Thursday, June 3, 2010

[24] " सन्जीवनी शक्ति आध्यात्मिकता में अन्तर्निहित है "

जिस एकमात्र मूल उदगम (Source) से सब कुछ अस्तित्व में आया है, उसको ही सत्य वस्तु कहते हैं|वह जो - 'एकमेवाद्वितीयं' वस्तु है वही पूरी सृष्टि के सभी ' नाम-रूपों ' में अनुस्यूत है| उपनिषद में उस सर्वानुस्यूत सत्य के विषय में कहा गया है -
' पूरा स पक्षीभूत्वा प्राविशत '
पूराकाल अर्थात सृष्टि के पहले वही ब्रह्म वस्तु मानो पक्षी के जैसे बन कर सभी कुछ (पूरे विश्व ब्रह्माण्ड) में प्रविष्ट हो गये थे| लौकिक रूप में जिस प्रकार बाहर से भीतर घुसा जाता है, ' सृष्टि के भीतर प्रविष्ट होने को ' उस अर्थ में नहीं समझना चाहिये|
{तैत्तरीय उपनिषद में कहा गया है- 
" तत-सृष्ट्वा तत एव अनुप्राविशत ! तत अनुप्रविश्य सत च त्यत अभवत |
विज्ञानम च अविज्ञानम च सत्यम च अनृतम च, इदम यत किम च; तत सत्यम ।। " 
( तैत्तरीय उपनिषद : वल्ली :२: अनुवाक : ६)
- सर्ग के आदि में परब्रह्म पुरोषत्तम (T माने ठाकुरदेव) ने यह विचार किया कि मैं नाना रूपों में उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ !यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात जीवों के कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करने के लिये संकल्प किया|संकल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझने में आता है, इसी जड़-चेतनमय सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड की रचना की, अर्थात अपने ही संकल्पमय स्वरूप को बाहर प्रकट कर दिया| उसके बाद स्वयं भी उसमे प्रविष्ट हो गये|
यद्यपि अपने से ही उत्पन्न इस जगत में वे परमेश्वर पहले से ही प्रविष्ट थे- यह जगत जब उन्ही का स्वरूप है, तब उसमे उनका प्रविष्ट होना नहीं बनता- तथापि दृष्टि गोचर जड़-चेतनमय जगत-प्रपंच में आत्मा रूप  से परिपूर्ण उन परब्रह्म पुरुषोत्तम (ठाकुरदेव) के अमूर्त,निर्गुण - ' अंतर्यामी '  स्वरूप का लक्ष्य कराने के लिये यहाँ यह बात कही गयी कि ' इस जगत कि रचना करके वे स्वयं भी उसमे प्रविष्ट हो गये|'
फिर जिसका वर्णन किया जा सकता है और नहीं किया जा सकता; ऐसे विभिन्न नाना पदार्थों के रूप में हो गये|इसी प्रकार आश्रय देने वाले और आश्रय न देने वाले, चेतन और जड़ - इन सब के रूप में वे एकमात्र पुरुषोत्तम 'T' ही बहुत -से नाम और रूप धारण करके व्यक्त हो गये!
वे एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही सत्य और मिथ्या इन सबके रूप में हो गये| इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं कि ' यह जो कुछ देखने, सुनने और समझने में आता है, वह सब-का-सब सत्यस्वरूप परमात्मा (ठाकुरदेव का अमूर्त निर्गुण अन्तरयामी Super Consciousness स्वरूप) ही हैं!  
बल्कि यह पूरा विश्व ब्रह्माण्ड उसी से निर्मित हुआ है - अर्थात वह ब्रह्म वस्तु (य़ा परम सत्य) ही जगत का उपादान कारण है| वही ब्रह्म-वस्तु सम्पूर्ण सृष्टि में अनुस्यूत य़ा ओतप्रोत है अतः वही एकमात्र वस्तु है !(जिस प्रकार स्वर्ण के विभिन्न आभूषणों में स्वर्ण ही एक मात्र वस्तु है!)
।।इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद् विप्रा बहुधा वदंत्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहु: ।।
- ऋग्वेद (1-164-43)
भावार्थ : जिसे लोग इन्द्र, मित्र, वरुण आदि कहते हैं, वह सत्ता केवल एक ही है; ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं।उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म [ब्रह्मा नहीं] ही परम तत्व है। ब्रह्म ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है और विश्व का आधार है। इसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और नष्ट होने पर विश्व उसी में विलीन हो जाता है।
 श्लाकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभ:।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।।
-अर्थात् ' जो अनेक ग्रंथों में लिखा है, उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं। ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है तथा जीव ब्रह्म ही है, कोई अन्य नहीं।'
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसमें अद्वैत दर्शन का प्रतिपादन सूत्र के रूप में किया गया है। इन दृश्यमान जगत में सत्य क्या है, मिथ्या क्या है तथा जीव और ब्रह्म में परस्पर संबंध है- इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर है इसमें। इन सृष्टि में अनुस्यूत है ब्रह्म ! संसार का अधिष्ठापन ही ब्रह्म नाम से श्रुतियों द्वारा प्रतिपादित है। जो था, जो है और जो सदैव रहेगा- वही तो ब्रह्म है। यहां मिथ्या शब्द असत् से भिन्न है। मिथ्या शब्द यहां प्रतीति होनेवाली वस्तु सत्य सी लगती है जबकि वह प्रतीति क्षण में नहीं। यही मिथ्यात्व है। इसमें संस्कारों तथा उसके परिणाम स्वरूप स्मृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
संसार के अस्तित्व को स्वीकार करने पर ही जीव है। संसार की संसार के रूप में प्रतीति के नष्ट होते ही ‘जीव’ का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यह ऐसे ही है जैसे जागने पर स्वप्नकाल के द्रष्टा और दृश्य का को लोप हो जाता है।सत्य का अर्थ है- जिसका तीनों कालों में बाध नहीं होता अर्थात् जो था, जो है और जो रहेगा। इस दृष्टि से जगत् ब्रह्म-सापेक्ष है। ब्रह्म को जगत् के होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता। जिस प्रकार आभूषण के न रहने पर भी स्वर्ण की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है, उसी प्रकार सृष्टि से पूर्व भी सत्य था। दूसरे शब्दों में, ब्रह्म का अस्तित्व सदैव रहता है।श्रुति का वचन है- सदेव सोम्येदग्रमासीत् -अर्थात् हे सौम्य ! सृष्टि से पूर्व सत्य ही था।}
उस वस्तु को जानने के लिये जिस अनुभूति की आवश्यकता है, आज का विज्ञान भी ठीक वही बात कह रहा है| केवल आज ही कह रहा हो ऐसा नहीं, विज्ञान तो बहुत वर्षों से वैसा ही कह रहा है| एक ही वस्तु से सब कुछ,यह पूरा विश्व-ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया है|  सृष्टि की रचना के सम्बन्ध में जो सर्वमान्य वैज्ञानिक सिद्धान्त है उसका नाम है- " Big Bang Theory "| इसमें कहा गया है कि सृष्टि के ठीक पहले एक जोरदार विस्फोट हुआ होगा जिससे यह पूरा विश्व-ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया! महाकाश में किसी कारण से एक बहुत बड़ी घटना घटित हुई, अचानक एक बहुत बड़ा Explosion हुआ जिससे यह जगत-प्रपंच निर्मित हो गया!" बिग बैंग (य़ा जोरदार धमाका ) सिद्धांत "  छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था?ऋग्वेद(१०:१२९) से
" सृष्टि- सृजन"की यह श्रुती लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी यह श्रुती आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी इसे रचित करते समय थी। सृष्टि की उत्पत्ती आज भी एक रहस्य है। सृष्टि के पहले क्या था ? इसकी रचना किसने, कब और क्यों की ? ऐसा क्या हुआ जिससे इस सृष्टि का निर्माण हुआ ? अनेको अनसुलझे प्रश्न है जिनका एक निश्चित उत्तर किसी के पास नही है। कुछ सिध्दांत है जो कुछ प्रश्नो का उत्तर देते है और कुछ नये प्रश्न खडे करते है। सभी प्रश्नो के उत्तर देने वाला सिध्दांत अभी तक सामने नही आया है।सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त सिद्धांत है
JNKHMP-Page 50:
इस सिद्धान्त के नाम से ही यह पाता चल जाता है कि निश्चय ही धमाका तो बहुत जोरदार रहा होगा| इंग्लैण्ड के jodrell observatory के एक दूरबीन के माध्यम से जिस वर्ष एक Sound Wave को चिन्हित किया गया था, वह वर्ष १९६७ मुझे विशेष तौर पर अब भी इसीलिये याद है क्योंकि -उसी वर्ष तो अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल का प्रारम्भ भी हुआ था!
(9th Spl ?)


महाविस्फोट सिद्धान्त 
 (The Big Bang Theory)
 बिग बैंग या ज़ोरदार धमाका, ब्रह्मांड की रचना का एक वैज्ञानिक सिद्धांत है. यह इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है कि यह ब्रह्मांड कब और कैसे बना. इस सिद्धांत के अनुसार, लगभग बारह से चौदह अरब वर्ष पूर्व संपूर्ण ब्रह्मांड एक परमाण्विक इकाई के रूप में था। इससे पहले क्या था, यह कोई नहीं जानता क्योंकि उस समय मानवीय समय (Time)और स्थान(Space) जैसी कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं थी। 
उस समय समस्त भौतिक पदार्थ (Matter) और ऊर्जा(Energy)  एक बिन्दु में सिमटी हुई थी. 
फिर इस बिन्दु ने फैलना शुरू किया. बिग बैंग, बम विस्फोट जैसा विस्फोट नहीं था बल्कि इसमें, प्रारंभिक ब्रह्मांड के कण, समूचे अंतरिक्ष में फैल गए और एक दूसरे से दूर भागने लगे. बिग बैंग प्रतिरूप के अनुसार लगभग १३.७ अरब वर्ष पूर्व इस धमाके में अत्यधिक ऊर्जा का उत्सजर्न हुआ। 
यह ऊर्जा इतनी अधिक थी जिसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जा रहा है। सारी भौतिक मान्यताएं इस एक ही घटना से परिभाषित होती हैं जिसे बिग बैंग सिद्धांत कहा जाता है।
बिग बैंग नामक इस महाविस्फोट के धमाके के मात्र १.४३ सेकेंड अंतराल के बाद समय, अंतरिक्ष की वर्तमान मान्यताएं अस्तित्व में आ चुकी थीं।भौतिकी के नियम लागू होने लग गये थे। १.३४वें सेकेंड में ब्रह्मांड १०३० गुणा फैल चुका था और क्वार्क, लैप्टान और फोटोन का गर्म द्रव्य बन चुका था। १.४ सेकेंड पर क्वार्क मिलकर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बनाने लगे, और ब्रह्मांड अब कुछ ठंडा हो चुका था। हाइड्रोजन, हीलियम आदि के अस्तित्त्व का आरंभ होने लगा था और अन्य भौतिक तत्व  बनने लगे थे। 
बिग बैंग प्रतिरूप के अनुसार, यह ब्रह्मांड अति सघन और ऊष्म अवस्था से विस्तृत हुआ है, और अब तक इसका विस्तार चालू है। एक सामान्य धारणा के अनुसार अंतरिक्ष स्वयं भी अपनी आकाशगंगाओं सहित विस्तृत होता जा रहा है।बिग बैंग सिद्धान्त के आरंभ का इतिहास आधुनिक भौतिकी में जॉर्ज लिमेत्री ने लिखा हुआ है। लिमेत्री एक रोमन कैथोलिक पादरी थे और साथ ही वैज्ञानिक भी। उनका यह सिद्धान्त अल्बर्ट आइंसटीन के प्रसिद्ध सामान्य सापेक्षवाद के सिद्धांत पर आधारित था। 
बिंग बैंग सिद्धांत दो मुख्य धारणाओं पर आधारित होता है। पहला भौतिक नियम और दूसरा ब्रह्माण्डीय (कॉस्मोलाजिकल) सिद्धांत। ब्रह्माण्डीय सिद्वांत के मुताबिक ब्रह्मांड होमोजीनस और आइसोट्रॉपिक होता है।
१९६४ में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्गस ने बिग बैंग के बाद एक सेकेंड के अरबें भाग में ब्रह्मांड के द्रव्यों को मिलने वाले भार का सिद्धांत प्रतिपादित किया था, जो भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस के बोसोन सिद्धांत पर ही आधारित था। इसे बाद में 'हिग्गस-बोसोन' के नाम से जाना गया।इस सिद्धांत ने जहां ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों पर से पर्दा उठाया, वहीं उसके स्वरूप को परिभाषित करने में भी मदद की।

{" बिग बैंग का प्रयोग सफल! खुलेंगे प्रकृति के नए राज "  (Tuesday, 30 March 2010 14:०२ (न्यूज़ डेस्क विज्ञान जगत)जेनेवा में सर्न के वैज्ञानिकों ने LHC मशीन के माध्यम से प्रोटोन को टकराने में सफलता प्राप्त की है. वैज्ञानिकों की मानें तो इससे ब्रह्मांड के बनने के रहस्य खुल सकते हैं. यही नहीं इससे भौतिक विज्ञान में नई खोज की उम्मीद की जा रही है. विशाल हैड्रन कोलाइडर फिर से काम करना शुरू कर चुका है और अब इस मशीन पर काम करने वाले वैज्ञानिक अब पहली बार प्रोटोन के कणों को एक साथ टकराने की कोशिश करने जा रहे हैं.क्या होगा इससे?इस प्रयोग के तहत सात करोड़ खरब इलेक्ट्रोन वोल्ट (टीइवी) का टकराव किया गया और आगे भी प्रयोग जारी रहेगा. जो लगभग 24 महीनों तक जारी रहेगा. इससे प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन और जांच पड़ताल की जाएगी. यह श्रमसाध्य कार्य है जो कई वर्षों तक चल सकता है. लेकिन इससे प्रकृति के रहस्य खुल सकते हैं. इससे यह भी पता चल सकता है कि ब्रह्मांड की रचना आखिर कैसे हुई?कहाँ हो रहा है प्रयोग?यह प्रयोग स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस की सीमा पर बनी एक बड़ी प्रयोगशाला में हो रहा है. इसकी स्थापना अरबों डॉलर खर्च कर की गई थी. इसको बनाने में 20 साल लगे. यहाँ विशाल हेड्रन कोलाइडर में अणुओं को लगभग प्रकाश की गति से टकराया जाएगा.इस पूरे महाप्रयोग के ज़रिए मिलने वाली जानकारी से पृथ्वी की उत्पत्ति की 'बिग बैंग' थ्योरी को समझने में भी मदद मिलने की उम्मीद है.कौन से आधार करते हैं समर्थन?इस थ्योरी को कुछ आधार सपोर्ट करते हैं। पहला यह कि ब्रह्मांड में जो आकाशगंगाएं जितनी दूर हैं, वह उतनी ही गति से हम से दूर जा रही हैं। हबल के नियम से जाने जाना वाला यह सिद्धांत इस बात को प्रमाणित करता था कि ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है।दूसरा जैसा कि बिग बैंग सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड अपनी प्रारंभिक अवस्था में काफी गर्म था, ऐसे में इस गर्म स्थान में शेष को तलाशने के लिए 1965 में दो वैज्ञानिक पेंजियाज और विल्सन ने कॉस्मिक माइक्रोवेव को देखा, जिससे इस बात को बल मिला कि कहीं कुछ शेष है। वहां शोर को सुना गया, जो प्रत्येक दिशा से समान मात्रा में आ रहा था।  

तीसरी बात यह कि ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्वों की प्रचुरता ने बिग बैंग सिद्धांत को बल दिया क्योंकि सिद्धांत कहता है कि ठंडे होने के बाद तत्व बनने लगे और हाइड्रोजन, हीलियम आदि के बनने की शुरुआत हो गई।

लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर  (LHC
विश्व का सबसे विशाल और शक्तिशाली कण त्वरक है। 
यह सर्न की महत्वाकांक्षी परियोजना है। यह जेनेवा के समीप फ्रांस एंव स्विट्जरलैंड की सीमा पर जमीन के नीचे स्थित है। इसकी रचना एक किलोमीटर परिधि वाले एक छल्ले-नुमा सुरंग में हुई है। इसी सुरंग में इस त्वरक के चुम्बक, डिटेक्टर, बीम-लाइन एवं अन्य उपकरण लगे हैं। सुरंग के अंदर दो बीम पाइपों में दो विपरीत दिशाओं से आ रही (टेरा इलैक्ट्रॉन वोल्ट) की प्रोटॉन किरण-पुंजों (बीम) को आपस में टक्कर) कराया जायेगा जिससे वही स्थिति उत्पन्न की जाएगी जो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय बिग बैंग के रूप में हुई थी।}
 {1967: THE OVERLOOKED UFO WAVE
AND
THE COLORADO PROJECT
Presented by
RICHARD H. HALL
INTRODUCTION

The "Great UFO Wave of 1967" 
 
 is not exactly on the tip of every one's tongue.Few people even know it happened. Even fewer have studied it in any systematic way. Ironically, the best financed independent study of UFOs undertaken to date was in full operation during 1967, and was alerted rapidly to potentially important new cases as they occurred, yet it totally failed to come to grips with the problem of investigating UFO reports. The Colorado UFO Project was extremely superficial in its examination of cases that occurred during the life time of the project.
क्योंकि sound wave तो पकड़ में आ रहा था किन्तु वह ध्वनी किस स्रोत य़ा उत्स (source) से निकाल रही थी ,उसका पता नहीं लग पा रहा था| बहुत से वैज्ञानिकों ने बहुत से प्रयोग किये और अंततः सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि, प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलने से भी यह जो ध्वनी पकड़ में आ रही है वह उसी Big Bang की आवाज है; जिस उत्स(Source) से समस्त विश्व ब्रह्माण्ड निकला है |


{The Discovery of Pulsars

When stars are observed through the Earth's atmosphere they are seen to scintillate ("twinkle" is a rather nice if not scientific term that is often used).   This is because irregularities in the atmosphere passing between the observer and the star act like alternate convex and concave lenses which sequentially converge the light from the star (so making it appear slightly brighter) and then diverge it (so reducing its brightness).

There is a similar effect related to radio sources caused by irregularities in the solar wind - bubbles of gas which stream out form the Sun expanding as they do so. 

It was realised that this could give a way of investigating the angular sizes of radio sources by studying the amount of scintillation observed when the source was at different angular distances from the Sun. 

It would also be a way of discovering radio sources with very small angular sizes - known as quasars .To carry out this experiment a very large antenna was required and Tony Hewish at the Mullard Radio Astronomy Laboratories at Cambridge recruited a Ph.D student called Jocelyn Bell to first help build the antenna - which was made up of an array of 2048 dipoles - and then carry out and analyze the observations.
 In July 1967
she observed a "little bit of scruff" that did not look like a scintillating radio source but did not appear like interference either. A second intriguing feature was that it had been observed at night when a radio source would be seen away from the direction of the Sun and scintillation would not be expected to be seen.
Looking through the charts, she discovered that a similar signal had been seen earlier from the same location in the sky. She observed that it reappeared again at always a precise number of sidereal days later which implied that the radio source, whatever it was, was amongst the stars rather that within the solar system. 
Hewish and Bell then equipped the receiver with a high speed chart recorder to observe the "scruff" in more detail and discovered to their amazement that it was not random, but a series of precisely spaced radio pulses having a period of 1.33724 seconds.

Observations using a different telescope at Cambridge confirmed the presence of the signal and also that fact that the pulse arrived at slightly different times as the frequency of observation was changed.  

This effect is called dispersion, and is exactly similar to the fact that different wavelengths of light travel at different speeds in glass.  The interstellar medium is not a perfect vacuum and so can cause this effect - but it would be only observed if the source of the pulses was far beyond the solar system.
 
At that time, no one in the radio astronomy group at Cambridge group could conceive of a natural phenomena that could give rise to such highly precise periodic signals

- it seemed that no star, not even a white dwarf could pulsate at such a fast rate - and they wondered if it might be a signal from an extraterrestrial civilisation.  Bell, who called the source LGM1 (Little Green Men 1), was somewhat annoyed about this as it was disrupting her real observations.  

When, later, a second source with similar characteristics but a slight faster period of 1.2 seconds was discovered she was somewhat relieved as

"it was highly unlikely that two lots of Little Green Men could choose the same unusual frequency and unlikely technique to send a signal to the same inconspicuous planet Earth!
पृथ्वी से परे सभ्यता की खोज
इस ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं हैं तो वे सभ्यताएँ कहाँ हैं, जो हमारी जैसी या शायद उससे भी बेहतर हैं? उड़न तश्तरियाँ कहाँ से आती हैं? वे कल्पनाएँ नहीं हैं तो उन्हें चलाने वाले हमारे रेडियो संकेतों का जवाब क्यों नहीं देते।
अमेरिका के प्रोफेसर फ्रैंक ड्रेक को भी यही प्रश्न कुरेदा करते थे। आज से पचास साल पहले 1960 में, जब वे तीस साल के भी नहीं थे, तब उन्होंने एक रेडियो टेलिस्कोप की मदद से पहली बार पृथ्वी से परे इतरलोकीय सभ्यता की आहट लेनी चाही। सोचा, उन्हें कुछ इस तरह की आवाजें सुनाई पड़ेंगी।
वह बताते हैं, 'मेरे पहले प्रयोग का नाम था प्रॉजेकट आजमा। हमने दो महीनों तक सूर्य जैसे दो तारों की दिशा में रेडियो संकेतों की खोज की। लेकिन हमें कुछ नहीं मिला।'कोई सुराग नहीं : फ्रैंक ड्रेक को आज तक ऐसा कुछ नहीं मिला है, जिसके बारे में भरोसे के साथ कहा जा सकता कि वह किसी दूसरी दुनिया के सभ्य लोगों की पैदा की हुई रेडियो तरंग है। रेडियो तरंगें तो ढेरों मिलती हैं, लेकिन वे आकाशीय पिंडों द्वारा स्वयं पैदा की हुई प्राकृतिक तरंगें होती हैं। तब भी, फ्रैंक ड्रेक की जिज्ञासा और लगन की कोख से विज्ञान की एक नई शाखा का जन्म हुआ, जैवखगोल विज्ञान (बायोएस्ट्रॉनॉमी) का। विज्ञान की यह नई शाखा अंतरिक्ष में संभावित जीवन की खोजबीन को समर्पित है। फ्रैंक ड्रेक सन फ्रांसिस्को के तथाकथित सेती इस्टीट्यूट के लिए काम करते हैं।SETI का अर्थ है 
 Search for Extraterrestrial Intelligence, 
यानी, पृथ्वी से परे बुद्धिधारियों की खोज। आज से पैंतालीस साल पहले 8 अप्रैल 1965 के दिन सेती ने तश्तरीनुमा बड़े बड़े रेडियो एंटेनों की सहायता से अंतरिक्ष में बुद्धिधारी प्रणियों की खोज शुरू की। भ्रम टूटा
दो ही साल बाद, 1967 में वैज्ञानिकों को लगा कि बटेर हाथ लग गयी। तब अखबारों की सुर्खियाँ कुछ इस तरह की थीं- 
'डॉक्टरेट कर रही महिला वैज्ञानिक ने हरे आदमियों का पता लगा लिया।','हम अंतरिक्ष में अकेले नहीं हैं।' 'खगोलविदों ने नई दुनिया खोज निकाली।'उस महिला वैज्ञानिक का नाम था जोसेलिन बेल।

Cosmic Search Vol. 1, No. 1

Little Green Men, White Dwarfs or Pulsars?

By S. Jocelyn Bell Burnell


"We did all the work ourselves and cheerfully sledgehammered all one summer." Burnell and the antenna.


In all the history of radio astronomy the pulsing signals discovered at Cambridge, England, in 1967 were the most suggestive of an extraterrestrial intelligent origin that have ever been detected.

In this article, Jocelyn Bell Burnell tells a delightful, personal story of how she first encountered the signals and what ensued.-Eds.


लेकिन, सारी खुशी पर तब पानी फिर गया, जब पता चला कि जिस रेडियो पल्स (स्पंद) को किसी सभ्यता का संकेत समझा जा रहा था, वह वास्तव में एक मृत न्यूट्रॉन तारे से आ रहा था। न्यूट्रॉन तारे ऐसे ठोस पिंड होते हैं, जो बहुत तेजी से घूमते हैं और साथ ही बहुत ही कसी हुई रेडियो तरंगों की कौंध सी पैदा करते हैं। इसीलिए उन्हें पल्सर भी कहा जाता है।
तलाश है रेडियो तरंगों की : इस बीच पृथ्वी से परे किसी बुद्धिमान सभ्यता का सुराग पाने के लिए सेती के वैज्ञानिक रात-दिन आकाश को छान रहे हैं। आकाश से आ रही लाखों रेडियों फ्रीक्वेंसियों को पकड़ने के लिए वे ओवन्स वैली, कैलीफोर्निया में स्थित एलन टेलेस्कोप अर्रे का उपयोग करते हैं।
इस परियोजना के प्रमुख पीटर बैकस बताते हैं, 'पृथ्वी से परे बुद्धिधारियों की अपनी खोज में हम इस दर्शनशास्त्री प्रश्न को गंभीरता से नहीं लेते कि बुद्धि क्या चीज है? हम टेक्नॉलॉजी पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। आकाशीय पिंड फ्रीक्वेंसियों के एक बहुत बड़े दायरे में रेडियो तरंगें छोड़ते हैं। हम मनुष्यों के बनाए रेडियो ट्रांसमिटर सबसे कम बैंड विस्तार वाले प्राकृतिक ट्रांसममिटरों की तुलना में भी 300 गुना संकरे बैंड पर प्रसारण करते हैं। इसलिए हमारी नजर में बहुत कम बैंड विस्तार वाला एक बहुत ही कसा हुआ रेडियो संकेत ही हमारे जैसी ही किसी तकनीकी सभ्यता परिचायक होगा।' 
अनहोनी बात तो तब हो जाएगी, जब सेर्न की प्रतियोगी अमेरिका की फर्मी लैब के वैज्ञानिक सेर्न से पहले ही ब्रह्मकण कहलाने वाले हिग्स-बोसोन का खंडन या मंडन कर देंगे। हिग्स-बोसोन को प्रमाणित करने वाले प्रयोग के निदेशक योआखिम म्निश भी स्वीकार करते हैं कि इस समय इस प्रमाण को पाने की दौड़ चल रही है और हो सकता है कि शिकागो के पास की फर्मी लैब के वैज्ञानिक बाजी मार ले जाएँ।

सेर्न का महात्वरक

 फर्मी लैब का त्वरक टेवाट्रॉन यद्यपि सेर्न के एलएचसी जितना शक्तिशाली नहीं है, तब भी इस समय वही एकमात्र ऐसा बड़ा त्वरक है, जो चालू है और जिस के साथ 600 वैज्ञानिक हिग्स बोसोन ब्रह्मकणों(God Particles) को प्रमाणित करने में जुटे हुए हैं। मजे की बात यह है कि टेवाट्रॉन को 2011 तक बंद कर दिया जाना है। 
लेकिन अब वहाँ के वैज्ञानिक चहक रहे हैं, 'मेरा नाम माइकल कर्बी है, इस समय हिग्स-बोसोन की खोज पर काम कर रहा हूँ। मूलकण विज्ञान में यही इस समय का सबसे रोचक विषय है। यह एक चुनौती है, जिसका हम करीब 40 वर्षों से, यानी तब से उत्तर खोज रहे हैं, जब पीटर हिग्स ने परिकल्पना की थी कि वे ही परमाणु के मूलकणों को मास, अर्थात द्रव्यमान प्रदान करते हैं।'
मूल कण क्या हैं ?
क्वांटम भौतिकी में मूलकण कहते हैं ऊर्जा के एक ऐसे अकेले अतिसूक्ष्म बिंदु को, जिस का, जहाँ तक हमें पता है, और कोई घटक या और कोई टुकड़ा नहीं होता। उसे और अधिक खंडित नहीं किया जा सकता। 
 हिग्स-बोसोन परमाणु-संघटक तत्वों को भार प्रदान करने वाले ऊर्जा के उस रहस्यमय रूप को कहते हैं, जिसकी अभी पुष्टि नहीं हो सकी है। वे ठीक उस क्षण में बने होंगे, जब ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई थी। हीलियम के प्रोटोन कणों को लगभग प्रकाश जैसी तेज गति से आपस में टकरा कर एक बिंदुरूप में उसी क्षण को दुबारा पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
माइकल कर्बी बताते हैं कि उन्हें अमेरिका की फर्मी लैब वाले त्वरक टेवाट्रोन के तथाकथित डी जीरो प्रयोग के दौरान पिछले सात वर्षों के प्रोटोन कणों की टक्करों वाले रिकार्ड देखने होंगे और ऐसी खास टक्करों को छाँटना होगा, जिनमें हिग्स-बोसोन बने होने के निशान मिल सकते हैं।
वे कहते हैं, 'यदि हम पूरी सावधानी से विश्लेषण कर सके, तो हिग्स-बोसोन बनने वाली घटनाओं के निशान पहचान कर उनके संकेतों को प्रोटोन टक्कर की अन्य घटनाओं वाली पृष्ठभूमि से अलग कर सकते हैं। यदि हम संकेतों को पृष्ठभूमि से अलग कर सके, तो यह कहने की आशा कर सकते हैं कि हमने हिग्स-बोसोन को पा लिया है और जान गए हैं कि वही परमाणु के मूलकणों को उनका द्रव्यमान देता है।'

' हिग्स बोसोन का महत्व '

हिग्स-बोसोन की खोज वास्तव में इस प्रश्न के उत्तर की खोज है कि परमाणु में निहित इलेक्ट्रॉन, उस के प्रोटोनों का निर्माण करने वाले दो अप क्वार्क और एक डाउन क्वार्क, उसके न्यूट्रोनों का निर्माण करने वाले दो डाउन क्वार्क और एक अप क्वार्क और न्यूट्रॉन के बिखरने से बनने वाले न्यूट्रीनो का जो अलग अलग द्रव्यमान है, यानी उनका जो अलग अलग भार है, वह उन्हें कहाँ से मिलता है

एक ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने 1964 में यह परिकल्पना दी कि परमाणु के इन आठ संघटक मूलकणों को उनका भार एक विशेष बलक्षेत्र से मिलता है। इस बलक्षेत्र को बाद में हिग्स फील्ड कहा जाने लगा। परमाणु विज्ञान के तथाकथित स्टैंडर्ड मॉडल के अनुसार हिग्स फील्ड के भी विद्युत आवेशधारी और आवेशहीन भाग होते हैं। उन्हें भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस के नाम पर बोसोन नाम दिया गया। सत्येद्रनाथ बोस ने परमशून्य तापमान पर पदार्थ की एक पाँचवीं अवस्था की भी कल्पना की थी, जिसे बोस आइनश्टाइन कंडेनसेट कहा जाता है।
द्वैत भी अद्वैत ही है !जिस प्रकार पदार्थ (matter) और ऊर्जा (Energy) एक ही है !! अब वैज्ञानिक भी मानते हैं कि हम एक कणिका जगत में रहते हैं। जो कुछ हम देखते हैं या नहीं देख पाते, वह सब इन्हीं मूलकणों के बीच असंख्य जोड़-तोड़ का परिणाम है। प्रकृति उनके माध्यम से हमें यही बताती है कि ऊर्जा(E) और पदार्थ(M )  एक ही चीज है। जिसे हम द्वैत यानी दोरूपीय देखते-मानते हैं, वह सब वास्तव में अद्वैत यानी एकरूपीय है। क्या यही बातें भारत का वैदिक तत्वदर्शन भी नहीं कहता ? इस तरह स्पष्ट है कि सृष्टि के निर्माण की ' बिग बैंग की धाराणा ' और ' भारतीय दर्शन ' की धारणा में कितनी ज्यादा समानता है! अब भाषा और समय के अंतर को छोड़ दें तो वैदिक व्याख्या अधिक वैज्ञानिक  दिखती है। अगर यह मान लिया जाए कि आत्मा शब्द का मूल अर्थ वही है, जिसे अब ऊर्जा या एनर्जी कहा जाता है तो वैदिक दर्शन एक विज्ञान नजर आता है।  
आत्मा की परिभाषा गीता (गीता :२:२०) में भी रखी गई है-


न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ 


यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता है। 
यह हमेशा साश्वत है। सिर्फ शरीर मरता है आत्मा नहीं।
 'नैनं छिदंति शस्त्राणी, नैनं दहति पावक। 
न चैनं क्लेदयां तापो, नैनं शोशयति मारूतः।। 
(गीता:२:२३)
आत्मा वो है जिसे किसी भी शस्त्र से भेदा नहीं जा सकता, जिसे कोई भी आग जला नहीं सकती, कोई भी दु:ख उसे तपा नहीं सकता और न ही कोई वायु उसे बहा सकती है।

अब ऊर्जा की परिभाषा देखते हैं-
" ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न।
सिर्फ एक ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा में बदला जा सकता है। "
भारतीय दर्शन भी यह मानता है कि आत्मा रूप बदलती है, य़ा उसका पुनर्जन्म भी होता है! यह दृष्टांत भी ऊर्जा के रूपांतरण से मिलता है। इस तरह वैदिक मान्यताओं का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करना  पूरी मानवता के लिये बहुत उपयोगी है !}
प्रकृति ऊर्जा का कभी क्षय नहीं होने देती। ऊर्जा से ही वह पदार्थ बनाती है। ब्रह्मांड में आज जो कुछ हमें पदार्थ-रूप में दिखाई पड़ता है, वह कोई 14 अरब वर्ष पूर्व सृष्टि की उत्पत्ति वाले महाधमाके से पहले एक बिंदु में मात्र ऊर्जा के रूप में संचित था। सेर्न और फर्मी लैब जैसी प्रयोगशालाओं में हिग्स-बोसोन की खोज के नाम पर एक बहुत सीमित पैमाने पर उन्हीं परिस्थितियों को पैदा करने का प्रयास हो रहा है। 
यूरोप की परमाणु भौतिकी प्रयोगशाला सेर्न के महानिदेशक रोल्फ डीटर होयर कहते हैं।
'मेरा मानना है कि हिग्स का अस्तित्व है। मैं जानता नहीं कि ऐसा है यै नहीं।जानूँगा तब, जब वह मिल जाएगा।यह जरूर जानता हूँ कि ऐसा कुछ जरूर होना चाहिए,जो हिग्स जैसा असर पैदा करता है, क्योंकि इसका कोई कारण होना चाहिए कि मूलकणों के पास अपना भार क्यों होता है?'- राम यादव सौजन्य से - डॉयचे वेले, जर्मन रेडियो)
 " आदमी का निर्माण: य़ा मनुष्य की सृष्टि कैसे हुई ?"
कहाँ से आया मनुष्य ? ईसाई धार्मिक ग्रन्थ बाइबिल के ' सृष्टि की उत्पत्ति ' नामक प्रथम अध्याय में तथा इस्लाम और सनातन धर्म के पुरानों में भी कहा गया है कि ' God ,अल्ला य़ा भगवान ' ही पृथ्वी पर दिखाई पड़ने वाले प्राणियों तथा फरिश्तों का निर्माता है! लेकिन मनुष्य को पैदा करने य़ा उसके निर्मित हो जाने की वास्तविक प्रक्रिया क्या है?
 चार्ल्स डार्विन के क्रम-विकासवाद का सिद्धांत
कहता है कि मनुष्य - वानर से विकास का परिणाम हैं ! यदि ऐसा है, तो फिर मनुष्य से और भी उन्नत किसी प्राणी का क्रम विकास जारी रहना चाहिये था!किन्तु विगत २००० वर्षों से भी अधिक समय से मानव की आकृति में कोई बदलाव क्यों नहीं आया है ? क्या इसका मतलब यह निकाल कर चुप-चाप बैठे रहा जाये कि -  चार्ल्स डार्विन का वैज्ञानिक सिद्धान्त - क्रम-विकासवाद ने अब कार्य करना बन्द कर दिया है? य़ा; आध्यात्मिक वैज्ञानिक (ऋषि )स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित :' क्रम-संकोच वाद ' के सिद्धान्त को भी सर्न की प्रयोगशाला (LHC) में सिद्ध करने का प्रयोग क्यों न किया जाये? क्या कोई भाई इस प्रश्न का उत्तर दे सकता है ?}
इसके सम्बन्ध में अब भी नयी नयी गवेषणा चल रही है| अभी हाल में ही Black Matter का अविष्कार हुआ है| पृथ्वी के विभिन्न देशों के यूरोपियन, अमेरिकन एवं जापानी मूल के ७० वैज्ञानिक विशेष कर 
- रेडियो खगोल वैज्ञानिक वे सभी एकसाथ मिल कर, एक सैटेलाइट दूरबीन से बहुत सारे परिक्षण-निरिक्षण करने के बाद, एक ऐसी वस्तु पाये हैं, जिस वस्तु से पूरा विश्व ब्रह्माण्ड निकला है| किन्तु उस वस्तु को तो देखा नहीं जा सकता, क्योंकि उसमे कोई प्रकाश तो है नहीं, नहीं तो उसको Black Matter कैसे कहा जायेगा?  
{डार्क मैटर ' वह ' है, पर हम उसे पहचानते नहीं।न उसे देख सकते है, न सूंघ सकते हैं, न छू सकते हैं। पर वह है।ईश्वर के अलावा और कौन है, जिसके बारे में ऐसी बात कही जा सकती है? इसे हम नहीं दुनिया के वैज्ञानिक कह रहे हैं। 
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ इनर्जी की फर्मी नेशनल एक्सीलरेटर लैब की ओर से गुरुवार को बताया गया कि वैज्ञानिकों की एक टीम ने कुछ ऐसी धड़कनें दर्ज की हैं, जो डार्क मैटर से जुड़ी अवधारणाओं के करीब हैं। वैज्ञानिकों के इस सतर्क दावे के बाद-सारी दुनिया की निगाहें फिर उस " छलिया " की ओर उठीं हैं, जो है;पर सामने नहीं आता। 
सम्पूर्ण सृष्टि में ग्रहों, तारों और मंदाकिनियों सहित तमाम पिण्डों में मौज़ूद ठोस तरल या गैस की शक्ल में जिस पदार्थ को हम देख पाते हैं, वह सिर्फ पाँच प्रतिशत है। बाकी अदृश्य है। जो नज़र नहीं आता उसमें 75 प्रतिशत डार्क इनर्जी और 25 फीसदी डार्क मैटर है

यह सब भी अनुमान है। इधर का उधर हो सकता है। अलबत्ता वैज्ञानिक मानते हैं कि वह है ज़रूर। उसकी वजह से ही सृष्टि का यह रूप और आकार है। डार्क मैटर ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति का मुख्य स्रोत है। प्रकृति में मौज़ूद सुपर सिमिट्री का वह कारक है। 

यदि वह मिल गया तो वैज्ञानिकों को उस सुपर स्ट्रिंग के गणितीय सूत्र को बनाने में सफलता मिल जाएगी, जो सारे विज्ञानों पर लागू होगा। अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालय और प्रयोगशालाएं क्रायोजेनिक डार्क मैटर सर्च (सीडीएमएस) के प्रयोग से जुड़े हैं। उत्तरी मिनेसोटा की एक खाली पड़ी लोहे की खान में करीब आधा मील गहरी चट्टानों और शील्ड करने वाले मैटीरियल की तमाम परतों के नीचे माइनस 273 सेल्सियस तापमान पर (जिसे एब्सल्यूट ज़ीरो) कहा जाता है, यह प्रयोग चल रहा है।

यहाँ पर वैज्ञानिकों ने स्पंदन दर्ज किया, जो डार्क मैटर का भी हो सकता है। सिद्धांत में डार्क मैटर अत्यंत सूक्ष्म सब एटॉमिक पार्टिकल से बना हैं।इन्हें वीकली इंटरएक्टिंग मैसिव पार्टिकल्स या विम्प्स कहते हैं।

इसकी तलाश में जो डिटेक्टर लगाया गया है, उससे बेहतर डिटेक्टर अगले वर्ष से काम करना शुरू कर देगा। अभी जो स्पंदन प्राप्त हुआ है, वह पृष्ठभूमि के किसी अन्य ऊर्जास्नोत का नहीं है, तो यह बहुत बड़ी सफलता है।अगर वह मिल गया है तो यकीनन सैकड़ों रोचक चीजें और मिलेंगी। 

' वह '(परम सत्य-जिससे सब कुछ निकला है)" अमवस्या की रात में-  काली बिल्ली " की तरह अदृश्य है !इसीलिए अंग्रेज़ी में उसे डार्क मैटर, यानी काला पदार्थ कहते हैं.1933 से वह वैज्ञानिकों को छका रहा है. हाथ ही नहीं आताकभी किसी अनजान तारे के प्रकाश को अपने गुरुत्व बल से मोड़ देता है, तो कभी किसी मंदाकिनी (गैलेक्सी) के अत्यंत तेज़ी से घूमते हुए तारों को छटक कर दूर जाने से रोकता है. कहने को तो तीन चौथाई ब्रह्मांड उसी का बना है,  पर देखने पर वह कहीं रत्ती भर भी दिखाई नहीं पडता.

जर्मनी में म्युनिख के पास गार्शिंग के खगोल भौतिकी माक्स प्लांक संस्थान के वैज्ञानिक भी इस काले पदार्थ पर से रहस्य का पर्दा उठाने में लगे हैं. संस्थान के निदेशक साइमन व्हाइट कहते हैं, "दु्र्भाग्य से हम नहीं जानते कि ब्लैक मैटर किस तरह का पदार्थ है. हमारे पास इस के प्रमाण तो हैं कि ब्रह्मांड में भारी मात्रा में ऐसा कोई पदार्थ है, जो गुरूत्वाकर्षण जैसा प्रभाव पैदा करता है,लेकिन हम उसे देख नहीं पाते". पूरी तह से तो अब भी किसी ने नहीं देखा है.

 लेकिन, अब लगता है कि वैज्ञानिकों को इस " छलिये " - की हल्की सी झलक मिल गयी है!गत दिसंबर में अमेरिका की कई प्रयोगशालाओं ने मिल कर घोषित किया कि उन के डिटेक्टरों ने पहली बार दो ऐसे कण दर्ज किये हैं, जो डार्क मैटर के मूल कण होने चाहिये. ये महासंवेदनशील डिटेक्टर मिनीसोटा की खनिज लोहे की एक खान में, जो अब इस्तेमाल में नहीं है, पौने एक किलोमीटर की गहराई पर लगे हैं. यदि बात सही निकली, तो यह भौतिक विज्ञान में अब तक की एक सबसे सनसनीखेज़ खोज बन जायेगी.क्रायोजेनिक डार्क मैटर सर्च (CDMS),  अर्थात परम शून्य तापमान वाले डिटेक्टरों की सहायता से काले पदार्थ की खोज नाम की इस परियोजना के प्रमुख डैन बाउअर ने बताया कि डिटेक्टरों ने जो कुछ दर्ज किया है, उसे होना तो अदृश्य काला द्रव्य ही चाहिये, लेकिन कुछ और होने की संभावना भी 25 प्रतिशत के बराबर है.इसी कारण विज्ञान जगत इस खोज को अभी पूरी मान्यता नहीं दे रहा है.वैज्ञानिक काले पदार्थ को, यानी उसके अणुओं-परमाणुओं को, अब तक देख या पकड़ भले ही न पाये हों, विभिन्न प्रयोगों और अवलोकनों से इतना ज़रूर जानते हैं कि उसके मूलकण  हमें ज्ञात इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रटोन या फिर उन से भी छोटे क्वार्क, लेप्टॉन, ग्लूऑन से बिल्कुल भिन्न होने चाहिये.  कंप्यूटर अनुकरणों से यही पता चलता है. 

वे न्यूट्रीनो कहलाने वाले उन कणों की तरह के होने चाहिये, जो इतने छोटे हैं कि हर क्षण लाखों-करोड़ों की संख्या में हमारे शरीर ही नहीं, हमारी पृथ्वी के भी आरपार आते-जाते रहते हैं और हमें रत्ती भर भी पता नहीं चलता.न्यूट्रीनो शायद ही कभी किसी परमाणु के नाभिक से टकराते हैं, इसलिए अच्छे से अच्छे पार्टिकल डिक्टेर भी उन के टकराने की बस इक्की दुक्की चमक ही दर्ज कर पाते हैं, जबकि वे संवेदनशील इतने हैं कि एक जुगुनू की चमक को एक किलोमीटर दूर से भी दर्ज कर सकते हैं.वैज्ञानिकों का समझना है कि न्यूट्रीनो भी वहीं से आते हैं,जहां काले पदार्थ का जमघट है.  और, काले पदार्थ, यानी डार्क मैटर का यह जमघट कहां से आता है? 


म्यूनिक विश्वविद्यालय के प्रो. हाराल्ड लेश कहते हैं, "एक अनुमान यह है कि वह मृत तारों का बना होना चाहिये. हर गैलेक्सी या मंदाकिनी में सौ से दौ सौ अरब तारे होते हैं. उन में से कुछ अपना जीवनकाल पूरा कर चुके होते हैं. ब्लैक होल यानी कृष्ण विवर, न्यूट्रॉन तारे, बुझ गये तारे, इत्यादि. वे गैलेक्सियों के आस-पास जमा हो जाते हैं. चमकते नहीं, इसलिए दिखते नहीं और केवल गुरूत्वबल के द्वारा अपने अस्तित्व का आभास देते हैं."
इस बीच एक और अनुमान वैज्ञानिकों के बीच लोकप्रिय हो रहा हैः"आज यह माना जा रहा है कि डार्क मैटर विम्प (WIMP) कणों का बना होता है. यह नाम वीक इंटर ऐक्टिंग मैसिव पार्टिकल्स  का संक्षेप है. ये विम्प बहुत ही अपरिचित किस्म के मूलकण होने चाहिये".
वीक इंटर ऐक्टिंग मैसिव पार्टिकल्स  का अर्थ हुआ क्षीण अभिक्रिया करने वाले भारी कण.  अनुमान है कि हमें ज्ञात परमाणुओं वाले मूलकणों की तरह ही, डार्क मैटर भी हमें अज्ञात कई प्रकार के मूलकणों का बना होना चाहिये.
 उसके मूलकण हमें बता सकते हैं कि समय हमेशा आगे की दिशा में ही क्यों चलता है. वे शायद सुपरसिमेट्री वाले इस सिद्धांत की भी पुष्टि करें कि ब्रह्मांड के हर कण और मूलकण का, उससे भी भारी, एक जुड़वां प्रतिरूप होता है. इसी उत्तर की जेनेवा में सेर्न के महात्वरक से भी खोज हो रही है.
मिनीसोटा वाली खनिज लोहे की बेकार पड़ी खान में ज़मीन से सैकड़ों मीटर नीचे जर्मेनियम और सिलिकॉन क्रिस्टल के बने 30 डिटेक्टर लगे हैं. वे लगभग ऋण 273 डिग्री सेल्ज़ियस वाले परमशून्य पर काम करते हैं.
इस तापमान पर किसी कण के टकराने से पैदा हुई क्षीणतम गर्मी को भी मापा जा सकता है. साथ ही, जैसे ही डार्क मैटर वाला कोई विम्प कण इन क्रिस्टलों से टकरायेगा,  उन्हें हिला देगा.  इस गहराई पर पृथ्वी तक पहुंचने वाली ब्रह्मांडिय किरणें नहीं पहुंच सकतीं, इसलिए वे ऐसा कोई कंपन पैदा नहीं कर सकतीं.  डिटेक्टरों ने ऐसे ही दो अलग अलग कंपन दर्ज किये हैं. यदि अगले कुछ वर्षों में ऐसे ही चार और घटनाएं दर्ज होती हैं, तो इसे डार्क मैटर वाली अवधारणा की पुष्टि मान लिया जायेगा.  रिपोर्ट: राम यादव}
 यह अविष्कार आइन्स्टाइन के एक सिद्धान्त का अनुसरण करता है जिसमे कहा गया है- ' प्रकाश की गति के मार्ग में यदि कोई अवरोधक वस्तु आ जाति है तो उसकी गति थोड़ी मुड़ जाति है|' इसी सिद्धान्त के आधार पर प्रयोग करके इन वैज्ञानिकों ने एक Gravitational वस्तु का एक चित्र बनाये हैं| एक विराट वस्तु के आकार का एक पिण्ड कहीं पर है, उसी से यह पूरी सृष्टि निकली है|

{इस प्रयोग से खुलेगा ब्रह्मांड का रहस्य  
इस प्रयोग को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि यह ईश्वर के अस्तित्व को प्रकारांतर से चुनौती देता है। धर्म के पास चूँकि इस बात का वैज्ञानिक जवाब नहीं है कि यह ब्रह्मांड कैसे अस्तित्व में आया इसलिए उसने उसके बनाने वाले की कल्पना कर ली और उसे ईश्वर कहा।
जरा सृष्टि के निर्माण की बाइबिल की व्याख्या पर गौर करें, जो कहती है कि एक ईश्वर है जिसने शुरू में इस पृथ्वी और स्वर्ग का निर्माण किया।  
बिग बैंग या महाविस्फोट की वैज्ञानिक अवधारणा, जो कई प्रश्नों का जवाब देती है, बताती है कि इस ब्रह्मांड का जन्म 13 अरब 70 करोड़ साल पहले एक महाविस्फोट के साथ हुआ और एक सेकंड के लाखवें हिस्से में दूर-दूर तक पदार्थ फैल गया।
पृथ्वी का अस्तित्व ही सिर्फ 4 अरब 54 करोड़ साल पुराना है। बहरहाल, प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन की ऊर्जा और पदार्थ के बारे में जो समीकरण है, वह भी ऊर्जा के पदार्थ में रूपांतरण की बात सिद्ध करता है। अब आप कहेंगे कि ठीक है मान लिया, पर उससे पहले स्पेस तो कहीं न कहीं रहा होगा जिसमें यह पदार्थ फैला होगा। आज हम जानते हैं कि आकाशगंगाएँ लगातार एक-दूसरे से दूर हो रही हैं। छिटक रही हैं। यानी ब्रह्मांड का कोई ओर-छोर ही नहीं है।
हमारी अपनी आकाशगंगा, जिसे मिल्की-वे कहा जाता है इतनी विराट है कि इसके एक सिरे पर स्थित तारे के प्रकाश को दूसरे सिरे तक पहुँचने में 1 लाख प्रकाश वर्ष का समय लगता है। प्रकाश एक साल में करीब 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चलकर लगभग 9.5 खरब किलोमीटर तक पहुँचता है। इस संख्या को 1 लाख से गुणा करके हम अपनी आकाशगंगा की लंबाई पा सकते हैं।
अब अपनी आकाशगंगा की विराटता की कल्पना कर लीजिए और फिर सोचिए कि ब्रह्मांड में कम से कम और नहीं तो कई अरब आकाशगंगाओं का अस्तित्व होना चाहिए। तो कितना विराट स्पेस होगा? 
वैसे बिग बैंग की थ्योरी यह भी कहती है कि विस्फोट से पदार्थ ही नहीं बना, टाइम और स्पेस भी बने।
हम जैसे आम आदमियों के लिए इस गड़बड़झाले को समझना आसान नहीं है। इस ब्रह्मांड के बारे में यह भी कहा जाता है कि जिन तमाम तारों, ग्रह नक्षत्रों, सुपरनोवा तारों और आकाशगंगाओं आदि का पता लगा लिया गया है, वह समूचे ब्रह्मांड का मात्र 4 प्रतिशत हिस्सा है। शेष अंतरिक्ष डार्क मैटर और डार्क एनर्जी से बना है।
जिनेवा के निकट सर्न के इस महाप्रयोग की खासियत यह है कि इसके जरिए 13 अरब 70 करोड़ साल पहले हुए विस्फोट के एकदम बाद की स्थिति की एक बड़ी प्रयोगशाला में पुनर्रचना करने की कोशिश की जा रही है। इससे बहुत सारे बुनियादी सत्य उजागर होंगे, जिनके बारे में धर्म के पास कोई भी तार्किक जवाब नहीं है। हमें कई उत्तर मिलेंगे।
जैसे वैज्ञानिकों के पास इसका जवाब नहीं है कि महाविस्फोट के बाद से जो आदिकण बने, उनमें भार कहाँ से आया। बिना भार के दो इलेक्ट्रॉन आपस में जुड़ ही नहीं सकते। इस जुड़ाव से ही फिर भाँति-भाँति के पदार्थों का ठोस, द्रव और गैस के रूप में जन्म हुआ।
इसके लिए 'हिग्स' कणों की परिकल्पना की गई है, जिन्हें ईश्वरीय कण भी कहा जाता है। दो प्रोटीन पुंजों की टकराहट से वैज्ञानिकों को इन हिग्स कणों के बारे में ही नहीं, डार्क मैटर आदि के बारे में भी जानकारी मिल सकती है। इस प्रयोग ने जिन अनंत आँकड़ों की पूँजी मनुष्य को सौंपी है, उनका प्रारंभिक विश्लेषण करने में करीब छह महीने लगेंगे।
वैज्ञानिक अंतरिक्ष का कोई अतिरिक्त आयाम भी ढूँढना चाहते हैं। किसी भी वस्तु के तीन आयाम होते हैं, लेकिन अंतरिक्ष का एक आयाम टाइम या काल भी माना जाता है। कई वैज्ञानिक शोध ब्रह्मांड के 11 आयामों की ओर संकेत करते हैं।
जाहिर है ब्रह्मांड के रहस्यों से उठने वाला कोई भी पर्दा प्रकारांतर से ईश्वर के अस्तित्व पर भी वाजिब सवाल खड़ा कर सकता है, जैसे मनुष्य ने प्रयोगशाला में क्लोन बनाकर किए भी हैं। तब हमें पता चलेगा कि इस सृष्टि के निर्माण की यही वैज्ञानिक व्याख्या है, जो सही है। यह तो नहीं कह सकते कि तब हमारी दुनिया पूरी तरह बदल जाएगी, लेकिन इतना जरूर है कि तब ईश्वर और धर्म के बारे में मनुष्य के विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा। (नईदुनिया)

{स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " आज हमको बुद्धि के इस प्रखर सूर्य ' शंकराचार्य ' के साथ बुद्धदेव का अद्भुत प्रेम और दयायुक्त अद्भुत ह्रदय चाहिये| इसी सम्मिलन से हमें उच्चतम दर्शन की उपलब्धि होगी| विज्ञान और धर्म एक दूसरे का आलिंगन करेंगे| कविता और विज्ञान मिल जायेंगे| यही भविष्य का धर्म होगा|
" अग्निः यथा एको भुवनम प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव |
एकः तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च || 
(कठ २:२:९)
- जिस प्रकार एक ही अग्नि निराकार रूप से सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, उस समय उसमे कोई भेद नहीं है, परन्तु जब वह साकार रूप से प्रज्वलित होता है, तब उन आधारभूत वस्तुओं (चकमक पत्थर, लकड़ी और युरेनियम)
का  जैसा आकार होता है, वैसा ही आकार अग्नि का भी दृष्टिगोचर होती है, उसी प्रकार सारे जीवों की अन्तरात्मा वह ब्रह्म (परम सत्य) ही भिन्न-भिन्न प्राणियों में उन उन प्राणियों के अनुरूप नाना रूपों में प्रकाशित होते हैं, फिर वह जगत के बाहर भी है|
भाव यह कि आधारभूत वस्तु के अनुरूप ही उनकी महिमा का प्रकाट्य होता है| किन्तु वह परम सत्य इतना ही नहीं है इससे बहुत अधिक विलक्षण है|...विज्ञान किस ओर जा रहा है, यह क्या तुम नहीं देखते?
...मनस्तत्व में से होकर हम उसी एक अनन्त सार्वभौमिक सत्ता में पहुँच रहे हैं, जो सब वस्तुओं कि अन्तरात्मा है, जो सबका सार और सभी वस्तुओं का सत्य है, जो नित्य मुक्त, नित्यानन्द और नित्य सत्ता है|बाह्य विज्ञान के द्वारा भी हम उसी एक तत्व पर पहुँच रहे हैं|यह जगत-प्रपंच उसी एक का विकास है! " (२:९४-९५) 
{ चन्द्रा ने ली दो टकराते ब्लैक होल की तस्वीर स्वप्निल भारतीय द्वारा बुधवार, 10/07/2009 - 16:32 को प्रकाशित अन्तरिक्ष विज्ञान सन २००२ मे इन टकराते श्याम विवरों का पता लगाया गया था। यह दोनो श्याम विवर(Black hole)  एक दूसरे से मात्र ३००० प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं और इस चित्र मे मध्य मे चमकीले बिन्दूओं की तरह दिखाई दे रहे हैं। है न आश्चर्य की बात -- दो श्याम विवरों को साक्षात देखना! वैज्ञानिक मानते हैं कि इन दोनो के बीच इतनी नजदीकी की वजह शायद यह है कि यह दोनो एक दूसरे के ऊपर सांप की तरह कुंडली मार रहे है -- यह कुंडली मारने की प्रक्रिया शायद ३०० लाख साल पहले शुरू हुई थी। श्याव विवर की खोज व अध्यन हाल के वर्षों मे शोध का बेहद सक्रिय क्षेत्र हो गया है। खासकर एन.जी.सी. ६२४० पर तो वैज्ञानिकों‌ की नजरें हमेशा टिकी रहती हैं।}
 उस मूल उदगम को य़ा उत्स (Source ) को जिससे सब कुछ निकला है, उस वस्तु को गीता में -" उर्ध्वमूलं अधः शाखम "- (गीता:१५:१)  कह कर उसका वर्णन किया गया है, तथा उपनिषद में उसीको - " उर्ध्वमूलः अवाक्शाखः एषो अस्वत्थः सनातनः " (कठ: ३:२:१) कहा है|
 अर्थात इस संसार रूप सनातन अश्वत्थ वृक्ष (पीपल का वृक्ष जो कल नहीं रहेगा, पर अभी दीखता है) का मूल ऊपर में और शाखायें नीचे की ओर हैं| इसका जो मूल कारण है, जिससे यह उत्पन्न होता है, जिससे सुरक्षित है और जिसमे विलीन होता है, वह ब्रह्म-वस्तु ऊपर है, कोई भी उसका अतिक्रमण करने में समर्थ नहीं है|...ऐसा यह ब्रह्माण्ड रूप पीपल-वृक्ष अनादी कालीन- सदा से है| सत्य यही है कि एक ही " वस्तु " से सबकुछ उत्पन्न हुआ है!
[स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " जिन्हें आत्मा की अनुभूति य़ा ईश्वर (सत्य) -साक्षात्कार नहीं हुआ हो, उन्हें यह कहने का क्या अधिकार है कि आत्मा य़ा ईश्वर है? यदि ईश्वर हो, तो उसका साक्षात्कार करना होगा; यदि आत्मा नामक कोई चीज हो, तो उसकी उपलब्धि करनी होगी| अन्यथा ईश्वर (य़ा सत्य ) पर विश्वास न करना ही भला| ढोंगी होने स्पष्टवादी नास्तिक होना अच्छा है|
....यदि लोगों को ईश्वर की सत्ता में विश्वास रहेगा, तो वे सत (ईमानदार)  और नीतिपरायण बनेंगे इसलिए अच्छे (योग्य) नागरिक होंगे|" (वि० सा० ख० १:३७)
स्वामीजी अन्यत्र कहते हैं -" सत्य की खोज करो- इस नित्य परिवर्तनशील नश्वर जगत में क्या सत्य है, इसकी खोज करो| कुछ भौतिक परमाणुओं के समष्टिस्वरूप इस देह के भीतर क्या कोई ऐसी चीज है जो सत्य हो?" (२:५) 
" यह आपातप्रतीयमान व्यक्तितित्व (M /F ) वास्तव में भ्रम मात्र है; इस भ्रमातक व्यक्तित्व में आसक्त रहना- अत्यन्त नीच कार्य है,...आत्मत्याग का अर्थ है, इस मिथ्या व्यक्तित्व का त्याग सब प्रकार(स्वयं को स्त्री-पुरुष मान कर मन से सब प्रकार के भोगों की इच्छा य़ा ) की स्वार्थपरता का त्याग| यह अहंकार और ममता पूर्व कुसंस्कारों के फल हैं और जितना ही इस (मिथ्या) 'व्यक्तित्व ' का त्याग होता जाता है, उतनी ही आत्मा अपने नित्य स्वरूप में, अपनी पूर्ण महिमा में अभिव्यक्त होती है|...यही समस्त नैतिक शिक्षा का आधार है |" (२:१५)
" हम इन्द्रिय-सुख की सस्ती वस्तु के शिकार हैं, भले ही उससे हमारा सर्वनाश ही क्यों न हो| हमने यह भुला दिया है कि जीवन में और अधिक महान वस्तुएं हैं|...ईश्वर ने एक बार धरती पर वराह-अवतार लिया; उनकी एक शूकरी भी थी| कालान्तर में उनके कई शूकर संतानें हुईं|अपने परिवारवालों के बीच वे बड़े चैन से रह रहे थे| कीचड़ में लोटते हुए वे खूब मस्त थे| वे अपनी दिव्य महिमा एवं प्रभुता भूल बैठे| देवता बड़े चिंतित हुए|
वे धरती पर उतर आये और उनसे शूकर-शरीर का त्याग कर देवलोक लौट चलने की विनती करने लगे| ईश्वर ने उनकी एक न सुनी और उन सब को दुत्कार दिया| वे बोले ' मैं इसी योनी में बड़ा प्रसन्न हूँ और इस रंग में भंग देखना नहीं चाहता|'
कोई चारा न देख देवताओं ने प्रभु का शूकर-शरीर नष्ट कर दिया| तत्क्षण ईश्वर की दिव्य भव्यता लौट आई और वे बड़े विस्मित थे कि शूकर-स्थिति में वे प्रसन्न रहे कैसे! मानवीय आचरण भी इसी प्रकार का है| जब कभी वे लोग - (उर्ध्वमूल) निर्गुण ईश्वर (Super -Consciousness ) की चर्चा सुनते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया होती है कि ' मेरे व्यक्तित्व का क्या होगा? मेरा तो व्यक्तित्व ही लुप्त हो जायेगा|'फिर कभी ऐसा विचार मन में उठे तो उस शूकर की दशा याद कर लेना|" 
(९:८२) 
" हे नर-नारियों ! उठो, आत्मा के सम्बन्ध में जाग्रत होओ, सत्य में विश्वास करने का साहस करो, सत्य के अभ्यास का साहस करो| संसार को कोई सौ साहसी नर-नारियों की आवश्यकता है| अपने में वह साहस लाओ, जो सत्य को जान सके, जो जीवन में निहित सत्य को दिखा सके, जो मृत्यु से न डरे, प्रत्युत उसका स्वागत करे, जो मनुष्य को यह ज्ञान करा दे कि वह आत्मा है और सारे जगत में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो उसका विनाश कर सके | " (२:१८) ]
 
बिल्कुल हाल -फ़िलहाल में चीन, जापान, युरोप, अमेरिका जैसे देशों  के १८ गणितज्ञ ने हफ़्तों-महीनों-वर्षों तक मिहनत करके एक ऐसा अंक बनाएं हैं, जो अंक  इतना जटिल है कि अभी तक पृथ्वी पर कोई ऐसा कंप्यूटर नहीं बना जिससे उसे हल किया जा सकता हो| यह अंक इतना बृहत् है कि लिखने पर अमेरिका का पूरा मैनहट्टन द्विप को ही भर दिया जा सकता है| 

{Is this the fabric of the universe?

Last Updated: 12:01am GMT 19/03/2007

Roger Highfield describes a heroic mathematical enterprise that could lay bare 

 the fundamentals of the cosmos.

Mathematicians have successfully scaled their equivalent of Mount Everest. Today they unveil the answer to a problem that, 
if written out in tiny print, 
would cover an area the size of Manhattan.

At the most basic level, the calculation is an arcane investigation of symmetry – in this case of an object that is 57 dimensional, rather than the usual three dimensional ones that we are familiar with. Although this object was first discovered in the 19th century. there is evidence that it could contain the structure of the cosmos.
Mathematicians are known for their solitary style of working, but the combined assault on what is described as 
"one of the largest and most complicated structures in mathematics" required the effort of 18 mathematicians 
from America and Europe for an intensive four-year collaboration.
The feat may baffle most people but could have unforeseen implications in mathematics and physics, which won’t be evident for years to come, said the American Institute of Mathematics.
"The group of symmetries of this strange geometry called E8 is one of the most intriguing structures that Nature has left for the mathematician to play with," commented Prof Marcus du Sautoy of Oxford University, currently in Auckland. "Most of the time mathematical objects fit into nice patterns that we can order and classify. But this one just sits there like a huge Everest."
What makes this group of symmetries so exciting is that Nature also seems to have embedded it at the heart of many bits of physics. One interpretation of why we have such a quirky list of fundamental particles is because they all result from different facets of the strange symmetries of E8. 
 I find it rather extraordinary that of all the symmetries that mathematicians have discovered, it is this exotic exceptional object that Nature has used to build the fabric of the universe. The symmetries are so intricate and complex that today’s announcement of the complete mapping of E8 is a significant moment in our exploration of symmetry."

For the feat, the team used a mix of theoretical mathematics and intricate computer programming to successfully map E8, (pronounced "E eight") which is an example of a Lie (pronounced "Lee") group. Lie groups were invented by the 19th century Norwegian mathematician Sophus Lie to study symmetry.
Underlying any symmetrical object, such as a sphere, is a Lie group. Balls, cylinders or cones are familiar examples of symmetric three-dimensional objects. 

Today’s feat rests on the drive by mathematicians to study symmetries in higher dimensions. E8 is the symmetries of a geometric object that is 57-dimensional. E8 itself is 248-dimensional.
"E8 was discovered over a century ago, in 1887, and until now, no one thought the structure could ever be understood," 
said Prof Jeffrey Adams, Project Leader, at the University of Maryland.
"This groundbreaking achievement is significant both as an advance in basic knowledge, as well as a major advance in the use of large scale computing to solve complicated mathematical problems."
"This is an exciting breakthrough," said Prof Peter Sarnak at Princeton University. "Understanding and classifying the representations of E8 and Lie groups has been critical to understanding phenomena in many different areas of mathematics and science including algebra, geometry, number theory, physics and chemistry. This project will be invaluable for future mathematicians and scientists."
The ways that E8 manifests itself as a symmetry group are called representations. The goal is to describe all the possible representations of E8. These representations are extremely complicated, but mathematicians describe them in terms of basic building blocks. 

The new result is a complete list of these building blocks for the representations of E8, and a precise description of the relations between them, all encoded in a matrix, or grid, with 453,060 rows and columns. There are 205,263,363,600 entries in all, each a mathematical expression called a polynomial. 
If each entry was written in a one inch square, then the entire matrix would measure more than seven miles on each side.
The result of the E8 calculation, which contains all the information about E8 and its representations, is 60 gigabytes in size. This is enough to store 45 days of continuous music in MP3-format. If written out on paper, the answer would cover an area the size of Manhattan
The computation required sophisticated new mathematical techniques and computing power not available even a few years ago.

"This is an impressive achievement," said Hermann Nicolai, Director of the Albert Einstein Institute in Potsdam, Germany. "While mathematicians have known for a long time about the beauty and the uniqueness of E8, we physicists have come to appreciate its exceptional role only more recently - yet,
in our attempts to unify gravity with the other fundamental forces into a consistent theory of quantum gravity, we now encounter it at almost every corner," he said, referring to efforts to combine the theory of the very big (general relativity) with the very small (quantum mechanics). 

"Thus, understanding the inner workings of E8 is not only a great advance for pure mathematics, but may also help physicists in their quest for a unified theory."
[अंक लिखने का इतिहास
अधिकतर सभ्यताओं में लिपि के अक्षरों को ही अंक माना गया। रोमन लिपि के अक्षर I को एक अंक माना गया क्योंकि यह शक्ल से एक उंगली जैसा है। इसी तरह II को दो अंक माना गया क्योंकि यह दो उंगलियों की तरह है। रोमन लिपि के अक्षर V को ५ का अंक माना गया। यदि आप हंथेली को देखे जिसकी सारी उंगलियां चिपकी हो और अंगूंठा हटा हो तो वह इस तरह दिखेगा। रोमन X को उन्होंने दस का अंक माना क्योंकि यह दो हंथेलियों की तरह हैं। L को पच्चास, C को सौ, D को पांच सौ और N को हजार का अंक माना गया। इन्हीं अक्षरों का प्रयोग कर उन्होंने अंक लिखना शुरू किया। इन अक्षरों को किसी भी जगह रखा जा सकता था। इनकी कोई भी निश्चित जगह नहीं थी। ग्रीक और हरब्यू (Hebrew) में भी वर्णमाला के अक्षरों को अंक माना गया उन्हीं की सहायता से नम्बरों का लिखना शुरू हुआ।
नम्बरों को अक्षरों के द्वारा लिखने के कारण न केवल नम्बर लिखे जाने में मुश्किल होती थी पर गुणा, भाग, जोड़ या घटाने में तो नानी याद आती थी। अंक प्रणाली में क्रान्ति तब आयी जब भारतवर्ष ने लिपि के अक्षरों को अंक न मानकर, नयी अंक प्रणाली निकाली और शून्य को अपनाया। इसके लिये पहले नौ अंको के लिये नौ तरह के चिन्ह अपनाये जिन्हें १,२,३ आदि कहा गया और एक चिन्ह ० भी निकाला। इसमें यह भी महत्वपूर्ण था कि वह अंक किस जगह पर है। इस कारण सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे अंक इन्हीं की सहायता से लिखे जाने लगे और गुणा, भाग, जोड़ने, और घटाने में भी सुविधा होने लगी। यह अपने देश से अरब देशों में गया।]ये गणितज्ञ लोग आशा कर रहे हैं कि, इसी अंक की सहायता से, प्रकृति में जितनी भी प्रकार की शक्तियाँ क्रियाशील हैं (-  नक्षत्र नक्षत्र के बीच, ग्रह और उसके उपग्रह के बीच, य़ा प्रयेक वस्तु में सन्निहित गुरुत्वाकर्षण में जिस शक्ति के रहने से अणु-परमाणु के भीतरी गतिशीलता के बीच जो आकर्षण-विकर्षण की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है) उन समस्त शक्तियों के मूल में जो एक ही शक्ति विभिन्न रूपों में क्रियाशील है उसका सन्धान प्राप्त हो जायेगा|  
उस शक्ति का मूल भी उसी ' उर्ध्वमूल ' में स्थित है ! इन सिद्धान्तों को विज्ञान ने तो कभी अस्वीकार नहीं ही किया, बल्कि धीरे धीरे वह स्वयं भी उसी ' सत्य ' की ओर अग्रसर हो रहा है|
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- 
" इस समस्त विश्व में एक सत वस्तु ओतप्रोत है; और वह देश, काल तथा (निमित्त ) कार्य-कारण के जाल में मानो फँसी हुई है| मनुष्य का सच्चा स्वरूप वह है, जो अनादी, अनन्त, आनन्दमय तथा नित्य मुक्त है, वही देश, काल और परिणाम के फेर में फंसा है| यही प्रत्येक वस्तु के सम्बन्ध में भी सत्य है| प्रत्येक वस्तु का परमार्थ स्वरूप वही अनन्त है|
यह विज्ञानवाद (प्रत्याय वाद ) नहीं है, इसका अर्थ यह नहीं कि विश्व का अस्तितिव ही नहीं है| इसका अस्तित्व सापेक्ष है, और सापेक्षता के सब लक्षण इसमें विद्यमान हैं| लेकिन इसकी स्वयं की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है| यह इसलिए विद्यमान है कि इसके पीछे देश-काल-निमित्त से अतीत निरपेक्ष आद्वितीय सत्ता मौजूद है| " (३:११९)
किन्तु प्राचीन काल में जो लोग अपने अंतर्जगत में ही स्थित अमृतस्वरूप सत्य को पाने की इच्छा से ' आवृत्तचक्षू:' अर्थात मन को बाह्य जगत में जाने से रोक कर उसकी दृष्टि को अंतर्जगत (ह्रदय) में नियोजित रखने में समर्थ हो जाते थे, वे (ऋषि लोग) आन्तरिक उज्ज्वलता (चित्त-शुद्धि) के प्रकाश में उस सत्य का अवलोकन करते थे|
{स्वामी विवेकाननद की शिक्षा : 
' मनुष्य का पुनरुत्थान '
     (Revivification  of men )   
चेतन मन ही अचेतन का कारण है| हमारे जो लाखों पुराने चेतन विचार और चेतन कार्य थे,वे ही घनीभूत होकर प्रसुप्त हो जाने पर हमारे अचेतन विचार बन जाते हैं|हमारा उधर ख्याल ही नहीं जाता,हमे उनका ज्ञान नहीं होता, हम उन्हें भूल जाते हैं|...वे ही प्रसुप्त कारण एक दिन मन के ज्ञानयुक्त क्षेत्र पर आ उठते हैं और मानवता का नाश कर देते हैं| अतएव सच्चा मनोविज्ञान (मनः संयम का अभ्यास)उनको (अचेतन मन को) चेतन मन के अधीन लाने का प्रयत्न करेगा| अतएव शिक्षा का सबसे महत्व पूर्ण कार्य है,पूरे मनुष्य को पुनरुज्जीवित (नये सिरे से जीवित) जैसा कर देना,जिससे कि वह अपना पूर्ण स्वामी बन जाये|अचेतन को अपने अधिकार में लाना हमारी साधना का पहला भाग है|दूसरा है- चेतन के परे -("उर्ध्वमूल"Super -Conscious अतिचेतन ) में जाना ! जिस तरह, अचेतन चेतन के नीचे - उसके पीछे रहकर कार्य करता है, उसी तरह चेतन के ऊपर-उसके अतीत भी एक अवस्था है|जब मनुष्य इस अतिचेतन अवस्था में पहुँच जाता है, तब वह मुक्त हो जाता है, ईश्वरत्व को प्राप्त हो जाता है| 
ब मृत्यु अमरत्व में परिणत हो जाती है, दुर्बलता असीम शक्ति बन जाती है और अज्ञान की लौह श्रृंखलाएँ मुक्ति बन जाती हैं!अतिचेतन(Super Consciousness : उर्ध्वमूल) का यह असीम राज्य ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है! 
अतएव यह स्पष्ट है कि हमे दो कार्य अवश्य ही करने होंगे| एक तो यह कि इड़ा और पिंगला के प्रवाहों का नियमन करअचेतन कार्यों को नियमित करना;  और दूसरा, इसके साथ ही साथ चेतन के भी परे चले जाना| 
  ग्रंथों में कहा गया है कि योगी वही है, जिसने दीर्घ काल तक चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करके ( य़ा अनायास भगवत कृपा से भी ) इस सत्य की उपलब्धि कर ली है|अब सुषुम्ना का द्वार खुल जाता है और इस मार्ग में वह प्रवाह प्रवेश करता है, जो इसके पूर्व उसमे कभी नहीं गया था, यह धीरे धीरे विभिन्न कमल-चक्रों को खिलाता हुआ अन्त में मस्तिष्क तक पहुँच जाता है| तब योगी को अपने सत्यस्वरूप का ज्ञान हो जाता है, वह जान लेता है कि वह स्वयं परमेश्वर ही है|
हममें से प्रत्येक व्यक्ति, बिना किसी अपवाद के, योग के इस अन्तिम अवस्था को प्राप्त कर सकता है| लेकिन यह अत्यन्त कठिन कार्य है|यदि मनुष्य को इस सत्य का अनुभव करना हो ...कुछ विशेष साधनाएँ भी करनी होंगी (य़ा महामण्डल का निष्ठावान कर्मी बनने से अनायास T की कृपा से भी होगा ) | महत्व है तैयारी ही का|दीपक जलाने में कितनी देर लगती है?केवल एक सेकंड, लेकिन उस मोमबत्ती को बनाने में कितना समय लग जाता है! "  (३: १२१-१२२) 
" जब कोई भी मनुष्य यह दावा करता है कि ' मैं सत्य को जानता हूँ|' तो मैं कहता हूँ, ' यदि तुम सत्य को जानते हो, तो तुममें आत्मनियंत्रण होना चाहिये; और यदि तुममे आत्मनियंत्रण है, तो इन (मस्तिष्क में स्थित) इन्द्रियों के नियन्त्रण करने में समर्थ बन कर सिद्ध कर दो!.. जब मैं ध्यान के लिये बैठता हूँ, तो मन में संसार के सब बुरे से बुरे विषय उभर आते हैं|
मतली आने लगती है (ऐसा लगता है मानो अपना कान ऐंठ कर अपने चेहरे पार खुद ही थप्पड़ मारूँ)| मन ऐसे विचारों को क्यों सोचता है, जिन्हें मैं नहीं चाहता कि वह सोचे ? मैं मानो मन का दास हूँ|जब तक मन चंचल है और वश से बाहर है, तब तक कोई आध्यात्मिक ज्ञान संभव नहीं है| शिष्य (विद्यार्थी) को मनः संयम सीखना ही होगा| हाँ, मन का कार्य है सोचना ! पर यदि शिष्य जिन विचारों को सोचना नहीं चाहता, तो मन में वैसे विचार आने ही नहीं चाहिये! जब वह आज्ञा दे, तो मन को सोचना भी बन्द कर देना चाहिये|" (३:१९३)

" तुम जो जो आवश्यक समझते हो, सब रखो, यहाँ तक कि उससे अतिरिक्त वस्तुएं भी रखो- इससे कोई हानी नहीं| पर तुम्हारा प्रथम और प्रधान कर्तव्य है- सत्य को जान लेना, उसको प्रत्यक्ष कर लेना|" (२:१५२)" सत्य को प्राप्त करने में निमिष मात्र लगता है- प्रश्न केवल जान लेने भर का है| स्वप्न टूट जाता है, उसमे कितनी देर लगती है ? एक सेकण्ड में स्वप्न का तिरोभाव हो जाता है| जब भ्रम का नाश होता है, तो उसमे कितना समय लगता है ? पलक झपकने में जितनी देर लगती है, उतनी| 
जब मैं सत्य को जानता हूँ, तो इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं होता कि - ' असत्य ' (नाम-रूप) गायब हो जाता है| मैंने रस्सी को सर्प समझ लिया था और अब जानता हूँ कि वह रस्सी है| प्रश्न केवल आधे सेकण्ड का है| और सब कुछ हो जाता है ! तू वह है! तू वास्तविकता है ; इसे जानने में कितना समय लगता है? ..ईश्वर जीवन है; ईश्वर सत्य है| फिर भी इस स्वतः प्रत्यक्ष सत्य को प्राप्त करना कितना कठिन जान पड़ता है! " ( ३:१९०)
{उपनिषद में कहा गया है- 'आवृत्तचक्षू:  अमृतत्व इच्छन ' (कठ : २:१)कोई विरला ही बुद्धिमान मनुष्य ऐसा होता है जो सत्संग, स्वाध्याय तथा भगवत्कृपा से मन के इन्द्रिय विषय-भोगों में जाने की परिणाम दुःखता को जानकर अमृतस्वरूप सत्य-वस्तु को पाने की इच्छा से ' आवृत्त चक्षू: ' - अर्थात अपने मन और इन्द्रियों को  बाह्य विषयों से लौटाकर, ह्रदय में स्थित अन्तरात्मा में नियोजित रखने में समर्थ हो पाता है, वह उस सत्य-वस्तु (परमात्मा T) का दर्शन कर लेता है|)
उस सत्य को अपने ह्रदय में अनुभव कर लेना ही आध्यात्मिकता हैं! आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न मनुष्य य़ा सत्य को अपने ह्रदय में अनुभव कर लेने वाला मनुष्य यह जान लेता है कि, मनुष्य का शरीर तो वृद्धि और जरा को प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है, ध्वंश हो जाने पर उसे मिट्टी में दफ़न कर दिया जाता है, आग में जला दिया जाता है, किसी गाँछ-वृक्ष के ऊपर रख दिया जाता है, वहन कोई गिद्ध य़ा चिल्ह उसे खा लेते हैं, मनुष्य के शरीर का अन्तिम संस्कार कई प्रकार से किया जाता है| 
किन्तु आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न मनुष्य य़ा सत्य को अपने ह्रदय में अनुभव कर लेने वाला मनुष्य यह जान लेता है कि, शरीर का अन्तिम संस्कार कर देने भर से ही, सब कुछ समाप्त नहीं हो जाता| स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " मृत्यु, दुःख तथा इस संसार में मनुष्य को मिलनेवाले अनेक जोरदार- झटके केवल वही मनुष्य पार कर सकता है, जिसने सत्य जान लिया है| सत्य क्या है ? सत्य वह है, जिसमे कोई विकार उत्पन्न नहीं होता, मनुष्य की आत्मा, विश्व की आत्मा ही सत्य है|...जो अनेकता में एकमेवाद्वितीय को समझता है और उसका अपनी आत्मा में दर्शन करता है, वही शाश्वत शान्ति का अधिकारी होता है, दूसरा कोई नहीं , दूसरा कोई नहीं|" (३:१६४-६५)
 " मृत्यु के समय भी तुम्हारे अधरों पर सोsअहं ,सोsअहं खेलता रहे | यही सत्य है- जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे भीतर है| जो कुसंस्कार तुम्हारे मन को ढके हुए है, उन्हें भगा दो| साहसी बनो| सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो| चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो, जागो, जब तक ध्येय तक न पहुँचो, तबतक मत रुको! " (२:२०) }
 मनुष्य के भीतर जो सत्ता है,वह सत्ता भी उस सत्य के साथ अभिन्न है - इस बोध का थोड़ा स भी अंश, एक कणमात्र भी जाग्रत होना आध्यात्मिकता है!आध्यात्मिकता प्राप्त होने से क्या लाभ होता है ? यही कि हमलोग सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड के साथ एकत्व की अनुभूति करते हैं !
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है - " जिन व्यक्तियों ने इस जीवन में ही इस अवस्था को प्राप्त कर लिया है, जिन्हें कम से कम एक मिनट के लिये भी संसार का यह साधारण दृश्य बदलकर सत्य का ज्ञान मिल गया है, उन्हें जीवन्मुक्त कहते हैं|जीवित रहते हुए यह मुक्ति प्राप्त करना ही वेदांती का लक्ष्य है|.... हम प्रतिदिन, प्रतिमास, प्रतिवर्ष इस जगत रूपी मरुस्थल में भ्रमण कर रहे हैं पर मरीचिका को मरीचिका नहीं समझ पा रहे हैं| एक दिन वह मरीचिका अदृश्य हो जाएगी|पर वह फिर से आ जाएगी-शरीर  को पूर्व कर्मों के अधीन रहना पड़ता है, अतः वह मरीचिका फिर से लौट आएगी| जबतक हम कर्म से बन्धे हुए हैं, तब तक जगत हमारे सम्मुख आयेगा ही| ....पर वे पहले की भाँति हमपर प्रभाव न डाल सकेंगे|इस नवीन ज्ञान के प्रभाव से कर्म की शक्ति का नाश हो जायेगा, उसके विष के दाँत टूट जायेंगे; जगत हमारे लिये एकदम बदल जायेगा; क्योंकि जैसे ही जगत दिखायी देगा, वैसे ही उसके साथ उसका स्वरूप और सत्य तथा मरीचिका के भेद का ज्ञान भी हमारे सामने प्रकाशित हो जायेगा|" (२: ३६) 
" मैं पुरुष य़ा स्त्री हूँ, मैं अमुक देशवासी हूँ, यह सब कहना केवल मिथ्या है| सभी देश मेरे हैं, सारा विश्व मेरा है; ...सारा विश्व ही मानो मेरा शरीर हो गया है| किन्तु हम देखते हैं कि संसार में बहुत से लोग ये सब बातें मुख से कहने पर भी आचरण में सभी प्रकार के अपवित्र कार्य करते रहते हैं; ... जब तक अशुभ-वेग एकदम समाप्त नहीं हो जाता, जब तक पहले की अपवित्रता बिल्कुल दग्ध नहीं हो जाती, तब तक कोई भी सत्य का साक्षात्कार और उसकी उपलब्धि नहीं कर सकता|अतएव जिन लोगों ने आत्मा को प्राप्त कर लिया है, जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार कर लिया है, उनके लिये अतीत जीवन के शुभ संस्कार, शुभ वेग ही बच रहता है| शरीर में वास करते हुए भी और अनवरत कर्म करते हुए भी वे केवल सत्कर्म ही करते हैं;उनके मुख से सब के प्रति केवल आशीर्वाद ही निकलता है, उनके हाथ केवल सत्कार्य ही करते हैं, उनका मन केवल सत्चिन्तन ही कर सकता है, उनकी उपस्थिति ही, चाहे वे कहीं भी रहे सर्वत्र मानव जाती के लिये महान आशीर्वाद होती है| " (२: ३८)

" मस्तिष्क एवं ह्रदय दोनों की ही हमें आवश्यकता है| अवश्य ह्रदय बहुत श्रेष्ठ है- ह्रदय के मध्यम से जीवन की महान अन्तः प्रेरणाएं आती हैं| मस्तिष्क वान किन्तु ह्रदय शून्य- मनुष्य बनने की अपेक्षा मै सौगुना अधिक चाहूँगा कि भले मेरे पास दिमाग न हो, पर थोड़ा स ह्रदय अवश्य प्राप्त हो! जिसके ह्रदय है, उसीका जीवन संभव है, उसीकी उन्नति संभव है; किन्तु जिसके तनिक भी ह्रदय नहीं, केवल मस्तिष्क है, वह सूखकर मर जाता है|...पर जो केवल अपने ह्रदय के द्वारा परिचालित होते हैं, उन्हें अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं, ...हमको चाहिये - ह्रदय और मस्तिष्क का समन्वय|... इस वैराग्य का अर्थ शुष्क आत्महत्या नहीं है| वेदान्त में वैराग्य का अर्थ है, जगत को ब्रह्म-रूप देखना! " (२:१४९-५०)}
हमलोग विश्व-ब्रह्माण्ड से अलग कोई भिन्न वस्तु नहीं हैं, हमलोग भी इस विश्व-ब्रह्माण्ड के लघु अंश हैं! इसीलिये -श्रीश्रीमाँ सारदा देवी का अत्यन्त सरल भाषा में दिया गया वह उपदेश घूम-फिर कर सामने आ ही जाता है कि -" इस जगत में कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं! "(अगर वर्ष १९६७ के वैज्ञानिक खोज के आधार पर भी देखा जाय तो यही सिद्ध होता कि - There are no Alien - extraterrestrial civilization. Bell, who called the source LGM1 -' Little Green Men 1 ')
" जगत तुम्हारा अपना है, कोई पराया नहीं है ' - इस बोध को ही आध्यात्मिकता कहा जाता है| यही है -सच्चा धर्म ! सच्चा धर्म वह है जो धारण करता है| किन्तु हमलोगों का धारण नहीं हो रहा है, हमलोगों का तो विनाश हो रहा है| सम्पूर्ण जगत हमलोगों का विनाश करने पर उतारू है; तथा हमलोग क्रमागत धीरे धीरे विनाश की ओर बढ़ते जा रहे हैं|किन्तु यदि हम विनष्ट हो जाने से बचना चाहते हैं, पुनरुज्जीवित होना चाहते हों तो, इसके लिये जिस सन्जीवनी शक्ति की आवश्यता है- वह इसी आध्यात्मिकता में अन्तर्निहित है| अतः जगत के समस्त मनुष्यों की दृष्टि को इसी आध्यात्मिकता की ओर आकृष्ट कराने का प्रयत्न करना आवश्यक है| इसीलिये वर्त्तमान युग में, इस युग के युगावतार श्रीरामकृष्ण देव, जगज्जननी माँ सारदा, जगत-बन्धु स्वामी विवेकानन्द इसी आध्यात्मिकता रूपी अद्भुत संजीवनी शक्ति को हमलोगों के निकट उपलब्ध करा दिये हैं| प्राचीन काल में भारतवर्ष में जितने भी ऋषि-मुनि इतने दिनों तक थे,इतने शास्त्र थे, इन शास्त्रों को भी बहुत सारे लोग भुला चुके थे, श्रीरामकृष्ण देव ने अपने जीवन को ही अद्भुत दृष्टान्त स्वरूप गढ़ कर, उसके ही आलोक में उन समस्त विस्मिर्त हो चुके वेद-उपनिषदों को मानव समाज के सामने पुनर्स्थापित करा दिया! उन्होंने उसी पुरातन ज्ञान को बिल्कुल सरल और सहज भाषा में नये ढंग से प्रस्तुत किया|इसीलिये प्राचीन युग के ऋषियों मुनियों के जैसा अत्यन्त ज्ञान, पाण्डित्य अत्यन्त शास्त्रज्ञ होने का तनिक भी भाव उनके अन्दर नहीं था| बिकुल ही प्रकृति की गोद में पले-बढे सरल ग्राम्य जीवन में जन्म से ही पढने-लिखने की ओर नहीं गये, पाठशाला में यदि गये भी तो केवल योग करना सीख पाये, वियोग करना नहीं हो सका|इसीलिये केवल योग ही चलने लगा, स्वयं भी वियोग नहीं सीखे न दूसरों को ही वियोग सीखा पाये| क्योंकि समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड महायोग में युक्त है, इसमें कहीं वियोग नहीं है|   
    (और यही सत्य है! ॐ )
 श्रीरामकृष्ण परमहंस कहते हैं, 'सारी विद्याएं अधूरी हैं। जो परमात्मा को जान गया उसी का जीवन सफल है। जिसने प्रभु का आश्रय लिया है, वही इस भवसागर से पार हो सकता है। शेष लोगों का तो पूरा जीवन ही व्यर्थ में चला जाता है। 'विद्या' वही है जो प्रभु से मिला दे, जो भवसागर पार करा दे -वह ज्ञान सर्व श्रेष्ठ है। और खुद का ज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान कहलाता है। ऐसा ज्ञान जो जीवन को आनंद से सरोबार कर दे।'
 
           

































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