दलबन्दी केवल आत्मरक्षा के लिये है, परस्पर के हीत के लिए नहीं। ब्रह्मा की व्यवस्था में कोई भौगोलिक सीमा-रेखा नहीं है, इन शब्दों के भीतर हम विश्वमानवता की झंकार सुनते हैं। ]
हमलोगों का पहला कर्तव्य है, दूसरों का सुख, दूसरों के कल्याण के बारे में सोचना। इसीके माध्यम से हम समाज के प्रति जागरूक बनते हैं। समाज के कल्याण के प्रति जागरूक बनने से ही हमलोग अपना अधिकार अर्जित कर सकेंगे। यदि काम करने ही नहीं गये, तो वेतन कैसे मिलेगा ? उसी प्रकार यदि परस्पर के प्रति कोई कर्तव्य-बोध ही नहीं रहे तो, हमें अधिकार कौन देगा ? मेरा जो कर्तव्य है, उसका पालन यदि मैं नहीं करूँ, तो मुझे अधिकार क्यों मिलना चाहिये ? कर्तव्य-बोध की शिक्षा नहीं प्राप्त होने से, हमारा चरित्र-निर्माण नहीं हो सकता। यदि हमलोग सचमुच अपने समाज और देश का निर्माण करना अपना दायित्व समझते हों, तो हममें से प्रत्येक को दूसरों के लिये अपने स्वार्थ का त्याग करना सीखना होगा और सर्वप्रथम स्वयं एक चरित्रवान ' मनुष्य' बनना पड़ेगा। 
मानव-कल्याण या समाज-सेवा के विभिन्न स्तर हैं। अन्नहीन को अन्न का दान करना, जिसके सिर पर छत नहीं है, उसके लिये आवास का निर्माण कर देना, ये सभी बहुत अच्छे कार्य हैं। किन्तु यह कार्य हमारे अन्दर (धर्म) कर्तव्य-बोध जाग्रत होने के बाद कर्म करने का पहला सोपान है। इसके बाद का, दूसरा सोपान होगा, मनुष्य को उसकी मानसिक संपदा (उच्च भावों, या विवेक-प्रयोग की शक्ति) से समृद्ध करना। फिर समाज-सेवा का उच्चतम स्तर है, उसको उसकी अध्यात्मिक संपदा का प्रति जाग्रत कर देना। यही सबसे बड़ी समाज- सेवा है। 
हम लोगों के पास जो अत्यन्त दुर्लभ किन्तु स्वाभाविक संपदा (त्रय दुर्लभमं) है, उसके बारे में कुछ नहीं जानने से हम उसे व्यर्थ में गवाँ देंगे। जब हमलोग अपनी अध्यात्मिक संपदा का आविष्कार कर लेंगे, तब हम इस बात को जान लेंगे कि, हम सभी लोगों का अस्तित्व अलग अलग नहीं है, बल्कि हमसभी लोगो के भीतर एक आन्तरिक एकत्व का सूत्र (आत्मा) पिरोया हुआ है। (जैसे रंग-बिरंगे फूलों की माला में धागा पिरोया होता है) इस समझ के प्राप्त होते ही हमलोग अध्यात्मिक दृष्टि से एकात्मता-बोध (अध्यात्मिक संपदा) अर्जित कर लेंगे। इसीलिये हमारी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है-' Heart ' या ह्रदय का विकास।  या सर्वोच्च स्तर की समाज-सेवा है - मनुष्य की ' अध्यात्मिक-दृष्टि ' को जाग्रत कर देना।  इसके बाद एक सीढ़ी नीचे उतर कर पहले उच्च-भावों से या पवित्र-विचारों से अपने मन को परिपूर्ण कर लेना होगा। इसी को मन की शक्ति 'Head' का विकास या ' मन को प्रशिक्षित करना ' कहते हैं।
 [निरन्तर विवेक-प्रयोग करते हुए अपनी बुद्धि को 'व्यवसायात्मिका बुद्धि '(अर्थात एकनिष्ठ बुद्धि) में परिणत कर लेना होगा। अस्थिर चित्त वाले सकाम व्यक्तियों के मन हजारों विषयों में फ़ैल जाते हैं, इस कारण शक्ति का वृथा क्षय हो जाता है। इसलिये हे अर्जुन,' व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। (गीता 2/41)'  सकाम व्यक्तियों की बुद्धि इस लोक तथा परलोक की अनेक प्रकार की भोग्य वस्तुओं को पाने के लिए दौड़ती रहती है। किन्तु एकमात्र ब्रह्म को अपनी आत्मा-रूप से जानने पर ही परम शान्ति मिलती है। निष्काम कर्म के द्वारा यह बात अच्छी तरह समझ लेने के बाद मन में केवल सद-विचारों (शिव-संकल्प) को उठने देने की निश्चयात्मिका बुद्धि उत्पन्न होती है।] इसके और एक सीढ़ी नीचे उतर कर हम लोग शारीरिक व्यायाम और पौष्टिक आहार द्वारा अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट बना कर, अपनी शारीरिक शक्ति या 'Hand' की शक्ति का विकास कर सकते हैं।
इस प्रकार ('3H'- की शक्ति) का प्रयोग करके हमलोग अपना एवं दूसरों के आभाव को दूर करने का प्रयत्न करेंगे। मनुष्य का चरित्र विवेक-प्रयोग करके मन को सर्वदा उच्च भावों या अच्छे विचारों से परिपूर्ण रखने का अभ्यास करते रहने से  कैसे गठित हो जाता है ? कोई व्यक्ति किसी विशेष परिस्थिति में किस प्रकार का आचरण करेगा, यह निर्भर करता है- उसका विवेक-प्रयोग अभ्यास किस प्रकार का है उसके उपर।  किसी निर्जन स्थान में कोई मूल्यवान वस्तु गिरी हुई देखने से, कोई व्यक्ति नजरें बचाकर उसे अपने अधिकार में लेने की चेष्टा करेगा, और कोई दूसरा व्यक्ति उसके असली मालिक को वापस करने की चेष्टा करेगा। 
हमारा मन बहुत हद तक किसी कैमरे के समान है। जिस वस्तु के सामने कैमरा रखा होगा, उसके पर्दे पर सिर्फ उसी वस्तु  का चित्र बनेगा। किन्तु मनुष्य का मन, किसी कैमरा की अपेक्षा और अधिक उन्नत कोटि का यंत्र है। क्योंकि  शब्द और रूप के आलावा मन रूपी कैमरे में किसी वस्तु के गंध, स्पर्श और स्वाद के छाप भी पड़ जाते हैं। [गुलाब के फूल को इतनी बार सूंघा हूँ की उसके विशिष्ट गन्ध की छाप मेरे चित्त में गहरी हो गयी है, अब मैं यदि गुलाब के फूल को दूर से भी देखता हूँ, या केवल स्मरण भी करता हूँ -तो वह विशिष्ट गन्ध उभर आती है। ] 
इसी प्रकार 'मन-कैमरा' की सहायता से, हमारी पंचेन्द्रियाँ निरन्तर इस जगत के सैकड़ों वस्तुओं की छाप हमारे चित्त पर डालती  रहती है। मेरे अपने विचार, कथन और कार्य की जैसी गहरी छाप मेरे मन पर पड़ेगी, उसका जितनी गहरी लकीर हमारे चित्त पर बनेगी, उतनी गहरी छाप या लकीर दूसरों के विचार, कथन और कार्य द्वारा नहीं पड़ सकती है। एक ही कार्य का अभ्यास बार बार करते रहने से हमारे चित्त के ऊपर, किसी बैल-गाड़ी के पहिये से बनी लकीर (Rut) के जैसा हमारे विचारों, शब्दों और कर्मों की लकीर भी पड़ जाती है, तथा ये लकीरें क्रमशः गहरी होती जाती हैं। और हमलोग बैल-गाड़ी में जुते बैलों के समान ही एक ही लकीर से होकर बार बार चलते रहते हैं।
इसीलिये यदि हमलोग नित्य विवेक-प्रयोग करके अपनी बुद्धि को जब केवल पवित्र विचार संग्रहित करने में दक्ष बना लेंगे (या अपनी बुद्धि को व्यवसायत्मिका बुद्धि में परिणत कर लेंगे) तो हमारे चित्त पर केवल सद-विचारों की गहरी लकीरें ही पड़ेंगी, यदि हम केवल सद-अभ्यास ही करेंगे तब हमारा चरित्र अच्छा बने बिना रह नहीं सकता! इसलिये, मुझे - अपने और प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण के लिये, पहले अपने चरित्र को अच्छा बनाना ही होगा। इसके लिये यथार्थ-शिक्षा के माध्यम से मुझे स्वयं अपना चरित्र-गठन करना होगा, और इसके लिये मुझे सद-अभ्यास (या अच्छी आदतें ) अर्जित करनी होंगी। 
इस शिक्षा को ग्रहण करने के लिये बड़े बड़े विद्यालय-भवन बनाने की आवश्यकता नहीं है। हम घर पर हों, या बाहर हों, दिन-रात हर समय अच्छी आदतों को अर्जित करने की शिक्षा प्राप्त करने से, जीवन में असफलता नहीं आयेगी। हमलोग स्वयं अपने जीवन को सुन्दर रूप में गढ़ लेंगे, तथा अपने देश-वासियों का कल्याण करने की क्षमता अर्जित करके, अपने जीवन को सार्थक बना सकेंगे।  

Thursday, September 13, 2012

$$$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [20] 'शिक्षा की चर्चा '- पुनः एक बार ! शिक्षा : समस्त रोगों की रामबाण औषधि है,

 'सच्चा मूर्ति-पूजक '
'आइये, पुनः एक बार शिक्षा के ऊपर चर्चा करें!' - सुनने से हो सकता है,आप कुपित हो जायें। शिक्षा के उपर तो कई बार चर्चा हो चुकी है, एक बार फिर से करने की क्या जरुरत है? किन्तु भाइयों, इसके सिवा अन्य कोई उपाय नहीं है। चाहे किसी भी विषय पर चिंतन करें, यही दिखाई देता है कि-समस्या चाहे जो भी हो, उसके जड़ में शिक्षा भी अवश्य सम्मिलित है। इसीलिये हमलोग स्वामी विवेकानन्द के मुख से भी सुनते हैं," केवल शिक्षा! शिक्षा ! शिक्षा ! यूरोप के बहुतेरे नगरों में में घूमकर और वहाँ के गरीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर, अपने गरीब देशवासियों की याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह अन्तर क्यों हुआ? उत्तर में पाया कि शिक्षा से!"७/३११ 
उन्होंने जिस समय यह बात कही थी, तब भारत पराधीन था; तथापि लगभग उसी समय ५० वर्ष पूर्व ही भारतवर्ष में यूरोपीय मॉडल पर आधारित विश्वविद्यालयों की स्थापना हो चुकी थी। किन्तु,उस शिक्षा में शिक्षित लोगों को,बड़े क्षोभ के साथ स्वामी विवेकानन्द जी को 'अपच के मरीज' (Dyspepsia patients) कहना पड़ा था। उसी समय उन्होंने कहा था, " विगत ५० वर्षों में हमारे विश्वविद्यालयों से एक भी मौलिक चिन्तन करने में समर्थ व्यक्ति नहीं निकल सका है।" शिक्षा की जैसी स्थिति उस समय थी, तथ्यात्मक रूप से देखें तो यही प्रतीत होगा, कि आज तक उसमें कोई बदलाव नहीं आ सका है। आज भी भारतीय शिक्षा नीति लगभग वैसी ही बनी हुई है । 
भारत में सभी के लिये शिक्षा-' नयी सर्व-शिक्षा नीति '(Education for all) के उपर एक प्रतिवेदन देते हुए २ फरवरी 1835 ई० को ब्रिटेन के संसद में, लार्ड मेकाले ने कहा था " इस शिक्षा का उद्देश्य, एक ऐसे नये राष्ट्र का निर्माण करना है-'जो जन्मजात रूप से तो भारतीय होगा, किन्तु संस्कृति की दृष्टि से बिल्कुल अंग्रेज होगा।' हम एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्था लागु करने जा रहे हैं, जिसका तात्कालिक मुख्य उद्देश्य,मनुष्य-निर्माण करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन को और अधिक मजबूती से चलाने के यंत्र (device) रूप में कुशल किरानियों की जमात का निर्माण करना होगा।" और अघोषित रूप में आज भी हमलोगों की शिक्षा-पद्धति का उद्देश्य-'मनुष्य निर्माण' नहीं है; बल्कि सरकारी प्रशासन-तन्त्र चलाने वाले ' इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस' (I.A.S) रूपी टाई-कोट धारी 'सुपर-किरानी' या 'सिविल-सर्वेन्ट ' का निर्माण करना बना हुआ है।
लॉर्ड मेकाले ने तो बहुत गर्व के साथ लिखा था, भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था देकर जा रहा हूँ कि,यहाँ  मात्र ४० वर्षों के भीतर एक भी मूर्तिपूजक बाकी नहीं रहेगा! किन्तु,हाय रे विधि के विधान ! पाश्चात्य शिक्षा-व्यवस्था १८३५ में लागु होने के,मात्र एक ही वर्ष बाद-१८ फरवरी १८३६ ई० को बंगाल के गाँव-कामारपुकुर में एक बच्चे का जन्म होता है, जिसका नाम था गदाधर ! वे जब पाठशाला गए, तो कहते हैं- यह विद्या नहीं चलेगी! (मैं ऐसी 'चावल-केला बाँधने वाली-'अर्थकरी-विद्या' ग्रहण नहीं करूँगा!) यदि भारतवर्ष में शिक्षा के इतिहास को सही रूप में देखा जाय, तो छात्र-आन्दोलन की शुरुआत प्रथम छात्र नेता- ' गदाधर चट्टोपाध्याय ' ने यहीं कामारपुकुर गाँव में की थी। 
छात्र-असन्तोष के हजारों कारणों में से मुख्य कारण यही है कि छात्रों को सही ढंग की 'शिक्षा' नहीं मिलती।श्रीरामकृष्ण को शिक्षा के नाम पर जो कुछ देने की चेष्टा की गयी, उसका थोड़ा भी उन्होंने ग्रहण नहीं किया।और मेकाले द्वारा निर्धारित समयावधि के भीतर ही, अर्थात उन्नीसवीं शताब्दी में ही गदाधर ने दिखला दिया कि मूर्ति-पूजा करने अर्थ क्या है? और बालक गदाधर ने अपने जीवन को ही वेद-मूर्ति (श्रीरामकृष्ण परमहंस)  के रूप में गढ़ कर विश्व के मनुष्यों के समक्ष उदहारण के रूप में प्रस्तुत कर दिया था। उनके जीवन को देख-सुन कर मनुष्य आसानी से समझ सकता है कि 'शिक्षा' किसे कहते हैं, और यथार्थ शिक्षित मनुष्य कैसा बन जाता है?
 [इसके साथ ही साथ शाक्त और इस्लामी पद्धति से साधना करके-'काली और अल्ला ' के भेद को मिटा कर उन्होंने यह भी दिखला दिया कि ५ वक्त का सच्चा नमाजी किसे कहते हैं?] वे स्वयं जिस प्रकार के छात्र थे, उसी प्रकार के एक अद्भुत शिक्षक भी थे। अपनी शिक्षा सम्पूर्ण कर लेने के बाद ही उन्होंने ' शिक्षक ' का कार्य-भार ग्रहण किया था। कोई कुम्हार जिस प्रकार कच्ची मिट्टी को विभिन्न मूर्तियों के रूप में गढ़ देता है, ठीक उसी प्रकार अल्पव्यस्क तरुणों (लाटू और नरेन् जैसे) के जीवन-गठन का दायित्व अपने हाथों में लेकर, किसी कुशल मूर्तिकार के जैसा उनके जीवन को ही विलक्षण मूर्ति के रूप में ढाल दिया। केवल एक सारदामणि, और एक विवेकानन्द को गढ़ देना ही- सम्पूर्ण विश्व के शिक्षा-जगत के इतिहास में सर्वदा एक अतुलनीय उदाहरण बना रहेगा।    
आजकल प्रत्येक वर्ष ५ सितम्बर को अपने 'दार्शनिक और शिक्षाविद ' पूर्व-राष्ट्रपति डा० एस. राधाकृष्णन के जन्मदिन को हम लोग 'शिक्षक-दिवस' के रूप में मनाते हैं। उस उपलक्ष्य में शिक्षा के विषय पर काफी चर्चा होती है, इसीलिये हमलोग भी थोड़ी चर्चा कर रहे हैं। मेकाले द्वारा प्रस्तावित 'सर्व-शिक्षा अभियान' ब्रिटिश-सरकार के लिये भले उपयोगी हो सकता हो, किन्तु 'शैक्षणिक-सिद्धान्तों' (श्रवण-मनन -निदिध्यासन की भारतीय गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा) की दृष्टि से बिल्कुल निकृष्ट और सार-हीन है।
मेकाले ने सोचा था, उसकी शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद भारत से मूर्ति-पूजा बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। किन्तु हम लोगों ने देखा कि कोई शिक्षक (नेता) यदि सच्चा मूर्ति-पूजक नहीं है, तो वह शिक्षा-दान के व्रत में (लीडरशिप ट्रेनिंग देने में) सिद्धि (पूर्ण सन्तुष्टि) नहीं प्राप्त कर सकता। आप सोच रहे होंगे, यह भी क्या बात हुई ? अब थोड़ा खोल कर, स्पष्ट रूप में कहता हूँ- यथार्थ मूर्तिपूजक क्या करते हैं? वे मिट्टी की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा करके मृण्मयी मूर्ति को चिन्मयी बना देते हैं। वे बेजान मूर्तियों में भी जान डाल देते है, जो ऐसा करने में समर्थ हैं, वे ही मानव जाती के सच्चे नेता हैं, वे ही पूजनीय हैं। किन्तु, जो लोग मूर्ति को केवल प्रणाम करके, उसे मूर्ति के रूप में छोड़कर (उसमें प्राण-प्रतिष्ठा किये बिना) ही हट जाते हैं, वैसे शिक्षकों को कौन याद रखता है? [श्रीरामकृष्ण को ही क्यों याद किया जाता है ?] उसी प्रकार जो यथार्थ शिक्षक होते हैं, वे जड़पिण्ड जैसे छात्र के जीवन में भी प्राणों संचार कर देते हैं। उसको जाग्रत और पुरुज्जिवित कर देते हैं-"शिक्षाबल से आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है, और आत्मविश्वास की शक्ति से अन्तर्निहित ब्रह्म जाग उठते हैं ![শিক্ষাবলে আত্মপ্রত্যয়, আত্মপ্রত্যয়বলে অন্তর্নিহিত ব্রহ্ম জাগিয়া উঠিতেছেন" स्वामी जी यह बात २४ अप्रैल १८९७ भारती की सम्पादिका सरला घोषाल को लिखे के पत्र में कहते हैं]" 
हमलोग शिक्षा के उपर चर्चा करते समय,अक्सर शिक्षकों की तंगहाली, उनके पे-स्केल, ट्यूशन-फ़ी में बढ़ोत्तरी की प्रासंगिकता, मैचिंग ग्रांट, बड़े पैमाने पर कदाचार का दर्शन- इत्यादि बातों के उपर हम लोग अपने (बहुमूल्य विचार) या अभिमत दिया करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि शिक्षकों की तंगहाली ने शिक्षा-व्यवस्था को बहुत हद तक शिथिल बना दिया है। शिक्षक वर्ग समाज से जैसा सम्मान पाने के अधिकारी हैं, वह उनको नहीं मिलता है। शिक्षण-संस्थाओं की निदेशक-मण्डली के कुछ सदस्य आज भी जमीन्दारी वाली मानसिकता से ग्रस्त हैं। और अधिकांश अभिभावक अपने उत्तरदायित्व के सम्बन्ध में,या तो अनभिज्ञ हैं या उदासीन हैं। छात्र-गण श्रद्धा-हीन हो गये हैं, वे केवल नारेबाजी या तोड़-फोड़ करने में लगे रहते हैं। जब राजनैतिक पार्टियाँ, शिक्षा-संस्थानों (जे.एन.यू-जादबपुर)के संचालक,शिक्षक या छात्र में कोई भी समुदाय को आवश्यकतानुसार अपने अपने ढंग से राजनैतिक मुहाबरा  -'जहाँ कूएँ में ही भाँग घुल गयी हो।' का कुतर्क देने के प्रति कृत-संकल्प हैं- कि जहाँ पूरे समाज की ऐसी हालत है, तो ऐसे परिवेश में केवल शिक्षक वर्ग ही, अकेले अपनी जिम्मेदारी कैसे निभा सकते हैं ?  
बिल्कुल सही बात है। किन्तु समाज का सभी वर्ग, इसी प्रकार का तर्क देने लगें- कि जब दूसरे लोग अपने-अपने कर्तव्य का पालन करने लगेंगे, तो मैं भी अपने कर्तव्य का पालन करूँगा। और आज इसी प्रकार के  कुतर्क? का सहारा लेकर, समाज का कोई भी वर्ग अपने उत्तरदायित्व का पालन करने की आवश्यकता नहीं महसूस कर रहा है। और इसके फलस्वरूप समाज में किसीको भी अपना उत्तरदायित्व निभाना नहीं पड़ता है।  और इसी कारण से बिल्ली के गले में घन्टी भी, कभी  बंध नहीं पाती है। और,अधिकांशतः इसका खोज करने में ही, कि शिक्षा के क्षेत्र में विद्यमान कूव्यवस्था तथा अन्य समस्याओं के कारण और उसके लिये कौन दोषी है- या कैसा कड़ा कानून बने , 'शिक्षक दिवश' के समारोह का समापन हो जाया करता है।  
किन्तु समस्या का समाधान तो तभी हो सकेगा, जब उस मूल कारण (सच्ची शिक्षा का आभाव) को दूर करने के लिये क्या होना उचित है ? उस उपाय का आविष्कार कर लेने के बाद,जब हम में से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं जितना कर सकते हों, उतना करने में जुट जायेंगे। हमें वैसा करते देख कर दूसरे लोग भी अपना कर्तव्य पालन करने के प्रति यथेष्ट रूप से जागरूक हो जायेंगे। जब हम सभी लोग अपने-अपने कर्तव्य उचित ढंग से पालन करने लगेंगे, तभी हमें अपना उचित अधिकार प्राप्त हो सकेगा। यदि सभी लोग इस तथ्य (कारण-कार्य नियम) को समझ जाएँ, तो लगता है अधिकांश समस्यायों को बहुत हद तक सुलझा लिया जा सकता है।
 मूलतः शिक्षा एक प्रकार की द्वैत-प्रणाली (Dual process-दोहरी प्रक्रिया) है। इसमें शिक्षक का अपना (अनुकरणीय) व्यक्तित्व ही छात्रों के व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायक होता है। इसिलिये शिक्षा के क्षेत्र में सबसे मूल्यवान साधन शिक्षक हैं। किन्तु, इस पूरे शिक्षा रूपी महाननाटक में हीरो के रोल में  की शिक्षक नहीं- छात्र हैं। शिक्षा के क्षेत्र में स्पॉट लाइट छात्र के ऊपर या लोगों की नजर छात्र ऊपर ही टिकी रहती है। (शिष्य से ही गुरु की पहचान होती है ?) फिर भी, इस महत्वपूर्ण सच्चाई को- शिक्षा-क्षेत्र से जुड़े हम में से अधिकांश लोग अक्सर भूल जाते हैं।
वास्तव में समस्त शिक्षक-प्रशिक्षण (लीडरशिप ट्रेनिंग) का कार्य [महामण्डल द्वारा आयोजित वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर] एक बहुत बड़ा (immeasurable) सार्वजनिक महा-पूजनोत्सव है ! इस पूजनोत्सव में छात्र (भावी नेता) 'ईश्वर की प्रतिमा 'है,और शिक्षक पूजक हैं। पूजा करते समय पुजारी (शिक्षक) इतने प्रेम-पूर्ण स्वर में मंत्रोच्चार करेगा, कि उसके शब्द छात्र (प्रतिमा) के हृदय को स्पर्श कर लेंगे। वे कहेंगे- " हे मनुष्य-रूपी देवता, इहागच्छ, इहागच्छ ! - यहाँ आओ, यहाँ आओ। इह तिष्ठ!, इह तिष्ठ ! यहाँ बैठो, यहाँ बैठो। अत्र-अधिष्ठानं कुरु !- यहीं पर (कैम्प के रूम न ९ में) वास करो। मम पूजा गृहान !- मेरी पूजा ग्रहण करो ! " 
(पाश्चात्य शिक्षा में शिक्षित लोग तो पूछेंगे) महाशय,आपलोग कैसी बातें कह रहे हैं? कहीं आपलोग कुछ भूल तो नहीं कर रहे हैं? यदि आप गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा में आधारित प्राचीन-काल की शिक्षा-प्रणाली के उपर ही चर्चा कर रहे हों, तो आपको कहना चाहिये था- गुरु की सेवा-सुश्रुषा के द्वारा ही विद्या, प्रणिपात करके ही शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। अथवा यह कहना चाहिए था-' गुरु-दक्षिणा प्रदान करना ही विद्या-प्राप्ति का उपाय है।' किन्तु बात क्या है -जानते हैं ? (शिक्षकों-छात्रों के प्रति नजरिये में इस बदलाव का मुख्य कारण क्या है, जानते हैं ?) जिन लोगों को (ब्राह्मणों को) स्थायी रूप से पूजक के कार्य का दायित्व सौंपा गया था, वे लोग अन्ततोगत्वा (समय के प्रवाह में) केवल दक्षिणा से ही सन्तुष्ट न रहकर, भगवान के स्थान पर स्वयं को ही  रखने लगे थे। इसीलिये मुझे इतना दो, उतना दो- केवल दो-दो करने लगे थे। लेकिन, मैं क्या दे सकता हूँ, उसका कोई हिसाब करने की जरूरत भी नहीं समझते थे।
छात्रों की तरफ से देखें, तो उनका यह कर्तव्य अवश्य है, कि वे प्रणिपात, प्रश्न और गुरुसेवा, श्रद्धा और गुरु-दक्षिणा, देकर विद्या ग्रहण करेंगे। किन्तु शिक्षकों को भी छात्रों के प्रति श्रद्धा करनी होगी। प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद भी, पूजक को ही उसके सामने अपना शीश झुकाना पड़ता है। कोई भी पूजक- ऐसा सोचकर कि- 'अरे मैंने ही तो इस प्रतिमा में प्राण डाले हैं'; प्रतिमा के सिर पर पैर रखने की धृष्टता नहीं करता। क्या, दक्षिणेश्वर के शिक्षक श्रीरामकृष्ण ने -क्या यह कहते हुए अपने छात्र नरेन को दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम नहीं किया था - "प्रभु मैं जानता हूँ, कि तुम्हीं नर-रूपी नारायण हो! 'और (ऐसा कहने का सैभाग्य केवल एक सच्चे नेता को ही प्राप्त हो सकता है!) यह कार्य केवल शिक्षक ही कर सकते हैं, इसीलिये शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक ही सबसे मूल्यवान साधन हैं। 
अतएव -शिक्षा के इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन 'शिक्षक'(नेता) को, ऐसा होना चाहिये जो सर्वदा पवित्र या मिलावट-रहित (ब्रह्मचर्य) अवस्था में रह सके। यदि ऐसे शुद्ध व्रतधारी शिक्षकगण हर स्थान में जा जाकर, समवेत स्वर में, इतने प्रेम से " इहागच्छ ! इहागच्छ !(ऐनुअल कैम्प में आओ,ऐनुअल कैम्प में आओ!) का आह्वान करें, कि उनकी आवाज पूरे कौम (गणदेवता-डेमोज़, Demos) के हृदय को छू ले, तो देश जाग उठेगा। और, जो 'सिद्ध' पुजारी सोये हुए देवता को 'जाग्रत' करने में समर्थ होते हैं,भारत का समाज उनको यथेष्ट सम्मान देना जानता है। किन्तु हम लोग जब अपने मन्त्र (५ अभ्यास=त्याग और सेवा) को सिद्ध किये बिना ही,'सिद्ध-गुरु' का भेष धारण करके दक्षिणा में 'सिधा' माँगने पँहुच जायें, तो वैसा होना संभव कैसे होगा ?
आजकल शिक्षा को भी एक उद्द्योग(Industry) के रूप में देखा जा रहा है। साधारण शिक्षा में लागत-पूँजी के अनुपात में मुनाफा कम होता है, इसीलिये इसकी उपेक्षा होती है। किन्तु हाल में ही 'नौकरी या रोजगार देने सक्षम ' (Job Oriented) के नाम से दी जाने वाली विशेष शिक्षा के उपर सरकार की थोड़ी विशेष  कृपा-दृष्टि हुई है। हजारो-हजार अयोग्य व्यक्ति इस गणदेवता (कौम) की महा पूजा में पुजारी के पद पर नियुक्त हो रहे हैं। कितने आश्चर्य की बात है, जो व्यक्ति मानव-मशीन की चाभी घुमाने में भी अक्षम है, वह मनुष्य के हृदय को नये साँचे में ढालने चला है। 
आन्तरिक शक्ति के (२४) गुणवाचक क्रमागत उन्नति (Qualitative evolution) को शिक्षा कहते हैं।शिक्षा की शक्ति से आत्मविश्वास जैसा गुण भी जाग्रत हो जाता है। किन्तु, इस कार्य को करने के लिए एक अभ्यस्त और कार्यकुशल वास्तुकार (architect) चाहिये। जो लोग ऐसा कर सकते हैं, वे ही समाज को बदलने में सक्षम नये भारत के शिल्पियों का निर्माण भी कर सकते हैं। अन्य किसी की उम्मीद न करके ऐसे शिल्पकारों (जो पत्थर की मूर्तियों में भी प्राण-प्रतिष्ठा कर सके,उन्हें पुरुज्जिवित कर सके ) की संख्या बढ़ने से ही देश जाग उठेगा। 
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"जो आत्मविश्वास वेदान्त की नींव है, वह किंचित भी यहाँ व्यव्हार में परिणत नहीं हुआ। भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण यही है कि देश की सम्पूर्ण विद्या-बुद्धि, राज-शासन और दम्भ के बल पर मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गयी है। जनता में विद्या का प्रचार करना होगा। -शिक्षाबल से आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है, और आत्मविश्वास की शक्ति से अन्तर्निहित ब्रह्म जाग उठते हैं ! स्कूल में लड़के कुछ भी नहीं सीखते, बल्कि जो कुछ अपना है, उसका भी नाश हो जाता है। और इसका परिणाम होता है -श्रद्धा का अभाव। जो श्रद्धा वेद-वेदान्त का मूल मन्त्र है, जिस श्रद्धा ने नचिकेता को प्रत्यक्ष यम के पास जाकर प्रश्न करने का साहस दिया, जिस श्रद्धा के बल से यह संसार चल रहा है -उसी श्रद्धा का लोप ! गीता ४/४० में कहा है -'अज्ञश्च-अश्रद्धानश्च संशयात्मा विनश्यति' -अर्थात विवेकहीन (विवेक-प्रयोग न करने वाले) और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्य (doubting Thomas) का पतन हो जाता है। अब उपाय है शिक्षा का प्रचार पहले आत्मज्ञान। इससे मेरा मतलब जटा-जूट, दण्ड, कमण्डलु और पहाड़ों की कन्दराओं से नहीं,जो इस शब्द के उच्चारण करते ही याद आते हैं। तो मेरा मतलब क्या है? जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य (अज्ञानता के बन्धन (भेंड़त्व) से मुक्त (डी-हिप्नोटाइज्ड) हो जाता है,) संसार-बन्धन तक से छुटकारा पा जाता है, उससे क्या तुच्छ भौतिक उन्नति नहीं हो सकेगी ? अवश्य हो सकेगी। मुक्ति, वैराग्य,त्याग -ये सब उच्चतम आदर्श हैं, किन्तु गीता २/४० में कहा गया है -स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।[स्वल्पम्  अपि  अस्य धर्मस्य =duty त्रायते  महतः  भयात्] अर्थात इस धर्म का अर्थात कर्तव्य का -थोड़ा सा भी भाग भी महाभय (जन्म-मरण) से त्राण करता है।
 जितने भी सम्प्रदाय भारत में स्थापित हुए हैं, सभी इस बात पर सहमत हैं कि -" प्रत्येक जीवात्मा में अनन्त शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है!" चींटी से लेकर ईसा-मोहम्मद तक सभी में वह आत्मा विराजमान है। अन्तर केवल उसके प्रत्यक्षीकरण के भेद में है। "निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्॥ कैवल्यपाद ३ ॥ सूत्रार्थ—सत् और असत्कर्म प्रकृति के परिणाम (परिवर्तन) के प्रत्यक्ष कारण नहीं हैं, वरन् वे उसकी बाधाओं को दूर कर देनेवाले निमित्त मात्र हैं, जैसे किसान जब खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दूसरे खेत में चला जाता है, वैसे ही आत्मा भी आवरण टूटते ही प्रकट ही जाती है। उपयुक्त अवसर और उपयुक्त देश-काल मिलते ही उस शक्ति का विकास हो जाता है। इस शक्ति को सर्वत्र जा जाकर जगाना होगा। 
आधुनिक विज्ञान ने ईसाई आदि धर्मों की भित्ति बिल्कुल चूर चूर कर दी है। इसके अतिरिक्त घोर विलाशिता तो प्रायः धर्म वृत्ति का नाश ही करने पर तुली है। यूरोप और अमेरिका आशाभरी दृष्टि से भारत की ओर देख रहे हैं। परोपकार का --शत्रु के किले पर अधिकार जमाने का यही समय है। यदि भारत की नारियाँ देशी पोशाक पहने भारतीय ऋषियों के मुख से निकले हुए वेदांत के महावाक्यों का प्रचार करेंगी -तो एक ऐसी बड़ी तरंग उठेगी जो सारे पश्चमी संसार को डुबो देगी। इंग्लैण्ड पर भी हमलोग अध्यात्म के बल से अधिकार कर लेंगे , उसे जीत लेंगे। अब इंग्लैण्ड, यूरोप और अमेरिका पर विजय पाना -यही हमारा महाव्रत होना चाहिये। इसीसे देश का भला होगा। विस्तार ही जीवन का चिन्ह है , और हमें सारी दुनिया में अपने आध्यात्मिक आदर्शों का प्रचार करना होगा।" ७/३११-१४ 

[ महामण्डल के लीडरशिप ट्रेनिंग में - " शिष्य देव-प्रतिमा है और शिक्षक पुजारी"; महामण्डल का शिक्षक, मूर्ति में प्राण डालने वाला शिक्षक (नेता ) कहेगा - "माइ हेड बाउ डाउन टू द वुड बी लीडर ऑफ महामण्डल" और इस प्रकार छात्र को ईश्वरोन्मुख कर देने के बाद उस भावी नेता को स्वतः (अपने स्वरूप का या) परमात्माके वास्तविक तत्व का परिज्ञान होने लगता है! और फिर वह सदा सर्वदाके लिये जीवन्मुक्त हो जाता है। इसीलिये प्रचलित शिक्षा के साथ साथ, शिक्षक-प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी प्रतिवर्ष तैत्तिरीय० उप ० की आज्ञाके अनुसार होना चाहिये।
ठाकुर ने हाथ जोड़ कर केवल नरेन् से ही ऐसा क्यों कहा था -मैं जानता हूँ प्रभु, आप वही नारायण ऋषि हैं?.... मूर्ति पूजक शिक्षक, मन ही मन योग्य आधार की जाँच करने के बाद कहता है - "ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! " तै० उप ०; वेदान्त के महावाक्यों की शिक्षा प्राप्त करने के लिये तीन चीजों की जरूरत, होती है- प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा। यदि शिष्य का आधार (५ अभ्यास या ब्रह्मचर्य पालन की क्षमता) मजबूत न हुआ तो वह ढोंगी या विक्षिप्त भी हो सकता है।] 
[लोर्ड मेकाले ने भारत में सभी के लिये शिक्षा 'Education for all ' या ' सर्वशिक्षा-अभियान ' के उपर एक प्रतिवेदन देते हुए २ फरवरी 1835 ई० को ब्रिटेन के संसद में कहा था- "मैं ने भारत की लंबाई और चौड़ाई भर में यात्रा की है, किन्तु मैंने एक भी वैसा व्यक्ति नहीं देखा जो भिखारी या चोर हो। इतने ऊंचे नैतिक मूल्यों का ऐसा धनी देश मैंने नहीं देखा है। इन लोगों की सांस्कृतिक चेतना का ऐसा विस्तार, मैंने इस देश में देखा है, कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी इस देश को गुलाम बना पाएंगे। जब तक हम इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत रूपी रीढ़ की हड्डी नहीं तोड़ देते, तब तक हम उन्हें गुलाम नहीं बना पाएंगे। इसलिए है, मेरा प्रस्ताव है कि हम पुरानी और प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली को अपनी शिक्षा से बदल दे।  
" इस शिक्षा का उद्देश्य, एक ऐसे नये राष्ट्र का निर्माण करना होगा - 'जो जन्मजात रूप से तो भारतीय होगा, किन्तु संस्कृति की दृष्टि से बिल्कुल अंग्रेज होगा।'  और जब शिक्षित भारतीयों को भी ऐसा लगने लगेगा, कि यह सब विदेशी और अंग्रेजी संस्कृति उनकी संस्कृति से बड़ी और अच्छी है। तो वे  अपने आत्म सम्मान और मूल संस्कृति को खो देंगे और अपने आत्म सम्मान और संस्कृति को भूल कर हमारे गुलाम बन जायेंगे, जो हम वास्तव में उन्हें बनाना चाहते हैं।"  

कितना सही और समझदार व्यक्ति था लोर्ड मेकाले और हम आज भी कितने नासमझ बने हुए हैं? हम स्कूल जाते है इसलिए के हम बड़े होकर इंजिनियर बने, डॉक्टर बने, कलेक्टर बने और पता नहीं क्या क्या, किन्तु अगर नहीं बन पाते तो क्या नहीं बन पाते- एक इन्सान ! या एक सच्चा मनुष्य ! ६४ सालो से हम शायद इतना भी नहीं समझ पाए, कि हम आज तक आजाद नहीं हो सके हैं। वही पुरानी पाश्चात्य-शिक्षा हमें 'गोरी 'चमड़ी की ब्रिटिश सरकार के स्थान पर आज के 'भूरी' चमड़ी की सरकार का गुलाम बना देती है।]
["आजकल यूरोपीय ढंग पर उच्च शिक्षा देने की ओर लोगों का विशेष ध्यान है विदेशी विजयी यहाँ हमारी भलाई करने के लिये नहीं आये है, वे तो धन लूटने आये हैं। विदेशियों की ये शिक्षा-संस्थायें तो थोड़े मूल्य पर उपयोगी गुलाम पैदा करने के कारखाने हैं; अर्थात इन कारखानों से 'मनुष्य' नहीं - क्लर्क (मुंशी), डिप्टी मजिस्ट्रेट, बड़ाबाबु, डाकबाबू, तारबाबु आदि पैदा होते हैं।" १/३२१
इसीलिये एक एक I.A.S. के यहाँ छपा मारने पर ३०० करोड़ और सरकारी क्लर्क के यहाँ ७० करोड़ निकते हैं। केन्द्रीय मंत्री श्रीजयराम रमेश ने तो 'भारतीय ब्यूरोक्रेशी ' को दुनिया का सबसे खतरनाक ' पशु ' की उपमा दे दी है!)  (तभी तो चेन्नई में स्टालिन (डी.एम्.के.) के घर पर CBI द्वारा छापा मारने के बाद वित्त मंत्री से लेकर प्रधान-मंत्री तक को कहना पड़ता है,  मैं इस छापे की निन्दा करता हूँ। क्यों छापा मारा, इसकी जाँच करनी होगी ? और यह सुनते ही CBI अपना जाँच बंद कर देती है।]
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