Thursday, September 1, 2011

15." ज्ञान-भक्ति और कर्म के मूर्तमान प्रतिक " (प्रचारक अभेदानन्द - १७)

15.ज्ञान-भक्ति और कर्म के मूर्तमान प्रतीक अभेदानन्द 
' सभी लड़कों में तुम बुद्धिमान हो. नरेन के बाद तुम्हारी ही बुद्धि का स्थान है. जिस प्रकार नरेन कोई मत चला सकता है, तुम भी वैसा कर सकोगे. ' - यह बात १८८६ ई० में श्री रामकृष्ण ने अपने अंतरंग लीला-पार्षद अभेदानन्दजी से एकांत में कही थी. उस समय स्वामी अभेदानन्द,कालीप्रसाद उर्फ काली के नाम से जाने जाते थे, तथा काशीपुर उद्द्यान-बाड़ी में बीमार श्रीरामकृष्ण की सेवा करते थे, किन्तु मौका मिलते ही, पुनः शास्त्र अध्यन में डूब जाते थे.
 यहाँ शास्त्र-अध्यन से तात्पर्य केवल धर्म, दर्शन, एवं न्ययशास्त्र ही नहीं है, बल्कि पाश्चात्य विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, जौन स्टुअर्ट का तर्कशास्त्र, लुईस के दर्शन का इतिहास, हैमिल्टन के दर्शन के साथ कुमारसंभव, श्रीमदभगवतगीता, शिव संहिता, पतंजल योग दर्शन, आदि ग्रन्थों को कालीप्रसाद गहन रात्रि  तक बहुत ध्यान से पढ़ा करते थे. एकदिन रात्रि में श्रीरामकृष्ण की चरण-सेवा करते हुए, अंग्रेज दार्शनिक मिल का तर्कशास्त्र पढ़ रहे थे. इतने ध्यान से शास्त्र-अध्यन करने की निष्ठा को देख कर श्रीरामकृष्ण को उत्सुकता हुई, उन्होंने पूछा - ' क्यूँ रे, तूँ अभी कौन सी पुस्तक पढ़ रहा है ?'
  कालीमहाराज बोले- ' अँग्रेज़ी का न्यायशास्त्र. श्रीरामकृष्ण ने पूछा- ' उसमें कौन सी बात सिखाई जाती है ? ' इसमें ईश्वर के अस्तित्व के प्रमाण के बारे में तर्क, दलील, एवं वाद-विवाद करना सिखाया जाता है.थोड़ा हंसते हुए श्री रामकृष्ण बोले- " केवल इतना ही, लेकिन देखता हूँ कि तुम बाकि लड़कों में भी ग्रंथों को पढ़ने का शौक जगा रहे हो. पर एक बात जानते हो, किताबी-ज्ञान से ज्यादा कुछ लाभ नहीं होता. भगवान को जानने के लिए, पुस्तकीय ज्ञान की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती. पर हाँ, दूसरों को समझाने के लिए पुस्तकीय विद्या की आवश्यकता होती है. अपना दृढ विश्वास तो संबल के रूप में अपने पास रहता ही है, पर दूसरों को विश्वास कराने में युक्ति-तर्क के अस्त्र-श्स्त्र का सहारा लेना पड़ता है. खुद को तो एक नरहणी से भी मारा जा सकता है, किन्तु दूसरों को मारने के लिए ढाल, तलवार आदि अस्त्र-श्स्त्र के बिना नहीं मार सकते. यह पुस्तकीय ज्ञान इसीलिए प्राप्त किया जाता है. जो लोग लोकशिक्षा देंगे उनके लिए  ग्रंथों का अध्यन करना ज़रूरी  है. "
 श्रीरामकृष्ण परमहंस (परम सद्गुरु ) कभी किसी के भाव को नष्ट नहीं करते थे, किन्तु उसका जो भाव पहले से हो, वह भाव उसके भीतर और अधिक प्रखर हो उठे, उस विषय में वे सदा सतर्क रहते थे. अंतर्यामी श्रीरामकृष्ण ने उस दिन देख लिया था, कि एक दिन स्वामी अभेदानन्द को 
एक ' सर्वशास्त्र-विशारद-लोकशिक्षक ' के रूप में विश्व के रंगमंच पर खड़ा होना होगा. 
  इसीलिए श्रीरामकृष्ण ने उनके शास्त्र-अध्यन में बाधा नहीं देकर उनको उत्साहित, एवं और अधिक गहराई से अध्यन करने को अनुप्रेरित किया था. संशय के बदले उनमें विश्वास भर उठा, तथा आशीर्वाद की शक्ति से उनके उद्यम-शीलता दोगुनी बढ़ गयी. मान-प्राण ईश्वरीय शक्ति से भरपूर हो गया. अभेदानन्द आत्मशक्ति से भर कर अपराजेय हो उठे. अब उनके साथ तर्क-विचार करके कोई उनको हरा नहीं पाता था.  इसके लिए श्रीरामकृष्ण ने भी कभी असंतोष नही प्रकट किया, और इसीप्रकार अभेदानंद का जीवन स्नेहमय पिता तुल्य परमहंसदेव की असीम करुणा से समृद्ध होता चला गया.
        फलस्वरूप पुनः एक नयी पुस्तक- ' अष्टवक्र-संहिता ' को पढ़ना आरंभ कर दिए. अब उनके मन में अद्वैत वेदान्त मत का केवल ' नेति-नेति ' विचार उठने लगा. इसप्रकार तर्क-युक्ति पूर्ण विचार रूपी तीक्ष्ण धार से अन्य सारे मत खंडित हो जाते है. इतना ही नहीं जन्मजात-विश्वास को भी अब तर्क-युक्ति रूपी कसौटी पर कस कर देख लेने के बाद ही स्वीकार करने का मनोभाव हो जाता है. और अब उस मन में अन्धविश्वास के लिए कोई भी स्थान नहीं रह जाता. इसी अवस्था में शास्त्र-उद्धरनों की सहयता से अभेदानन्दजी ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में विभिन्न प्रकार के ढेर सारे अकाट्य युक्ति-तर्क को ढूढ़ निकालते थे.
उनके अद्वैत वेदान्त के नेति -नेति विचार के सामने सभी परास्त हो गये. जब सबों का मत खंडित हो गया, तो सभी लोग दौड़े सर्वमताधीश श्रीरामकृष्ण के पास, तथा बूढ़ेगोपाल ने स्वामी अभेदानन्द के विरुद्ध श्री रामकृष्ण से अभियोग लगाया कि ' महाशय, काली कुछ भी नहीं मानता, बिल्कुल नास्तिक हो गया है. ' इस अभियोग को सुन कर श्रीरामकृष्ण कुछ कहे नहीं, केवल थोड़ा हंस दिए. क्योंकि वे तो अंतर्यामी थे, सबकुछ जानते थे.
इसके बाद पुनः एक दिन श्रीरामकृष्ण की सेवा करने गये हैं, कमरे में कालीमहाराज को अकेले देख कर श्रीश्रीठाकुर ने पूछा- ' हाँ रे, सुनता हूँ कि आजकल तूँ नास्तिक हो गया है.' 
 काली महाराज कोई उत्तर न देकर चुपचाप एक किनारे खड़े रहे. यह देख कर श्रीरामकृष्ण ने पुनः प्रश्न 
 किया- ' क्या तूँ ईश्वर को मानता है ? क्या शास्त्र पर विश्वास करता है ? ' इस बार उनके सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर मिला- ' नहीं '.
    शिष्य के इस उत्तर को सुन कर श्री रामकृष्ण स्तंभित हुए और एक वाक्य-बाण  छोड़े - ' यदि तुम किसी दूसरे साधु से इस प्रकार कहते, तो वे तुम्हारे गाल पर एक थप्पड़ लगा देते.' तार्किकतावादी अभेदानन्द ने पुनः स्पष्ट कहा- ' आप भी मारिए, किन्तु जब तक मैं यह ठीक ठीक नही साँझ लेता कि ईश्वर हैं, एवं वेद सत्य है, तब तक इन सब अंधविश्वास के ऊपर विश्वास कर, इन्हें सत्य क्यूँ मान लूँ? आप मुझे समझा दीजिए, और मेरे ज्ञान नेत्रों को खोल दीजिए, तब मैं सबकुछ मान लूँगा.' 
        अभेदानन्दजी अंधविश्वास से कभी दिग्भ्रमित नहीं होते थे. युक्ति-तर्क से जाँच-परख करने के बाद ही उन्होंने श्रीरामकृष्ण को भी गुरु रूप में स्वीकार किया था. अनुभूति के प्रकाश में अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि के आधार पर ही उनको अपना गुरु माना था. इसीलिए श्रीरामकृष्ण थोड़ा भी क्रुद्ध नहीं हुए थे. बल्कि प्रसन्न ही हुए थे, एवम् हंसते हुए कहा था- ' एकदिन तुम सब जान जाओगे, और सब कुछ मानने लगोगे. देखो न, इसी तरह नरेन भी पहले कुछ नहीं मानता था, किन्तु आजकल ' राधे राधे ' कह कर रोता है, और कीर्तन में नृत्य करता है. इसके बाद से तुम भी सब कुछ मानने लग जाओगे. '
    अभेदानन्दजी छोड़ने वाले नहीं थे, केवल बातों से नहीं गुरुकृपा के प्रमाण को भी साथ ही साथ मिला कर देख लेना चाहते हैं. क्योंकि उनका हृदय तो व्याकुल होकर प्रार्थना कर रहा है-
' अज्ञानतिमिरन्धस्य ज्ञानंजनश्लाकया चक्षुरुउन्मिलितम एन तस्मै श्री गुरुवै  नमः'
 - ज्ञान अंजन प्रदान कर मेरे नेत्रों को खोल दीजिए, मुझको दिखला दीजिए. और जब मैं जान जाऊंगा तो फिर सबकुछ मानूँगा, वरना कुछ नहीं मानूँगा. आन्तरिकतता के साथ कालीमहाराज ने यही निवेदन किया. करुणामय श्री रामकृष्ण ने उनके प्राणों की भूख व्याकुलता और सरलता को हृदय से अनुभव किए एवं, अपने दिव्य-स्पर्श से धीरे धीरे उपलब्धि के समस्त द्वार को खोल दिए.  
श्रीरामकृष्ण की कृपा से अभेदानन्दजी अनुभूति के चरम शिखर पर पहुँच गये थे, इस बात को अपनी आत्मजीवनी में उन्होंने इस प्रकार लिखा है- " एक दिन गहन रात्रि में ध्यानस्थ अवस्था में बाह्यज्ञानशून्य हो गया, और मेरी आत्मा मानो शरीर रूपी पिंजड़े से बाहर निकल कर शून्य आकाश में मुक्त पंछी की तरह उड़ान भरने लगी. क्रमशः वह उपर उठती हुई, अनन्त की ओर उड़ने लगी.तब मैं अपूर्व दृश्य देखते देखते एक सुंदर सुशोभित राजमहल जैसे किसी सुरम्य स्थान में जा पहुँचा. ...उसी अपूर्व सुंदर दृश्य को देख ही रहा था, कि ठीक उसी समय परमहंसदेव की मूर्ति ज्योतिर्मय होकर विराट आकर में परिणत हो गयी, एवं उनके भीतर समस्त देवी-देवता, अधिकारिक पुरुष, श्रीकृष्ण,ज़राथ्रूष्ट, नानक, श्रीचैतन्य महाप्रभु, शंकराचार्य आदि अपने अपने आसनसे उठ कर परमहंसदेव के विराट शरीर में प्रविष्ट होने लगे. 
 उस समय इस अपूर्व दर्शन का यथार्थ कोई मर्म नहीं समझ सकने के कारण मैं तेज़ी से दौड़ता हुआ परमहंसदेव के पास उपस्थित हुआ, और उनसे सारी बातों को कह सुनाया. परमहंसदेव ने सुन कर कहा- ' तुम्हें वैकुंठ का दर्शन मिल गया है. इसबार तुम देवी-देवताओं के दर्शन की चरम सीमा तक जा पहुँचे हो. अब तुम्हारे लिए और कुछ दर्शन करना बाकी नहीं रह गया है. यहाँ से तुम अब अरूप और निराकार के स्तर में उठ गये हो. "
वाराहनगर मठ में रहते समय स्वामी अभेदानन्दजी गंभीर जप-ध्यान में डूबे रहते थे. और मौका मिलते ही, वेदान्त दर्शन के अद्वैतवाद को लेकर विचार करते रहते थे. वे वेदान्त-मत के समर्थक थे, इसीलिए उनका
नाम ' काली-वेदान्ती ' पड़ गया था; एवं दिनरात एक छोटे से कमरे में बैठ कर तपस्या भी करते रहते थे, इसीलिए उनको ' काली-तपस्वी ' भी नाम मिला था. इसी समय (१२९५ बांगाब्द में) स्वामी अभेदानन्दजी ने अनुष्टप छ्न्द में पहली बार ' श्रीरामकृष्णस्त्रोत्रम ' की रचना की थी. उस स्त्रोत्र में कहा है-
 ' लोकनाथ-श्चिदाकारो राजमानः स्वधामनी '... इत्यादि. 
   वाराहनगर मठ में संध्या-आरती के उपरान्त समवेत कंठ से इसी स्त्रोत्र का पाठ किया जाता था. तथा जिस स्त्रोत्र के माध्यम उन्होने श्रीश्रीमाँ सारदादेवी को परिष्कृत रूप में वर्णन किया था वह है-
' प्रकृतिं  परमामभयां वरदां नररूपधरां जनतापहराम '...इत्यादि.
 इस स्त्रोत्र को स्वयम् पाठ करके श्रीश्रीमाँ को सुनाया था. एवं इसे सुन कर श्रीश्री माँ आनन्दके वेग से आप्लुत होकर स्वामी अभेदानन्दजी को आशीर्वाद दीं थीं- ' तुम्हारे मुख में सरस्वती बैठ जाएँ '. इसी समय श्रीश्रीमाँ ने उनको आशीर्वाद स्वरूप एक जप करने की माला भी दी थीं.   
स्वामी अभेदानन्दजी एक ही आधार में तपस्वी और कर्मयोगी थे. स्वामीजी के आह्वान पर वेदान्त का प्रचार करने के लिए वे भी पाश्चात्य देशों में गये थे, तथा २५ वर्षों तक ( १८९६ से १९२१ तक ) अथक परिश्रम करके, स्वामीजी द्वारा प्रतिष्ठित वेदान्त-' बीज ' को सफलतापूर्वक विशाल ' वृक्ष ' में परिणत कर दिए थे
स्वामी अभेदानन्दजी असाधारण वक्ता थे. स्वयम् स्वामीजी उनकी प्रथम वक्तृता को सुन कर आनन्द से भर उठे थे, एवं अभिभूत होकर सभामंच से ही घोषणा किए थे-
 " Even if I perish out of this plane, my message will be sounded 
  through these dear lips and the World will hear it. "
          और सचमुच ही उनके भीतर ' त्रिवेणी- संगम ' हुआ था, पाश्चात्य जगत के समक्ष स्वामी अभेदानन्दजी  स्वामीजी के संदेशवाहक रूप में आविर्भूत हुए थे. वे कहते थे- ' मेरे भीतर ठाकुर-माँ- स्वामीजी की शक्ति खेल कर रही है. ' त्रि-शक्ति के अधिकारी '  स्वामी अभेदानन्दजी के भीतर उनकी ही कृपा विकसित हो उठी  थी- और वे श्रीरामकृष्ण का ज्ञान, सारदादेवी की भक्ति, एवं स्वामीजी का कर्म का  एक ही आधार में मूर्तप्रतीक हो गए  थे. 
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'স্বস্তিকা ' ৮ সেপ্টেম্বর ২০০১ , ' स्वस्तिका ' ८ सितम्बर २००१ , स्वामी अभेदानन्द की जन्मतिथि के अवसर पर प्रकाशित.
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