Tuesday, April 27, 2010

" महामंडल का उद्देश्य एवं कार्यपद्धति "

                                  " महामंडल का उद्देश्य एवं कार्यपद्धति "
                               (" Aims and Objects of Mahamandal  ")
' मनुष्य ' ही समाज की मूल इकाई है ! कोई परिवार, समाज या देश तभी महान हो सकता है जब उसके अधिकांश मनुष्य महान चरित्र वाले हों । राष्ट्र-निर्माण का आधारभूत तत्व ' मनुष्य ' है,  इसीलिये 'मनुष्य-निर्माण' अथवा " चरित्रवान-नागरिकों " का निर्माण करना ही, भारत-पुनर्निर्माण का मौलिक कार्य है ! समाज के कल्याण के किसी भी योजना को यदि धरातल पर उतारना हो, तो चाहे उस योजना को सरकारी स्तर पर (मनरेगा आदि ) से क्रियान्वित किया जाय य़ा किसी N.G.O. (गैर सरकारी संस्थाओं) के माध्यम से करवाया जाय, समस्त सरकारी य़ा गैर-सरकारी योजनाओं को उत्कृष्ट तरीके निष्पादित करने  का कार्य  केवल ' मनुष्यों ' के माध्यम से ही होता है!
अतः समाज-कल्याण के लिये बनाई गयी किसी भी योजना का शत-प्रतिशत (१००%) लाभ  तबतक जनसाधारण तक नहीं पहुँच सकता, जब तक उस कार्य में संलग्न तथा ऊँचे पदों पर कार्यरत, सभी मनुष्यों को अपनी मानवोचित मर्यादा का बोध न हो। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, 'मानहूश तो मानुष'- अर्थात जिस मनुष्य में अपनी मानवोचित गरिमा का बोध है, केवल वही 'मनुष्य' कहलाने का अधिकारी है! अतः भारत-कल्याण के लिये बनायी गयी किसी भी योजना  का समुचित लाभ ( केवल १५ % नहीं १०० % लाभ) तभी प्राप्त हो सकताहै, जब उन कार्यों में संलग्न सभी मनुष्य- ईमानदार, निष्कपट,  सेवापरायण, अनुशासित, और निःस्वार्थपर हों! 
इन गुणों को अर्जित कर लेने को ही-'मनुष्य-बनना' कहा जाता है|जब किसी व्यक्ति के चिन्तन, वचन और आचरण में, ये सभी गुण स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होने लगते हैं, तब इन्हें ही उस व्यक्ति का 'चारित्रिक-गुण' भी कहा जाता है| इसीलिये, " चरित्र-निर्माण " का दूसरा नाम -" मनुष्य- निर्माण "भी है| तथा 'मनुष्य-बनने', य़ा देश के लिये ' योग्य- नागरिक' निर्माण के इस बुनियादी कार्य का प्रारम्भ - स्वयं अपने से भी किया जा सकता है, य़ा दूसरों को इन गुणों को अर्जित कर लेने के लिये प्रेरित करने से भी हो सकता है|
 अतः महामण्डल के साथ जुड़ने के पहले हमें स्वयं से पूछना चाहिये कि, कहीं हमारा उद्देश्य भी  उन वाह-वाही लूटने वाले सनकी लोगों के जैसा तो नही है; जो केवल नाम-यश पाने के लिये समाज-सेवा के कार्यों से जुड़ कर, समाचारपत्रों में अपना फोटो देखने की कमाना से समाजसेवा के कार्य करने का पाखण्ड करते हैं? यदि हमारा उद्देश्य उन लोगों के जैसा नहीं है, जो आज किसी कार्य में जुड़ते हैं और कल ही छोड़ देते हैं, तब हम भी महामण्डल का सदस्य बनकर 'मनुष्य-निर्माण' ( देश के लिये 'योग्य-नागरिक निर्माण ) के इस मौलिक कार्य का प्रारम्भ, हम स्वयं मनुष्य ' बनने 'के साथ-साथ दूसरों को भी मनुष्य 'बनाने' से कर सकते हैं. इस संगठन के साथ जुड़ कर हमलोग ' बनो और बनाओ !' अर्थात "तुम स्वयं मनुष्य बनो, और दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता करो "; इस " Be and Make" को साथ-साथ चला सकते हैं | तभी तो स्वामी विवेकानन्द ने भारत के युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था-

" बनो और बनाओ, Be and Make ! यही हमारा मूल मंत्र रहे ! "  ( वि० सा० ख० ९:३७९) इसीलिये अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल का "Motto" य़ा आदर्श-वाक्य है- " Be and Make"!   अर्थात तुम स्वयं इस देश के योग्य नागरिक (चरित्रवान-मनुष्य) बनो, और दूसरों को भी चरित्रवान -मनुष्य बनने में सहायता करो ! अतः यह स्पष्ट है कि देश के लिये 'चरित्रवान-मनुष्यों  का निर्माण करना ' ही वह लक्ष्य है, जिसे महामण्डल प्राप्त करना चाहता है|
 इसी मौलिक कार्य- ' मनुष्यनिर्माण ' का दूसरा नाम ' चरित्र -निर्माण ' भी है ! अतः भारत के गाँव-गाँव में " मनुष्य-निर्माण कारी " -  शिक्षा केन्द्रों को स्थापित करना ही महामण्डल का उद्देश्य है|   देश के पुनर्निर्माण के लिये जो कुछ भी करना प्रयोजनीय है, उन सब के ऊपर विस्तार से चर्चा कर लेने के बाद,स्वामी विवेकानन्द ने सब का निचोड़ देते हुए कहा था -  "  माना कि सरकार तुमको तुम्हारी आवश्यकता की वस्तुएं  देने को राजी भी हो जाय, पर प्राप्त होने पर उन्हें सुरक्षित और सँभालकर रखने वाले " मनुष्य "  कहाँ हैं? इसलिए पहले ( ' जन लोकपाल बिल ' लाना अच्छा है, पर लाने के पहले उसको ईमानदारी से लागु करने वाले ' चरित्रवान- जन ' का निर्माण करो! ) आदमी, मनुष्य-निर्माण करो ! हमे अभी मनुष्यों   की आवश्यकता है, और बिना श्रद्धा के 'मनुष्य' कैसे बन सकते हैं? " (८:२७०)
 " जब आपके पास ऐसे मनुष्य होंगे, जो अपना सबकुछ देश के लिये होम कर देने को तैयार हों, भीतर तक एकदम सच्चे, जब ऐसे मनुष्य उठेंगे, तो भारत प्रत्येक अर्थ में महान हो जायेगा ये ' मनुष्य ' हैं, जो देश को महान बनाते हैं ! (४:२४९)
" भारत तभी जागेगा, जब विशाल ह्रदय वाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष भोग-विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर- मन, वचन, और शरीर से उन करोड़ो भारतवासियों के कल्याण के लिये सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरन्तर नीचे डूबते जा रहे हैं|(६:३०७)
उन्होंने आह्वान किया था- " जो सच्चे ह्रदय से ' भारतवासियों के कल्याण ' का व्रत ले सकें तथा, इसी कार्य को अपना एकमात्र कर्तव्य समझें, ऐसे युवाओं के साथ कार्य करने में लग जाओ| भारत के युवावर्ग पर ही यह कार्य सम्पूर्ण रूप से निर्भर है|" (४:२८०)
 इसीलिये अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के आदर्श हैं- युवा नेता स्वामी विवेकानन्द ! जिनके जन्म दिवस १२ जनवरी को भारत सरकार ने " राष्ट्रीय युवा दिवस " घोषित किया है |


बाजार से चन्दा मांग कर अभावग्रस्त लोगों के बीच कुछ राहत सामग्रियों का वितरण करना - एक अच्छा कार्य है, साधारण जनता की आर्थिक उन्नति के लिये किसी योजना को लागु करना भी अच्छा कार्य है - किन्तु इन सब हलके-फुल्के सामाजिक कार्यों की अपेक्षा, वैसे युवाओं का-"जीवन-गठन "  करना और भी ज्यादा गुरुत्वपूर्ण तथा उत्कृष्ट कार्य है, जो अपने क्षुद्र स्वार्थ को भूल कर, ' भारतवासियों के कल्याण ' को ही अपना एकमात्र कर्तव्य समझेंगे| सरकारी सेवा (Government Service )में हो, य़ा निजी सेवा (N.G.O.) में, समाज में हो य़ा घर-परिवार में- जीवन के हर क्षेत्र में, इसी प्रकार के निःस्वार्थी य़ा " चरित्रवान- मनुष्यों " की आवश्यकता है !
अब (आजादी के छः दशक बाद, 2G Spectrum घोटाले, कोलगेट घोटाला के युग में )- हमलोग आसानी से इस बात को समझ सकते हैं कि आज देश को पहले चरित्रवान-मनुष्य; बनने और बनाने वाली शिक्षा की आवश्यकता है, केवल I.A.S., Doctors, Engineers, व्यापारी, नेता आदि तो बहुत से हैं, किन्तु चरित्र गठित करने वाली शिक्षा नहीं पाने के कारण उनमें से अधिकांश या तो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं या पूरे ' चरित्र-भ्रष्ट ' या घोटालेबाज बन चुके हैं। आज के तरुण और युवा ही देश के भविष्य हैं ! यदि इनके चरित्र को सुन्दर रूप से गठित किया जायेगा, तभी देश और समाज का स्थायी कल्याण भी सम्भव हो सकेगा|  इसीलिये इस प्रकार के ' यथार्थ मनुष्यों ' का निर्माण करना, समाजसेवा के समस्त कार्यों में-सर्वश्रेष्ठ समाज-सेवा " का कार्य है! किन्तु यहाँ याद रखना चाहिये, कि ' समा-जसेवा ' करना हमारे ' जीवन का लक्ष्य ' नहीं है। बल्कि अपना चरित्र- गठन करने का -सबसे कारगर ' उपाय ' है!  यदि हमारे जीवन का उद्देश्य ' आध्यात्मिकता लाभ ' य़ा समाज की " विभिन्नताओं में अन्तर्निहित  एकत्व " की उपलब्धि करना हो, तो हमे वैसे समाज सेवा मूलक कार्यों को बार-बार करना होगा जिन्हें करते रहने से - सम्पूर्ण मानव जाति के प्रति सच्ची सहानुभूति जाग्रत होने में सहायता मिलती है|  इस तरह आध्यात्मिकता प्राप्त करने के उपाय के रूप में की गयी समाज सेवा, हमारे भीतर समग्र मानव जाति में अन्तर्निहित- ' दिव्यता य़ा एकत्व के बोध '  को जाग्रत करा देती है|
वहीं सांसारिक दृष्टि से य़ा ' नाम-यश पाने की इच्छा ' य़ा  ' स्वर्ग-प्राप्ति  की इच्छा से की गयी समाज-सेवा ' के द्वारा  चरित्र में सदगुण आने के बजाय दुर्गुण ही बढ़ते हैं| क्योंकि जब भी हम कोई अन्य समाजसेवा मूलक कार्य करते हैं, तो मन में यह विचार उठता है कि मैं दूसरों को कुछ दे रहा हूँ, अर्थात जो 'दूसरा' व्यक्ति मुझसे कुछ प्राप्त कर रहा है-  वह उपकृत हो रहा है, और 'मैं' उसका उपकार कर रहा हूँ ! मैं दाता हूँ !  यही क्षुद्र ' अहंबोध ' हमारे सेवकत्व-बोध को, अर्थात" शिव ज्ञान से जीव सेवा " करने के बोध का अपहरण कर लेते हैं|अहंबोध आते ही नाम-यश पाने की दुर्दान्त वासना जाग उठती है और हमारी आध्यात्मिकता (अद्वैत बोध) भी वहीं दम तोड़ देती है!
इस प्रकार हम यह समझ सकते हैं कि अपने जीवन में 'श्रेष्ठ आदर्श ' को धारण करने तथा तदानुरूप 'चरित्र-गठन ' करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये हमें भी - निःस्वार्थ भाव से समाजसेवा के कार्यों में आत्मनियोग करना ही पड़ेगा|  कर्म के रहस्य को जानकर, कर्म के पीछे अपनी दृष्टि (मनोभाव) को ठीक रखते हुए सरल और छोटे-मोटे सेवामूलक कार्यों को करते हुए ही हम यह सीख सकते हैं कि,बदले में कुछ भी पाने की अपेक्षा किये भी ' निष्काम दाता ' की भूमिका किस प्रकार ग्रहण की जाती है, साथ ही साथ आत्मविश्वास भी कैसे अर्जित हो जाता है!
 अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के समस्त कार्यक्रमों के माध्यम से इसी लक्ष्य को पाने का प्रयास किया जाता है, तथा आज ४९ वर्षों तक इस कार्य को चलते रहने के बाद, निश्चित रूप से यह कह सकते हैं कि हमे इस प्रचेष्टा में सफलता भी  मिली है! इसका कोई बहुत विस्तृत  घोषणा  पत्र नहीं है| बहुत छोटे से रूप में गठित होकर, क्रमशः बढ़ता जा रहा है| धीरे -धीरे यह तरुणों के मन को अपनी ओर आकर्षित किया है, उनपर विजय प्राप्त किया है; विशेष तौर पर इसने ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले युवाओं के मन को जीता है!  उन युवाओं ने अपने मन को एक ' दुर्भेद्य-दुर्ग ' के रूप में गठित कर लिया है, जिसमे पाश्चात्य संस्कृति जन्य- ' स्वार्थपरता ' प्रविष्ट ही नहीं हो सकती, जहाँ भारत के चिर-प्राचीन आदर्श " त्याग और सेवा "  अहंबोध के द्वारा कभी आच्छादित नहीं हो पाती|
स्वामी विवेकानन्दजी भी कहा करते थे-" मैं कभी कोई योजना नहीं बनाता | योजनाये स्वयं विकसित होती जाती हैं और कार्य करती रहती हैं |मैं केवल यही कहता हूँ - जागो, जागो (मोहनिद्रा को त्याग दो!)|" महामण्डल केवल इतना ही चाहता है, स्वामीजी का यह ' जागरण-आह्वान ' देश के समस्त युवाओं के कानों में गूँज उठे! आज जब हम देश में हर किसी के प्रति, यहाँ तक कि स्वयं अपने-आप के प्रति भी विश्वास खो बैठे हैं; हमारी चिर गौरवमयी भारतमाता को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिये, इस संकट की घड़ी में सब युवा उठ खड़े हों- परिस्थिति का सामना करें| 
विवेकानन्द युवा महामण्डल को यदि कुछ करने की भूमिका ग्रहण करनी ही हो, तो वह है- हमलोग देश के तरुणों का खोया हुआ " आत्मविश्वास " उन्हें वापस लौटा दें ! और  इस कार्य के लिये पहले उसे युवाओं के मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना होगा, जिससे उन सबों को अपना एक ' जीवन-
दर्शन ' प्राप्त हो | ताकि वे अपने जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान स्वयं करने में सक्षम हों, कर्तव्य सचेतन एवं कर्तव्य पालन में समर्थ ' विवेक-सम्पन्न नागरिक के रूप में गठित हो कर ' अपने व्यक्तिगत जीवन में 'उच्चतर -सार्थकता ' को प्राप्त कर सकें| अतः  ' आत्मविश्वास की प्राप्ति '  एवं 
'चरित्र -निर्माण' की व्यावहारिक पद्धति से युवाओं का परिचय करा देना ही युवा महामण्डल का मूल कार्य है| 
महामण्डल के जितने भी कार्यक्रम हैं, वे इसी लक्ष्य की दिशा में परिचालित होती हैं |अतएव व्यष्टि -मानव के ' जीवन-गठन ' एवं ' चरित्र-गठन ' के माध्यम से श्रेष्ठतर समाज का निर्माण करना ही महामण्डल का उद्देश्य है | स्वामीजी की वह विख्यात उक्ति है- "मनुष्य-निर्माण और चरित्र-गठन  ही मेरे समस्त उपदेशों का सार है |" " संसार को जो चाहिये, वह है व्यक्तियों के माध्यम से विचार शक्ति| मेरे गुरुदेव कहा करते थे, तुम स्वयं अपने कमल के फूल (ह्रदय) को खिलने में सहायता क्यों नहीं देते ? भ्रमर तब अपने आप ही आयेंगे, हमें तीन वस्तुओं(3H)-  की आवश्यकता है, अनुभव करने के लिये ह्रदय (Heart) की, कल्पना करने के लिये मस्तिष्क (Head) की, और काम करने के लिये हाथ (Hand) की |हम मस्तिष्क, ह्रदय और हाथों के ऐसे ही सुसमन्वित विकास को पाना चाहते हैं | " (३:२७१)
व्यष्टि-मानव यदि समष्टिगत प्रयत्न के द्वारा इस लक्ष्य को प्राप्त करने में निरन्तर लगा रहे तो समाज का बहुत बड़ा भाग उत्तरोत्तर प्रभावित होने के लिये बाध्य है | परन्तु, यह कार्य (3H-निर्माण) कोई पाँच वर्ष य़ा पच्चीस-वर्ष के निश्चित मियाद में पूरा हो जाने वाला कार्य नहीं है| यह तो पीढ़ी दर पीढ़ी तक चलने वाला कार्य है ; एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी आकर इस कार्य को अपने हाथों में लेगी, और यह कार्य चलता रहेगा| इस कार्य में जुड़ने से पहले यह भी समझ लेना चाहिये कि समय के अनन्त प्रवाह में ऐसा कोई क्षण नहीं आयेगा, जब हमलोग गर्व से पुकार कर यह कह सकेंगे कि ' बस, अब हमलोगों का कार्य समाप्त होता है, हमने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया- यह रहा आपके सपनों का त्रुटि-रहित समाज !' क्योंकि ऐसा होना अवास्तविक है !
अतएव,
जो लोग अपना ' जीवन-व्रत ' समझकर  इस कार्य में आत्मनियोग करेंगे, उन्हें उन्हें जीवन पर्यन्त संग्राम करने के लिये प्रस्तुत रहना होगा| और विदा लेते समय इस कार्य का दायित्व उन हाथों में सौंप देना होगा जो इस कार्य में अनुगामी बन कर,  दूसरी पीढ़ी के युवाओं को भी इस कार्य में जुड़ने के लिये प्रशिक्षित करने में समर्थ होंगे। हमलोगों के देश की अवस्था किसी से छिपी हुई नहीं है, देशवासियों की दुर्दशा से आज सभी लोग परिचित हैं | इस अवस्था को सँभालने के लिये, सरकारी तंत्र, गणतंत्र, तथा असंख्य ' मतवाद ' हैं, किन्तु, पिछले ६७ वर्षों में  इन सबके क्रिया-कलापों को देख-सुन लेने के बाद, इतना तो समझ में आ ही रहा है कि, किसी भी दल, सरकार य़ा NGO की कार्य-सूचि में ' चरित्र-निर्माण ' य़ा (3H-निर्माण) का कार्य शामिल नहीं है! इस सबसे बुनियादी एवं ' अनिवार्य कार्य ' के ऊपर किसी का ध्यान नहीं है, इसे देखते हुए महामण्डल ने इस कार्य को करने का बीड़ा स्वयं उठा लिया है।
हमलोग अभी तक " चरित्रवान- मनुष्य " नहीं बन सके हैं, एक मात्र इसी कमी के कारण -
अंतिम आदमी को सुखी बनाने की सारी कोशिशें, भारत को एक महान और निरापद राष्ट्र के सारे प्रयत्न, भारतवासियों की दुःख-वेदना में कमी लाने के सारे प्रयास, सब कुछ व्यर्थ सिद्ध हो रहा है |   यथार्थ मनुष्य बनने के लिये- ' शरीर, मन और ह्रदय ' तीनों का सुसमन्वित विकास करने हेतु - " चरित्र-निर्माण की निष्काम समाजसेवा पद्धति " के ऊपर गहन चिन्तन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि,' मनुष्य-निर्माण' का कार्य जितना आधिभौतिक (मटिरीअलिस्टिक) है, उससे कहीं ज्यादा आध्यात्मिक (spiritualistic) है !
 क्योंकि मनुष्य-निर्माण का कार्य केवल उसके बाहरी आवरण, ' शरीर और मन ' को प्रशिक्षित करने पर ही नहीं, वरन उसके भीतर (ह्रदय) के परिवर्तन पर निर्भर करता है! किन्तु धर्म के प्रचलित अर्थ में महामण्डल कोई ' धार्मिक संगठन ' बिल्कुल नहीं है !
क्योंकि महामण्डल केवल तरुणों (किशोर) या युवाओं का संगठन है| उनमे से सभी लोग प्रचलित ढंग से पूजा-पाठ करने के विधि-अनुष्ठानों का पालन करने के इक्षुक नहीं भी हो सकते हैं| इसीलिये महामण्डल अपने सदस्यों को मन्दिर, मस्जिद य़ा गिरजाघर जाने के लिये कभी बाध्य नहीं करता | अथवा किसी प्रकार के प्रचलित धार्मिक पूजा-अनुष्ठान आदि का पालन करने के लिये वह अपने सदस्यों को कभी अनुप्रेरित य़ा उत्साहित भी नहीं करता|किन्तु बिना किसी अपवाद के सभी तरुणों में एक योग्य नागरिक (Enlightened Citizen) के रूप में अपना जीवन गठित करने का आग्रह अवश्य  रहता है|  बिना जाति -धर्म का भेद किये लगभग सभी तरुण अपने वतन से (भारत माता से) इतना प्रेम करते हैं कि उसका गौरव बढ़ाने तथा अपने देशवासियों के कल्याण के लिये अपने समग्र जीवन को भी उत्सर्ग कर देने से भी पीछे नहीं हटतेमाखनलाल चतुर्वेदी (१८८९-१९६८) की एक प्रसिद्द कविता 'पुष्प की अभिलाषा ' में तरुणों के हृदय का उद्गार इस प्रकार व्यक्त हुआ है - 
चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूथा जाऊँ !
चाह नहीं प्रेमी माला मे
बिंध प्यारी को ललचाऊँ !
चाह नहीं सम्राटों के
शव पर हे हरि डाला जाऊँ !
 चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ - भाग्य पर इतराऊँ !
मुझे तोड़ लेना बनमाली
  उस पथ पर तुम देना फेंक |
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
    जिस पथ जाएँ वीर अनेक ||

यदि 'सच्ची देश-भक्ति' के ऊपर गहराई से विचार किया जाय तो यह बात स्पष्ट हो जाती है की, स्वाधीनता संग्राम में देश के लिये केवल फांसी के फंदे पर झूल जाना ही देश-भक्ति नहीं है, बल्कि एकमात्र अपने ,
'देश और देशवासिओं के कल्याण के उद्देश्य से जीवन धारण करना ' भी सच्ची देश-भक्ति है! और सच्ची आध्यात्मिकता भी देशवासियों की सेवा-' शिव-ज्ञान ' से करने में ही सन्निहित है| स्वामी
विवेकानन्द कहते हैं, " यह जगत भगवान का विराट रूप है; एवं उसकी पूजा का अर्थ है- उसकी सेवा;  वास्तव में आध्यात्मिक कर्म इसीका नाम है, निरर्थक विधि -उपासना के प्रपंच का नहीं|"...कहीं ठाकुरजी वस्त्र बदल रहे हैं, तो कहीं भोजन अथवा और कुछ (१२ रुपया चम्मच का दूध गणेश जी पी रहे हैं ) कर रहे हैं जिसका ठीक ठीक तातपर्य भी हम नहीं समझ पाते,.. किन्तु दूसरी ओर जीवित ठाकुर भोजन, विद्या और चिकत्सा के बिना मरे जा रहे हैं ! " (३:२९९) 
देशवासियों की निःस्वार्थ सेवा करने से ही तरुणों का हृदय परिवर्तित हो जाता है, और वे 'पूर्णतर मनुष्यत्व' अर्जित करने, तथा अपने अन्तर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करने में समर्थ बन जाते हैं । स्वामी विवेकानन्द के उपदेशों को स्मरण कराते हुए महामण्डल सबों को कहता है-  " धर्म का रहस्य - तत्व को जान लेने में नहीं, वरन उस तत्व-ज्ञान को आचरण में उतार लेने में निहित है ! भला बनना तथा भलाई करना " Be good and do good" - अर्थात स्वयं एक चरित्रवान मनुष्य बनना और दूसरों को भी चरित्रवान मनुष्य बनने में सहायता करना - इस 'BE AND MAKE' में ही समग्र धर्म निहित है | एक ही वाक्य में कहें तो, ' मनुष्य स्वयं अपने यथार्थ स्वरूप में क्या है ?  इस तथ्य को अपने अनुभव से जान लेना ही वेदान्त का लक्ष्य है। "  (निष्काम कर्म, भक्ति, ज्ञान और राजयोग इस सत्य की अनुभूति के चार मार्ग हैं !)
जब  कोई व्यक्ति अपरोक्षानुभूति द्वारा अपने यथार्थ स्वरूप को जान लेता है, अथवा आत्मसाक्षात्कार कर लेता है तो वह क्या देखता है ? यहाँ स्वामी जी की वाणी को ही पुनः उद्धृत करते हुए कहना पड़ता है,वह देख पाता है कि-" मनुष्य एक असीम वृत्त  है, जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है, लेकिन जिसका केन्द्र एक स्थान में निश्चित है |और परमेश्वर एक ऐसा असीम वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है, परन्तु जिसका केन्द्र सर्वत्र है। वह सब हाथों से काम करता है, सब आँखों के द्वारा देखता है, सब पैरों के द्वारा चलता है, सब शरीरों द्वारा साँस लेता है, सब जीवों में वास करता है, सब मुखों द्वारा बोलता है और सब मस्तिष्क द्वारा विचार करता है | " (३:११९) मनुष्य भी यह जान लेता है कि अपने को केन्द्र मान कर अपने चारों ओर ह्रदय की परिधि (ह्रदयवत्ता की त्रिज्या ) को विकसित करते हुए, वह अनन्त दूरी पर  रहने वाले मनुष्यों (पराय ) को भी अपना बना सकता है ! इस प्रकार उसका ह्रदय विकसित हो जाता है, उसका प्रभाव क्षेत्र प्रसारित होता है, और वह यथार्थ ' मनुष्य ' में परिणत हो जाता है | इसी को इश्वराभिमुखी पथ-परिक्रमा कहते हैं | किन्तु प्रश्न उठ सकता है कि, क्या भारत के सभी ' जन ' अपनी स्वार्थपरता, हिंसा, लोभ, असंयम, तथा क्षुद्र अहंबोध से परिपूर्ण अपने पाशविक आवरण को भेद कर सीधा- ' ईश्वर के साथ एकत्व ' की अनुभूति कर लेंगे ?' ईश्वरत्व ' में उपनीत हो जाना इतना आसन नहीं है। अतः आचरण में अन्तर्निहित ' पशुत्व ' का अतिक्रमण कर के ' मनुष्यत्व ' अर्जित करना प्रथम सोपान है| हमलोग अभी इसी प्रथम सोपान की ओर अग्रसर हो रहे हैं|
 कह सकते हैं कि, अभी हमारी सीमा यहीं तक - ' मनुष्यत्व ' अर्जित करने तक ही है |  मनुष्य बनना पड़ता है, केवल मनुष्य का ढांचा प्राप्त हो जाने से ही कोई मनुष्य नहीं हो जाता| अतएव  जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के अन्य जितने संभाव्य मार्ग (चार योग ) हो सकते हैं, उन सब पर चर्चा किये बिना, महामण्डल तरुणों से केवल उसी मार्ग की चर्चा करना चाहता है, जो  उन तरुणों के लिये समझने में आसान और  उपयोगी है |तरुणों के लिये उपयोगी केवल ' कर्म-मार्ग ' के ऊपर ही चर्चा करना चाहता है| महामण्डल जाति, भाषा, धर्म य़ा मतवाद के आधार पर तरुणों में कोई भेद-भाव नहीं करता|जीवन में जो कुछ भी मूल्यवान है, उन्हें एक ' महान- उद्देश्य ' को पाने के लिये त्याग देने में समर्थ होना भी तो आध्यात्मिक शक्ति है| यहाँ महामण्डल का वह 'महान - उद्देश्य ' है देश एवं करोड़ो देश-वासियों का कल्याण !
निःस्वार्थ भाव से देशवासियों के  कल्याण के लिये थोड़ा सा भी कुछ करने से, ह्रदय में सिंह का सा बल और हाथों में और अधिक कर्म करने की शक्ति प्राप्त प्राप्त होती है| महामण्डल के समस्त कार्यक्रमों के माध्यम से इसी प्रकार की 'समाज-सेवा' की जाती है, अर्थात तरुणों के चरित्र-निर्माण करने का प्रयास किया जाता है । इसीलिये ' भारत के कल्याण ' के लिये अपना और देश के तरुणों का ' चरित्र-निर्माण ' में निरन्तर लगे रहना,  महामण्डल का लक्ष्य नहीं बल्कि लक्ष्य तक पहुँचने का उपाय है | इसीलिये महामण्डल तरुणों के साथ,
वेदव्यास के शब्दों में केवल कर्म वाले धर्म की ही चर्चा करता है:-
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
अर्थ- धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये। महाभारत में ही कहा गया है -
                                   

                                     सर्वेषां यः सुहृनित्यं सर्वेषां च हिते रताः ।
                                     कर्मणा मनसा वाचा स धर्म वेद जाजले ॥


अर्थ--अर्थात हे जाजले ! धर्म को केवल उसने ही जाना है, कि जो कर्म से , मन से और वाणी से सबका हित (अपने-पराये का भेद देखे बिना) करने में लगा हुआ है और सभी का नित्य स्नेही-बन्धु (हिताकांक्षी)  है।
महामण्डल के पास न तो प्रचूर धन-बल है न जन-बल है, किन्तु इसकी चिन्ता भी उसे तब तक नहीं है, जबतक उसकी दृष्टि के सामने उसका वास्तविक लक्ष्य - ' भारत का कल्याण ' बिल्कुल सुस्पष्ट है! तथा थोड़ी ही संख्या में सही, पर उसके साथ ऐसे युवा संलग्न हैं जो, यह अच्छी तरह से जान चुके हैं कि देश के कल्याण का एकमात्र उपाय है- 'चरित्र -निर्माण '!  आज भी सम्पूर्ण भारत वर्ष में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे युवा भरे पड़े हैं, जो ईमानदार, निष्ठावान, परिश्रमी, देशभक्त, जिज्ञासु, निःस्वार्थपर, त्यागव्रती, तेजस्वी एवं साहसी हैं! महामण्डल का कार्य केवल उन्हें संगठित करना है, और अपनी मोहनिद्रा को त्याग कर इस मनुष्य-निर्माण कारी आन्दोलन से जुड़ जाने कि लिये अनुप्रेरित करना है|  

महामण्डल कुछ चुने हुए तथाकथित ' गणमान्य (VIP) ' लोगों का संगठन नहीं है| यह उन समस्त तरुणों के लिये है जो देश से प्यार करते है, अपने देश-वासियों से प्यार करते हैं, साथ ही साथ जो स्वयं से भी प्यार करते हैं| महामण्डल उन युवाओं का संगठन है, जो कर्मोद्दीपना से भरपूर एक गौरव-पूर्ण जीवन जीना चाहते हैं, और साथ ही अपने तथा राष्ट्रिय जीवन में गौरव कि परिपूर्णता प्राप्त करने के इक्षुक हैं ! यह संगठन उन सभी लोगों का है, वे चाहे जिस स्थान में रहते हो, जिस किसी भी धर्म को मानते हों, य़ा वे चाहे नास्तिक ही क्यों न हों ! महामण्डल के सदस्यों को ना तो अपना घर-परिवार छोड़ना होता है, न ही स्वभाविक रूप में प्राप्त आजीविका का भी त्याग नहीं करना होता, उन्हें केवल अपना अतिरिक्त समय देना होता है, थोड़ी शक्ति लगानी पडती है एवं यदि संभव हुआ तो इसके कार्यक्रमों को सफल करने में थोड़ा अर्थ देना पड़ सकता है| एक प्रबुद्ध नागरिक का सुसमन्वित चरित्र कहने से जो समझा जाता है, अपना वैसा ही सुन्दर चरित्र गठित करने में सहायक पाँच कार्यों- ' प्रार्थना, मनः संयोग, शारीरिक व्यायाम, स्वाध्याय, विवेक-प्रयोग' का नियमित अभ्यास पूरे अध्यवसाय के साथ करने को अनुप्रेरित किया जाता है। 
इन दिनों साधारण य़ा असाधारण सभी तरह के मनुष्य गली-नुक्कड़ पर खड़े होकर अक्सर ये बातें करते हैं कि-भारत कि वर्तमान अवस्था में परिवर्तन लाने के इस निकम्मी सरकार को तुरन्त बदल देना होगा!  कोई- कोई यह सुझाव भी देते हैं कि प्रजातन्त्र के वर्तमान स्वरूप को ही बदल देने के लिये इसके संविधान में संसोधन कर लोकपाल बिल तो लागु करना ही होगा। किन्तु लोकपाल का उत्तरदायित्व उठाने के लिये य़ा सरकार को सही ढंग से चलाने के लिये, और भी अधिक योग्य, ईमानदार, चरित्रवान मनुष्य 'जन' चाहिये - वे कहाँ से आयेंगे ?  ' आम आदमी' में उन सच्चरित्र मनुष्यों का निर्माण करने कि जिम्मेदारी कौन उठाएगा ? उनका निर्माण कैसे होता है, यह कौन बतायेगा और करके दिखायेगा ? जो लोग बाहें चढाते हुए, गणतान्त्रिक व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिये संघर्ष-रत रहने (अन्नाहजारे के साथ जंतर-मंतर पर बैठ कर आमरण-अनशन करने) का दावा किया करते हैं, वे सभी किन्तु इस सबसे अनिवार्य कार्य के ऊपर कोई योजना नहीं बनाते, और इस असली कार्य को ही भूले रहते हैं।
इसीलिये महामण्डल अभी से उतने बड़े बड़े परिवर्तनों को लाने की तरफ ध्यान दिये बिना, सबों के द्वारा परित्यक्त इस ' चरित्र-निर्माण ' के कार्य को करने का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठा लेना चाहता है! क्योंकि इस प्रथम-करनीय कार्य को पूरा किये बिना- बाद वाले बड़े-बड़े परिवर्तन कभी संभव नहीं है| अतः महामण्डल पूरी विनम्रता के साथ यह स्वीकार करता है कि उसके कार्य क्षेत्र कि सीमा य़ा उसकी उड़ान बस यहीं तक है ! इसलिए राजनीति के साथ महामण्डल का कोई सम्बन्ध नहीं है; जो सर्वदा 

' घोड़े के आगे गाड़ी रखते हैं ' !
स्वामीजी ने कहा है-" उदाहरण के लिये कर्म-प्रक्रिया को ही लो| हम गरीबों को आराम देकर उनकी भलाई करने का प्रयत्न करते हैं| हमें दुःख के मूल कारण का भी ज्ञान नहीं है ! यह तो सागर को बाल्टी से खाली करने के बराबर है |" (४:१६१) ट्रकों के ऊपर- ' मेरा भारत महान ' लिख देने से ही भारत महान नहीं बन जाता| कोई भी देश तब महान बनता है, जब वहाँ के मनुष्य (नागरिक) महान होते हैं! वास्तविक प्रयोजनीयता क्या है- गहन चिन्तन करके पहले उसको जान लेना चाहिये | फिर उस प्रयोजनीयता - ' यथार्थ मनुष्यों का निर्माण ' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये ' चरित्र-निर्माण की पद्धति ' को सीख कर उसे अपने आचरण में उतारना चाहिये । यदि एक बड़ा परिवर्तन लाकर, भारत वर्ष को पुनः उसकी उचाईयों पर ले जाना चाहते हों, उसे एक ' महान- राष्ट्र ' बनाना चाहते हों तो उसका एक मात्र उपाय यही है !
महामण्डल की पुस्तिका " चरित्र के गुण " का अध्यन कर, उन गुणों को अभ्यास के द्वारा अपने जीवन और आचरण में उतार कर आत्मसात कर लेना होगा| दैनन्दिन जीवन में कोई भी कार्य करने के पहले 'विवेक-प्रयोग ' की शक्ति अर्जित करने समर्थ बनाने वाली शिक्षा को ही वास्तविक शिक्षा कहते हैं| अतः वास्तविक ' शिक्षित -मनुष्य ' (केवल डिग्रीधारी नहीं )  कहने से जो अर्थ निकलता है, वैसे मनुष्यों का निर्माण करना ही महामण्डल का उद्देश्य है !
यह स्वाभाविक है कि इस कार्य में समय तो लगेगा| ' अमृत-मन्थन ' करने के समान- निरन्तर, बिना विश्राम लिये कठोर परिश्रम किये बिना-  केवल बैठ कर सोचते रहने से ही, रातों-रात किसी बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन को रूपायित नहीं किया जा सकता| स्वामीजी कहते हैं, " सभी आधुनिक सुधारक युरोप के "विनाशात्मक -सुधार की नकल " करना चाहते है,   (धरणा देने या आमरण-अनशन करने से देश की मूल आवश्यकता-' चरित्रवान मनुष्य ' का निर्माण नहीं हो सकता, ऐसे ' चरित्रवान-जन ' कहाँ से आयेंगे जो 'जन-लोकपाल ' बिल को पूरी ईमानदारी से लागु करे ? ) इससे न कभी किसी की भलाई हुई है और न होगी| हमारे यहाँ के सुधारक - शंकर, रामानुज, मध्व, चैतन्य- हुए हैं|ये महान सुधारक थे, जो  सदा राष्ट्र-निर्माता रहे और उन्होंने अपने समय की परिस्थिति के अनुसार राष्ट्र-निर्माण किया (उन्होंने इसकेलिए कभी आमरण अनशन या धरणा-सत्याग्रह नहीं किया )| यह काम करने की हमारी (भारत की) विशिष्ट विधि है !" (४:२५६)
 " मेरा ध्येय निर्माण है, विनाश नहीं ! ..संक्षेप में वह योजना है : वेदांती आदर्शों (ठोस चरित्र निर्माण) को सन्त और पापी, ज्ञानी और मूर्ख, ब्रह्मण और चंडाल के नित्यप्रति के व्यावहारिक जीवन में प्रतिष्ठित करना | " (४:२५६)
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " यदि किसी कार्य को जड़ से आरम्भ करना हो तो कोई भी यथार्थ प्रगति धीर गति से होने को बाध्य है |" कोई कोई बुद्धिजीवी ( किसी दार्शनिक का सा चेहरा बनाकर ) अपने हिसाब से बड़ा ही सूक्ष्म प्रश्न उठाते हुए कहते है-" क्या इतने बड़ी जनसंख्या वाले देश के समस्त मनुष्यों का चरित्र-निर्माण कभी संभव है?" ठीक है- वैसा करना संभव नहीं ही है, तो आप के पास क्या विकल्प है, जरा वही बता दीजिये ?  यही न कि- ' यथा पूर्वं तथा परम '! अर्थात अब कुछ नहीं हो सकता, बोल कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और " Dooms Day " का इंतजार करे ? इस प्रकार सोचने से क्या किसी भी समस्या का समाधान होगा ?
किन्तु यदि संघ-बद्ध होकर थोड़े से लोग भी स्वयं को और साथ-साथ दूसरों को भी- मनुष्य बनाने के प्रयत्न में लगे रहें तो कोई न कोई तरुण अवश्य ही यथार्थ-मनुष्य के रूप में उन्नत हो सकेगा|क्रमशः ऐसे मनुष्यों की संख्या में वृद्धि होती रहेगी जिसके साथ-साथ उसी के अनुपात में समाज भी परिवर्तित होने को बाध्य हो जायेगा | स्वामी विवेकानन्द ने उदहारण देते हुए कहा था- " जब हम विश्व-इतिहास का मनन करते हैं, तो पाते हैं कि जब जब किसी राष्ट्र में ऐसे लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है, तब तब उस राष्ट्र का अभ्युदय हुआ है; और जैसे ही कोई राष्ट्र अपनी अन्तः-प्रकृति का अन्वेषण करना वह छोड़ देता है, वैसे ही उस राष्ट्र का पतन होने लगता है |भले ही उपयोगितावादी लोग इस चेष्टा (मनुष्य-निर्माण) को कितना भी अर्थहीन प्रयास कहते रहें |" (२:१९८) उनका सिद्धान्त बिल्कुल स्पष्ट था - " हमें उस समय तक ठहरना होगा, जब तक कि लोग शिक्षित (चरित्रवान) न हो जाएँ, जब तक वे अपनी आवश्यकताओं को न समझने लगें और अपनी समस्याओं को स्वयं ही हल करने में समर्थ न हो जाएँ ! " (४:२५४)
शिक्षा के सम्बन्ध में भी स्वामीजी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहते हैं- " जिस विद्या ( ' मनः संयम ' अर्थात मन को एकाग्र करने की विद्या ) का अभ्यास करने से, इच्छा-शक्ति के प्रवाह को शक्तिशाली बनाकर, उसे इस प्रकार संयमित कर लिया जाता है जिससे वह ' फलप्रसविनी-शक्ति ' के रूप में रूपान्तरित हो जाती है, उस (मनः संयोग की)  विद्या के अभ्यास को ही - ' शिक्षा ' कहते हैं !"(७: ३५९)  किन्तु  इस शिक्षा को पर्षद एवं विश्वविद्यालय के अनुदान पर राज्य-संपोषित विद्यालय और कॉलेज की स्थापना करने से ही नहीं दी जा सकती | प्रतिष्ठित शिक्षालयों की संख्या तो इतनी हैं, जिसे गिना भी नही जा सकता, इसके अलावा एक से एक बड़े बड़े नामी-गिरामी विद्यालय, प्रतिदिन खुलते भी जा रहे हैं| स्वामी जी कहते हैं- " जन समुदाय के दुःख-कष्ट में सहभागी बनने के लिये अपने भोग-विलास को त्याग देने की भावना का विकास अभी तक हमारे देशवासियों के ह्रदय को वेध नहीं सका है |" तरुण समुदाय के प्राणों में इस बोध-शक्ति को जाग्रत करा देना होगा| अपने देश के सभी युवाओं के द्वार-द्वार तक इस शिक्षा (मन को एकाग्र करने की विद्या) का वहन करके ले जाना होगा ' यदि पहाड़ मुहम्मद तक नहीं आता तो मुहम्मद को ही पहाड़ के पास जाना होगा'-  यही है महामण्डल का कार्य !
एक प्रश्न और है जिसे हमलोगों को अक्सर सुनना पड़ता है, कुछ लोग पूछते हैं- " आप लोगों का उद्देश्य तो महान है, आपकी परिकल्पना भी प्रशंसनीय हैं, किन्तु इस कार्य को धरातल पर उतारने के लिये आपकी पद्धति क्या है ? आप इस कार्य को पूरा करने के लिये किस प्रकार अग्रसर होना चाहते हैं ? इसके  उत्तर में हमलोगों को यही कहना पड़ता है कि, प्राचीन काल में हमलोगों के ऋषियों ने मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण की जिस पद्धति का अविष्कार किया था, और वर्तमान युग के द्रष्टा- स्वामी विवेकानन्द ने उस पद्धति को जितना सरल बना कर हमें समझाया है, वह पद्धति पूरी तरह से विज्ञानसम्मत है | वही पथ महामण्डल का भी है |
आधुनिक मनोविज्ञान की व्याख्या भी मानो उसी मनःसंयोग विद्या की एक क्षीण प्रतिध्वनी है| उस पद्धति को संक्षेप में इस प्रकार कहा जा सकता है : पहले श्रवण, उसके बाद मनन के द्वारा चरित्र के गुणों की स्पष्ट-धारणा को अपने अवचेतन मन स्थापित करना, उसके बाद उनका सुरक्षण, अभिचालन, एवं अभिलेषण य़ा इच्छा शक्ति के द्वारा उन समस्त गुणों को स्थायी छाप य़ा संस्कार में परिणत करना होता है |
इसके बाद - ' श्रेय-प्रेय ' के विवेक-विचार को सीख कर, लालच को थोड़ा काम करते हुए, मन को वश में रखने के माध्यम से बार-बार इस तरह के कर्मों का अनुष्ठान करना, जिनके भीतर उन गुणों के भाव प्रतिफलित हो जाएँ| इसमें ह्रदय की भी एक भूमिका है |क्योंकि नियन्त्रित ह्रदय-आवेग, समग्र चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया को ही सरस बना देती है|इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि, चरित्र-निर्माण की सम्पूर्ण प्रक्रिया में - पहले श्रेय-प्रेय का 'विवेक' को जीवन में अंगीकार कर लेना सीखना (ज्ञान-योग) है, मन को वश में रखने य़ा मन को एकाग्र करने का अभ्यास(राज-योग)है, एवं नियन्त्रित ह्रदय आवेग (भक्ति-योग) है, एवं पूर्व-निर्धारित सुचिन्तित उद्देश्य - ' भारत का कल्याण ' के लिये निःस्वार्थ कर्म करना (कर्म-योग) है| इन चारों के सुसमन्वित अभ्यास से चरित्र-गठन किया जाता है |
महामण्डल के कार्यक्रमों को इस प्रकार निर्धारित किया गया है कि, इसमें सम्मिलत प्रत्येक सदस्य को इन चारों योग मार्गों का अनुसरण करने का अवसर प्राप्त हो जाता है| महामण्डल का मनुष्य-निर्माण कारी कार्यक्रम उपर्युक्त योग-प्रणाली के अनुरूप चार धाराओं में यथाक्रम, बँटी हुई है- पाठचक्र, मनः संयोग, प्रार्थना, एवं समाज-सेवा| समाज-सेवा महामण्डल का उद्देश्य नहीं है, बल्कि चरित्र-गठन का उपाय मात्र है|
इसीलिये महामण्डल के कार्यों का परिमाप करते समय, समाज-सेवा के परिमाण को मानदण्ड बनाना ठीक नहीं होगा|  बल्कि यह देखना होगा कि उन कार्यों का सम्पादन करते समय उस महामण्डल-कर्मी का दृष्टिकोण कैसा है, वह शिव-ज्ञान से निष्काम जीव-सेवा कर रहा है,य़ा नाम-यश पाने के लोभ से कर रहा है ? इस प्रकार सेवा-कर्मी का सही मनोभाव के साथ लक्ष्य प्राप्ति हेतु स्वाध्याय, विवेक-शक्ति,एवं हृदयवत्ता की त्रिज्या के विस्तार से प्रेम की परिधि के विस्तार, तथा मन पर नियन्त्रण करने की शक्ति कितनी बढ़ी है, यही सब विचारणीय हैं|
महामण्डल के सभी केन्द्र अपने अपने क्षेत्र में  इस प्रकार के परिवेश की रचना कर देता है, जिससे वहाँ के तरुण महामण्डल के उद्देश्य के अनुरूप अपना चरित्र गठन का अभ्यास करने में सक्षम हो सकें| महामण्डल के केन्द्र ग्रामों में य़ा शहरों में कहीं भी स्थापित किये जा सकते हैं|इस समय देश के १२ राज्यों में महामण्डल के ३५० केन्द्र हैं| इन केन्द्रों को किसी विद्यालय के एक कमरे में, बरामदे में, किसी पेंड़ की छाया में, य़ा खेल के मैदान में - य़ा जहाँ कही भी तरुण लोग एकत्र होते हों, वही पर स्थापित किया जा सकता है । वहाँ पर वे अपने शरीर को स्वस्थ सबल रखने के लिये व्यायाम करते हैं,ज्ञान को बढ़ाने तथा बुद्धि को तीक्ष्ण करने के में उपयोगी अध्यन-चर्चा किया करते हैं,फिर विशाल समुद्र के जैसा जिनका ह्रदय था, उन्ही स्वामी विवेकानन्द के जीवन और उपदेशों का पाठ करते हैं, तथा अपने अपने ह्रदय की प्रसारता को बढ़ाने के लिये, मनुष्य की सेवा करने के लिये उनके दिये निर्देशों को कार्य में उतार देने की चेष्टा करते हैं| ' Be and Make ' के माध्यम से ' 3H-निर्माण ' की यह पद्धति कितनी ज्यादा कारगर है, इस बात पर कोई तब तक विश्वास नहीं कर सकता जब तक वह स्वयं इसी प्रणाली का अनुसरण के फलस्वरूप यह नहीं अनुभव कर लेता का कि उसका ह्रदय कितना विशाल हो गया है!
युवा महामण्डल के ही जैसा, बच्चों के लिये एक अलग ' शिशु-विभाग ' भी है,जिसमे उन्ही अभ्यासों को सहजतर तरीके से किया जाता है| कई जगह पर महामण्डल के केन्द्रों में - दातव्य चिकित्सालय, कोचिंग-क्लास, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र, शिशु पाठशाला, छात्रावास, पुस्तकालय-सह-वाचनालय, पौष्टिक आहार वितरण आदि कार्य भी समाज-सेवा के रूप में चलाये जाते हैं| इसके अतिरिक्त जरुरत पड़ने पर, अपने अपने क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों के लिये राहत-कार्य, कृषक, दिन-छात्रों, तथा अभावग्रस्त लोगों को सामयिक सहायता एवं इसी प्रकार के और भी  कई कार्यक्रम चालये जाते हैं|
 किन्तु समाज सेवा के इन समस्त कार्यों को करते समय उनका मनोभाव यही रहता है कि, 'नर- देह में नारायण की सेवा ' करने का जो सूयोग मिला है, उसे पूजा के भाव से करना है|तथा इसी भावना को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकसित करना हमारा उद्देश्य है|ये लोग प्रति वर्ष जरुरतमन्द रोगियों के लिये रक्त-दान करते हैं| इस प्रकार वे उन समस्त कार्यों को करते हैं, जिसके माध्यम से मांस-पेशियों को बलिष्ठ बनाने, मस्तिष्क को प्रखर करने, और ह्रदय को प्रसारित करने में सहायता मिलती हो|   मनुष्य-निर्माण एवं चरित्र-गठन की पद्धति को सभी तरुण सही ढंग से समझ पाने में समर्थ हों, इसके लिये, अखिल भारतीय-स्तर पर,राज्य-स्तर पर, जिला स्तर पर, य़ा स्थानीय-स्तर पर भी प्रति वर्ष युवा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये जाते हैं|
 मन को एकाग्र करने की पद्धति, चरित्र-निर्माण की पद्धति एवं चरित्र के गुण, ' नेति से इति 'आदि विषयों को स्पष्ट रूप से समझा दिया जाता है|यहाँ बताये जाने वाले निर्देशों को आग्रही तरुण लोग अपने अपने नोटबुक में उतार लेते हैं, तथा अपने चरित्र के गुणों में वृद्धि के प्रतिशत को तालिका बद्ध करके स्वयं अपना मूल्यांकन य़ा ' आत्म-मूल्यांकन तालिका ' को भरना सिखाया जाता है|  बाद में सभी तरुण व्यक्तिगत स्तर पर अपने चरित्र के गुणों में मानांक में प्रतिशत की वृद्धि को देख कर स्वयं ही उत्साह से भर उठते हैं|
 देश के विभिन्न प्रान्तों से आये, विभिन्न भाषा-भाषी युवा समुदाय, जब एक ही उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये, छः दिनों तक एक ही साथ वास करते हैं, सामूहिक क्रिया-कलाप एवं पारस्परिक प्रेमपूर्ण व्यवहार से, उनके भीतर सहिष्णुता, सहयोग की भावना, एकात्म-बोध, एवं राष्ट्रिय एकता की भावना जागृत होती है|  शिविर के सभी कार्यक्रम उन्हें एक कर्तव्यपरायण, देशभक्त, निःस्वार्थी एवं त्यागी उन्नततर नागरिक में परिणत होने में सहायक सिद्ध होते हैं | इस प्रकार इस प्रशिक्षण-शिविर के माध्यम से  तरुण लोग मवोचित भाव से विभूषित, सेवा के लिये तत्पर, एवं उदार जीवन दृष्टि सम्पन्न - प्रबुद्ध नागरिक में परिणत हो जाते हैं !
राष्ट्र की सेवा सही ढंग से कर पाने में समर्थ होने के लिये पहले योग्यता अर्जन करना कितना आवश्यक है, इसे युवाओं को ठीक तरीके समझ लेना होगा | अपना सुन्दर चरित्र गढ़ लेना ही सबसे बड़ी समाज-सेवा है ! देश-सेवा की योग्यता-अर्जन करने के माध्यम से, य़ा प्रबुद्ध-नागरिकता अर्जित करने के माध्यम से ही तरुण लोग सामाजिक समस्याओं का समाधान करने एवं समाज के अनिष्ट को रोकने में समर्थ हो सकते हैं| समाज के अन्य सभी वर्ग के लोगों का यह पुनीत कर्तव्य है कि, वे इन तरुणों को अपना चरित्र-गठन करने के प्रयास में हर संभव सहायता करें|महामण्डल का अपने लिये निर्वाचित कर्म-क्षेत्र बस यहीं तक है । भारत को महान बनाने के लिये, जो सबसे अनिवार्य कार्य है, वह है तरुणों के लिये उपयुक्त शिक्षा की व्यवस्था लागु करना|शिक्षा-पद्धति को ऐसा होना चाहिये जिसे तरुण लोग शरीर-मन -ह्रदय, हर दृष्टि(3H Head ,hand and Heart ) से विकसित हो उठें|
प्रत्येक तरुण में पूर्णत्व का विकास ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिये | तरुणों के तीनों अवयवों का सुसमन्वित विकास कराकर, प्रत्येक युवा को योग्य नागरिक में परिणत करना ही शिक्षा का उद्देश्य है, और आज इसी शिक्षा की आवश्यकता है । किन्तु हमारे विद्यालयों के लिये जो शिक्षा व्यवस्था अभी प्रचलित है, उसमे चरित्र-निर्माण य़ा मनुष्य-निर्माण की कोई चर्चा ही नहीं है |  इस दृष्टि से देखने पर महामण्डल के सारे कार्यक्रम प्रचलित शिक्षा-व्यवस्था की परिपूरक हैं ! और चूँकि महामण्डल के समस्त कार्यक्रमों में समाज-सेवा का भाव अनिवार्य रूप से अन्तर्निहित रहता है, इसीलिये जिन राज्यों के जिन-जिन जिलों में महामण्डल के केन्द्र क्रियाशील हैं, वहाँ का समाज इनकी सेवाओं से अवश्य लाभान्वित होता है |
 तथा जो लोग महामण्डल में योगदान करते हैं, उन निष्ठावान कर्मियों को महामण्डल जो सेवाएं प्रदान करता है, वही तो सर्वश्रेष्ठ समाज-सेवा है ! क्योंकि यही एकमात्र वैसा कार्य है - जो समाज की दशा में वास्तविक परिवर्तन लाने में समर्थ है| इस प्रकार हम कह सकते हैं कि, महामण्डल कोई संस्था ही नहीं वरन एक धीमी-गति से चलने वाला एक विशेष प्रकार का आन्दोलन है | यदि देश के युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इस आन्दोलन से जुड़ जाएँ तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह आन्दोलन, निश्चित रूप से  समाज की पत्नोंमुख दिशा को उन्नति की दिशा में, भ्रष्टाचार की दिशा से सदाचार की दिशा में ले ही जायेगा |
विगत ४९ वर्षों से इसके कार्यों की प्रगति तथा सफलताओं के प्रत्यक्ष प्रमाण को देख कर यह आशा क्रमशः बढती जा रही है, तथा इस आन्दोलन से जुड़े पुराने निष्ठावान कर्मियों की आशा अब तो दृढ विश्वास में परिणत हो चुकी है ! चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण कर के, समाज के हर क्षेत्र में इसी प्रकार के मनुष्यों को प्रविष्ट कर देना है-  किन्तु यह कार्य दूसरों के ऊपर जासूसी करने के लिये नहीं है, य़ा राजनीति करके सत्ता का सुख संग्रहित करने के लिये भी नहीं है | इस आन्दोलन से जुड़े रहने का एकमात्र कारण यही है कि - इस कार्य (चरित्र-निर्माण ) को छोड़ कर अन्य किसी भी उपाय से समाज कि चरम-समस्या, भ्रष्टाचार कि समस्या का निदान होना संभव नहीं है ! धन्यवाद-रहित इस कार्य को सफलता पूर्वक सन्चालित कर पाने में सक्षम होकर ही महामण्डल संतुष्ट है!
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामंडल का संक्षिप्त परिचय :

उद्देश्य : भारत का कल्याण

उपाय : चरित्र निर्माण

 आदर्श : स्वामी विवेकानन्द
 
        आदर्श वाक्य : Be and Make!

स्वामी विवेकानन्द के उपदेश -"अतएव, पहले - ' मनुष्य ' उत्पन्न करो|"  (८:२७०) का तात्पर्य  ऐसे ही चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण करने से है |उनके इस परामर्श पर हम भारत वासियों ने अभीतक ठीक से कर्ण-पात नहीं किया है|किन्तु उनके इसी वाणी में - ' आमूल क्रान्तिकारी-परिवर्तन 'य़ा ' Total Revolution '(सम्पूर्ण क्रांति) का बीज निहित है |
सत्ता और सम्पत्ति के लालच में लीन गोपनीय राजदूतों (Informer ) के सुखकर स्वप्न बाद में कहीं खो न जाये, इसी डर से नवीन भारत के इस जननायक के गले में केवल एक ' हिन्दू -सन्यासी ' का तगमा(लेबल) लगा कर,  भारत कि आम जनता से दूर हटाने का प्रयास करना छोड़ कर आइये, हमलोग इसी चरित्र-निर्माण कार्य में कूद पड़ें, एवं मनुष्य-निर्माण के इस आन्दोलन को, एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में फैलाते हुए सम्पूर्ण राष्ट्र के कोने-कोने तक पंहुचा दें!

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(अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की पुस्तिका - ' एकटी युव आन्दोलन ' के एक अध्याय,
' महामण्डलेर लक्ष्य उ कर्मधारा ' का भावानुवाद |) 
  
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स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- " मैं यहाँ मनुष्य-जाति में एक ऐसा वर्ग उत्पन्न करूँगा, जो ईश्वर में अंतःकरण से विश्वास करेगा और संसार की परवाह नहीं करेगा| यह कार्य मन्द, अति मन्द, गति से होगा|" (४:२८४)

" जिसके मन में साहस तथा ह्रदय में प्यार है,वही मेरा साथी बने- मुझे और किसी की आवश्यकता नहीं है।...हम सब कुछ कर सकते हैं और करेंगे; जिनका सौभाग्य है, वे गर्जना करते हुए हमारे साथ निकल आयेंगे,  और जो भाग्यहीन हैं, वे बिल्ली की तरह एक कोने में बैठ कर म्याऊँ-म्याऊँ करते  रहेंगे ! "(४:३०६)

Thursday, April 22, 2010

सिल्वरजुबली में सिंहावलोकन

 झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल वर्ष (२००९-२०१०) के सचिव का 
वार्षिक प्रतिवेदन    

 स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- " हो सकता है कि एक पुराने वस्त्र को त्याग देने के सदृश, अपने शरीर से बाहर निकल जाने को मैं बहुत उपादेय पाऊँ|लेकिन मैं काम करना नहीं छोडूंगा|जब तक सारी दुनिया न जान ले, मैं सब जगह लोगों को यही प्रेरणा देता रहूँगा कि वह परमात्मा के साथ एक है! "(१०:२१७)
आज की यह ' वार्षिक-सभा ' महामण्डल की ' २५ वीं ' वार्षिक आमसभा है! सिल्वरजुबली में सिंहावलोकन किया जाय- स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श मानने वाली यह संस्था झुमरीतिलैया में क्यों और कैसे आविर्भूत हुई ? 
उस दिन - वर्ष  १९८५ में १२ जनवरी के दिन ' स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती ' मनाई  जा रही थी, तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजिव गाँधी ने पहली बार - १२ जनवरी को ' राष्ट्रीय युवा दिवस ' घोषित करते हुए दिल्ली रामकृष्ण मिशन आश्रम पहुँच कर स्वामी विवेकानन्द के शिकागो Pose वाली छवि पर माल्यार्पण किया था|उसका Live Telecast ' झुमरीतिलैया महामण्डल ' का वर्तमान सचिव भी टीवी पर देख रहा था|उसे ऐसा लगा मानो चन्द सेकेन्ड के लिये स्वामीजी की " वह छवि "टीवी के परदे पर Still (ठहर सी गयी थी) हो गयी थी|

 अचानक उनकी आँखों में कुछ ऐसा दिखा कि हिन्दी भाषी प्रान्तों के युवा, जिस ' युवा आदर्श ' (Role Model) की तलाश अभी तक सिनेमा के नायकों में कर रहे थे, उन सबसे अधिक आकर्षक और ओजपूर्ण तो यह " योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द " हैं ! फिर क्या था झुमरी तिलैया के अपने बंगाली मित्रों के पास उस छवि की खोज करने लगा, अन्त में वह छवि श्री सुकान्त मजुमदार के यहाँ प्राप्त हो गयी जिसे अपने प्रतिष्ठान में मुख्य स्थान पर लगा दिया|


 और उसके अगले ही दिन- " मकर संक्रान्ति १४ जनवरी १९८५ "  के दिन झुमरी तिलैया में एक ' चारित्र निर्माण कारी संस्था ' के रूप में ' विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर ' भी बिना कोई योजना बनाये- स्वतः ही आविर्भूत हो गया!( यह तो बाद में पता चला की सन १८६३ में १२ जनवरी को भी मकर संक्रान्ति थी, जब स्वामी विवेकानन्द का जन्म हुआ था)
किन्तु चरित्र क्या है, और चरित्र निर्माण कैसे किया जाता है; इन सब के विषय में तत्कालीन अध्यक्ष य़ा सचिव दोनों में से किसी के पास कोई जानकारी नहीं थी | इसीलिये जेसीज क्लब , बैंक ऑफ़ इंडिया, रोटरी क्लब जैसी संस्थाओं के मिलकर " करमा हरिजन टोला " के विकास में ' ज्ञान-मन्दिर 'भी लगा रहा |
इसी बीच राँची रामकृष्ण मिशन में कार्यरत महामण्डल के भ्राता श्री प्रमोद रंजन दास (प्रमोद दा) से स्वामी विवेकानन्द की उक्ति सुनने को मिली कि - " देश के प्रत्येक घर को हम सदावर्त में भले ही परिणत कर दें, देश को रोड और अस्पतालों आदि से भले ही पाट दें, परन्तु जबतक मनुष्य का चारित्र परिवर्तित नहीं होता, तब तक दुःख-क्लेश बना ही रहेगा|" (३:२९) उन्होंने ने ही उसे वर्ष १९८७ में बेलघड़िया में आयोजित महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने को प्रोत्साहित किया! 
उस युवा प्रशिक्षण शिविर में अपने साथ-साथ सैंकड़ो युवओं के ऊपर
 " Be and Make " तथा " 3H निर्माण " सूत्र पर आधारित ६ दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के प्रभाव को देख कर आवाक रह गया! स्वामीजी ने कहा है- " यदि यह प्रभु का कार्य हो, तो उचित समय पर योग्य व्यक्ति अवश्य ही तदनुरूप कार्य में आकर सम्मिलित होंगे! "(४:३६९) और वर्ष १९८८ में महामण्डल का ३दिवसिय ' प्रथम बिहार राज्य स्तरीय युवा प्रशिक्षण शिविर ' झुमरीतिलैया में आयोजित होने के बाद ' विवेकानन्द ज्ञान मन्दिर ' का विलय " झुमरी तिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल " में हो गया|
महामण्डल द्वारा प्रकाशित मन, ह्रदय तथा शरीर को सुसमन्वित ढंग से विकसित कराकर तरुणों के जीवन को गठित करने वाली पुस्तिकाओं  (Mahamandal Booklets ) एवं युवाओं में ' श्रद्धा और विवेक ' जाग्रत करा देने में समर्थ उसकी संवाद पत्रिका " Vivek Jivan " के अंग्रेजी एवं बंगला में लिखी हुई रचनाओं को ठीक से समझ कर उन्हें हिन्दी में अनुवादित करने में सक्षम एवं स्वामी विवेकानन्द में अनुराग रखने वाले किसी हिन्दी भाषी व्यक्ति के लिये बंगला भाषा को सीखना भी अनिवार्य हो गया था| ...इसीलिये लगता है, स्वयं स्वामीजी ही अपनी वाणी को सत्य सिद्ध करने के लिये अब भी कार्यरत हैं; और उन्ही की प्रेरणा से यहाँ का कार्य प्रारम्भ हुआ था|
स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व देशवासिओं के मन में ऐसी धारणा थी कि वर्तमान में सम्पूर्ण देश को दरिद्रता, अनाहार, अशिक्षा आदि जिन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है, उन सारी समस्याओं का मूल कारण केवल (अंग्रेजों की) पराधीनता ही है !जैसे ही देश गुलामी की जंजीरों से मुक्त होकर राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर लेगा, वैसे ही यहाँ की सारी समस्याएं समाप्त हो जाएँगी और देश में समृद्धि का ज्वार आ जायेगा! 
परन्तु आजादी के छः दशक बीत जाने के बाद-२१ अप्रैल २०१० को प्रतिष्ठित हिन्दी समाचार पत्र ' हिन्दुस्तान 'का सम्पादकीय कहता है- 
" योजना आयोग के पैनल ने गरीबी का आकलन करने वाली 'सुरेश तेंदुलकर समिति की पद्धति ' को स्वीकार करते हुए (२००४-०५) में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या को ३७.२ % (करीब ४४ करोड़) मान लिया है ! यह संख्या योजना आयोग के अपने ही पूर्व के आकलन से १० % ज्यादा है| गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की २७.५ % संख्या का वह आकलन ' कैलोरी उपभोग ' पर आधारित था, जिसकी आलोचना तमाम अर्थशास्त्री लंबे समय से कर रहे थे|

हालांकि गरीबी मिटाने के लिये समर्पित विशेषग्य..के अनुसार इस संख्या को ५० % तक मानते हैं|..सही आकड़े तो सन २०११ तक ही मिल पायेंगे,लेकिन देश के कई हिस्से भूख की चपेट में हैं और उन्हें जल्दी से जल्दी राहत मिलनी चाहिये|दिलचस्प बात यह है कि ३७.२ % की यह संख्या सिर्फ खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लिये स्वीकार की गई है| सरकार के बाकी योजनायें और कार्यक्रम अभी २७.५ % वाले आकलन के आधार पर ही चलेंगे|" जनकल्याण का रास्ता " निकलता है तो उसका स्वागत होना चाहिये | " 
अगर हम सभी भारतवासी सचमुच " जनकल्याण का रास्ता " ढूँढना चाहते हों -  तो हमें इस प्रश्न का उत्तर अवश्य ढूँढना चाहिये कि, आखिर क्यों राजनैतिक स्वाधीनता भी देशवासियों का यथार्थ कल्याण करने में विफल सिद्ध हो गयी? राजनीतिक दृष्टि से स्वाधीनता प्राप्त करने के ६२ वर्ष बाद, इतने मिहनती होने पर भी हमारे करीब ४४ करोड़ देशवासी क्यों गरीब हैं ?इतना धन व्यय करने के बाद भी सारी पंचवर्षीय योजनायें लक्ष्य को क्यों नहीं प्राप्त कर पाती हैं ? जब अंग्रेज चले गये गये हैं तो फिर आज स्वतन्त्रता के इस शुभ्र प्रकाश में भी देशवासी स्वयं को छला हुआ सा -क्यों अनुभव कर रहे हैं ?
विलम्ब से ही सही, पर अभी किस उपाय के द्वारा- इतने वर्षों की विफलता को दूर करके एक बार पुनः देश को विकास और प्रगति के पथ पर आरूढ़ कराया जा सकता है?

 देश की दुरावस्था के लिये केवल दूसरों को जिम्मेदार ठहराने, या शासक वर्ग के विरुद्ध विक्षोभ प्रदर्शन के लिये, रेल,बस,आदि सरकारी संपत्तियों को जला कर खाक कर देने से - देश की दुरावस्था का अवसान कभी संभव न होगा|स्वामी  विवेकानन्द ने कहा है- " जो लोग अपने दुखों य़ा कष्टों के लिये दूसरों को दोषी बनाते हैं, वे साधारणतया अभागे और दुर्बल-मस्तिष्क हैं|अपने ही कर्म-दोष से वे ऐसी परिस्थिति में आ पड़े हैं, और अब वे दूसरों को इसके लिये दोषी ठहरा रहे हैं| पर इससे उनकी दशा में तनिक भी परिवर्तन नहीं होता- उनका कोई उपकार नहीं होता, वरन दूसरों पर दोष लादने की चेष्टा करने के कारण वे और भी दुर्बल बन जाते हैं|
...अतएव उठो, साहसी बनो, वीर्यवान होओ|सब उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर लो- यह याद रखो कि तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो|तुम जो कुछ बल य़ा सहायता चाहो, सब तुम्हारे ही भीतर विद्यमान है|अतएव इस ज्ञानरूप शक्ति के सहारे तुम बलवान बनो और अपने हाथों अपना भविष्य गढ़ डालो !"  (२:१२०)
" पहले यह बताओ कि समाज के दोष दूर करने कि आवश्यकता तुमको है य़ा सरकार को ? यदि तुमको आवश्यकता है, तो क्या सरकार उन्हें दूर करेगी य़ा तुमको स्वयं ही उन्हें दूर करना होगा ?..भिखमंगों की मांगें कभी पूरी नहीं होतीं| 
माना की सरकार तुमको तुम्हारी आवश्यकता की वस्तुएं देने को एकबार राजी हो भी जाय, पर प्राप्त होने पर उन्हें सुरक्षित और संभाल कर रखने वाले मनुष्य कहाँ हैं? इसलिए पहले आदमी (इन्सान ) य़ा - ' मनुष्य ' उत्पन्न करो| हमें अभी ' मनुष्यों ' आवश्यकता है, और बिना श्रद्धा के मनुष्य कैसे बन सकते हैं ? (८:२७०)
भारत के पुनर्निर्माण के प्रति जितने भी बुद्धि जीवी, राजनीतिक नेता आदि हैं सभी एक मत हैं, सभी चाहते हैं कि भारत का पुनर्निर्माण तो होना ही चाहिये, किन्तु उपाय को लेकर किसी एक का भी मत दूसरे से नहीं मिलता | ७६ CRPF जवानों के दन्तेवाड़ा में शहीद होने के बाद लोकसभा में जो चर्चा हो रही थी उसके लाइव-टेलीकास्ट को मैं भी देख रहा था|उसको देखने के बाद स्वामी विवेकानन्द कथित एक कहानी का स्मरण हो आया, जो इस प्रकार है :-  
" अपने मत को अक्षुण रखने में प्रत्येक मनुष्य का एक विशेष आग्रह देखा जाता है|"...एक समय एक छोटे राज्य को जीतने के लिये एक दूसरे राजा ने दल-बल के साथ चढ़ाई कर दिया। शत्रुओं के हाथ से बचाओ कैसे हो, इस सम्बन्ध में विचार करने के लिये उस राज्य में एक बड़ी सभा बुलायी गयी|सभा में इंजीनियर, बढ़ई, चमार, लोहार, वकील, पुरोहित आदि सभी उपस्थित थे |
इंजीनियर ने कहा- 'शहर के चारों ओर एक बहुत बड़ी खाई खुदवाइये|' 
बढ़ई बोला- ' काठ की एक दीवाल खड़ी कर ड़ी जाय|' 
चमार बोला- ' चमड़े के समान मजबूत और कोई चीज नहीं है, चमड़े की ही दीवाल खड़ी की जाय|'
लोहार बोला- ' इस सबकी कोई आवश्यकता नहीं है; लोहे की दीवाल सबसे अच्छी होगी; उसे भेदकर गोली य़ा गोला नहीं आ सकता|'
वकील बोले- ' कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है; हमारा राज्य लेने का शत्रु को कोई अधिकार नहीं है- यही एक बात शत्रु को तर्क-युक्ति द्वारा समझा दी जाय|'
पुरोहित बोले- ' तुम लोग तो पागल जैसे बकते हो|होम-याग करो, स्वस्त्यन करो, तुलसी दो, शत्रु कुछ भी नहीं कर सकता|'
इस प्रकार उन्होंने राज्य को बचाने का कोई उपाय निश्चित करने के बदले अपने अपने मत का पक्ष लेकर घोर तर्क-वितर्क आरम्भ कर दिया|यही है मनुष्य का स्वभाव !" (१०:३२७,३२८)मानव मन के एकतरफा, एकपक्षीय झुकाव(या सनक) के बारेमें;' शिकागो-भाषण ' के पूर्व ही २५ अक्टूबर १८९२ को स्वामी विवेकानन्द से दीक्षा प्राप्त करने वाले उनके शिष्य ' श्री हरिपद मित्र ' भी उनको एक घटना सुनाते हुए कहते हैं- ' स्वामी जी , मुझे लड़कपन में पागलों के साथ बातचीत करना बड़ा अच्छा लगता था|एक दिन मैंने एक पागल देखा - खासा बुद्धिमान, थोड़ी-बहुत अंग्रेजी भी जनता था; वह केवल पानी ही चाहता था! उसके पास एक फूटा लोटा था|पानी की कोई नयी जगह देखते ही, चाहे नाला हो, हौज हो, बस वहीं का पानी पीने लगता था| 
मैंने उससे इतना पानी पीने का कारण पूछा,तो वह अंग्रेजी में बोला -  
 ' Nothing like water, Sir !'(पानी जैसी दूसरी कोई चीज ही नहीं, महाशय!) मैंने उसे एक अच्छा लोटा देने की इच्छा प्रकट की, पर वह किसी प्रकार राजी नहीं हुआ|कारण पूछने पर बोला , 'यह लोटा फूटा हुआ है, इसीलिये इतने दिनों तक मेरे पास टिका हुआ है|अच्छा रहता, तो कब का चोरी चला गया होता!
स्वामी जी यह कथा सुन कर बोले, '..ऐसे लोगों को झक्की कहते हैं|हमसभी लोगों में इस प्रकार का कोई दुराग्रह य़ा झक्कीपन हुआ करता है|हमलोगों में उसे दबा रखने की क्षमता है| पागल में वह नहीं है|हमलोगों में और पागलों में भेद केवल इतना ही है|रोग, शोक, अहंकार, काम, क्रोध, ईर्ष्या य़ा अन्य कोई अत्याचार अथवा अनाचार से दुर्बल होकर, मनुष्य के अपने इस संयम को खो बैठने से ही सारी गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है! मन के आवेग को वह फिर संभाल नहीं पाता| हमलोग तब कहते हैं, 'यह पागल हो गया है |' बस इतना ही ! " (१०:३२८) 
२१ अप्रैल २०१० को दैनिक जागरण में एक समाचार छपा था- शीर्षक था-' शारीरिक परिवर्तन के प्रभाव से अवगत हुए किशोर-किशोरी '" नेहरू युवा केन्द्र, हजारीबाग में किशोर-किशोरी मार्गदर्शन को ले कार्यशाला का आयोजन हुआ |कार्यशाला में ग्रामीण व शहरी क्षेत्र के २० किशोर व २५ किशोरियों ने भाग लिया, जिन्हें जीवन कौशल के विभिन्न पहलुओं की जानकारी देते हुए शारीरिक परिवर्तन के प्रभाव से अवगत कराया गया|जिला युवा समन्वयक विजय कुमार के निर्देशन में आयोजित कार्यशाला में प्रतिभागियों ने परामर्शदात्री रूपा बनर्जी से शारीरिक परिवर्तन के सम्बन्ध में कई सवाल पूछे|परामर्शदात्री ने सवालों का विस्तृत जवाब देकर प्रतिभागियों को संतुष्ट किया|
कार्यशाला में लिंग भेद, नशा, भ्रूण हत्या, एनीमिया, एड्स व सामाजिक सरोकार से संबन्धित विषयों पर जानकारी दी गयी|कार्यशाला को सफल बनाने में DPO शुभ्रो मल्लिक, राजनारायण महतो, शबनम, आदि का सराहनीय योगदान रहा| " 
इसको क्या कहेंगे? क्या इसी (भ्रूण हत्या और एड्स ) शिक्षा के बल पर तरुणों में आत्मश्रद्धा का संचार हो सकेगा
" मनुष्य को सदैव उसकी दुर्बलता की याद कराते रहना उसकी दुर्बलता का प्रतिकार नहीं है- बल्कि उसे अपने बल का स्मरण करा देना ही उसके प्रतिकार का उपाय है|मनुष्य में जो बल पहले से ही विद्यमान है, उसका उन्हें स्मरण कराओ| " (८:११)  
 " वेदान्त सबसे पहले मनुष्य को अपने ऊपर विश्वास करने के लिये कहता है| जिस प्रकार संसार का कोई कोई धर्म कहता है कि जो व्यक्ति अपने से बाहर किसी सगुण ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता, वह नास्तिक है| उसी प्रकार वेदान्त भी कहता है कि जो व्यक्ति अपने आप पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है| अपनी आत्मा की महिमा में विश्वास न करने को ही वेदान्त में नास्तिकता कहते है|" (८:६) 
 " मनुष्य केवल मनुष्य भर चाहिये| बाकी सब कुछ अपने आप हो जायेगा| आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वि, श्रद्धासमपन्न और दृढविश्वासी निष्कपट नवयुवकों की| ऐसे सौ मिल जाएँ, तो संसार का कायाकल्प हो जाय |"(५:११८)  
 " आज हमें श्रद्धा की आवश्यकता है, आत्मविश्वास की आवश्यकता है| बल ही जीवन, और निर्बलता ही मृत्यु है- ' हम आत्मा हैं- अजर,अमर, मुक्त और शुद्ध| फिर हमसे पाप-कार्य कैसे संभव है ? असंभव है- इस प्रकार की दृढ निष्ठा होनी चाहिये|इस प्रकार का अडिग विश्वास हमें मनुष्य बना देता है, देवता बना देता है|पर आज हम श्रद्धाहीन हो गये हैं और इसीलिये हमारा तथा देश का पतन हो रहा है|...हम श्रद्धाहीन कैसे बन गये ? 
बचपन से हमारी शिक्षा ही ऐसी रही है| हमने तो यही सीखा है कि हम नगण्य हैं, नाचीज हैं|कभी हमें यह नहीं बताया गया कि हमारे देश में भी ( बिक्रमादित्य जैसे राजा और चाणक्य जैसे प्रधान मंत्री हुए हैं !) महान पुरुषों का जन्म हुआ है |
हमे एक भी तो अच्छी बात नहीं सिखाई जाती|हमे हाथ-पैर चलाना (परेड में चलना) तक नहीं आता|हमें इंग्लैण्ड (अभी अमेरिका) के पूर्वजों की तो एक एक घटना और तिथि याद हो जाती है, पर, दुःख है, अपने देश के अतीत से हम अनभिज्ञ रहते हैं|हम केवल निर्बलता का पाठ पढ़ते हैं|पराजित राष्ट्र होने से, हमें यह विश्वास हो गया कि हम शक्तिहीन और हर बात में परावलम्बी हैं|
अतः श्रद्धा नष्ट न हो तो क्या हो ? अब हमें पुनः एकबार श्रद्धा का भाव जाग्रत करना होगा, हमारे सोये हुए आत्मविश्वास को जगाना होगा, तभी आज देश के सामने जो समस्याएं हैं, उनका समाधान स्वयं हमारे द्वारा हो सकेगा| " (८:२६९) 
" सारी शिक्षा तथा समस्त प्रशिक्षण का एकमेव उद्देश्य मनुष्य का निर्माण होना चाहिये| परन्तु हम यह न कर केवल बहिरंग पर ही पानी चढाने का सदा प्रयत्न किया करते हैं|जहाँ व्यक्तित्व का ही आभाव है, वहाँ सिर्फ बहिरंग पर पानी चढाने का प्रयत्न करने से क्या लाभ? 
सारी शिक्षा का ध्येय है- मनुष्य (में यथार्थ नेतृत्व शक्ति का) का विकास! वह " मनुष्य "
- { महामण्डल के ' नेता ' जैसा मनुष्य } जो अपना प्रभाव सब पर डालता है, जो अपने संगियों पर जादू सा कर देता है, शक्ति का एक महान केन्द्र है, और जब वह मनुष्य तैयार हो जाता है, वह जो चाहे कर सकता है| यह व्यक्तित्व जिस वस्तु पर अपना प्रभाव डालता है, उसी वस्तु को कार्यशील बना देता है ! " (४:१७२)
" (मनोनिग्रह अर्थात ) आत्मसंयम का अभ्यास करने (और लालच को काम करते जाने से ) महान इच्छा-शक्ति का प्रादुर्भाव होता है; वह बुद्ध य़ा ईसा जैसे चरित्र का निर्माण करता है| मूर्खों को इस रहस्य का पता नहीं रहता, परन्तु फिर भी वे मनुष्य जाती पर शासन करने के इच्छुक रहते हैं!" (३:९)
" तथ्य-समूह से मन को भर देना ही शिक्षा नहीं है, शिक्षा का आदर्श है, साधन को योग्य बनाना और अपने मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना| यदि किसी विषय पर मन को केन्द्रित करना चाहूँ, तो उसे उसमे ही निविष्ट हो जाना चाहिये, और जिस क्षण उसे आदेश दूँ, पुनः उसे वहाँ से हट जाना य़ा मुक्त हो जाना चाहिये|
...एकाग्रता के साथ साथ अनासक्ति की क्षमता का विकास हमे करना होगा, जो समान रूप से दोनों में, ' प्रवृत्ति -निवृत्ति ' में शक्तिशाली है, वही सच्चा पौरुष प्राप्त कर सकता है| सारा विश्व डगमगा जाये, तो भी तुम उसे चिन्तातुर नहीं पाओगे|कौन सी पुस्तक ऐसी शिक्षा दे पायेगी !तुम चाहे जितनी पुस्तकें पढ़ लो| " (४:१५७,१५८)
" मैं शिक्षा को गुरु के साथ संपर्क, ' गुरु-गृहवास '- समझता हूँ| गुरु के व्यक्तिगत जीवन के आभाव में शिक्षा नहीं हो सकती|अपने विश्वविद्यालयों को लीजिये| अपने ५० वर्ष के अस्तित्व में उन्होंने क्या किया है? उन्होंने एक भी मौलिक व्यक्ति पैदा नहीं किया|वे केवल परीक्षा लेने की संस्थाएँ हैं|(देशवासियों के कल्याण के लिये ) सबके कल्याण के लिये बलिदान की भावना (अपने जीवन को न्योछावर करदेने की भावना) का अभी हमारे राष्ट्र में विकास नहीं हुआ है| " (४:२६२) 
" आज के विश्वविद्यालय ' बाबू ' पैदा करने की मशीन के सिवाय कुछ नहीं है| अगर इतना ही होता, तब भी ठीक था, पर नहीं- इस शिक्षा से लोग किस प्रकार श्रद्धा और विश्वास रहित होते जा रहे हैं|
वे कहते हैं कि गीता तो एक प्रक्षिप्त अंश है और वेद देहाती (गड़ेरिये का) गीत मात्र है| वे भारत के बाहर के देशों तथा विषयों के सम्बन्ध में तो हर बात जानना चाहते हैं, पर यदि उनसे कोई अपने पूर्वजों के नाम पूछे तो चौदह पीढ़ी तो दूर रही, सात पीढ़ी तक भी नहीं बता सकते|
(...यह न सोचना कि) इससे क्या हुआ? वे अपने पूर्वजों के नाम नहीं जानते हैं तो क्या हानी है ? नहीं, ऐसा मत सोचो| जिस राष्ट्र का अपना कोई इतिहास नहीं है, वह संसार में अत्यन्त ही हीन और नगण्य है| 
क्या तुम सोचते हो कि कोई व्यक्ति जिसे सदैव इस बात का विश्वास और अभिमान है कि वह उच्च कुल में उत्पन्न हुआ है, कभी दुश्चरित्र हो सकेगा?...इसी तरह राष्ट्र का गौरवमय अतीत राष्ट्र को नियन्त्रण में रखता है, उसका अधःपतन नहीं होने देता|" (८:२२७) 
" शिक्षा किसे कहते हैं ? क्या वह पठन मात्र है? नहीं| क्या वह नाना प्रकार का ज्ञानार्जन है? नहीं, यह भी नहीं| जिस संयम के द्वारा इच्छा-शक्ति का प्रवाह और विकाश वश में लाया जाता है और वह फलदायक  होता है, वह शिक्षा कहलाती है|...वास्तविक शिक्षा को ..मानसिक शक्तियों का विकास - केवल शब्दों का रटना मात्र नहीं, अथवा व्यक्तियों को ठीक तरह से और दक्षता पूर्वक इच्छा करने का प्रशिक्षण देना कह सकते हैं|" (७:३५९)(४:२६८)
" शिक्षा से मेरा तात्पर्य आधुनिक प्रणाली की शिक्षा से नहीं, वरन ऐसी शिक्षा से है जो बी भावनात्मक हो तथा जिससे स्वाभिमान और श्रद्धा के भाव जागें|केवल किताबें पढ़ा देने से कोई लाभ नहीं|हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जिससे चरित्र-निर्माण हो, मानसिक शक्ति बढे, बुद्धि विकसित हो, और देश के युवक अपने पैरों पर खड़े होना सीखें|...अबतक तो उन्होंने थोड़ी सी भी अनिष्ट य़ा संकट की आशंका होने पर आँसू बहाना ही सीखा है|" (८:२७७)
" ( उच्च शिक्षा का अर्थ डिग्री बटोरना य़ा फर्स्ट क्लास फर्स्ट हो कर आईएस बन जाना ही नहीं है-) उच्च शिक्षा का उद्देश्य है- जीवन की समस्याओं को सुलझा लेने में स्वयं समर्थ बन जाना- और आज का सभ्य संसार आज भी इन्हीं समस्याओं पर गहन चिन्तन कर रहा है, किन्तु हमारे देश में सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही गुत्थियाँ सुलझा ली गयीं | " (८:२३०) 
" हमारा यह संसार - इन्द्रियों, बुद्धि और युक्ति का संसार, दोनों ही ओर अनन्त, अज्ञेय और अज्ञात से परिसीमित है|यह अनन्तता ही हमारी खोज है, इसीमें अनुसन्धान के विषय हैं, इसीमें तथ्य हैं और इसी से प्राप्त होने वाले प्रकाश को संसार धर्म कहता है|इस तरह धर्म वस्तुतः इन्द्रियातीत भूमिका की वस्तु है, ऐन्द्रिक भूमिका की नहीं|
वह समस्त तर्क के परे है, बुद्धि के स्तर की नहीं| यह एक अलौकिक दिव्य दर्शन है, एक अन्तःप्रेरणा है, यह मानो अज्ञात और अज्ञेय के उदधि में डुबकी लगाना है, जिसके द्वारा ' ज्ञानातीत ' ज्ञात से भी अधिक ज्ञात हो जाता है, क्योंकि वह कभी 'जाना ' नहीं जा सकता |" (४:१८७)
" शिक्षा का अर्थ है,उस पूर्णत्व की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है!
धर्म का अर्थ है, उस ब्रह्मत्व की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है|"  (२:३२८)
" मैं धर्म को शिक्षा का अन्तरतम अंग समझता हूँ!..पर ध्यान रखिये कि यहाँ धर्म का अर्थ मैं अपना (ब्रांडेड धर्म )" य़ा किसी दूसरे की राय की बात नहीं कहता|" (४:२६८) 
 " मेरे गुरु कहते थे कि हिन्दू, ईसाई आदि नाम (ब्रांड) मनुष्य मनुष्य में भ्रातृ-प्रेम के होने में बहुत रूकावट डालते हैं|पहले इन्हें (नाम कि कट्टरता को ) तोड़ने का यत्न करना चाहिये|
उनकी कल्याण करनेवाली शक्ति अब नष्ट हो गयी है और अब केवल उनका घातक प्रभाव रह गया है,जिसके जादू-टोने के कारण हममें से सर्वश्रेष्ठ मनुष्य भी राक्षसों का सा व्यवहार करने लगते हैं|" (३:३८७)  
" मन्दिर और गिरजा, पोथी और पूजा, ये धर्म की केवल शिशुशाला (Kinder-garden ) मात्र हैं, जिनके द्वारा आध्यात्मिक शिशु पर्याप्त बलवान होता है, जिससे वह उच्चतर सीढियों पर पैर रखने में समर्थ होता है|...धर्म न तो मतों में है, न पन्थों में और न तार्किक विवाद में ही|धर्म का अर्थ है आत्मा की ब्रह्मस्वरुपता को जान लेना, उसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त कर लेना और तद्रूप हो जाना |" (३:२४८)
" धर्म के सब रूपों में एक सार भाग और एक अ-सार भाग होता है|यदि हम उनसे अ-सार को अलग कर दें, तो सब धर्मों का वह वास्तविक आधार बच रहता है, जो धर्म के सब रूपों में सामान्यतः मिलता है| उन सब के पीछे वही एक है| हम उसे God, अल्लाह, जिहोवा, चेतना, प्रेम जो चाहें, कहें|...किन्तु मनुष्य की प्रवृत्ति अ-सार पर बल देने की रही है| वे इन रूपों के लिये, अपने हमसफ़र को सहमत बनाने के लिये, आपस में लड़ते हैं, एक दूसरे की हत्या तक कर देते हैं|" (४:२३८)

" केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही ऐसा है, जो हमारे दुखों को सदा के लिये नष्ट कर दे सकता है;अन्य किसी प्रकार के ज्ञान से आवश्यकताओं की पूर्ति केवल अल्प समय के लिये ही होती है| केवल आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ही हमारे दैन्य-क्लेशों का सदा के लिये अन्त हो सकता है| अतएव किसी मनुष्य की आध्यात्मिक सहायता करना ही उसकी सबसे बड़ी सहायता करना है|जो मनुष्य को पारमार्थिक ज्ञान दे सकता है, वही मानव समाज का सबसे बड़ा हितैषी है! " (३:२८)   

 स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, " सभी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं मनुष्यों के भलेपन पर टिकती हैं| कोई राष्ट्र इसलिए महान और अच्छा नहीं होता कि उसकी Parliament (संसद) ने यह य़ा वह (Bill) पास कर दिया है, वरन इसलिये होता है कि उसके निवासी महान और अच्छे होते हैं|" (४:२३४) 
" हम उस मनुष्य को देखना चाहते हैं, जिसका विकास समन्वित रूप से हुआ हो...ह्रदय से विशाल 
मन से उच्च, कर्म में महान ! हम ऐसा मनुष्य चाहते हैं, जिसका ह्रदय संसार के दुःख-दर्दों को गंभीरता से अनुभव करे|
और हम चाहते हैं ऐसा मनुष्य, जो न केवल अनुभव कर सकता हो, अपितु समस्याओं के तह तक य़ा  प्रकृति और बुद्धि के गहराई में पहुँच कर वस्तुओं के अर्थ का भी पता लगा सके (Sharp-Intellect)| हम चाहते हैं ऐसा मनुष्य, जो यहाँ भी न रुके, वरन जो भाव और वास्तविक कार्य में ताल-मेल बैठा कर उन समस्याओं का निदान करने में भी समर्थ हो अर्थात व्यावहारिक (Practical ) मनुष्य |हम मस्तिष्क (Head) ह्रदय (Heart)और हाथों (Hand) - के ऐसे ही संघात (3H) को चाहते है!
इस संसार में बहुत से शिक्षक हैं, पर तुम पाओगे कि उनमे से अधिकतर एकांगी (एकपक्षीय य़ा झक्की टाइप ) हैं|एक को ' ज्ञान का देदीप्यमान मध्यान्ह सूर्य ' दिखाई देता है, और दूसरा कुछ नहीं सूझता|दूसरे को ' प्रेम का सुन्दर संगीत सुनाई ' देता है, और कुछ नहीं सुन पड़ता |एक 'निरन्तर कर्म 'में ही डूबा रहना चाहता है, उसे न कुछ महसूस करने का समय है, न विचार करने का|तब हम उन महान मनुष्यों का निर्माण क्यों न करें, जो समान रूप से क्रियाशील, ज्ञानवान, प्रेमवान हैं
क्या ऐसे मनुष्यों का निर्माण करना असंभव है ? निश्चय ही नहीं ! 
(महामण्डल तो यही कार्य विगत ४३ वर्षों से करता आ रहा है, और अब मनुष्य निर्माण कारी शिक्षा का प्रशिक्षण शिविर एक परीक्षित सत्य बन चुका है|और अपनी ऋषि दृष्टि से भविष्य के महामण्डल को भारत के गाँव गाँव में आविर्भूत होता हुआ देख कर ही उह्नोने कहा था-)
ऐसों की संख्या उस समय तक बढती रहेगी जब तक कि समस्त संसार का मानवीकरण नहीं हो जाता ! " (३:२१४,२१५) 
     
  " मनुष्य के मन में ही समस्या का समाधान मिल सकता है| कोई कानून किसी व्यक्ति से वह कार्य नहीं करा सकता है, जिसे वह करना नहीं चाहता है|
अगर मनुष्य अच्छा बनना चाहेगा, तभी वह अच्छा बन पायेगा|सम्पूर्ण विधान एवं विधान के पण्डित मिलकर भी उसे अच्छा नहीं बना सकते| सर्वशक्ति सम्पन्न तो कहेगा ही, ' मैं किसी की परवाह नहीं करता !' हम सब अच्छे बनें, यही समस्या का हल है|(४:१५७)  
...यह तो हमें मान ही लेना चाहिये कि कानून,सरकार, राजनीति ऐसी अवस्थाएं हैं, जो किसी प्रकार अन्तिम नहीं हैं| उनसे परे एक एक ध्येय (ब्रह्मज्ञानी मनुष्य) है, जहाँ कानून कि आवश्यकता नहीं है|...ईसा ने देखा कि विधि-नियम उन्नति का मूल नहीं हैं, केवल नैतिकता और पवित्रता ही शक्ति है|"(४:२३४)
" ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है| उसे बताओ की तू ब्रह्म है| यदि कोई शैतान हो, तो भी हमारा कर्तव्य यही है कि हम ब्रह्म का ही स्मरण करें, शैतान का नहीं|...हम यही कहें - 'हम हैं ', 'ईश्वर हैं और हम ईश्वर हैं|
' शिवोहम शिवोहम कहते हुए आगे बढ़ते चलो|जड़ (शरीर) नहीं, वरन चैतन्य (आत्मा) हमारा लक्ष्य है! नाम-रूप वाले सभी पदार्थ नाम-रूप हीन सत्ता (अस्ति,भाति,प्रिय) के अधीन हैं| इसी सनातन सत्य की शिक्षा श्रुति (गीता -उपनिषद आदि) दे रही है! प्रकाश को ले आओ, अन्धकार आप ही आप नष्ट हो जायेगा|
वेदान्त -केसरी गर्जना करे, सियार अपने अपने बिलों में छिप जायेंगे!..यदि कोठरी में अन्धकार है, तो सदा अन्धकार का अनुभव करते रहने और अन्धकार अन्धकार चिल्लाते रहने से तो वह दूर नहीं  होगा, बल्कि प्रकाश को भीतर ले आओ, तब वह दूर हो जायेगा|
..आत्मा की शक्ति का विकास करो और सारे भारत के विस्तृत क्षेत्र में उसे ढाल दो, और जिस स्थिति की आवश्यकता है, वह आप ही आप प्राप्त हो जाएगी|अपने आभ्यन्तरिक ब्रह्मभाव को प्रकट करो और उसके चारों ओर सब कुछ समन्वित हो कर विन्यस्त हो जायेगा|
वेदों में बताये हुए- 'इन्द्र और विरोचन ' के उदाहरण को स्मरण रखो|दोनों को ही अपने ब्रह्मत्व का बोध कराया गया था, परन्तु असुर विरोचन अपनी देह को ही ब्रह्म मान बैठा|
इन्द्र तो देवता थे, वे समझ गये कि वास्तव में आत्मा ही ब्रह्म है!!
तुम तो इन्द्र की सन्तान हो! तुम देवताओं के वंशज हो! जड़ पदार्थ तुम्हारा ईश्वर कदापि नहीं हो सकता; शरीर तुम्हारा ईश्वर कभी नहीं हो सकता!
भारत का पुनरुत्थान होगा, पर वह जड़ की शक्ति से नहीं, वरन आत्मा की शक्ति द्वारा| वह उत्थान विनाश की ध्वजा लेकर नहीं, वरन शान्ति और प्रेम की ध्वजा से-...ऐसा मत कहो कि हम दुर्बल हैं, कमजोर हैं|
श्री रामकृष्ण के चरणों के दैवी स्पर्श से जिनका अभ्युदय हुआ है, उन मुट्ठी भर नवयुवकों की ओर देखो !उन्होंने उनके उपदेशों का प्रचार आसाम से सिंध तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक कर डाला|
..उनपर कितने ही अत्याचार किये गये, पुलिस ने उनका पीछा किया, वे जेल में डाले गये, पर अन्त में जब सरकार को उनकी निर्दोषिता का निश्चय हो गया, तब वे मुक्त कर दिये गये!
अतएव, अपने अन्तःस्थित ब्रह्म को जगाओ, जो तुम्हें क्षुधा-तृष्णा, शीत-उष्ण सहन करने में समर्थ बना देगा |..आत्मा की इस अनन्त शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु पर होने से भौतिक उन्नति होती है, विचार पर होने से बुद्धि का विकास होता है और अपने ही पर होने से मनुष्य भी ईश्वर-तुल्य बन जाता है!
पहले हमें ईश्वर बन लेने दो! तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर-तुल्य- ' मनुष्य ' बनाने में सहायता देंगे| बनो और बनाओ - Be and Make !यही हमारा मूल मंत्र रहे! " (९:३७९-३८०) 
विलासपूर्ण भवनों में बैठे बैठे जीवन की सभी सूख-सामग्रियों (एसी, LCD टीवी और फ्रिज आदि ) से घिरे हुए रहना और धर्म की थोड़ी सी चर्चा कर लेना अन्य देशों में भले ही शोभा दे, पर भारत को तो स्वभावतः सत्य की इससे कहीं अधिक पहचान है|
..कोई भी बड़ा कार्य बिना त्याग के नहीं किया जा सकता|स्वयं 'पुरुष' ने भी सृष्टि की रचना करने के लिये सवार्थ त्याग किया, अपने को बलिदान किया|
अपने आरामों का, अपने सुखों का, अपने नाम, यश और पदों का- इतना ही नहीं, अपने जीवन तक का- त्याग करो, और मनुष्य-निर्माण रूपी श्रृंखला का ऐसा पुल बना दो जिस पुल पर से करोड़ो (४४ करोड़ गरीब) लोग भवसागर को पर कर जाएँ !(९:३८१)
" मैं समझता हूँ कि हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय पाप जनसमुदाय (इन ४४ करोड़ गरीब लोगों ) की उपेक्षा है, और वह भी हमारे पतन का एक कारण है| हम कितनी भी राजनीति बरतें(नरेगा का नाम बादल कर मनरेगा कर दें), उससे उस समय तक कोई लाभ न होगा, जब तक कि भारत का जनसमुदाय एक बार फिर सुशिक्षित, सुपोषित, और सुपालित नहीं होता|वे हमारी शिक्षा के लिये धन देते हैं, हमारे मन्दिर बनाते हैं, और बदले में ठोकरें पाते हैं| वे व्यवहारतः हमारे दास हैं|यदि हम भारत को पुनर्जीवित करना चाहते हैं तो हमें उनके लिये काम करना होगा|
...आपके सामने है जनसमुदाय को उसका अधिकार देने की समस्या| आपके पास संसार का महानतम धर्म है और आप जनसमुदाय को सारहीन और निरर्थक बातों पर पलते हैं|आपके पास चिरंतन बहता हुआ स्रोत है और आप उन्हें गन्दी नाली का पानी पिलाते हैं| आपका मद्रास का स्नातक एक नीची जाती का स्पर्श नहीं करेगा, पर वह अपनी शिक्षा के लिये उससे रुपया खींचने को तैयार है |(४:२६०,२६१)
" प्रेम कभी निष्फल नहीं होता मेरे बच्चे, कल हो य़ा परसों य़ा युगों के बाद, पर सत्य की जय अवश्य होगी|प्रेम ही मैदान जीतेगा(बंदूकें नहीं)|क्या तुम अपने भाई, मनुष्य जाती - को, प्यार करते हो ? ईश्वर को कहाँ ढूंढने चले हो- ये सब गरीब (४४ करोड़), दुखी, दुर्बल मनुष्य क्या ईश्वर नहीं हैं? इन्हीं की पूजा पहले क्यों नहीं करते ?
गंगा-तट पर कुआँ खोदने क्यों जाते हो? प्रेम की असाध्य -साधिनी शक्ति पर विश्वास करो|इस झूठ जगमगाहट वाले नाम-यश की परवाह कौन करता है? समाचारपत्रों में क्या छपता है, क्या नहीं, इसकी मैं कभी खबर ही नहीं लेता
क्या तुम्हारे पास प्रेम है ? तब तो तुम सर्वशक्तिमान हो| क्या तुम संपूर्णतः निःस्वार्थ हो? यदि हो ? तो फिर तुम्हें कौन रोक सकता है? चरित्र की ही सर्वत्र विजय होती है ! भगवान ही समुद्र के तल में भी अपनी संतानों की रक्षा करते हैं| तुम्हारे देश के लिये वीरों (Heroes) की आवश्यकता है - वीर बनो ! " (३:३२३)
" मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नयी पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमे से आयेंगे|सिंहों की भाँति वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे|...वे एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र में उस समय तक फैलेंगे, जब तक कि हम सम्पूर्ण भारत पर नहीं छा जायेंगे !" (४:२६१)
" आवश्यकता है संघठन करने की शक्ति की, मेरी बात समझे ?क्या तुममें से किसी में यह कार्य करने की बुद्धि है ?यदि है तो तुम कर सकते हो|...हमें कुछ चेले (निष्ठावान आज्ञाकारी कर्मी ) भी  चाहिये- वीर युवक, समझे ? दिमाग में तेज और हिम्मत के पूरे, यम का सामना करने वाले, तैर कर समुद्र पार करने को तैयार - समझे? हमें ऐसे सैंकड़ो चाहिए- स्त्री और पुरुष, दोनों|जी -जान से इसीके लिये प्रयत्न करो !"(३:३५४)
" हे नर-नारियों ! उठो, आत्मा के सम्बन्ध में जाग्रत होओ, सत्य में विश्वास करने का साहस करो| संसार को कोई सौ (१००) साहसी नर-नारियों की आवश्यकता है ! अपने में साहस लाओ, जो सत्य को जान सके, जो जीवन में निहित सत्य को दिखा सके, जो मृत्यु से न डरे, प्रत्युत उसका स्वागत करे, जो मनुष्य को यह ज्ञान करा दे कि वह आत्मा है, और सारे जगत में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जो उसका विनाश कर सके|" (२:१८) 
" कुछ ही लोग हैं, जो सत्य की जिज्ञासा करते हैं, उससे भी कम सत्य को जानने का साहस करते हैं, और सबसे कम सत्य को जानकर हर प्रकार से उसको कार्यरूप में परिणत करते हैं|...फिर भी कुछ तो ऐसे वीर संसार में हैं ही, जो सत्य को जानने का साहस करते हैं, जो उसे धारण करने तथा अन्त तक उसका पालन करने का साहस करते हैं| " (२:२१०)
" अपनी बहादुरी तो दिखाओ! प्रिय भाई, मुक्ति न मिली तो न सही, दो-चार बार नरक ही जाना पड़े तो हानि ही क्या है ? क्या भर्तृहरि का यह कथन असत्य है- 
मनसि  वचसि काये पुन्यपीयूषपूर्णः 
त्रिभुवनं-उपकारश्रेनिभिः प्रीयामानः  !
परगुणपरमाणुम पर्वतीकृत्य केचित 
निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः क्रियन्तः ||   
ऐसे साधु (सज्जन पुरुष ) कितने हैं, जिनके कार्य मन तथा वाणी पुण्यरूप  अमृत से परिपूर्ण  हैं और जो विभिन्न उपकारों के द्वारा त्रिभुवन की प्रीति सम्पादन कर दूसरों के परमाणु तुल्य अर्थात अत्यन्त स्वल्प गुण को भी पर्वतप्रमाण बढ़ा कर दूसरों से कहते रहते हैं- और इस प्रकार अपने हृदयों को विशाल बनाते रहते हैं!(' विवेकानन्द - राष्ट्र को आह्वान ' पुस्तिका का पृष्ठ २७)    
" समस्त मंगलकारी शक्तियों को एकत्र करो! किस ध्वजा के नीचे तुम अग्रसर हो रहे हो, इसकी परवाह मत करो|तुम्हारी ध्वजा का रंग हरा, नीला, य़ा लाल कुछ भी हो, उसकी चिन्ता मत करो, बल्कि सभी रंगों को एक में मिला दो और उससे अत्युज्ज्वल श्वेत रंग का निर्माण करो, जो कि प्रेम का रंग है|
हमे तो कर्म ही करना है, फल अपने आप होता रहेगा|यदि कोई सामाजिक बन्धन तुम्हारे ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में बाधक है, तो आत्मशक्ति के सामने अपने आप ही वह टूट जायेगा|
भविष्य मुझे दीखता नहीं और मैं उसे देखने की चिन्ता भी नहीं करता| परन्तु मैं अपने सामने वह एक सजीव दृश्य तो अवश्य देख रहा हूँ कि हमारी यह प्राचीन भारत माता पुनः एक बार जाग्रत होकर अपने सिंहासन पर नवयौवनपूर्ण और पूर्व कि अपेक्षा अधिक महा महिमान्वित होकर विराजी है| शान्ति और आशीर्वाद के वचनों के साथ सारे संसार में उसके नाम की घोषणा कर दो !
सेवा और प्रेम में सदा तुम्हारा ,
विवेकानन्द (९:३८१) 
स्वामीजी के अनुसार राष्ट्र कल्याण की पहली शर्त है- " स्वयं मोहनिद्रा से जागकर यथार्थ मनुष्य बनना तथा भारत के अन्य समस्त देशप्रेमी युवाओं को संगठित कर, उन्हें भी मोहनिद्रा से जगाकर यथार्थ मनुष्य बनजाने में सहायता करना !" इसलिए उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था- " साहसी बनो! सत्य को जानो, और उसे जीवन में परिणत करो! चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो, जागो, जब तक ध्येय तक न पहुँचो, तबतक मत रुको! " (२:२०)
" उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ! " 
" Arise, awake ! and stop not till the goal is reached !" 
स्वामी जी ने कहा था- " अंग्रेजी पढ़े-लिखे युवकों के साथ हमे कार्य करना होगा|(अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े छात्रों के) त्यागी हुए बिना  तेजस्विता नहीं आने की| कार्य आरम्भ कर दो! यदि तुम एक बार दृढ़ता से कार्यारम्भ कर दो तो मैं कुछ विश्राम ले सकूँगा! "( ३:३१३)
स्वामीजी के इसी उपदेश को ध्यान में रखते हुए, तथा महामण्डल के भाई श्री अजय अग्रवाल के अनुरोध पर इस वर्ष से ' झुमरी तिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल ' का " सदस्यता आवेदन प्रपत्र " इस वर्ष से दोनों भाषाओँ में (अंग्रेजी और हिन्दी ) में छपवाने का निर्णय लिया गया है | अंग्रेजी का प्रपत्र निम्नवत होगा-
JHUMRI TILAIYA 
VIVEKANAND YUVA MAHAMANDAL 
( Affiliated to Akhil Bharat Vivekananda Yuva Mahamandal )


Application Form for Admission 

To, 
The Secretary,
Jhumritilaiya Vivekananda Yuva Mahamandal,
 ' Tara Niketan '
Bishunpur Road, Jhumri Tilaiya,
Kodarma (Jharkhand)
pin -825409 

Sir, 

I have read the " Aims and Objects " of the Mahamandal 
and I have allegiance to its ideals. I affirm that I shall endeavor to uphold the ideals through my thought, actions, and speech and I shall also try to propagate the ideals among the others.

I shall abide by the rules and regulations of the Mahamandal 
  and shall also endeavor to further the cause of the Mahamandal in all possible ways.
  In this connection it is to state that I am not attached to- " any
Political Party" . 

Kindly admit me as a member of Jhumri Tilaiya Vivekananda Yuva Mahamandal unit. My other particulars are given below:-

Yours faithfully

Signature of the applicant
date:
 ------------------------------------------------
Name in full : (In block letters)---------------------------------
Fathers Name :----------------------------------------------------
Address         : ---------------------------------------------------

 Phone no :---------------------      Email address: ----------------------------
Age :-----------------------------     Occupation : -----------------------------
For Office Use

Admission fee paid vied :Rs. -------------------------------------------------------
  
Receipt No :------------ Date :--------------------------
Reason for cancellation of membership :-------------------------------------------
Secretary's opinion :-----------------------------------------------------------
हिन्दी प्रपत्र की रुपरेखा निम्नवत होगी:-
झुमरीतिलैया  
विवेकानन्द युवा महामण्डल 
(अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की एक इकाई )

सदस्यता आवेदन प्रपत्र 

सेवा में, 
सचिव, 
झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल, 
' तारा निकेतन '
बिशुनपुर रोड, झुमरीतिलैया, कोडरमा |
(झारखण्ड ) 
पिन- 825409 
महाशय, 
मैंने महामण्डल के " उद्देश्य और कार्यक्रम " को पढ़ा है, और मैं इसके आदर्शों 
के प्रति निष्ठा रखता हूँ! मैं दृढ़ता पूर्वक यह वचन देता हूँ कि, मैं इन आदर्शों की मर्यादा को अपने विचार, आचरण तथा वाणी के द्वारा सदैव प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न कर्ता रहूँगा, साथ ही साथ इन आदर्शों को दूसरों के बीच प्रतिष्ठित कराने का प्रयास भी करूँगा| 
मैं महामण्डल के सभी नियमों का पालन करूँगा एवं महामण्डल के कार्यक्रमों को    
समग्र रूप से विकसित कराने के लिये सदैव तत्पर रहूँगा|
इस सन्दर्भ में मैं यह घोषणा करता हूँ कि मैं किसी भी राजनीतिक दल के साथ संलग्न 
नहीं हूँ! कृपया मुझे झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल की सदस्यता प्रदान की जाय| अन्य व्यक्तिगत विवरण नीचे दे रहा हूँ |
आपका विश्वासी 


आवेदक के हस्ताक्षर |
तिथी :-----------------------
पूरा नाम :----------------------------------------------
पिता का नाम :----------------------------------------
पूरा पता :--------------------------------------------
----------------------------------------------------
------------------------------------------------------
फोन : ------------------------------------ ई मेल --------------------
उम्र- ------------------------------------- वयवसाय ----------------------
(कार्यालय के लिये )
प्रवेश शुक्ल :----------------
रसीद संख्या :--------------------- तिथी ----------------------------------
सदस्यता अस्वीकार करने का कारण  :--------------------------------------



सचिव का मन्तव्य 
-----------------------------------------------------------------------------------------


वर्ष (२००९-१०) में
झुमरी तिलैया 
विवेकानन्द युवा महामण्डल 
द्वारा किये गये कार्यों का विवरण 

युवा प्रशिक्षण शिविर :
  • " १५वाँ बिहार-झारखण्ड राज्य स्तरीय चरित्र-निर्माणकारी युवा प्रशिक्षण शिविर " का आयोजन ३० अक्टूबर से १ नवम्बर २००९ तक स्थानीय C.H.Inter College में किया गया|इस शिविर में बिहार-झारखण्ड के विभिन्न जिलों से आये ३६८ युवकों ने हिस्सा लिया| 
  • इस शिविर को रामकृष्ण-विवेकानन्द  सेवासंघ, अंबिकापुर (छत्तीस गढ़ ) के सचिव परमपूज्य स्वामी तन्मयानन्द जी ने उदघाटित किया तथा ' अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के अध्यक्ष परमपूज्य श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय, महामण्डल के दो सहायक सचिव श्रद्धेय श्री रनेन मुखर्जी एवं श्री दीपक सरकार ने शिविर के सञ्चालन में प्रमुख भूमिका निभाई |
  • एक दिवसीय " बिहार-झारखण्ड निष्ठावान कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण शिविर " का आयोजन २६ जुलाई २००९ को ' तारा-टावर ', झुमरीतिलैया  में आयोजित हुआ |
  • जिसमे जानिबिघा विवेकानन्द युवा महामण्डल, बरसोत विवेकानन्द युवा पाठचक्र, हजारीबाग विवेकानन्द युवा महामण्डल, फुलवरिया विवेकानन्द युवा पाठचक्र, तथा झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल के १८ कार्यकर्ताओं ने भाग लिया तथा महामण्डल का निष्ठावान,निष्कपट और निः स्वार्थपर कर्मी ' बनने और बनाने ' की प्रेरणा को और भी दृढ़ता से धारण किय़ा |
  प्रकाशन कार्य   : 
  •   महामण्डल द्वारा अंग्रेजी और बंगला भाषा में प्रकाशित पुस्तिका " Leadership : its Concept and Qualities " को हिन्दी में अनुवाद करके " नेतृत्व की अवधारणा एवं गुण " के नाम से प्रकाशित किया गया| 
  • ' चरित्र गठन ' एवं ' चरित्र के गुण ' को बंगला से हिन्दी में अनुवाद करके महामण्डल की त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका 'विवेक-जीवन ' में धारावाहिक तरीके से प्रकाशित किया गया|  
  • महामण्डल की त्रैमासिक हिन्दी संवाद पत्रिका ' विवेक-जीवन ' के ग्राहकों की संख्या में वृद्धि करने का प्रयत्न किया गया| 
  • इस पत्रिका के देश व्यापी प्रचार-प्रसार हेतु डाक-शुल्क में सुविधा का लाभ लेने के लिये; भारत सरकार के "Office of the Registrar of Newspapers for India, New Delhi -110066 " से सम्पर्क किया गया| 
  •  ८ मार्च २०१० को भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय से महामण्डल द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक सम्वाद पत्रिका को ' विवेक अंजन ' शीर्षक से छापने के लिये अनुमोदित किया गया है, क्योंकि  ' Vivek Jivan ' नाम अंग्रेजी- बंगला भाषा में पहले से निबंधित है|
श्रीरामकृष्ण विवेकानन्द साहित्य विक्रय केन्द्र (बुक स्टाल):
  • बरही विवेकानन्द युवामहमंडल द्वारा आयोजित दो दिवसीय युवा प्रशिक्षण शिविर में ९-१० जून २००९ को बरही उच्च विद्यालय के प्रांगण में लगाया गया जिसमे लगभग ८०० रूपए की महामण्डल पुस्तिकाओं का विक्री हुई |
  • झुमरी तिलैया में आयोजित शिविर में ३० अक्टूबर से १ नवम्बर २००९ को C.H. Inter College में लगभग १२,००० रूपए की रामकृष्ण-विवेकानन्द साहित्य एवं महामण्डल पुस्तिकाओं की विक्री हुई |
श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द चित्र प्रदर्शनी :
  • दो दिवसीय बरही  युवा प्रशिक्षण शिविर में तथा त्रिदिवसीय झुमरीतिलैया शिविर में कुल ५ दिनों  तक श्रीरामकृष्ण एवं स्वामी विवेकानन्द के जीवन और सन्देश पर चित्र प्रदर्शनी लगायी गयी|
विशेष  कार्यक्रम :
श्रीरामकृष्ण  परमहंस की जन्म तिथी(१६ फरवरी २०१०) के शुभ अवसर पर झुमरीतिलैया विवेकानन्द महामण्डल के साप्ताहिक पाठचक्र को प्रति रविवार C.D. Girls High  School , गौशाला रोड, झुमरी तिलैया में आयोजित करने का निर्णय लिया गया |
तथा इस अवसर पर श्री सुकान्त मजुमदार, श्री अजय अग्रवाल, श्री सुनील देबनाथ, और अजय पाण्डेय ने श्रीरामकृष्ण देव की पूजा अर्चना के बाद एक बहुत सुन्दर " गीति-आलेख " प्रस्तुत
किया | संध्या ६ बजे से रात्रि ९ बजे तक चले इस कार्यक्रम में झुमरीतिलैया के लगभग ५० -६० स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया|
श्रीरामकृष्ण की जीवनी और उपदेशों का कथावाचन हिन्दी में श्री अजय अग्रवाल द्वारा तथा प्रार्थना और भजन श्रीमती काकोली मजुमदार, श्रीमती उमा बिश्वास, श्रीमती जयश्री श्रीमती सुनील देबनाथ ने प्रस्तुत किया, जबकि पटकथा लेखन श्री रामचंद्र मिश्र ने किया|
साप्ताहिक पाठचक्र ( Study Circle ) :
" 3H- निर्माण "
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, " हम मस्तिष्क (Head) ह्रदय (Heart)और हाथों (Hand) - के ऐसे ही संघात (3H) को चाहते है!इस संसार में बहुत से शिक्षक हैं, पर तुम पाओगे कि उनमे से अधिकतर एकांगी (एकपक्षीय य़ा झक्की टाइप ) हैं|
एक को ' ज्ञान का देदीप्यमान मध्यान्ह सूर्य ' दिखाई देता है, और दूसरा कुछ नहीं सूझता|दूसरे को ' प्रेम का सुन्दर संगीत सुनाई ' देता है, और कुछ नहीं सुन पड़ता |एक 'निरन्तर कर्म 'में ही डूबा रहना चाहता है, उसे न कुछ महसूस करने का समय है, न विचार करने का| 
तब हम उन महान मनुष्यों का निर्माण क्यों न करें, जो समान रूप से क्रियाशील, ज्ञानवान, प्रेमवान हैं? क्या ऐसे मनुष्यों का निर्माण करना असंभव है ? निश्चय ही नहीं
ऐसों की संख्या उस समय तक बढती रहेगी जब तक कि समस्त संसार का मानवीकरण नहीं हो जाता !"
महामण्डल तो यही कार्य विगत ४३ वर्षों से करता आ रहा है!
 यथार्थ मनुष्य बनने के लिये यह अपने सदस्यों को " पञ्च कर्म " का दैनिक अभ्यास करने का परामर्श देता है ! 
  • शरीर  (Hand) को स्वस्थ रखने के लिये - खाली हाँथ का दैनिक व्यायाम (Physical Exercise ) और पौष्टिक आहार लेना चाहिये !
  • मन (Head) को स्वस्थ सबल बनाने के लिये- मन को वश में रखने के लिये लालच को कम करना चाहिये और प्रति दिन दो बार, कम से कम 5 मिनट मनः संयम (Mental Concentration) का अभ्यास करना चाहिये |
  • स्वाध्याय : और मन को पौष्टिक आहार देने के प्रतिदिन नियमित रूप से स्वामी विवेकानन्द के एक भी ' शक्तिदाई विचारों ' को पढ़ लेना चाहिये |
  • ह्रदय (Heart ) को विस्तार करने के लिये- (Auto-Suggeestion)  महामण्डल से प्राप्त " स्वपरामर्श-सूत्र " का दो बार नियमित रूप से पाठ करना चाहिये| प्रातः काल सो कर उठते ही , और रात में सोने से पहले जब मनः संयोग करने बैठें तो उसके पहले| 
  • प्रार्थना  :स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " संसार में पवित्र चिन्तन का एक स्रोत बहा दो| मन ही मन कहो - ' संसार के सभी मनुष्य सुखी हों, सभी शान्ति और आनन्द में रहें, सबों को ईश्वर (परम सत्य) की अनुभूति हो! ' इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चारों ओर पवित्र चिन्तन की धारा बहा दो|ऐसा जितना करोगे, उतना ही तुम अपने को अच्छा अनुभव करने लगोगे|बाद में देखोगे ,  ' दूसरे सब लोग स्वस्थ हों ', यह चिन्तन ही स्वास्थ्य-लाभ का सहज उपाय है|इसके बाद जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, वे ईश्वर के निकट प्रार्थना करें- मुझे अर्थ, स्वास्थ्य य़ा जो कुछ भी दो वह स्वर्ग के लिये नहीं, वरन ह्रदय में ज्ञान और सत्य-तत्व के उन्मेष के लिये |इसको छोड़ कर बाकी सब प्रार्थनाएँ स्वार्थभरी हैं|" (१:५७) उन्होंने कहा था - " मनुष्य की प्रज्ञा, उसके अनुभव, उसका विवेक, उसकी बुद्धि, उसका ह्रदय, ये सब इस संसाररूपी क्षीरसागर के मन्थन में लगे हुए हैं |दीर्घ काल तक मथने के बाद उसमे से मक्खन निकलता है, और यह मक्खन है ईश्वर|हृदयवान मनुष्य ' मक्खन ' पा लेते हैं और कोरे बुद्धिमानों के लिये सिर्फ ' छाछ ' बच जाति है |" (३:१०७)
इन ' पञ्च कर्म ' में यहाँ के सदस्यों का प्रतिशत निम्नवत है -
प्रार्थना -  ९५ %
मनः संयम - ८२ %
शारीरिक व्यायाम - ६५ %
स्वाध्याय - ७० %
संकल्प सूत्र - ६६ % 
यहाँ की प्रेरणा से नये स्थान में ' पाठ- चक्र '  का प्रारम्भ : 
झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल से अनुप्रेरित हो कर यहाँ के पूर्व सदस्य श्री रजत मिश्र ने दिल्ली में पाठ चक्र का प्रारम्भ दिनांक      से  किया है, जिसक पता है- 
इस वर्ष महामण्डल के नये युवा सदस्य :
१५ वे राज्य स्तरीय शिविर का बाद ' शिविर अनुभव प्रपत्र ' को पढने और संपर्क करने के बाद तीन नये तरुण पाठचक्र में इस वर्ष जुड़े हैं| 
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