Friday, April 2, 2010

" तीन आने के ऋण की वसूली " [जीवन नदी के हर मोड़ पर [7]

' फणीन्द्रनाथ पाल मशाई (महोदय )' हमलोगों के विज्ञान शिक्षक थे| उस समय स्कूल में ही विज्ञान की किस साखा का ज्ञान न दे दिया जाता हो, बता नहीं सकता ! क्या नहीं पढाया जाता था ! फिजियोलोजी से लेकर ज्युओलोजी, बोटनी, फिजिक्स, केमिस्ट्री, एस्ट्रोनोमी, आदि सारे विषय पढाये जाते थे| एवं उस समय किसी स्कूल में लैबरोटरी भी हो यह कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, किन्तु हमारे स्कूल में विज्ञान का क्लास लेने के लिये एक अलग बिल्डिंग में गैलरी थी, जिसमे लैबरोटरी थी|  १९४२-४३ तक पश्चिम बंगाल तो क्या पूरे भारत में शायद ही किसी स्कूल लैबरोटरी होगी,और जिसके गैलरी में विज्ञान का क्लास चलता हो, पर हमारे स्कूल में था| 
मेरे विज्ञान के क्लास में एक बार बहुत हँसी की घटना घटित हुई थी| बीच बीच में उसकी याद हो आती है| मास्टर मशाई (मास्टरसाहेब) पढ़ाना शुरू किये हैं, कह रहे हैं - " आज की कक्षा में मैं तुम लोगों को साबुन -निर्माण की विधि पढ़ाऊंगा साथ ही साथ प्रयोगशाला में उसका निर्माण करना भी सीखा दूंगा| परन्तु उससे पूर्व क्या कोई लड़का मुझे यह बता सकता है कि साबुन कैसे तैयार होता है ?"
हम लोग बोले नहीं जानते हैं सर ! 
मास्टरसाहेब (मास्साब ) पुनः चुनौती भरे लहजे में पूछे- " साबुन का निर्माण करना तो उतना कठिन कार्य नहीं है, कोई नहीं जानता ?" 
तब एक लड़के के मन में विचार उठा कि, यह तो पूरे क्लास के लड़कों के लिये लज्जा की बात होगी, वह खड़ा हो कर बोला- " आमी जानि सर "! मैं जानता हूँ सर, सर ने कहा - ' बलो '| उसने कहा -" मैं ने एकबार साबुन बनते हुए अपनी आँखों से देखा था सर "| सर ने पूछा, ' अच्छा बताओ क्या देखे थे?' तब वह बताना शुरू किया - " पहले तो मैंने देखा कि वहाँ एक बहुत बड़ा सा चूल्हा था, सर ! और उस पर एक बहुत बड़ा सा कड़ाह चढ़ाया हुआ था! उस कड़ाह में न जाने क्या दो , एक ठो कुछ डाल दिया सर ! उसके बाद फिर (फिन से और कुच्छो) उसमे डाल दिया सर! चूल्हे से बहुत आँच ऊपर कि ओर उठने लगी| उसके बाद एक विशाल आकर के डब्बू जैसे चीज से हिलाने लगा- और साबुन बन गया सर !" 
उसके भोलेपन से भरे उत्तर को सुन कर, सारे क्लास के लड़के ठहक्का मार कर हँसने लगे ! कितने आनन्द से भरे दिन कटे हैं, उनकी यादें भुलाये नहीं भूलतीं |  
सतीश चन्द्र दास मशाई हमलोगों को बंगला पढ़ाते थे| वे इन्टरमिडीयट तक पढ़े थे | बाद के जीवन में कुछ दिनों तक स्काटिश चर्च कॉलेज में पढ़ा हूँ, उस समय वहाँ बंगला के विख्यात विख्यात अध्यापक थे, अंग्रेजी के थे, विभिन्न विषयों के थे| हमलोगों के स्कूल के ही दो छात्र उस समय स्काटिश चर्च कॉलेज के प्रोफ़ेसर थे | वे हमारे ही स्कूल के प्रोडक्ट थे, इस दृष्टि से ' सतीर्थ ' कहा जा सकता है|
उनमे से एक हमलोगों को बंगला पढ़ाते थे, और दूसरे मैथेमेटिक्स पढ़ाते थे| जो मैथेमेटिक्स पढ़ाते थे
वे ' ईषान स्कालर ' थे|( ?)हमलोगों के स्काटिश चर्च से निकल जाने के बाद, स्काटिश चर्च में पढ़ाते पढ़ाते वे भी आई .आई. टी. खड़कपुर चले गये थे| वहाँ पर कितने दिनों तक थे यह ज्ञात नहीं है, वहाँ पढ़ाते समय भी अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में ' भिजिटिंग प्रोफ़ेसर ' के रूप में मैथेमेटिक्स पढ़ाने जाया करते थे|
स्काटिश चर्च कॉलेज में जो हमारे बंगला के प्रोफ़ेसर थे उनका नाम था- विपिन कृष्ण घोष, और स्कूल के बंगला पढ़ाने वाले शिक्षक थे सतीश चन्द्र दास महाशय, किन्तु वे दोनों स्वयं भी हमारे स्कूल के ही छात्र थे| वे दोनों अद्भुत मनुष्य थे, असाधारण मनुष्य थे|
" कार कथा बलबो, आर कार कथा ना, कतटा बलबो, आर कतटा बलबो ना ! "
' किसे भूलूं किसे याद करूँ ?' - ' कितना कहूँ और कितना छोड़ दूँ ?'
कॉलेज स्ट्रीट में - जहाँ पर पहले महामण्डल का ऑफिस हुआ करता था, उसके पीछे वाली गली में एक मेस था, जो किसी बिल्कुल ही जीर्ण-शीर्ण दोतल्ला या तीन तल्ला मकान में था| उसी मेस के एक कमरे में वे ( विपिन कृष्ण घोष ) रहा करते थे| अक्सर मेस (लौज में) में सीढ़ी से चढ़ने पर, जहाँ वह सीढ़ी मुड़ती है, उसके सामने ही कई लोग एक छोटा सा कमरा बनवा देते हैं, एक दम छोटा सा कमरा | उसी एक छोटे से कमरे में वे रहते थे|
कमरे में एक छोटी सी चौकी रखी हुई थी| किन्तु वह चौकी तो सर्वदा   पुस्तकों से भरी रहा करती थी; इसीलिये सीढ़ी जहाँ से मुड़ती थी, वहाँ से दो धाप (स्टेप) नीचे उतर कर कमरे में प्रवेश करते और और नीचे फर्श पर ही चटाई बिछा कर सो जाते थे| ऐसा साधारण रहन सहन, किन्तु तीन कालेजों में अध्यापन करते थे| स्काटिश चर्च कॉलेज में बंगला पढ़ाते थे, हावड़ा के नरसिंह दत्त कॉलेज में तथा सेंट लुईस कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे|
क्योंकि वे अत्यन्त अल्प-वित्त परिवार में जन्म ग्रहन किये थे, इसीलिये मासिक शुल्क चुका कर स्कूल में पढने की क्षमता नहीं थी | उनके पिताजी उनको लेकर हमलोगों के स्कूल के हेडमास्टर पास गये, और यह कहते हुए आँखों में आँसू आ गये कि, " मैं अपने लड़के को आपके स्कूल में देना चाहता हूँ, किन्तु मासिक शुल्क देने में कष्ट होगा, क्या फ्री कर देंगे ? " और वह हो गया ! रामायण - महाभारत के पात्रों का जैसा अपूर्व चरित्र उनके जीवन से प्रतिबिम्बित होता है, इन लोगों के जीवन को भी उनसे थोड़ा भी कम करके नहीं आँका जा सकता|         
उस समय भूगोल की एक पुस्तक का मूल्य तीन आना था, किन्तु उनके अभिभावक के पास, उनके लिये  भूगोल की नयी पुस्तक खरीद पाने की क्षमता भी नहीं थी| इसीलिये किसी अन्य छात्र से भूगोल की पुस्तक को मांग कर उनकी माँ और उनके ' बड़दादा ' (बड़ेभैया) ने - सम्पूर्ण पुस्तक को हाथ से लिख कर उनको दिया था| और इस तीन आने का जो ऋण उनके ऊपर था- उसका पाई-पाई उन्होंने चुकता कर दिया था ! 
उस समय आन्दुल में एक बड़ा सा जेनरल स्टोर हुआ करता था, जिसमे घर के जरुरत के सारे समान मिल जाते थे, साथ साथ उसमे कॉपी- किताब, पेंसिल रबड़ आदि भी मिलते थे| उस दुकान में उनका ३००/=(तीन सौ रुपया) सदा जमा रहा करता था| और दुकान के मालिक को उनका निर्देश था
कि - " कोई भी गरीब का लड़का या लड़की आपके पास, से किताब-कॉपी या पेन्सिल आदि - जो भी लेना चाहते हो उनको दे दीजियेगा और आपके पास जमा रुपया कम पड़ जाय तो मुझसे कहियेगा | "   

अब वे तीन कालेजों में पढ़ाते थे|कलकाता में भी उनके कई छात्र-छ्त्रायें ऐसे थे जनके पास धन की थोड़ी कमी थी, जिसके कारण वे परीक्षा शुल्क चुकाने में असमर्थ थे, या कॉलेज का फी नहीं दे पा रहे थे उनके लिये भी वे अपने पास से व्यवस्था कर देते थे, या उनके लिये भी पुस्तकें भी खरीद दिया करते थे| इस प्रकार से लड़के -लडकियों के लिखने-पढने के लिये उन्होंने उस जमाने में भी तीन लाख रूपए दिये थे|
कितने वर्षों पहले इतना दान कर दिये, और जब लगभग बिल्कुल फकीर हो गये तब, आन्दुल में एक कॉलेज के स्थापना की बात चलने लगी|
 वहाँ के जो लोग कॉलेज खोलने के लिये प्रयासरत थे, वे लोग उनसे मिलने एक दिन मेस में पहुंचे| उनसे बोले- " विपिन दा आन्दुल में हमलोग कॉलेज खोलना चाह रहे हैं, क्या इसमें आप अपना कुछ सहयोग नहीं करेंगे ?" 
उन्होंने बताया- " मेरे पास अब देने के लिये ज्यादा कुछ बचा हुआ नहीं है|" उनलोगों ने कहा - " आपको यहाँ से कुछ नहीं देना होगा, आन्दुल- मौड़ी पोस्टऑफिस में आपका एक आकाउंट (बचत-खाता) है न ? "उन्होंने कहा - " हाँ, एक खाता बहुत दिनों पूर्व वहाँ था, किन्तु कई वर्षों से मैंने उसे operate नहीं किया है, खाता खोलने के बाद उसमे न तो कुछ जमा किया, न निकाला हूँ|"

वे लोग बोले - " वह सब आपको नहीं सोचना है, हमलोग एक withdrawal form साथ में लेकर आये हैं, आप तो बस एक दस्तखत कर दीजिये, वहाँ जितना भी है हमलोग निकाल लेंगे |" और उनलोगों ने आन्दुल कॉलेज के लिये उनका वह बचा-खुचा पैसा भी निकाल लिया |
मेस के जिस कमरे में वे रहते थे, उसके सारे दीवाल पर केवल ठाकुर के (श्रीरामकृष्ण के), चेहरे का चित्र सटा हुआ था| अपने कमरे के सारे दीवालों को उन्होंने ठाकुर के चेहरे से ढँक रखा था|अर्थात कमरे में प्रवेश करने के बाद वे ठाकुर के चेहरे के सिवा अन्य कुछ भी देखना नहीं चाहते थे|

 प्रत्येक रविवार को वे कॉलेज स्ट्रीट से पैदल ही चलकर दक्षिणेश्वर पहुँच जाते थे|फिर दक्षिणेश्वर से बालि-ब्रिज पार करके पैदल ही बेलुड़ मठ दर्शन करके वहाँ से भी पैदल हावड़ा ब्रिज होते हुए कॉलेज स्ट्रीट के मेस में लौट जाते थे| यही उनके प्रत्येक रविवार का कार्य था|
बुढ़ापे के समय उतनी शक्ति न रही, कालेज की नौकरी भी समाप्त हो गयी और वे सभी कालेजों से रिटायर हो गये | रिटायर हुए, अर्थात वे बंगला साहित्य के एम्. ए. कोर्स में फर्स्ट-क्लास-फर्स्ट थे, अंग्रेजी में फर्स्ट-क्लास-सेकण्ड, और बी.टी. में भी फर्स्ट-क्लास फर्स्ट थे! तीन कालेजों में अंग्रेजी और बंगला पढ़ाते थे| पार जब उनका सारा रुपया ख़त्म हो गया तो, अपने गाँव लौट आये|
आन्दुल-मौड़ी ग्राम के सभी घरों में उनका कोई न कोई छात्र था ही, इसीलिये किसी छात्र के घर पर सुबह में जा कर कहते- " आज दोपहर के समय तुमलोगों के घर में कुछ खाना चाहूँगा |"  वे कहते " हाँ हाँ आइयेगा सर, आइयेगा सर |"संध्या के समय भी किसी के यहाँ जाकर बोल आते- " आज रात का भोजन तुम्हारे यहाँ करूँगा |"
रिटायर होने के बाद वे जितने भी दिन जीवित रहे, इसी तरह जीवन बीता दिये, किन्तु अपना सर्वस्व दूसरों के कल्याण में समर्पित कर गये ! अपने कमरे में ठाकुर के चेहरे के सिवा किसी का चेहरा 
नहीं देखे | अपने लिये इलेक्ट्रिक-फैन तो क्या, कभी हाथ-पंखा का व्यवहार भी नहीं किये थे | मैं कभी कभी उनके यहाँ जाया करता था|
 एक दिन देखा कि, वहाँ एक हाथ-पंखा रखा हुआ है| जब उन्होंने मुझे पंखे की ओर देखते हुए देखा तो, समझ गये| वे कहने लगे- " क्या करता, एक बहुत मोटी सी लड़की कुछ दिनों के लिये पढने आती थी, उसको गर्मी बिल्कुल बर्दास्त नहीं थी, उसी के लिये हाथ-पंखा खरीदना पड़ गया था |" उन्होंने जीवन में कभी हाथ पंखे की हवा तक नहीं खायी थी, जीवन में कभी इलेक्ट्रिक का फैन भी नहीं चलाया| 

उनका शरीर जब एकदम अस्वस्थ रहने लगा तब डाक्टर ने कहा था- " रात के समय दही और सन्देश (बंगाल की एक प्रसिद्ध मिठाई ) के सिवा और कुछ मत खाइएगा |" लोगों को बताते थे, " थोड़ा दही दे ले आता हूँ, एक-दो सन्देश ले आता हूँ, रात के समय वही खाता हूँ|" 
किन्तु दही और सन्देश का स्वाद जीभ को अच्छा लगने लगेगा, इससे बचने के लिये वे दही-सन्देश में एक निम्बू, थोड़ा नमक, और ऐसा ही कुछ घोंट-घांट कर खा लेते थे| ऐसे ऐसे मेरे शिक्षक थे- स्कूल के जिस तरह, उसी तरह कालेज के भी शिक्षक थे|       

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