Friday, January 7, 2011

शिक्षा क्या है ? शिक्षा का सार है -"अच्छा मनुष्य बनना "

" शिक्षा का आदर्श है, साधन (मन) को योग्य बनाना" 
महामण्डल द्वारा जो चरित्र-गठन एवं मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन विगत ४४ वर्षों से चलाया जा रहा है, उसके अन्तर्गत मनः संयोग के विषय का प्रशिक्षण ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी विषय को सीखने से अच्छा मनुष्य बना जा सकता है.  
स्वामी विवेकानन्द प्रचलित शिक्षा-प्रणाली को भ्रान्त महसूस करते हुए कहते हैं- " वर्तमान शिक्षा प्रणाली पुर्णतः दोषपूर्ण है, चिन्तन शक्ति का विकास होने के पूर्व ही मस्तिष्क में बहुत सी बातों को भर दिया जाता है. मन के संयम की शिक्षा पहले दी जानी चाहिये.यदि मुझे अपनी शिक्षा फिर से प्रारम्भ करनी हो, और उसमे कुछ मेरी भी चले, तो मैं सर्वप्रथम अपने मन का स्वामी बनना सीखूंगा और तब यदि मुझे आवश्यकता होगी, तो ही तथ्यों का संग्रह करूँगा. (८:१४४)"
" शिक्षा का आदर्श है, साधन (मन) को योग्य बनाना,(अर्थात भैंसे जैसी मोटी अकल को सूक्ष्म बना लेना) और अपने मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना. यदि किसी विषय पर मन को केन्द्रित करना चाहूँ, तो उसे वहाँ जाना चाहिये, और जिस क्षण कहूँ, वह पुनः मुक्त हो जाये.लोगों को सीखने में बहुत देर लगती है, क्योंकि वे अपने मन को इच्छानुसार एकाग्र नहीं कर पाते.(४:१५७)"
" To me the very essence of education is concentration of mind, not the collecting facts. If I had to do my education over again, and had any voice in the matter, I would not study facts at all, I would develop the power of concentration and detachment, and then with a perfect instrument I could collect facts at will. (4:38-39)       
इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वामी विवेकानन्द मन के ऊपर नियन्त्रण करने, उसे एकाग्र करने और उस पर प्रभुत्व प्राप्त करने को ही यथार्थ शिक्षा कहते थे. वर्तमान शिक्षा पद्धति में हमलोग केवल तथ्यों को रट लेते हैं, तथा उसको संग्रहित रखने को शिक्षा कहते हैं, परन्तु उसमे निहित भावों (ज्ञान) को आत्मसात नहीं कर पाते हैं, जिसके कारण हमलोग बदहजमी का शिकार हो जाते हैं. स्वामी विवेकानन्द भारत का भविष्य नामक भाषण में कहते हैं- " शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूँस दी जाएँ कि मन में अन्तर्द्वन्द्व चलने लगे, और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर पचा न सके. जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और उसमे निहित भावों को आत्मसात कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है. यदि तुम पाँच ही भावों को पचाकर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो, तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी कि अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरे पुस्तकालय को कंठस्त कर रखा है...यदि बहुत तरह की तथ्यों का संचय करना ही शिक्षा है, तब तो ये पुस्तकालय संसार में सर्वश्रेष्ठ मुनी हैं और विश्वकोष ही ऋषि हैं !"(५:१९५) 
" Education is not the amount of information that is put into your brain and runs riot there, undigested all your life. If you have assimilated five ideas and made them your life and character, you have more education than any man who has got by heart a whole library. " (3:302) 
शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखने के लिये, हमलोग पौष्टिक आहार खाते हैं, परन्तु यदि हम उन्हें पचा नही सकें तो हमारा शरीर भी स्वस्थ नहीं रहेगा. उसी तरह वर्तमान शिक्षा व्यवस्था (स्वाधीन भारत की ६३ वर्ष बाद भी कोई राष्ट्रीय शिक्षा नीति नहीं है.) के फलस्वरूप हमलोग बदहजमी से पीड़ित समाज के रूप में परिणत हो गये हैं. जरा सुनिए इस सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द स्वाधीनता प्राप्ति से ५० वर्ष पूर्व क्या कहते थे-  " कुछ डिग्रियाँ प्राप्त कर लेने य़ा अच्छा भाषण दे सकने से ही क्या किसी व्यक्ति को शिक्षित कहा जा सकता है ? जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवन-संग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जो मनुष्य में चरित्र बल, पर-हित भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है ? जिस शिक्षा के द्वारा जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाता है, वही शिक्षा है. आजकल के इन सब स्कूल कालेजों में पढ़ कर तुम लोग न जाने बदहजमी के रोगियों की कैसी एक जमात तैयार कर रहे हो. केवल मशीन की तरह परिश्रम कर रहे हो और ' जायस्व- म्रियस्व ' के साक्षी रूप में खड़े हो!" (६:१०६)
जिस व्यक्ति को अनपच हो जाता है, पेट में गैस हो जाने से, उसको बहुत कष्ट होता है. उसी तरह नई कक्षा में जाते ही पुस्तकों की एक तालिका दे दी जाती है और चेष्टा की जाती है कि सारी पाठ्य-पुस्तकों को रट कर दिमाग में ढूका लेंगे और परीक्षा के दिन उस विषय को उगल देंगे. इसीलिये बदहजमी के शिकार व्यक्ति के जैसा, परीक्षा के समय हमलोगों का मन अत्यन्त उद्विग्न हो जाता है. और रोज एक-एक विषय के अनपचे तथ्यों को उगलते उगलते क्रमशः मन हल्का होता जाता है, अन्तिम परीक्षा के रोज मन बहुत हल्का और शान्त महसूस करता है. ठीक उसी प्रकार जैसे बदहजमी हो जाने पर सब उलटी हो जाने के बाद शान्ति महसूस होती है.
स्वामीजी के अनुसार- " शिक्षा का अर्थ है-मानसिक शक्तियों का विकास- केवल शब्दों को रटना भर नहीं, अथवा इसे व्यक्तियों को दक्षता पूर्वक ईच्छा करने (विवेक-प्रयोग के बाद ही मन-वचन-कर्म से कुछ करने) का प्रशिक्षण देना कह सकते हैं." (४:२६८) 
स्वामीजी ने प्रचलित शिक्षा-प्रणाली कि कमियों को दूर करने का प्रशिक्षण अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस से सीखा था. और कहते थे अगर मुझे पुनः शिक्षा ग्रहण करनी पड़े तो मैं सबसे पहले अपने मन को इच्छानुसार - नियन्त्रित और एकाग्र करने की शिक्षा ग्रहण करूँगा. क्योंकि भावों के आत्मसातीकरण को ही शिक्षा कहते हैं. यदि कोई व्यक्ति सारा पुस्तकालय ही क्यों न कंठस्त कर ले, और कोई केवल पाँच भावों को ही आत्मसात करे- तो उसे ही अधिक शिक्षित माना जायेगा. स्वामी विवेकानन्द कहते थे- भावों को आत्मसात कर लेने में दक्ष हो जाना ही शिक्षित होने का प्रमाण है.
यदि यथार्थ शिक्षा व्यवस्था का अनुशरण किया जाय तो बचपन के समय से ही जब हमलोग वर्ण-परिचय से - क,ख,ग,य़ा अ,आ,इ,ई से पढ़ाई शुरू करते हैं, फिर दो अक्षर के शब्द के बाद तीन अक्षर के शब्दों को पढना लिखा सीख जाते हैं तब वाक्य-लिखना सिखया जाता है. बचपन में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा लिखित वाक्य-विन्यास की पुस्तिका से पढ़ाई शुरू की जाती है. उनकी पुस्तिका में छोटे-छोटे वाक्यों में जो महत भाव दिये गये हैं, हमलोग उसे भी आत्मसात करना सीख सकते हैं. पहला वाक्य जो हमे लिखना सिखया जाता है वह है-" सदा सच बोलना चाहिये ." अथवा " झूठ बोलने से बचना ही उचित है ." इस छोटे से वाक्य में दिये गये भाव को आत्मसात करने की पद्धति को सीख कर हमलोग सत्यवादी मनुष्य में परिणत हो सकते हैं. 
राजनीति विज्ञान के छात्र परीक्षा के समय पुस्तक में लिखे ' प्रबुद्ध नागरिकों के गुण ' के बारे में पढ़ कर उसे रट लेते हैं, कि उनमे कौन कौन से गुण होने चाहिये; फिर उसीको उत्तरपुस्तिका में लिख देते हैं तो उनको २०/२० अंक मिल जाते हैं.परन्तु अपने व्यक्ति-जीवन में तुम यदि दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हो, तब तुम्हारे आचरण से ही यह प्रकट हो जाता है कि भले तुमको पोलिटिकल साइंस में फर्स्ट क्लास मिल जाये किन्तु तुमने किसी योग्य नागरिक य़ा प्रबुद्ध नागरिक में रहने वाले गुणों को, उसके सत भावों को आत्मसात नहीं किया है. 
उसी तरह बचपन में सीखे गये उस छोटे से वाक्य में निहित आन्तरिक भाव को ग्रहण करके यदि मैं सत्यवादी मनुष्य नहीं बन सका तो मेरी शिक्षा अधूरी ही है. पर यदि मै इस वाक्य में निहित सत्य कि उपयोगिता को समझ कर अपने जीवन में धारण करके सत्यवादी मनुष्य बन सकता तो मेरी शिक्षा सम्पूर्ण हो जाती. मुझे तभी एक शिक्षित मनुष्य कहा जा सकता था. परन्तु मैंने किसी सत-नागरिक में कौन कौन से गुण रहने चाहिये उसे रट कर परीक्षा में लिख दिया और डिग्री मिल गया पर उन भावों को यदि मैं स्वयं भी अपने जीवन में भी धारण कर लेता तो आज हमारे नागरिकों में जितने असत भाव दिखाई दे रहे हैं, उतना तो नहीं होता.  
हमारे देश के १० करोड़ नागरिकों में से १० के भीतर भी प्रबुद्ध-नागरिकों में जितने सारे सदगुण रहने चाहिये उतने गुण नहीं हैं. हमलोगों कि शिक्षा व्यवस्था में योग्य नागरिक बनने का प्रशिक्षण देने का कोई प्रावधान ही नहीं है, इसिलए अधिकांश देश-वासी योग्य-नागरिक बनने से वंचित रह जाते हैं. शिक्षा की सार बात है, मन के ऊपर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त कर लेना. मैं अपने मन को जो भी आदेश दूँ उसे तत्काल मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिये, मैं उसे जब चाहूँ विषयों से खींच कर अपनी ईच्छा और प्रयोजनीयता के अनुसार जहाँ चाहूँ एकाग्र रखने में समर्थ बन जाऊं तभी मेरी शिक्षा पूर्ण कही जा सकती है.
किन्तु  वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में केवल माध्यमिक,उच्च माध्यमिक की परीक्षा में अच्छा अंक लाना, डिसटिंकसन प्राप्त करके डाक्टर,इंजीनियर य़ा बहुत हुआ तो आई.ए.एस  बन जाना ही हमारी शिक्षा का उद्देश्य रह गया है.
किन्तु आज की मानव सभ्यता में जितना भी विकास दिखाई दे रहा है, वह सब मन की शक्ति के द्वारा ही सम्भव हुआ है. हमारे मन के भीतर जो अनन्त शक्ति है, उसीको उपयोग में लाकर हमने बाह्य प्रकृति को नियंत्रि करके अपने अनुकूल और उपयोगी बना लिया है. २१वीं शदी आते आते विश्व-सभ्यता इतनी अधिक उन्नत हो गयी है कि सारी पृथ्वी की भौगोलिक दूरी सिमट गयी है और पूरा विश्व एक ग्राम जितना छोटा प्रतीत होता है. 
सर्दी के दिनों में रूम हीटर, पानी गर्म करने का गीजर आदि का निर्माण, गर्मी के दिनों में जब तापमान ५० डिग्री तक बढ़ जाता है, वातावरण में गर्म लू चलने लगती है, तब हमलोग वातानुकूल यन्त्र ए.सी./फ्रिज बना कर उसे भी अपने अनुकूल कर लिये हैं.हजारों किलोमीटर की यात्रा चन्द घंटों में पूरी करके पृथ्वी के एक सीरे से दूसरे सीरे तक जा पहुँचते हैं.यदि माइक का अविष्कार न हुआ होता, तो किसी विशाल सभा कक्ष में कोई भी शैक्षणिक सत्र नही चल सकता था. प्रतिदिन मनः संयोग का अभ्यास करने के लिये जब अमृत-वेला में उठते हैं, उस समय भी अँधेरा ही रहता है, यदि बिजली का आविष्कार न हुआ होता तो तैयार होकर अभ्यास करना भी सम्भव न होता.
वर्तमान समय में हमलोग ये सब जितने आधुनिक आविष्कार माईक,पंखा, ए.सी., हीटर, आदि देख रहे हैं वह सब आदिम युग के मानवों के पास नहीं था. कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं- सृष्टि के आदि में विधाता बार-बार प्राकृतक आपदाएं भेज-भेज कर इस सृष्टि को पुनः पुनः रचते और भंग करते रहते थे. मनुष्य प्रकृति के सामने बिलुल असहाय अवस्था में था. परन्तु आज हमलोग क्रमशः जल,वायु,अग्नि, आदि प्राकृतिक शक्तियों को नियन्त्रण में रखना सीख कर बहुत प्रगति कर लिये हैं, हमारा रहन सहन, हमारी सभ्यता पहले से बहुत विकसित हो चुकी है. यह सारी उन्नति केवल मन की शक्तियों को कार्य में लगाने से ही प्राप्त हो गयी है. 
न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की शक्ति का आविष्कार कैसे किया ? उन्होंने जब सेव को पेड़ से टूट कर नीचे गिरते देखा तो विचार करने लगे, स्वयं से प्रश्न पूछने लगे- ' गिरने के बाद सेव ऊपर क्यों नहीं गया,  नीचे क्यों जाता है ? इसी प्राकृतिक घटना के ऊपर उन्होंने अपने मन को एकाग्र किया और इसके पीछे जो सत्य (प्राकृतिक नियम) था उसको आविष्कृत कर लिया- तथा इस प्रकार Law of Gravitation नामक यह नया सत्य उदघाटित हो गया. उसी प्रकार सभ्यता की सारी उन्नति मन की शक्ति को प्रयोग में लाने से ही सम्भव हुई है. बाह्यप्रकृति में घटने वाली घटनाओं को देखने के बाद मनोयोगपूर्वक उसका विश्लेषण करने से उसके नियम उदघाटित हो जाते हैं, फिर उन्हें अपनी प्रयोजनीयता के अनुसार उनका कुशल प्रयोग करके उस सत्य य़ा प्राकृतिक-शक्ति (LAW धम्म) को अपने अनुकूल बना लेते हैं. इस प्रकार हम देख सकते हैं कि सारे वैज्ञानिक आविष्कार मन की शक्ति से ही होते हैं.      
अतः अब हमलोग अपने मन की शक्ति को व्यर्थ में बर्बाद नहीं होने देंगे, हमारे मन में जो अनन्त शक्ति अन्तर्निहित है, उसे हम किसी भी विषय पर लगा कर उसका समस्त ज्ञान अर्जित कर सकते हैं और खुद को अधिक शक्तिशाली बना सकते है. जब हम किसी भी कार्य को पूरी एकाग्रता के साथ करना सीख जायेंगे, तो हमे जीवन के हर क्षेत्र में असीम सफलता प्राप्त हो सकेगी. अतः महामण्डल के किसी भी नजदीकी केन्द्र से महामण्डल द्वारा प्रकाशित पुस्तिका मनः संयोग को खरीद कर और उसका अभ्यास करके हमे मन को एकाग्र करने की पद्धति सीख लेनी चाहिये.
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