Wednesday, April 18, 2012

" चरित्र-निर्माण कैसे करें ? "

                                                      (१)

                            " निर्माण की नींव चट्टानी ही होनी चाहिए "
                                   (Build From The Bottom )
प्रत्येक युग में कोई न कोई विशिष्ट मतवाद या विचारधारा ऐसी होती है, जो सर्वजन-स्वीकृत तथा  सर्वाधिक लोकप्रिय बन जाती है; तथा उस नूतन विचारधारा के प्रति सभी समुदाय के लोगों में एक विशिष्ट प्रकार का उत्साह एवं उमंग भी दृष्टि-गोचर होने लगता है। वर्तमान युग का वह सर्वजन-स्वीकृत  और लोकप्रिय मतवाद है, नव-निर्माण या पुनर्निर्माण ! इन दिनों 'राष्ट्र-निर्माण ' या 'नए भारत का निर्माण ' के विषय में प्रत्येक माध्यम पर चर्चायें सुनी जा सकती हैं।
किसी भी समुदाय में कोई एक व्यक्ति भी ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता जो इस मत से सहमत न हो अथवा इस नव-निर्माण के विचार का विरोधी हो। किन्तु ,जैसा हर युग में सर्व-मान्य अथवा लोकप्रिय मत के साथ होता आया है, पुनर्निर्माण का वास्तविक अर्थ समझे बिना, हममें से प्रत्येक व्यक्ति इसको क्रियान्वित करने के लिये, अपना अलग-अलग विचार और प्रस्ताव देने लगता है। जिसके फलस्वरूप 'पुनर्निर्माण 'या राष्ट्र-निर्माण के प्रति आम-सहमति रहने पर भी उसके क्रियान्वयन की पद्धति एवं  अन्तिम प्रारूप को लेकर हमारे विचारों में गहरा मतभेद या विभिन्नता दिखाई देने लगती है।
राष्ट्र-निर्माण कैसे किया जा सकता है ? जबतक हमलोग इस मूल बिन्दु पर एकमत नहीं हो जाते, कि 

' निर्माण का प्रारम्भ चट्टानी नींव पर ही करना होगा' तब तक नव-निर्माण के लिए संचित यह सारा उत्साह अंततः सोडा-वाटर की गैस बनकर उड़ जाने के लिए बाध्य होगा। हम सभी लोग यह जानते हैं कि यदि किसी 'भव्य ईमारत' का निर्माण चट्टानी नींव पर न किया जाय, तो वह ईमारत शीघ्र ही टूट-फूट कर बिखर जायेगी।
अतः राष्ट्र का पुनर्निर्माण तब तक नहीं हो सकता जब तक नागरिकों का चरित्र-निर्माण नहीं हो जाता और भ्रष्टाचार (सदाचार के द्वारा ) समाप्त नहीं हो जाता। ईसामसीह ने भी कहा था "वी मस्ट हैव आवर फाउंडेशन ऑन  रॉक, नोट ओन सैंड'' (We Must Have Our Foundation On Rock, not on sand) -अर्थात हमारी नींव चट्टानी होनी चाहिए,बालू कि भित्ति पर महल नहीं खड़ा करना चाहिए। अतः यदि गौरवशाली राष्ट्र का निर्माण है तो उसकी चट्टानी नींव केवल देश के नागरिकों के वैयक्तिक (Individual) चरित्र-निर्माण से ही प्राप्त हो सकती है, जिनकी समष्टि से देश बनता है।
इसीलिए स्वामी विवेकानन्द ने भविष्य के गौरवशाली भारत का निर्माण-सूत्र दिया था -'Be  and Make' अर्थात " तुम स्वयं एक चरित्रवान मनुष्य बनो और दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करो।"
यही वह पद्धति है जिसके द्वारा हमारे देश का 'राष्ट्रीय - चरित्र ' (National-character) भी पुनर्निर्मित हो सकता है।क्योंकि चरित्र मनुष्य को दो बड़े गुणों से विभूषित कर देता है,पहला-उसको यह समझ में आ जाता है कि उसे स्वयं के साथ कैसा व्यव्हार करना चाहिए और दूसरा-यह कि उसे दूसरों के साथ कैसा व्यव्हार करना चाहिए। पहला गुण है पवित्रता (Purity) और दूसरा है नैतिकता या सदाचार (Morality) ।
चरित्रगठन हो जाने से मनुष्य को मनसा-वाचा-कर्मणा पवित्र रहने कि क्षमता स्वतः प्राप्त हो जाती है; तथा अन्य मनुष्यों के साथ उसका व्यवहार भी स्वतः नैतिकतापूर्ण हो जाता है। इसीलिए ,जब हमलोग नव-निर्माण या पुनर्निमाण के प्रति अति-उत्साह से भरकर कुछ भी कर डालने पर उद्दत होने लगें ,उस समय हमारे लिये स्वामी विवेकानन्द कि इस वाणी का स्मरण कर लेना बहुत उपयोगी होगा- 'सभी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाएँ (System) उससे जुड़े मनुष्यों के सदाचार और सच्चरित्रता के उपर ही निर्भर करती हैं। कोई भी राष्ट्र केवल इसलिए महान और अच्छा नहीं बन जाता कि उसके पार्लियामेंट ने यह या वह बिल पास कर दिया है,वरन इसलिए होता है कि उसके नागरिक महान और अच्छे हैं' । दुनिया के सभी महान आचार्यों (शिक्षकों या पथ-प्रदर्शकों ) ने ऐसा ही उपदेश दिया है। ईसा मसीह कहते हैं--'दैट द  बेसिस इज नॉट  लॉ, बट द मोरालिटी एंड प्यूरिटी आर द ओनली स्ट्रेंथ' -(....that the Basis is not Law, but the Morality and Purity are the only strength) -अर्थात किसी समाज के  नैतिकता  की बुनियाद नियम-अधिनियम में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की  नैतिकता और पवित्रता में ही उस समाज या देश समस्त शक्ति निहित होतीं हैं ।'
यदि राष्ट्र-निर्माण का दायित्व, (भारत माता को पुनः उसके गौरवशाली सिंघासन पर बैठाने का दायित्व) ऐसे भावी वकीलों,लिपिकों, प्रशासकों,डाक्टरों,इंजीनियरों ,शिक्षकों, श्रमिकों या राजनीतिज्ञों के उपर सौंप दिया जाय जिनमें ' सच्चरित्रता और सदाचार रूपी रीढ़ की हड्डी ' ही नदारत हो, तो भारत के पुनर्निमाण की समस्त बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ (मनरेगा, 2G आदि) भ्रष्टाचार के कारण विफल होने को बाध्य हैं। (क्योंकि जिस दिन कोई नया कानून पारित होता है, उसी दिन उसको चुनौती देने के लिये उसका कोई वैध या अवैध उपाय भी ढूँढ़ लिया जाता है, और बड़ा से बड़ा घोटाला करने वाला भी बिना कोई सजा पाए बच निकलता है।)

                 
    (२)      

" चरित्र हनन " के प्रयास को बन्द करना होगा. 
                                       (Stop character Assassination )
' चरित्र- हनन ' एक ऐसा हथियार है जिसका प्रयोग राजनीति के क्षेत्र में प्रायः तब किया जाता है, जब किसी व्यक्ति-विशेष को बदनाम करके उसे राजनीती के क्षेत्र से निकाल बाहर करने की योजना होती है। जब तक उस व्यक्ति से अपना उल्लू सीधा होता रहता है तबतक इस प्रकार के विध्वंसात्मक हथियार का प्रयोग नहीं किया जाता । किन्तु जब किसी व्यक्ति-विशेष से नहीं, बल्कि किसी शक्तिशाली और बहुत बड़े समुदाय से छुटकारा पाने की योजना बनानी हो तो,केवल एक ही उपाय शेष रह जाता है, और वह है- उस विशाल समुदाय को बदनाम करने के बजाय उस शक्तिशाली और विशाल समुदाय के चरित्र को ही भ्रष्ट कर दिया जाए।
 हो सकता है कि यह कोई पूर्व नियोजित षडयंत्र या सोची-समझी चाल न भी हो, किन्तु यह तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि भारत के एक विशाल और शक्तिशाली समुदाय के विरुद्ध इसी हथकण्डे को प्रयोग में लाया जा रहा है।और वह लक्षित समुदाय है भारत का विशाल और उर्जावान युवावर्ग।
वैसे यह घटना केवल भारत में ही घट रही हो, वैसी बात नहीं है। किन्तु भारत के परिप्रेक्ष्य में ऐसे हथकण्डों को देख कर अधिक चिंतित इसलिए होना पड़ता है कि इसने सदियों पूर्व बलात थोप दिए गए पिछड़ेपन के अभिशाप को दूर हटाकर विकास के पथ पर अभी-अभी तो चलना प्रारम्भ किया है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " सदियों की दासता के फलस्वरूप प्राप्त अपनी जड़ता को उखाड़ फेंकना होगा । हमारा राष्ट्रीय प्रासाद (राष्ट्रीय-चरित्र का निर्माण ) अभी अधुरा ही है, इसीलिए सभी कुछ भद्दा सा दिख पड़ रहा है। सदियों के अत्याचार के कारण हमें प्रासाद निर्माण कार्य (नागरिकों के चरित्र का निर्माण कर उन्हें "यथार्थ ब्राह्मण "में रूपांतरित करने का कार्य ) बीच में ही छोड़ देना पड़ा था। अब,वह निर्माण कार्य पूरा कर लीजिये बस,सब कुछ अपनी जगह पर सजा हुआ सुंदर दिखाई देगा। यही मेरी समस्त कार्य योजना है। "
हमारी मातृभूमि के विशाल एवं शक्तिशाली युवा वर्ग का 'सामूहिक चरित्र- हनन' करने के लिए विभिन्न हथकण्डों का प्रयोग करने में सक्रिय लोग इस कार्य (भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच-फिक्सिंग ,या IPL मैच आदि कार्य ) को, चाहे किसी षडयंत्र के रूप में कर रहे हों या अनजाने में ही - हमारे युवा-शक्ति के उपर इसका दुष्प्रभाव तो हर हाल में एक जैसा ही होगा। इसके दुष्परिणाम स्वरूप,जिन युवाओं के कन्धों पर भविष्य के गौरवशाली भारत के निर्माण का दायित्व आने वाला है उनकी तो रीढ़ ही टूट जायेगी।
युवा मन को विकृत करने वाले साहित्य का जो विशाल भण्डार आज बाजार में या इन्टरनेट पर उपलब्ध है वह तो " परमाणु आयुधों " के भण्डारण से भी अधिक खतरनाक है। परमाणु परीक्षण के दुष्परिणाम स्वरूप ,जहाँ भावी पीढियों का शारीरिक स्वास्थ्य खतरे में पड़ता है ,वहीं ये गन्दे साहित्य तथा अश्लील दृश्य देश के भविष्य के लिए उससे भी अधिक घातक हैं ।
फ़िर यह बात दावे के साथ कौन कह सकता है कि इस क्षेत्र में जो कुछ घटित हो रहा है वह मात्र धन अर्जित करने के उद्देश्य से ही हो रहा है? हमलोग आने वाली फिल्मों तथा टेलीविजन धारावाहिकों के विषय में भी बहुत कुछ जानना चाहते हैं, उसके विषय में चर्चा किया करते हैं, किन्तु हम यहाँ जिस चरित्र हनन के उपर चर्चा कर रहे हैं उसमें इनकी भूमिका भी बहुत कारगर हथियार वाली है।
'दर्द निवारक' दवाओं के नाम पर बेचीं जाने वाली नशे की सूइयाँ, ड्रग्स, हुक्का पब  कई प्रकार के मादक पदार्थ, एक्स्ट्रा कैश, पब संस्कृति, तथा कई अन्य इसी प्रकार के 'धीमी प्रभाव वाले जहर' को विभिन्न श्रोतों के माध्यम से युवाओं के बीच पहुँचाया जा रहा है। जुआ खेलने के लिए भी नई-नई मशीनें आविष्कृत हो रही हैं। दर्शन-शास्त्र का एक सिद्धांत है-''द पीचर सजेस्ट्स द इग्ज़िस्टेन्स ऑफ़ द मेकर ऑफ़ द पीचर' (The Pitcher Suggests The Existence Of The Maker of The Pitcher) अर्थात् "घड़े को देख कर यह अनुमान करना सहज है, कि उसको बनाने वाला भी कोई न कोई कुम्हार भी अवश्य होगा।"
 ठीक उसी प्रकार जब एक ही सामान्य उद्देश्य -युवाओं का 'सामूहिक चरित्र हनन' को सिद्ध करने वाले अस्त्रों की व्यूह रचना पर दृष्टि पड़ती है तो बाध्य होकर हमें यह विश्वास करना ही पड़ता है की इन तमाशों 

 ( 20-20 match एवं चीयर गर्ल्स ) के पीछे भी , कोई न कोई शातिर मदारी अवश्य ही छुपा हुआ है।
             (३)            


भारत के युवाओं के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सबसे पहले पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति की आंधी को सारी शक्ति लगाकर रोकना होगा, तथा मनुष्य को उसकी स्व-महिमा में पुनः प्रतिष्ठित करना होगा। इस प्राथमिक कार्य को किये बिना, केवल मनुष्य की आर्थिक अवस्था को उन्नत करने के लिए - चाहे जितने भी राजनीतिक दल क्यों न खड़े कर लिए जायें ,चाहे जितनी भी पंचवर्षीय योजनायें क्यों न बना ली जायें,गरीबी-उन्मूलन के नाम पर चाहे जितना भी विदेशी सहायता क्यों न ले ली जाय, इन सब से  कुछ भी लाभ न होगा; ये सारे के सारे प्रयास व्यर्थ ही सिद्ध होंगे!
विद्यार्थियों का एक बहुत बड़ा वर्ग भले ही -'साइंस और टेक्नोलौजी','मैनेजमेंट -आईटी प्रोफेसनल' या विज्ञान की अन्य किसी भी शाखा में कितना भी प्रशिक्षित क्यों न हो जाए, वह तब तक समृद्ध राष्ट्र-निर्माण के लिए सच्चे अर्थ में 'रचनात्मक-शक्ति' नहीं बन सकता,  जब तक कि वह चरित्र की शक्ति  से भी सम्पन्न न हो जाए।
  स्वामी विवेकानन्द ने चेतावनी देते हुए कहा था, ' यदि अध्यात्मिक शिक्षा (या चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा) का अनुसरण नहीं किया गया, तो तीन पीढ़ियों में ही हमारी जाति का विनाश हो जायेगा।'  क्योंकि चरित्र-निर्माण के प्रति पुरी तरह से उदासीन बने रहने के फलस्वरूप, केवल ऊँची-ऊँची डिग्रियों को प्राप्त करने के होड़ में,जो नकारात्मक गुण चरित्र में प्रविष्ट हो जाएँगे वे इस तथाकथित शिक्षा को बिल्कुल ही व्यर्थ बना देंगे। और जिन लोगों के पास इस सामूहिक 'चरित्र हनन' के प्रयास को विफल कर देने का सामर्थ्य है, उन में से कोई  इस चेतावनी पर ध्यान नहीं देंगे। क्यों की यह चेतावनी उनके कानों में पहली बार दस्तक दे रही हो, ऐसी बात नहीं है।
तो क्या अब इस सम्बन्ध में कुछ भी नहीं किया जा सकता है? हाँ,किया जा सकता है ! इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए अब केवल एक ही मार्ग शेष है, राष्ट्र-निर्माण की इस संधि-बेला में भारत के नागरिकों  को 'मोह-निद्रा' से जाग्रत करने के लिये अब हमलोगों को स्वयं उठ खड़े होना होगा। तथा उनकी कुम्भकरणी निद्रा को भंग करने के लिये गाँव-गाँव में घूमकर समस्त देशवासियों को स्वामी विवेकानन्द का आह्वान मंत्र-  "उत्तिष्ठत! जाग्रत!" सुनाना होगा। तथा जो पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति हमारे युवाओं का चरित्र -हनन करने के लिए, 'सुरसा' के सामान मुंह फैलाये दौड़ी चली आ रही है,उसका दृढ़तापूर्वक  सामना करने के लिए, युवाओं को ही उसके विरुद्ध एक राष्ट्र-व्यापी ' चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन ' खड़ा करना होगा।
हम अपने 'मन' को सद्विचारों का ' दैवीकवच ' पहनाकर, हाथों में ' देश-भक्ति 'की प्रज्वलित मशाल थामकर तथा देशवासिओं के लिए अपने " ह्रदय "  में  सागर सदृश अथाह प्रेम भरकर,पाश्चात्य सभ्यता के चरित्र-हननकारी समस्त घातक अस्त्रों को पूरी तरह से विफल कर सकते हैं। हमारे युवा भाई अपने " शरीर "( Hand ) को हृष्ट-पुष्ट  बनाने, " मन " ( Head ) को एकाग्र रखने, तथा हृदय (Heart ) को विशाल बनाने के लिये मनुष्य-निर्माणकारी प्रशिक्षण प्राप्त करके- स्वयं यथार्थ 'मनुष्य' बनकर इन दुष्टशक्तियों के समस्त प्रयासों को आसानी से कुण्ठित कर सकते हैं।तथा उनके ऊपर अपनी विजय का डंका बजा सकते हैं।
हमारे वैदिक ऋषिओं ने 'क्षात्र-वीर्य' और 'ब्रह्म-तेज' ( Dynamic Goodness of Manliness and All loving intelligence of saintliness ) अर्थात सदाचार की शक्ति को जीवन में प्रतिष्ठित करा देने वाली उर्जा से भरपूर 'पौरुष' के साथ-साथ सन्त-सुलभ सर्वजन प्रेमी बुद्धि से सम्पन्न युवा-शक्ति का निर्माण करने के उपर बहुत जोर दिया है। तथा इसी कार्य को सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानते हुए, 'मनुष्य-निर्माणकारी विद्या'  या ' परा -विद्या ' का हमारे शास्त्रों में सर्वत्र बहुत गुणगान किया गया है।
[मुण्डक उपनिषद के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है-अपरा विद्या और परा विद्या। हम इन्द्रिय-गोचर वस्तुओं के विषय में जो कुछ भी जानते हैं, वह अपरा विद्या है। जैसे -भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, अन्तरिक्ष विज्ञान, इतिहास-भूगोल, और वेदोक्त ज्योतिष शास्त्र, या वास्तु-शास्त्र आदि का ज्ञान भी अपरा विद्या के अन्तर्गत ही आता है। इन्द्रियातीत सत्ता 'आत्मा' का ज्ञान परा विद्या है। किन्तु दुर्भाग्यवश पाश्चात्य-प्रणाली की शिक्षा व्यवस्था में सर्वाधिक ज्ञान अपर विद्या का ही है। इसका अर्थ यह हुआ कि यद्दपि हमें सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान है, किन्तु यदि हमें अपनी आत्मा का ज्ञान नहीं है, तो हम आत्मज्ञान से वंचित है। आत्मज्ञान अर्थात परम सत्य ( परमात्मा)  का ज्ञान, जो कि देश-काल-कारण के अतीत है, परे है, उसे परा विद्या कहते हैं। प्राचीन काल में हमारे शिक्षा-संस्थानों में जिन्हें हम 'गुरुकुल' कहते थे, ये दोनों विद्यायें (परा-अपरा, भौतिक और अध्यात्मिक ) एक साथ शिष्य (विद्यर्थियों) को प्रदान की जाती थीं। किन्तु आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में केवल अपरा विद्या ही प्रदान करने की व्यवस्था है। परा-विद्या को जानने वाले शिक्षकों का निर्माण करने की कोई व्यवस्था नहीं  है, इसलिये परा विद्या को अलौकिक विद्या मान कर उसके प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था हमारे B.Ed, या  M.Ed.तक के शिक्षक-प्रशिक्षण कोर्स में नहीं रखा गया है। इसीलिये आधुनिक शिक्षण संस्थानों में परा विद्या को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है। सत्य का साक्षात्कार (या आत्मसाक्षात्कार) करने की पद्धति पातंजलि योग-सूत्र या अष्टांग-योग को सिखलाने वाले शिक्षकों का निर्माण किये बिना, कोई साधारण शिक्षक 'आत्मानुभूति' (Self-Realization) प्राप्त करने विद्या या मिथ्या अहं से परे जाने की विद्या (Self-Transcendence) की पद्धति किसी दूसरे व्यक्ति को सिखा ही नहीं सकता, इसीलिये प्रचलित शिक्षा-व्यवस्था में मनुष्य के यथार्थ स्वरुप को या उसकी दिव्यता (DIVINITY ) को अभिव्यक्त करने की पुर्णतः उपेक्षा की गयी है। यहाँ तक कि 'गुरु' शब्द का वास्तविक अर्थ भी भुला दिया गया है, और आजकल बड़े ही हल्के अर्थ में इसका प्रयोग किया जाता है। आजकल हमलोग इस शब्द का प्रयोग मैनेजमेन्ट-गुरु, कराटे-गुरु, संगीत-गुरु आदि के रूप में करते हैं, जो कि स्पष्ट रूप से 'Teacher' एवं 'गुरु 'को समानार्थक शब्द मान लेने का परिचायक है। जबकि गुरु एक संस्कृत शब्द है, जो 'गु' और 'रु' दो अक्षरों को मिलाने से बनता है। 'गु' शब्द का अर्थ है अन्धकार या अज्ञान और 'रु' अर्थात वह जो अन्धकार या अज्ञान को दूर कर देता है, नष्ट कर देता है। जो मनुष्य को अन्धाकर से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाय उसे मानव-जाति का 'नेता' या 'पथ-प्रदर्शक' कहा जा सकता है। गुरु वह व्यक्ति हैं, जो शिष्य के अज्ञान का नाश करके उसे उसके सच्चे स्वरुप का ज्ञान रूपी प्रकाश के द्वारा शिष्य को आत्मज्ञान प्रदान करे। श्रीरामकृष्ण देव कहा करते थे, ' प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में विद्यमान (विवेक के आनन्द - 'द्रष्टा-दृश्य विवेक, आत्म-अनात्म विवेक, सद-असद विवेक, श्रेय-प्रेय का विवेक' को प्रदान करने वाली आत्मा क्या है ? तुम स्वयं अनुभव कर के देखो ! हृदय को टटोल कर देखो- अर्थात अनात्म वस्तुओं (शरीर-मन-अहं) के द्रष्टा बन जाओ, तुम्हें आत्मा का ज्ञान हो जायेगा। केवल 'सच्चिदानन्द' परमात्मा ही गुरु हैं।' गुरु किसी मनुष्य को उसके सच्चे स्वरूप का ज्ञान कैसे प्रदान करते हैं ? जगत गुरु दो प्रकार से ज्ञान प्रदान करते हैं। प्रथमतः वे सूक्ष्म रूप में व्यक्ति को 'सर्वोच्च-सत्ता' या परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिये अन्तःप्रेरणा प्रदान करते हैं। द्वितीयतः जब धर्म की ग्लानी दूर करने के लिये उनको मानव-जाति का नेता या पथ-प्रदर्शक बन कर आविर्भूत होना अनिवार्य हो जाता है, तब वे स्वयं इस धरा पर अवतार लेते हैं। मानव-जाति के प्रमुख नेता या अवतार हैं- श्रीराम,श्रीकृष्ण, ईसा मसीह, बुद्ध, श्रीशंकराचार्य, मुहम्मद, महावीर, आदि और सद्द्यः अभिनव पथ-प्रदर्शक 'प्रथम युवा-नेता' है, श्रीरामकृष्ण ! इनका अवतार ही पाश्चात्य भोगवाद की आँधी से आधुनिक विश्व को बचाने के लिये वेद को पुनः प्रतिष्ठित करने का कार्य करने के लिये हुआ है। वेदों के सर्व-धर्म समन्वय के सिद्धान्त को विश्वपटल पर आधुनिक भाषा में रखने के लिये ही उनके साथ श्रीमाँ सारदा देवी और स्वामी विवेकानन्द जी भी आये हैं। ये अवतार ही मानवता के श्रेष्ठतम आचार्य और पथ-प्रदर्शक या नेता हैं। दूसरी श्रेणी के गुरुओं में हम पैगम्बर और अनुभूति-सम्पन्न आत्मज्ञानी महापुरुषों को पाते हैं, जिन्होंने साधना की और ईश्वर-दर्शन किया या परम सत्य का साक्षात्कार किया है। ये लोग गुरु-पद को प्राप्त होकर गुरु बने और लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किये; जैसे गुरु-नानक देवजी, संत-कबीर, मीराबाई, शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास आदि। इसके बाद शिक्षक हैं, जो भौतिक जगत से सम्बन्धित विषयों का ज्ञान, लौकिक ज्ञान प्रदान प्रदान करते हैं। जो लोग स्कूल या अन्य शिक्षा-संस्थानों में अध्यापन का कार्य करते हैं, उनका भी सम्मान करने के लिए हमलोग 5सितम्बर को प्रति-वर्ष शिक्षक-दिवश मनाते है। किन्तु जो आध्यात्मिक गुरु समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने में समर्थ होते हैं, जो सम्पूर्ण विश्व को परिवर्तित कर देते हैं, (श्रीशंकराचार्य, विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस आदि ) उनका सम्मान करने के लिये भारत में प्रतिवर्ष अषाढ़-पूर्णिमा के दिन को गुरु-पूजा के रूप में मनाया जाता है।  लेकिन हमारे जैसे साधारण लोक -शिक्षकों का राष्ट्र-निर्माण में क्या योगदान हो सकता है ? क्या साधारण युवा भी महामण्डल के प्रशिक्षण शिविर द्वारा चरित्रवान मनुष्य बनकर सामाजिक-क्रान्ति के अग्रदूत, मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षक या नेता, या समाज के पथ-प्रदर्शक बन सकते हैं? यदि बन सकते हैं, तो कैसे ? यही इस पुस्तिका का विवेच्य विषय है।]  

पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति के दुष्प्रभाव को रोकने के लिये, स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में महामण्डल के युवा प्रशिक्षण शिविर में प्रदान की जाने वाली 'नेतृत्व-प्रशिक्षण' या 'Leadership training' को प्राप्त करके भारत के युवा निश्चित रूप से 'चरित्र निर्माणकारी -सामाजिकक्रान्ति के अग्रदूत ' बन सकेंगे। एवं भविष्य के गौरवशाली भारत का निर्माण करने के लिये एक ऐसे समाज की स्थापना कर देंगे जहाँ के नागरिकों राष्ट्रीय-चरित्र में ' क्षात्रवीर्य ' और ' ब्रह्मतेज ' साथा-साथ एवं एक सामान आभा बिखेरेंगे।  इसी महान स्वप्न को अपने ह्रदय में संजोये हुए हमारे, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस आदि वीर शहीदों ने भारत-माता की बली वेदी पर अपनेप्राणों को न्योछावर कर दिया था।
 आज का युवा समुदाय अपनी चारित्रिक-शक्ति की संप्रभुता का दुन्दुभीनिनाद कर उन अमर शहीदों के स्वप्नों को साकार कर सकते हैं। भारत के युवाओं के समक्ष यही सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को स्वीकार कर, अपना चरित्र-गठन करके बहुत बड़ी शंख्या में सामाजिक-क्रान्ति के अग्रदूतों का निर्माण करना-सबसे कठिन  चुनौती है। क्योंकि चुनौती से प्राप्त होने वाले -'जय या पराजय' के उपर ही भारत का गौरवशाली भविष्य निर्भर करता है, तथा इस कार्य का सारा उत्तरदायित्व युवाओं के कन्धों पर ही है। अतः वे अपनी तथा अपनी प्यारी मातृभूमि को संकट में डालने का जोखिम उठा कर ही,इस चुनौती की उपेक्षा कर सकते हैं।

    
     (४)          


चरित्र-गठन एवं मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा को अनिवार्य बनाएँ ! 
                                    How To Form Character 
[ सारे संसार में मानसिक अशान्ति परिव्याप्त है। यूनेस्को (UNESCO) इस विषय में सर्वाधिक चिन्तित और उद्विग्न है। क्योंकि प्रचलित शिक्षा पद्धति में 'बनने' (Be)के बदले 'करने' (Do) की शिक्षा दी जा रही है, इसीलिये अधिकांश नयी पीढ़ी नशे का शिकार हो रही है, आत्महत्या कर रही है या ऐड्स जैसे हानिकारक संक्रामक बिमारियों के चपेट में आ रही है,या खाप पंचायत में honer killing हो रहा है। ]
आज पूरा विश्व ,विशेषकर हमारा देश जिन संकटों ( 2g Spectrum ..... आदि ) से गुजर रहा है,वे सब अंततोगत्वा उसी एक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं; जिसका नाम है-' चरित्र का अभाव '। यदि हमलोग केवल इसी एक संकट का सामना पूरे साहस और ईमानदारी के साथ करने की ठान लें, तो अन्य सारी समस्याएँ आसानी से हल हो जाएंगी। [यदि हम मानसिक शान्ति और विश्व-शान्ति चाहते हैं, तो हमें चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा को अपनाना ही पड़ेगा। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि 'पशु-मानव को देव-मानव में रूपान्तरित करना ' ही भारत का भाग्य है। किसी ने स्वामीजी से पूछा कि एक संन्यासी होकर उन्हें राष्ट्रीयता से उपर होना चाहिए। वे क्यों भारत और राष्ट्रभक्ति के बारे में इतनी बातें करते हैं ? स्वामीजी ने इसके प्रत्युत्तर में कहा कि उनके लिये सभी देश समान है, लेकिन विश्व को भौतिकवादी संस्कृति का ग्रास बनने से बचाने में भारत को एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। हमें महान भारतीय संस्कृति विरासत में मिली है, जिसे सम्पूर्ण विश्व को प्रदान करने की जिम्मेवारी को हम अपना जीवन-गठन और चरित्र-गठन करने के बाद ही निभा सकते हैं। इसलिये सम्पूर्ण जगत भारत के मोहनिद्रा से जाग उठने की प्रतीक्षा कर रहा है।
 वास्तव में स्वामी विवेकानन्द ने जितनी भी भविष्यवाणीयाँ की थी, वे सभी सच हुई हैं। किन्तु वे कोई भविष्यवक्ता या ज्योतिषी नहीं थे, बल्कि वे एक भविष्य-द्रष्टा ऋषि थेसन १८९७ ई०  में उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि विशेष परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी और अगले ५० वर्षों में भारत स्वतंत्र हो जायेगा। उस समय तक गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत में नहीं आये थे और किसी ने 'असहयोग आन्दोलन' के विषय में सोचा भी नहीं था। लेकिन
ठीक ५० वर्ष बाद सचमुच १९४७ ई ० में यह हुआ और हमलोगों ने स्वन्तंत्रता प्राप्त की। उनहोंने और भी बहुत सी भविष्यवाणीयाँ की थीं, जो बाद में सत्य हुईं। १८९३ ई०  में अमेरिका के हारवर्ड विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट के घर पर उनहोंने कहा था, अंग्रेजो के भारत छोड़ने के बाद सबसे अधिक खतरा चीन के द्वारा भारत पर आक्रमण करने का है। १९६२ ई०  में यह यह हुआ, चीन ने भारत पर आक्रमण किया। कार्ल मार्क्स ने स्वयं सोचा था कि पहला श्रमिक-आन्दोलन जर्मनी से होगा, क्योंकि वहाँ संगठित मजदूर थे। रूस में संगठित मजदूर नहीं थे। लेकिन स्वामीजी ने यह भविष्यवाणी भी की थी कि प्रथम श्रमिक मजदूर-आन्दोलन रूस या चीन से आरम्भ होगा। यह भविष्यवाणी भी सत्य सिद्ध हुई। १८९७ ई०  में मद्रास व्याख्यान में स्वामीजी ने कहा था कि " भारत अपनी आध्यात्मिकता के द्वारा सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करेगा। " यह भविष्यवाणी पूर्ण होना अभी शेष है।
जब तक हम एक विकसित राष्ट्र नहीं हो जाते, तब तक हम कैसे उनके 'गुरु' हो सकते हैं ? इसीलिये सभी बाधाओं का अतिक्रमण करके राष्ट्र-निर्माण की परम आवश्यकता है। पूर्व राष्ट्रपति डा .  ऐ . पी . जे . अब्दुल कलाम जी अपनी पुस्तक " India 2020 : A Vision of the New Millennium " में लिखते हैं, " यदि आप शिक्षक हैं, तो राष्ट्र-निर्माण में आपकी विशेष भूमिका है। क्योंकि बच्चों के चरित्र-निर्माण में अन्य किसी की अपेक्षा आपका योगदान सबसे अधिक है। " यदि हम देश को बचना चाहते हैं, तो हमें अवश्य ही अपने देश के लोगों के चरित्र का विकास करना होगा। अन्यथा देश उन्नति नहीं कर सकता। किसी राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा भी, इसकी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने पर ही निर्भर करती है। इसीलिये CBSE के पाठ्यक्रम में सभी विरोधो के बावजूद संस्कृत विषय को ऐच्छिक विषय के रूप में अवश्य जारी रखना चाहिये,  क्योंकि राजा-कवि भर्तृहरी, महाकवि कालीदास आदि द्वारा संस्कृत भाषा में लिखे चरित्र-निर्माणकारी सूत्र (नीतिशतकम , वैराज्ञ शतकम आदि काव्य) ही भारतीय संस्कृति के मूल आधार हैं।]
 यद्दपि हमलोग अन्य सभी प्रकार की संकटों (घोटाला या FDI आदि ) के ऊपर अक्सर चर्चा करते रहते हैं तथा उन्हें हल करने का प्रयास भी करते हैं ,किंतु 'चरित्र का अभाव' या 'चरित्र -हीनता ' की समस्या को हल करने के लिए न तो कोई प्रयास करते हैं, न इसके ऊपर कभी गम्भीरता पुर्वक विचार-गोष्ठी ही करते हैं। जब की यही सबसे बड़ी और ज्वलंत समस्या है। सभी प्रबुद्ध नागरिकों को इसका हल ढूंढने के लिए निष्ठां पूर्वक पर्याप्त समय देना चाहिए तथा इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए निष्कपट होकर उद्दम भी करना चाहिए।प्रश्न होगा कि, जब ' चरित्र निर्माणकारी शिक्षा ' इतना अनिवार्य है तो अबतक इसे उपेक्षित क्यों रखा गया है? इसके कई कारणों में से पहला महत्वपूर्ण कारण यही है कि अधिकांश लोगों के मन में 'चरित्र' के विषय में कोई स्पष्ट अवधारणा ही नहीं है,तथा वे इसे कोई जन्मजात वस्तु मानते हैं। विशेषकर हमारे देश के कुछ बुद्दिजीवी तो ऐसी धारणा बना चुके हैं कि इतने विशाल जनसँख्या वाले देश के मनुष्यों का चरित्र परिवर्तित कर पाना तो बिल्कुल ही असंभव है।तथा अब इस समस्या को सुलझाने के लिए अधिक कुछ भी नहीं किया जा सकता है। उनकी यह धारणा बिल्कुल ग़लत है,तथा ऐसी अवधारणाएं चरित्र-निर्माण कि दिशा में आगे बढ़ने के उत्साह को ठंढा कर देती हैं।
अपनी इस पुवाग्रह को संशोधित करते हुए ,पहले हमें निश्चित तौर पर यह समझ लेना होगा कि जबतक हम 'व्यष्टि'(व्यक्तिगत रूप से एक-एक व्यक्ति के) चरित्र में परिवर्तन लाने के लिए कोई प्रयास नहीं करते-जिनकी 'समष्टि' से समाज बनता है; तब तक इस समाज को बेहतर बनाने का कोई भी प्रयास अंततः विफल होने को बाद्ध्य है।आइये पहले हम इसी बात पर विचार करें कि ,क्या सचमुच 'चरित्र' कोई (vague) अस्पष्ट या न समझ में आने वाली वस्तु है? यह सच है कि हम किसी मनुष्य को उपर से देख  यह नहीं बता सकते उसका चरित्र, उसके शरीर के किस स्थान विशेष में अवस्थित है?  किंतु हमारे विचारों,वचनों या व्यवहार की हलकी सी अभिव्यक्ति भी हमारे चरित्र की कलई को दूसरों के सामने खोल कर रख देती है। हमारी प्रत्येक भाव-भंगिमा,बोलने का ढंग तथा व्यव्हार को देखकर ही लोग बड़ी आसानी से हमारे चरित्र के विषय में जान लेते हैं।कहा गया है-
                               'दूरतः शोभते मूर्खो लम्बवत शटाक -वृत्ता ।
                                तावत शोभते मूर्खो यावत् किंचित न भाषते।। '

अर्थात किसी सभा में सज-धज कर बैठा मूर्ख भी दूर से देखने पर बहुत सुंदर दिखाई देते हैं । किंतु वह तभी तक सुंदर दीखते हैं जबतक कुछ बोलने के लिए वे अपना मुख नहीं खोलते,जैसे ही किसी विषय पर राय जाहिर करने के लिए अपना मुख खोलते हैं,उनकी मूर्खता पकड़ी जाती है।क्योंकि इस प्रकार की कोई भी,वाचिक या व्यवहारिक अभिव्यक्ति हमारे आंतरिक व्यक्तित्व की कलई खोल ही देती है। हमारे बोलने,विचारने या आचरण से हमारे यथार्थ व्यक्तित्व का भंडाफोड़ तो हो ही जाता है। " चरित्र " ही हमारा समग्र " व्यक्तित्व " है।
             (५)
'चरित्र गठन में विवेक-सम्मत इच्छाओं के चयन का महत्व '                  
चरित्र के विषय में वैज्ञानिक पद्धति से परिक्षण-निरीक्षण करने के बाद ,स्वामी विवेकानन्द उसे परिभाषित करते हुए कहते हैं- " Character is an agglomeration of our propensities, It is but the bundle of our habits "-अर्थात " चरित्र हमारी मानसिक-प्रवृत्तियों (रुझानों) की समष्टि है,यह हमारी आदतों का समूह मात्र है। " या दुसरे शब्दों में कहें तो-"यह हमारे द्वारा पुनः पुनः दुहराए जाने वाले अभ्यासों की समष्टि मात्र है।" साधारणतया हम सभी लोग अपनी-अपनी आदतों (प्रवृत्तियों या रुझानों) के अनुरूप ही चिंतन करते हैं,बोल बोलतेहैं तथा व्यवहार करते हैं।एक ही काम को बार-बार दुहराते रहने से ,हमें उसकी आदत पड़ जाती है। वे आदतें जब पुरानी पड़ जाती हैं तो हमें उसकी लत लग जाती है या हमारी प्रवृत्ति बन जाती है।  अर्थात हमारी वे आदतें,जिन्हें पुनः पुनःअभ्यास करके हमने स्वयं ही अपने जीवन का अंग बना लिया था,अब उन्हीं से प्रेरित होकर किसी खास ढंग से चिंतन करने,बोल बोलने या व्यव्हार करने को बाध्य हो जाते हैं।इस प्रकार हम यह स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं कि चरित्र कोई जन्मजात वस्तु नहीं है, हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपनी मानसिक प्रवृत्तियों या आदतों को परिवर्तित कर सकता है,अर्थात अपने चरित्र को रूपान्तरित कर सकता है। आदतों का निर्माण एक दिन में ही नहीं होता, एक ही काम (चिंतन औरबोल-चाल)एक ही ढंग से प्रतिदिन बार-बार दुहराते रहने से हमें उसकी लत लग जाती है और वे हमारी आदतों में परिणत हो जाती हैं।
 हमलोग कोई भी कर्म बिना विचारे यूँ ही नहीं करते हैं ; बहुत सोंच-विचार करने के बाद ही हम किसी इच्छा का चयन करते हैं;फ़िर उस तीब्र इच्छा को पूरा करने के लिए कर्म करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि हमारा कोई भी कर्म या आचरण हमारे ही विचारों के द्वारा निर्देशित होते हैं। अपने पुराने अनुभवों का बार-बार स्मरण-मनन करते रहने से मन में उसीका स्वाद एक बार और चखने कि तीब्र इच्छा मन में उदित हो जाती है,तथा हमारी इच्छाएँ ही हमारे समस्त कार्यों कि नियामक होती हैं। 
अतः हमलोग यदि सचमुच अपना चरित्र सुंदर बनाना चाहते हों, तो हमें अपनी इच्छाओं के चयन के प्रति अत्यन्त सतर्क हो जाना चाहिए,तथा अपने मन में केवल सदिच्छाओं को ही रहने देना चाहिए। क्यों कि यह इच्छा ही हमारी विचार-शक्ति को निर्देशित करेगी एवं उसी से प्रेरित होकर हम कोई भी कार्य करने को बाध्य हो जाएंगे तथा उन्ही कार्यों को बार-बार दुहराते रहने से हमें उसकी आदत हो जायेगी।
वही आदतें जब थोडी परिपक्व हो जाती हैं तो वे आदतें हमारी मानसिक प्रवृत्तियों या रुझान में परिणतहो जाती हैं। इसीलिए यदि हमारे मन में सदैव सदिच्छाएं ही उदित होती रहें तो हम सद्कर्म ही करते रहेंगे,हमारी मानसिक प्रवृत्ति सुंदर रहेगी और उन्ही मानसिक प्रवृत्तियों कि समष्टि से हमारा सुंदर चरित्रनिर्मित हो जायगा। एक प्रचलित कहावत है- " जैसा बीज बोओगे, वैसा फसल काटोगे।" सद-विचारों का बीजारोपण करके सद-कर्मों की फसल काटो, सद-कर्मों का बीज बो कर अच्छी-आदतों की फसल काटो, अच्छी आदतों के बीज से सद-प्रवृत्तियों  की फसल काटो, और सद-प्रवृत्ति की बीज बो कर सच्चरित्रता  की फसल काटो।
इस प्रकार हम यह समझ सकते हैं कि हमारा ' भाग्य ' ( या भविष्य ) भी, हमारे ही अच्छे या बुरे चरित्र पर निर्भर करता है। और हमारा ' चरित्र '  सत-असत इच्छाओं में से सदिच्छाओं को ही चयन करके मन में धारण किए रहने के संकल्प पर अटल रहने की  क्षमता पर निर्भर करता है। इसप्रकार हम कह सकते हैं कि हमारे चरित्र-निर्माण में इच्छाओं का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है .किंतु इसके लिए दृढ़-संकल्प  का रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि, जब तक हम अपने ' विवेकसम्मत-इच्छाओं ' से अनुप्रेरित हो कर कर्म नही करेंगे तबतक हम सद्कर्म नहीं कर पाएंगे और सद्चरित्र का गठन भी न हो सकेगा। ' इसीलिए हमें 'श्रेय-प्रेय विवेक (good and pleasant), आत्म -अनात्म विवेक, द्रष्टा-दृश्य विवेक, सत्य-मिथ्या विवेक'  में से केवल श्रेय इच्छाओं को ही पूर्ण करने के दृढ़ निश्चयपर निरंतर अटल रहना चाहिए,वरना हमारे कदम लड़खड़ा जायेंगे और हम ठोकर खाकर गिर पड़ेंगे। 

भर्तृहरि जी अपनी प्रसिद्द पुस्तक 'नीतिशतकम' में कहते हैं :
                             एते सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज ये
                              सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये |
                              तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये
                               ये तु घ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ||


समाज में चार प्रकार के मनुष्य देखे जा सकते हैं। प्रथम श्रेणी में वैसे सत्पुरुष लोग हैं, जो अपने स्वार्थ की बात सोचे बिना, निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करते हैं। द्वितीय श्रेणी में साधारण मनुष्य आते हैं, जो पहले अपना कल्याण देखते हैं, फिर दूसरों का कल्याण करते हैं। तीसरी श्रेणी में मानव-राक्षस आते हैं, ये मनुष्य की तरह ही दिखते हैं, किन्तु अपने स्वार्थ को पूर्ण करने के लिये दूसरों की क्षति करने में थोडा भी नहीं संकोच नहीं करते। वे जो कुछ भी करते हैं, केवल अपने स्वार्थ के लिये ही करते हैं। अपने समाज में ऐसे मानव-राक्षस या पशु-मानव भरी संख्या में उपलब्ध हैं। उदहारण के लिये किसी बाँध, पुल या किसी मकान के निर्माण में संलग्न नेता, इंजीनियर, ठीकेदार मिलकर सीमेन्ट में बालू का अनुपात बढ़ा देते हैं, इससे इनलोगों की स्वार्थ पूर्ति तो हो जाती है, किन्तु राष्ट्र खोखला हो जाता है। उसके बाद चतुर्थ श्रेणी के लोग आते हैं, जो अपना कोई लाभ नहीं होने से भी अकारण ही दूसरों को हांनी पहुंचाते हैं। भर्तृहरी कहते हैं, ऐसे मनुष्यों को किस नाम से पुकारा जाय, या उनकी संज्ञा क्या होनी चाहिये यह मैं नहीं बता सकता। आजकल मनुष्यों की पाँचवी प्रजाति भी तैयार हो रही है, जिनको तालीबान या आतंकवादी के नाम से हम जानते हैं। ये लोग अपने को विस्फोट से उड़ाकर भी सैंकड़ों निर्दोष मनुष्यों की हत्या कर देते हैं। वर्तमान युग में तीसरी,चौथी और पाँचवी श्रेणी के लोगों की बहुतायत है। दूसरी श्रेणी के मनुष्यों की संख्या भी बहुत कम ही हैं, प्रथम श्रेणी के मनुष्य तो विरले ही देखे जा सकते हैं। इसीलिये स्वामीजी की मनुष्य-निर्माणकारी और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार होना सबसे ज्यादा आवश्यक कार्य है।
इसीलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-'Upon ages of struggle a Character is built'. -अर्थात ' युगों-युगों तक संघर्ष करने के बाद ही एक चरित्र का निर्माण होता है '। अतः सत्चरित्र का निर्माण करनेके लिए अपने मन के साथ हमारा संघर्ष निरंतर चलते रहना चाहिए ,क्षण भर कि लापरवाही भी चरित्र-निर्माण कि प्रक्रिया को ध्वस्त कर सकती है। '
                                     (६) आत्म-सुझाव का सिद्धान्त  !
सद्ग्रंथों में तो ढेरो अच्छे विचार और प्रेरक प्रसंग भरे पड़े हैं, किंतु इन सद-विचारों को अपने मन की गहरी परतों में (अवचेतन मन में ) कैसे बिठाया जाय ? उन सद्विचारों को अपने भीतर स्थाई रूप से कैसे धारण करें, कि वे हमारी स्वाभाविक ' इच्छाशक्ति ' बनकर हमें निरंतर सद्चिन्तन तथा सद्कर्म करने के लिए ही अनुप्रेरित करते रहें ? सचमुच इस प्रश्न के उत्तर को जान लेना अत्यन्त अनिवार्य है । क्योंकि सद्विचारों की केवल पुस्तकीय जानकारी रखना ही पर्याप्त नहीं है, चरित्र-गठन या जीवन-गठन में इससे कोई विशेष लाभ तब तक नहीं मिलेगा जब तक हम उन्हें आत्मसात नहीं कर लेते। हमें तो उन सदभावों को अपने अवचेतन मन में या " मन कि गहरी परतों " में बिठाना होगा,या अंतःस्थापित कर लेना होगा। इस तकनीक को समझने के लिए पहले, हमें ' स्वयं ' के विषय में थोड़ा और अधिक ज्ञान अर्जित करना होगा। मनोविज्ञान के अनुसार कोई भी सद्भावना या सद् इच्छा हमारे मन कि गहरी परतों में तभी बैठ पाती है;  जब वह मन कि ' वाह्यतम परत ' को लाँघ कर,उसके पीछे गहराई में अवस्थित ' अवचेतन मन ' (Subconscious Mind) या ' चित्त ' में प्रविष्ट हो जाती है। हम सबों के भीतर जो अनन्त शक्ति (आत्मा) विद्यमान है, उसका ' प्रवेश-द्वार ' भी यह ' अवचेतन- मन ' ही है। कोई ईच्छा जब हमारे मन के बाह्य परतों को लाँघ कर ' अवचेतन- मन ' या चित्त में सचमुच प्रविष्ट हो जाती है ,केवल तभी वह हमारी विचार- शक्ति को दक्षता के साथ निर्देशित कर सकती है। इस प्रकार अवचेतन मन में गहराई तक बैठी इच्छा ही अदम्य ' इच्छा-शक्ति ' ही दृढ़-संकल्प में परिणत हो कर हमे केवल ' सद्-कर्म ' ही करने को बाध्य कर देती है, और हम उसे पहले अपनी ' आदत ' फ़िर ' प्रवृत्ति ' में ढाल कर ' सद् चरित्र ' के स्वामी बन जाते हैं।
इसीलिए सर्वप्रथम हमें औचित्य-बोध या विवेक कि सहायता से ' सद् इच्छाओं ' का चयन कर लेना होगा। उसके बाद स्वयं को ही यह सुझाव या परामर्श बार-बार देना होगा, कि वास्तव में हम चाहते क्या हैं,या हमारी वह कौन सी ' अदम्य -इच्छा ' है जिसे हम हर हाल में पूर्ण करना चाहते हैं ?
हमें स्वयं को ही परामर्श देते हुए इस प्रकार कहना होगा- " मै एक चरित्रवान मनुष्य बनना चाहताहूँ ! " इसके लिए मै अमुक-अमुक सदगुणों को अर्जित (आत्मसात) कर लेना चाहता हूँ।मैं एक आत्मविश्वासी मनुष्य बनना चाहता हूँ, मैं एक ईमानदार मनुष्य बनना चाहता हूँ, मै एक निर्भीक मनुष्य बनना चाहताहूँ, मैं एक निःस्वार्थी मनुष्य बनना चाहता हूँ.... .आदि,आदि। " इस तकनीक को ही मनोविज्ञान कि भाषा में   -" Auto-Suggestion "-(psychology - a process by which a person acts according to suggestions made form within herself or himself, eg. during HYPNOSIS) या आत्म- सुझाव  या  सम्मोहन (Hypnosis )   भी कहा जाता है। विवेक-विचार या औचित्य-बोध की  सहायता से चयनित सर्वोत्कृष्ट सदिच्छाओं को मन की गहरी परतों में बिठा लेने का यही एकमात्र उपाय है। विवेक-सम्मत ऐसी-ऐसी केवल सद् इच्छाएं ही जब ,मन की गहरी परतों में प्रविष्ट हो जाएँगी तो हमारे विचार,वाणी और कर्म उन्ही के द्वारा निर्देशित होने लगेंगे,और हमारा चरित्र -' सद्चरित्र ' में रूपांतरित होजाएगा।
                                 (७)असत-प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने का उपाय
जब हम अपने ' अवचेतन- मन '(Subconscious Mind) में स्थित विवेक सम्मत किसी ' अदम्य ' सद् ईच्छा द्वारा प्रेरित होकर कोई कर्म करते हैं, तो वह कर्म हमारे मन के ऊपर एक हल्की सी लकीर डाल देती है। फ़िर उन्हीं सद्कर्मों को बार-बार दुहराते रहने से,मन पर पड़ी वह लकीर क्रमशः अधिकाधिक और चौड़ी तथा गहरी होकर बिल्कुल स्पष्ट ' लीक ' बन जाती है।
अब जब कभी हम कोई ऐसा नया सद्कर्म करते हैं जो मन में गुंथे उस गहरे-चौड़े स्पष्ट ' लीक ' या छाप के सदृश ही हो, तो उस से बनने वाली यह नई लकीर पहले से विद्यमान उसी गहरे-चौड़े स्पष्ट लीक में स्वतः ही प्रविष्ट  जाती है। हमारे अवचेतन मन में दृढ़ता से जमी विवेक सम्मत सदिच्छाएं इसी प्रकार हमें सदैव सद्कर्म ही करने के लिए अनुप्रेरित करती रहतीं हैं,अच्छी आदतें क्रमशः अधिकाधिक दृढ़तर होती हुई ' सत्-प्रवृत्तियों ' का निर्माण करतीं हैं और हम एक ' सत् -चरित्रवान ' मनुष्य में रूपान्तरित हो जाते हैं।
 (क्योंकि अब मैं श्रेय-प्रेय का औचित्य-बोध रखता हूँ, और विवेक-प्रयोग (आत्म-अनात्म विवेक या द्रष्टा-दृश्य विवेक, किये बिना - कोई भी कार्य ऐसा नहीं करना चाहता जिससे मुझमें कोई बुरी लत लग जाय।  और प्रेयेय (इन्द्रिय विषयों को भोगने) के लालच को बहुत कम कर चुका हूँ, विषयों को विष के समान समझ लेने के बाद अब मैं उन भोगों में थोड़ी भी रूचि नहीं रखता।) किन्तु अब यह प्रश्न उठ सकता है कि सत्- चरित्र का निर्माण करने के उद्देश्य से, मैंने  ( Auto-Suggestion ) या ' स्वपरामर्श-पद्धति ' - का नियमित अनुपालन करके अपने अवचेतन- मन में विवेक सम्मत सद् इच्छाओं को ही धारण किये रहने का दृढ-संकल्प अवश्य कर लिया है; किन्तु अवचेतन मन में पहले से विद्यमान ' असत-इच्छाओं ' द्वारा बने उन पुरानी लीकों से कैसे छुटकारा पाया जाय ?
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अब तुम ' दृढ़ निश्चय तथा विवेक ' कि सहायता से अवचेतन मन में सद्प्रवृत्तियों की ' लीक या लकीर ' को और अधिक गहरा-चौड़ा तथा सुस्पष्ट लीक में बदलने का प्रयास करते रहो ,ऐसा करने से पुरानी असत प्रवृत्तियों से निर्मित लीकें क्रमशः नीचे दबती जाएँगी तथा सदिच्छाओं द्वारा निर्देशित होकर तुमने जो नई और सुस्पष्ट लीक निर्मित किया है, वे उनका स्थान ले लेंगी।
यही 'चरित्र निर्माण कि प्रक्रिया' है, जिसको अपना कर हम अपने पुराने असत-प्रवृत्तियों,बुरी आदतों तथाअपवित्र मानसिक रुझानों को क्रमशः समाप्त करते हुए अपने वाँछित चरित्र का निर्माण करने के पथ पर अग्रसर हो जाते हैं। अपनी दुर्बलताओं को जीत लेने वाला मनुष्य ही सच्चा वीर है। सच्चा वीर वही है जो अपने मन को वशीभूत करके, दृढ़ निश्चय और लगन के बल पर एक ओजस्वी चरित्र का निर्माण कर लेता है। जो वीर है वह ' Static-Goodness ' या तथा कथित ' अकर्मण्य-सदाचार ' से युक्त ' मिटटी-का-माधव ' बन कर कभी संतुष्ट नहीं रह सकता ,बल्कि वह अपने परिवेश को बदलने के साथ-साथ दूसरों को भी सत्चरित्र का निर्माण करने में ' Dynamic Goodness ' या ' सक्रिय सदाचार ' के साथ सहयोग करता रहता है। निःसंदेह यह कार्य अत्यन्त दुःसाध्य है ,किंतु ऐसे ही साहसिक कार्यों के चुनौती को स्वीकार करने वाले को ही 'साधू- युवा ' या सच्चा युवा कहा जाता है। जब इसी साहसिक कार्य को करने के  दायित्व को तुम अपने कन्धों पर उठा लोगे, तब इस चुनौती का सामना तुम अपनी जिस प्रतिभा और कार्य-कुशलता के साथ करोगे -उसी के आधार पर यह निर्णय हो पायेगा कि,आज देश में जो विषाद के दुर्दमनीय काले बादल छाये हुए हैं -वे कितनी जल्दी विलुप्त हो जायेंगे ?
                                     (८)चरित्र निर्माण में पुरुषार्थ की भूमिका
                                      ( Self Effort For character Building )
" पुरुषार्थ " - अर्थात आत्म -प्रयास ही चरित्र निर्माण का- एकमात्र साधन है ! जो कोई भी व्यक्ति अपने चरित्र का निर्माण करने में रूचि रखता है,उसे इसके लिए कठोर परिश्रम भी करना पड़ता है,इसका अन्य कोई मार्ग नहीं है। तुम यदि कुछ प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हे उसका मूल्य भी चुकाना पड़ेगा। तुम यदि अपना चरित्र सुंदर रूप में गठित करना चाहते हो तो,तुम्हे निरंतर पुरुषार्थ या स्वप्रयत्न के रूप में इसका मूल्य भी चुकाना होगा।
क्योंकि चरित्र-गठन मुख्यतः शिक्षा का विषय है और जीवन के साथ जुड़ी हुई है। जबतक जीवन चलता रहता है,शिक्षा भी चलती रहती है-अर्थात शिक्षा और जीवन साथ-साथ चलते रहते हैं। मानव-स्वभाव में विद्यमान किसी एक ही विशेषता या गुण को चरित्र नहीं कहा जा सकता है। यह तो कई सारे गुणों का जटिल संकलन है।
दूसरे शब्दों में कहें तो चरित्र कोई (Element) या अमिश्रित विशुद्ध मूलतत्व  नहीं है,बल्कि यह कई सारे प्राथमिक गुणों का एक (Compound) या यौगिक मिश्रण है। हमारे जीवन में सुंदर चरित्र की जो व्यावहारिक उपयोगिता है उसे दृष्टि में रखा जाय तो इसके प्रत्येक गुण को अपने पुरुषार्थ से संवर्धित करना अत्यन्त आवश्यक है। चरित्र-गठन समाज से भाग कर जंगल चले जाने या एकान्त में मौन हो कर बैठे रहने से नहीं होता, बल्कि चरित्र के सभी गुणों को संवर्धित करतेहुए उन्हें अपने आचरण में उतार लेने से हमारा चरित्र निर्मित हो जाता है।  हम लोग समाज के बीच में रहते हुए अन्य मनुष्यों या परिवार के सदस्यों के साथ जिस प्रकार के विशिष्ठ सद्व्यवहार का अथवा दुर्व्यवहार का परिचय देते हैं, उससे ही लोगों के समक्ष हमारा सम्पूर्ण चरित्र उजागर हो जाता है। हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मुख्य घटक हमारा चरित्र ही है। यदि तुम एक व्यव्हार-कुशल मनुष्य बनना चाहते हो; तो तुम्हे एक अच्छे चरित्र का स्वामी भी अवश्य बनना होगा। समाज के प्रति तुम्हारा व्यव्हार जैसा होगा उसी से तुम्हारा भाग्य भी निर्धारित होगा। समाज के साथ तुम्हारा व्यव्हार जितनी उत्तम कोटि का होगा उतनी ही उन्नति तुम्हारे जीवन की भी होगी। इसी लिए तुम्हे अपने फायेदे के लिए ही अपने लोक-व्यव्हार के स्तर को ऊँचा बनाये रखने के लिए सदैव सतर्क रहना चाहिए। और अपने आचरण के स्तर को फ़िर से ऊंचाई तक उठा लेने को ही चरित्र-निर्माण कहा जाता है।
सच्चा-चरित्र मानव स्वभाव के - ' तात्विक-अंश ' (आत्मा या ह्रदय) को भी स्पर्श करता है। इसीलिए  केवल एक- ' दिखावटी-शिष्टाचार ' सीख लेने को ही 'चरित्र-गठन' समझने की भूल नही करनी चाहिए। किसी फुटपाथ पर तीन सौ पैसों में बिकने वाली पुस्तकों- यथा ' ड्राइंग रूम में लोकप्रिय होने के सुहावने नुस्खे ' सभी अवसर के लिए ' शिष्टाचार के गुर ';  जैसी पुस्कों में वर्णित केवल ' वाह्य सभ्याचार ' को ही वास्तविक चरित्र समझने की भूल नहीं करनीचाहिए। तुम्हें अपने अन्तरमन या अवचेतन मन में परिवर्तन लाना है, इसीलिये ये सारे दिखावटी दाँव-पेंच तुम्हारे वास्तविक स्वभाव की पुनर्रचना नहीं कर सकते। कुछ पुस्तकों (जैसे How to ween friends and influence people आदि ) में वर्णित शिष्टाचार या सभ्याचार के ' दिखावटी गुर ' सीख लेने से ही जीवन-संग्राम के किसी भी क्षेत्र में सम्पूर्ण विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। अतः इस प्रकार के नकली नुस्खों में वर्णित दाँव-पेंच को ही चरित्र के वास्तविक गुण समझ कर अपने आचरण में उतारने से बचना चाहिए। किसी मनुष्य का सच्चा-चरित्र,  उसे उसके दैनन्दिन जीवन में भी सर्वोच्च नैतिकता पालन करने में समर्थ बना देता है।
ऐसे ही मनुष्य को चरित्रवान मनुष्य कहा जाता है तथा ऐसे ही चरित्र-संपन्न मनुष्यों से गठित समाज को अच्छा समाज कहा जाता है। उन मनुष्यों को 'चरित्रवान मनुष्य' की संज्ञा नहीं दी जा सकती जो केवल दूसरों को दिखाने के लिए स्वयं को सदाचारी या शिष्ट साबित करने का ढोंग करते हों। सच्चा चरित्रवान मनुष्य उसे कहते हैं जिसने सचमुच ही चरित्र के सदगुणों को अपने व्यक्तित्व में समाहित कर लिया है। चरित्र के गुणों को अवसर-विशेष के अनुरूप प्रदर्शन की वस्तु नहीं समझना चाहिए। क्योंकि जब सदगुणों को चरित्रगत कर लिया जाता है तो वे व्यक्तित्व की स्थायी संपत्ति बन कर सदैव उसमे विद्यमान रहते हैं। अब प्रश्न होगा की चरित्र के वे गुण कौन-कौन से हैं,  जिन्हें अपने भीतर विकसित और संवर्धित करने के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए?
वे गुण हैं-आत्म-श्रद्धा,आत्म-विश्वास,आत्म-निर्भरता, आत्म-संयम, साधारण-बुद्धि, मन-वचन-कर्म में पवित्रता, धैर्य,सहनशीलता, अध्यवसाय, दृढ़संकल्प, स्वयं तथा अन्य के प्रति ईमानदारी , विवेक-प्रयोग तथा उद्देश्य के प्रति निष्ठा, भद्रता, सहानुभूति,त्याग करने की शक्ति, सेवापरायणता,नैतिक और शारीरिक साहस,सत्यनिष्ठा आदि ,जिन्हें हमें जीवन में धारण कर लेना चाहिए। अब प्रश्न होगा कि इन गुणों को आत्मसात या स्वभावगत कैसे करें? ये सभी गुण अन्तरमन या मन की गहरी परतों में धारण किए जाने वाले गुण हैं, अतैव मन के ऊपर सदैव सतर्क दृष्टि बनाय रखो। जब कभी तुम्हे अभद्र ढंग से बोलने,विचार करने या व्यव्हार करने को बाध्य होना पड़े ,उस समय भी शांत रह कर यह देखने कि चेष्टा करो कि इस वक्त तुम्हारे मन में जो गुण प्रबल हो रहे हैं, वे सत् हैं याअसत् ? फ़िर दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रयोग करते हुए केवल सत् गुणों को ही यह अनुमति दो कि वे ही तुम्हारेविचार,वाणी और कर्मों को निर्देशित करें। इसी प्रकार तुम सदगुणों को विकसित और संवर्धित करसकते हो। मन को अपवित्र बनाने या नीचेगिराने वाली किसी भी इच्छा के सामने घुटने मत टेको,या उनके साथ कोई समझौता मत करो। यदि अनवरत अपने मन कि निगरानी सतर्कता पूर्वक करते रहो और असत् गुणों (क्रोध, असंतोष आदि ) को कड़ाई से निकाल बाहर करने के लिए स्वप्रयत्न या पुरुषार्थ करते रहो तो एक सुंदर चरित्र गठित करने में उपयोगी समस्त गुण तुम अर्जित कर लोगे। सजग व्यव्हार के फलस्वरूप अच्छी आदतों से अर्जित ये सारे सदगुण तुम्हारे व्यक्तित्व के स्थाई मानसिक उपादान बनजायेंगे। अपने लक्ष्य के प्रति लगन, दृढ़ संकल्प तथा आत्मविकास के लिए निरंतर स्वप्रयत्न या पुरुषार्थ ही चरित्र-निर्माण का एक मात्र पथ है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है,अन्य कोई उपाय नहीं है।
                                          (९)चरित्र-निर्माण के लिए अध्यन
                                        (Reading For Character-Building )
जो लोग चरित्रवान मनुष्य बनना चाहते हैं या जो आत्मविकास करना चाहते हैं उनके लिए एक उत्तम परामर्श है-' Keep the Holy Shrine of your Mind ,God's temple, Pure and Free from all your Thought Enemies.'  -अर्थात ' अपने मन रूपी पवित्र तीर्थ को, ईश्वर के मन्दिर को ,अधःपतित करने वाले शत्रुतापूर्ण विचारों से सदा मुक्त रखो'।
क्योंकि मन की पवित्रता के ऊपर ही उत्तम चरित्र निर्भर करता है। यदि हम अपने मन की देख-भाल समुचित ढंग से करते रहते हैं तो उसी से हमारे चरित्र की भी देख-भाल होती रहती है। हमारा ' मन ' भी चूँकि प्रकृति का ही अंश है,इसीलिए वह भी कभी रिक्तता या शून्यता को पसंद नहीं करता है। इसीलिए यदि मन को उत्कृष्ट,
कल्याणकारी तथा पवित्र विचारों से परिपूर्ण करके नहीं रखा जाय तो यह स्वतः ही अपने को निकृष्ट,अधम, रुग्न एवं असंगत विचारों विचारों से परिपूर्ण कर लेगा। इसीलिए हमें अपने मन में केवल शुभ या सत् संकल्पों को ही उठने देना चाहिए। यह कथन भी पूर्णतया सत्य है कि- " हमारे अपने ही विचारों के अतिरिक्त , दूसरा कोई भी हमारा वास्तविक शत्रु नहीं है। वैसे अपवित्र विचाररूप ' शत्रु ' हमारे ही कामवासना, स्वार्थीपन तथा पूर्वाग्रह से उत्पन्न होते हैं,तथा हमारे ही मन में छुपी रहते हैं।" मन रूपी वास्तविक पवित्र ' तीर्थ-स्थल ' को सभी तरह के अपवित्र या शत्रुतापूर्ण विचारों से सदा मुक्त तथा निर्मल बनाय रखने का सबसे सरल उपाय -तो यही है कि मन को निरन्तर सद्विचारों के चिंतन में ही व्यस्त रखा जाय । पवित्र विचारों के सबसे विश्वसनीय और अक्षय आपूर्तिकर्ता तो हमारे 'सदग्रंथ' ही हैं। एटकिंसन ने कहा हैं कि -"सद्ग्रंथों के वास्तविक मूल्य को आँक पाने में- भला कौन समर्थ हो सकता है ? "सद्ग्रंथों को 'निरावृत- ज्ञानराशी'  बताते हुए फ्रांसिस बेकन कहते हैं-" हमारे सदग्रंथ मानो समय के समुद्र में ज्ञान-राशियों से भरे हुए उन जल-पोतों के सदृश हैं जो उसमें संचित बहुमूल्य-ज्ञान राशी को एक पीढी से दूसरी पीढी तक सुरक्षित रूप में पंहुचा देने का कार्य करती हैं।उन ग्रंथों से हमें अतीत और वर्तमान युग के सर्वोत्कृष्ट मानस द्वारा निसृत
 ' सर्वोत्तम प्रज्ञा ' प्राप्त होती है। उनकी ज्ञानशक्ति हमलोगों की तुलना में अपरिमित है,तथा मनीषियों द्वारा जीवन भर धैर्यपूर्वक किए गए चिंतन-मनन के फलस्वरूप प्राप्त ज्ञान तथा कल्पनाशक्ति से उपलब्ध सृष्टि के सौन्दर्य के रहस्य को हमें प्रदान करने के लिए ये सदग्रंथ सदैव प्रस्तुत रहते हैं। यदि तुम सद्चरित्र संपन्न मनुष्य बनना चाहते हो तो सद्ग्रंथों को पढने की आदत डालो।" धर्म-गुरुओंतथा पैगम्बरों के बारे में एक प्रसिद्ध चेतावनी है- " Beware of false prophets " अर्थात " नकली या ढोंगी पैगम्बरों से सावधान रहो। " ठीक उसी प्रकार स्वाध्याय के लिए सही पुस्तकों का चयन करते समय भी इसी चेतावनी को याद कर लेना चाहिए। जो भी पुस्तक हाँथ में आ जाय उसीको पढ़ डालना बिल्कुल उचित नहीं है,क्योंकि उससे लाभ होने के बजाय हानी होने की सम्भावना ही अधिक रहती है। कुछ पुस्कों में छपी निकृष्ट सामग्री भी मन को पौष्टिक आहार देने के बजाय हमारे चरित्र को ठीक उसी प्रकार भ्रष्ट कर देती है,जिस प्रकार मिलावटी खाद्यसामग्री हमारे स्वास्थ्य को बिगाड़ देती है।
इस प्रकार की पुस्तकों को दूर से देख कर ही विष के समान त्याग कर देना चाहिए। घटिया पत्र-पत्रिकाओं तथा सस्ते उपन्यासों को भी किसी महापेटू किताबी- कीड़े की तरह चाटते रहने की आदत आत्मविकास या चरित्र निर्माण के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है। एक सच्ची घटना है-
"एकबार किसी लड़के ने एक दूसरे लड़के को एक ऐसी पुस्तक पढने को दी जो अश्लील-चित्रों और अपवित्र बातों से भरी हुई थी। उस दूसरे लड़के ने उस पुस्तक को केवल कुछ क्षणों तक अपने हाँथों में रखकर,उसपर एक सरसरी सी नजर डाली फ़िर उसे वापस लौटा दिया। बाद के जीवन में वह दूसरा लड़का चर्च में एक ऊँचे ओहदे पर पहुँच जाता है, बिशप या मठ का सचिव  पर पहुँच जाता है। कई वर्षों बाद उसने अपने एक मित्र को उक्त घटना के बारे में बताते हुए कहा था-अगर उस दिन उस लड़के ने मुझे वह अश्लील पुस्तक न दिखाई होती तो उस उपकार के बदले,आज मैं उसे अपनी आधी सम्पत्ति भी भेंट में दे सकता था। "
इसीलिए जो पुस्तक-पुस्तिकाएँ या औडियो-भिडियो (आवाज और दृश्य) तुम्हारे मन को सुसंस्कृत बनाने में थोड़ी भी सहायता न कर उसे विकृत कर देती हों वैसी पुस्तकों या दृश्यों को पढ़ने-देखने की तो बात ही क्या पैर के अंगूठे से भी छूने की चेष्टा मत करो। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं को परामर्श देते हुए कहा था-"तुम लोग (बाजारू पुस्तकों को) जितना कम पढ़ो उतना ही अच्छा होगा,पढ़ना ही हो तो गीता एवं वेदांत (उपनिषदों) के ऊपर लिखे उत्तम भाष्यों का ही अध्यन करो। इतना पढ़ लेना ही तुम्हारे लिए यथेष्ट होगा।"
उनके कथन का तात्पर्य यही है कि विवेक-विचार किए बिना जो कुछ सामने दिख जाए उसी को पढ़ने लगना बिल्कुल उचित नहीं,क्योंकि उससे लाभ के बजाय हानी होने कि सम्भावना ही अधिक है। वे आगे कहते हैं- "वर्तमान शिक्षा-पद्धति बिल्कुल ग़लत है,मन को विवेक-सम्मत निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षित करने के पूर्व ही उसमे तथ्यों को ठूंस दिया जाता है।.... शिक्षा केवल शब्दों को रट लेना मात्र नहीं है,हम इसको मानसिक शक्तियोंका विकास अथवा व्यक्ति को सही ढंग से और दक्षतापूर्वक सत् इच्छाओं को चयन करने (विवेकसम्मत निर्णयलेने) का प्रशिक्षण देना कह सकते हैं।"
शिक्षा की यही परिभाषा हमें " चरित्र निर्माण के लिए अध्यन का दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत " में ले जाती है। वह सिद्धांत कहता है कि-' यदि कोई व्यक्ति शास्त्रों के अध्यन से सर्वाधिक लाभ उठाना चाहता हो तो उसे एक ' पाठक ' (Reader) के साथ-साथ एक अच्छा ' विचारक ' (Thinker) भी अवश्य बनना चाहिए। ' क्योंकि केवल तथ्यों का संकलन भर कर लेने से ही का वास्तविक उद्देश्य- ' विवेक- सम्मत निर्णय लेने कि शक्ति ' भी प्राप्त नहीं हो जाती।
जॉन लाक कहते हैं- " पुस्तकों के अध्यन से हमें केवल उसमे लिखे ज्ञान से परिचय भर ही हो पाता है,किन्तु पठित विषयों पर चिंतन-मनन करते रहने से उनका आत्मसातीकरण हो जाता है।"
थामस हाब्स ने कहा था- " Knowledge is power " अर्थात -" ज्ञान ही शक्ति है। "  किंतु कोई भी ज्ञान तबतक शक्ति नहीं बन सकता जबतक बुद्धि इसे पचा कर या आत्मसात कर के उसे मन का ही अंश नहीं बना लेती। दुसरे शब्दों में -' ज्ञान ' शक्ति के रूप में तब तक परिणत नहीं होता, जब तक मन उसे पचा कर या आत्मसात करके अपना ही हिस्सा नहीं बना लेता।
                                     (१०)अध्यन करने का सही तरीका
यदि आप बौद्धिक रूप से शक्तिशाली बनना चाहते हों,  तो किसी सदग्रंथ को निम्न लिखित तरीके से  पढ़ने की आदत बना लीजिये|  किसी एक अनुच्छेद को एकाग्रता के साथ पढ़ लेने के बाद, पुस्तक के पन्नों के बीच (marker या चिन्हक ) रख कर पुस्तक को बंद कर दीजिये, तत्पश्चात बैठे- बैठे या टहलते हुए कुछ समय तक केवल ' पठित- विषय ' के ऊपर ही चिन्तन-मनन करते रहिये। किसी भी स्थिति में, अपने मन को पठित 'विषय-वस्तु ' के अभिप्राय के बारे में चिन्तन-मनन करते रहने में ही एकाग्र बनाये रखिये। अर्थात अभी अभी आपने जो कुछ पढ़ा है;  उसके ' वास्तविक अभिप्राय ' को ही अपने मन में बार-बार घुमाते रहिये।
क्योंकि कोई भी ज्ञान तब तक आपका नहीं हो सकता,  जबतक आप उसके मर्म या अभिप्राय पर चिन्तन-मनन करके उसे आत्मसात कर अपने जीवन में नहीं उतार लेते। ज्ञान की सार्थकता अपने जीवन में उसके उपयोग करने पर निर्भर है.  जब आप उसे पहली बार पढ़ते हैं, तब वह लेखक की संपत्ति ही रहती है, किन्तु जब आप ( गाय के पागुर कर भोजन पचा लेने की पद्धति के जैसा ) उसे आत्मसात कर लेते हो,  तब वह ज्ञान आपका अविभाज्य अंग बन जाता है; और तब अपने व्यवहारिक जीवन में भी आप उस ज्ञान का उपयोग करने में सक्षम हो जाते हैं.
ऐसी किसी पुस्तक को मत पढो जिसमे ' नैतिकता ' को बल प्रदान करने वाली कोई सामग्री न हो। अध्यनका उद्देश्य निर्धारित किए बिना किसी भी पुस्तक को मत पढो। केवल टाइमपास करने या समय व्यतीत करने के उद्देश्य से पढ़ाई करना नीतिसंगत नहीं है बल्कि मुर्खता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है, मन को विषयवस्तु पर एकाग्र किए बिना कभी मत पढ़ो। किसी पुस्तक को जब अपने हाँथ में लो तो उसे पढ़ने से पूर्व मन को तरोताजा, उत्साही और मनीषा को सक्रीय बना लो। किसी फालतू या असंगत विषयों को पढ़ने से अधिक हानिकारक है; निरुत्साही होकर निष्प्राण भाव से या मन मार कर पढ़ते रहना। जो कुछ भी पढ़ो पुरी तल्लीनता के साथ पढ़ो,पढ़ाई करते समय उसी में लीन हो जाओ। जब अध्यन समाप्त हो जाय तो,पुस्तक के भावों को पुस्तक में ही छोड़ कर मत उठो। उसके अभिप्राय के ऊपर उसी प्रकार चिन्तन-मनन करो जिस प्रकार घास खा लेने के बाद एक गाय जुगाली ( या पागुर ) करती है,ठीक उसी प्रकार पठित विषयों को चबा-चबा कर उसके विचारों को आत्मसात कर लो।
 प्रो० विलियम मैथ्यू कहते हैं- " सद्ग्रंथों को पढ़ना बहुत अच्छी आदत है,किंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है एक सदाचारी जीवन जीना। जब किसी व्यक्ति के जीवन में सदाचार प्रतिष्ठित हो जाता है, तो वह आयु और उसके ह्रास की अवज्ञा करने में भी समर्थ हो जाता है।"
वे पुनः कहते हैं-"कोई मनुष्य कितना बुद्धिमान और सुविज्ञ है उसका आकलन उसके द्वारा पढ़ लिए गए सद्ग्रंथों की संख्या के आधार पर नहीं,बल्कि उस आधार पर हो सकता है की उसने सद्ग्रंथों में से कितने मूल्यवान भावों को पचा कर, उन्हें आत्मसात करके अपना अन्तरंग साथी बना लिया है ? "
आगे वे कहते हैं - " मानवीय बुद्धि द्वारा अबतक जितने भी अविष्कार किए गए हैं उनमे से सर्वाधिक लाभदायकअविष्कार शायद भाषा-लिपि या वर्णाक्षरों का अविष्कार ही है। इसके बहुत समय बाद में मुद्रण की तकनिकी का अविष्कार हुआ है। इसी की कृपा से आज हमलोग अबतक हुए महान विचारकों में से किसी को  मध्यरात्रि के समय भी, अपने अध्यन-कक्ष में बुला सकते हैं ;  तथा अब तक के किसी ख्यातिप्राप्त लेखक के ड्राइंग-रूम में बिना उनसे पूर्वानुमति लिए ही चले जा सकते हैं। हम लोग आज मिल्टन,शेक्सपियर या इमर्सन में से किसी के भी बिल्कुल निकट जाकर बैठ सकते हैं तथा बिना एक भी क्षण की पूर्व सूचना दिए ही उनसे हार्दिक स्वागत-सत्कार प्राप्त कर सकते हैं।"
यहाँ हम यह भी जोड़ सकते हैं कि-"इसी भाषा-लिपि कि कृपा से हमारा जब भी जी चाहे तभी श्रीराम,श्रीकृष्ण, बुद्ध,व्यासदेव,पतंजली,आचार्य शंकर,या श्रीरामकृष्ण,माँ सारदा तथा स्वामी विवेकानन्द जैसे प्रख्यात और यशस्वी व्यक्तिओं के भी बिल्कुल नजदीक बैठ कर उनके हार्दिक-प्रेम कि ऊष्मा का अनुभव कर सकते हैं।" प्रो० मैथ्यु आगे कहते हैं-"कोई बिल्कुल अनजान और पराया व्यक्ति भी किसी व्यक्ति-विशेष कि पठन-सामग्रियों का बहुत ध्यान से अध्यन और विश्लेषण करने के बाद चाहे तो उस व्यक्ति कि बहुत सुंदर जीवनी लिख सकता है।"
सद्ग्रंथों से प्राप्त होने वाली इतनी संभावनाओं को देखते हुए युवा भाइयों को चाहिए कि वे अपने समय को थोड़ा सुव्यवस्थित कर लें तथा पुस्तकों का चयन करते समय अपने विवेक का प्रयोग करें। एवं अपने मन से उन संदेहों को दूर हटा देने के उद्देश्य से ही अध्यन करें जो हमारे आत्मविकास में बाधा पंहुचाते हैं। तथा केवल उन्ही पुस्तकों का अध्यन जो हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक हैं। यदि हमारे युवा भाइयों के पास बहुत से सद्ग्रंथों को पढने का समय न हो,  तथा वे उचित पाठ्य-पुस्तकों का चयन कर पाने में भी असमर्थ हों;  तो उन्हें ' स्वामी विवेकानन्द कि जीवनी तथा संदेश ' या 'स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र को आह्वान ' जैसी छोटी-छोटी पुस्तिकाओं का अध्यन करना भी बहुत लाभदायक होगा। उन पुस्तकों से स्वस्थ और सुंदर जीवन का निर्माण करने के लिए " सर्वशक्ति-प्रद तथा सर्वदुःख हरणी " टौनिक (स्वास्थ्यवर्धक औषधि) प्राप्त होगी।
Is Character A Luxury ?
                           (११)" क्या ' चरित्र-गठन ' विलासिता की वस्तु है ? "
वर्तमान युग में केवल युवा वर्ग ही नहीं, उनके अभिभावक गण भी नौकरी पाने या घर बसाने के पूर्व चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा के प्रति उपेक्षा का भाव ही प्रर्दशित करते हैं। इस उपेक्षा के लिए उनके पास एक जोरदार दलील है-' इस सामाजिक व्यवस्था में जहाँ जीविकोपार्जन की समस्या को सुलझाने में ही हमारा सर चकराता रहता है, वहां किसी न किसी रोजगार में लगने के पूर्व ही, चरित्र-निर्माण के लिए भी प्रयत्नशील रहना एक ऐसी विलासिता की वस्तु है जिसको युवा वर्ग या उनके अभिभावक गण बहुत कठिनाई से वहन कर सकते हैं।'
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज सभी युवाओं के लिए कोई ढंग का रोजगार पा लेना तथा अभिभावक गण के लिए पूरे परिवार का दो जून कि रोटी कि व्यवथा कर लेना सचमुच बहुत कठिन हो गया है। तब यह प्रश्न स्वभाविक है कि ' पहले अपनी आसन्न अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा किया जाय,या चरित्र-निर्माण को प्राथमिकता दी जाय ? '
यह बात स्पष्ट है कि आज का समाज आसन्न अनिवार्यताओं को पूर्ण करने को ही प्राथमिकता देगा।निश्चित है कि आज का समाज चरित्र-निर्माण को तत्काल पूर्ण की जाने वाली अनिवार्य आवश्यकता नहीं समझता। आमतौर से यही माना जाता है कि पहले भूख एवं अन्य भौतिक असुविधाओं को मिटाना अनिवार्य है; और जबतक इन कष्टों तथा अभावों का स्थायी समाधान नहीं हो जाता, तबतक ' चरित्र ' प्रतीक्षा कर सकता है।
इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए यदि 'अर्थशास्त्र' कि शब्दावली का प्रयोग किया जाय तो यह कहा जा सकता है - कि चरित्र भी एक विलास कि वस्तु है। किंतु क्या सचमुच ' चरित्र ' एक विलासिता की वस्तु है ? जिस प्रकार हमलोग-' टीवी ', ' फ्रिज ' या ' एसी ' आदि अन्य विलासिता कि सामग्रियों के बिना भी अपना काम चला लेते हैं, ठीक उसी तरह क्या 'चरित्र' के बिना भी हम अपना काम नहीं चला सकते?
क्या हम सचमुच ' चरित्र-निर्माण ' को भविष्य में आने वाले किसी सुविधाजनक तिथि तक स्थगित रख सकते हैं ?इन प्रश्नों का उत्तर देने के पूर्व हमें इसके ऊपर बहुत गंभीरता पूर्वक चिंतन-मनन करना होगा। विलासिता की  सामग्री वह है - जो जीवन-स्तर को उन्नत करने, उंच्च स्तर को बनाए रखने, तथा अपनी कार्यक्षमता को और अधिक बढ़ाने के लिए परमावश्यक समझी जाती है।इसीलिए यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि विलासिता कि वस्तुओं के बिना भी हमारा काम चल सकता है तथा उन्हें भविष्य के किसी सुविधाजनक तिथि तक के लिए स्थगित भी रखा जा सकता है।
इसी प्रकार 'चरित्र' कि भी जाँच-परख करके हम इसका निर्णय करें कि,यह कोई अत्यावश्यक वस्तु है या अनावश्यक वस्तु है। किसी ' विलासिता कि वस्तु ' ( फ्रिज, एसी, टिभी.... आदि ) के विपरीत चरित्र विशुद्ध रूप से मनुष्य की आंतरिक वस्तु है, तथा किसी व्यक्ति के दैनंदिन जीवन में उसके अस्तितित्व के साथ कहीं न कहीं प्रति मुहूर्त संलग्न रहने को बाध्य है। इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-
" हमारा प्रत्येक कार्य जो हम करते हैं, हर विचार जो हम सोंचते हैं, हमारे मन के ऊपर एक छाप छोड़ जाता है, जिसे संस्कृत में 'संस्कार' कहते हैं। ये सभी संस्कार एकत्रित होकर ऐसी महती शक्ति का रूप ले लेते हैं, जिसे 'चरित्र' कहते हैं।किसी व्यक्ति ने स्वयं ही जिसका निर्माण किया वही उसका चरित्र है। यह उन मानसिक तथा दैहिक क्रियाओं का परिणाम है, जिन्हेंउसने अपने जीवन में किया है।"
स्वामी विवेकानन्द ने 'चरित्र' का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, उससे यह स्पष्ट है कि- मनुष्य के अस्तित्व के साथ 'चरित्र' इतना ओतप्रोत है,  कि उसे इससे अलग करके देखा भी नहीं जा सकता। ' तथा जो वस्तु किसी व्यक्ति के अस्तित्व का अविभाज्य अंग हो, सम्भवतः उसे 'अनावश्यक' वस्तु कहने कि धृष्टता कोई भी नहीं करना चाहेगा।
हम जानते हैं कि,किसी व्यक्ति के शरीर को नुकसान पहुंचाय बिना उसके ' organs ' को काट कर अलग नहीं किया जा सकता। यदि किसी एक भी 'organ' को काट कर निकाल लिया जाय तो वह व्यक्ति या तो मर जायगा, या उसकी कार्य क्षमता क्षीण हो जायेगी। सम्भव है कि एक-आध 'organ' निकाल लेने के बाद भी उसको कृत्रिम उपकरण कि सहायता से जीवित रख लिया जाय, किंतु किसी व्यक्ति के अस्तितिव से 'चरित्र' को एक क्षण के लिए भी काट कर निकला नहीं जा सकता।
इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि ' चरित्र ' किसी व्यक्ति के अस्तित्व का अविभाज्य अंग है। इसीलिए यहउसके अस्तित्व का अनिवार्य या मौलिक वैशिष्ट है।यह सत्य है कि हमारी शारीरिक तथा मानसिक क्रियाओं के ऊपर परिस्थितियों का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। अच्छे परिवेश में पलने-बढ़ने से हमारा झुकाव अच्छे संस्कारों को विकसित करने कि ओर रहता है, वहीं बुरे परिवेश में यह झुकाव बुरे संस्कारों को विकसित करने वाला होता है। किंतु हर हाल में अपने मन पर संस्कारों का निर्माण करने के लिए हम स्वयं ही मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। क्यों कि परिस्थितियाँ भी एक निश्चित सीमा तक ही हमारी शारीरिक और मानसिक क्रियाओं को प्रभावित कर सकतीं हैं। इसीलिए हमारे चरित्र-निर्माण में परिस्थितियाँ कभी भी निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकतीं। यदि चरित्र-निर्माण में परिस्थितियाँ ही निर्णायक भूमिका निभातीं तो अच्छे परिवेश में रहने,पलने-बढ़ने वाले सभी मनुष्यों का सदैव सत्-चरित्र ही विकसित होता और जो लोग बुरे परिवेश में रहने को बाध्य हैं उनका चरित्र सदैव बुरा ही रहता। दीर्घ काल तक बुरे परिवेश में जीवन व्यतीत करने के बाद भी किसी व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के रुझानों का योगफल यदि अच्छाई या साधुता के पक्ष में अधिक हो तो उसमे सत्-चरित्र ही विकसित होगा।
ठीक उसी प्रकार दीर्घकाल तक साधू-संग और अच्छे वातावरण में रहकर भी यदि किसी व्यक्ति के कर्मों का योगफल बुराई के ही पक्ष में अधिक हो, तो उसके चरित्र का झुकाव बुरा बनने की ओर होगा। निःसंदेह  परिवेश का प्रभाव भी मन के उपर पड़ता है,किंतु व्यक्ति जबतक स्वयं न चाहे वह पूरी तरह से परिवेश के अधीन कभी नहीं हो सकता।
परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, हर अवस्था में किसी व्यक्ति की इच्छाशक्ति या उसके 'मन की संकल्पशक्ति' (Volition of Mind) ही उसकी शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के लिए- अन्तिम रूप से उत्तरदायी है ! एवं परिवेश की भूमिका अहम नहीं है।  यदि यही बात सच न होती तो विगत वर्षों में- "खुदीराम बोस, बाघा जतिन, चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, विनय-बादल-दिनेश, आदि स्वतंत्रता सेनानियों ने फाँसी के फन्दों में आसन्न मृत्यु को सामनेदेख कर भी जिस तरह का आचरण किया था (आगे बढ़ कर फाँसी के फन्दों को चूम लिया था), उनका आचरण पूरीतरह से भिन्न होता तथा वे भी अंग्रेजों के विरुद्ध लोहा लेते हुए अंत में पकड़े जाने और फाँसी पर झूल जाने के बहुत पहले ही आत्म-समर्पण कर चुके होते।" इस चर्चा के सार को समझ लेने के बाद,अब हमारे लिए इस लेख के आरम्भ में उठाए गए प्रश्नों का सीधा उत्तर दे पाना सम्भव हो सकता है। अब हमलोग भी इस बात को दृढ़ विश्वास के साथ कह सकते हैं की- ' चारित्र ' कोई विलासिता की सामग्री तो नहीं ही है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व के साथ इतना ओतप्रोत कि इसे कभी हमसे अलग नहीं किया जा सकता है।
                   (१२)छात्र-जीवन ही चरित्र-निर्माण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय है !
इसके पहले वाले लेख को पढ़ कर इतना तो समझा ही जा सकता है कि, 'चरित्र' के बिना हमारे अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारा चरित्र चाहे भला हो या बुरा,वह हमारी इच्छा की परवाह किए बिना हमारे अस्तित्व के साथ अविभाज्य रूप से जुडा ही रहता है।यदि हम अपनी शारीरिक और मानसिक क्रियाओं से निर्मित सत्- संस्कारों की अतिरिक्त बढ़त को अच्छाई के पक्ष में संवर्धित न करना चाहते हों,केवल तभी चरित्र-निर्माण के कार्य को भविष्य के किसी सुविधाजनक तिथि तक टाले रख सकते हैं।यदि हम इस मनोवैज्ञानिक तथ्य का ध्यान रखें कि-' हमारीप्रत्येक मानसिक या शारीरिक गतिविधियाँ हमारे चरित्र को प्रभावित करने के लिए बाध्य हैं, तथा भूल से भी बुरी प्रवृत्तियों ने मन में जड़ जमा लिया और एक बार भी चरित्र बिगड़ गया तो आसानी से उसे सत्-चरित्र में परिवर्तीत नहीं किया जा सकता।' इस सीधी सी बात को हम यदि एक बार भी अच्छी तरह से समझ लें, तो फ़िर शायद ही हम में से कोई अपने चरित्र-निर्माण के कार्य को ' कैरिअर ' बना लेने के बाद - जीविकोपार्जन प्रारम्भ करने कि ' तिथि ' तक स्थगित रखना चाहेगा। इसीलिए जब कभी हमारे मन में यह प्रश्न उठे,  कि जीवन- स्तर को ऊँचा उठाने वाली भौतिक सामग्रियों के संग्रह अथवा चरित्र-निर्माण के लिए सार्थक प्रयास में से किसे प्राथमिकता दी जाय ? तो धैर्य पूर्वक विवेक-विचार करने के बाद ही कोई निर्णय करना चाहिए। तथा उपरोक्त प्रकार से विचार-विश्लेष्ण करने के बाद जब यह समझ में आ जाय की जिस प्रकार, अनिवार्य रूप से तत्काल पूर्ण की जाने वाली कुछ मानवीय आवश्यकताएं होतीं हैं उसी प्रकार चरित्र-निर्माण के उपायों को सीख लेना भी-'अनिवार्य रूप से तत्काल पूर्ण की जाने वाली आवश्यकता है।'
तब उन उपायों को रोजगार करने या घर-गृहस्ती बसा लेने के पूर्व, अर्थात विद्यार्थी जीवन से ही प्रयोग में लाना प्रारम्भ कर देना चाहिए। क्योंकि विद्यार्थी जीवन में मन मिट्टी के लोंदे जैसा मुलायम, सत् या असत् किसी भी भाव को ग्रहण करने के प्रति द्रुत-ग्रहणशील तथा शीघ्र प्रभावित हो जाने वाला होता है।इसीलिए विद्यार्थी जीवन में बुरी आदतों या अच्छी आदतों में से किसी को भी अत्यन्त सरलता से अपनाया जा सकता है।
जबकि आयु अधिक बढ़ जाने के बाद यह कार्य उतना सरल नहीं रह जाता।वहीं विद्यार्थी जीवन में निर्मित अच्छी आदतें सद्प्रवृत्तियों में या सद्संस्कारों में परिणत हो जाती हैं और गृहस्त जीवन में प्रविष्ट होने के पूर्व ही हमारा चरित्र अच्छा बन जाता है। जीवन को सफल करने वाले सारे सदगुण हमारे आचरण में झलकने लगते हैं। किंतु हम अविवेकी के समान 'चरित्र' को केवल एक विलासिता की वस्तु या दिखावटी वस्तु समझ कर बिना चरित्र-निर्माण किए ही गृहस्त जीवन में कूद पड़े तो कुछ ही वर्षों बाद हमें यह निश्चित तौर अनुभव होने लगेगा कि- चरित्र का आभाव प्रतिपल हमारे जीवन को संकट में डाल रहा है। उदाहरणार्थ , मानलो कि यदि मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में चरित्र-निर्माण के प्रति थोडी भी दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसके परिणामस्वरूप मुझमे विश्वसनीयता, ईमानदारी , समयानुवर्तिता , सत्यनिष्ठा तथा अध्यवसाय आदि सदगुणों का मुझमे घोर आभाव हो गया है। अब यदि मैं जीविकोपार्जन का साधन ढूंढ़ पाने में असफल हुआ या उत्तरदायित्व को ठीक से निभा नहीं सका तो इसका कारण मेरा वह दुर्बल चरित्र ही तो है, इस बात को प्रमाणित करने के लिए क्या कोई और तर्क देना आवश्यक होगा?
इतना ही नहीं चरित्र रूपी दुर्ग के बिना, अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मेरे द्वारा किया गया संग्राम मुझे ऐसी स्थिति में ला खड़ा करेगा जहाँ एक कौर अन्न जुटाने कि यंत्रणा से भी अधिक भयावह परिस्थितियां होंगी। इतना सब समझ-बूझ लेने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि चरित्र-निर्माण के कार्य को इसकी अपनी स्वाभाविक विलक्षणता के कारण अन्य दूसरी अनिवार्य आवश्यकताओं के पूर्ण हो जाने तक स्थगित नहीं रखा जा सकता। इसीलिए हर समय , विशेषकर छात्र-जीवन में अपनी प्रत्येक शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं को नियंत्रित करने का प्रयास,भले-बुरे परिवेश का ध्यान रखे बिना -सदा करते रहना चाहिए।
                                               (१३)चरित्र-निर्माण कैसे करें ? 
                                               Building A Character
[स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- ' मनुष्य के मन में ही सारी समस्याओं का समाधान मिल सकता है. कोई भी कानून किसी व्यक्ति से वह कार्य नहीं करा सकता जिसे वह करना नहीं चाहता. अगर मनुष्य स्वयं अच्छा बनना चाहेगा, तभी वह अच्छा बन पायेगा. सम्पूर्ण संविधान या संविधान के विशेषज्ञ मिलकर भी उसे अच्छा नहीं बना सकते. हमसब अच्छे (मनुष्य) बनें, यही समस्त समस्यायों का हल है. (४/१५७)'] 
  (मान लो कि) तुम अभी स्वार्थपरायण या ख़ुदगर्ज बन जाने में असमर्थ हो. तुम दूसरों का कल्याण करने की अपनी  इच्छा को रोक पाने में असमर्थ हो. इसीलिए तुम अच्छे (मनुष्य) हो. किन्तु इसके लिए अपने मुँह से अपनी बड़ाई मत हाँको. क्योंकि तुम दूसरों का कल्याण करने के चरित्र से युक्त हो, इसीलिए इसका सारा श्रेय तुम्हें नहीं, तुम्हारे अच्छे चरित्र को जाता है. दूसरे शब्दों में कहें, तो किसी तरह से तुम निश्चित रूप से अच्छे-चरित्र के अधिकारी बन चुके हो, इसीलिए अपने अच्छे चरित्र के द्वारा बलात प्रेरित होकर ही तुम अच्छे कार्य करते हो.
हाँ, निश्चित रूप से इसका श्रेय तुम्हें भी मिलना चाहिए, क्योंकि - अच्छे चरित्र को अर्जित करने के लिए, सच्चरित्र का अधिकारी बन जाने के लिये तुमने अवश्य ही दीर्घ काल तक लगातार संघर्ष किया होगा; एवं वैसा करने के पहले तुमने इस विषय पर लम्बे समय तक चिन्तन-मनन किया होगा और तभी तुम इस निष्कर्ष पर पहुँचे होगे कि - सच्चरित्र का अधिकारी बनने के लिये अवश्य ही तुम्हें कठोर प्रयत्न करना चाहिए. तथा दृढ संकल्प के साथ वैसा करते करते तुमने अपने चरित्र को अच्छे साँचे में ढाल लिया है. तुमने अच्छी आदतों को क्रमबद्ध  करने के उद्देश्य से, दृढ संकल्प के साथ स्वयं को केवल सदकर्म करते रहने पर मजबूर कर दिया होगा.
  इसीलिए जिस समय तुम कोई सद्कर्म कर रहे होते हो, भले ही तत्काल तुम्हें इसके लिए वाहवाही भी मिल जाये, किन्तु उस क्षण तुम वैसा कुछ नहीं कर रहे होते हो जिसका श्रेय तुम्हें दिया जाना चाहिए. किन्तु निश्चित रूप से तुम्हें इस बात का श्रेय अवश्य मिलना चाहिए कि तुमने अच्छा मनुष्य बनने के विषय में चिन्तन किया है तथा अच्छा चरित्र अर्जित करने के लिए कठोर परिश्रम किया है. यह कार्य हमलोगों को सदैव करना चाहिए. अच्छा चरित्र गठित करने के दृढ निश्चय पर पहुँचने, तथा वर्षों तक निरन्तर कठोर परिश्रम करने के लिए पहले हमें उचित रीति से विचार करना सीखना चाहिए. तथा अपने चरित्र को और अधिक उत्कृष्टतर बनाते रहने के लिए, अपने जीवन के अन्तिम क्षणों तक  हमलोगों को नितन्तर संघर्ष करते रहना चाहिए. इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए, कि हमारे द्वारा किये गये किसी कार्य से हमारे चरित्र में अधिगृहित सद्गुण कहीं कलुषित तो नहीं हो जायेंगे.
स्वामीजी कहते हैं, जिस प्रकार किसी अच्छे कार्य को करने का सारा श्रेय तुम्हें नहीं तुम्हारे अच्छे चरित्र को जाता है, उसी प्रकार जब तुमसे कोई बुरा कार्य हो जाता है, तो उसके लिए भी दोष तुम्हारा नहीं तुम्हारे बुरे चरित्र का है. ऐसा होने पर भी, स्वामीजी के इस कथन को गलत कार्य करने में या बुरे कार्य करने के पीछे बहाना के तौर पर उपयोग नहीं करना चाहिए. ( मू कहाँ चीचाउची माँ -मोर पोट्टी चीचाउची ! जिभिया बोल देला और पीठिया पीटाला-तब जिभिया सटक जाला ) क्योंकि, यदि जैसे चरित्र का मैं अधिकारी हूँ उसी के कारण मैं कुछ ऐसा कार्य कर बैठता हूँ, जिसे अच्छा नहीं कहा जा सकता, या कुछ बुरा कार्य करता हूँ, तो वैसा चरित्र बनाये रखने के लिए नैतिक रूप से उत्तरदायी भी मैं ही हूँ.
ऐसी परिस्थिति में केवल एक सद्चरित्र का निर्माण करने की अपेक्षा, मेरा कार्य-भार (task) थोड़ा अधिक कठिन हो जाता है, क्योंकि अब मुझे अपने बुरे चरित्र के साथ संयुक्त बुरी आदतों एवं प्रवृत्तियों से छुटकारा पहले प्राप्त करना होगा, और उसके बाद मुझे अच्छे चरित्र का निर्माण भी करना होगा. यह कार्य विशेष तौर पर तब और अधिक कठिन हो जाता है, जब मेरी उम्र अधिक हो चुकी हो, तथापि इस कार्य को तो करना ही है.
जब कोई व्यक्ति उम्रदराज हो जाता है, तो उस समय चरित्र को उपयुक्त रूप से गढ़ना कठिन हो जाता है, इसीलिए उचित यही होगा कि हमलोग अपने चरित्र गढ़ने के कार्य को जीवन के प्रारंभ में, या छात्र-जीवन से ही प्रारम्भ कर दें.
 क्योंकि जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे वैसे तुम्हारे चरित्र में समाहित कोई बुरी विशेषता (a particular bad quality in your personality ) रुझान, या प्रवृत्तियाँ अधिक स्थायी रूप धारण कर लेती है, जिससे छुटकारा पाना कठिन हो जाता है. किन्तु उन बुरे रुझान एवं गलत आदतों को किसी के चरित्र से रगड़ कर या कुरेद कर आसानी से मिटाया नहीं जा सकता है. उसके दुष्प्रभाव के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप अच्छी आदतों एवं रुझानों को धैर्य के साथ कठोर संघर्ष करते हुए गठित करना ही, उससे छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है.वैसा करने से अच्छी आदतों तथा रुझानों के नीचे वे सब ढंक जाती हैं, तथा किसी सच्चरित्र के अधिकारी व्यक्ति को हानि पहुँचाने में क्रमशः असमर्थ हो जाती हैं.
ऐसा होने पर भी, चरित्र-निर्माण की तकनीक सीखने से पहले, हमें यह अवश्य जान लेना चाहिए कि चरित्र वास्तव में क्या है ? तत्पश्चात यदि मुझे बुरे चरित्र की रुझानों को हरा देने का कार्य करना भी शेष हो, तो मेरे उपर यह अतिरिक्त कार्यभार हो जाता है. और जब इस कार्य में हमने सफलता प्राप्त कर ली हो, तब फिर चरित्र गठन की सेष-प्रक्रिया एक जैसी है. अब हमलोग इस बात पर चर्चा करेंगे कि चरित्र क्या है ?
' Character is an agglomeration of propensities.'- अर्थात किसी व्यक्ति के मानसिक रुझानों या प्रवृत्तियों की समष्टि को ही चरित्र कहते हैं. यदि प्रवृत्तियाँ बुरी हों, तो चरित्र बुरा हो जाता है; यदि प्रवृत्तियाँ अच्छी हो तो चरित्र अच्छा होता है.अब प्रश्न उठता है कि प्रवृत्ति किसे कहते हैं ? किसी विशेष परिस्थिति में, परिणाम के उपर दीर्घ काल तक सोच-विचार किये बिना, लगभग स्वतः, सहज क्रिया (reflex-action ) के जैसा  तत्क्षण कुछ विशिष्ट प्रकार की प्रतिक्रिया अनायास कर बैठने के रुझान को प्रवृत्ति कहते हैं.
 उदाहरण के लिए मान लो कि तुम्हारे आँखों को लक्ष्य करके कागज का एक गोला फेंक दिया जाय, तो तुम्हारी पलकें स्वतः बन्द हो जाएँगी. उस समय तुम इतना सोच-विचार नहीं करते, कि कोई वस्तु तुम्हारे आँखों की तरफ आ रही है, उससे तुम्हारी एक आँख फूट भी सकती है, इसीलिए तुम्हें अपनी पलकें अवश्य मूंद लेनी चाहिए. और इस निर्णय पर पहुँचते ही, मस्तिष्क को पलकों की मांसपेशियों के पास उसकी मोटर-तंत्रिकाओं के माध्यम से यह सन्देश भेजना चाहिए,कि आँखों के निकट आती हुई वस्तु से आँख की पुतली को बचाने के लिए पलकों को बन्द कर लो.
जब तत्काल प्रतिक्रिया करना अनिवार्य हो जाता है, उस समय यह सब क्रियाएं घटित नहीं होती हैं. जिस वस्तु से आँखों को खतरा पहुँच सकता है,उस वस्तु के निकट आते ही पलकें स्वतः बन्द हो जाती हैं, जिसके कारण पुतलियाँ सुरक्षित बच जाती हैं. इसी तरह जब किसी व्यक्ति को कोई कार्वाई करने के लिए तत्काल निर्णय लेना अनिवार्य हो जाता है, तब हमेशा सबकुछ देख-सुन कर, विवेक-प्रयोग करने के बाद निर्णय लेने का उसके पास समय नहीं होता। तब सद-सत में चुनाव करने करने की प्रक्रिया अपनाने के बाद कोई कार्वाई नहीं करता,बल्कि इसी तरह की परिस्थितयों में, अपनी परिपक्व आदतों, अपने सामान्य झुकाव, या प्रवृत्तियों के द्वारा निर्देशित होकर जिस विशेष ढंग से कार्य करने का अभ्यस्त होता है, उसे तत्काल उसी ढंग से करना पड़ता है.मन के निर्देशन में औचित्य-बोध या विवेक-प्रयोग का पूरा खेल खेले बिना, इसी तरह के झुकावों, रुझानों, परिपक्व आदतें जो हमें, आपात स्थिति में अपने निर्देशन में कार्वायी के लिए बाध्य कर देती हों,उन्हें ही प्रवृत्ति कहा जाता है.
 प्रवृत्तियाँ विभिन्न प्रभागों के उन जनरलों की तरह कार्य करती हैं, जो तात्क्षणिक निर्णय लेते हैं, एवं अपने सर्वोच्च सेनापति ' मन ' के प्रति जवाबदेह रहते हैं. जब हम किसी प्रवृत्ति के आधीन बाध्य होकर कोई कार्य करते हैं, और यदि वह कार्य अच्छा है, तो उस प्रवृत्ति को सद्प्रवृत्ति या अच्छी प्रवृत्ति कहते हैं; जब हम किसी प्रवृत्ति के द्वारा मार्गदर्शित होकर या उकसाए जाने पर कोई दुष्कर्म कर बैठते हैं, तो उसे असद्प्रवृत्ति या बुरी प्रवृत्ति कहते हैं.
हमारा चरित्र हमारी प्रवृत्तियों की समष्टि है. इसीलिए किसी व्यक्ति की अधिकांश प्रवृत्तियाँ यदि अच्छी हैं, तो उस व्यक्ति को सद्चरित्र का अधिकारी मनुष्य कहा जाता है; और यदि किसी व्यक्ति के चरित्र में अधिकांश प्रवृत्तियाँ या झुकाव बुरी होती हैं, तो व्यक्ति को दुश्चरित्र मनुष्य कहा जाता है.
यह बात समझ लेने में बिल्कुल आसान, स्पष्ट, और सरल है, किन्तु चरित्र-निर्माण करना सरल नहीं है.यह एक अर्थ में सरल है; किन्तु इसके लिए एक दृढ संकल्प लेने तथा लम्बी अवधि के लिए लगातार कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है.और यही कठिनाई है. एक अच्छा चरित्र गठित करने के लिए,बिना विश्राम लिए अपने मन को निरन्तर इसी कार्य पर निवेशित रखना आवश्यक है.और तुम जानते हो कि परिवेश, प्रकृति, तथा अन्य बहुत सी वस्तुएं हमें, अपने मार्ग से दूर लेजाने के लिए, एवं बुरी प्रवृत्तियों को अर्जित करने पर बाध्य कर देने के लिए, हमें निरन्तर लुभाने की कोशिश कर रहे हैं.
 इसीलिए, हमें यह पता होना चाहिए कि प्रवृत्तियाँ क्रमशः विकसित किस प्रकार होती हैं; क्योंकि वे प्रवृत्तियाँ ही जब समष्टिकृत हो जाएँगी, तो मेरा परिणामी चरित्र निर्मित हो जायेगा. प्रवृत्तियाँ आदतों से विकसित होती हैं. और जैसा हम सभी जानते हैं, एक ही कार्य को बार बार दुहराते रहने से उसकी आदत पद जाती है. अपने औचित्य-बोध के अनुसार पक्ष और विपक्ष दोनों पहलुओं के उपर काफी सोच-विचार करने के बाद ही हमलोग कोई कार्य करते हैं. किसी कार्य को करने के कई विकल्प हो सकते हैं; तथा दोनों या सभी संभाव्य संभावनाओं के उपर गौर करने के बाद हम किसी विशेष क्षण या परिस्थिति में एक को चुन लेते हैं.
  अपने निर्णय-क्षमता या औचित्य-बोध के अनुसार हम उसी कार्य को करते हैं, जिसके करने से, हमें लगता है कि यथासंभव सबसे अच्छा परिणाम निकलेगा. जब हम उस कार्य को करते है,तथा उसी विशेष क्रिया को कई बार दोहराते रहते हैं, तो वह हमारी आदत बन जाती है, या हमें उसकी लत पड़ जाती है. और जब कोई आदत बढ़ते बढ़ते थोड़ी और अधिक परिपक्व हो जाती है, तो वह एक प्रवृत्ति बन जाती है, जो हमें किसी विशेष स्थिति में, कोई विशेष प्रकार का कार्य करने के लिए मजबूर कर देती है.
  वैसा करते समय हमलोग अपने विवेक, औचित्य-बोध या विचारण क्षमता का प्रयोग नहीं करते हैं. उस समय तो बस हमलोग प्रवृत्ति की प्रचण्डता के वशीभूत होकर किसी विशेष कार्य को कर बैठते हैं. हम जानते हैं कि आदतें हमारी उन्हीं कृत्यों से पैदा होती हैं, जिन्हें हम अपने विवेक, या औचित्य-बोध का प्रयोग करने के बाद करते हैं; इसीलिए कोई भी आदत गठित करते समय हमें बहुत सावधानी रखनी चाहिए. कोई भी कृत्य करने के पहले, बहुत सतर्क रहना चाहिए, हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए के बारे में बहुत सावधानी से विचार करना आवश्यक है. चूँकि हमारे कृत्य ही पुनः पुनः दोहराए जाने के बाद हमारी प्रवृत्तियाँ बन जाती हैं, तथा इन प्रवृत्तियों कि समष्टि ही एक विशेष प्रकार के चरित्र का अधिकारी बना देंगी, इसीलिए हमें अपने कृत्यों के प्रति अत्यधिक सतर्कता बरतनी चाहिए.      
और हमलोगों ने यह पहले ही देखा है, कि हम किसी खास मौके पर चिन्तन-मनन करने के बाद ही, कुछ कृत्य या कोई विशेष ढंग का आचरण करते हैं. इसीलिए विवेक-पूर्वक सोच-विचार करना ही बुद्धिमानी का कार्य है.जब तक हम उन विशेष क्रियाओं को, जो मुझे कोई कृत्य करने या मेरे भविष्य के जीवन के समस्त कार्यों के लिए मजबूर कर देंगे, उन्हें करते समय उचित ढंग से सोच-विचार कर के, समय पर उचित निर्णय लेकर नहीं करेंगे, तो मेरे द्वारा बोये गये बीज की फसल को भी मुझे ही काटना पड़ेगा. इसीलिए,अपने विचारों एवं कार्यों के विषय में मुझे बहुत सावधान रहना चाहिये.
 किन्तु जब तुम सदैव विवेक-विचार करने के बाद ही किसी काम को करने में बिल्कुल अभ्यस्त हो जाते हो, तब तुम्हारे कदम बहुत तेज गति से आगे बढने लगते हैं. हमारी निष्कपटता एवं संकल्प के उपर ही हमारे विकास की गति निर्भर करती है. इसीलिए चरित्र-निर्माण का कठिन पक्ष यहीं तक है. लेकिन तब भी, हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि विकास करने का उल्टा पतन होना होता है.
यदि हमलोग अपने विचार तथा कार्यकलाप (करतूत) के विषय में बेपरवाह रहेंगे, तो हम नीचे फिसल सकते हैं, और अन्ततोगत्वा सम्पूर्ण रूप से बर्बाद भी हो सकते हैं. और यह पतन बहुत तेजी से भी हो सकता है.
ठीक उसी प्रकार, यदि तुम्हारे पास दृढ संकल्प है, तो तुम्हारी प्रगति दिन दूनी रत चौगुनी भी हो सकती है. अतः चरित्र-निर्माण में यह एक बहुत उत्साहवर्धक कारण है- हालाँकि, शुरू में यह कार्य बहुत कठिन है. जब तुम किसी पहाड़ के पास पहुँच कर उसके उपर चढ़ना आरम्भ कर देते हो, तो एक निश्चित ऊंचाई तक पहुँचने पर, चढ़ाई कि ख़ुशी मन को इतनी अधिक उर्जा से भर देती है, कि उस व्यक्ति के लिए उपर चढ़ना आसान हो जाता है.किन्तु जो व्यक्ति थोड़ी ही दूर तक चढ़ने के बाद, आगे की चढ़ाई को देख कर भयभीत हो जाता है, वह व्यक्ति अधिक ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाता. और जो व्यक्ति पहाड़ की ऊँचाई को दूर से देखकर ही डर जाता है, वह बिल्कुल भी ऊँचा नहीं उठ पाता.
  चरित्र-निर्माण के मामले में भी ठीक वैसा ही होता है. क्योंकि पहले पहल एक भी कदम आगे बढ़ाने से पहले तुमको काफी सोच-विचार करना पड़ता है,एक एक कदम बहुत फूंक-फूंक कर रखते हुए आगे जाना पड़ता है, इसीलिए पहले कुछ सोपानों पर चढ़ना ही बहुत बहुत कठिन कार्य है. सबसे अधिक सोच-विचार तो तुम्हें उस समय करना पड़ता है, जब तुम एक पैर को उपर उठाकर यह निर्णय कर रहे होते हो कि, इसे यहाँ रखूं, वहाँ रखूं या इसके अतिरिक्त किसी भी दिशा में रख दूँ. वैसे तो चरित्र-निर्माण करना साधारण सी बात है, किन्तु इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया इस मायने में कठिन है कि, जब तक तुम बहुत अधिक सतर्क नहीं हो, तथा प्रत्येक क्षण सावधान नहीं हो, तो तुम असफल हो सकते हो, और बहुत जल्दी ही तुम्हारा पतन भी हो सकता है.
  किन्तु यदि तुम सतर्क हो, यदि तुम में पौरुष है, तेज है, तुम्हारा मन यदि प्रबल इच्छाशक्ति सम्पन्न है, तथा अपने संकल्प पर अटल रहते हुए तुम कठोर और भरपूर प्रयास कर सकते हो, तो तुम्हारी प्रगति ही तुमको और अधिक उर्जा से लबरेज कर देगी, तुम्हारे लिए बहुत सहायक होगी, और तुम्हारी उन्नति बहुत तेज गति से होगी.
               (१४) " सद-चरित्र का निर्माण करने में 'स्व-परामर्श' के सिद्धान्त का महत्व।"

                  (An ' Auto-suggestion Formula ' for acquiring a Good Character.)
हमने इस बात को समझ लिया है कि दृढ संकल्प के साथ विवेक-प्रयोग करने से सत-इच्छा का चयन होगा, फिर सत इच्छाओं से सत्कर्म होंगे, उन्हीं सत्कर्मों को पुनः पुनः दोहराने से अच्छी आदतें गठित होंगी, परिपक्व आदतों से सत्प्रवृत्तियाँ पैदा होंगी, जिसके परिणाम में अच्छा चरित्र गठित हो जायेगा.
 अब प्रश्न उठता है, कि अच्छी रुझानों या श्रेष्ठतर-प्रवृत्तियों को अर्जित करने के लिए चरित्र के किन गुणों को अभ्यास द्वारा अपने आचरण में उतार लिया जाये, जिससे उन अच्छी आदतों का गठन हो सकेगा जो हमें एक अच्छा चरित्र प्रदान कर सकते हैं? अब हम उसी विषय की चर्चा करेंगे. इसके लिए दो विषयों को समझना आवश्यक है.
पहला है, अच्छा चरित्र गठित करने के अपने लक्ष्य- को प्राप्त करने के संकल्प पर अटल बने रहने के लिए, प्रचण्ड इच्छाशक्ति एवं प्रबल आत्मविश्वास प्राप्त करने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को   सीख कर उसका अभ्यास करने में जुट जाना. अतः हमें सर्वप्रथम " Auto-suggestion formula " (psychology - a process by which a person acts according to suggestions made from within herself or himself, eg during HYPNOSIS) - या " आत्म-सुझाव की  प्रणाली  " .को समझ कर उसे अपने उपयोग में लाना होगा.
[ जिस प्रकार कोई मनोवाज्ञानिक (Psychologist ) किसी व्यक्ति का उपचार करने के लिए, उसे सम्मोहन-क्रिया (HYPNOSIS ) की पद्धति से सुझाव देकर, कृत्रिम उपाय से उत्पन्न निद्रा या मोहावस्था में ले जा कर अपना आदेश मानने के लिए बाध्य कर देता है; ठीक उसी प्रकार  " Auto-suggestion formula " या ' आत्म-सुझाव की प्रणाली ' भी एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा स्वयं के भीतर स्वयं से स्वयं को दिए गए सुझावों के अनुसार अपने दृढ-संकल्प या इच्छाशक्ति को इतना अधिक बढ़ा लेता है, कि उसका अवचेतन-मन (Subconscious-Mind), उसके स्वयं का आदेश मानने के लिए बाध्य हो जाता है. ]     
 दूसरा विषय है- चरित्र में धारण करने योग्य उन २४ गुणों के नाम एवं विशेषता के बारे में जानना जिन्हें हमें अपनी आदतों के रूप ढाल लेना आवश्यक है.(तथा उन १२ दोषों के नाम एवं विशेषता को भी जानना चाहिए जिन्हें हमें अपने चरित्र से निकाल बाहर करना है. इसके लिए महामण्डल पुस्तिका - ' नेति से इती ' भी देखें

चरित्र के १२ दुर्गुण या दोष कौन कौन से हैं जिन्हें हमें बाहर निकालना है ?-(२६ जून २००९ का ब्लॉग देखें )
 १.जीवन-स्तर के मानदण्ड का दिखावा करने में वृद्धि नहीं।
२ " कपटता नहीं "
 ३. " जंग(मोर्चा) लग कर मरना ठीक नहीं "
४. स्वर्ग जाने की चाह नहीं "
५. " असन्तोष नहीं "
६." आत्मसंतुष्टि नहीं "
७." नैराश्य नहीं "
८ ." कर्म विमुखता नहीं "
९." ज्योतिष नहीं "
१०." भय नहीं "
११." क्रोध नहीं "
१२." विद्वेष नहीं " 
 इन दोषों को पहचानने और इन्हें दूर करने के बाद अपने चरित्र को अच्छे रूप में गढ़ने का दृढ संकल्प लेने, तथा चरित्र के उन २४ आवश्यक गुणों-जिन्हें अच्छा चरित्र गढ़ने के लिए अर्जित करना आवश्यक है, के बारे में जान लेने के बाद, यदि हमलोग उन्हें अपनी आदत बना लेने का प्रयत्न लगातार करते रहें, तो परिणाम में एक अच्छा चरित्र होगा निर्मित हो जायेगा.
हमने देखा है, कि चरित्र क्या है, यह भी जान लिया कि चरित्र को विकसित कैसे किया जाता है. चरित्र-निर्माण की विधि को दो भाग हैं. इसका पहला भाग, एक अच्छा-चरित्र विकसित करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयास में निरन्तर लगे रहने के लिए- अनिवार्य रूप से, सर्वप्रथम अपनी प्रबल इच्छाशक्ति तथा आत्मविश्वास का विकास करने की मांग करता है. इसे प्राप्त करने के लिए उपरोक्त " आत्म-सुझाव का सिद्धान्त " को अपनी दिनचर्या में अपना लेना अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है.   सुबह में जागने के तुरत बाद, तथा रात को बिस्तर पर लेटने से ठीक पहले, तुम स्वयं ही स्वयं से इस प्रकार कहो, सुझाव दो- " मैं एक चरित्रवान मनुष्य बनना चाहता हूँ, अपने कल्याण के लिए एवं समाज के कल्याण के लिए मुझे एक सच्चरित्र मनुष्य बनना ही होगा. क्योंकि, मुझे अपने आप पर विश्वास है, इसलिए मैं इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, जो कुछ भी करना अनिवार्य होगा, वह सब कुछ करूँगा. " ( विस्तृत आत्म-सुझाव प्रपत्र ' चमत्कार जो आपकी आज्ञा का पालन करेगा ' के नाम से 2/= रूपये में बुक-स्टाल से प्राप्त किया जा सकता है )
चरित्र-निर्माण प्रक्रिया का दूसरा भाग :
चरित्र के उन गुणों से संबंधित है, जिन्हें आत्मसात करने का प्रयास हम कर सकते हैं. एक सशक्त दृढ संकल्प करो, तथा चरित्र के गुणों की तालिका में बताये गये- सत्यनिष्ठा, साहस, ईमानदारी, उद्द्य्म, सहिष्णुता, विनयशीलता, सहानुभूति, आत्म-संयम, धैर्य, सेवा-परायणता, अनुशासन की भावना, निःस्वार्थपरता, स्वच्छता आदि २४ गुणों में से कम से कम कुछ गुणों को अवश्य विकसित करो ; परिणामतः तुम एक अच्छे चरित्र के अधिकारी मनुष्य बन जाओगे. हम इस बात की गारन्टी दे सकते हैं. तुम सच्चरित्र मनुष्य बन जाओगे, या तुम्हें यह पता चल जायेगा, निश्चित रूप से तुम स्वयं यह देख लोगे कि केवल छः महीनों में ही तुम्हारा चरित्र बेहतर (अधिक अच्छा ) बन चूका है. इसके बारे में कोई संदेह नहीं है.
यह कोई चमत्कार नहीं है कि -" तुम वैसा मनुष्य.... आदि आदि बनना चाहते हो. " को प्रतिदिन दो बार स्वयं को सुनाने से, या आत्म-सुझाव देने से- तुम्हारी इच्छाशक्ति अत्यन्त बलवान
हो जाएगी ! क्योंकि चमत्कार किसी की आज्ञा का पालन नहीं करते. किन्तु इस 'स्व-परामर्श' की प्रक्रिया को अपने दैनंदिन अभ्यास में उतार लेने से, यह अवश्य तुम्हारी आज्ञा का पालन करता है.  यह एक प्राकृतिक नियम है,एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है- जो कोई भी व्यक्ति इस प्रक्रिया को अपनाएगा, उसे कभी इससे भिन्न परिणाम नहीं प्राप्त हो सकता. यह केवल एक जैसा परिणाम उत्पन्न करेगी. यदि तुम इसके अनुसार कार्य करोगे, तो परिणाम में यह निश्चित रूप से तुम्हें प्रबल-इच्छाशक्ति सम्पन्न मनुष्य बना देगी.
उसके बाद जब तुम यह समझ लोगे कि किन-किन गुणों एवं आदतों को तुम्हें आत्मसात करना आवश्यक है, तब यदि तुम उन गुणों में सुधार करते जाओ, तथा उन्हें जोड़ते चले जाओ, तो बिल्कुल स्वाभाविक रूप से, गणित के नियम के अनुसार (जैसे २ X २ = ४ ही होता है.) तुम एक अच्छे चरित्र के अधिकारी मनुष्य बन जाओगे. अच्छे चरित्र का अधिकारी मनुष्य बनाने समर्थ, इस ' दृढ संकल्प अर्जित करने के सूत्र ' को अपने हाथ से एक कागज पर उतार लो, उसपर हस्ताक्षर करो तथा तिथि भी अंकित कर दो; उसके बाद तुम्हें इसीके अनुरूप आचरण करना होगा.
इसे प्रतिदिन कई बार ध्यानपूर्वक पढ़ो, तथा पूरी ईमानदारी के साथ वही करो, जैसा करने का वादा (वचन) तुमने स्वयं को दिया है. तुम स्वयं यह देख कर दंग रह जाओगे कि मात्र छः महीनों में ही तुम्हारा चरित्र कितना विकसित हो गया है ! तुम स्वयं इस बात को देख कर आश्चर्यचकित हो जाओगे, कि तुम्हारा आत्म-विश्वास कितना बढ़ गया है. यह कोई चमत्कार नहीं है, यह एक अमोघ-नियम (अस्त्र) है, जो कभी नाकाम नहीं हो सकता. यह उतना ही सत्य है, जितना कि सूर्य का पूर्व दिशा से उदय होना सत्य है.
चरित्र के २४ गुणों के विषय में लगातार चिन्तन करते रहो, तथा हर अवसर पर- विचार करने, बोलने या कर्म करते समय, इस प्रकार से करो कि, उन्हीं कार्यों को बार बार दोहराते रहने से, इन गुणों में से एक या एक से अधिक गुणों को आत्मसात करने में तुम्हें सहायता मिलती हो.
चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया बहुत सरल है, किन्तु यह तुमसे निरन्तर सतर्क-दृष्टि ((the capability of conscious choice and decision and intention) या विवेक-प्रयोग करने तथा एक अमोघ इच्छाशक्ति अर्जित करने की माँग भी करती है. ( क्योंकि  strong will make everything possible.)
  अपनी इच्छाशक्ति को दृढ अमोघ बनाने के लिए-किसी भी विचार में लिप्त होने के पहले, या कोई भी बात कहने से पहले, या कोई भी दैहिक क्रिया करने से पहले, चाहे वे कितनी भी नगण्य क्योंन प्रतीत होती हों, हर पल सावधान रहते हुए, किसी भी रूप में उन्हें पहचान लेने के लिए निरन्तर सतर्क-दृष्टि बनाये रखो, कि अपने विचार, कर्म या वाणी से तुम जैसा भी कर्म करने जा रहे हो, उसका तुम्हारे मन पर छाप कैसा पड़ेगा, उसके दूरगामी परिणामो का अनुमान लगा लो, कि क्या यह कृत्य करना मेरे लिए हितकर है, क्या इसके द्वारा मुझे चरित्र के एक या कई गुणों को विकसित करने में सहायता मिल सकती है ?
  अगर तुम इन सभी अवसर पर अपने विचारों, कृत्यों और वाणी को अपने नियंत्रण में रख सकते हो, तथा स्वयं को केवल उन्हीं चीजों को करने की अनुमति देते हो, आगे चल कर चरित्र विकास के लिए अनुकूल होगा, तो फिर प्रकृति के भीतर या बाहर ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो तुम्हें एक अच्छा चरित्र प्राप्त करने से रोक सकता हो.
अपना तथा समाज का कल्याण करने के लिए,अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग करने की सर्वोच्च दक्षता, तुम्हें ऐसा चरित्र ही प्रदान करता है.जीवन का वास्तविक स्वाद- अन्य लोग नहीं, केवल वही व्यक्ति ले पाता है, जिसने एक अच्छे चरित्र का निर्माण कर लिया हो. जो ऐसा सोचते हैं की चरित्र की कोई परवाह किये बिना ही, वे भी जीवन का आनन्द उठा रहे हैं, या रस भोग रहे हैं; वास्तव में वे अपने बहुमूल्य मानव जीवन को केवल नष्ट कर रहे होते हैं." अली-मृग-मीन-पतंग-गज जरै एक ही आँच, तुलसी वे कैसे जियें जिन्हें जरावे पाँच ?? "
                                                (१५)चरित्र ही समाधान है !
                                             (Character is the Answer )
जब श्रीरामकृष्ण का निधन हो गया, तब उनके युवा शिष्यों का मानो आश्रय ही छीन गया. उनके सामने कोई निश्चित और सामान्य उद्देश्य नहीं था. ऐसी विषम परिस्थिति में स्वामी विवेकानन्द ने उन सबों को संघ-बद्ध किया तथा दो महान आदर्श- ' अपनी मुक्ति ' एवं ' जगत का कल्याण ' को उनके समक्ष प्रस्तुत किया. उन्होंने उन सबके मन को भारत के राष्ट्रिय आदर्श -' त्याग और सेवा ' के भाव से परिपूर्ण कर दिया.
स्वामीजी ने हिमालय से कन्याकुमारी तक तथा सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक, सम्पूर्ण भारतवर्ष का परिभ्रमण किया था. भारत के विभिन्न स्तरों पर रहने वाले- शिक्षित, धनी, राजे-महाराजे, मूर्खों-दरिद्रों, क्षुधा-पीड़ितों, नीचजाति कहाने वालों- हर तबके के मनुष्यों से, वे मिले थे तथा उनका नजदीकी परिचय प्राप्त किया था.
उनहोंने उन दरिद्र लोगों की दुर्दशा के कारणों का गहराई से अध्यन किया था, जो अभिजात्य-वर्ग के लोगों द्वारा सदियों से शोषित होते चले आ रहे थे. तथा वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन का एकमात्र कारण- अज्ञानता या अशिक्षा ही है. उन्होंने इस बात को अपने हृदय से महसूस किया था, कि भारत की साधारण जनता जो झोपड़ियों में निवास करती है, उनके लिए सर्वप्रथम, भोजन-शिक्षा एवं चिकित्सा आदि का प्रबंध होना नितान्त आवश्यक है.
आज भी, आजादी के ६५ वर्ष गुजर जाने के बाद भी-हमलोग देखते हैं कि साधारण जनता की मूल आवश्यकताएँ उसी तरह बनी हुई हैं. जबकि सरकार तथा दूसरे संगठनों के द्वारा अरबों-खरबों रुपये खर्च किये जा चुके हैं.फिर भी साधारण जनता की दैनीय अवस्था में कोई बहुत ज्यादा अन्तर नहीं दीखता है.
 आज भी उचित चिकत्सा नहीं मिल पाने के कारण कितने ही गरीब लोग अकाल ही मृत्यु के गाल में चले जाते हैं.आये दिन समाचार पत्रों में देखने को मिलता है, ' देश के अमुक क्षेत्र में कोई ' पुल ' टूट गया या किसी स्कुल-भवन का छत धंस गया, जिसमें दब कर कई कीमती जानें चली गयीं. ' ऐसा क्यों होते रहना चाहिए ? क्या हमारे पास एक अच्छा पुल,स्कुल-बिल्डिंग, या अस्पताल, सड़क आदि का निर्माण करने में कुशल कारीगरों, इंजीनयरों या डाक्टरों की कमी है ? निश्चित तौर से यह बात नहीं है.
इसकी सारी जिम्मेदारी उन लोगों पर जाती है, जो इन कार्यों में संलग्न रहते हैं. यदि उपयुक्त शब्दावली का प्रयोग करते हुए कहा जाय, तो उनका चरित्र एवं शिक्षा ही इस बात के लिए पूरी तौर से जिम्मेदार है. उसी समान तरीके से, जब कोई व्यापारी, क्लर्क, उद्योगपति या शिक्षक, डाक्टर या कम्पौंडर, या जो कोई भी व्यक्ति, यदि अपना चरित्र-निर्माण किये बिना ही, किसी सरकारी-बेसरकारी स्तर से समाज-कल्याण या देश-निर्माण की योजनाओं में संलग्न हो जाता है, वैसे ही भ्रष्टाचार पनपने लगता है.
और भ्रष्टाचार के कारण ही समस्त समस्यायों का जन्म होता है. आज के मानव समाज में ' चरित्र का आभाव ' तो मानो एक सार्वभौमिक घटना बन चुकी है. जो अपने पेशे में कर्तव्यपरायण नहीं हों, या अपने निजी जीवन में कड़ी मेहनत करने वाले, दक्ष, नैतिक रूप से उत्तरदायी (जवाबदेह), और ईमानदार व्यक्ति न हों, तो वैसे मनुष्यों के बल पर, देश के विकास दर को हासिल करना कभी संभव नहीं होगा.
 चाहे कोई व्यापारी हो, या कोई इंजीनियर, या डॉक्टर, या एक शिक्षक हो, (वोट देने वाली खुशहाल जनता हो या चुनाव जीतने वाले खुशहाल-जनप्रतिनिधि हों,) सभी लोगों को-' हड़पने और धोखा देने ' की आदत को त्याग कर अपने-अपने पेशे के प्रति ईमानदार होना होगा; और उन सबों को जिम्मेदारी से काम करने के लिए, सर्वप्रथम एक अच्छे चरित्र का अधिकारी मनुष्य बनना ही पड़ेगा.
जो छात्र एक प्रोफेसनल डिग्री पाना चाहता है,या सिविल सर्विस में जाना चाहता है, उसके उपर भारत की गरीब जनता की गाढ़ी कमाई पर टैक्स के रूप में सरकार द्वारा एकत्रित बहुत सा पैसा खर्च करना पड़ता है. किन्तु, आजकल शिक्षित हो जाने के बाद, वह एक देश-भक्त नागरिक बनने के बदले एक अहंकारी व्यक्ति बन जाता है !
और उसका दृष्टिकोण सहानुभूति, शालीनता, तथा सेवापरायणता के विपरीत हो जाता है. वह अब एक आरामदायक जीवन का रसास्वादन करने की योजना बनाने में ही लिप्त रहना चाहता है. अब वह अपने देशवासियों की दुःख-दुर्दशा के बारे सोचने की भी जहमत नहीं उठता, और न ही उन लोगों के प्रति अपने कर्तव्य का ही पालन करता है, जिनके खर्च पर उसने इस पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त किया है. ऐसा करना, और बेईमानी के रस्ते पर चल पर अधिक से अधिक धन-दौलत बटोरने में लगे रहना तथा देश की सेवा सही ढंग नहीं करना,बिल्कुल अनैतिक, अमानवीय, स्वार्थी, गैर जिम्मेदाराना कार्य है.
 भारत के राष्ट्रिय आदर्श हैं ' त्याग और सेवा ' किन्तु उसके बदले अभी हमारे जीवन में ' भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता ' रूपी कठपुतली-युगल का कैसा खेल चल रहा है ! स्वाधीनता प्राप्त करने से पहले, हमलोगों का एक लक्ष्य था- ' स्वराज '- जिसे प्राप्त करने के लिए हमलोगों ने एक मन-प्राण होकर संघर्ष किया था.यह एक ऐसा जनआन्दोलन था जिसका नेतृत्व चरित्रवान और शिक्षित लोग कर रहे थे.लेकिन वर्तमान समय में, जो लोग देश-सेवा में लगें हैं, जन-सेवा के कार्य में संलग्न हैं, वे पश्चमी सभ्यता के भोगवादी बहाव में अपने अपने अभिप्राय को शीघ्र पूरा करने की अधीरता के साथ कार्य करते हैं. दृढ संकल्प, एवं चारित्रिक गुणों की न्यूनता के कारण वे भारत के पुनर्निर्माण के उद्देश्य को अपने जीवन का ध्रुव तारा बना कर, उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उत्साह पूर्वक कार्य का प्रारम्भ करने का उनमें साहस ही नहीं है.
राष्ट्र-निर्माण कैसे हो सकता है ?
सभी समस्याओं का समाधान करने के लिए, देश वासियों का सुंदर चरित्र गढ़ना ही एकमात्र रामबाण औषधि है. यदि हम देश को बचाना चाहते हैं, तो हमें अवश्य ही अपने देश के लोगों के चरित्र का निर्माण करना होगा। अन्यथा देश उन्नति नहीं कर सकता। इसीलिये हमारे राष्ट्रिय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, ' समाज का पथ-प्रदर्शक ' या ' क्रान्ति का अग्रदूत ' के रूप में आगे आगे चलने वाले, उज्ज्वल-चरित्र संपन्न युवाओं के जीवन को गठित करने के कार्य को प्राथमिकता देनी होगी. केवल तभी, विकास को देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा देने की आतुरता रखने के लिए प्रत्येक देशवासी को अनुप्रेरित करने में समर्थ ' नेता ' (पथ-प्रदर्शक) का निर्माण संभव होगा.ऐसा (क्रान्ति का अग्रदूत बनो और बनाओ का) वातावरण ही, स्वामी विवेकानन्द के सपनों का भारत के अनुरूप भारत की साधारण जनता का उत्थान करने के लिए हमें अनुप्रेरित करता रहेगा. इसीलिए राष्ट्रिय जीवन के समस्त स्तरों (System) में नियोजित सम्पूर्ण जन-बल (Work-Force) को, उज्ज्वल चरित्र तथा व्यक्तित्व से संपन्न 'मनुष्यों' का निर्माण करने में समर्थ मानव-जाति के सच्चे नेताओं (पथ-प्रदर्शक गुरु या शिक्षक,या) ' क्रान्ति के अग्रदूतों ' से भर देना होगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?
 हमारी वर्तमान शिक्षा-पद्धति को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर उसे नए साँचे में ढाल देना ही, इसका (भारत के पुनर्निर्माण का) पहला कदम है. हमें एक ऐसी शिक्षा-प्रणाली की आवश्यकता है, जो चरित्र निर्माण तथा व्यक्तित्व विकास की गति को निर्धारित करने में सक्षम हो. किन्तु यह एक सच्चाई है (चाहे जिस कारण से हो ) कि हमलोग अपनी शिक्षा-प्रणाली में परिवर्तन लाने की मनोदशा में ही नहीं हैं, इसके लिए कत्तई तैयार नहीं हैं. " स्वाधीन भारत की शिक्षा-नीति " में नाम के अनुरूप, आज तक कोई परिवर्तन नहीं आ सका है; और न ही इस मुद्दे के विषय में किसी को कोई चिन्ता ही है. इसीलिए यह आवश्यक है कि छात्रों और युवाओं को संगठित कर, उनकी शिक्षा को (वर्तमान प्रणाली के) बाहर से परिपूर्ण कर दिया जाय, इससे ही उनका अत्यधिक भला हो सकेगा.
 किन्तु कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग ऐसा विचार रखते हैं कि पहले एक नई सरकार को सत्ता में लाना चाहिए, जो प्रचलित नीतियों में परिवर्तन ला सकती हो. कल्पना कीजिये कि जो सरकार अभी सत्ता में है, उसको किसी उपाय से हमलोगों ने रातो-रात बदल दिया; तो उसके बाद क्या होगा ?
वैसे व्यक्ति कहाँ से आयेंगे- जो उज्ज्वल-चरित्र के अधिकारी होने के साथ साथ, साधारण जनता के दुःख-दर्द को अपने हृदय में महसूस कर, उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रशासन-व्यवस्था को पूरी दक्षता के साथ संचालित करने में कुशल भी हों ? यदि सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसे मनुष्य हों ही नहीं, तो सत्ता-परिवर्तन होने के बाद ( अपने अपने जाती के लोगों को उच्च पदों पर ट्रान्सफर-पोस्टिंग का खेल तो चलता रहेगा किन्तु), हमें चरित्रहीन,समर्पण-भाव से रहित- सत्ता के उन्हीं पुराने दलालों के कारनामों ( घोटाला-कालाधन आदि) की पुनरावृत्ति देखने को मिलेगी, जिनका दुष्परिणाम हमलोग अभी तक भुगतते आ रहे हैं.
इसीलिए राष्ट्रिय जीवन के प्रत्येक स्तर पर, यथार्थ मनुष्य ( पूंछ-सिंघ रहित पशु-मानव नहीं) चाहिए, तो हमलोगों को ' चरित्र-निर्माण आन्दोलन ' को भारत के गाँव-गाँव तक फैला देने के कार्य में जुट जाना होगा. आप यह प्रश्न कर सकते हैं, कि इस दिशा में थोड़ी भी प्रगति करने में कितने वर्ष लग जायेंगे ? इसके जवाब में कहना पड़ेगा, कि फिर क्या हमें किसी ' सर्वनाश का दिन ' (Dooms-day) आने की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ रखे बैठे रहना चाहिए ?
यहाँ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए, कि एक हजार वर्षों से भी अधिक समय तक हमलोगों ने विदेशी शासकों की गुलामी के कष्ट को झेला है, और विगत ६४ वर्षों से कुम्भकर्णी निद्रा में सोये पड़े हैं. तो अभी इतनी जल्दी क्यों पड़ी है ? अपने समस्त पददलित, शोषित-पीड़ित भाइयों को साथ, यथार्थ विकास और समृद्धि के मार्ग पर जनसाधारण को आरूढ़ करने वाले नये भारत को उभर कर विश्व-रंगमंच के सामने आना है, तो हमें इस कार्य के लिए उसे अपेक्षित समय लेने की अनुमति भी देनी चाहिए. किसी महान कार्य में सिद्धि प्राप्त करने का कोई संक्षिप्त रास्ता नहीं होता.

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{" शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य है, सच्चरित्र मनुष्य का निर्माण. वैसा ' मनुष्य ' बनो जो अपना प्रभाव सब पर डालता है. जो अपने संगियों के उपर मानो जादू सा कर देता है, जो इच्छाशक्ति का एक महान केंद्र (Dynamo) है, और जब ऐसा मनुष्य तैयार हो जाता है, वह जो चाहे कर सकता है...महान धर्माचार्यों या पैगम्बरों (बुद्धदेव,ईसामसीह, मोहम्मद, नानक,श्रीरामकृष्ण आदि) के जीवन को देखो, उन्होंने अपने जीवन-काल में ही सारे देश को झकझोर कर रख दिया था...उन महापुरुषों में ऐसा क्या था कि शताब्दियों के बाद भी लोग उनके बताये रस्ते पर चलने की बातें करते हैं ? उनका वैसा सुंदर चरित्र और व्यक्तित्व ही था जिसने यह अन्तर पैदा किया " (४/१७२) इसीलिए ' स्वाधीन भारत की राष्ट्रिय शिक्षा-नीति ' ऐसी हो जिससे " Be and Make " आन्दोलन को भारत के गाँव-गाँव तक फैलाया जा सके }
' दृढ संकल्प अर्जित करने का सूत्र : आत्म-सुझाव या " स्व-परामर्श सूत्र "
                                  ' चमत्कार जो आपकी आज्ञा का पालन करेगा '
" मैं पूरी दृढ़ता के साथ संकल्प लेता हूँ कि मैं एक चरित्रवान मनुष्य बनूंगा, क्योंकि केवल इसी प्रकार मैं जगत का सर्वाधिक कल्याण करने में सक्षम हो सकता हूँ। मेरा सुन्दर चरित्र ही एक सुन्दर-समाज का निर्माण कर मेरी प्रिय मातृभूमि भारत को सुन्दर और महान बनाने में मेरी सहायता करेगा। मैं जानता हूँ कि चरित्रवान मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता होता है, अतः इसी चरित्रबल से मैं अपना भी सर्वाधिक कल्याण कर पाउँगा। चरित्र ही धर्म है, इसलिये  चरित्रबल (श्रद्धा-निर्भीकता-निःस्वार्थपरता -त्याग और सेवा) के बिना लौकिक उन्नति अथवा आध्यात्मिक उन्नति के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना सम्भव नहीं है। 
" क्योंकि स्वामी विवेकानन्द अपनी शिक्षाओं की प्रतिमूर्ति हैं, इसीलिये  'विवेक-दर्शन' का अभ्यास करने से  'विवेक-स्रोत' उद्घाटित हो जाता है। विवेक-दर्शन का अभ्यास करने से हमारा आत्मविश्वास  इतना प्रबल हो जाता है कि हम जब चाहें, वैराग्य का फाटक लगाकर मन के इच्छाशक्ति के प्रवाह की दिशा को निरन्तर एकाग्र (अंतर्मुखी या उर्ध्वगामी) बनाये रखने में समर्थ मनुष्य बन जाते हैं ! मैं प्रति दिन उनके चित्र पर अपने मन को इस तरह एकाग्र करने का अभ्यास करूँगा कि उनका जीवन्त स्वरुप मेरे चित्त की गहरी परतों में बस जाये।"
" मैं जानता हूँ कि मैं स्वयं को एक चरित्रवान मनुष्य के साँचे में ढाल सकता हूँ। इसी लिये इस उद्देश्य को सिद्ध करने के मार्ग में आने वाले किसी भी बाधा या विघ्न को कभी प्रश्रय नहीं दूंगा; तथा धैर्य और अध्यवसाय के साथ बिना आलस्य किये इस उद्देश्य के सिद्ध हो जाने तक निरन्तर प्रयत्न करता रहूँगा। मैं अवश्य सफल होऊंगा, क्योंकि मैं उस अनन्त शक्ति के प्रति अटूट विश्वास रखता हूँ जो मुझमें अन्तर्निहित है।"


दिनांक/    हस्ताक्षर                                                                   
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उपर्युक्त पंक्तियों को कागज के एक पृष्ठ पर लिखिए, हस्ताक्षर कीजिये, पढ़िये एवं तिथि अंकित कीजिये. इन्हें एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन कई बार पढ़िये और वही कीजिये जो आपने निष्ठापूर्वक करने की प्रतिज्ञा की है. आप देखेंगे कि छः महीनों में ही आपका चरित्र कितना उन्नत हो चूका है, तथा आपका आत्म-विश्वास पहले कितना अधिक बढ़ गया है ! जिस प्रकार सूर्य का पूर्व दिशा में उदय होने में कोई सन्देह नहीं है, उसी प्रकार इस प्रक्रिया के सफल होने में भी कोई सन्देह नहीं है- परीक्षा करने से आप स्वयं इसकी सत्यता का अनुभव करेंगे.यह वास्तव में कोई चमत्कार नहीं है. यह एक ऐसा प्राकृतिक नियम है जो किसी निष्ठावान सेवक के समान  आपकी आज्ञा का पालन करता है

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ॐ – पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
  ' किसी प्रकार की कमी शेष न रहे, अर्थात पूर्णता का अनुभव करना यही मानव-जीवन की पराकाष्ठा है।'
 (अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल, खरदह, २४ परगना ( पश्चिम बंगाल ) द्वारा प्रकाशित )

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आत्म-समीक्षा तालिका
श्री ----------------------------------------------------------
केवल तुम्हारा चरित्र-बल ही तुम्हें अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता प्रदान करता है. क्या तुम्हें अपना निश्चित जीवन-लक्ष्य ज्ञात है ? यदि नहीं, तो इसी समय अपना एक निश्चित जीवन-लक्ष्य निर्धारित कर लो और यहाँ नीचे लिखो. यदि अपने अन्तर्निहित विवेक-शक्ति का प्रयोग करते हुए निम्न लिखित गुणों को जीवन में धारण कर लोगे तो तुम एक चरित्रवान मनुष्य बन सकोगे.
" मेरा निश्चित जीवन लक्ष्य है-----------------------------------"   
चरित्र के गुण
१. आत्म-श्रद्धा
२. आत्म-विश्वास
३. सच्चाई
४. स्पष्ट-विचारण
५. साहस
६. संकल्प
७. ईमानदारी
८. निष्कपटता
९. उद्दम
१०. अध्यवसाय
११. साधन-सम्पन्नता
१२. सहन-शीलता
१३. भद्रता
१४. सहानुभूति
१५. विश्वसनीयता
१६. आत्म-संयम
१७.आत्म-निर्भरता
१८. धैर्य
१९. सेवा परायणता
२०.संतुलन
२१. निःस्वार्थपरता
२२. अनुशासन की भावना
२३. स्वच्छता
२४. सामान्य बुद्धि

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प्रत्येक निश्चित अन्तराल के बाद आत्म-समीक्षा करो और उपरोक्त गुणों के सामने जो तुम अपनाने योग्य समझते हो, एक " श्रेणीकरण चिन्ह " या मानांक लगाओ. ८० % व अधिक के लिये -  ' A '/ ७० % व अधिक के लिये -' B'/ ६० % व अधिक के लिये -  ' C  '/ ५० % व अधिक के लिये - ' D / ४०% से कम के लिये - ' E '
हर एक गुण के मानांक को क्रमशः बढ़ाते जाओ तथा आगे के मार्गदर्शन हेतु महामण्डल के सम्पर्क में रहो.
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 स्मरण रखो कि इनमें से प्रत्येक गुण तुम्हारे लिये आवश्यक है, एवं केवल तुम स्वयं अपने संकल्प और चेष्टा से ही इन गुणों को बढ़ा सकते हो. इन गुणों पर चिन्तन करो और प्रतिदिन कोई भी कार्य या व्यव्हार करते समय विवेक का प्रयोग करके इस प्रकार करो, जिससे इन गुणों में से कोई एक या एकाधिक गुण को बढ़ाने में सहायता मिलती हो.
विवेक-प्रयोग का अभ्यास जिस प्रकार सर्वदा सभी अवस्था में करोगे, उसी प्रकार प्रतिदिन/ प्रतिसप्ताह/१५ दिन बाद या महीने में एक बार आत्म-समीक्षा भी करो कि तुमने कौन से गुण को कितना अर्जित किया है; फिर उसको तालिका में अंकित कर दो. ऐसा करते रहने से तुम देखोगे, कि कुछ महीनों में ही तुमने चरित्र-निर्माण में कितनी उत्तम प्रगति कर ली है !
इस प्रयक्ष-प्रमाण को देखने से तुमको एक ऐसे अपूर्व आनन्द का अनुभव होगा, जो तुम्हें आत्म-विकास में निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिये अदमनीय उत्साह और उर्जा से भरपूर कर देगा.
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मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः | परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यम्           निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः ||8||-भर्तृहरिः
कुछ सन्त ऐसे भी देखे जाते हैं, जिनका मन वचन और कर्म पुण्यरूप अमृत से परिपूर्ण हैं और जो विभिन्न उपकारों के द्वारा त्रिभुवन के प्रति प्रेम वितरण करते हुए, दूसरों के परमाणु तुल्य गुण  अर्थात अत्यन्त स्वल्प राई जितने गुण को भी पर्वतप्रमाण बढ़ाकर अपने हृदयों का विस्तार करने की साधना में रत रहते हैं ! (४/३०५)

 

( अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल, खरदह, २४ परगना, (पश्चिम बंगाल ) द्वारा प्रसारित 
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