Sunday, July 31, 2011

यथार्थ में किसी की मृत्यु नहीं होती

श्रीरामकृष्ण- भावान्दोलन में अभेदानन्द 
आज श्रीरामकृष्ण- सारदा- विवेकानन्द का नामत्रय सर्वजन विदित है. किन्तु इस नामत्रय के अतिरिक्त भी अन्य कुछ नाम भी इसके नेपथ्य में थे, जिनको जाने बिना रामकृष्ण-विवेकानन्द-वेदान्त-साहित्य का अधिकांश भाग असम्पूर्ण ही रह जाता है. इनमे से स्वामी ब्रह्मानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी सारदानन्द, स्वामी अभेदानन्द जैसे प्रधान नाम विशेष तौर से उल्लेखनीय हैं. किन्तु श्रीरामकृष्ण-साहित्य आकाश की व्यापकता इन नामों में ही सीमित नहीं हो जाती है. 
 इस आकाश में श्रीरामकृष्ण एक महासूर्य-स्वरुप हैं, जिनकी हजारो करोज्ज्वल रश्मियाँ संन्यासी-पार्षद रूपी उज्जवल नक्षत्रों के माध्यम से प्रवाहित होकर सम्पूर्ण विश्व को नूतन आलोक से आलोकित कर रही हैं. इन सबों में से प्रत्येक ने एक एक पक्ष को उज्जवल प्रभा से महिमा-मंडित किया है. इनमे से प्रत्येक एक एक दिकपाल रूप से अवस्थित हैं. इनमे से किसी की तुलना किसी के साथ नहीं की जा सकती है. इनमे से प्रत्येक असाधारण प्रतिभा-सम्पन्न थे.
एक ही सत्ता श्रीरामकृष्ण-सारदा-विवेकानन्द रूपी त्रिमूर्तियों में प्रकाशित है. अवतार लीला को पूर्ण करने के उद्दश्य से यह त्रिमूर्ति आविर्भूत हुई है. प्रसिद्द दार्शनिक अमियकुमार मजुमदार के मतानुसार- ये सभी एक अभिन्न सत्ता से गठित; वृक्ष, फुल और फल के समान अविच्छिन्न सत्ता हैं;  एवं उन्होंने श्रीरामकृष्ण को भक्ति, श्रीसारदा देवी को कर्म और स्वामी विवेकानन्द को ज्ञान के रूपों में प्रकाशित एक ही चैतन्य शक्ति की अभीव्यक्ति माना है.
इस महाभाव राज्य के राजाओं-महाराजाओं में इनके अतिरिक्त: 
ब्रह्मज्ञ स्वामी ब्रह्मानन्द, स्थितप्रज्ञ महापुरुष स्वामी शिवानन्द, कर्णधार प्राणपुरुष स्वामी सारदानन्द, वेदान्तप्रचारक प्रभावशाली-वक्ता स्वामी अभेदानन्द, शिवज्ञान से जीवसेवा के संस्थापक स्वामी अखंडानन्द, ब्रह्म-वैज्ञानिक स्वामी विज्ञानानन्द, सेवापरायण स्वामी अद्वैतानन्द, संघसेवक स्वामी योगानन्द, सेवा की मूर्तरूप स्वामी प्रेमानन्द, शुद्धसत्व-गुणी स्वामी निरंजनानन्द, श्रीरामकृष्ण-सेवक कर्मवीर स्वामी रामकृष्णानन्द, वेदान्तविद स्वामी तुरीयानन्द, सफल कर्मयोगी और श्रीरामकृष्ण के वार्ता-वाहक स्वामी निर्मलानन्द, सारदा-सेवक और भाव-प्रचारक स्वामी त्रिगुणतीतानन्द, श्रीरामकृष्णदास स्वामी अद्भुतानन्द, तथा देवशिशु-सुलभ-स्वाभाव स्वामी सुबोधानन्द आदि अन्य १६ व्यक्तियों को भी हमलोगों ने प्राप्त किया है. 
इनमे से कोई किसी दुसरे से थोड़े परिमाण में भी कमतर नहीं थे. इनमे से प्रत्येक एक एक भावराज्य के महान महारथी हैं. फिरभी हमलोगों के चर्चा का आलोच्य विषय के अतिरिक्त अन्य चर्चा के समय कम है; इसीलिए यहाँ हमलोग एक नक्षत्र के कई पहलुओं के ऊपर चर्चा करेंगे.
श्रीरामकृष्ण-भावान्दोलन का एक विशेष अध्याय स्वामी अभेदानन्द के नाम के साथ जुड़ा हुआ है; इनको छोड़ कर इस रामकृष्ण-दर्शन को परिपूर्ण आकर में समझना संभव नहीं है; श्रीरामकृष्ण-लीलासहचरों के बीच केवल इन्होंने ही सबसे अधिक समय तक लीला की है. श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग-पार्षदों में से किसी को भी इतने लम्बे समय (१८८३-१९३८ ई०) तक इस रामकृष्ण-भावान्दोलन बने रहने का अवसर में या सुयोग नहीं मिला है. इसीलिए उनके माध्यम से हमलोगों को दीर्घ काल की अभिज्ञता इतिहास जानने का सुयोग मिला है; एवं उन्होंने भी कृपा करके कुछ तथ्यों को जोड़ कर श्रीरामकृष्ण के इतिहास को अधिक संजीवित तथा समृद्ध किया है.
२ अक्टूबर १८६६ ई० को स्वामी अभेदानन्द का आगमन हुआ था. उत्तर कोलकाता के निमू गोस्वामी लेन में उनका जन्म हुआ था. माँ-काली के आशीर्वाद से जन्म हुआ था, इसीलिए उनका नाम कालीप्रसाद पड़ा. आश्चर्य की बात यह है कि जब कालीप्रसाद या काली उर्फ़ स्वामी अभेदानन्द जब पहली बार श्रीरामकृष्ण के निकट उपस्थित हुए तब उनको देखते ही श्रीरामकृष्ण ने कहा था- " पूर्वजन्म में तूँ एक योगी था; पर कुछ बाकी रह गया था. यह जन्म तुम्हारा आखरी जन्म होगा. " कैसी अद्भुत दिव्यदृष्टि थी ! यह मानो किसी जौहरी द्वारा स्वर्ण को पहचान लेने जैसी बात थी. प्रथम मिलन में ही उन्होंने अपने लीलापार्षद को चुन लिया था. उनको पहचानने में थोड़ी भी कठिनाई नहीं हुई. परन्तु घटित हो गयी थी परमप्राप्ति. 
दूसरी बार मिलने पर कालीप्रसाद को श्रीश्रीठाकुर ने कहा- " देखो, तुम्हारी दोनों आँखें, भवें, और ललाट को देखने से मेरे भीतर श्रीकृष्ण के मुखड़े की उद्दीपना होती है." ठाकुर इसीप्रकार अपने अन्तरंग पार्षदों को देखते ही पहचान लिया करते थे. पूर्वजन्म में किये गए सद्कर्मों के कारण ही इस प्रकार के गुरु प्राप्त होते हैं.
यह तो हुई उनके जन्मजात प्राप्त संपदा की बात. इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी साधना के बलबूते पर वेदान्त-विद्या में प्रज्ञा प्रोज्ज्वल प्रदीप्त प्रतिभा भी अर्जित की थी. जिसने उनके विद्याबुद्धि तथा अतीन्द्रियज्ञान को स्फूरित कर दिया था.
  इसीलिए तो श्रीरामकृष्ण कहते थे- " सभी लडकों में तुम भी बुद्धिमान हो, नरेन् के बाद तुम्हारी ही बुद्धि प्रखर है. नरेन् जिस प्रकार किसी मत को चला सकता है, तुम भी वैसा कर सकोगे." श्रीरामकृष्ण का यह आशीर्वचन व्यर्थ नहीं हुआ था. भविष्य-द्रष्टा श्रीरामकृष्ण की भविष्यवाणी को वास्तविकता में रूपायित करते हुए उन्होंने यह प्रमाणित किया था कि वे भी एक मत को चलाने के अधिकारी हैं. 
श्रीरामकृष्ण की कृपा से काली-महाराज दर्शन आदि के चरम शिखर पर पहुँच गए थे. इसके बारे में अपनी अभिज्ञता का उल्लेख स्वामी अभेदानन्द जी ने अपनी आत्मजीवनी में इस प्रकार किया है- " एकदिन मैं परमहंसदेव के श्रीचरणों को सहला रहा था, इसी समय अनुभव हुआ मानो परमहंसदेव श्रीश्रीजगन्माता के रूप में मुझे अपना स्तन-पान करवा रहे हैं....
.उस अद्भुत अनुभूति की बात जीवन में मैं कभी भूल नहीं सकूँगा. एक दिन गहरी रात्रि में ध्यानस्थ होकर मैं बाह्यज्ञान शून्य हो गया था, और मेरी आत्मा मानो देहरूपी पिंजड़े से बाहर निकल कर शून्य आकाश में मुक्त पंछी के जैसा विचरण कर रही थी; ...देखते देखते एक सुन्दर सुशोभित प्रासादोपम सुरम्य स्थान में उपस्थित हुआ. उस स्थान में प्रविष्ट होकर एक के बाद एक नाना सम्प्रदाय के विभिन्न भावों की मूर्तियों का दर्शन करके आश्चर्य चकित रह गया.
शाक्त, शैव, वैष्णव, गाणपात्य, क्रिश्चियन, इस्लामिक, आदि धर्मों के भिन्न भिन्न भाव और प्रतीकों को देख कर भाव विह्वल हो गया. क्रमशः किसी महान अतिवाहिक आत्मा की प्रेरणा से मानो अनुप्रेरित होकर एक विराट ह़ाल जैसे कमरे में प्रविष्ट करके देखा कि, उस कमरे के चारों दीवालों से सटे एक विशाल वेदी पर समस्त देवदेवी, अवतारपुरुष और धर्मप्रवर्तकों की मूर्तियाँ स्थापित की हुई हैं...और उसी हाल के बीचोबीच परमहंसदेव दंडायमान हैं.
  मैं उसी अद्भुत दृश्य का दर्शन कर रहा हूँ, तभी परमहंसदेव की मूर्ति ज्योतिर्मय होकर विराट आकार धारण कर ली और उनके भीतर समस्त देवदेवी, अधिकारिक और अवतारपुरुष ( मत्स्य, कूर्म, श्रीरामचंद्र, बुद्ध आदि दशावतार ) श्रीकृष्ण, ईसामसीह, जरथ्रुष्ट, नानक, श्रीचैतन्य, शंकराचार्य,...आदि प्रविष्ट होने लगे. तब उस अद्भुत दर्शन का कुछ यथार्थ मर्म नहीं समझ सका तो तेजगति से दक्षिणेश्वर पहुँच कर परमहंसदेव से सब बातों को कह सुनाया. परमहंसदेव ने सुन कर कहा- " तुमको वैकुण्ठ का दर्शन हुआ है. इसबार देवदेवी दर्शन की चरमसीमा में पहुंचे हो. अब तुमको और कुछ दर्शन करना बाकी नहीं है- अभी से तुम निराकार और अरूप के घर में उठ गए हो. " ( ' आमार जीवनकथा ' : १म भाग, पृष्ठ ३४-३५ )
काली-महाराज तार्किक या युक्तिवादी थे. युक्ति के आलोक में समस्त वस्तुओं को देखते थे. बिना तर्क की कसौटी पर कसे वे किसी भी बात को नहीं मानते थे. एकबार काली-महाराज काशीपुर उद्यानवाटी में रहते समय तालाब में बंशी डालकर मछली पकड़ रहे थे. यह देख कर श्रीरामकृष्ण को बहुत कष्ट हुआ, उनका समानानुभूति शील मन और व्यथातुर ह्रदय रो पड़ा. और उन्होंने उनको बंशी में चारा डाल कर मछली पकड़ने से मना किया. किन्तु काली-महाराज ने गीता के एक श्लोक को उद्धृत करते हुए युक्तिसंगत व्याख्या देते हुए कहा-
( ' नायं हन्ति न हन्यते ' गीता २ : १९ ) ' यह आत्मा हनन नहीं करता, और हत भी नहीं होता. ' ( अर्थात यथार्थ में किसी की मृत्यु नहीं होती, केवल अवस्थान्तर होकर सब कुछ आत्मा में लीन हो जाता है.)  ...इत्यादि.
  वे सदैव अपने द्वारा किये किसी कार्य के समर्थन में सूक्ष्म विचारणीय युक्ति द्वारा एक सिद्धान्त ( मत ) खड़ा कर लेते थे. स्वयं श्रीरामकृष्ण भी इस सूतीक्ष्ण बुद्धि से परास्त हुए हैं. किन्तु वे स्वयं कभी पराजित नहीं होते थे. परन्तु कोई यदि किसी सिद्धान्त को उपस्थापित करना चाहता तो वे उसे आसानी से स्वीकार नहीं कर लेते थे. इतना ही नहीं वे उस सिद्धान्त को अपनी तीक्ष्ण युक्ति-तर्क द्वारा खंडन करके एक अन्य सिद्धान्त को सामने रख देते थे.
वेदान्त शास्त्रों की सूक्ष्मातिसूक्ष्म बाल की खाल निकालने वाली तर्कशील बुद्धि के सामने सभी परास्त हो जाते थे. इसीकारण उनको ' काली-वेदान्ती ' कह कर पुकारा जाता था. उनकी असाधारण बुद्धिदीप्त प्रतिभा के लिए श्रीरामकृष्ण भी उनकी प्रशंसा किया करते थे. 
काली-महाराज जब वराहनगर-मठ में निवास करते थे, उस समय वे एक छोटे से कमरे में जप-ध्यान और शास्त्र-चर्चा करते हुए अपना समय बिताते थे. वे सदैव शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों में डूबे रहते थे. यहाँ तक कि गीता और उपनिषदों के प्रत्येक श्लोक के ऊपर ध्यान करके उसका मर्मार्थ उपलब्धि कर लेते थे. इसके फलस्वरूप उनका वह छोटा सा कमरा सदैव एक आध्यात्मिक- परिवेश से परिपूर्ण रहा करता था. इसीलिए उनके कमरे
को ' काली-तपस्वी का कमरा ' कहा जाता था. और उनके सभी गुरुभाई उसी कमरे में सामूहिक रूप से आध्यात्मशास्त्रों की चर्चा करते हुए अपना समय बिताते थे.
वराहनगर मठ में उनलोगों को अपना साधू-जीवन दरिद्रता के अनेक कष्टों को झेलते हुए बिताना पड़ता था. यहाँ तक कि शारीरिक परिश्रम करके उनलोगों को भोजन के लिए दो मुट्ठी अन्न का जुगाड़ करना पड़ता था. किन्तु स्वामी अभेदानान्दजी इस शारीरिक श्रम से विरत रहते हुए शास्त्र-चर्चा में ही निमग्न रहते थे. फलस्वरूप उनके शास्त्र-अध्यन को लेकर कोई कोई व्यंगपूर्ण आक्षेप भी कर देते थे, किन्तु वे कभी विचलित नहीं होते थे. 
एक दिन स्वामीजी उनलोगों के इस प्रकार व्यंगपूर्ण विद्रूप आक्षेपों को सुने तो भर्त्सना करते हुए बोले- " तुमलोगों का एक भाई यदि कल अध्यन-मनन में ही डूबा रहता है तो तुमलोगों के शरीर में इतनी जलन क्यों होती है ? तुमलोगों के भोजन बनाने वाले जितने बर्तन-भांडे हैं मेरे पास भेज दो, मैं उनको मांज देता हूँ. " (श्रीरामकृष्ण भक्तमालिका : १म, पृष्ठ ३९८)
स्वामीजी अपने इस प्रियगुरुभाई के प्रति सदैव सहृदय रहते हुए उनको सदैव अपनी स्नेह्छाया की ओट में रखते थे. कोई यदि कुछ आक्षेप लगाता तो स्वामीजी उसका खण्डन करने में मुखर हो जाते एवं अभेदानन्द जी के शास्त्र-अध्यन आदि क्रियाकलापों को सादर ग्रहण करने के लिए अनुप्रेरित करते थे. 
स्वामी अभेदानन्द में शास्त्रों के प्रति प्रबल निष्ठा थी. अनेक विपरीत परिस्थितयों में भी उनको अपना पठन-पाठन का अभ्यास करते रहना पड़ता था. एकाग्रचित्त होकर की जाने वाली प्रचेष्टा एवं तीव्र व्याकुलता के फलस्वरूप वेदान्त-चर्चा करने में वे सिद्धस्त हो गए थे. अभेदानन्द के पण्डित-महाशय कालीवर वेदान्तवागीश उनमें वेदान्त चर्चा के प्रति व्याकुल आग्रह देख कर कहे थे- " बच्चे, तुम्हारा ही वेदान्त पढ़ना सार्थक है. तुम्हारे प्राणों में ज्ञान की पिपासा जाग्रत हो गयी है. परमतत्व की उपलब्धी करना ही तुम्हारे जीवन का व्रत है. इसीलिए तुमको उस पीपासा ने त्याग के पथ में खींच रखा है, और तुम प्राणपण से तपस्या कर रहे हो. तुम्हारे जैसे विद्यानुरागी तपस्वी को पढाना, मेरे लिए भी सार्थक हुआ है. " ( ' स्मृतिसंचयन ', विश्ववाणी : चैत्र १३५१, पृष्ठ ११) 
 स्वामी अभेदानन्द जी आत्मजीवनी में इस प्रसंग पर लिखते हैं -
" उस समय (वराहनगर मठ में रहते समय १२९५ बंगाब्द ) मैंने श्रीश्रीठाकुर और श्रीश्रीमाँ के प्रति स्त्रोत्र रचना की थी और श्रीश्रीमाँ को सुनाया था, जिसे सुनकर श्रीश्रीमाँ ने आनन्दपूर्वक आशीर्वाद देते हुए कहा था-
"  তোমার মুখে সরস্বতী বসুক "
' तुम्हारे मुख में विद्या की देवी सरस्वती का वास हो जाय '!  
इसी समय में मैंने श्रीश्रीमाँ की हाथों से जप की माला (रुद्राक्ष की बनी हुई ) प्राप्त की थी. " ( ' आमार जीवनकथा ': १म, पृष्ठ १११)  
श्रीश्रीमाँ का यह आशीर्वाद उनके ऊपर बरस पड़ा था. जिसके परिणामस्वरूप पाश्चात्य देशों में प्रचार करते समय हमलोग उनकी उस प्रज्ञादीप्त प्रतिभा, लोकोत्तर मनीषा, अद्भुत भाषणकला और अपूर्व आध्यात्म-अनुभूति को देख सकते हैं, जिसने उनको सर्वजन-वर्णीय बना दिया था. स्वामी अभेदानन्द जी द्वारा 
अनुष्टप-छन्दों में ' श्रीरामकृष्णस्त्रोत्रम ' शीर्षक प्रथम संस्कृत रचना की गयी थी. एक बानगी देखें-
" लोकनाथश्चिदाकारो राजमानः स्वधामणि 
कलीकल्मषमग्नानामूत्तारणचिकीर्षया |
मायाश्क्तीं समाश्रित्य मोहवतीर्नो महीतले 
नमोस्तु रामकृष्णाय तस्मै श्रीगुरुवे नमः || "
( ' स्त्रोत्ररत्नाकर ' : पृष्ठ १ )
  काली-महाराज ने स्वरचित जिस श्लोक का पाठ श्रीश्रीमाँ के समक्ष किया था उसे ' श्रीसारदादेवी- स्त्रोत्रम ' कहते हैं, जिसमें उनकी स्तुति इस प्रकार की गयी है-  
" प्रकृतिं परमामभयां वरदां नररूपधरां जनतापहराम |
शरणागत सेवकतोषकरीं प्रणमामि परां जननीं जगताम || 
( ' स्त्रोत्ररत्नाकर ' : पृष्ठ ४२ ) 
स्वामी अभेदानन्दजी के असाधारण लोकोत्तर जीवन की बहु सृष्टिशील कालजयी रचनायें आजभी आध्यात्म समाज में मार्गदर्शक बनी हुई हैं. उनकी रचनाओं में कहीं कोई उग्रता नहीं है, अगर है तो बस केवल परम स्निग्धता और सहिष्णुता. यही है उनकी रचनाओं का वैशिष्ठ. उन्होंने जीवन किसी क्रान्तिद्रष्टा के जैसी दूरदृष्टि लेकर देखा है. पुनः कभी आध्यात्मिक भावनाओं में डूब कर अपने ईष्टदेवता के साथ एकात्मबोध में एकाकार हुए से दिख जाते हैं. 
अभेदानन्दजी की अनुभूतिशील लेखनी से भावावेग पूर्ण एक कविता-कलि निःसृत हुई थी-
' आत्मसमर्पण ' : 
" तुमने जो कृपा की है प्रभु, क्या मैं उसे कभी भूल सकता हूँ ?
जिस प्रकार तुमने मुझे (मेरे वजूद को, ' अहं '  को ) निगल लिया है,
उसी प्रकार मैंने भी तुमको (आत्मसात कर लिया- बूंद सागर में मिल कर एक हो गया है ) निगल लिया है;
इस रहस्य को कौन समझ सकेगा ! - यह मैं नहीं कह सकता |
तुम्हारे आदेशानुसार इस रहस्य को
- मैं कभी जगजाहिर कर ही नहीं सकता || 
It Will Die With Me.
तुम और मैं एक हो गए है, 
तुम और मैं भिन्न नहीं है !
मैं हूँ आधार और तुम हो आधेय-
मेरा यह देह्मन प्राण; 
तुम्हारे ही चरणों में समर्पित है |
आगे तुम्हारी जैसी इच्छा  हो वैसा ही करो | " 
(' विश्ववाणी ' : १म वर्ष, पौष १३४६, पृष्ठ ३९३ )

    स्वामी अभेदानन्द जी ने इसके अतिरिक्त और भी कितने सारे स्त्रोत्र एवं कविताओं की रचना की है. इन में पूर्वोक्त प्रथम स्त्रोत्र के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है - ' वराहनगर-मठ में आरात्रिक (संध्या-प्रार्थना ) हो जाने के बाद हमसभी लोग एकसाथ बैठ कर कुछ श्लोकों का पाठ भी किया करते थे. ' यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि उस समय तक श्रीश्रीठाकुर और श्रीश्रीमाँ के ऊपर अन्य किसी स्त्रोत्र कि रचना नहीं हुई थी. इसीलिए वे लोग श्रीश्रीठाकुर के फोटो के सामने बैठ कर पूर्वोक्त स्तव का ही पाठ किया करते थे. और श्रीश्रीमाँ भी उस समय तक स्थूल शारीर में ही लीला कर रहीं थीं, इसीलिए उनके स्त्रोत्र का पाठ नहीं किया जाता था. 
स्वामी अभेदानन्द ने ही ठाकुर और माँ के लिए पहले पहल स्त्रोत्र रचना की थी. इसी समय से उनकी सारस्वत- प्रतिभा विकसित होने लगी थी. उनके इन  सब वेदान्तिक तत्वों की गवेषणा करने उद्देश्य था- " किसी अंधे के समान जो कुछ सामने आ जाय, उसीका अनुसरण न करते हुए, जिस प्रकार श्रीश्रीठाकुर के आदर्श को सामने रख कर जप-ध्यान आदì