Sunday, June 10, 2012

' ब्राह्मण-पुत्र का गुरु आत्मज्ञानी हरिजन ! ' [4]कहानियों में वेदान्त

 " धर्म व्याध "
कौशिक को अपना मन शान्त करने में थोडा वक्त लग गया। उस पतिव्रता रमणी  ने उनको धर्म व्याध के पास जाने का निर्देश दिया है। वे एक ब्राह्मण-पुत्र हैं, वेद-पाठी हैं; क्या धर्म का उपदेश ग्रहण करने के लिए उनको एक व्याध ( एक ऐसा ' हरिजन ' - जो मांस बेचकर अपनी आजीविका चलता है ) के पास जाना पड़ेगा ? पूरी घटना (केवल पातिव्रत्य-धर्म का पालन करने कारण उस स्त्री को आत्मज्ञान हो गया था, और वह घर बैठे ही दूर जंगल में बगुला-भष्म की कथा को जान गयी थी !) के उपर काफी सोच-विचार करने के बाद, अन्त में उन्होंने मिथिला जाने का निर्णय ले ही लिया।

कौशिक मिथिला की दिशा में पैदल ही चल पड़े। रस्ते में कितने ही गाँव मिलते गये, हरे-भरे कितने ही मैदान मिले। कितनी ही नदियों को पार करते हुए वे बस चलते ही जा रहे थे। अन्त में वे राज-ऋषि जनक की राजधानी मिथिला नगरी पहुँच गये। क्या ही सुंदर नगर था ! सभी सड़कें एवं घाट साफ-सुथरे थे, वहाँ के महलों- घरों, उद्द्यान और स्वच्छ ताल-तलैयों को देखने से आँखे जुड़ा जाती थीं। वहां के लोग भी दिखने में स्वस्थ, सबल, और सुन्दर थे। वहां के सड़कों पर, बाजार में, सभी के घरों को देखने से ऐसा प्रतीत होता था, मानों कोई उत्सव मनाया जा रहा हो; सर्वत्र ही आनन्द छाया हुआ था। यह सब देख कर वे बड़े प्रसन्न हुए। पूछने पर ज्ञात हुआ कि ब्रह्मज्ञानी राजा जनक के सुशासन के कारण राजधानी में हर समय इसी प्रकार की शान्ति और आनंद छाया रहता था।
वे अपने जीवन में पहली बार ही मिथिला आये थे। वहाँ के रास्तों से वे बिल्कुल अनभिज्ञ थे। वे पूछते हुए जा रहे थे कि धर्म व्याध कहाँ मिलेंगे। परन्तु उन्होंने देखा कि वहां के सभी लोग धर्म व्याध को पहचानते थे, तथा उनको एक परम धार्मिक व्यक्ति के रूप में जानकर आदर के साथ उनका नाम लेते थे। इस प्रकार पूछते पूछते वे अन्त में एक मांस बेचने वाले की दुकान में आ पहुंचे। उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति दुकान के भीतर बैठ कर मांस बेच रहा था। उन्होंने सुना कि वे ही धर्म व्याध हैं। दुकान के सामने बहुत से खरीदने वालों की भीड़ लगी हुई थी। वे भी एक किनारे पर खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे। मन ही मन बहुत नाराज भी हो रहे थे।
ब्राह्मण-पुत्र कौशिक सोचने लगे, " हाय री मेरी किस्मत ! जो व्यक्ति एक ' हरिजन ' है;  पेशे से व्याध या मांस बेचने वाला कसाई है ! इतना घृणित कार्य करता है, वह क्या परम धार्मिक भी हो सकता है? क्या मैं इतना गया-गुजरा हूँ कि मुझे इसके मुंह से धर्म का उपदेश सुनना पड़ेगा !"

 
इधर धर्म व्याध भी अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर यह जान चुके थे कि कौशिक मिथिला पहुँच चुके हैं और दुकान के सामने खड़े होकर प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने यह भी जान लिया था कि वे यहाँ किस लिए आये हैं, तथा किसने उनको भेजा है। उनको देख कर वे झटपट उठ कर खड़े हो गये, और उनके निकट आकर प्रेम के साथ स्वागत सत्कार करते हुए बोले- " हे ब्राह्मण देवता, मेरा प्रणाम स्वीकार कीजिये। सब कुशल-मंगल तो  है न ? आप आदेश कीजिये कि मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ।किस पतिव्रता रमणी  ने आपको यहाँ भेजा है, और क्यों भेजा है,यह भी मैं जानता हूँ। " 
उनकी बातों को सुन कर कौशिक आश्चर्य-चकित हो गये, सोचने लगे- " देखता हूँ यह हरिजन भी कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। इसको घर में बैठे हुए ही बोध-शक्ति प्राप्त हो चुकी है, इसे भी सारी बातें ज्ञात हैं ! " फिर उस व्याध ने उनको ' हे ब्राह्मण देवता ' कहकर भी संबोधित किया था ! उसके विनम्र व्यवहार को देख कर भी बड़े प्रसन्न हुए थे। व्याध के अनुरोध करने पर कौशिक उसके घर में गये। घर पहुँच कर हाथ-पैर धोकर दोनों व्यक्ति आराम से बैठ कर वार्तालाप करने लगे।
ब्राह्मण-पुत्र कौशिक ने कहा, " देखो भाई, तुम जो यह माँस बेचने का कार्य करते हो, वह मुझे बिलकुल भी पसन्द नहीं है। तुम तो एक धार्मिक व्यक्ति हो, फिर ऐसा नीच कर्म क्यों करते हो ? तुम्हारे जैसे व्यक्ति को ऐसा क्षुद्र कार्य करना शोभा नहीं देता। तुमको ऐसा घटिया कार्य करता देख कर मुझे बहुत बुरा लगा है। " 
व्याध ने कहा, " ब्राह्मण देवता, यही तो मेरा वर्णाश्रय-धर्म (जाती-धर्म) है !  मेरे वंश में सभी लोग यही कार्य करते चले आ रहे हैं। आप इस बात पर इतना नाराज क्यों हो रहे हैं ? मैं तो शास्त्रों के नियम के अनुसार जीवन यापन करता हूँ। माता-पिता आदि गुरुजनों की मन-प्राण से सेवा-सुश्रुषा करता हूँ। सदा सत्य बोलता हूँ, और किसी के भी प्रति अपने मन में विद्वेष नहीं रखता। दीन दुखियों की यथाशक्ति सहायता करता हूँ। अतिथि सेवा करने में कभी कोई कोताही नहीं करता। देवसेवा हो जाने बाद गुरुजनों, स्वजनों-अतिथियों, यहाँ तक कि नौकर-चाकर आदि का भोजन समाप्त हो जाने के बाद, जितना अन्न शरीर की रक्षा के लिए आवश्यक है, उतना ही ग्रहण करता हूँ। इन सबों की सेवा करना ही मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। पूरी श्रद्धा के साथ मैं अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूँ। इन सबकी सेवा के लिए धन की आवश्यकता होती है, एवं माँस बिक्री करके धनोपार्जन करना मेरा स्वधर्म है, इसीलिए मैं उसी कर्म को करता हूँ। मैं एक भी शास्त्र-विरोधी कर्म नहीं करता। मैं स्वयं कभी माँस नहीं खाता। स्वयम किसी प्राणी की हत्या भी नहीं करता, शिकारियों द्वारा मारे  गये पशुओं को खरीद कर उसका माँस बिक्री करता हूँ।"
इसके बाद धर्म व्याध ने कौशिक को धर्म के गूढ़ तत्वों के बारे में, यहाँ तक कि ब्रह्म विद्या के विषय में भी विस्तार से बताने लगे। इसी प्रसंग में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था, " आत्मज्ञान (अर्थात अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान ) ही श्रेष्ठ ज्ञान है, सत्य ही परम पवित्र व्रत है। जो सर्वसाधारण के लिए कल्याणकारी हो, वही सत्य है। श्रेय प्राप्त करने का आद्वितीय उपाय सत्य ही है। इन्द्रिय संयम करना ही तपस्या है; इससे भिन्न तपस्या करने का दूसरा कोई उपाय नहीं है। ....जीव नित्य है, शरीर अनित्य है; मृत्यू के समय केवल शरीर का ही नाश होता है।"
उनकी बातों को सुन कर धर्म व्याध के बारे में कौशिक की जो धारणा पहले थी वह बदल चुकी था। उन्होंने देखा कि वे उनकी बातों को जितना ही सुन रहे हैं, मन का संशय उतना ही मिटता जा रहा है; उनका हृदय ज्ञान के आलोक से उतना ही उद्भाषित हो उठा है। ब्रह्म विद्या के बारे में धर्म व्याध ने जो कुछ भी कहा, उनके मन ने उसे बिना किसी शंका के स्वीकार कर लिया। तब उनके समझ में आ गया कि धर्म व्याध को ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है।
 क्योंकि शास्त्रों को पढ़ कर उन सब बातों का उल्लेख करके दूसरों को तर्क में परास्त किया जा सकता है; या बहुत हुआ तो उस विषय में उसकी बुद्धि में कोई अस्पष्ट (या किसी बेबुनियाद) धारणा को प्रविष्ट करा दिया जा सकता है। किन्तु स्वयं की अनुभूति नहीं रहने से इसप्रकार किसी दूसरे के मन में कुछ आरोपण (Implant) कर देना कभी संभव नहीं होता।
 किसी आदर्श को अपने स्वयं के जीवन में प्रतिबिम्बित किये बिना, केवल प्रवचन देकर दूसरों को उस आदर्श के अनुरूप जीवन गठन करने के लिए अनुप्रेरित कर पाना अव्यवहारिक (Impracticable) है। कौशिक ने धर्म व्याध से कहा, " धर्म का कोई भी तत्व आपके लिए अविदित नहीं है। आपकी बातों को सुनने से, आप किसी महर्षी की तरह प्रतीत होते हैं। उपरी तौर पर देखने से घृणित कर्म करने वाले होकर भी, मैं यह समझ सकता हूँ कि आपको सिद्धि प्राप्त हो गयी है। "
किसी को यदि सिद्धि प्राप्त करनी हो, तो उसे सांसारिक जीवन में सगे-सम्बन्धियों, समाज या परिवार के  बीच किस प्रकार से रहना होता है, इन सब बातों को धर्म व्याध ने बहुत विस्तार से, कई प्रकार के उदहारण देकर समझा दिया। इसके बाद सबसे अन्त में अपने माता-पिता से परिचय करवा देने के बाद कौशिक से कहा - " मैं इन्हें साक्षात् देवता (शिव-पार्वती ) के रूप में देखता हूँ और उसी रूप में बड़े प्रेम से उपासना समझ कर  इनकी सेवा करता हूँ। इतनी साधना से ही मुझे सबकुछ प्राप्त हो गया है। 
आप भी अपने घर-परिवार में वापस लौट जाइये और वहाँ रहते हुए ही धर्म-प्राप्ति (अपने सच्चे स्वरुप को जानने ) की साधना करते रहिये। माता-पिता की अनुमति लिए बिना उनको घर में असहाय छोड़ कर, जंगल में वेद-पाठ करने के लिए चले आकर आपने अच्छा कार्य नहीं किया है। घर लौट कर पहले उनको प्रसन्न कीजिये। मैं सोचता हूँ, इसीसे आपका कल्याण होगा। "
कौशिक ने कहा- " उस पतिव्रता रमणी ने आपको ' महा-धार्मिक ' की संज्ञा दी थी; पहले तो मैं आपको नहीं समझ सका था, किन्तु अब देखता हूँ, उन्होंने ठीक ही कहा था। आपकी बातों को सुनने से मेरे मन का संशय मिट चुका है, अब मैं आपके निर्देशानुसार ही चलूँगा। " इतना कहकर कौशिक देवता ज्ञान से अपने माता-पिता की सेवा करने लिए धर्म व्याध से विदा लेकर अपने घर वापस लौट गए।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि यदि अपने देव-स्वरुप की उपलब्धी करनी हो, सभी जीवों में स्वयं को प्रत्यक्षतः अनुभव करना चाहते हों, तो ईश्वर ज्ञान से सबों की सेवा करनी होगी। कहते हैं, यदि तुम प्रारंभ में सबों को यदि ईश्वर ज्ञान से नहीं देख सको तो, अपने परिवार के सभी लोगों को, या कम से कम एक व्यक्ति को लेकर आरम्भ कर सकते हो; मन में ऐसा दृढ निश्चय लेकर आगे बढना होगा कि उनको प्रेम करने से ईश्वर को ही प्रेम कर रहा हूँ, उनकी सेवा से ईश्वर की ही सेवा हो रही है।
कठिन होने पर भी, परिवार में रहते हुए, समस्त कर्तव्यों का पालन करते हुए भी कोई व्यक्ति आत्मज्ञान (अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान ) प्राप्त कर सकता है। कोई किस जाती का है, किसका क्या धर्म है, कौन क्या कार्य कर रहा है, यह सब देख कर यह नहीं समझा जा सकता कि स्वरुप-बोध की दिशा में वह कितना आगे बढ़ चुका है। मूल बात यह है कि वह किस भाव से उस कार्य को कर रहा है, उस पर दृष्टि रखना ही ज्यादा जरुरी है।
किसी भी कार्य को करने से सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि - ये सारी चीजें भी स्वतः प्राप्त होने लगती हैं। इन मौकों पर कभी तो मन आनन्द से नृत्य करना चाहेगा, या कभी दुःख की निराशा से उत्साह हीन होकर मुरझा जाना चाहेगा। उस समय में भी बल पूर्वक मन को स्थिर रखने की चेष्टा करते रहने से  ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक साधना हो जाती है। इसीलिए, अपने सच्चे स्वरुप का ज्ञान प्राप्त करने की आन्तरिक या तीव्र इच्छा रहने से संसार के किसी भी परिवेश में रहते हुए भी, कोई व्यक्ति आत्मज्ञान को प्राप्त करने के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है, उसके मार्ग में कोई भी पारिवारिक स्थिति कभी बाधक नहीं बन सकती है।
इसके बाद वाली कहानी में इस तथ्य को हमलोग और भी अच्छी प्रकार से समझ सकेंगे।

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