Saturday, August 7, 2010

[42] " स्वामी विवेकानन्द निर्देशित शिक्षा-प्रणाली "

उस नव आविर्भूत युवा संगठन का नाम ' महामण्डल ' (* अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ) निर्धारित हो गया. उसके बाद सभी बोले - अब इसके लिये आगे जो भी सोंचना य़ा करना है, वह आपको ही करना है. फिर यही विचार मन में रातदिन चलने लगा. पहले मन में प्रश्न उठा -इस ' युवा महामण्डल ' का आदर्श-पुरुष (Ideal ) किसको बनाना चाहिये ? 
स्वाभाविक उत्तर है कि  ' युवा ' महामण्डल के ' आदर्श-पुरुष ' (साँचा य़ा Role -Model ) तो " चिर-युवा "- स्वामी विवेकानन्द ही हो सकते हैं !
क्योंकि उन्हीं की विचार-धारा की बुनियाद पर युवाओं के बीच इस प्रकार का कार्य करना होगा जिससे उनके भीतर सुमति (सदबुद्धि) वापस आजाय, य़ा युवा-वर्ग सुमति ( आत्मश्रद्धा ) प्राप्त करने में सक्षम हो जाएँ ! इस युवा-संगठन का मूल कार्य तो यही है.
इसीलिये उस नव आविर्भूत युवा संगठन के आदर्श हैं  - स्वामी विवेकानन्द !  (इसका कार्य क्षेत्र य़ा ) कार्य की परिधि है - सारा भारतवर्ष ! यह संगठन किस प्रकार अपना कार्य करेगा ? स्वामीजी बार बार यही कहते थे कि, 
" Man-making and Character Building Education " " - मनुष्यनिर्माण एवं चरित्र-गठन करने वाली शिक्षा " समस्त युवाओं को देनी होगी ! क्योंकि प्रचलित शिक्षा व्यवस्था में युवाओं को चरित्र-निर्माण की पद्धति नहीं सिखाई जाती है.  
आज (स्वतंत्र भारत में ) भी देश में ऐसी कोई राष्ट्रीय शिक्षा नीति नहीं है जिसमे -  " मनुष्य-निर्माण एवं चरित्र-गठन कराने की शिक्षा " देने की व्यवस्था हो, और पहले (गुलाम भारत में ) तो खैर ऐसी शिक्षा देने का सवाल ही नहीं था. उसके भी और पहले की तो -बात ही अलग थी.
जिस समय में सुभाष चन्द्र स्कूल में पढ़ते थे, जब उन्हीं के जैसे अन्य लोग स्कूल में पढ़ते थे, जो लोग देश के लिये प्राण दिये हैं, देने के लिये प्रस्तुत थे, उनके समय के शिक्षक लोग दूसरे ही ढंग की चीज छात्रों को देते थे. किन्तु यह चीज तो उनके समय में भी नहीं थी !
इसी के पहले वाली शताब्दी के साठवें दशक तक, सत्तर के दशक तक भी नहीं था. तब इसके ऊपर चिन्तन करना पड़ा, और (विवेकानन्द साहित्य का मन्थन कर) स्वामीजी द्वारा प्रदत्त " मनुष्य-निर्माण एवं चरित्र-गठन की पद्धति को " ढूंढ़ कर महामण्डल की कार्यपद्धति के रूप में निर्धारित कर लिया गया.

फिर यह तय हुआ कि "  स्वामी विवेकानन्द निर्देशित शिक्षा-प्रणाली " के अनुसार ' चरित्र-गठन ' एवं ' मनुष्य- निर्माण ' के कार्य को सारे भारतवर्ष में फैला देना ही इस संघ का कार्य होगा ! अब इसका एक Leaflet (पत्रक) लिखा गया और उसको छपवा कर परिचित लोगों के बीच वितरित कर दिया गया. ( उसका हिन्दी प्रारूप ?) फिर " महामण्डल का आदर्श और उद्देश्य " शीर्षक देकर एक छोटी सी पुस्तिका तैयार की गयी. ये सभी कार्य ऑफिस के टेबल पर बैठ कर ही करने पड़ते थे.

बहुत से लोग पूछते थे- " आप ऑफिस के कार्य कैसे निबटाते हैं ? " ऑफिस के काम की मैंने कभी उपेक्षा नहीं की है, उस समय तक नौकरी करते हुए मुझे कई वर्ष हो चुके थे. क्योंकि बहुत कम उम्र में ही मुझे नौकरी में आना पड़ा था, एवं विभिन्न स्तर पर कार्य किया हूँ. उस समय जितने कार्यों का दायित्व मेरे ऊपर था, उन समस्त कार्यों का उचित ढंग से निष्पादन करने में एक पुरा दिन लग जाना तो दूर रहा, सारे कार्य दिन के एक-चौथाई समय में ही समाप्त हो जाते थे.

निष्ठापूर्वक कार्यों का निष्पादन करने के फलस्वरूप मेरे कार्यालय के जो प्रधान थे, उन्होंने स्पष्ट आदेश दे रखा था कि, समस्त फ़ाइल चाहे जिस किसी के पास भी जाएँ, उसके  दस्तावेज य़ा विवरण एकबार इनके पास अवश्य भेजनी होगी. उसके बाद ही चिट्ठी डिसपैच के लिये भेजी जाएगी. बाद में मैंने हिसाब लगाकर देखा है कि, दिन भर में १५० के करीब फाइलें मेरे पास आया करती थीं. किन्तु ऑफिस के किसी भी आज के फ़ाइल को, कल के लिये कभी पेन्डिंग नहीं छोड़ा है.
कभी मैं यदि यह पाता कि कोई आवश्यक फ़ाइल अपराह्न में तीन बजे आ गया है, तब मैं डिसपैच सेक्सन को खबर कर देता कि- ' पाँच बज जाने के बाद भी एक पिउन को रोक लीजियेगा.' और डिरेक्टर के स्टेनो-बाबू ( stenographer ) को ही बुलवा लेता था. क्योंकि डिरेक्टर ने बोल रखा था, " आपको जब कभी जरुरत हो, मेरे साथ मिल सकते हैं ." 

उनको बुलवाकर साथ ही साथ उस फ़ाइल की उचित व्यवस्था करके पाँच बज जाने के बाद भी उसको भिजवा देना य़ा बहुतजरुरी फ़ाइल रहा तो जल्दी-जल्दी उसे  हाथोहाथ राइटर्स बिल्डिंग में मिनिस्टर के पास य़ा सेक्रेटरी के पास ही सीधा भिजवा देता था. मैंने करके देखा है कि, पूरे दिन के एक-चतुर्थांश य़ा बहुत हुआ तो एक-तृतीयांश समय में ही सारे दिन का कार्य समाप्त  हो जाता था. 
यदि किसी कार्य के लिये और भी कुछ जानकारी, य़ा और कुछ तत्थ्य संग्रह किये बिना पुरा करना सम्भव नहीं रहता तो, उनको कलेक्ट करने में जितना समय लगता, उतनाही समय तक उस फ़ाइल को अपने पास रखता था.इसीलिए कह सकता हूँ कि ऑफिस के काम के प्रति कोई लापरवाही दिखाए बिना, ऑफिस के टेबल पर बैठ कर ही (महामण्डल प्रशिक्षण कि प्रमुख) पुस्तिकाएँ- ' मनः संयोग ', ' चरित्र-गठन ', ' चरित्र के गुण ' आदि कई पुस्तिकाएँ लिखी गयीं हैं. घर में वापस लौटने के बाद, रात्रि में भी काम करना पड़ता था, कभी कभी तो देर रात (डेढ़-दो बजे तक भी) तक काम करना पड़ता था. 

अब प्रश्न उठा कि, स्वामीजी की शिक्षा पद्धति के अनुसार शिक्षा कैसे दी जाएगी ? हमलोग तो स्कूल, कालेज बनायेंगे नहीं. तब यह तय हुआ कि, महामण्डल के द्वारा युवा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जायेगा. इसके लिये पहले युवाओं का आह्वान करके प्रशिक्षण शिविर परिसर में एकत्र करके रखा जायेगा. फिर पूरे दिन का एक कार्यक्रम बना कर, नको चरित्र-गठन किस प्रकार किया जाता है, चरित्र कहते किसे हैं, मनुष्य-निर्माण किस प्रकार होता है, कोई व्यक्ति आखिर ' मनुष्य ' बनता किस प्रकार है, मनुष्य बन कर समाज के लिये क्या किया जा सकता है - इन सब विषयों की शिक्षा दी जाएगी. 
 ' स्वामी विवेकानन्द द्वारा निर्देशित मनुष्य-निर्माण की पद्धति के अनुसार '  इस प्रकार से प्रशिक्षण देने की व्यवस्था आज भी कहीं नहीं है, उस समय (१९६७ तक ) भी नहीं था. मनुष्य-निर्माण की पद्धति आखिर है क्या ?  प्रशिक्षण के द्वारा धीरे धीरे मनुष्य कैसे बना जाता है ? स्वामीजी ने तो कहा है, बार बार कहा है कि,मनुष्य के तीन मौलिक components ( अवयव य़ा घटक) हैं-शरीर, मन और ह्रदय !  
इनको ही हमलोगों के देश में - शरीर, मन और आत्मा भी कहा जाता है !.' ये  तीन बातें पहले भी कही जाती थीं, पहले किसी ने कहा ही नहीं हो ऐसा नहीं है. किन्तु स्वामीजी शरीर, मन, और आत्मा नहीं कहते थे. क्योंकि- ' आत्मा ' क्या है ? - इसको साधारण मनुष्यों को समझा देना उतना सहज नहीं है. किन्तु ' ह्रदय '  तो हर कोई समझ लेता है.' ह्रदय ' वह वस्तु है जिसे आत्मा को अभिव्यक्त करने वाला यन्त्र कहा जा सकता हैं, य़ा माध्यम भी कहा जा सकता है
किसी व्यक्ति की आत्मा किस प्रकार कार्य कर रही है, इसको उस मनुष्य के ह्रदय से समझा जा सकता है. ह्रदय सहानुभूति-सम्पन्न रहना चाहिये, दूसरों के दुःख में दुखी होगा, दूसरों के आनन्द में आनन्दित होगा, विस्तृत ह्रदय होगा, समस्त विश्व के साथ (एकात्मता का बोध करने वाला ह्रदय) अपने को जुड़ा हुआ मानने वाला ह्रदय होगा, प्रत्येक मनुष्य का ह्रदय इतना विस्तृत हो सकता है, कि वह समस्त विश्व के साथ एकात्मता का अनुभव कर पाने में सक्षम होगा.         
 किन्तु केवल ह्रदय के विकास करने य़ा विस्तृत बना लेने से ही तो काम नहीं चलेगा.ह्रदय को अपने भीतर धारण करने के लिये एक शरीर भी तो है ?  उसकी भी आवश्यकता रहती है.इसीलिये शरीर को शख्त, सबल, निरोग, कर्मठ रखना होगा.शख्त, सबल, निरोग, कर्मठ शरीर बनाने के लिये क्या आवश्यक है ? नियमित रूप से व्यायाम आदि करना आवश्यक है. इसीलिये खाली हाथ का व्यायाम आदि करने का प्रशिक्षण देना इस शिक्षा का एक अंग होगा. 

'Iron-man' Nilmoni Das, the famous body builder

(and formerly the Vice President of the Mahamandal, 

here he is training the campers)

उसी प्रकार हमलोगों का मन भी है; बल्कि मन ही तो सबकुछ है. कहा गया है- 
" मन एव मनुष्यानाम कारणम बन्धमोक्षयो: | "" - मन ही मनुष्यों के बन्धन और मुक्ति का कारण है ! "  
इस मन के द्वारा ही हमलोग प्रत्येक कार्य को करने में समर्थ होते हैं. किन्तु हमलोग अपने मन की हमलोग कोई सुध नहीं लेते, उसका समुचित मूल्य नहीं समझते हैं. इसीलिये मन हमलोगों के द्वारा उसकी जो इच्छा  हो वही करवा लेता है, और उसके बहकावे में आकार  हमलोग विवेक-विचार किये बिना ही मन जो कुछ चाहता है, उसीको पाने के लिये दौड़ जाते हैं. हमलोग मन के दास बन गये हैं,किन्तु हमें मन को अपना दास बनाना होगा. जिस प्रकार मनुष्य अर्थ का भी दास नहीं होता, उसका प्रभु होता है. किन्तु अभी रूपया ही मनुष्य का स्वामी बन गया है, रुपया मनुष्य का दास नहीं है.
जिस प्रकार हम सभी लोग रूपये के दास बन गये हैं, उसी प्रकार हमसभी लोग मन के भी दास बन गये हैं. मन हमारा दास नहीं है, वह हमारे आदेश के अनुसार कार्य नहीं करता.इसीलिये इस बिगड़े हुए मन को पहले अपने वश में लाना होगा !  मन को अपने वश में कैसे लाऊंगा, उसकी पद्धति क्या है ? इस पद्धति को प्रशिक्षण शिविर में सिखाया जायेगा.
 इसी प्रकार हमलोगों के  ह्रदय का विस्तार कैसे होता है-  भारत के विभिन्न प्रान्तों से आये विभिन्न भाषा-भाषी मनुष्यों के साथ मिलकर शिविर के विविध कार्यक्रमों में भाग लेने से हमारे अनजाने ही वह भी हो जाता है.
इसीलिये मनुष्य-निर्माण पद्धति को स्वामीजी एक सूत्र में कहते हैं- ' 3H " निर्माण ! ' HAND ' standing for the body, ' HEAD ' standing for one 's itellect and mind; तथा ' HEART ' जो मनुष्य की आत्मा का माध्यम है, जिसके द्वारा मनुष्य की आत्मा का परिचय प्राप्त होता है. जैसे किसी किसी मनुष्य को
 ' महात्मा ' कहा जाता है - ' महात्मा ' का अर्थ क्या है ? 
वैसा मनुष्य जिसका ह्रदय अति विस्तृत हो गया हो. जो ह्रदय सबों के सुख-दुःख को अपने ही सुख-दुःख जैसा अनुभव करने में समर्थ होता है, और जो दुःख-कष्ट में गिरा हुआ है, उसके दुखों को दूर करने के लिये, उसकी सहयता करने के लिये जिसका ह्रदय उसे प्रेरणा देता है, उदबुद्ध करता है, उसके ह्रदय का प्रेम जाग्रत हो जाता है. और वह अपने शरीर की शक्ति, अपना अर्थबल, सब कुछ को वह दूसरे मनुष्यों का दुःख-कष्ट दूर करने में व्यवहार करता है.
यही तो है- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा. स्वामीजी इसी प्रकार का मनुष्य - ' महात्मा - मनुष्य ' य़ा चरित्रवान-मनुष्य का ही निर्माण करना चाहते थे !     
 

1 comment:

Vivek-Jivan said...

...रेशम के कीड़े के समान तुम्हीं ने अपने चारों ओर ककून ( कच्चे रेशम का कोवा जैसा कवच या नाम-रूप का आवरण ओढ़ लिया है) का निर्माण कर लिया है. कौन तुम्हारा उद्धार करेगा ? तुम इस ककून (नाम-रूप के आवरण ) को फोड़ कर एक सुन्दर तितली के रूप में - मुक्त आत्मा के रूप में बाहर प्रकट हो जाओ. " यह शिक्षा (ककून को तोड़ कर मुक्त होने का प्रशिक्षण ) केवल महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में ही प्राप्त हो सकती है.