Thursday, March 24, 2011

" एक नवीन भारत निकल पड़े "उद्दम एवं नेतृत्व - २


संगठित चेष्टा का महत्व 
नेता के सामने अपने जीवन का एक सर्वोच्च निश्चित लक्ष्य (Definite Chief Aim) बिलकुल स्पष्ट रहना चाहिए. तथा इस लक्ष्य को वास्तविकता में रूपान्तरित करने का एक उत्कृष्ट नक्शा (रेखा-चित्र) भी बना लेना चाहिए. तत्पश्चात अपने नक्शे को साकार रूप देने के लिए, पर्याप्त आत्मविश्वास रखते हुए उद्दम करने में जुट जाना चाहिए. 
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल का निर्दिष्ट सर्वोच्च लक्ष्य (Definite Chief Aim) है- भारत का कल्याण ! स्वामीजी के शब्दों में- ' भारत माता को पुनः उसके गौरवशाली सिंघासन पर आसीन करना '. इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हमारे नेता स्वामी विवेकानन्द ने जो (रेखा-चित्र ) नक्शा (उपाय) दिया है, वह है-
" Be and Make "
अर्थात तुम स्वयं यथार्थ मनुष्य (श्रद्धावान मनुष्य अर्थात सत्य-द्रष्टा ऋषि) बनो और दूसरों को भी यथार्थ मनुष्य (श्रद्धावान मनुष्य -' नेता ') बनाने में सहायता करो.
स्वामी विवेकानन्द कहते थे, " हमें जिस चीज की आवश्यकता है, वह यह श्रद्धा ही है. दुर्भाग्यवश भारत से इसका प्रायः लोप हो गया है, और हमारी वर्तमान दुर्दशा का कारण भी यही है...यह श्रद्धा ही है, जो एक मनुष्य को बड़ा और दूसरे को कमजोर और छोटा बनाती है. हमारे गुरुदेव कहा करते थे, जो अपने को दुर्बल सोचता है, वह दुर्बल ही हो जाता है, और यह बात बिलकुल ठीक भी है. इस श्रद्धा को तुम्हें पाना ही होगा...उस अनन्त आत्मा, उस अनन्त शक्ति पर विश्वास करो, तुम्हारे शास्त्र और तुम्हारे ऋषि एक स्वर से उसका प्रचार कर रहे हैं. वह आत्मा अनन्त शक्ति का आधार है, कोई उसका नाश नहीं कर सकता, उसकी वह अनन्त शक्ति प्रकट होने के लिए केवल  की प्रतीक्षा कर रही है.
आत्मा में सम्पूर्ण शक्ति अवस्थित है; केवल उसे व्यक्त करना होता है. इसके लिए हमें श्रद्धा की ही जरुरत है; हमें, यहाँ जितने भी मनुष्य हैं, सभी को इसकी आवश्यकता है. इसी श्रद्धा को प्राप्त करने का महान कार्य तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है...अब तक मैंने कुछ भी नहीं किया, यह कार्य तुम्हें करना होगा. अगर कल मैं मर जाऊं तो इस कार्य का अन्त नहीं होगा.
 मुझे दृढ विश्वास है, सर्वसाधारण जनता के भीतर से हजारों मनुष्य आकर इस व्रत को ग्रहण करेंगे और इस कार्य की इतनी उन्नति तथा विस्तार करेंगे, जिसकी आशा मैंने कभी कल्पना में भी न की होगी. मुझे अपने देश पर विश्वास है- विशेषतः अपने देश के युवकों पर. बंगाल के युवकों पर सबसे बड़ा भार है. इतना बड़ा भार किसी दूसरे प्रान्त के युवकों पर कभी नहीं आया. पिछले दस वर्षों तक मैंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया. इससे मेरी दृढ धारणा हो गयी है कि बंगाल के युवकों के भीतर से ही उस शक्ति का प्रकाश होगा, जो भारत को उसके आध्यात्मिक अधिकार पर फिर से प्रतिष्ठित करेगी. मैं निश्चय पूर्वक कहता हूँ, इन ह्रदयवान उत्साही बंगाली युवकों के भीतर से ही सैंकड़ो वीर उठेंगे, जो हमारे पूर्वजों द्वारा प्रचारित सनातन आध्यात्मिक सत्यों का प्रचार करने और शिक्षा देने के लिए संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक भ्रमण करेंगे. "   
स्वामीजी की भविष्यवाणी को सत्य करते हुए  कोलकाता शहर के (श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय प्रमुख) कुछ तीक्ष्णबुद्धि और देशभक्त बंगाली (बंगला-भाषी) नवयुवकों ने, विवेकानन्द साहित्य रूपी सागर का मंथन करके भारत-निर्माण के इस नक्शे " Be and Make " को ढूंढ़ निकला. तथा चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन को भारत के गाँव गाँव तक पहुंचा देने योग्य युवा-नेताओं का निर्माण करने के लिए वर्ष १९६७ में - " अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल " की स्थापना हुई.
  विगत ४४ वर्षों से महामण्डल इसी ' बनो और बनाओ ' आन्दोलन को कार्य रूप देने में लगा हुआ है. तथा अभी भारत के १२ राज्यों में इसके लगभग ३०० केंद्र हैं जहाँ युवा चरित्र-निर्माण का कार्य चल रहा है. किन्तु (ऋषि) यथार्थ मनुष्य ' बनने और बनाने ' का कार्य सम्पूर्ण भारत में फैला देने के लिए, और अधिक संख्या में  कुशल युवा नेतृत्व( सत्य-द्रष्टा युवा नेताओं ) की आवश्यकता है. 
४४ वर्ष पहले हमारे जो भाई (अग्रज) जीवन गठन और चरित्र-गठन के माध्यम से ऋषि-तुल्य नेता बनो और बनाओ के कार्य में अपने जीवन को समर्पित कर के आगे बढ़ा रहे थे उनमें से अधिकांश की आयु अब ६० से ऊपर की हो चुकी है. आज भी उनके मन में युवाओं का ही जोश है, किन्तु शारीरिक अवस्था आड़े आती है. अतः जिन युवा सदस्यों में  ऋषित्व-प्राप्त नेता बनने की पात्रता (भरपूर आत्मविश्वास और उद्दम ) हो उन्हें अपने अपने शहर या ग्राम में महामण्डल केंद्र खोलने के संगठित प्रयास में जुट जाना चाहिए. 
यदि किसी केंद्र के नेता के अपने ह्रदय की सम्पूर्ण वक्रता (भेद-बुद्धि) दूर हो चुकी हो, (अर्थात जिनका ह्रदय इतना उदार हो जिसमें अपनी  ऊँची जाति, ज्ञान और भाषा का कोई अहंकार न बचा हो;) तो उन्हें ऐसे युवाओं के साथ ' महामण्डल-भ्रातृत्व ' की भावना से ओतप्रोत संगठन बनाने की चेष्टा करनी चाहिए जो अपने जीवन को सार्थक करना चाहते हों. ऐसे नेताओं की संख्या बढने के अनुपात में ही हमारे देश की समस्त समस्याओं का निदान निर्भर करेगा. 
महामण्डल -भ्रातृत्व की भावना से ओतप्रोत संगठन का निर्माण भी एक ऐसे रेखा-चित्र पर आधारित होना चाहिए, जिसका लाभ (आत्मश्रद्धा)  सभी सम्बद्ध भाइयों को एक समान प्राप्त होना चाहिए. यह तभी सम्भव है जब इस संगठन का नेतृत्व किसी आध्यात्मिक शक्ति-सम्पन्न (सत्य-द्रष्टा ऋषि तुल्य) नेता के हाथों में हो, जो भारत के किसी भी दूसरे प्रान्त के भाइयों से भाषा, जाति और धर्म के नाम पर कोई भेद-भाव न करता हो.  हमारा नेता ऐसे नाविक की तरह होना चाहिए जो तूफान आने पर भी धैर्य धारण करे और पुरषार्थ के बल पर विभिन्न जाती, धर्म और भाषा बोलने वाले अपने सभी सहयोगियों को एकता के सूत्र में बान्धे रख सके. 
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " पानी का जहाज (महामण्डल द्वारा आयोजित वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर के जैसा ही) हवाई जहाज ( अन्य नामी-नामी क्लबों ) की अपेक्षा बहुत बड़ा होता है...बहुत बड़े बड़े जहाजों में बीच में रहती है पहली श्रेणी, दोनों ओर कुछ खाली जगह, उसके बाद दूसरी श्रेणी, और स्टीयरेज इधर उधर जैसे तीसरी श्रेणी हो; उसमें वही लोग जाते हैं जो बहुत गरीब हैं.
तूफान उठने पर डेक के यात्रियों को बड़ी तकलीफ होती है और कुछ तकलीफ बन्दरगाह में माल उतारने के समय. पानी के जहाज के सर्वेसर्वा मालिक हैं कप्तान. जहाज पर उनका हुक्म ही कानून है. उनके नीचे चार 'अफसर ' हैं, जिन्हें देशी नाम से 'मालिम' कहते हैं. ये लोग यूरोपियन हैं, बाकी सब नौकर-चाकर खलासी, कोयला झोंकनेवाले देशी लोग ही हैं- सभी मुसलमान. नौकर खलासी कलकत्ते के, कोयला झोंकनेवाले पूर्व बंग (बंगलादेशी) बावर्ची भी पूर्व बंग के कैथोलिक क्रिश्चियन हैं और हैं चार मेहतर.
..ये सब... आजकल प्रायः उन सभी जहाजों पर रहते हैं, जो कलकत्ते से यूरोप जाते हैं. क्रमशः इनकी एक जाती तैयार हो रही है. कुछ जहाजी पारिभाषिक शब्दों की सृष्टि हो रही है. कप्तान को ये लोग कहते हैं-
' बाड़ीवाला ', अफसर को 'मालिम',  मस्तूल को - 'डोल' ..खलासियों और कोयले वालों में एक आदमी सरदार रहता है, उसे ' सारंग ' कहते हैं, उसके नीचे दो-तीन 'टंडेल', इसके बाद खलासी या कोयलेवाला. 
खानसामा लोगों (boy ) के सरदार को ' बटलर ' कहते हैं, उसके ऊपर एक आदमी गोरा, ' स्टुअर्ड ' होता है. खलासी लोग जहाज धोना-पोछना रस्सी फेंकना-उठाना, नाव उतरना-चढ़ाना, पाल गिराना-उठाना आदि काम करते हैं. सारंग और टंडेल सदा ही साथ साथ फिरते और काम करते हैं. कोयलेवाले इंजन-घर में आग ठीक रखते हैं; उनका काम दिन-रात आग से लड़ते रहना है, और इंजन को पोंछकर साफ रखना. वह विराट इंजन और उसकी शाखा -प्रशाखाएँ साफ रखना कोई साधारण काम है?
इन सब बंगाली खलासी, कोयलेवाले, खानसामे आदि का काम देखकर स्वजाति पर जो एक निराशा का भाव था, वह बहुत कुछ घट गया है. ये लोग धीरे धीरे कैसे 'मनुष्य ' बन रहे हैं, कैसे तंदरुस्त, कैसे निडर फिर भी शान्त (3 _H ). वह नेटिवी (देशज) पैरपोशी (चाटुकारिता) का भाव मेहतरों में भी नहीं, कैसा परिवर्तन !
देशी मल्लाह (महामण्डल के नेता - उत्तम ) लोग जो काम करते हैं, वह बहुत अच्छा है. जबान पर एक बात भी नहीं, पर उधर तनख्वाह गोरों की चौथाई . इन्हें देख कर, पाश्चात्य में बहुतेरे असंतुष्ट हैं, खास कर इसलिए कि बहुत से गोरों (अमेरकियों कि नौकरी जाती है) की रोटियाँ छीन जातीं हैं. वे लोग कभी कभी शोर मचाते हैं. कहने को तो और कुछ है नहीं, क्योंकि ये काम में गोरों (अमेरकियों ) से तेज और फुर्तीले होते हैं. परन्तु दोषारोपण करते हुए कहते हैं- तूफान उठने पर, जहाज के विपत्ति में पड़ने पर, इनमें हिम्मत नहीं रहती. राम कहो !
वास्तविक विपत्ति के समय यह स्पष्ट हो जाता है, कि उनके ऊपर लगाया गया लांछन सरासर झूठ है. विपत्ति के समय गोरे भय से शराब पीकर, डर के सिकुड़ जाते हैं, निकम्मे हो जाते हैं. जबकि देशी खलासियों ने एक बूंद भी शराब जिन्दगी भर नहीं पी, और अब तक किसी महा विपत्ति के अवसर पर एक आदमी ने भी कायरता नहीं दिखायी. अजी, देशी सिपाही (स्वामीजी का  सैनिक ) भी कभी कायरता दिखलाता है ?
परन्तु नेता चाहिए. जनरल स्ट्रांग नामक मेरे एक अंग्रेज मित्र सिपाही -विद्रोह (सन १८५७)  के समय इस देश (भारत) में थे. वे अक्सर ग़दर के दिनों की कहानियाँ सुनाया करते थे. एक दिन उनसे बातों ही बातों में पूछा गया कि सिपाहियों के साथ इतनी तोप, बारूद, रसद थी,  और वे शिक्षित तथा दूरदर्शी थे. फिर वे इस तरह क्यों हार कर भागे? उन्होंने उत्तर दिया, उसमें जो लोग नेता थे, वे सब बहुत पीछे से ' मारो बहादुर ', ' लड़ो बहादुर ' कह कहकर केवल चिल्लाते रहते थे ! स्वयं अफसर (नेता ) के आगे बढ़े बिना, तथा मौत का सामना किये बिना कहीं सिपाही लड़ते हैं ! सब काम में ऐसा ही हाल है. 'सिर दार तो सरदार '; सिर दे सको तो नेता हो . हम सब लोग धोखा देकर नेता होना चाहते हैं; इसीसे कुछ होता नहीं, कोई मानता भी नहीं
आर्य बाबा का दम भरते हुए चाहे प्राचीन भारत का गौरव गान दिन-रात करते रहो और कितना भी 'डमडम' कहकर गाल बजाओ, तुम ऊँची जातवाले (बिना लहसुन पियाज का मुर्गा खाने वाले) क्या जीवित हो ? तुम लोग हो दस हजार वर्ष पीछे के ममी !! जिन्हें (जिन निम्न जाती वालों को ) ' सचल श्मशान ' कहकर तुम्हारे पूर्व पुरुषों ने घृणा की है, भारत में जो कुछ वर्तमान जीवन है, वह उन्हीं में है और ' चलते-फिरते मुर्दे ' हो तुमलोग.
  तुम्हारे घर-द्वार म्यूजियम हैं, तुम्हारे आचार-व्यव्हार, चाल-चलन देखने से जान पड़ता है, बुढ़िया दादी के मुंह से कहानियाँ सुन रहा हूँ. तुम्हारे साथ  प्रत्यक्ष वार्तालाप करके भी जब घर लौट कर तुम्हारे चेहरों को याद करता हूँ तो जान पड़ता है, किसी चित्र-प्रदर्शनी में टंगे तस्वीरों को देख आया हूँ! 
इस माया के संसार के असली प्रहेलिका (?) (गड्ढे?) , असली मरू-मरीचिका तुम लोग हो भारत के उच्च वर्णवाले. तुम लोग भूत काल हो, लंग, लुंग, लिट, सब एक साथ. ..स्वप्न-राज्य के आदमी हो तुम लोग, अब देर क्यों कर रहे हो ? भूत-भारत-शरीर के रक्त-मांस-हीन कंकालकुल, तुम लोग क्यों नहीं जल्दी से जल्दी धूलि में परिणत हो वायु में मिल जाते ? 
तुमलोगों  की अस्थिमय अँगुलियों में पूर्वपुरुषों की संचित कुछ अमूल्य रत्न जड़ित अंगूठियाँ हैं, तुम्हारे दुर्गन्धित शरीरों को आवृत किये पूर्व काल की बहुत सी रत्न पेटिकाएँ सुरक्षित हैं. इतने दिनों तक उन्हें दे देने की सुविधा नहीं मिली. अब पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में, अबाध विद्या-चर्चा के दिनों में, उन्हें उत्तराधिकारियों को दो, जितने शीघ्र दे सको, दे दो. 
तुम लोग शून्य में विलीन हो जा और फिर एक नवीन भारत निकल पड़े. निकले हल पकड़ कर, किसानों की कुटी भेदकर, जाली, माली, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से . निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से. निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से. 
इन लोगों ने सहस्र सहस्र वर्षों तक नीरव अत्याचार सहन किया है, - उससे पायी है अपूर्व सहिष्णुता. सनातन दुःख उठाया, जिससे पायी है अटल जीवनी शक्ति. ये लोग मुट्ठी भर सत्तू खाकर दुनिया उलट दे सकेंगे. आधी रोटी मिली तो तीनों लोक में इतना तेज न अटेगा ! ये रक्तबीज के प्राणों से युक्त हैं. और पाया है सदाचार-बल, जो तीनों लोक में नहीं है. इतनी शान्ति, इतनी प्रीति, इतना प्यार, बेजबान रहकर दिन-रात इतना खटना और काम के वक्त सिंह का विक्रम !! 
अतीत के कंकाल-समूह ! - यही है तुम्हारे सामने तुम्हारा उत्तराधिकारी भावी भारत. वे तुम्हारी रत्न पेटिकाएँ, तुम्हारी मणि की अंगूठियाँ - फेंक दो इनके बीच; जितना शीघ्र फेंक सको, फेंक दो; और तुम हवा में विलीन हो जाओ, अदृश्य हो जाओ, सिर्फ कान खड़े रखो.
 Skeletons of the Past, there, before you, are your successors, the India that is to be. Throw those treasure-chests of yours and those jeweled rings among them, as soon as you can; and you vanish into the air, and be seen no more- only keep your ears open. No sooner will you disappear than you will hear the inaugural shout of Renaissance India, ringing with the voice of a million thunders and reverberating throughout the universe, " Wah Guru Ki Fateh "- victory to the Guru !     
तुम ज्यों ही विलीन होगे, उसी वक्त सुनोगे, कोटि जीमूतस्यन्दिनी, त्रैलोक्यकम्पनकारिणी भावी भारत की उद्बोधन ध्वनी- " वाह गुरुजी (श्रीरामकृष्ण ) का खालसा (नरेन्द्र नाथ दत्त !), वाह गुरूजी (श्रीरामकृष्ण) की फतह ! "
किसी महान दार्शनिक ने कहा है- " Initiative is the passkey that opens the door to opportunity." अर्थात 'उद्दम ' वह कुंजी जो 'अवसर ' के द्वार को खोल देता है ! जब किसी श्रद्धावान नेता (स्वामी विवेकानंद) के नेतृत्व में महामण्डल के सभी कर्मी (श्रीरामकृष्ण की संतानें) भ्रातृत्व की भावना से महामण्डल के चरित्र-निर्माण आन्दोलन को भारत के सभी प्रान्तों में फैला देने के लिए संगठित प्रयास करेंगे तो सफलता अवश्य मिलेगी.                                        

No comments: