Friday, April 2, 2010

"बंग-भंग आन्दोलन और स्कूल में अंग्रेज पुलिस आफिसर "[जीवन नदी के हर मोड़ पर -9]

[* मेरे पितामह वर्ष १९०१ से लेकर १९५३ तक, अर्थात कुल ५२ वर्षों तक उस स्कूल में हेडमास्टर रहे थे: ]
और भी कई महत्वपूर्ण घटनाएँ इस स्कूल में घटित हुई हैं, ' बंग-भंग आन्दोलन ' के समय हमारे स्कूल के छात्रों ने,  १९०५ में विदेशी कपड़ों का होलिकादहन किया था| यह खबर इंग्लैंड के अख़बार में 
छप गया ! उस समय भारतवर्ष की राजधानी तो कलकाता ही हुआ करती थी, इसीलिये इंग्लैंड के अख़बार में खबर देख कर उसके जाँच का आदेश, कलकाता आया है!
उस आदेश के अनुसार कलकाता से लालबाजार का एक बड़ा पुलिस ऑफिसर घोड़े पर सवार हो कर मामले की तहकीकात करने के लिये आन्दुल-स्कूल जा रहे हैं| स्कूल चल रहा है, बाहर का विशाल गेट बन्द है, घोड़े को लिये हुए स्कूल के गेट के सामने आये हैं| गेट पर एक दरवान खड़ा है, नजदीक आकर बोले- ' ऐ दरवान, गेट खोलो ! '
दरवान आकर बोला- ' स्कूल चलते समय गेट नहीं खोला जाता है |' " तुम खोलते हो या नहीं ?" दरवान-  " नहीं, अभी गेट नहीं खुलेगा, जब स्कूल बन्द हो जायेगा, छुट्टी होगी, तब गेट खुलेगा ! उसके पहले नहीं खुलेगा |" - " कितने बजे छुट्टी होगी? " " चार बजे छुट्टी होगी " 
समय बिताने के लिये वे स्कूल के नजदीक स्थित ' गुलाब-बाग ' नामक एक पुराने मकान में चले गये, वह विशाल भवन था जो अब खंडहर हो गया था, उसमे एक छोटा सा तालाब, विशाल झील और बगीचा था| उस भवन में कुछ दिनों तक बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय (बंदे मातरम गीत के रचनाकार ) भी निवास किये थे|
पुलिस आफिसर वहीँ जाकर प्रतीक्षा करने लगे और ४ बजते ही घोड़े पर चढ़ कर गेट पर पहुँचे| उस समय स्कूल में छुट्टी हो गयी है, टप-टप टप-टप करते घोड़े की टाप पर भीतर प्रविष्ट हो गये| हमलोगों के स्कूल का भव्य बिल्डिंग , आज भी वैसे ही खड़ा है, उसको देखने से बहुत हद तक उसकी आकृति कलकाता यूनिवर्सिटी के उस सेनेट हौल जैसी गथिक स्ट्रक्चर की है, जिसे हाल में तोड़ डाला गया था| उसका उपरी भाग बहुत ऊँचा है, सामने का हिस्सा भी उसी तरह है, छत बड़े बड़े खम्भों पर टिकी हुई है, उसके मुख्य द्वार पर हमलोगों के स्कूल का शुभ वाक्य - " सरस्वती श्रुतमहतां महियसाम " लिखा हुआ है |
[ " राजा प्रकृति रंजनात्"  अर्थात् सब प्रकार से प्रजा को प्रसन्न रखने वाला ही राजा या आई.ए.एस. हो सकता है। 

प्रवर्तताँ प्रकृति पार्थिवः सरस्वती श्रुतमहतां महीयसाम्।
ममापि च क्षपयतु नील लोहितः पुनभवं परिगतशक्तिरात्मभूः।।]

व्यास यदि मनुष्य को सृष्टि का श्रेष्ठतम जीव मानते हैं, तो कालिदास प्रकृति अर्थात् प्रजा के हित को सर्वोपरि स्थान देते हैं। पग-पग पर राजा या प्रशासक को कालिदास की कविता प्रकृति रंजन का स्मरण दिलाती है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् के अंत में नाटककार का भरत वाक्य है कि राजा प्रजा के हित में रत रहे। विद्या में वृद्धि हो। शिव हम सबका शुभ करें। 
सुसंस्कृत भारत की संस्कृति पूजा-पाठ प्रधान नहीं, धर्म और कर्म प्रधान है। धर्म और शिक्षा की व्याख्या में समष्टि का मंगल विधान सर्वोपरि है, बाह्याडंबर नहीं। धर्म की अवधारणा प्रजा और समाज के धारण या रक्षण करने से अर्थवती है। 
धारणाद्धर्म इत्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः।
               यत् स्यात् धारणासंयुक्तं स धर्म इत्युदाहृतः। - महाभारत

वे कर्म और यम-नियम, जो ध्वंस से बचाते हैं और चरित्र-निर्माण करते हैं, उन्हें धर्म कहते हैं। वे आचरण जो आतंक नहीं, आनन्द और अभय़ प्राणि मात्र के लिए सिरजते हैं, उन्हें धर्म की मर्यादा कहते हैं।जो अर्थ धर्मार्जित नहीं होता, अनीति अन्याय व दुष्ट साधनों से अर्जित होता है, वह अनर्थकारी होता है। गलाकाट प्रतियोगिता व लूट-खसोट को बढ़ावा देता है। आदमी को आदमी नहीं रहने देता। वह धर्म अर्थात शिक्षा से अनुशासित न रहने पर हवस का रूप ले लेता है। अनुजा तनुजा, परजा में भेद भूल जाता है। आसुरी बन जाता है। 
धर्म रहित राज्यकी भी यही दशा होती है। हस्तिनापुर का राज्य उसे छोटा लगता है। जो प्राप्त भाग है उसका विकास भूलकर काश्मीर की रट लगाने लगता है। मानों काश्मीर मील जाने पर उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रहेगी। यह देश हमेशा धर्म को कमोबेश केन्द्र में रखता चला आया है। लंका जीतकर लंकावासी को और बंगलादेश बंगलावीसी को सुशासन के लिए सौंप दिये गये। यह भारतीय धर्म या शिक्षा का मंगल भाव है जिससे हमारा जीवन, हमारे आचार-व्यवहार और हमारी राजनीति अनुशासित है। यह धर्म आध्यात्मिकता की ऊँचाई पर पहुँचकर जीवन के बहुविध अच्छे कर्मों को ही शिव की आराधना मानता है।]

उसी रास्ते से गड़ गड़ करते चले गये| वहाँ से भीतर प्रविष्ट होने के लिये तीन दरवाजे हैं| एक दरवाजा बड़ा है, पास में दो छोटे छोटे दरवाजे हैं|छोटे दरवाजों से छात्र लोग अपने क्लास में चले जायेंगे और शिक्षक लोग बीच वाले दरवाजे से जायेंगे| दरवाजे से लगा एक छोटा हौल है, उसके बाद दोनों ओर बरामदा है| उस हौल के ठीक बीचो बीच ' सेन्ट टेम्स ' की घड़ी अब भी लगी हुई है| १९०१ ई में भी यह घडी थी या नहीं बता नहीं सकता, किन्तु है वह बहुत पुरानी | वहीँ पर एक विशाल गोल टेबल है, वहीँ पर हेडमास्टरमशाई बैठते हैं|
लालबाजार से भेजे गये वे अंग्रेज पुलिस आफिसर गड़ गडाते हुए गये हैं, और उनके सामने पहुँच कर बोले, ' Are you the Headmaster ? ' तुम्हारे लड़के इस प्रकार क्लास में खुले-आम ' बंदे मातरम' गीत गा रहे हैं? ' ' मेरे लड़के " बंदे मातरम " गीत गा रहे हैं ? ' ' स्कूल में तो छुट्टी हो गयी है, गीत कैसे गा सकते हैं ?' ; ' मैंने आते समय सुना है, हर एक क्लास में " बंदे मातरम " गीत गया जा रहा था '|
" आपके कहने से ही हो गया " | बोले, " आप मेरे साथ चलिए और खुद ही देख लीजिये कि छात्र लोग कहाँ हैं|" वे जैसे ही आये हैं पितामह कुछ बोले बिना, उनके टेबल पर रखे एक स्प्रिंगदार घंटी को बजा दिये थे, जिसके बजते ही कोई पिउन या अन्य कोई आ जाते थे| जैसे ही उनको पुलिस आफिसर आते दिखे उन्होंने उस घंटी को केवल एक बार बजा दिया था|   
और जो छोटे छोटे दरवाजे थे, उसके ऊपर झिर्रीदार पर्दा लगा हुआ था, समस्त क्लास से लड़कों के बाहर निकाल जाने के बाद भी कोई उन्हें देख नहीं सकता था| जैसे ही यह घंटी बजाये कि समस्त स्कूल के छात्र बाहर निकाल कर रोड पर आ गये और अपने अपने घर चले गये | वे जाकर खोज रहे हैं, " कहाँ गये तुम्हारे लड़के ?" " न न वे यहाँ कहाँ मिलेंगे, अभी तो मेरे स्कूल में एक भी छात्र नहीं है, छुट्टी जो हो चुकी है|" - कहते हैं, ' नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है? '- वे बहुत गुस्सा किये हैं, आँख मुख लाल हो गया है | हेडमास्टरमशाई बोले, " आप स्वयं मेरे स्कूल को देख कर मुयायना कर आइये "| सारा स्कूल छान मारे, एक भी छात्र नहीं मिला| तब उस अंग्रेज साहब ने कहा- " इसका रहस्य क्या है, जरा बताइए तो !"
बोले, " ऐसा कुछ भी नहीं है|" ' Ah, that is a miracle. I have never seen such discipline anywhere else, I go back with the warrant of arrest ' कहे, और किसी को  arrest किये बिना ही वापस लौट गये|
वर्ष १९०१ से लेकर वर्ष १९५३ तक, अर्थात कुल ५२ वर्षों तक पितामह उस स्कूल में रहे थे| स्कूल में जब उनकी सेवा के पचास वर्ष पूरे हुए तो, बहुत समारोह पूर्वक उनकी ' प्रधान शिक्षकता ' की स्वर्ण जयन्ती मनाई गयी थी| वह समारोह बहुत विराट स्तर पर मनाया गया था| 
उसके पहले आशुतोष मुखोपाध्याय के साथ भी उनकी गहरी घनिष्टता थी, बहुत अच्छा परिचय था|       

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