Friday, June 8, 2012

कहानियों में वेदान्त/ 1

कहानियों में वेदान्त
स्वामी विश्वाश्रयानन्द
प्रकाशक: सचिव, रामकृष्ण मिशन कोलकाता स्टुडेंट्स होम
बेलघरिया, कोलकाता -70056
निवेदन
आचार्य शंकर, श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द तथा अन्य सत्यद्रष्टा ऋषियों के जीवन की अनेक घटनाओं एवं उनके द्वारा कथित कहानियों में वेदान्त के बहुत से कठिन विषय अत्यन्त सहज रूप से बोधगम्य हो जाते हैं।
हमारे ऋषियों ने भारतीय धर्म एवं सभ्यता के मूल सिद्धान्त तथा आध्यात्मिक तत्व को सरलता से समझाने के लिए पुराणों का तो कहना ही क्या, कई स्थानों पर कहानियों के माध्यम से उन्हें बोधगम्य बनाने का प्रयास किया है।
उन्हीं सब घटनाओं तथा कहानियों में से कुछ को आधार बना कर यह ' कहानियों में वेदान्त ' नामक पुस्तक प्रकाशित हो रहा है।
 वेदान्त के सार्वभौमिक उदार विचार समूहों की ओर साधारण जनता की दृष्टि को आकर्षित करना ही इसका उद्देश्य है। इन कहानियों के वर्णन में सत्यद्रष्टा ऋषियों के संदेशों में समाहित मूल विचारों को सर्वत्र अक्षुन्न रखा गया है। उदाहरण में अधिकांश सत्यद्रष्टा ऋषियों द्वारा कथित संदेशों से ही लिया गया है।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- 'वेदान्त ही हमारा जीवन है, वेदान्त में ही हमलोगों का प्राण बसता है।' राष्ट्र के सर्वांगीन विकास के लिए उन्होंने सम्पूर्ण भारत को वेदान्त के जीवन दायीनी शक्तिदायी विचारों के जलप्रवाह में डुबो देने का परामर्श दिया है।
केन्द्रिय शिक्षा-मन्त्रालय ने उन्हीं के संदेशों से उत्प्रेरित होकर इस प्रकार की पुस्तक को प्रकाशित करने के सद्प्रयास में सहायता प्रदान की है। स्वामी विवेकानन्द की जन्म-शदाब्दी के अवसर पर उन्हीं के चरणों में यह अर्ध्य निवेदित है !



लेखक
प्रथम प्रकाशन के अवसर पर प्रकाशक का निवेदन 
श्रीभगवान की कृपा से ' कहानियों में वेदान्त ' प्रकाशित हो रहा है। छात्रों की बुद्धि के विकास के साथ साथ जिन विचारों के आत्मसातीकरण होने से उनका सुन्दर चरित्र गठित हो जाता है, इस कार्य में यह पुस्तिका बहुत ही सहायक सिद्ध होगी इसमें कुछ संदेह नहीं है। यह बात सर्वविदित है कि बचपन में किस्से कथाएं सुनना सब को पसंद होता है। शायद इसीलिए समस्त देशों में समस्त समाजों में इतनी कहानियां रचित हुई हैं, और आज भी प्रचलित हैं। 
भारत में धर्म के मूल तथ्य वेदान्त में ही सन्निहित हैं। हमारे आचार्यों ने युगों युगों से वेदान्त के इन गूढ़ विचारों को आमजनता के बीच प्रचारित करने के उद्देश्य से बहुत से रूपक एवं कहानियों की सहायता ली है। ये कथाएं चाहे जितनी भी प्राचीन क्यों न हों, वे सब आज भी उसी प्रकार शिक्षाप्रद एवं लोकप्रिय बनी हुई हैं। 
भारत सरकार ने धर्म के मूल तथ्यों को कथा-कहानियों के माध्यम से जनसाधारण को सिखाने के उद्देश्य से देश की विभिन्न भाषाओँ में ' कहानी-पुस्तक ' लेखन प्रतियोगोता का आयोजन किया था। रामकृष्ण मठ और मिशन के संचालकों के निर्देशानुसार स्वामी विश्वाश्रयानन्द ने बंगला भाषा में इस ' कहानी -पुस्तक ' को लिखा है। यह बड़े ही आनंद की बात है कि भारत सरकार द्वारा मनोनीत निर्णायक मण्डली ने इसी पुस्तक को सर्वोत्तम घोषित किया है। सरकारी विज्ञप्ति में यह भी कहा गया था कि इस सर्वत्तम घोषित पुस्तक का प्रकाशन भी उनके ही द्वारा होगा। किन्तु बाद में उन्होंने किसी अपरिहार्य कारणों से इस पुस्तक के प्रकाशन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित रखने का निर्णय लिया है। किन्तु उनहोंने लेखक को इस पुस्तक को प्रकाशित करने की अनुमति अवश्य प्रदान की है।       
दूसरी ओर सरकारी विज्ञप्ति में सर्वोत्तम निर्वाचित पुस्तक के रूप में ' कहानियों में वेदान्त ' का नाम प्रकाशित होने के कारण बहुत से व्यक्तियों में इस पुस्तक को पाने का विशेष आग्रह दिखाई दे रहा है। इसीलिए बहुत प्रकार की असुविधाओं के रहने पर भी स्वामी विवेकानन्द निर्दिष्ट सेवा-धर्म से अनुप्रेरित होकर श्रीभगवान के चरणों में इसके परिणाम को समर्पित करते हुए यह पुस्तक प्रकाशित हो रहा है। किमधिकमिति।
स्वामी सन्तोषानन्द 
प्रकाशक 
महालया 1370. 
प्रकाशक का निवेदन 
श्रीश्रीजगदम्बा की कृपा से ' कहानियों में वेदान्त ' का 17 वां संस्करण प्रकाशित हो रहा है। यथासंभव पुस्तक को आद्द्योपांत देख लिया गया है। कागज तथा छपाई खर्च में बेहिसाब वृद्धि होने के कारण पुस्तक का मूल्य बढ़ाने को हम बाध्य हुए हैं।
1ला वैशाख, 1406 
हिन्दी अनुवादक का निवेदन 
इस पुस्तक में वर्णित अमूल्य कहानियों को हिन्दी-भाषी तरुणों-विद्यार्थियों को सुनाने से उनके चरित्र गठन में निश्चित रूप से सहायता मिलेगी, इसी विचार से इसका हिंदी अनुवाद भी श्रीश्रीजगदम्बा ( माँ सारदा देवी ) के चरणों में समर्पित है। जो असंख्य बालक-बालिकाओं के रूप में इसकी प्रतीक्षा कर रही हैं। 
9जून 2012.
प्रार्थना

ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्‍योतिर्गमय ।

 मृत्‍योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।

    - वृहदारन्यक उपनिषद 
रुद्रं यतते दक्षिणं मुखं ............
श्वेताश्वतर उपनिषद।
असत राह से मुझे सत राह पर लो,
ज्ञान आलोक से मन का अँधेरा हटाओ। ........ 

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