Wednesday, July 18, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [1] 'विवेकानन्द अतीत के नायक थे या भावी युग के ?'(व्यक्ति और मन ),

प्रकाशक का निवेदन 
प्रत्येक देश के मनुष्य समुदाय के समक्ष प्रत्येक युग में कुछ न कुछ समस्यायें बनी ही रहती हैं।  कभी कभी तो कोई समस्या राष्ट्रिय-संकट का रूप भी धारण कर लेती है। अधिकांश भारतीय ऐसा मानने लगे हैं कि इन दिनों हम लोग एक भारी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। गरीबी, अशिक्षा,चरित्र, नैतिकता और आम-जनता के प्रति सच्ची सहानुभूति का अभाव, दूसरों को हानी पहुँचाकर भी अपना स्वार्थ पूरा करने का निर्लज्ज प्रयास, मानवीय मूल्यों तथा आत्मविश्वास का घोर आभाव देखकर बहुत से लोगो के मन को दुःख पहुंचता है।
किन्तु अक्सर हममें से अधिकांश लोग इसके उपर दुःख प्रकट कर या दूसरों के दोषों को देखने-दिखाने की चेष्टा करके ही चुप बैठ जाते हैं। 
हम लोग इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते कि - केवल देश-वासियों की आन्तरिक शक्ति और संभावनाओं को विकसित करने से ही, देश की अवस्था में परिवर्तन होना संभव है। मनुष्य के आन्तरिक सम्भावनाओं की कोई सीमा नहीं है। रचनात्मक विचार तथा कठोर परिश्रम की सहायता से उन संभावनाओं को विकसित करके प्रयोग में लाने से, हमलोग समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द असाधारण मानव-प्रेम, मनीषा और हृदयवत्ता के अधिकारी महापरुष थे। उन्होंने मानव-समाज विशेष रूप से भारत के जन-जीवन के असीम दुःख-दैन्य के मूल कारण को समझा था, एवं उसमें आमूल परिवर्तन लाने का उपाय भी बतलाया था। 
समस्त विचार-शील व्यक्तियों का हृदय, मानव-समाज की अनेकों समस्याओं में से विशेष रूप से 'युवा समस्या' को देखकर अधिक व्यथित होता है। किन्तु स्वामी विवेकानन्द ने युवा-जीवन में ही सम्पूर्ण समाज की सम्यक उन्नति का बीज निहित देखा था, तथा अपने देश के जनसाधारण की सर्वांगीन उन्नति के सपने को साकार करने के लिये, उन्होंने समस्त युवाओं को अपने व्यक्ति-जीवन की संभावनाओं को प्रस्फुटित करने का आह्वान किया था।
इस पुस्तक में संकलित रचनाओं का उद्देश्य, स्वामी विवेकानन्द के उसी आह्वान को आम जनों तक, विशेष तौर पर युवाओं के समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। विगत ५० (१९८४ में १७ वर्ष हुए थे) बर्षों से विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा महामण्डल यही कार्य करता चला आ रहा है। इसकी मासिक द्विभाषी पत्रिका ' विवेक-जीवन ' भी विगत ४८ वर्षों से प्रकाशित होती आ रही है। कुछ को छोड़ कर इस संकलन के अधिकांश लेख ' विवेक-जीवन ' के विभिन्न अंकों में प्रकाशित सम्पादकीय के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से सभी सम्पादकीय लिखित भी नहीं हैं, कक्षा में बोले गये व्याख्यान को लिख कर बाद में सम्पादकीय रूप में प्रकाशित किया गया है। इसीलिये यह संभव है कि सम्पूर्ण पुस्तक में भाषा और भाव की अभिव्यक्ति एवं एकरूपता में कहीं कहीं अंतर दिखाई दे, और यह भी स्वाभाविक है कि कहीं कहीं किसी विषय का उल्लेख दुबारा भी हो गया हो।
इधर बहुत दिनों से कुछ पाठक और महामंडल के हितैषी गण ' विवेक-जीवन ' में प्रकाशित सम्पादकीय लेखों  के संकलन को प्रकाशित करने का अनुरोध करते रहते थे। किन्तु मुख्य रूप से धनाभाव के कारण वैसा संभव नहीं हो रहा था। अभी भी आर्थिक असुविधा रहने के बावजूद इस ग्रन्थ को प्रकाशित किया जा रहा है। इस ग्रन्थ को बेचने से जो भी धन प्राप्त होगा, वह पूरा धन महामण्डल के कार्यों में ही खर्च किया जायेगा। आगे चल कर यदि आर्थिक स्थिति में थोडा भी सुधार  हुआ तो अंग्रेजी में प्रकाशित सम्पादकीय लेखों का अंग्रेजी संकलन भी प्रकाशित करने का प्रयत्न किया जायेगा।
' विवेक-जीवन ' के सम्पादकीय के आलावा अन्य कुछ रचनाएँ भी आलोच्य विषय को व्याख्यायित करने में सहायक सिद्ध होंगे, यही सोचकर इसमें उन्हें भी समावेशित कर लिया गया है। जैसे- ' स्वामी विवेकानन्द एवं युवा समाज ' तथा ' राष्ट्रिय एकता एवं स्वामी विवेकानन्द ' ये दो लेख रामकृष्ण मिशन सारदा-पीठ की वार्षिक स्मारिका ' सारदा ' में प्रकशित हो चुके हैं। ' युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द ' लेख बलराम मन्दिर के श्री श्री ठाकुर के चरणों में में निवेदित शत-वार्षिकी उत्सव के उपलक्ष्य में प्रकाशित स्मारिका में छपी हैं। इन तीनो रचनाओं को पुनर्मुद्रित करने की अनुमति देने के लिये हमलोग रामकृष्ण मिशन सारदापीठ एवं बलराम मन्दिर के अध्यक्ष के प्रति कृतज्ञ हैं।
'काँथी रामकृष्ण मिशन आश्रम ' द्वारा आयोजित युवा सम्मेलन के अवसर पर उनके अनुरोध पर लिखित लेख- ' नारि-जाती की उन्नति के विषय में स्वामी विवेकानन्द के विचार ' को भी इसमें सम्मिलित किया गया है। ' स्वामी विवेकानन्द और आधुनिक मानव ' कुछ वर्षों पूर्व दिए गये व्याख्यान की अनुलिपि है। ये दोनों लेख पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय युवा वर्ष के पूर्व संध्या में युवकों के कल्याण के लिये यह ग्रन्थ निवेदित हुई हैं। यदि इस संकलन में प्रकशित निबन्धों के अध्यन से थोड़े भी युवा विवेकानन्द के भाव को ग्रहण करने की प्रेरणा प्राप्त कर सकें तो सभी की मिहनत सार्थक हो जाएगी।
प्रथम संस्करण : बंगला भाषा में : अक्टूबर 1984. 
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चतुर्थ संस्करण की भूमिका 
पूर्व में प्रकाशित समस्त संस्करणों के समाप्त हो जाने के बाद, आठ नये निबन्धों को जोड़ कर तथा कुछ लेखों को हटाकर पुनः नये परिष्कृत कलेवर में इस ग्रन्थ का चतुर्थ संस्करण प्रकाशित हो रहा है। इस ग्रन्थ में स्वामीजी का दो नया चित्र भी इसमें डाला गया है, जिसमें से एक चित्र अमेरिका स्थित 'वेदान्ता सोसायटी ऑफ़ सेंट लुईस ' के अध्यक्ष स्वामी चेतनानन्द के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। स्वामी विवेकानन्द के सार्धशततम जन्म जयन्ती के अवसर पर महामण्डल प्रकाशन द्वारा प्रस्तावित प्रकाशन में से एक ग्रन्थ यह है। 
भारत के राष्ट्रियकृत बैंकों में से एक 'यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ' के प्राधिकारी वर्ग ने इस ग्रन्थ को प्रकाशित करने में विशेष रूप से आर्थिक सहायता प्रदान की है। उनके प्रति हम अपनी विनम्र आंतरिक कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इनके अतिरिक्त सर्वश्री अमित कुमार दत्त, भूपेन्द्र चन्द्र भट्टाचार्य,अरुणाभ सेनगुप्त, तथा विश्वनाथ पाल आदि ने भी इस ग्रन्थ के प्रकाशन में कई तरह से सहायता पहुँचाई है। ग्रन्थ की रूपसज्जा श्री सुकेश मण्डल के सौजन्य से हुई है। श्रीरामकृष्ण-माँ सारदा-स्वामीजी का आशीर्वाद सबों के उपर वर्षित हो, यही प्रार्थना है। 
आर्थिक सहायता मिलने से भी इस संवर्धित संस्करण के कलेवर में वृद्धि तथा अन्य प्रासंगिक व्यय में अत्यधिक होने से न चाहते हुए भी ग्रन्थ के मूल्य में थोड़ी सी वृद्धि करनी पड़ी है। आशा करते हैं, इस विशेष संस्करण को सुधि पाठक वृन्द स्वीकार करेंगे, तथा स्वामीजी के सार्धशततम जन्म जयंती में साक्षात् भाग लेने के आनन्द का उपभोग करेंगे। 
प्रकाशक 
४ जुलाई २ ० १ २ 
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हिन्दी प्रकाशन की भूमिका 
यद्दपि १४ जनवरी १९८५ को ही 'विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर' (युवा चरित्र-निर्माणकारी संस्था) के माध्यम से स्वामीजी का भाव झुमरीतिलैया (तब के बिहार अभी झारखण्ड ) में आविर्भूत हो चूका था। किन्तु चरित्र क्या है तथा चरित्र-निर्माण की पद्धति क्या है ? इस विषय में इस पुस्तक के अनुवादक को स्वयं कुछ भी ज्ञात नहीं था। किन्तु स्वामी जी की सत्येन्द्रनाथ मजूमदार द्वारा लिखित जीवनी 'विवेकानन्द चरित' को पढ़ने के बाद वह तीव्र ४४० वोल्ट के इलेक्ट्रिक शॉक का अनुभव कर रहा था। राँची रामकृष्ण आश्रम में कार्यरत पूज्य प्रमोद दा के परामर्श पर १९८७ के बेलघड़ीया में आयोजित वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में इस अनुवादक ने महामण्डल का प्रथम कैम्प किया था। वहाँ उसने जीवन्त वेद स्वरूप पूज्य नवनी दा के मुख से विवेकानन्द के जीवन-गठनकारी विचारों तथा ' Be and Make ' की अद्भुत व्याख्या के अनुसार 'भारत निर्माण की योजना' को आश्चर्यचकित होकर सुना था। 
किन्तु इस भाव को समझकर, अपना जीवन गठित करने में पूर्व संस्कार भी बाधक होते हैं, जिनके साथ संघर्ष करके मन को वशीभूत करने में काफी समय लग जाता है। इसीलिये किसी हिन्दी-भाषी महामण्डल कर्मी को पूज्य ' नवनी दा ' के द्वारा बंगला भाषा में लिखे इस ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद करने का सौभाग्य, प्रथम बंगला संस्करण प्रकशित होने के पूरे 28 वर्ष बाद  मिल रहा है।
स्वामी विवेकानन्द के सार्धशतक जन्म जयंती के अवसर पर जो चतुर्थ संस्करण बंगला भाषा में प्रकाशित हुआ है, उसमें संकलित आठ नये निबन्धों का हिन्दी अनुवाद भी यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है।
महामण्डल के इस मनुष्य निर्माणकारी और चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन से जुड़े हिन्दीभाषी युवा कार्य-कर्ताओं को अपना जीवन गठित करने की 'अद्भुत शिक्षा के अद्भुत शिक्षक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय' की बंगला वाणी को हिन्दी में पढ़ने से स्वामी विवेकानन्द के आदर्श और उद्देश्य का अनुसरण करके अपना जीवन गठित करने में बहुत बड़ा संबल प्राप्त होगा। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर इस ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद - ' झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल ' के ' विवेक-अंजन ' प्रकाशन कार्यालय से प्रकाशित किया जा रहा है। 
 प्रकाशक: 
(बिजय कुमार सिंह , महामण्डल का हिन्दी प्रकाशन विभाग,झुमरितेलैया (झारखण्ड): सितम्बर 2012 ) 


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[प्रथम अध्याय : स्वामी विवेकानन्द -व्यक्ति और मन ]
१. "स्वामी विवेकानन्द अतीत के नायक थे या भावी युग के ?" 
कुछ (तथाकथित) बुद्धिजीवी लोग, स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त व्याख्यानों के कुछ शब्दों का अर्थ सामान्य  प्रचलित धारणा के अनुसार कुछ  इस प्रकार तोड़-मड़ोड़ कर व्यक्त करते हैं, कि हमलोग उनके कथन का अक्सर गलत अर्थ समझ बैठते हैं।  विवेकानन्द साहित्य को स्वयं गहराई से पढ़ने या समझने की चेष्टा हमलोगों ने अभी तक नहीं की है, इसीलिये उनको एक महान ' धार्मिक भय ' के रूप में देखते हैं, किन्तु साथ ही साथ उनके प्रति एक आदर का भाव भी रखते हैं। परन्तु, उनको ठीक से नहीं समझ पाने के कारण यह आदर का भाव उनके प्रति अटूट श्रद्धा में परिणत नहीं हो पाता, इसीलिये युवावस्था में तो हमलोग उनका अनुसरण करने की बात भी नहीं सोच पाते हैं।
उनके व्याख्यानों में कुछ अबूझ-शब्दों (उत्तिष्ठत -जाग्रत आदि) को पहली बार सुनने के कारण हमलोग उनको भी कोई आम प्राचीन दुरूह धार्मिक प्रवक्ता समझ लेते हैं। क्योंकि वे जिस समय आविर्भूत हुए थे, उस समय से आज के हमलोग बहुत आगे निकल चुके हैं- आज हमलोग चन्द्रमा की धरती पर पैर रखने का गर्व करने वाले मानव बन चुके हैं।
हमलोग समय के प्रवाह में भी बहते चले जा रहे हैं, और समय के साथ कदम से कदम मिला कर चलना भी चाह रहे हैं। क्योंकि जिनके पाँव समय के साथ मिल कर चलते हैं, उनको ही आधुनिक मनुष्य कहा जाता है, नहीं तो प्राचीन युग में जीने वाला या ' पुरातन-पन्थी ' समझ लिया जाता है। किन्तु समय के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाने के- दो कारण हो सकते हैं। पहला जो मनुष्य समय से पीछे रह गया है, उसके कदम समय के साथ मिलेंगे ही नहीं। दूसरा - जो लोग मानवजाति के मार्गदर्शक नेता होते हैं वे भविष्य-द्रष्टा ऋषि होते हैं, इसीलिये वे सदैव अपने कदमों को समय से आगे बढ़ा कर चलते हैं ! अतएव समय के साथ-साथ चलने वाले व्यक्तियों के कदम भी नेता के कदमों से नहीं मिल पाते हैं। और यही कारण है कि स्वामी विवेकानन्द जैसे किसी युग-नायक के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले लोग बहुत कम ही होते हैंइसीलिये उनके जैसे नेता का तो सदैव अनुसरण ही करना पड़ता है।
ठीक उसी प्रकार कुछ लोग, वर्तमान के भौतिकवादी वातावरण में अपनी बुद्धि की तराजू से तौलने, और तर्क-वितर्क करके प्राचीन समय में दिये गये स्वामी जी के व्याख्यानों को, उतना उपयोगी नहीं मानते। किन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि - समय के साथ जिनके शब्द नहीं मिलते वे समय से पीछे रहने वालों के शब्द भी हो सकते हैं, और समय से आगे चलने वालों के शब्द भी हो सकते हैं। स्वामीजी के शब्द समय से आगे रहने वालों में से थे। वे तो अतीत के बिल्कुल विपरीत- भविष्य के द्रष्टा थे। इसीलिये वर्तमान की निष्क्रियता और धीमी गति को देखने लिए, या वर्तमान को देखने के लिये उनको पीछे मुड़ कर देखना पड़ता था। अपनी ही निष्क्रियता तथा धीमी गति आदि सैंकड़ो कारणों से उनको समझाना साधारण तौर से कठिन प्रतीत होता था।
जिस युग में स्वामी विवेकानन्द आविर्भूत हुए थे, उस समय पाश्चत्य से नव आयातित आधुनिकता के कारण मूर्ति-पूजा के प्रति अविश्वास का भाव हमारे देश को प्लावित कर रहा था, और उनके समकालीन नवशिक्षित सम्प्रदाय उसी 'विश्वास-अविश्वास 'के प्लावन में डूब-उतरा रहे थे। किन्तु उन्हीं दिनों स्वामी  विवेकानन्द ने घोषित किया था- ' वे इतने अनाड़ी आधुनिक भी नहीं हैं, जो ईश्वर को तड़ित (बिजली) का 'परिणाम-विशेष' के रूप में प्रमाणित करने की चेष्टा करेंगे। ' वे एक ऐसे नित्य-आधुनिक व्यक्ति थे जो केवल एकबार दृष्टिपात करके ही, इन्द्रधनुष के समान विस्तृत अतीत में हुए सृष्टि के प्रारंभ से लेकर, वर्तमान को भी पार करके, भविष्य तक की सृष्टि को स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ थे।
इसीलिये वे अपने युग के तथाकथित ' नव-आधुनिक ' बुद्धिजीवियों के जैसा इस मन्त्र का जाप करने को तैयार नहीं थे कि जो कुछ भी समय के प्रवाह में पुराने होकर ' पूराण ' के नाम से पुकारे जायें उन्हें बिल्कुल ही त्याग देना चाहिये।  उन्होंने कहा ' वहिष्कार ' (Exclusion ) जैसे शब्द का उनकी भाषा में कोई स्थान ही नहीं है। उन्होंने अतीत के गौरव-पूर्ण समय से प्रेरणा प्राप्त करके, वर्तमान के 'शिशु' को अपने पैरों पर खड़े होने तथा  भविष्य को और भी अधिक महान रूप से गढ़ने की साधना, में वीरता के साथ कदम उठाते हुए आगे बढ़ने का  आह्वान  किया है।
उन्होंने कामना-वासना का त्याग करने को कहा है। किन्तु उनके कहने अर्थ यह नहीं है कि सभी मनुष्यों को निरुत्साही, निश्चेष्ट,निकम्मा, बनस्पति के जैसा मनुष्य बन जाना होगा। कामनाओं को त्याग करने का अर्थ है- कामनाओं का दास नहीं बनना।  उन्होंने विश्व के धार्मिक इतिहास का अध्यन करके यह जान लिया था कि केवल भारत में ही 'चार पुरुषार्थ ' (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष), 'चार आश्रम' (ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ,संन्यास) और 'चार वर्ण' (शूद्र,वैश्य,क्षत्रीय,ब्राह्मण) के क्रमविकास और चरित्रनिर्माण के सुसमन्वित अभ्यास के द्वारा जीवन में उतार कर उसे सार्थक बनाने (शुद्र को भी ब्राह्मण तक उन्नत करने) की व्यवस्था थी। इसमें से मोक्ष को अन्तिम पुरुषार्थ (last Luxury) माना जाता था, और सभी मनुष्यों के लिये इसे अनिवार्य बनाया ही नहीं गया था।
 क्योंकि इहलोक तथा परलोक के भोगों के प्रति मनुष्यों में जो स्वाभाविक लालसा रहती है, आज के भारत में उसकी (रजोगुण में वृद्धि की) भी प्रयोजनीयता है, इस तथ्य को धर्म के बारे में कहते हुए उन्होंने कई प्रकार से समझाया है। उन्होंने कहा है कि -पाश्चात्य के लोगों में धर्म के प्रति हमलोगो से अधिक आग्रह है, क्योंकि हमलोगों ने अभी तक उनके समान भोग-सामग्रियों का उत्पादन और उपभोग करके उनकी व्यर्थता का अनुभव करना नहीं सीखा है; इसीलिये उन्होंने यह आक्षेप हमलोगों पर लगाया है। सुख-सुविधा का भोग किये बिना, जो कुछ भाग्य से प्राप्त हो जाय उसकी अयोक्तिक बड़ाई करने को उन्होंने पागलपन कहकर निन्दा की है।
 ' अंगूर खट्टे हैं ' को छिपाने के लिये भाग्य की दुहाई देते हुए दरिद्रता और अभाव में ही सम्पूर्ण जीवन बिता देने को ही, उन्होंने सात्विकता के आवरण में छुपी हुई महान तामसिकता ही कहा है। स्वामी विवेकानन्द क्रमिक विकास (evolution) में विश्वास रखते थे। वे मनुष्यों को पहले रजोगुण की अभिव्यक्ति करने के माध्यम से तामसिकता को दूर हटाकर, सतोगुण (सत्व-शुद्ध-चित्त में) में लीन शान्ति का आश्रय ग्रहण करने को प्रेरित करते थे। ठीक उसी प्रकार सामुदायिक जीवन के क्षेत्र में भी पहले शूद्रों की एकता, वैश्यों के आदान-प्रदान, क्षात्र-वीर्य ( क्षत्रियों की वीरता और साहस) की उपलब्धी कर लेने के बाद ही  साधना के द्वारा ब्रह्मतेज को प्राप्त करने के पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देते थे। 
दरिद्रता, अशिक्षा, अज्ञानता के घने अंधकार को भूतकाल की गहरी खाई में फेंक कर, मनुष्य मात्र में अन्तर्निहित ब्रह्मत्व (शाश्वत महानता) को उद्घाटित करा देना ही स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित कर्म-योग का रहस्य है। वे हमलोगों को केवल इतना ही याद करवा देना चाहते थे कि " कई हजार ब्रह्मा एवं इन्द्रादि देवता भी ' बुद्धत्व-प्राप्त ' नर-देवता के चरणों में शीस झुकाते हैं तथा इस बुद्धत्व-प्राप्ति पर मानव-मात्र का अधिकार है। " इस भविष्य-द्रष्टा योद्धा-सन्यासी के समक्ष आधुनिकता की राग अलापना नवजात शिशु का क्रंदन मात्र प्रतीत होता है ।
इसीलिये यह प्रश्न उठता है, कि स्वामीजी अतीत युग के नायक थे या भावी युग के ?  
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