Tuesday, April 13, 2010

जीवन नदी के हर मोड़ पर [१४] " नेपोलियन हिल " - 'सफलता के सूत्र' (Law of Success )

मैं तो स्काटिश चर्च कॉलेज में भी दो वर्षों तक पढ़ा हूँ| नाम लिखाने का समय दादा (बड़े भैया) के लिये Science का और मेरे लिये आर्ट्स का फॉर्म मंगवा दिया गया | मैंने फॉर्म भर दिया| थोड़ी ही देर के बाद बाबा (बाबूजी) एक Science का फॉर्म ले आये और मुझे देने के बाद बोले- " तुम ये वाला फॉर्म भरो वो वाला नहीं |" उस समय अपने से बड़ों के सामने अपना मतामत बताना य़ा वादविवाद करना - ये सब कुछ नहीं था| 
स्काटिश चर्च में केमिस्ट्री के बड़े विख्यात अध्यापक थे- रवीन चाटुज्ये (रवीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय)| फिजिक्स के प्रोफ़ेसर थे-के.पी.घोष| फिर हमारे ही स्कूल के पूर्व छात्र देवेन मित्र -मैथेमेटिक्स के और विपिन कृष्ण घोष बंगला के प्रोफ़ेसर थे, इसके अलावे अन्य प्रोफ़ेसर गण भी थे| उन सबों के पढ़ाने का तरीका अद्भुत था|
इन्टरमेडीएट की परीक्षा दे चुका था| किन्तु उस समय घर की आर्थिक अवस्था कैसी है, इस सम्बन्ध में हमलोग कुछ नहीं जानते थे|तबतक रिजल्ट भी नहीं निकला था| बड़े भैया उस समय बिहार में रहने वाले किसी सम्बन्धी के यहाँ गये हुए थे|
बाबूजी शाम को आकर मुझसे बोले, " अमुक जगह के लिये एक दरखास्त लिखो, अमुक मेरे परिचित हैं,( बटकृष्ण श्रीमानी भी हमारे ही स्कूल के एक ही हेडमास्टरमशाई के छात्र थे), खबर भेजे हैं कि एक नौकरी केवल दरखास्त भेज देने से मिल सकती है|" भैया के बारे में कहे कि, " बड़का तो अभी घर में नहीं है,और दरखास्त एक-दो दिन में ही भेजना है, यहाँ तक कि कल ही देने से अच्छा होगा, इसीलिये चाहता हूँ कि तुम्ही दरखास्त लिख दो|" 

 मैंने अंग्रेजी में एक दरखास्त लिख दिया| लिखने के बाद दूसरे ही दिन बोले, " अच्छा होगा कि, तुम  आज ही निकल पड़ो|" मैंने सोचा नौकरी करने जा रहा हूँ तो सूट पहन कर जाना अच्छा रहेगा| इसीलिये बाबूजी का ही एक सूट पहना और दरखास्त ले कर घर से निकल पड़ा|

 मन में किसी प्रकार का क्षोभ नहीं, बस यही जनता था कि बाबूजी ने दरखास्त लिखने को कहा तो मैंने लिख दिया|बड़े भैया जब घर पर नहीं हैं तो मुझे ही जाना होगा, तो जाऊंगा| कई लोगों से पूछने पर पाता चला कि, अमुक ट्रेन से जाना होगा, रात के डेढ़ बजे ट्रेन वहाँ पहुंचेगी, वहाँ उतर कर किसी से पूछ कर गंतव्य तक जाना होगा|
रात के ढेढ़ बजे वहाँ उतर कर देखता हूँ कि स्टेशन वीरान सा है, इक्के-दुक्के लोग ही  
दिखाई दे रहे थे, टिमटिम करती रौशनी थी | मैंने सोचा, " ये मैं कहा आ गया !" एक दो लोग से पूछा तो इशारे से बता दिये, उस तरफ है! वह जिस ओर इशारा किया उधर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था| थोड़े बहुत जंगल-झाड़, उसके बाद छोटे सी पहाड़ी, उसके और दूरी पर एक बड़ा सा पहाड़| रात के डेढ़ बजे ट्रेन से उतरा हूँ, कहीं कोई रौशनी नहीं |
 पर कोई भय नहीं, कुछ नहीं|फिर साधारण चाल से उसी जंगल के बीच कि पगडंडियों से पैदल जाने लगा|रास्ते के दोनों ओर विशाल-विशाल शाल के बृक्ष भरे हुए थे| उबड़-खाबड़ रास्ते से चलते समय लगता कि कहीं चढ़ाई आगई है, कहीं ढलान से गुजर रहा हूँ, चलते चलते दूर पर दो-चार टीम-टिमाती सी रौशनी दिखाई देने लगी, देखा दो-चार घर दिखाई दे रहा है|
 घर के पास जाकर दरवाजा खटखटाया तो ' ज्येठाबाबू '(ताउजी) बाहर निकल कर बोले, " आच्छा, तूमि एसेछो, एसो,एसो | " ( अच्छा तुम आये हो, आओ,आओ ) मुझे पहचान लिये|दूसरे दिन सुबह मुझे अपने साथ ऑफिस ले गये|
मैं तो बाबूजी का सूट पहन कर गया था, पर यह भी नहीं जनता था कि मुझे कौन सी नौकरी मिलेगी| एक दक्षिण भारतीय ऑफिसर के पास ले गये, उन्होंने मुझसे अंग्रेजी में वार्तालाप किया| उनके साथ जैसे ही मैंने अंग्रेजी बोलना प्रारम्भ किया, वे तो मेरे चेहरे और पोशाक को देखा और बातचीत सुना, बस मेरे दरखास्त के ऊपर लिख दिया- " Take this boy against E.S.A.(Extra Staff Application)| और नौकरी भी मिल गयी|
क्या नौकरी करनी थी? वहाँ से उसी तरह के पहाड़ी रास्ते से चलते हुए, एक छोटी सी पहाड़ी नदी को पार करने के बाद, लगभग एक माइल कि दूरी पर एक छोटा पहाड़ है| वहाँ पर पहाड़ को ब्लास्ट करके बड़े बड़े बोल्डर को निकाला जाता था, फिर उसे क्रशर में डाल कर स्टोन चिप्स बनाया जाता था| वहीँ पर एक खपड़ा छाया हुआ एक (चाल) कोठरी थी, जहाँ एक (तख्तपोश ) चौकी बिछी थी| वहीँ पर बैठ कर मुझे यह हिसाब रखना था कि कितना चिप्स कहाँ गया | मैंने अपना काम शुरू कर दिया| मन में कोई क्षोभ नहीं कोई दुःख नहीं था| पचहत्तर रुपया महिना मिलता था|उन्ही के घर में रहता था, उनको बीस रूपया महिना दिया करता था|
 " Overseas Correspondence Course " से ' Electrical Engineering ' करने के लिये  टेकनिकल एडूकेशन प्रदान करने वाली एक संस्था इंग्लैण्ड में थी जिसका नाम -" इंग्लैण्ड BOAT " था| शायद उनके ही परामर्श से मैंने वहाँ एक दर्ख्स्त भेज दिया| उनलोग पत्राचार के माध्यम से किताबें भेजते थे, लेसन्स भेजते थे, प्रश्न भेजते थे| 
जब मैं उसी खपड़े की कोठरी में चौकी पर बैठ कर, स्टोन चिप्स का हिसाब लिख रहा था तो, उनलोगों की भेजी हुई किताब मिलीं| उनलोगों ने ' डंकन एवं स्टर्लिंग ' की लिखी हुई मैथेमेटिक्स की पुस्तक को भेजा था| वहाँ बैठे, बैठे, उसी किताब को पढता -लिखता, और कर भी क्या सकता था| सारे दिन बैठे रहना था, और कुछ करना नहीं था जब कोई हाफ-डाला का ट्रक य़ा बड़ा ट्रक आता तो उसमे कितना चिप्स गया उसका हिसाब रखता था- इतना ही तो मेरा काम था|
हठात चीफ इंजिनीयर आगये तो मैं सामने जाकर खड़ा हो गया|मैं जैसे ही खड़ा हुआ,वे उतरे और उतरते  ही मेरे हाथ में किताब देख कर पूछे- " What's that book? " किताब को अच्छी तरह से देखने के बाद सोंचे, अरे बाप यहाँ आकर पहाड़ के नीचे स्टोन चिप्स का हिसाब रखता है, इसका जैसा चेहरा है, और इसने जैसा ड्रेस पहना है, उसके बाद डंकन और स्टर्लिंग का मैथेमेटिक्स भी पढ़ता है, आगे कुछ मुझसे पूछे नहीं|
उसके बाद लगता है कुछ महीनो तक इसी तरह काम करता रहा|तब और एक दूसरा कार्य सौंप दिया गया, जिसके लिये मुझे कालकाता आते रहना पड़ता था| विभिन्न प्रतिष्ठानों में किसके यहाँ किन चीजों का ऑर्डर दिया गया था, उनमे से क्या-क्या चले गये क्या-क्या आया है- यह सब कुछ दिनों तक करने के बाद मैं सोचा- ' इस तरह तो समय बीता देना ठीक नहीं होगा '|
 उस समय मेरे घर पर पितामह की बातें सुनने के लिये एक सज्जन अक्सर आते रहते थे, वे अविभक्त बंगाल के Director of Land Records थे| मैंने उनसे कहा- " देखिये, इस प्रकार कलकाता से बाहर नौकरी करने के कारण मेरी तो पढाई लिखाई ही बन्द हो गयी है, अगर मेरी बदली कलकाता हो जाती तो थोड़ी पढाई-लिखाई भी हो सकती थी|" 
 तबतक मुझे इतना भी ज्ञात नहीं था कि नौकरी करते हुए भी पढाई -लिखाई कर पाना संभव है य़ा नहीं? 
जिस समय कम्पनी के काम से कलकाता आना पड़ता था, उस समय कालेजों में जा कर पूछा करता था,
 " आच्छा, दिनेर बेलाय कलेजे भर्ती ना हये पड़ाशुना करा जाय ? "  (दिन का समय में कालेज गये बिना भी क्या पढाई-लिखाई जारी रखी जा सकती है?) सभी मेरे मुख की ओर देख कर कहते, " हाँ क्यों नहीं किया जा सकता, कर सकते हो!" 
मैंने जब उनसे( डिरेक्टर ऑफ़ लैंड रेकॉर्ड्स ) कहा, तब उन्होंने कहा- " करा जाय, आच्छा आच्छा| " तब उन्होंने उस संस्था के प्रधान को कह दिया और एक वर्ष पूरा होने के पहले ही मेरी बदली हो गयी, मैं स्थानांतरित होकर कलकाता चला आया|
जब वहाँ से बदली करवा लिया तब वहाँ के लोग सोचने लगे, " बाबा, ऐ के रे! ऐ आसेउ निजेर ईच्छाये, जाएउ निजेर ईच्छाये| " ( बापरे , यह कौन विआइपि है रे, जो आता भी है अपनी ईच्छा से और जाता भी है अपनी ईच्छा से !) 
कलकाता आने के बाद, सुरेन्द्रनाथ कालेज (संध्या) के ' संध्या क्लास ' में भर्ती हो गया | वहाँ पर प्रियनाथ कुन्डू नामक केमेस्ट्री के प्रोफ़ेसर को देखा था| वे छात्रों को बहुत प्रेम करते थे, तथा एक नाईट कालेज के क्लास में अपने खर्चे से अच्छी अच्छी बातें लिखवा कर टंगवाया करते थे, अब तो यह सोचा भी नहीं जा सकता| 
वे कुछ दिनों बाद मुझसे बोले- " नवनी, तुमको एक किताब पढने के लिये कहूँगा, पढोगे? आजकल के लड़के तो बात ही नहीं सुनते हैं| 
 मैंने कहा, "कहिये|" 
उन्होंने कहा- " Napoleyon Hill की ' Law of Success ' पढ़ो, यह बहुत अच्छी पुस्तक है| मैंने पढ़ा है| अगर संभव हो तो तुम भी पढो| "

http://www.achhikhabar.com/wp-content/uploads/2012/03/Napoleon-Hill.jpg
 Napoleon Hill / नेपोलियन हिल
(BornOctober 26, 1883Pound, Virginia,DiedNovember 8, 1970 (aged 87)
One of the greatest writers on success. His most famous book, Think and Grow Rich (1937), is one of the best-selling books of all time.)
 मैंने उस पुस्तक को कालेज-स्ट्रीट में तथा अन्य जगहों पर भी खोजा| कहीं भी यह पुस्तक नहीं मिली तब, Thakers Spink में गया | जब वहाँ जाकर माँगा, तो वे लोग बोले, 'रुकिए देखते हैं |'
देख कर बताये - ' Just one copy is left ' मैंने १६ रुपये में उस पुस्तक को खरीद लिया, उससमय का १६ रुपया- इतनी मोटी पुस्तक है! 
खरीद कर उस पुस्तक को आद्योपान्त पढ़ गया| फिर उनको जाकर बोला- " सर, मैंने ' Law of Success ' को पढ़ लिया है|" तुमने खरीद कर पढ़ा ? कोई तो बात मानता नहीं , मैंने भी इस किताब को बहुत दिन पहले पढ़ा था, जरा मुझे भी देना तो, एक बार फिर से पढने की ईच्छा है| " [২৬-২৯] आदमी की सफलता उसकी इच्छा पर निर्भर करती है। अगर इंसान के मन में अपने मकसद के प्रति गहरी इच्छा है तो उसे अपने लक्ष को पाने में कामयाबी जरूर मिलती है। नेपोलियन हिल ने कहा है कि इंसान का दिमाग जिन चीजों को सोच सकता है या जिन चीजों पर यकी न कर सकता उन्हें हासिल भी कर सकता है। 
" Whatever the mind of man Can conceive and believeIt can achieve. "- NAPOLEON HILL]

नेपोलियन हिल के कुछ अनमोल विचार 

  • Everyone enjoys doing the kind of work for which he is best suited. हर कोई उस तरह का काम करने में आनंद उठता है जिसे करने के लिए वो उपयुक्त है।
     A goal is a dream with a deadline.  जीवन का लक्ष्य वह स्वप्न है, जिसे एक निश्चित समय सीमा के  अन्दर पूर्ण किया जा सकता हो। 
  • Action is the real measure of intelligence.आपके बुद्धिमत्ता की पहचान आपके कार्यों को देखने से होगी।
  • Man, alone, has the power to transform his thoughts into physical reality; man, alone, can dream and make his dreams come true. केवल इंसानों में अपने विचारों को भौतिक वास्तविकता में बदलने की शक्ति होती है; केवल इंसान सपने देख सकता है और उन्हें साकार कर सकता है.
     
  • All achievements, all earned riches, have their beginning in an idea.किसी  भी क्षेत्र में सफलता और अमीरी की प्राप्ति का प्रारंभ एक संकल्प से होता है। 
  • All the breaks you need in life wait within your imagination, Imagination is the workshop of your mind, capable of turning mind energy into accomplishment and wealth.जीवन में आपको जो भी अवसर चाहिए वो आपकी कल्पना में प्रतीक्षा करते हैं, कल्पना आपके मस्तिष्क की कार्यशाला है, जो आपके मन की उर्जा को सिद्धि और धन में बदल देती है।
    • Any idea, plan, or purpose may be placed in the mind through repetition of thought.
    स्वपरामर्ष सूत्र : कोई भी सुझाव , योजना ,या उद्देश्य मन में विचार को बार-बार दोहरा कर बैठाया जा सकता है.
    • Cherish your visions and your dreams as they are the children of your soul, the blueprints of your ultimate achievements. अपने जीवन लक्ष्य और सपनो को इस तरह संजोयें, मानों वे आपकी उपलब्धियों की मूल योजना और आत्मा के बच्चे हों।
      • Create a definite plan for carrying out your desire and begin at once, whether you ready or not, to put this plan into action. अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए एक निश्चित योजना बनाएं , और तुरंत इसे क्रियान्वित करने की शुरुआत कर दें, चाहे आप तैयार हों या नहीं।
        • Desire is the starting point of all achievement. इच्छा ही सभी उपलब्धियों का प्रारंभिक बिंदु है। 
        • Don’t wait. The time will never be just right. इंतज़ार मत करिए, सही समय कभी नहीं आता.
          • Edison failed 10, 000 times before he made the electric light. Do not be discouraged if you fail a few times.
          एडिसन इलेक्ट्रिक बल्ब बनाने में १०,००० बार विफल हुए. यदि अपक कुछ बार विफल हो जाते हैं तो हिम्मत मत हारिये।
          • Education comes from within; you get it by struggle and effort and thought. शिक्षा भीतर से आती है, आप इसे संघर्ष, प्रयास और विचारों से पाते हैं।

             
         

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