Monday, August 13, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [16*****] ' स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज ' लीडरशिप - ट्रेनिंग(स्वामी विवेकानन्द और युवासमाज),

 'श्रीरामकृष्ण का मुख्य कार्य 'शिक्षकों को शिक्षित करना'
(विश्वसंचालन का कानून सिखाना, अपने जीवन से 'त्याग' का उदाहरण प्रस्तुत करना  था !)
त्यागीश्वर श्रीरामकृष्ण का युवाओं के प्रति  के प्रेम को देखकर बहुत से लोगों को आश्चर्य होता था। उनके लिए तो कोई भी वस्तु ऐसी नहीं थी, जिसे प्राप्त करने के लिये उनके मन में चाह उठती हो। फिर भी वे क्यों
चाहते थे कि युवा लोग उनके पास आयें?  और कितने आश्चर्य की बात है, कि इसके लिये वे दक्षिणेश्वर की माँ भवतारिणी के निकट प्रार्थना भी करते थे ! भला उनका अपना कार्य क्या हो सकता था? फिर भी माँ काली के निकट प्रार्थना करते हैं, और व्याकुलता के साथ युवाओं के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या वे बिना किसी उद्देश्य के ही युवाओं के साथ समय बिता रहे थे, उनको प्रशिक्षित करने में अथक परिश्रम कर रहे थे? 
नहीं, उनका एक उद्देश्य अवश्य था, और वह उद्देश्य था - विश्व का कल्याण ! इसीलिये वे युवाओं के आने की बाट जोह रहे थे। किन्तु वे तो, इस जगत का मंगल वैसे भी कर सकते थे-[उन्होंने अपने मुख से कहा था, जो राम जो कृष्ण वही रामकृष्ण - इस बार दोनों एक साथ; वेदान्त की दृष्टि से नहीं, बल्कि साक्षात् !!] वे केवल अपने हाथों को आशीर्वाद की मुद्रा में उठा देते-- और पलक झपकते सब कुछ ठीक हो जाता- किन्तु वैसा वे करते क्यों नहीं हैं ? वे कहते हैं- 'आइन एरुप आचे ' - अर्थात विश्व-संचालन का कानून ही वैसा है। वे उसी के भीतर रहते हुए कार्य करना चाहते हैं। जगत की भलाई (अथवा उच्च स्तर की समाज-सेवा) करने के लिये भी, पहले जगन्माता से एक हुक्मनामा,'चपरास' (डिक्रीटल-decretal-अध्यादेश) प्राप्त कर लेना होता है! वे उसी कानून को सिखा देना चाहते थे। युवाओं को उसी जगत-कल्याण के कानून को सिखा देने के उद्देश्य से ही श्रीरामकृष्ण की समस्त जीवन-लीला सम्पन्न हुई है। [ विवेक-प्रयोग द्वारा भूमा विवेकज आनन्द को प्राप्त करके,'लस्ट ऐंड लूकर' के क्षुद्र आनंद में आसक्ति का त्याग को सिखा देने के उद्देश्य से श्रीरामकृष्ण की समस्त जीवन-लीला सम्पन्न हुई है !] और अपने इसी कार्य का उत्तरदायित्व भावी-पीढ़ी को सौंपने के लिये, वे योग्य-युवाओं (शिष्यों) के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। अद्भुत शिक्षक श्रीरामकृष्ण (नवनी दा ?) ने मानो युवा-प्रशिक्षण (शिविर) को ही अपने जीवन का व्रत बना लिया था। किन्तु आगन्तुक युवाओं में से, जिसके भीतर वे सार (गुण) देखते थे, केवल वैसे युवाओं का ही चयन करते थे। वे कहते थे, " सार-वस्तु नहीं रहने से, सभी लकड़ियाँ (जैसे बाँस आदि) चन्दन नहीं बन सकती।" चाणक्य नीति में कहा गया है -
 अन्तःसार-विहीनानाम् उपदेशः न जायते। 
मलयाचल सम्सर्गात् न वेणुः चन्दनायते॥ 
- अर्थात जिसके अंदर सार-असार वस्तुओं में से विवेक-प्रयोग द्वारा केवल सार को ही ग्रहण करने की योग्यता का अभाव है, और परिणामस्वरूप जिसका चित्त अत्यंत मैला हो चुका है,अर्थात जिनका भेजा ही
खाली है,उस पर किसी भी संत के उपदेश वैसे ही कोई प्रभाव नहीं होता; जैसे मलयागिरी से आने वाली वायु के स्पर्श से भी बांस चंदन नहीं बनता।
श्रीरामकृष्ण वास्तव में जगतगुरु (सम्पूर्ण मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) थे, उनका मुख्य कार्य, मानो 'शिक्षकों को शिक्षित करना ' (लीडरशिप ट्रेनिंग देने में सक्षम -भावी नेताओं का निर्माण करना ) था, इसीलिये वे योग्य आधार देखने के बाद ही युवाओं का चयन करते थे। क्योंकि जो युवा उनसे लीडरशिप-ट्रेनिंग प्राप्त कर के मानवजाति के मार्दर्शक नेता बनेंगे, आगे चलकर वही लोग विश्व का कल्याण करने योग्य दूसरे युवाओं का चयन करके, उन्हें भी शिक्षा देंगे अर्थात लीडरशिप का प्रशिक्षण देंगे। इस लिये ऐसे ही कई गुणी सन्तानों में से, एक युवक को अलग से चिन्हित करते हुए कहते हैं-  "नरेन्द्र शिक्षा देगा!"  
[ केवल मुख से नहीं कहा था, कागज के उपर लिख कर चपरास दिया था - " जय राधे प्रेममयी ! नरेन शिक्षे दिबे, जखन घरे बाहिरे हाँक दिबे ! जय राधे !! " अर्थात-" जय राधे प्रेममयी ! नरेन्द्र शिक्षा देगा, जब घर और बाहर में हूँकार देगा। जय राधे ! " नरेन्द्रनाथ को भावी लोक-शिक्षक या अधिकारी पुरुष का केवल लिखित 'चपरास' देकर ही नहीं रुके। उसी क्षण सहज भावावेग में, उन्होंने अपने हाथों से बयान के नीचे एक गूढ़ (Esoteric) रेखा-चित्र भी अंकित कर दिया।

वह रेखा-चित्र उच्चतम भावनाओं की अभिव्यंजनाओं से परिपूर्ण एक अत्यन्त मनोरम चित्र था। उस रेखा-चित्र में ठाकुर ने सिर से गले तक के एक मानव-मुखड़े को उकेरा था। उस आवक्ष-मुखाकृति के विशाल नेत्रों की दृष्टि प्रशान्त है, और एक 'लम्बी पूंछवाला धावमान मयूर' उस मुखाकृति का अनुगमन करता हुआ उसके पीछे-पीछे चल रहा है। मानो चपरास प्रदानकर्ता त्यागीश्वर श्रीरामकृष्ण परमहंस उस लोक-शिक्षक की पृष्ठभूमि में विदयमान हैं, और उस नव-निर्वाचित भावी लोक-शिक्षक नरेन्द्रनाथ के पीछे-पीछे स्वयं चल रहे हैं।]
श्रीरामकृष्ण द्वारा लीडरशिप-ट्रेनिंग में प्रशिक्षित युवा-नेता नरेन्द्रनाथ ने जगत को 'कल्याण के कानून' (Welfare Actकी शिक्षा दी थी। किन्तु इस कानून में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता है। जबकि संसद के द्वारा पारित कानून में संशोधन हो सकता है, क्योंकि जनता द्वारा चुने गये सांसद बदलते रहते हैं, और तदनुसार सांसदों की बुद्धि भी बदलती रहती है। किन्तु जिस  ईश्वर ने जगत का विधान बनाया है, वे भी नहीं बदलते हैं, और उनकी बुद्धि भी नहीं बदलती! जबकि कुछ लोग ऐसा सोंचते हैं, कि सब कुछ बदल जाता है, यहाँ ऐसी कोई वस्तु नहीं- जो अपरिवर्तनीय हो। वे ऐसा भी सोचते हैं, कि सब कुछ बदलते बदलते, अन्त में जो कुछ शेष रह जाता है, वही अच्छा (अपरिवर्तनीय) है। किन्तु सब कुछ बदलते बदलते जो शेष बच रहेगा, वह अच्छा (शाश्वत) ही होगा- इस बात का प्रमाण क्या है ? ऐसा भी तो हो सकता है कि बाद में पता चले, कि जो शेष रह गया था वह भी अच्छा (अपरिवर्तनीय) नहीं था ? जिसको अभी अच्छा समझ रहे थे, हो सकता है वह भी पुनः बदल जाये। क्योंकि कहा गया है, ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बदलता न हो। इसका अर्थ यह हुआ कि इस अंतिम अच्छे के भी बदल जाने के बाद, जो शेष बचेगा उसको एक बार फिर अच्छा कहेंगे। किन्तु जो परिवर्तित हो गया, वह निश्चय ही अच्छा नहीं था।
निष्कर्ष क्या निकला? जिसको अभी अच्छा कहता हूँ, वही फिर आगे चल कर-अच्छा नहीं था, ऐसा स्पष्ट प्रतीत होने लगता है। उसके बाद जिसको अच्छा कहता हूँ, वह भी पुनः परिवर्तित हो जा रहा है। तो फिर ऐसे किसी ऐसी वस्तु (नाम-रूप) को,जो सतत बदल रहा है,अच्छा (अविनाशी) नहीं कहा जा सकता।
तो क्या यहाँ कुछ भी अच्छा (शाश्वत) नहीं है ? हाँ, जरुर है ! जो कभी नहीं बदलता, जो 'वस्तु' है, वही वास्तव में अच्छा (अविनाशी) है ! और मनुष्य जीवन का उद्देश्य ही है उस अच्छी वस्तु, उस अपरिवर्तनशील (अविनाशी) ' वस्तु ' का अनुसन्धान करना ! समस्त परिवर्तनशील (नश्वर) वस्तुओं का धीरे धीरे त्याग करते जाने (नेति नेति) से ही वह (अविनाशी) 'वस्तु ' प्राप्त हो जाती है। 
अच्छा (अविनाशी) या कल्याण को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग या कानून (ईश्वरीय-विधान)  है - त्याग, त्याग के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। स्वयं भोगों में रत रहते हुए जगत का कल्याण नहीं किया जा सकता है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कहा  था, " अतीतकाल में (परमहंस जी के समय में ?) भी त्याग ही नियम था; और हाय ! (अफ़सोस!) भविष्य काल में (नवनी दा-अमित दा ? के समय में) भी त्याग ही नियम रहेगा ! " 'हाय'  (अफ़सोस) -क्यों कहते हैं ? इसीलिये कहते हैं- जो लोग ऐसा सोचते हैं, यह नियम (कम से कम उनके लिये) बदल जायेगा, और वे त्याग किये बिना भी जगत का कल्याण कर सकेंगे, तो वे निश्चित रूप से असफल हो जायेंगे। इसीलिये 'अफ़सोस' कहते हैं !
त्याग के द्वारा उस अच्छा (अविनाशी) अपरिवर्तनशील वस्तु को, जिस प्रकार स्वयं प्राप्त किया जा सकता
है,उसी प्रकार दूसरों को उसे प्राप्त करने में सहायता भी दी जा सकती है। और यही तो है सच्ची सेवा
(उच्च स्तर की समाज सेवा) ! स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - 'त्याग' और 'सेवा' ही भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं, इन दो धाराओं में तीव्रता उत्पन्न करो, शेष सबकुछ अपने आप ही ठीक  जायेगा।" अतः हमलोगों का आदर्श हुआ-" त्याग और सेवा "; और जीवन का उद्देश्य है उस अपरिवर्तनीय अच्छा (अविनाशी-वस्तु)
को प्राप्त कर लेना। और उपाय को निर्देशित करते हुए कहते हैं- 'प्रयत्न'। तथा प्रयत्न (पुरुषार्थ) करने से ही आदर्श को रूपायित किया जा सकता है, तथा उद्देश्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हुआ जा सकता है।  
किन्तु जैसे ही हम किसी वस्तु को प्राप्त करने का प्रयत्न करेंगे या चेष्टा करेंगे, तो हमें कुछ न कुछ कार्य करना ही पड़ेगा। किन्तु क्या किसी भी तरह के कार्य को, हमलोग सच्चा प्रयत्न या पुरुषार्थ कह सकते हैं ? अर्थात क्या कोई भी कार्य आदर्श को रूपायित करने में उपयोगी सिद्ध हो सकता है ? नहीं, जिस कार्य के द्वारा 'त्याग और 
सेवा' का आदर्श जीवन में रूपायित हो सके, जो कार्य हमें जीवन लक्ष्य या उद्देश्य की दिशा में ले जाता हो, उसको ही सही प्रयत्न या पुरुषार्थ कहा जा सकता है, अन्य प्रकार के कार्य को नहीं। इसलिए कोई भी कर्म (समाज-सेवा) किस इच्छा या कामना को मन में लेकर किया जा रहा है, कर्म के पीछे का वह उद्देश्य ही यह निर्धारित करेगा कि सही कर्म हो रहा है या नहीं ? किसी परिवर्तनशील वस्तु (नाम-यश) को प्राप्त करने की कामना द्वारा प्रेरित होकर कार्य करने से, उसे यथार्थ प्रयत्न (उच्च स्तर की समाज-सेवा) तो निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। तब तो, जो अच्छा है, अपरिवर्तनीय (अविनाशी) है -केवल उसी को प्राप्त करने की कामना को मन में रखकर कर्म किया जाये, तो उसे ही सही प्रयत्न (पुरुषार्थ ) कहा जा सकता है। क्योंकि अच्छा (अविनाशी) को पाने की कामना को, कामना नहीं कहा जाता है। और इस प्रकार से कर्म करने को ही, 'कर्मयोग' कहा जाता है। 
विवेक-प्रयोग की शक्ति द्वारा  'शाश्वत-नश्वर' का विवेक करके जो अच्छा अर्थात अपरिवर्तनीय (अविनाशी) वस्तु है- उसे समस्त परिवर्तनशील वस्तुओं (नाम-रूप आदि) से अलग कर लेना पड़ता है। जो बुद्धि असत्य में से सत्य को, नश्वर वस्तुओं में से, अविनाशी 'वस्तु' का अविष्कार कर सकती हो, उसी यथार्थ-बुद्धि को 'मनीषा' कहते हैं। भागवत में ज्ञानी भक्त उद्धव से भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -
  एषा बुद्धिमतां बुद्धिः मनीषा च मनीषिणाम्।
    यत् सत्यम् अनृतेन इह मर्त्येन आप्नोति मा अमृतम्

-अर्थात (इह = इस जगत में, अनृतेन मर्त्येन मिथ्या और नश्वर मनुष्य शरीरइसी जन्म में इस असत और विनाशी मनुष्य-शरीर के द्वारा  मुझ सत्य और अमर परमात्मा को प्राप्त कर लेने में ही बुद्धिमानों की बुद्धिमानी और चतुरों की चतुराई है! अतएव जो मनुष्य अविनाशी भगवान की प्राप्ति के लिये यत्न न करके केवल विषयभोगों (नश्वर) में ही लगे हुए हैं, वे श्रीभगवान मत में तो बुद्धिमान हैं और न मनीषी हैं! 
[हे उद्धव! यह सब तो लीला है! हम और गोपियाँ (परमात्मा और जीवात्मा) अलग-अलग नहीं है! जैसे मुझमें वे हैं, वैसे ही उनमें मैं हूँ! विवेक-वान मनुष्यों के विवेक और बुद्धिमानों की बुद्धि (चतुराई) की पराकाष्ठा इसी में है, कि वे इस विनाशी और असत्य शरीर के द्वारा मुझ अविनाशी एवं 'सत्य वस्तु 'को प्राप्त कर लें। और उद्धवका समाधान तो हो गया ! मेरा ?]
यह जो अच्छा-बुरा का निर्णय करके, जो अच्छा नहीं है -अर्थात सदा परिवर्तनशील, नश्वर, क्षणस्थायी और 
अनित्य पदार्थ हैं, उनमें से जो यथार्थ अच्छा, अपरिवर्तनीय, नित्य, अविनाशी वस्तु है, उसी 'वस्तु' को प्राप्त करने के लिये समस्त प्रयत्न करना आवश्यक है; उस अविनाशी या नित्य वस्तु को स्वयं प्राप्त करने के बाद दूसरों को भी उसे प्राप्त करने में सहायता करना आवश्यक है- ' मैं भी सच्चा मार्गदर्शक नेता बनूँगा '---इस उद्देश्य को चुन लेना - इसको ही विवेक कहते हैं। यह भी एक प्रकार का प्रयत्न या उच्च स्तर की समाज-सेवा है; और इस प्रयत्न का नाम ही- ज्ञानयोग है। ज्ञानयोग के धरातल पर खड़े होकर कर्म करने से वह कर्मयोग बन जाता है। 
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कार्य को सही मार्ग पर संचालित रखने के लिये, 'विवेक-प्रयोग' सीखना 
अनिवार्य है। फिर विवेक-प्रयोग की क्षमता को निरंतर जाग्रत रखने के लिये एकनिष्ठता आवश्यक है। किसके प्रति ? जो सचमुच अच्छा है, हमारे भीतर जो अपरिवर्तनीय (अविनाशी) 'वस्तु' है, उसके प्रति एकनिष्ठ रहना परम आवश्यक है। क्योंकि-'भालोके एकनिष्ठ हये भालोबासते ना पारले'-- अर्थात सचमुच अच्छा  है, उसको एकनिष्ठ होकर प्रेम नहीं करने से, उस प्रेमपात्र में परिवर्तन होने से जीवन का उद्देश्य और आदर्श कुछ भी प्राप्त नहीं होगा, और सारा प्रयत्न (उद्द्य्म) व्यर्थ हो जायेगा। 'भालोर प्रति एई अपरिवर्तनीय भालोबासा' उस अच्छा, या अविनाशी (अपरिवर्तनशील) के प्रति यह अटूट-प्रेम, और मनुष्य जीवन का उद्देश्य -'अपनी अन्तर्निहित दिव्यता' अभिव्यक्त करने के प्रति मन-वचन-कर्म की यह एकमुखीनता (यूनिडायरेक्शनल)  --यही तो है भक्तियोग की मूल बात !  
प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने मन की भावनाओं के अनुरूप अच्छा (शाश्वत) के अमूर्तविचार (Abstract idea-प्रेम,पवित्रता, त्याग-सेवा) के विभिन्न प्रतीकों (श्रीरामकृष्ण ट्रिनिटी की प्रतिमा या बज्राङ्कित पताका) में से किसी एक का आश्रय ग्रहण करके, अपने हृदय का सम्पूर्ण प्रेम उसी (ईष्ट की मूर्ति) के चरणों में अर्पित करता है। और उसकी भक्ति का उद्देश्य होता है -समस्त प्रयत्न को, मन-वाणी-कर्म को अच्छा (अविनाशी वस्तु ) के प्रति एकमुखिन बनाये रखना। प्रयत्न में एकनिष्ठता रखने से, लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। [संत तुलसी दास कहते हैं - बिनु  सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥ भावार्थ:-सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है।] 
चिंतन-मनन, इच्छा और संकल्प किये बिना कोई भी कार्य नहीं होता। तथा सभी संकल्प मन में ही होते हैं। महाभारत में कहा गया है-
आत्मजन्या भवेदिच्छा, इच्छाजन्या कृतिभवेत।
कृतिजन्या भवेत चेष्टा, चेष्टाजन्या क्रिया भवेत ॥
हमारे नश्वर शरीर के भीतर आत्मा (अविनाशी वस्तु) हैं - इस ज्ञान का श्रवण-मनन करने पर, विवेकी
मन में अच्छा अपरिवर्तनीय-वस्तु को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है;  इच्छा बलवती होकर " कृति " अर्थात इच्छाशक्ति (kRuti i.e., volition- वोलिशन) या संकल्प बन जाती है । फिर उसी दृढ़-संकल्प पर अटल रहते हुए मनुष्य प्रयत्न (effort-उद्द्य्म) करता है। और प्रयत्न करने से क्रिया सम्पन्न हो जाती है। इसीलिए सभी कर्म में मन की शक्ति को लगाना ही पड़ता है। यह तो बिल्कुल स्पष्ट है कि निर्णय, विवेक-प्रयोग, या ज्ञानबुद्धि भी मन का ही कार्य है। अच्छा (अविनाशी) को प्यार करना, अर्थात अविनाशी के प्रति एकनिष्ठता, या भक्ति करना सब मन के द्वारा ही सम्पन्न होती है। अतएव उपरोक्त तीनों प्रकार के योग या प्रयत्न करने के लिये इस मन को नियंत्रण में रखना या संयिमत करना अत्यंत आवश्यक है। और चूँकि यह मनःसंयोग समस्त प्रयत्न या योगों का नियन्त्रक है, इसीलिये इसको ' राजयोग ' कहा जाता है। 
स्वामी विवेकानन्द ने इन्हीं चार प्रयत्न या चार -योग की सहायता से- भारत के राष्ट्रीय आदर्श- ' त्याग और सेवा ' को कार्यान्वित करने का परामर्श दिया है। और ये दोनों गुण मानो एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। यह 'त्याग' का गुण ही व्यावहारिक जीवन में 'सेवा' के रूप में अभिव्यक्त होने लगता है। यह त्याग ही ईश्वरीय-कानून है। अर्थात इस त्याग के नियम का उलंघन नहीं किया जा सकता है। इस कानून का उलंघन करने से अकल्याण अवश्य होता है। 
किन्तु कल्याण ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है ! और जो यथार्थ में अच्छा है, वह अपरिवर्तनीय है, अविनाशी, नित्य, सत्य, ध्रुव है- इसीलिये कल्याण है। त्याग के इस नियम (कानून) के द्वारा ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य सिद्ध होता है। 'त्यागीश्वर'(त्याग के बादशाह - परमहंस) श्रीरामकृष्ण के निर्देशानुसार,
स्वामी विवेकानन्द  युवा समुदाय को इसी त्याग के कानून को  सिखाना चाहते हैं, उन्हें 'त्याग और सेवा' का प्रतिक बज्राङ्कित ध्वज या श्रीरामकृष्ण पताका के नीचे एकत्र करना चाहते हैं। युवा-वर्ग को इस त्याग के आदर्श से उद्बुद्ध और अनुप्रेरित करने की आवश्यकता इसी लिए है कि, त्याग के आलावा अन्य किसी उपाय से कल्याण नहीं हो सकता है; और युवा-वर्ग ही इस बृहत समाज का शक्ति-केन्द्र है।  इस त्याग के आदर्श (निवेदिता वज्र) को समस्त कल्याण-साधकों के हृदय में, विशेष रूप से उस शक्ति-केन्द्र युवाओं के भीतर प्रविष्ट करा देना अत्यंत आवश्यक है।
युवा जीवन में ही समस्त शुभ और कल्याण के बीज बोये हुए हैं, किन्तु वे बीज अभी सूप्त हैं। इस सूप्त अच्छा के बीज को अंकुरित जाग्रत और प्रस्फुटित करा देना ही समस्त समाज-कल्याण कार्यक्रमों 
(Social welfare works) का 'प्रथम' आवश्यक कार्य है। युवा-समुदाय में ही समस्त उर्जा, प्राण और संभावना है। स्वामीजी इसी युवा शक्ति को जाग्रत करना चाहते थे, उनमें प्राण-शक्ति का उन्मेष और उस असीम सम्भावना का विकास देखना चाहते थे। उस विकसित प्राणशक्ति और सम्भावना के अभिव्यक्त होने पर ही समाज का यथार्थ कल्याण हो सकता है। अन्य किसी उपाय से कल्याण होना संभव ही नहीं है।
 इसीलिए स्वामीजी ने युवा समाज को मनुष्य जीवन का उद्देश्य और आदर्श का स्थायी-आदेश (standing order) देने के साथ साथ ' चरित्र-निर्माण के ' चतुर्विध प्रयत्न' रूपी  उपाय या मार्ग का आविष्कार भी बतला दिया है। नियंत्रित मन की सहायता से अपने और देश के कल्याण के लिये कार्य करते रहने योग्य बनने के लिये, (अपने यथार्थ स्वरुप या अविनाशी आत्मा  के प्रति) एकनिष्ठा एवं विवेक प्राप्त करके, स्वयं को उपयुक्त तरीके से गढ़ लेना- ऐसा जीवन या चरित्र-गठन ही यथार्थ धर्म है। स्वामीजी चाहते थे युवा-समुदाय उसी 'चरित्रगठन' रूपी धर्म को प्राप्त करे। 
आज के युवा या उनके अभिभावकों को इस प्रकार की बातों को सुनने का कोई विशेष मौका नहीं मिलता है। इसीलिये वे दोनों (अभिभावक और छात्र) अभी तो युवाओं की साधारण समस्या [बढियाँ पैकेज देने वाले ' कैरियर'] को लेकर चिन्तित रहते हैं। तथा उसके समाधान की निष्फल चेष्टा में अक्सर चरित्र-निर्माण या जीवन-गठन के लिये प्रयत्न करने के विषय में जो उद्द्य्म होना चाहिये, उसे भी खो देते हैं। जब तक समाज के 'शक्ति- केंद्र' -युवावर्ग के जीवन-गठन की समस्या का उपयुक्त समाधान नहीं निकल जाता, तब तक युवाजीवन की सामान्य समस्या [नौकरी दो! २७% आरक्षण दो!] का यदि कोई समाधान हो भी गया, तो उससे भी समाज का यथार्थ कल्याण साधित नहीं होगा। इसीलिये युवाकाल में ही जीवन-गठन (या चरित्र-निर्माण ) रूपी धर्म, पद्धति, उपाय या प्रयत्न करने की ' शिक्षा ' ग्रहण करना नितान्त आवश्यक है। प्रचलित शिक्षा-व्यवस्था में इसका कोई उपाय नहीं है। इसीलिये वर्तमान में प्रचलित अर्थकरी (नकद- नारायण की
 पूजा करने वाली) शिक्षा, या तकनिकी शिक्षा (स्किल डेवलपमेंट ?) के प्रसार से आशानुरूप कोई फल प्राप्त नहीं हुआ है- और भविष्य में होने की सम्भावना भी नहीं है।
क्योंकि  युवा-वर्ग की समस्या का मूल कहीं और ही है। देश-व्यापी स्तर पर जीवन-गठन या चरित्र-निर्माण
की समस्या ही समस्त समस्याओं का मूल है। प्रत्येक वस्तु की अपनी अपनी शक्ति के साथ, समग्र जगत का घात-प्रतिघात निरंतर चल रहा है। प्रत्येक व्यक्ति या युवाओं के क्षेत्र में भी यही घटित हो रहा है। उसकी शक्ति और बाह्य जगत की शक्तियों के बीच घात-प्रतिघात चल ही रहा है। किसी विशेष क्षण में इस घात-प्रतिघात (स्ट्राइकर)  का अंतिम परिणाम ही उस क्षण में युवा-जीवन की परिस्थितियों को निर्धारित करती है। यदि बाह्य-जगत की शक्ति (लस्ट ऐंड लूकर का आकर्षण  या मृत्यु का भय ) उसकी आन्तरिक शक्ति (विवेक -प्रयोग जन्य संयम) को पराभूत कर देती है, तो उसके शाश्वत जीवन को प्रस्फुटित होने में बाधा पहुँचती है। और वह शक्तिहीन युवा परिवेश तथा ऐतिहासिक खेल का मात्र एक कठपुतली बन कर रह जाता है। र यही सबसे बड़ी समस्या है। 
युवासमाज यदि अपने जीवन के उद्देश्य और आदर्श से अनुप्रेरित होकर, तथा  चार प्रकार के उपायों या योगमार्ग द्वारा नियंत्रित मन की सहायता से, ' विवेक-प्रयोग विधान ' (विवेक-प्रयोग के कानून ) के विषय में पूर्णतया अवगत होकर यदि बाधक-शक्ति (या प्रकृति) के साथ संग्राम करता है, तभी जीवन या चरित्र-गठन या व्यक्तित्व-विकास संभव होता है। स्वामीजी कहते हैं- "युगों युगों तक संघर्ष करने के बाद एक चरित्र का निर्माण होता है। ' वे कहते हैं, ' कोई मनुष्य जब तक इस प्रकृति के विरुद्ध संग्राम करता रहता है, तभी तक उसको मनुष्य कहा जा सकता है। जो पराजय स्वीकार कर लेता है, वह मनुष्य नहीं रह जाता।"
किन्तु यह प्रकृति केवल बाह्य-जगत में ही नहीं होती है। बाह्य-प्रकृति के ही सदृश हमलोगों के भीतर भी एक प्रकृति है। और उस अन्तः प्रकृति का आधार है हमारा मन ! उस मन में ही हमलोगों की समस्त शक्तियाँ निहित हैं। हमारी इन्द्रियाँ बाह्य-जगत के साथ हमारे इस मन का सबंध  जोड़ देती हैं। [जैसे एक गुलाब के फूल मैंने अभी सूंघा तो उसके विशिष्ट गन्ध की एक छाप हमारे चित्त में संचित हो जाती है,फिर बाद में उसे दूर से देखने पर या स्मरण करने से भी उसकी विशिष्ट गन्ध मन में उभर आती है।] 
अली-मृग-मीन-पतंग-गज जरै एक ही आँच !
तुलसी वे कैसे जियें जिन्हें जरावे पाँच ?
हमलोग विज्ञान की सहायता से बाह्यप्रकृति की बड़ी बड़ी शक्तियों को अपने वश में ला सकते हैं, तथा उनपर प्रभुत्व स्थापित कर उन शक्तियों को अपने दैनन्दिन जीवन में उपयोग में ला सकते हैं। किन्तु बाह्य जगत की समस्त वस्तुओं के भीतर, जो इन्द्रिय के विषय-संवेदक या सेन्स डेटम (sense-datum,जैसे
 रसगुल्ला देखकर मुँह में पानी आना) होते हैं, उन सेन्सैशन्स को नियंत्रित करने में विज्ञान अक्षम है। प्रत्येक वस्तु में जो दृश्य, गंध, स्पर्श, शब्द,स्वाद आदि को उत्तेजित या प्रलोभित (incitement) करने वाली 
शक्ति होती है, उस शक्ति को वशीभूत करने की क्षमता भौतिक - विज्ञान के पास नहीं है। हम उन शक्तियों को समाप्त नहीं कर सकते, किन्तु हम लोग इन इन्द्रिय-संवेदी विषयों से अपने मन की रक्षा अवश्य कर सकते हैं। जिन इन्द्रिय नामक यंत्र (सेन्स ऑर्गन) के माध्यम से वस्तु से जो सूचनायें (सेन्स डेटम =जानकारी या ज्ञान ) निकल कर, हमारे मन को जो उत्तेजित या डावांडोल कर देती हैं, उन इन्द्रियों को संयमित करके, हमलोग बाह्य जगत की शक्ति के प्रभाव से अपनी रक्षा कर सकते हैं, तथा आत्मविकास कर सकते हैं।
हमलोग अपने मन को संयमित करके, अर्थात यम-नियम का अभ्यास करके मन की कामनाओं इत्यादि को संयमित रखने में समर्थ हो जाते हैं, तब हमलोग बाह्य या आंतरिक प्रकृति की गुलामी से मुक्त हो जाते हैं। फिर हमलोग परिवेश या इतिहास, कामना या कांचन का दासत्व नहीं करते हैं। मन को वशीभूत करने के संग्राम में जय-पराजय की सम्भावना ही युवा-जीवन की मूल समस्या है। और युवा नेता (युवा आदर्श) स्वामी विवेकानन्द ने, इसी समस्या के समाधान का मार्ग दिखलाया है।
इस समस्या के समाधान के मार्ग पर चलने वाला प्रत्येक विजयी युवा आन्तरिक अनन्त शक्ति का अधिकारी बन सकता है। वह अपने परिवेश का रचयिता और इतिहास का निर्माता बन सकता है; स्वयं अपने भाग्य का निर्माता बन सकता है ! दूसरों को कल्याण या धन्यता प्राप्त करने की प्रेरणा दे सकता है। 
केवल ऐसा मनुष्य बनने और बनाने से ही समाज का सच्चा भला हो सकता है। अब वह समय आ गया है, जब देश के शिक्षक, अभिभावक तथा वैसे लोग जो देश के कल्याण की बात सोचते हैं, वैसे प्रत्येक व्यक्ति एवं युवा-समुदाय को इस विषय से अवगत करा दिया जाय।  
समाज में अनेकों समस्याएं हैं, उसके निश्चित रूप से यथेष्ट कारण भी हैं। किन्तु उन समस्त समस्याओं के उपर उत्तेजित होकर क्षोभ व्यक्त करते हुए, इसके लिये किसी व्यक्ति या दल को समस्त अपराधों के लिये दोषी ठहरा कर, उनके लिये केवल कटु-वाक्यों का प्रयोग करते रहने से ही, इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है। समस्या के समाधान के लिये संगठित होकर प्रयत्न करने की आवश्यकता है। और इस प्रयत्न की शुरुआत, अपने से ही करनी होगी। समाज में विद्यमान निराशा के बीच, बहुसंख्यक लोगों की दृष्टि से ओझल रहते हुए, अधिक से अधिक संख्या में युवा-वर्ग स्वामी विवेकानन्द  के ' मनुष्यत्व-उन्मेषक एवं चरित्र-निर्माणकारी'  शिक्षा, प्रयत्न, जीवन का आदर्श और उद्देश्य के प्रति आकृष्ट होते जा रहे हैं। स्वामीजी कहते हैं- " हे मानव, हम तुम्हें मृत की पूजा छोड़ कर, जीवन्त देवता की पूजा करने का आह्वान कर रहे हैं। अतीत में जो हो गया उसको लेकर सिर पीटना छोड़ कर वर्तमान में प्रयत्न करने का आह्वान करते हैं। "" क्या केवल मुख से कह देने भर, कि मैं उनकी शिक्षाओं को समझ गया हूँ, या विश्वास करता हूँ- से ही दूसरे लोग मान लेंगे ? हृदय की समस्त भावनाएं व्यवहार में दिखनी चाहिए। उपदेश तो तुझे अनेक दिये; कम से कम एक उपदेश को भी तो काम में परिणत कर ले। बड़ा कल्याण हो जायेगा। दुनिया भी देखे कि तेरा शास्त्र पढ़ना तथा मेरी बातें सुनना सार्थक हुआ ! "
स्वामीजी ने, भारत की वर्तमान हीन अवस्था में परिवर्तन लाने के लिए, दीन-दुखी, बीमार, मूर्ख, भूखे, पददलित, अवहेलित भारत-संतान की मुक्ति के लिये,जगत के कल्याण के लिये, युवा समुदाय से अपना जीवन अर्पण करने का निरंतर आह्वान किया है। वर्तमान-युग में युवा समुदाय के सामने दो प्रकार के 
आह्वान हैं। वे इन दोनों आह्वानों में  किस आह्वान के उपर ध्यान देंगे, इसी विवेक के उपर उनका एवं देश का भविष्य निर्भर करता है। प्रत्येक युवा के सामने उसके अपने अगठित, असंस्कृत मन से, तथा समाज-परिवार या सम्पूर्ण बाह्य जगत से भोग करने का आह्वान हो रहा है। तो दूसरा आह्वान स्वामी विवेकानन्द के कंठ से सुनाई पड़ता है- " युवाओं, तुम सबों के मंगल के लिये, अपनी अन्तर्निहित, अपरिवर्तनीय, अच्छा (अविनाशी वस्तु-डिविनिटी) के विकास और अभिव्यक्ति  के लिए, समस्त प्रकार के भोगों के प्रलोभन को त्याग दो ! और नचिकेता के जैसी श्रद्धा और आत्मविश्वास में दृढता पूर्वक निर्भर रहते हुए, प्रबल उत्साह के साथ सम्पूर्ण जगत के कल्याण का कानून या ईश्वरीय मंगल- विधान, ' त्याग ' को  वरण कर लो । और युवा समाज में ही इतनी शक्ति है, कि वह विवेक-प्रयोग करके इन दोनों आह्वानों-भोग और त्याग, या श्रेय और प्रेय में से  एक को चुन लेने में समर्थ हो सकती है। स्वामी विवेकानन्द युवा-समाज को उसी शक्तियोग (विवेक-प्रयोग रूपीमें दीक्षित करना चाहते थे। 
[महामण्डल का उद्देश्य है - भारत का कल्याण, आदर्श हैं -त्याग और सेवा के मूर्त रूप स्वामी
विवेकानन्द! उपाय है,चरित्र -निर्माण, महामण्डल का आदर्श-वाक्य है -BE AND MAKE !] 
[महाभारत के विदुरनीति /१०२  में भी कहा गया है - जो मनुष्य आत्मपरीक्षण (विवेक-प्रयोग) द्वारा अपनी उन भूलों या गलतियों के लिये जो अभी तक दूसरों को अज्ञात हैं; खुद को शर्मिन्दा महसूस करता है, वह व्यक्ति सारे संसार में अत्यधिक सम्मानित मार्गदर्शक नेता बनता है। 
य आत्मनापत्रपते भृशं नर: स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत ॥ 
      अनन्त तेजाः सुमनाः समाहितः स्वतेजसा सूर्य इवावभासते ॥ 
 [य अपत्रप् भृशं  = व्यर्थ के कार्यों पर शर्मिन्दा होने वाला /  स= वह   गुरुर भवत्य उत=] जो मनुष्य प्रत्येक काम से पूर्व यह देख लेता है कि इस काम के करने से मैं कहीं अपनी आत्मा के सम्मुख लज्जित तो नहीं होऊँगा?
ऐसा आत्मपरीक्षण में समर्थ व्यक्ति ही सारे संसार में अत्यधिक सम्मानित मार्गदर्शक गुरु या 'नेता' बनता है। विदुर जी कहते हैं, उस व्यक्ति का तेज बहुत बढ जाता है, उसका चित्त शान्त और प्रसन्न रहता है और वह सूर्य समान चमकता है।]
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[ नरेन ने अपने पिता से प्रत्येक विषय का सार ग्रहण करने की पद्धति, सत्य को उसके सभी दृष्टिकोणों से संपूर्ण रूप से देखने का तरीका तथा चर्चा के मुख्‍य विषय को बनाए रखने की कला सीख ली थी। १८७९  ई. में उनका परिवार पुन: लौटकर कलकत्ता आ गया। हाई स्कूल की परीक्षा को काफी कम समय बच रहा था, फिर भी नरेन प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।
इस बीच वे अँगरेजी तथा बंगला साहित्य की अनेक उच्च स्तरीय पुस्तकें पढ़ चुके थे। इतिहास उनका प्रिय विषय था। इन्हीं दिनों उन्होंने पुस्तकें पढ़ने तथा सभी विषय के सार को आयत्त कर लेने का एक अभिनव उपाय खोज निकाला था। उन्हीं के शब्दों में – ‘ऐसा अभ्यास हो गया था कि लेखक का पूरा अभिप्राय समझने के लिए मुझे पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति पढ़ने की आवश्यकता न होती थी। अनुच्छेद की प्रथम एवं अंतिम पंक्ति पढ़कर ही मैं उसका पूरा तात्पर्य समझ लेता था। फिर बाद में मैंने पाया कि मैं किसी पृष्ठ की प्रथम एवं अंतिम पंक्ति पढ़कर ही उसकी पूरी विषयवस्तु समझ जाता हूँ। फिर कुछ और काल बाद जहाँ लेखक पाँच-छ: पृष्ठों में अपना विषय समझाने का प्रयास करता, वहाँ मैं प्रारंभ की पंक्तियाँ पढ़कर ही लेखक की सारी युक्तियाँ समझ लेता था।’
उनकी प्रशंसा करते हुए एक बार प्रो. हेस्टी ने कहा था - ‘नरेंद्र एक वास्तविक प्रतिभाशाली युवक है। मैंने दूर-दूर की यात्रा की है परंतु ऐसी प्रतिभा एवं संभावनाओं वाला लड़का कभी भी नहीं मिला, यहाँ तक कि जर्मन विश्वविद्यालय के दर्शन के छात्रों में भी कोई नहीं दिखा। वह जीवन में निश्चय ही कुछ कर दिखाएगा।’
नरेंद्र की बहुमुखी प्रतिभा संगीत के माध्यम से भी अभिव्यक्त थी। उन्होंने संगीत विशारदों से वाद्य एवं स्वरसंगीत दोनों ही सीखे थे। वे कई तरह के वाद्य में पारंगत थे, परंतु गायन में तो वे सानी न रखते थे। उन्होंने एक मुसलमान शिक्षक से हिन्दी, उर्दू तथा फारसी के अनेक भक्ति-मूलक गाने सीखे। उस काल के सबसे महत्वपूर्ण धर्म-आंदोलन ब्रह्मसमाज के साथ भी वे जुड़े थे और इसका उनके प्रारंभिक जीवन पर काफी प्रभाव पड़ा था।ब्रिटिश साम्राज्य से पराभूत हो जाने के पश्चात भारत में अँगरेजी शिक्षा का सूत्रपात हुआ। 
इसके फलस्वरूप हिन्दू समाज बौद्धिक एवं आक्रामक यूरोपीय संस्कृ‍ति के संपर्क में आया। अभिनव तथा सक्रिय जीवनधारा के सम्मोहन में आकर हिन्दू युवकों को अपने समाज में अनेक दोष ‍दिख पड़े।  अँगरेज लोगों के आगमन के पूर्व मुस्लिम शासनकाल में ही हिन्दू समाज की गति अवरुद्ध हो गई थी, जा‍ति प्रथा में ऊँच-नीच का भेद बढ़ गया था तथा पुरोहितगण अपने‍ निजी स्वार्थ के लिए आम जनता का धार्मिक जीवन नियंत्रित करने लगे थे। उपनिषद एवं भगवद्‍गीता के शक्तिदायी दार्शनिक विचारों के साथ निरर्थक अंधविश्वास तथा निर्जीव रीतिरिवाज घुलमिल गए थे। 
जमींदार जनसाधारण का शोषण करने लगे थे तथा महिलाओं की दशा दयनीय हो गई थी। मुस्लिम शासन के पतन के बाद से भारतीय जनजीवन के सामाजिक, राजनीतिक धार्मिक तथा आर्थिक – प्रत्येक क्षेत्र में विश्रृंखला फल गई थी। नवोदित पाश्चात्य शिक्षा ने समाज के अनेक दोषों को तीव्र आलोक में ला दिया। अब राष्ट्रीय जीवन को एक बार पुन: नवजीवन के मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से अनेक पुरातनपंथी तथा उदारवादी सुधार आंदोलनों का प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्मसमाज इन उदारवादी आंदोलनों में एक था जिसने बंगाल के शिक्षित नवयुवकों को आकृष्ट किया। इसके संस्थापक राजा राममोहन राय (1774-1833 ई.) ने परंपरागत हिन्दू धर्म के कर्मकांड, मूर्तिपूजा और पुरोहिती प्रथा का बहिष्कार किया और अपने अनुयाइयों को आह्वान किया कि वे ‘इस विश्व-ब्रह्माण्ड के सृष्टि एवं पालनकर्ता – अनंत, अगोचर तथा अक्षर परमात्मा की पूजा-आराधना’ करें। 


स्वामी विवेकानन्द अपने भावी लोक-शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहते हैं, " आगे बढ़ो ! सैकड़ो युगों तक संघर्ष करने से एक चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ! सत्य के एक शब्द का भी लोप नहीं हो सकता। सत्य अविनाशी है, पुण्य अनश्वर है,पवित्रता अनश्वर है। मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है, मुझे शंख-ढपोर चेले नहीं चाहिये । … सदाचार  सम्बन्धी जिनकी उच्च अभिलाषा मर चुकी है, भविष्य की उन्नति के लिए जो बिल्कुल चेष्टा नहीं करते, और भलाई करने वालों को धर दबाने में जो हमेशा तत्पर हैं- ऐसे ' मृत-जड़पिण्डों ' के भीतर क्या तुम प्राण का संचार कर सकते हो ? क्या तुम  "उस वैद्य" की जगह ले सकते हो, जो लातें मारते हुए उदण्ड बच्चे के गले में दवाई डालने कीकोशिश करता हो ? भारत को उस नव-विद्युत की आवशयकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नविन चेतना का संचार कर सके। 'यह काम' हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और होगा।" (३:३४४)" धर्म का सार तत्व मंदिर, तीर्थ, पूजा-पाठ आदि में नहीं है, बल्कि अपने यथार्थ स्वरुप की अनुभूति या आत्मोलब्धि ही धर्म है।"
मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- सज्जन और दुर्जन। जन का अर्थ होता है-मनुष्य। सज्जन माने जो दूर्जन नहीं है। सज्जन माने जो अच्छा या चरित्रवान मनुष्य है। अर्थात जिनके व्यवहार से 'सू-जन' होने का परिचय मिलता है उसी को सज्जन कहते हैं। 
 जबकि दूर्जन किसी का उपकार नहीं करना चाहते, फिर भी दूर्जनों से घृणा करना ठीक नहीं है। उसके बुद्धि का बन्धन खोल देना होगा, या अज्ञान की गाँठ (Knot of Ignorance) काट देनी होगी, तब वह भी सज्जन बन जायेगा।  बोलचाल की भाषा में ' सज्जनता ' कहने से हमलोग भद्रता समझते हैं।  किन्तु यथार्थ भद्रता तभी आती है, जब मनुष्य वास्तव में अच्छा बन जाता है, सूजन या चरित्रवान मनुष्य बन जाता है।इसीलिये आचार्य शंकर समस्त मानव जाति को चरित्र-निर्माण का एक सूत्र देते हुए कहा है -

 दुर्जन: सज्जनो भूयात सज्जन: शांतिमाप्नुयात्।
    शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्त: चान्यान् विमोच्येत्॥

दूर्जन लोग पहले सज्जन बन जाएँ, क्योंकि जो सज्जन हैं, वे ही शान्ति प्राप्त कर सकते  हैं। फिर जो शान्त हो चुके हैं वे समस्त बन्धनों से मुक्त हो जायेंगे। जो स्वयं मुक्त हो चुके हों, वे दूसरों को मुक्त करने की चेष्टा  करते हैं। 
भागवत में बहुत सुन्दर ढंग से कहा गया है-  एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण गोचारण करते हुए वृन्दावन से बहुत दूर निकल गये। ग्रीष्म ऋतु के संताप से व्यकुल होकर सभी ग्वाल-बाल घने वृक्षों की शीतल छाया में विश्राम करने लगे। वे वृक्षों की लटहनियों से पंखों का काम ले रहे थे। तबी अचानक श्रीकृष्ण अपने साथियों को सम्बोधित करते हुए कहने लगे— 
  हे स्तोककृष्ण हे अंशो श्रीदामन्सुबलार्जुन ।
    विशाल वृषभौजस्विन्देवप्रस्थ वरूथप ॥
 
   पश्यतैतान्महाभागान्परार्थैकान्तजीवितान् ।
    वातवर्षातपहिमान्सहन्तो वारयन्ति नः ॥
    
अहो एषां वरं जन्म सर्व प्राण्युपजीवनम् ।
    सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ 

अर्थात् हे श्रीकृष्ण ! हे अंशु ! हे श्रीदामा ! हे सुबल ! हे अर्जुन ! हे विशाल ! हे ऋषभ ! हे जसस्वी ! हे वरुथप ! (ये उनके सखाओं के नाम हैं उनमें से प्रत्येक का सम्बोधन है) इन भाग्यशाली वृक्षों को देखो जो दूसरों की भलाई के लिए ही जीवित हैं। ये वृक्ष हम सबकी आँधी, वर्षा, ओला, पाला, धूप से रक्षा करते हैं और स्वयं इनको झेलते हैं।
इन (वृक्षों) का जीवन धन्य है (इन वृक्षों का जीवन ही सार्थक है) क्योंकि ये सब प्राणियों को उपजीवन (सहारा) देते हैं (मानो ये सभी प्राणियों के हित के लिए ही जीवन धारण करते हैं)। जैसे कोई सज्जन पुरुष किसी याचक को खाली नहीं लौटाता, वैसे ही ये वृक्ष भी (अपना सर्वस्व न्योछावर करके मनुष्यों के काम में आते हैं) जो भी इनसे कुछ पाने की अपेक्षा करता है, ये उसे कभी निराश नहीं करते। किसी को खाली हाथ न लौटाकर उन्हें कुछ न कुछ अवश्य देते हैं। सज्जन लोग भी ऐसे ही होते हैं, उनके पास से कोई असंतुष्ट होकर नहीं लौटता। 
वृक्ष हमें क्या-क्या देते हैं उनसे हमें क्या लाभ हैं? यह सब विस्तारपूर्वर समझाते हुए कृष्ण आगे कहते हैं-

 पत्रपुष्पफलच्छाया मूलवल्कलदारुभिः ।
       गन्धनिर्यासभस्मास्थि तोक्मैः कामान्वितन्वते ॥
   
 एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।
    प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥

अर्थात् ये वृक्ष पत्र (पत्ती), पुष्प, फल, छाया, मूल (जड़), वल्कल (छाल), दारू या लकड़ी, गंध, निर्यास या गोंद, भस्म (राख), अस्थि (कोयला), तोक्म (बीज) आदि पदार्थों के द्वारा हमारा उपकार करते हैं। 
‘‘प्राण, अर्थ, बुद्धि और वाणी द्वारा केवल श्रेय का ही आचरण करना देहधारियों का इस देह में जन्म साफल्य है।’’ इन वृक्षों की भाँति ही मनुष्य को अपना जीवन, तन, मन, धन, सब कुछ दूसरों की भलाई में लगा देना चाहिए। इसी में मानव जीवन की सफलता है। गीता ३/२१ में भगवान कहते हैं -
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरा जन: ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है ।  
इस प्रकार सज्जनो को सदैव सक्रिय रहने की आश्यकता है, क्योंकि सामान्य जन सज्जनो का ही अनुसरण करते हैं। सज्जनो के कार्य और आचरण सामान्यजनों के लिए मानक का कार्य करती है। आज देश के सामने मूल समस्या यह है कि सज्जन निष्क्रिय रहते हैं और दुर्जन सदैव सक्रिय। यदि सज्जन सक्रिय हो जायें तो देश की सभी समस्याओं का निदान हो जाये। इसलिए गीता से प्रेरणा लेकर समाज को सक्रिय करने की आवश्यकता है। 
हमलोग दूसरों में अपने सच्चे मित्र को नहीं खोजते हैं। हमलोग केवल उन्हीं को खोजते फिर रहे हैं, कि कौन कौन लोग वास्तव में हमारे शत्रू है। जबकि वेद में प्रार्थना की गयी है- " हे ईश्वर, हमें ऐसी शक्ति दो कि हम सभी मनुष्यों को अपने मित्र के रूप में देख सकें।" और हमलोग इसके ठीक विपरीत शिक्षा ही अपने छात्रों को नहीं दे रहे हैं ? हमलोग किसी से प्रेम नहीं करते। सभी को पराया समझते हैं। इसीलिये हर समय इस बात को लेकर शंकित रहते हैं, कि वे कहीं शत्रू बन कर हमें नुकसान पहुँचा देंगे? केवल द्वैत से ही भय होता है। तैत्तिरीयोपनिषद २/७/१ में कहा गया है है - 
" उदरम् अन्तरम् कुरुते अथ तस्य भयम् भवति ।" 
' जो व्यक्ति ब्रह्म और अपने अथवा दूसरों में -' उदरम् ' थोड़ा-सा भी, अन्तरम् कुरुते - अन्तर समझता है, उसको भय होता है।'
जिनको अपना सझते हैं, उनसे कोई भय नहीं होता। इसीलिये दूसरों के भय से सदा शंकित रहने की अपेक्षा, सभी को अपना समझना, और पराये को भी अपना बना लेना -निःशंक हो जाने का सबसे अच्छा उपाय है। यदि ऐसा नहीं करते तो, शत्रुओं से अपने को बचाने की चेष्टा में ही सारी शक्ति नष्ट हो जायेगी। अपने को उन्नत बनाने, औ अधिक विकसित करने की शक्ति फिर बाकी नहीं रहेगी। और उस शक्ति का आभाव, उसको प्रदान करने की पूंजी ही नहीं बचेगी। आज के हमलोग -ऐसी शिक्षा कहीं से नहीं प्राप्त कर पाते हैं। केनोपनिषद २. २. ५ में कहा गया है -

इह चेदवेदिदथ सत्यम् अस्ति, न चेत् इह अवेदीत महती विनष्टिः।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः, प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृताः भवन्ति ।।

' इस जगत में कोईपराया नहीं है, सभी अपने हैं '- इस अद्वैत निश्चय को इसी मनुष्य शरीर में रहते समय 'अवेदित् ' जान लिया, 'अथ'-तब तो 'सत्यम अस्ति ' -बहुत कुशल है। और यदि इस शरीर के रहते रहते, इस तथ्य को अपने अनुभव से नहीं जान सके, तो ' महती विनष्टिः '- यह दुर्लभ मानव-शरीर, सभी प्राणियों में स्वयं को देखने का एक अवसर है, यदि इस बार भी यह अवसर हाथसे निकल गया फिर महान विनाश हो जायेगा-बार-बार   मृत्युरूप संसार प्रवाह में बहना पड़ेगा। यही सोचकर ' धीराः ' - विवेक-प्रयोग करने में सक्षम बुद्धिमान पुरुष, ' भूतेषु भूतेषु '- प्राणी-प्राणी में या प्राणिमात्र में ' विचित्य' - अपने (ब्रह्म-स्वरुप) को समझकर, इस लोक से ' प्रेत्य ' -प्रयाण कर जाने के बाद, 'अमृताः भवन्ति '- अमर हो जाते हैं।
यदि हमलोग मानव-मन को उन्नत बनाने वाले विज्ञान (सत-असत विवेक ) का प्रयोग करें, तो हमलोग अपनी सत्ता के यथार्थ स्वरुप को जान सकते हैं। और यह भी समझ सकते हैं कि समस्त चीजों के भीतर एक सत्ता या वस्तु ओतप्रोत होकर समायी हुई है। इसीलिये प्रकट रूप से (ostensibly) एक भिन्न सत्ता (दुर्जन-सज्जन या M/F) प्रतीत होने से भी, वास्तव में मैं उस सत्ता (अविनाशी) के साथ एक और अभिन्न हूँ! तथा अदृश्य रूप से होने पर भी सबों के साथ जुड़ा हुआ हूँ, क्योंकि सबों के भीतर एक ही सत्ता विद्यमान है।
जब यही विचार क्रमशः दृढ़ होता जायेगा, तो मैं दुर्जनों को भी अपने से अलग न सोच कर, उनको शत्रु नहीं समझकर अपना जानूँगा, उनसे प्रेम करूँगा। तब हमारे हृदय में -घृणा के बदले, भय के बदले, सबों के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जायेगा। हमलोगों के भीतर ही अनन्त शक्ति विद्यमान है। उसको सही रूप में व्यवहार करना होगा, जानना होगा और उसे वास्तविकता में परिणत करके अपने जीवन से अभिव्यक्त करना होगा। इसे कार्य में उतारने के लिये हमलोगों को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा।  

नजरें बदलीं तो नज़ारे बदल गए।
कश्ती का मुख मोड़ा तो किनारे बदल गए।
 इसीलिये मानवजाति का मार्गदर्शक नेता वही बन सकता है, जिस शिक्षक या नेता ने पहले स्वयं आत्मसाक्षात्कार कर लिया हो, वह यदि कोशिश करे तो दूसरों को मुक्ति का सन्देश देकर, उन्हें भी मुक्ति के आनन्द को समझा सकता है। जिस प्रकार नरेन्द्रनाथ श्री रामकृष्ण के नेतृत्व में पहले नेतृत्व का प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वयं समस्त बन्धनों से मुक्त हो गये थे, इसीलिए वे स्वयं युवा-नेता स्वामी विवेकानन्द बनकर दूसरों को मुक्ति का सन्देश देकर, उन्हें भी मुक्ति के आनन्द को समझा सके थे। 
हममें से कुछ लोगों ने यदि आचार्य शंकर का नाम सुना भी है, तो दूसरों की सुनी-सुनाई बातों को दुहराते हुए कहते हैं- ' शंकर ने तो जगत को बिलकुल उड़ा दिया था।' यदि उन्होंने जगत को ही उड़ा दिया था, तो अपने ज्ञान का प्रचार उनहोंने कहाँ किया था ?  उन्होंने कहा था- वेदों में दो प्रकार के धर्मों का उल्लेख है, एक है प्रवृत्ति का धर्म और दूसरा है निवृत्ति का धर्म। एक किनारे पर भोग है, तो दूसरे किनारे पर त्याग है।
 केन्द्रापसारी बल (Centrifugal force) और केंद्राभिसारी बल (centripetal force) दो प्रकार के बलों के प्रभाव से यह विश्व, समाज स्थितावस्था में बना रहता है, या यथापूर्व स्थिति (status quo) बनाये रखता है। ये दोनों हैं, इसीलिये मनुष्यों का समाज अपना संतुलन (Equilibrium) बनाये रखता है। जैसे हवाई जहाज अपने दोनों पंखों पर भारसंतुलन बना कर उड़ान भरता रहता है। 
उसी प्रकार धर्म के भी दो पक्ष हैं- 'भोग और त्याग ', इन दोनों की सहायता से मानव-समाज साम्यावस्था में रहता है। एक को भी छोड़ देने से दूसरा पक्ष या समाज चल नहीं सकता। त्यागमार्ग-विहीन समाज केवल भोग के उपर निर्भर होकर चल नहीं सकता है। उसी प्रकार सम्पूर्ण भोग-विहीन समाज भी संभव नहीं है। आवश्यकता दोनों में सामंजस्य रखने की है। इसीलिए, हमारे शास्त्रों में- 'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ' ये चार प्रकार के पुरुषार्थ की बात कही गयी है। केवल एक ही पक्ष को लेकर चलने से नहीं होगा। जो समाज एक को ही लेकर रहता हो, उसे 'निन्दनीय' या 'जघन्य ' भी कहा गया है। ऐसा कहने से भी, चौथे पुरुषार्थ 'मोक्ष' के समकक्ष कोई भी नहीं है। 
चित्तं चेतयते । 
--ChAndogya upaniShad, 7.5.
'chitta remembers'.चित्त का कार्य स्मरण करना है। यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते, तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ 


" आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् "(विदुर नीति )
स्वयं के लिये जैसा व्यवहार-आचरण पसन्द न हो, वैसा व्यवहार-आचरण स्वयं भी दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
" हितं च सारं च वचो हि वाग्मिता।"
हितकारी एवं तत्वयुक्त वाणी ही वाग्मिता अर्थात् उत्तम वक्तृत्वकला कही जाती है ………


भार्यावन्त: क्रियावन्त: सभार्या गृहमेधिन:।
भार्यावन्त: प्रमोदन्ते भार्यावन्त: श्रियान्विता:॥ 
महाभारतम् 1/74/42॥

पत्नी से संयुक्त मनुष्य ही यज्ञादिक धार्मिक-सामाजिक कार्य व्यवस्थित रूप से कर सकते हैं। पत्नी से संयुक्त मनुष्य ही सच्चे गृहस्थ हैं। पत्नी से संयुक्त मनुष्य ही सुखी एवं प्रसन्न रहते हैं। पत्नी से संयुक्त मनुष्य ही धन-वैभव से सम्पन्न होते हैं, क्योंकि पत्नी साक्षात् लक्ष्मी का रूप होती है।

य: सदार: स विश्वास्य: तस्मात् दारा: परा गति:॥
 महाभारतम् 1/74/44॥
लोक-व्यवहार में पत्नी से संयुक्त मनुष्य पर ही सभी लोग विश्वास करते हैं। अत: पत्नी ही पुरुष की श्रेष्ठ गति है।
भार्या श्रेष्ठतम: सखा।
 महाभारत 01/74/41 ।

पत्नी ही सर्वोत्तम मित्र है।
नास्ति सिद्धि: अकर्मण: ॥ 
महाभारतम् शान्तिपर्व 10/26 ॥

कर्महीन व्यक्ति को कभी भी कोई सिद्धि अर्थात् सफलता नहीं प्राप्त हो सकती है।


   उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः        ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखं मृगाः ॥

कोई भी कार्य प्रयत्न करने से ही पूर्ण होता है, केवल इच्छा करते रहने से नहीं। किसी सोये हुए शेर के मुख में हिरण स्वयं चलकर प्रविष्ट नहीं होते। 


उद्योगिनं पुरुष-सिंहमुपैति लक्ष्मीर्दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्म-शक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः
 ॥ ३३ ॥

सन्धि विग्रह : उद्योगिनं पुरुषसिंहं उपैति लक्ष्मीः दैवेन देयं इति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषं आत्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कः अत्र दोशः ?
एक शेर की तरह उद्द्यमी (मेहनती) आदमी के पास लक्ष्मी स्वतः चली आती है। जबकि कायर और डरपोक लोग कहते हैं, भाग्य में होगा तो न मिलेगा? तुम अपने  पौरुष ( मर्दानगी, साहस) के द्वारा अपने भाग्य के निर्माण का प्रयास करो !और  प्रयास करने के बाद भी यदि कोई उपलब्धि न हो रही हो, तो आत्मनिरीक्षण करके देखो -
 कि गलती कहाँ  रह गयी है? (कठोर परिश्रम के बाद भी सफलता न मिले तो यह आपकी गलती नहीं है)

 श्रीमद्भागवत में देवर्षि नारदजी ने कहा है—
यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।।
(7/14/8)
‘‘जितने से पेट भरे—सादगी से जीवन-निर्वाह हो, उतने पर ही अधिकार है। जो उससे अधिकपर अपना अधिकार मानता है, और आवश्यकता से अधिक भोग-पदार्थों का संग्रह करता है, वह दूसरों के धन पर अधिकार मानने वाले की तरह चोर है और दण्ड का पात्र है।
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:।
ते मृत्युलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

जिनके पास न विद्या है, न तप (परिश्रम) है, न ज्ञान है, न शील (सदाचार) है और न ही किसी प्रकार के गुण हैं और न ही वह धर्म के मार्ग पर चलते हैं। ऐसे मनुष्य इस पृथ्वी पर बोझ हैं जो मनुष्य के रूप में जानवर की तरह विचरण करते रहते हैं।
हितोपदेश में कहा गया है -

सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम् ।
सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम् ॥


जो व्यक्ती सुख के पिछे भागता है उसे ज्ञान नही मिलेगा ।तथा जिसे ज्ञान प्रप्त करना है वह व्यक्ती सुख का त्याग करता है । सुख के पिछे भागनेवाले को विद्या कैसे प्राप्त होगी ? तथा जिसको विद्या प्रप्त करनी है उसे सुख कैसे मिलेगा?
 नेता बनने और बनाने का प्रशिक्षण देने के लिये - योग्य आधार का चयन इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? 
श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, " त्यागी हुए बिना, लोक-शिक्षा देने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है, त्याग होगा, समग्र रूप से त्याग। मन ही मन त्याग करने से नहीं होगा। लोक-शिक्षक (नेता) बनने योग्य केवल वही मनुष्य हो सकता है, जिसने समग्र-रूप से 'कामिनी-कांचन' का त्याग कर दिया हो ! उनका जीवन आचार-व्यवहार में दूसरे सभी लोगों के लिये उदाहरण-स्वरूप होगा। तभी उनका नेतृत्व अविवादित रूप से स्वीकृत होगा।"इसीलिये जो युवा मानवजाति का नेता बनने का प्रशिक्षण (लीडरशिप ट्रेनिंग ) लेना चाहते हों, उन्हें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना होगा कि) इन्द्रिय-भोगों में लिप्त रहते हुए विश्व का कल्याण कभी नहीं किया जा सकता है। 
"अगर कोई ऐसा समझे कि ' मैं महामण्डल का नेता हूँ', तो -वह ' कच्चा मैं' है। परन्तु यदि कोई जगन्माता का साक्षात्कार कर उन्हीं की आदेश से लोककल्याण के लिये प्रचार करता है, तो उसमें कोई हानि नहीं। जो स्वयं मुक्त (सिद्ध) हो जाता है, तो उसके पावन चरित्र की मधुर सुगन्ध चारों ओर फ़ैल जाती है, और उसके निकट चरित्र-निर्माण की शिक्षा ग्रहण करने के लिये, उत्सुक होकर दूर दूर से सत्य-प्राप्ति की स्पृहा रखने वाले सैकड़ो प्रशिक्षु आने लगते हैं। गुलाब के खिलने पर भौंरे अपने आप आ जुटते हैं। जब दीपक जल उठता है, तो न जाने कहाँ से पतिंगे आकर उसमें गिरते हुए अपने प्राणों का बलिदान देने लगते है; दीपक की लौ कभी पतिंगों को बुलाने नहीं जाती। सिद्ध-मुक्त-शुद्ध-बुद्ध लोक-सेवकों का प्रचार भी इसी तरह का होता है। श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को कई प्रकार से जाँच-पड़ताल करने के बाद ही अपना उत्तराधिकारी निर्वाचित किया था। कुछ लोग सोचते हैं की केवल लेक्चर देकर मैं अपने ज्ञान और विचार किसी दुर्जन मनुष्य को सज्जन बना सकता हूँ, या किसी मूर्ख व्यक्ति को बुद्धिमान बना सकता हूँ। किन्तु श्रीरामकृष्ण हमें यही सिखाना चाहते थे कि मानवजाति का मार्गदर्शक नेता या शिक्षकों के लिये ऐसा  सोचना ठीक नहीं है। लेक्चर देने से कुछ नहीं होता पहले स्वयं चरित्रवान मनुष्य बनने का प्रयत्न करना चाहिये। और सज्जनता जब हमारे व्यवहार से परिलक्षित होने लगती है, तब दूसरे लोग स्वभावतः उससे प्रभावित होकर हमारा अनुसरण करने लगते हैं।

श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, " हे प्रचारक, क्या तुम्हें 'चपरास' (Insignia- राज-चिन्ह अंकित पट्टा) मिला है? जिस व्यक्ति को चपरास मिल जाता है, भले ही वह एक सामान्य अर्दली या चपरासी ही क्यों न हो, उसका कहना लोग भय और श्रद्धा के साथ सुनते हैं। वह व्यक्ति अपना राज-मोहर अंकित बैज दिखलाकर बड़ा दंगा भी रोक सकता है। हे प्रचारक, तुम पहले भगवान का साक्षात्कार कर उनकी प्रेरणा से दूसरों को प्रेरित करने का आदेश प्राप्त कर लो, नेतृत्व का बैज प्राप्त कर लो। बिना बैज मिले यदि तुम सारे जीवन भी प्रचार करते रहो,तो उससे कुछ न होगा, तुम्हारा श्रम व्यर्थ होगा। पहले अपने ह्रदय मन्दिर से अहंकार को हटाकर, वहाँ भगवान को प्रतिष्ठित कर लो, उनके दर्शन कर लो, बाद में यदि उनका आदेश हो तो लेक्चर देना। संसार में (कामिनी-कांचन में ) आसक्ति के रहते और विवेक-वैराग्य के न रहते सिर्फ 'ब्रह्म ब्रह्म ' कहने से क्या होने वाला है ? अपने ह्रदय-मंदिर में देवता तो हैं नहीं, व्यर्थ शंख फूँकने से क्या होगा? " 
अनेक बार कुछ अल्पज्ञानी शिक्षक या नेता  लोगों के बीच बैठकर अपने ज्ञान का बखान सार्वजनिक रूप से, यह सोचकर  करते हैं कि वे दूसरों को सुधार लेंगे और समाज में नाम-यश (बुद्धिमान का दर्जा) पायेंगे। यह उनके (नरेन्द्र के फ्रैन्डो प्रताप चन्द्र हाजरा जैसा) अपूर्ण ज्ञान का ही परिचायक है। क्योंकि वैसे लोग पीठ पीछे लोगों की हंसी का पात्र बनते हैं। अनेक बार उनको ' ज्ञानी-जी ' या 'स्वामी-जी ' कहकर मजाक भी बनाया जाता है। जबकि सामान्यजन उनको केवल बकवादी समझते हैं।       

दरअसल इस संसार के विषय-भोग इतने व्यापक और आकर्षक हैं कि अधिकांश लोग इन्द्रिय भोगों में रचे-पचे रहते हैं, या और अधिक मात्रा में भोग करने के लिये स्वर्ग जाना चाहते हैं। उनके लिये उनका मोह, लोभ और क्रोध ही सत्य है। अल्पज्ञानी लोग इस मोह या आसक्ति के त्याग के विधान को नहीं जानते। पर तत्व-ज्ञानी श्रीमद्भागत गीता में वर्णित यह तथ्य नहीं भूलते जिसमें भगवान ने कहा है कि हजारों में भी कोई एक मुझे भजता है और उनमें भी हजारों में से कोई एक मुझे पाता है। 
स्पष्टतः यही कहा गया है, कि सामान्य 'गृहस्थ लोगों' में (या सन्यासियों का चोंगा ओढ़ने वालों में ?) ज्ञानी उंगलियों पर गिनने लायक ही होंगे। साधारणतया गृहस्थ लोगों में काम, क्रोध, मोह और अज्ञान का ऐसा जाल छाया रहता है, इतने हिप्नोटाइज्ड हो जाते हैं कि वे अपने इन्द्रिय आसक्ति या निजी स्वार्थों से पृथक  नहीं हो सकते। जिनकी उम्र बहुत अधिक हो गयी है, जीवन के कई थपेड़े खा चुके हैं, फिर भी जो अपनी दुष्टता और मूर्खता नहीं छोड़ रहे हैं, ऐसे लोगों के साथ तो यह अपेक्षा कभी करना भी  नहीं चाहिए कि वह कभी सुधरेंगे, उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ देना चाहिये । उनको सुधारने का प्रयास करना केवल अपना समय और ऊर्जा को नष्ट करना ही है।

                  यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
            लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥९॥
जिसके पास अपनी कोई अकल (बुद्धि) नहीं है, उसकी वेद-शास्त्र भला क्या भलाई करेंगे ? वैसे ही जैसे अंधा व्यक्ति दर्पण का क्या करेगा ?
               दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो नहि भूतले ।
                 अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत॥१०॥

दुर्जन व्यक्ति को सज्जन बनाने के लिये भूमि पर कोई भी उपाय नहीं है, जैसे आप पृष्ठ भाग को चाहे सौ प्रकार से साफ़ करे वो श्रेष्ठ भागो की बराबरी नहीं कर सकता। ]

[ 'सत ' का अर्थ है-जो अविनाशी हो या चिरस्थायी हो (सत्य-वस्तु)। 'असत' का अर्थ है क्षणभंगुर या नश्वर (मिथ्या-वस्तु)। कौन सी वस्तु सत (अविनाशी) है, और कौन सी वस्तु असत (नश्वर) है- जो प्राणी चिन्तन करके इस बात को जान सकता है, उसी को मननशील जीव कहा जाता है।] 

 आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।
सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥
 जिस प्रकार आकाश से गिरा जल विविध नदीयों के माध्यम से अन्ततः सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओं को किया हुवा नमस्कार अंत में एक ही परमेश्वर (केशव-श्रीरामकृष्ण) को प्राप्त होता है ।
 As all the water fallen from the skies goes to the sea, similarly salutations to any God finally reach Keshava.
भगवान् एक ही हैं। वे ही निर्गुण -निराकार, सगुण-निराकार और सगुण -साकार हैं। लीलाभेदसे उन एकके ही अनेक नाम, रूप तथा उपासनाके भेद हैं। जगतके सारे मनुष्य उन एक ही भगवान् की विभिन्न प्रकारसे उपासना करते हैं, ऐसा समझे। मनुष्य -जीवनका एकमात्र साध्य या लक्ष्य मोक्ष, भगवत्प्राप्ति या भगवत्प्रेमकी प्राप्ति ही है, यह दृढ़ निश्चय करके प्रत्येक विचार तथा कार्य इसी लक्ष्यको ध्यानमें रखकर इसीकी सिद्धिके लिए करे।
नाम-रूप अर्थात शरीर तथा नाम आत्मा नहीं है। अतः शरीर तथा नाममें 'अहं' भाव न रखकर यह निश्चय रखे की मैं विनाशी शरीर नहीं, नित्य आत्मा हूँ। उत्पत्ति, विनाश, परिवर्तन शरीर तथा नामके होते हैं -- आत्माके कभी नहीं।
भगवान् का साकार-सगुण स्वरुप सत्य नित्य सच्चिदानन्दमय है। उसके रूप, गुण, लीला सभी भगवत्स्वरूप हैं। वह मायाकी वस्तु नही है। न वह उत्पत्ति -विनाशशील कोई प्राकृतिक वस्तु है। किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, मतसे द्वेष न करे; किसीकी निंदा न करे। आवश्यकतानुसार सबका आदर करे। अच्छी बात सभीसे ग्रहण करे; पर अपने धर्म तथा इष्टदेवपर अटल, अनन्य श्रद्धा रखकर उसीका सेवन करे।]

[" संसार का इतिहास बुद्ध और ईसा जैसे (ड्रॉप-आउट) व्यक्तियों का इतिहास है। वासनामुक्त तथा अनासक्त व्यक्ति ही संसार का सर्वाधिक हित करते हैं। ...प्रत्येक सफल मनुष्य के स्वभाव में कहीं न कहीं असाधारण ईमानदारी और सच्चाई छिपी रहती है; और उसी के कारण उसे जीवन में इतनी सफलता मिलती है। वह पुर्णतः स्वार्थहीन भले न रहा हो,पर वह उसकी ओर अग्रसर होता रहा था। यदि वह पुर्णतः स्वार्थहीन बन गया होता, तो उसकी सफलता भी वैसी ही महान होती, जैसे बुद्ध या ईसा की। सर्वत्र निःस्वार्थता की मात्रा पर ही सफलता की मात्रा निर्भर करती है।]





  

                     

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