Wednesday, January 20, 2010

" न कृतः शीलविलयः" (Basantpur Camp Lecture of Navnida)

  " भर्तृहरि के नीतिशतक की शिक्षा "

भाइयों, प्रश्नोत्तरी की कक्षा में मुझे आज बहुत बोलना पड़ा, जबकि मेरा स्वास्थ्य अभी बहुत ख़राब है| वैसे बाहर से देखकर मेरी शारीरिक अवस्था या उम्र का सही-सही अनुमान लगा पाना काफी मुश्किल है, क्योंकि मेरे सिर के बाल अभी भी काले ही हैं, सफ़ेद नहीं हुए हैं| किन्तु मेरी आयु तो अब ८० वर्ष होने वाली है|
स्वामी विवेकानन्द ने युवा वर्ग को जितने भी परामर्श दिये हैं, तथा वे युवा वर्ग से जिन बातों की अपेक्षा रखते थे, उसके सार को हमलोगों ने यहाँ बार-बार सुना है| उनके अनुसार अपने चरित्र को सुन्दर ढंग से गठित कर लेना ही युवाओं का एकमात्र कर्त्तव्य है| केवल मनुष्य की आकृति प्राप्त कर लेने से ही कोई व्यक्ति मनुष्य नहीं बन जाता, बल्कि अपने चरित्र का निर्माण कर, सुन्दर जीवन-गठित कर लेने वाले व्यक्ति को ही यथार्थ ' मनुष्य ' की संज्ञा दी जा सकती है| भारत में दो हजार वर्ष से भी पहले एक प्रतापी राजा हुए हैं - भर्तृहरि ! आज उनका यह पवित्र नाम, " भर्तृहरि "- हमारे पूरे देश में वैराग्य का ज्वलन्त प्रतीक माना जाता है| 
किन्तु, इनका प्रारम्भिक जीवन ठीक नहीं था| ये बड़े ही बुरे ढंग से अपना जीवन-यापन करते थे, बड़े ही बुरे ढंग से| यौवन काल में वे अत्यन्त ही भोग-विलासपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे| और इसी कारण अपने उस जीवन के ऊपर, उन्होंने संस्कृत भाषा में एक सौ श्लोकों की रचना की थी| नाम था - ' श्रृंगार शतकम '! इस श्रृंगार-शतक में बस केवल श्रृंगार-रस ही भरा हुआ था|
क्योंकि इनकी रचना करते समय उनमे ' विवेक-शक्ति ' का उदय नहीं हुआ था| लेकिन धीरे धीरे व्यावहारिक जीवन का अनुभव प्राप्त करने से उनमें नीतिबोध जाग्रत हुआ| तब उन्होंने योग्य राजा के लिये उपयोगी और भी १०० संस्कृत श्लोकों की रचना की, जिसका नाम हुआ, ' नीति-शतकम '! मन में नीति का बोध जाग्रत होने से बाद में वैराग्य का भाव भी उत्पन्न हो गया|      
वैसे, श्रृंगार का यह भाव बीज रूप से सभी में रहता है| किन्तु वह बीज वृक्ष के रूप में परिणत होने से पूर्व ही, अनेकों युवाओं के जीवन को बिल्कुल ही नष्ट कर देता है| जो युवा नैतिकता के महत्व को समझकर उसे आचरण में उतारना चाहते हैं, वे श्रृंगार वाले भाव का त्याग कर देते हैं| क्योंकि जीवन में नैतिकता का पालन करने से ही ' जीवन गठन ' होता है| नीति बोध रहने से ही हम यथार्थ मनुष्य में परिणत हो पाते हैं| 
इसके बाद है- वैराग्य| वैराग्य का अर्थ घर से निकल कर जंगल में चले जाना और साधु बन जाना ही नहीं है| " घर-गृहस्थी में रहते हुये भी वैराग्य में सुप्रतिष्ठित " - ऐसे एक दो नहीं, बल्कि कई लोगों को देखने तथा उनके साथ रहने का सौभाग्य मुझे इस जीवन में प्राप्त हुआ है|
मैंने यह अनुभव किया है, कि घर-गृहस्थी में रहते हुए परिवार के सदस्यों, सगे-संबंधियों एवं पास-पड़ोस में रहने वाले लोगों के साथ यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी त्याग, वैराग्य के भाव में सुप्रतिष्ठित रहा जा सकता है| 
नीति-शतक में भर्तृहरि कहते हैं कि श्रृंगार के चक्कर में पड़कर कई युवाओं का बहुमूल्य जीवन नष्ट हो जाता है, उनका चरित्र सुन्दर ढंग से गठित नहीं हो पाता, वे यथार्थ मनुष्य बनने के लक्ष्य से भटक जाते हैं, इसीलिये समय रहते इसका त्याग कर देना चाहिये, जीवन भर इसीमें नहीं रहना चाहिये| श्रृंगार के आकर्षण से बाहर निकलने और नीतिबोध में जाग्रत रहने का मार्ग बतलाते हुए, ' राजा-कवि-योगी ' भर्तृहरि कहते हैं- 
वरं तुंगात श्रृंगात गुरुशिखरिणः  क्वापि विषमे 
   पतित्वायं कायः कठिनदृषदन्तर्विदलितः |
वरं न्यस्तो हस्तः फणिपतिमुखे तीक्ष्णदंशने
वरं वह्नौ पातास्तदपि न कृतः शीलविलयः ||
- यदि तुम श्रृंगार के आकर्षण से स्वयं को मुक्त करने में, या स्थिति को सँभालने में असमर्थ हो और चरित्रवान मनुष्य बनना तुमसे संभव नहीं हो पाता हो, तो इससे अच्छा है कि तुम विशाल पर्वत के ऊँचे शिखर से किसी भी टेढ़ी-मेढ़ी कठोर चट्टान के बीच गिरकर अपनी हड्डियाँ तुड़वा लो, या किसी फणधारी नाग के मुख में तीखी दाढ़ों के बीच हाथ धर देना भी उचित है|
क्योंकि चरित्रहीन होने की अपेक्षा आग में कूद पड़ना भला हो सकता है, किन्तु किसी भी परिस्थिति में अपने चरित्र को गिरने देना उचित नहीं है! क्योंकि अपने चरित्र का निर्माण किये बिना तुमसे देश की सेवा का कोई भी कार्य सुचारू ढंग से नहीं हो पायेगा| इस वाणी को दो हजार वर्ष पूर्व ही, भारत को सुनाया गया था| कवि-राजा योगी भर्तृहरि की इस प्राचीन वाणी को भारत में हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक पदबद्ध कर( लोक-गीत का रूप देकर) भिन्न-भिन्न भाषाओँ में योगियों-वैरागियों द्वारा गाये जाने की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है, और भविष्य में भी यह क्रम चलता रहेगा| स्वामी विवेकानन्द ने भी पूरे पाश्चात्य जगत को भारत की इसी प्राचीन शिक्षा को अपने ढंग से अंग्रेजी में सुनाया था| 
स्वामीजी तो बंगाल में जन्म लिये थे न, इसीलिये जब उनको बंगाल में भाषण देना पड़ा तो उन्होंने बंगला भाषा में दिया| किन्तु, उत्तर भारत की यात्रा के समय उन्होंने हिन्दी में भी व्याख्यान दिया था| अपने हिन्दी-भाषी भाईयों से, मैं एक बात और कहना चाहूँगा- शायद आप इसे नहीं जानते होंगे या हो सकता है आप में कोई-कोई इस बात को सुने भी होंगे|आज सारे भारत में हिन्दी भाषा में व्याख्यान देने की जिस परम्परा को आप देख रहे हैं, हिन्दी में भाषण देने की इस परम्परा का प्रारम्भ करने वाले ' प्रथम-व्यक्ति ' स्वामी विवेकानन्द ही थे| 
शायद, आपको हिन्दी में व्याख्यान देने की परम्परा के प्रारम्भ का इतिहास पुर्णतः ज्ञात न हो, क्योंकि इतिहासकार लोग भाषा के विषय में इतना विस्तृत इतिहास नहीं लिखते हैं| आमतौर पर इतिहास में राजा, उसकी शासन व्यवस्था, उसकी न्याय प्रणाली आदि के विषय में ही लिखा जाता है|लेकिन उस समय की सामजिक परिस्थितियों पर या छोटी-छोटी Cultural  गतिविधियों पर विस्तार से कुछ भी लिखा हुआ मिल पाना मुश्किल है| स्वामी विवेकानन्द जब पाश्चात्य की यात्रा से लौटे तो सिंहल-द्विप में उतरे थे, कोलम्बो में| फिर भारत आकर मद्रास होते हुए हिमालय तक चले गये थे| " Columbo to Almora " नामक पुस्तक में उनके इन व्याख्यानों को संकलित किया गया है- ऐसा अदभूत व्याख्यान और कहीं नहीं मिलेगा| उन्होंने उन्ही व्याख्यानों के माध्यम से पूरे भारत को यह संदेष दिया था कि अपने पुनरुत्थान के लिये उसे क्या करना होगा ! 
इसी क्रम में वे कुछ दीन अल्मोड़ा में ठहरे और विश्राम किया| लोग उन्हें देखने आते और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होते| अल्मोड़ा में रहते समय उन्होंने अंग्रेजों के लिये उन्होंने जो व्याख्यान अंग्रेजी भाषा में दिया था, उसका अंग्रेजी पढ़े-लिखे वहाँ के अन्य स्थानीय लोगों पर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था| वे स्वामीजी से विनती करने लगे कि - स्वामीजी यहाँ के स्थानीय लोग अंग्रेजी भाषा को ठीक से समझ नहीं पाते अतः वे हमसे पूछते हैं कि स्वामीजी ने क्या कहा, तो हम उन्हें थोड़ा बहुत बतलाने कि चेष्टा करते हैं| किन्तु आपके जैसा तो हम बोल नहीं सकते| इसीलिये यदि आप अपना व्याख्यान हिन्दी भाषा में देंगे तो उससे यहाँ की साधारण जनता का बहुत कल्याण हो सकेगा|'
 किन्तु उस समय तक समाज में संस्कृत के पंडितों की इतनी प्रधानता थी कि, तब हिन्दी में व्याख्यान देने का साहस कोई कर ही नहीं सकता था|उस समय तक संस्कृत के पंडित लोग समाज के ऊपर इतना वर्चस्व रखते थे कि पूरा समाज उनके आदेश को शिरोधार्य कर लेता था, अतः उस समय तक यही परम्परा थी कि यदि कहीं जनसभा में कोई भाषण होगा तो वह या तो संस्कृत में होगा या अंग्रेजी में होगा| उन पंडितों में कुछ महान गुणों के साथ साथ कुछ दोष भी थे जिसके कारण हिन्दी में व्याख्यान देने की पाबन्दी को समाज ने भी स्वीकार कर लिया था|
खैर, बहुत अनुनय-विनय करने पर स्वामीजी ने हिन्दी में ब्याख्यान देना स्वीकार कर लिया| एक स्कूल में व्याख्यान की व्यवस्था की गयी, लेकिन स्वामीजी ने इससे पूर्व कभी भी हिन्दी में व्याख्यान नहीं दिया था, पर, हिन्दी भाषा को समझते अवश्य थे| भारत में रहने वाले सभी लोग थोड़ा-बहुत हिन्दी अवश्य समझ लेते हैं, किन्तु, अधिकांश अहिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों को धारा प्रवाह हिन्दी बोलने में कठिनाई होती है| 
पर जब स्वामीजी ने भारत की प्राचीन शिक्षाओं को आम जनता के समक्ष पहली बार हिन्दी में रखा तो वहाँ के स्थानीय लोग बहुत खुश हुए, बहुत खुश ! वे कहने लगे अहा ! ऐसे-ऐसे श्रेष्ठ उपदेश हमारे भारत में सदियों से प्रचलित हैं !किन्तु लोकभाषा में रहने के कारण  अधिकांश आधुनिक तथाकथित पढ़े-लिखे लोग (उन्हें ' Shepherd Song ' गरड़िया का गीत मान कर ?)उनकी उपेक्षा कर देते थे| और प्राचीन काल से चली आ रही चरित्र-निर्माण कारी और जीवन गठन के लिये उपयोगी - ' भर्तृहरि के नीतिशतक की शिक्षा ' जैसी बहुमूल्य शिक्षाओं से वंचित रह जाते थे| अब उन्ही प्राचीन भारतीय शिक्षाओं को स्वामीजी के मुख से (अंग्रेजी, बंगला के साथ-साथ) पहली बार हिन्दी भाषा में भी सुनने से वे लोग अपने को धन्य मान रहे थे !
जिस दिन वह व्याख्यान हुआ था, उसके अगले दिन - २९ जुलाई १८९७ को स्वामीजी अपने एक गुरुभाई, स्वामी रामकृष्णानन्द जी को एक पत्र में बहुत ही आनन्द पूर्वक सूचित करते हैं कि- " देखो-देखो, मुझसे हिन्दी भाषा में व्याख्यान देना भी संभव हो गया|और यहाँ के हिन्दी भाषी लोग मेरा हिन्दी व्याख्यान सुनकर बहुत प्रसन्न हुए हैं |" 
तो इस प्रकार से स्वामीजी द्वारा किसी आम सभा में  पहली बार हिन्दी में व्याख्यान देने की मिशाल पेश करने के बाद अन्य जगहों  पर भी हिन्दी में व्याख्यान देने का प्रचलन हो गया|और तब पंडितों ने भी यह स्वीकार कर लिया कि हिन्दी में व्याख्यान दी जा सकती है| इसके पहले आम सभाओं में हिन्दी में व्याख्यान नहीं होता था| संस्कृत के अलावा कहीं-कहीं English में  होता था किन्तु, हिन्दी में तो बिल्कुल नहीं होता था|
हिन्दी भाषा मुझे बहुत प्रिय है, हालाँकि मैं इस भाषा को बहुत अच्छी तरह से नहीं जनता हूँ| पर यह भाषा बड़ी मीठी है तथा भारत के सभी प्रान्तों के लोग हिन्दी समझ सकते हैं|" We see some people pretend that they don't follow Hindi, But I have never found  a single person who does not follow if somebody says something in Hindi."
(- हम यह देखते हैं कि कुछ लोग हिन्दी जानते हुए भी उसे न समझने का बहाना करते हैं, किन्तु, मुझे आज तक कोई ऐसा एक भी भारतीय नहीं मिला जो हिन्दी में कुछ कहने से वह उसे नहीं समझ लेता हो|) 
हिन्दी सभी समझते हैं, अतः इसको ही भारत की ' Lingua Franca ' (a common language used by speakers of different languages) " सार्वजनिक भाषा " के रूप में स्वीकार करना चाहिये| हिन्दी ही राष्ट्र-भाषा  ' Lingua Franca ' है !
अतः राष्ट्रभाषा कहलाने का गौरव भी हिन्दी को छोड़ अन्य किसी भी भाषा को नहीं दिया जा सकता है| हिन्दी के अलावा इंग्लिश, मराठी, बंगाली या अन्य कोई भाषा भारत की राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती| भारत के किसी भी प्रान्त में चले जाइये, हिन्दी में बात करने से काम चल जायेगा| मैं एकबार दक्षिण भारत गया था| वहाँ बहुत स्थानों में घूमा, वहाँ मेरे साथ एक वरिष्ठ साधु भी थे| मेरी बहुत ईच्छा हुई कि दक्षिण भारत आया हूँ तो शंकराचार्य के जन्मस्थान को भी देखना चाहिये|लेकिन मेरे बहुत कहने पर भी कोई मेरे साथ चलने को तैयार नहीं हुआ| उस समय मैं किस शहर में था अब याद नहीं पर जब कोई तैयार नहीं हुआ तो मैं अकेला ही चल पड़ा| 
वहाँ कलाडी में शंकराचार्य के जीवन से संबन्धित पूर्णा नदी को देख कर मैं शंकराचार्य जी की स्मृति से इतना अभिभूत हो गया कि करीब १५-२० फीट कि ऊँचाई से नदी में कूद पड़ा ! लोग चिल्लाते हुए दौड़ पड़े - ये क्या कर रहे हैं ? यह बहुत खतरनाक है ऐसा करने से जान भी जा सकती थी|देखिये, उस सुदूर दक्षिणी प्रान्त में भी, लोगों ने मुझे North Indian  समझ कर मुझसे हिन्दी में ही बात की| यह है हिन्दी !
नदी की बात निकली है तो एक बात और याद आ गयी| जिन्होंने शंकराचार्य जी की जीवनी पढ़ी है वे जानते हैं कि उनकी माताजी को प्रतिदिन नदी में नहाने का अभ्यास था| लेकिन नदी उनके घर से थोड़ी दूर पर बहती थी| शंकराचार्य जी को लगा कि इतनी दूर जाकर नदी में नहाने से माँ को बहुत कष्ट होता है, यदि वह नदी ही थोड़ी नजदीक आ जाती तो माँ को आसानी हो जाती|
तब शंकराचार्य जी प्रार्थना की- " हे नदी माता, यदि तुम मेरे घर के निकट आ जाती तो अच्छा होता, मेरी माँ को तुम्हारे जल में स्नान करना अच्छा लगता है| " और ऐसा कहा जाता है कि नदी पास में आ गयी थी| There is another instance- श्री रामकृष्ण देव के एक गृही भक्त थे, साधु नाग महाशय, वे पूर्वी बंगाल में रहते थे, उनकी कुटिया से कुछ दूरी पर पद्मा नदी बहती थी| ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने भी शंकराचार्य जी की तरह प्रार्थना की और नदी सचमुच उनकी कुटिया के नजदीक आ गयी थी|
वरं तुंगात श्रृंगात गुरुशिखरिणः  क्वापि विषमे 
   पतित्वायं कायः कठिनदृषदन्तर्विदलितः |
वरं न्यस्तो हस्तः फणिपतिमुखे तीक्ष्णदंशने
वरं वह्नौ पातास्तदपि न कृतः शीलविलयः ||
 
- भले ही ऊँचे पर्वत-शिखर से कूद पड़ने के कारण तुम्हारा अंग भंग क्यों न हो जाय, काले नाग के मुख में हाँथों को डाल देने पर सर्प के दंश से तुम्हारे प्राण क्यों न छूट जाएँ, अग्नि में गिर पड़ने से तुम्हारा शरीर भी जल कर खाक क्यों न होता हो, लेकिन - " न कृतः शीलविलयः !! " अपने चरित्र को कभी नष्ट न होने देना|
कैसी अदभूत शिक्षा थी- भर्तृहरि की ! कैसा आह्वान था ! - ये सब वाणियाँ हजारो वर्ष पूर्व भारत में गुंजायमान हुई थीं| भारत की संतानें कितनी महान हैं ! सभी को भर्तृहरि की वाणी सुननी चाहिये और आचरण में उतारना चाहिये | चरित्र को कभी नष्ट नहीं होने देना, उसे सुन्दर रूप से बना लेना ही सबकुछ है| 
मैंने आपका बहुत समय ले लिया| मैं अपना प्रेम आप सभी को देता हूँ | किन्तु देना-लेना कुछ होता नहीं है, क्यों; जानते हो भाइयों ? तुमलोग और यहाँ से जो बैठकर बोल रहा है, एक ही हैं- बिल्कुल एक ! शरीर अलग-अलग है किन्तु, भीतर में एक ही वस्तु है | जगत में अनेक प्राणी हैं, पर मनुष्य को ही उनमे सबसे महान क्यों कहा जाता है ? वह इसीलिये कि सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही जगत को उसके यथार्थ स्वरूप में जान सकता है| इस जगत का जो सार वस्तु है, उसे ब्रह्म कहा जाता है |
इसी ब्रह्म से ही सबकुछ आया है और फिर अन्त में सबकुछ उसी में लौट जाता है| वही ब्रह्म सभी के भीतर में हैं ! इसीलिये बाहरी तौर पर अलग-अलग होते हुए भी हम सभी लोग भीतर से एक हैं| विविधता के भीतर ही एकत्व भी है |
मेरी शुभकामनाएँ आपके पास पहुँचे| मेरा हार्दिक प्रेम लो भाई| तुम सब अपने जीवन को सुन्दर रूप से बनाओ| और इस सुन्दर जीवन को राष्ट्रमाता कि सेवा में न्योछावर कर दो | और दुखी मनुष्यों के आँसू पोंछने का प्रयास करो | उन्हें भोजन मिल सके, विद्या प्राप्त हो सके, सुख किसे कहते हैं, इसका कुछ अनुभव इसी जीवन में उन्हें भी हो सके, इसकी व्यवस्था करो !
भगवान श्री रामकृष्ण, जगन्माता सारदा देवी एवं जगतबन्धु स्वामी विवेकानन्द के पास मेरी यही प्रार्थना है।
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अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के अध्यक्ष श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय द्वारा बसंतपुर (प० बंगाल) में आयोजित, महामण्डल के ४३ वें वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में ३० दिसम्बर २००९ को विदाई सत्र में दिये गये भाषण का सम्पादित अंश) 
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Monday, January 4, 2010

' विवेकानन्द की निवेदिता ' (Character Building Education)


(श्री भूपेन्द्र नाथ रॉय, सेवानिवृत प्रधानाध्यापक, गोलमारा हाई स्कूल, पुरुलिया Sri Bhupendra Nath Roy, Retired Headmaster, Golamara High School, Purulia द्वारा लिखित एवं महामण्डल के २००९ में आयोजित ४३ वें वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर के पुस्तक-विक्रय केंद्र में उपलब्ध, पुस्तिका का हिन्दी अनुवाद ) 
 

Kashmir, 1898. Left to right : Jesophine McLeod, Mrs. Ole Bull, 
Vivekananda, and Sister Nivedita
भगिनी निवेदिता की कालजयी रचना-' The Master As I Saw Him '  मेरे गुरुदेव - जैसा मैंने उनको देखा " नामक पुस्तक का अध्यन यदि गम्भीरता से किया जाये, तो हमें न केवल स्वामीजी के प्रति उनकी भक्ति की गहराई तथा ' भावनाओं के प्रवाह ' को समझने की शक्ति प्राप्त होगी, अपितु यह हमें उनके आन्तरिक जीवन में घटित होने वाले रुपान्तरण को, या ठीक ठीक कहा जाय तो, निवेदिता की मानसिक-संरचना तथा उनके बाह्य स्वरूप में क्रमशः घटित होते हुए परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से देखने की दृष्टि भी प्रदान कर देगी |
आत्मप्राणा माता जी द्वारा रचित पुस्तक " Sister Nivedita " (पृष्ठ-७) का अध्यन करने से हमें यह भी ज्ञात होता है कि (स्वामी विवेकानन्द से मिलने के पहले) निवेदिता के मन में आत्म-मन्थन चल रहा था, या यूँ भी कहा जा सकता है कि वे स्वयं के साथ - ' अक्षरशःयुद्ध ' कर रहीं थीं | उनके पितामह उनके पैदायशी देश आयरलैंड में चल रहे ' Home Rule ' आन्दोलन में,  सक्रिय भूमिका निभानेवाले एक क्रान्तिकारी थे, तथा उनके पिता इंग्लैंड में बस चुके एक धार्मिक  पादरी थे|शायद इसीलिये बचपन से ही उनमें जहाँ एक ओर अपने धर्म के प्रति असाधारण प्रेम था, वहीँ स्वतन्त्रता को भी वे अगाध प्रेम करती थीं|
वे अपने पिता के साथ नियमित रूप से church जाया करती थीं और वहाँ उनके sermons (धर्मोपदेश) को भी सुना करती थी, एवं घर आने पर जब कभी मौका मिलता उन धार्मिक उपदेशों पर चिन्तन-मनन भी किया करती थीं| Jesus (ईसामसीह) एवं उनके उपदेशों पर निरन्तर ध्यान करते रहने की उनमें एक आदत जैसी हो गयी थी| तथा उनके प्रेम की परिपूर्णता को जानने के लिये उनसे वे प्रार्थना भी किया करतीं थीं|प्रभु येशु के आत्म-बलिदानों का स्मरण करने पर वे सम्मोहित जैसी हो जाती थीं| उनको क्रूस पर चढ़ाये जाने की घटना का वे अगाध भक्ति के साथ चिन्तन-मनन किया करती थीं|तथा जबतक वे अट्ठारह वर्ष की न हो गयीं, यह सब इसी प्रकार चलता रहा|
इसी पथ से आगे बढ़ते समय उनमे एक रूपान्तरण घटित हुआ| ' ईसाई-सिद्धान्तों में समाहित सत्य ' क्या सचमुच सत्य हैं? (जैसे -क्या 'Original Sin' या ' मूल -पाप ' का सिद्धान्त सत्य है ? स्वर्ग-नरक जैसा कोई स्थान है, शरीर अविनाशी है या  आत्मा, यदि आत्मा अविनाशी है? तो शरीर को जलाने के बजाय उसे मिट्टी में दफ़न क्यों करते हैं?) ईसाई मत विज्ञान की कसौटी पर कितने खरे हैं ? इन सब प्रश्नों ने उनके मन में सन्देह उत्पन्न कर दिया|
अधिकन्तु इस बात का उल्लेख करते हुए आत्मप्राणा माताजी कहती हैं- ' ईसाई धर्म के अनेकों सिद्धान्त उनको झूठे एवं ' यथार्थ-सत्य ' के साथ बेमेल जैसे प्रतीत होने लगे|' हलाकि निवेदिता ने अपनी ओर से कभी 
' यथार्थ-सत्य ' को परिभाषित करने की चेष्टा भी नहीं की है किन्तु उनकी रचनाओं में सत्य के बारे में कुछ स्पष्ट संकेत अवश्य देखे जा सकते हैं| सत्य के प्रति अपनी अवधारणा का संकेत देते हुए  एक जगह वे कहती हैं - ' एक स्वतः प्रमाण्य वास्तविकता का नाम है सत्य ! यह एक ऐसी सर्व-व्याप्त सत्ता है जिसे देश या काल की सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता |' द्वितीयतः वे कहती हैं- ' यदि ठान लिया जाय तो कोई भी मनुष्य सत्य को प्राप्त कर सकता है|' और त्रितियतः वे यह भी विश्वास करती थीं (किन्तु यही उनकी अन्तिम मान्यता नहीं थी ) कि " जिस किसी भी धार्मिक-सिद्धान्त का कोई अंश, यदि
 ' सत्य ' का विरोधी है तो उसे धर्म नहीं अधर्म समझना चाहिये |"
अतः हम आसानी से समझ सकते है कि जिस किसी  के मन में सत्य के प्रति ऐसी अवधारणा होती है, वह  स्वयं के साथ ' अक्षरशः युद्ध ' की स्थिति में ही रहता है, वह कभी चैन से रह ही नहीं सकता|
इसीलिये निवेदिता के मन में धर्म के प्रति अविश्वास उत्पन्न होना एवं विज्ञान में उनकी रूचि का और अधिक बढ़ जाना - जैसी घटना को यदि कोई स्वाभाविक न भी माने, तो भी इसे अप्राकृतिक तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता| प्रभुयेशु के बाल-रूप की एकनिष्ठ भक्त, अब सम्पूर्ण रूप से धर्म की एक वैज्ञानिक-जिज्ञाशु में परिणत हो गयी थी| 
हमलोग उनके जिस स्ववृत्तान्त्मक अभिभाषण (The Master As I Saw Him ) के आधार पर  क्रमशः उनके भीतर घटित होने वाले परिवर्तन पर चर्चा कर रहे हैं, उन्हें उपरी तौर पर देखने से तो यही प्रतीत होता है कि उनकी मान्यताओं में मौलिक रूप से परिवर्त हो चुका था| किन्तु यदि हम उसे स्थाई परिवर्तन मान लें तो वह गलत सिद्ध होगा क्योंकि, गहराई से अध्यन करने पर हम देखेंगे कि वह परिवर्तन मौलिक नहीं अस्थाई था | 
निरन्तर सत्य की खोज में संलग्न रहने के कारण, क्रमशः सत्य के साथ उनका परिचय घनिष्ठ तथा और अधिक विश्वसनीय हो गया था - जिसके फलस्वरूप उनकी बोध-शक्ति तीव्र, तर्क-शक्ति सूक्ष्म, एवं ज्ञान विस्तीर्ण समुद्र के जैसा गहरा तथा अनन्तरूप से बहु-आयामी तो हो गया था; किन्तु जिस एकत्व या सर्व-व्यापकत्व में प्रतिष्ठित रहने की उनकी प्रबल अभिलाषा थी, वह अभी तक अप्राप्त ही थी|
जिन मुलभूत लक्षणों के आधार पर किसी मनुष्य को निम्न कोटि के पशुओं से अलग रूप में पहचान लिया जाता है, उनमे से एक है- हँसी या खिलखिलाहट| क्योंकि पशुओं को किसीने कभी हँसते हुए नहीं देखा है, जबकि मनुष्य हँसता है! यदि हँसी बिल्कुल सच्ची हो तो, वह दूसरों में भी आनन्द को संचारित कर देती है|आन्तरिक-आनन्द जब खिलखिलाहट के रूप में अभिव्यक्त होती है - अर्थात आनन्द जब अपने चरम-बिन्दु पर जा पहुँचता है, तब वह निष्काम और पक्षपात-रहित खिलखिलाहट या उन्मुक्त हँसी में परिणत हो जाता है| दूसरे शब्दों में कहा जाय तो उन्मुक्त हँसी ' मैं ' और ' मेरा ' की संकीर्णता से मुक्त रहती है, अतः उसे ' परमानन्द ' की अभिव्यक्ति ही  समझना चाहिये|
हमलोग जहाँ प्रसन्नता पाने के लिये दौड़ते हैं, वहीँ हर्ष (परमानन्द या Bliss) को प्राप्त करने के लिये आह भरते हैं| सुख या आनन्द पाने के लिये ही हमलोग विद्याभ्यास करते हैं, सभा-सोसायटी में आना-जाना करते हैं,प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन करते हैं, सुमधूर संगीत सुनते हैं, मनोरंजन का प्रबन्ध करते हैं, उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं, दुष्टता के विरुद्ध आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, कभी तो हम प्रफुल्लित हो जाते हैं तो कभी नैराश्य से भर उठते हैं| हमारी चित्त-वृत्ति चाहे जैसी भी क्यों न हो, ऐसे कुछ क्षण आ ही जाते हैं जब हम यह अनुभव करते हैं कि कोई न कोई वस्तु ऐसी अवश्य है जो हमारी तमाम कोशिशों के परे है, जो इन सबों से बिल्कुल भिन्न है :

 " समवेत स्तुति-गान हों , या जीत के गुण-गान -
तुम्हारे ही उपयुक्त होंगे सभी ! 
 किन्तु ' खोखली हँसी ' एक ऐसी वस्तु है - 
जिसे देखते ही हम यह ताड़ लेते हैं कि - 
इसके पीछे कोई गुप्त चाहत भी अवश्य छुपी है ! " 
(तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो, क्या बात है - जो छिपा रहे हो ?)


भगिनी निवेदिता के, इस प्रकार हठात ' भक्त ' से पूर्ण ' वैज्ञानिक सत्यार्थी ' में परिवर्तित होने के पीछे भी ऐसा ही कोई गुप्त कारण अवश्य रहा होगा ! इस निष्कर्ष पर पहुँचने के पर्याप्त कारण उनकी आत्म संस्मरण कथा में उपलब्ध है| वहाँ हम पाते हैं कि धार्मिक सिद्धान्तों का वैज्ञानिक ढंग से विश्लेष्णात्मक अध्यन करते समय ही उनको कहीं से ' बुद्ध कि जीवनी ' भी प्राप्त हो गयी थी| जिसका न केवल उन्होंने गहराई से, बल्कि विश्लेष्णात्मक अध्यन भी किया था|
इसके प्रभाव का वर्णन करते हुए वे कहतीं हैं- " इस प्रिय बालक सिद्धार्थ-गौतम ने मेरे मन पर गहरा अधिकार जमा लिया था, और अगले तीन वर्षों तक मैंने बुद्ध-धर्म के अध्यन में स्वयं को डुबो दिया था| तथा इस बात पर मेरा निश्चय दृढ से दृढ़तर होता चला गया कि, जिस मुक्ति (निर्वाण) का उपदेश उन्होंने दिया था वह ईसाई धर्म के उपदेशों की अपेक्षा निस्सन्देह सत्य के अधिक निकट, सुसंगत तथा अनुकूल था|" निवेदिता ने न तो बौद्ध धर्म में दीक्षा ग्रहण किया था और न कभी इसकी ईच्छा ही व्यक्त की थीं| पर इसका तात्पर्य यह नहीं है कि बुद्ध के प्रति उनकी वह अनुरक्ति, जिसका जिक्र उपरोक्त वाक्य में हुआ है वह कोरी भावुकता से भिन्न और कुछ भी नहीं थी| 
हमलोग गाँधीजी की जीवनी में पाते हैं कि,उनके बचपन की दाई (दूध पिलानेवाली) रम्भा,  ने उनसे बचपन के दिनों में एक बार कहा था कि जब कभी तुम्हें भूत से डर लगता हो तभी तुम राम-नाम का उच्चारण करने लगना, तुम्हारा डर तुरन्त नष्ट हो जायेगा| हालाँकि उनके कुल-देवता श्री कृष्ण थे फिरभी गाँधीजी ने अपनी दाई-माँ के शब्दों को धार्मिक सत्यता के रूप में स्वीकृत किया था| उन्होंने जितना ही राम-नाम का उच्चारण किया, यह शब्द उतना ही अधिक अर्थपूर्ण होता गया|वे बाद में इंग्लैंड गये,कानून का अध्यन किया,कुछ दिनों तक वकालत करने के बाद वापस लौट आये|नियति ने दक्षिणी अफ्रीका से संकेत भेजा,उनका कार्य समाप्त हुआ, वे भारत के लिये रवाना हो गये| उपमहाद्वीप का नेतृत्व उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था,जिसका बृहत्तर जिम्मेदारी उनके ही ऊपर आने वाली थी|संघर्ष प्रारम्भ हुआ,एक चरण से दूसरे में आगे बढ़ता गया, और उन्होंने स्वयं को एक-दो नहीं कई बार बंदीगृह में पाया|
ऐसे ही किसी मौके पर उन्होंने अपने ज्ञान में वृद्धि करने का निश्चय किया|अन्य लेखन-कृत्यों को पढने के साथ साथ उन्होंने जगत के समस्त धार्मिक ग्रंथों का तुलनात्मक अध्यन किया|अकेले तथा सामूहिक रूप से उनके द्वारा किये गये अध्यन ने श्री राम के प्रति उनके विश्वास को और अधिक गहरा बना दिया| और एक समय में उनके लिये जो शब्द ' राम ' उनके लिये ; किसी मनुष्य का नाम मात्र था, वही 'राम-राज्य ' अब उनके लिये सत्य का प्रतीक-चिन्ह बन गया था| वही- ' राम का नाम ' दुःख में सांत्वना, हताशा में हिम्मत, आत्मसंशय के क्षणों में आत्म-विश्वास को जाग्रत करा देता था| दिन के बाद रात,चन्द्र-पखवाड़ा के बाद अंधरिया का पखवाड़ा बीतता रहा,किन्तु ह्रदय के अन्तर की ज्योति, ' राम-राज्य ' के प्रति उनकी आस्था -अधिक से अधिक दृढतर होती जा रही थी| फिर एक ऐसा दिन भी आया-
जब उनको इस जीवन से बिदा लेना था,और उनको गोली मार दी गयी, पहली के बाद दूसरी फिर तीसरी गोली|पहली गोली पेट में, दूसरी उनके पसली में तीसरी गोली उनके एक फेफड़े में लगी और वहीँ जा कर फंस गयी थी|खून बहने लगा था,वे गिर पड़े और उनके होठों से अंतिम शब्द ' हे राम ' निकला|
ज्यों-ज्यों अपने अध्यन में हम आगे बढ़ते जाते हैं, हम अधिकाधिक स्पष्टतर रूप में- " निवेदिता और गाँधीजी " के चरित्र में सदृश्यता एवं असमानताओं को भी देख पाते हैं| सत्य को प्राप्त करने के लिये गाँधीजी ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था| उधर निवेदिता में भी सत्य को प्राप्त करने की प्यास बढती जा रही थी|
एक ओर गाँधीजी, जहाँ हिन्दू होकर भी सर्वदा ईसा मसीह के ' Sermon on the Mount ' या " शैलोपदेश " से ही प्रेरणा प्राप्त करते थे|( जिसमे कहा गया है - ' माँगो और वह तुमको दे दिया जायेगा ',' ढूंढो और तुम पा जाओगे ',  ' दरवाजा खटखटाओ और वह तुम्हारे लिये खोल दिया जायेगा '...आदि,आदि) उधर दूसरी ओर हमारी ' विदेशिनी बहन'- निवेदिता , के ह्रदय को " प्राणी मात्र के प्रति बुद्ध की करुणा " ने उनके प्रति सर्वोच्च आदरयुक्त विस्मय से भर दिया था| इस प्रकार हम पाते हैं कि गाँधीजी और निवेदिता के ' प्रेरणा पुरुष 'आवश्यक तौर पर वे दोनों एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न थे| 
यद्दपि गाँधीजी अपने जीवन के अन्त तक एक गुरु की कमी को महसूस करते रहे थे, किन्तु (महात्मा कहलाये जाने का अहंकार इतना प्रबल था, कि उन्हें गुरु की प्राप्ति नहीं हो सकी ) फिर भी यह कमी उनकी उन्नति की राह में बाधक नहीं हुई|
निवेदिता को ऐसे किसी गुरु द्वारा प्रदत्त व्यावहारिक सहायता को परखने का मौका अभी तक मिला नहीं था| गाँधीजी द्वारा ईसा मसीह के उपदेशों का गहराई से किया गये अध्यन ने न केवल उनको मित्रवत सहायता पहुंचाई, बल्कि धर्म के सारतत्त्व को अपने स्वभाव का अभिन्न अंग बनाने में उनको  सहायता भी मिली| हमलोगों ने पहले ही देखा है कि निवेदिता के मन में ऐसी कोई बात नहीं थी|क्योंकि बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म का तुलनात्मक अध्यन करने के फलस्वरूप ईसाइयत या ईसाई धर्म के दोषों के प्रति उनकी दृष्टि पहले ही खुल चुकी थी|
बुद्ध के प्रति निवेदिता द्वारा दिया गये वक्तव्यों एवं उनके उल्लेखों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक वे उनकी एक सच्ची प्रशंसक बनी रही थीं| किन्तु यहाँ यह भी स्मरण रहना चाहिये कि - धर्म के क्षेत्र में प्रशंसक होना ही अंतिम बात नहीं है| क्यों कि भक्ति-मार्ग के भक्तों में प्रचलित है -' तुम्हारा ईश्वर- एक ईर्ष्यालु ईश्वर है!' स्वामीजी अपने एक प्रसिद्द भाषण में प्राचीन भारत के सर्वाधिक समर्पित चरित्र, महावीर ' हनुमान ' के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहते हैं- " साधक के लिये आरम्भिक दशा में अपने इष्ट -देव के प्रति ' एकनिष्ठ ' रहना नितान्त आवश्यक है| " साधक के भीतर श्रीरामकृष्ण के प्रति वैसी ही एकनिष्टता आवश्यक है, जैसी हनुमान जी की एकनिष्टता श्रीरामचन्द्र में थी। उन्होंने कहा था -



श्रीनाथे जानकीनाथे अभेदः परमात्मनि|
तथापि मम सर्वस्वं रामः कमललोचनः ||
' यद्दपि परमात्मदृष्टि से लक्ष्मीपति और सीतापति दोनों एक हैं, तथापि मेरे सर्वस्व तो वे ही कमल लोचन श्री राम हैं |' अथवा तुलसीदास जी ने जैसा कहा है-
सबसे बसिए सबसे रसिये, सबका लीजिये नाम|
हाँ जी हाँ जी करते रहिये, बैठिये अपने  ठाम    ||"
(वि० सा० ४:३७) 
दुनिया में संभवतः कोई ऐसा धर्म नहीं है जो यह नहीं स्वीकार करता हो कि- ' सत्य के जिज्ञासु को चित्त की एकाग्रता (मनः संयोग या Power of Concentration ) को अर्जित करने पर ही अपना सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा |' उसी प्रकार कदाचित कोई ऐसा धर्म न होगा जो-  सत्य के अन्वेषक को अपने मन के आवेगों को उसके निर्धारित नियमों या शासनविधि के अनुसार नियन्त्रण में रखने की शिक्षा न देता हो| 
उदाहरण के लिये हिन्दू धर्म की मान्यता है कि ' श्रद्धा और विवेक'  शक्ति का नियमित प्रयोग करते रहने से उसका रूपांतरण वैसी भक्ति में हो जाता है, जिसके बल पर ईश्वर की अनुभूति तक संभव हो जाती है| वही अनुभूति (' वे सभी में हैं ' - की अनुभूति) जब गहरी हो जाती है, उस अन्वेषक को आत्म-समर्पण की दिशा में अग्रसर करा देती है|
और ऐसी मान्यता है कि यह प्रक्रिया यहीं पर समाप्त नहीं होती, कुछ लोगों में आत्म-समर्पण के फलस्वरूप ' सालोक्य ' प्राप्ति की कामना उत्पन्न हो जाती है, जो बाद में ' सायुज्य ' प्राप्ति की ईच्छा को भी जन्म देती है|
भले ही कोई यह दावा करे कि बुद्ध के द्वारा प्रतिपादित 'अष्टांग-मार्ग'  हिन्दू (या सनातन) धर्म से बिल्कुल भिन्न है, तो भी वह इसके माध्यम से एकाग्रता को प्राप्त करने का उद्दम अवश्य करेगा| क्योंकि हिन्दू पद्धति में, मनः संयोग ( या मन कि एकाग्रता शक्ति को अर्जित करने का अभ्यास ) सर्वोच्च महत्त्व रखता है|शायद ईसाइयत की पद्धति से सत्य का साक्षात्कार ( या आत्म-साक्षात्कार ) करने की ईच्छा रखने वालों को भी ' Power of Concentration ' प्राप्त करने की साधना, अवश्य करनी पड़ती होगी |    
  क्योंकि केवल वही व्यक्ति, जिसने ' सायुज्य ' को प्राप्त कर लिया है- यह कह सकता है कि ," I and My Father are One ! " अर्थात - ' मैं और मेरे पिता एक हैं ! ' और यदि सर्वदा न भी हो, तो भी प्रायः ' सायुज्य ' की प्राप्ति  का तात्पर्य ' चित्त कि एकाग्रता ' को प्राप्त करना ही  है|


इतिहासकारों के लिये यह प्रश्न भले ही विचारणीय होगा कि, बुद्ध के जीवन-चरित्र और उपदेशों का अध्यन करने से निवेदिता का जीवन किस सीमा तक परिवर्तित हो गया था ? किन्तु हमलोगों के लिये इतना जान लेना ही यथेष्ठ होगा कि, बुद्ध का अद्भुत- ' त्याग ' तथा  उनके चरित्र की एक अन्य विशिष्टता-' करुणा ' - ने निवेदिता के जज्बातों  के ऊपर अवश्य ही एक अमिट प्रभाव छोड़ा था | 

उदाहरण के लिये, निवेदिता अपनी पुस्तक " The Master As I Saw Him " के ' भारतीय इतिहास के क़दमों की आहट ' नामक अध्याय में, ' मूक मेमनों के प्रति बुद्ध की अद्भुत करुणा ' निवेदिता के ह्रदय को छू लेती है, और वे बुद्ध को एक महापुरुष मान कर अपना हार्दिक-अभिवादन और सर्वोच्च सम्मान अर्पित  करती हैं| " बुद्ध और यशोधरा " के दाम्पत्य-जीवन में  अन्तर्निहित पवित्रता की शक्ति को बुद्ध के त्यागी जीवन का आधार मान कर-  अपने विचारों को एक परिच्छेद में वर्णित किया है| ' क़दमों की आहट ' में हिन्दू धर्म और बैद्ध धर्म के बीच विरोध को उन्होंने सैद्धान्तिक मत-भेद न मानकर एक दिखावटी विरोध ही माना है| क्योंकि बुद्ध जिस अवस्था को ' निर्वाण ' कहते थे, शंकराचार्य उसी अवस्था को ' मुक्ति ' कहते हैं| 
  " भारतीय नारी के नाम खुला पत्र " ( The Open Letter to the Hindu Women ) नामक निबन्ध के निम्नोक्त अंश में निवेदिता बहिन ने जो लिखा है, ऐसा वाक्य केवल वही लिख सकता है जो बुद्ध के साथ साथ विवेकानन्द का अनुयायी भी हो| वे कहती हैं-  " प्रत्येक माँ को यह दृढ संकल्प लेना चाहिये कि, उसका पुत्र बड़ा होकर निश्चय ही महान बनेगा |" अन्यत्र कहती हैं- " क्या हम माताएँ अपने बच्चों के ह्रदय को असीम करुणा से परिपूर्ण नहीं बना सकतीं ?
" निवेदिता बहन की ' मातृत्व- शक्ति ' सम्बन्धी इन जीवन-प्रद  अनुसन्धानों पर शायद ही कोई प्रश्न चिन्ह खड़ा किया जा सकता है| इसी आस्था के द्वारा उनको एक नया आलोक प्राप्त हुआ था, उनमे सहानुभूति का पुनर्जन्म हुआ था, धर्म के प्रति उनके ह्रदय में विश्वास एक बार पुनः प्रकट हो गया था, उन्होंने धार्मिक क्रिया कलापों में फिर से रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया था|
 किन्तु क्या उनकी बेचैनी का निवारण भी संभव हो सका था ?उनके जीवन के जिस अवधि का पुनरावलोकन हमलोग यहाँ कर रहे हैं, उनके व्याख्यानों और निबंधों का परिशीलन करें तो किसी के भी मन में एक सन्देह उठ खड़ा होता है| यदि उनके संताप की तीक्ष्णता कुछ हद तक घटी भी थी तो उसका कारण यही था कि उनका दर्द चिरकालिक बन चुका था|
" मैंने क्यों और कैसे हिन्दू धर्म को अंगीकार किया " (How and why I adopted the Hindu Religion ) इसी प्रसंग के ऊपर वे अपने एक व्याख्यान- में एक बहुत ही मूल्यवान तथ्य को उजागर करने वाली उस चिर स्मरणीय घटना का जिक्र करते हुए निवेदिता कहतीं हैं - " lord Ripen (लोर्ड रिपन, जो आगे चलकर भारत के Viceroy या राजप्रतिनिधि बन गये थे) की एक चचेरी बहन ने मुझे एक चाय की पार्टी पर भारत से आये, किसी महान स्वामी से मिलने के लिये यह सोंच कर आमंत्रित किया था कि मेरी आत्मा जिस चीज को पाने के लिये व्याकुल थी, इस बैठक से मुझे उसकी प्राप्ति होने में सहयता मिल सकती थी "|   
उनके अन्य व्याख्यान -  ' भारत के आध्यात्मिक विचारों का इंग्लैंड पर प्रभाव ' में  शायद यह तथ्य अधिक स्पष्ट हो जाता है| इस व्याख्यान के प्रासंगिक अंश को अति संक्षेप में कहा जाय तो : ' कतिपय कारणों से पाश्चात्य जगत के लोगों में भी यह   विश्वास स्थापित हो चुका था कि -' ईश्वर प्रेम स्वरूप हैं !' क्योंकि इसके पूर्व सर्वप्रथम डार्विन ने ही अपनी पुस्तक -'Origin of Species' या 'प्रजाति का उद्गम' के माध्यम से पाश्चात्य जगत को - विकासवाद का सिद्धान्त समझाया था और ' दाँत और पँजे ' से खाने वाले पशु योनी से 'मनुष्य-योनी' में रूपान्तरित होने की जानकारी दी थी |जिसके फलस्वरूप दो विचारधाराओं- ' आस्तिकवाद ' और ' अज्ञेयवाद ' , या प्राचीन विचारधारा और नयी विचारधारा के बीच आवश्यक तौर से जो भिन्नता थी उसमे क्रूर संघर्ष होने के परिणाम स्वरूप' अज्ञेयवाद 'को रास्ता देने के लिये ' आस्तिकवाद ' को पीछे चला जाना पड़ा गया था |
साथ ही साथ  प्राचीन समय से अनेक लोगों के मन में बसने वाली प्रतीकात्मक आराधना (ईश्वर के साकार रूप की पूजा करने ) की इच्छा ने स्वयं को अभिव्यक्त करना प्रारम्भ कर दिया| एक Catholic Reality या सार्वभौमिक वास्तविकता (उदार सच्चाई) वर्तमान-युग की ज्वलन्त आवश्यकता बन गयी| इस कार्य में मदत देने के लिये विज्ञान को सामने आना पड़ा| 
दो विचारणीय परिवर्तन इस बात के सबूत थे, पहला यह कि औसत दर्जे के मनुष्य में भी विवेक-शक्ति पहले से अधिक विकसित हो गयी, तथा दूसरा यह कि ' परम-सत्य ' को प्राप्त करने की लालसा भी  तीव्रतर हो गयी| दूसरी ओर प्रसिद्ध जीव विज्ञानी Huxley की मृत्यु के बाद एक प्रबन्ध प्रकाशित हुआ, जिसमे कहा गया था कि ' हक्सले 'की आधुनिकतम दृढ धारणा यह थी - " कि मानवता,  शेष प्राणी-जगत से भिन्न थी और मात्र भौतिक विकास के कुछ नियमो से नहीं बल्कि किसी अन्य महत्वपूर्ण शक्ति के द्वारा शाशित हो रही थी|" डार्विन और हक्सले के वैज्ञानिक अनुसन्धानों ने 'रुढ़िवादी-धर्मों' की बुनियाद को ही हिला कर रख दिया था|
  जिस इंग्लैंड को निवेदिता के उपरोक्त वर्णन में हमलोग देखते हैं तथा इतिहास की पुस्तकों से जिस इंग्लैंड की जानकारी मिलती है, उनके बीच की अन्तर को आसानी से समझा जा सकता है| निवेदिता का यह चिन्तनशील इंग्लैंड उस इतिहास-प्रसिद्ध इंग्लैंड से बिल्कुल भिन्न था|
इसे एक शेयर खरीदने वाले, सत्ता का लोभी देश, पाल-युक्त जहाजों को वाष्प-ईंजन युक्त जहाजों में बदलने में व्यस्त अथवा रेलवे यातायात को एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक विस्तारित करने में व्यस्त एक देश, जहाँ संदेशों को टेलीग्राफ ( बेतार के तार ) से अथवा बातचीत को फ़ोन के द्वारा किया जाता है, जहाँ विज्ञान को उसके अनुसंधानों से अधिक उसके मशीनी-आविष्कारों के कारण अधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, के रूप में ही नहीं देखा जा सकता। यह इंग्लैंड तो वैसा देश है जहाँ मशीनी-आविष्कारों की अपेक्षा ध्यान को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त है, जो अज्ञेयवादी होने के साथ ही साथ अज्ञेयवाद के ही विरुद्ध संघर्ष करने में व्यस्त एक अद्भुत देश है|
  उपरोक्त उद्धरण में जो विचार सन्निहित हैं, उनके उपर गहराई से चिन्तन करने से हमलोग निम्न निष्कर्षों पर पहुँच सकते हैं- 
१. प्राचीन (रुढ़िवादी) मान्यतायें नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों के समक्ष घुटने टेक देने पर विवश थीं|
२. अज्ञेयवाद ने जहाँ आस्तिकवाद को पीछे धकेल दिया था वहीँ अब अज्ञेयवाद को भी वैज्ञानिक सच्चाई के लिये रास्ता देने के लिये पीछे हटना पड़ रहा था|
३. वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रति भरोसा करने का प्रचलन दृढ होता जा रहा था|
इस प्रकार के मनोवैज्ञानिक संक्रमण काल में निवेदिता की मुलाकात हुई थी उनके गुरु स्वामी विवेकानन्द के साथ|यहाँ स्वाभाविक रूप से ही मन की आँखों के समक्ष वह दृश्य उभर कर सामने आ जाती है जब पहली बार नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) अपने गुरुदेव ( श्री रामकृष्ण ) से वास्तविक रूप में मिलने गये थे|जब इन दो घटनाओं को अगल बगल रख कर विचार करते हैं, तो एक घटना की दूसरे के साथ सादृश्यता को देख कर आश्चर्यचकित होना पड़ता है|
सत्य की प्राप्ति के लिये स्वामीजी जहाँ मृत्यु का सामना करने को भी तैयार थे, वहीँ दूसरों के द्वारा पहल करने पर ही वे अपने गुरु से मिलने जा सके थे|और ठीक ऐसी ही स्थिति निवेदिता की भी थी| जिस प्रकार श्री रामकृष्ण के साथ स्वामीजी ने किया था, निवेदिता ने भी स्वामीजी की आदतों को ध्यानपूर्वक परखा था, विशेष कर उनके भाषण देने के ढंग पर वे मोहित हुई थीं| किन्तु पुनः स्वामीजी के समान ही वे भी अपने गुरु से बिना संतुष्ट हुये ही वापस लौट गयीं थीं|
उपरोक्त प्रत्येक उद्धरण हमें आश्चर्यचकित करता है, उसी प्रकार यह घटना भी अद्भुत है कि स्वामीजी कि तरह ही निवेदिता ने भी जैसे ही उस ऐतिहासिक मिलन-स्थली का त्याग किया- वैसे ही उनके अंतर्मन में  भी रुपान्तरण घटित होने लगा| वहाँ से लौट कर जब वे अपने घर गयीं और अपनी दिनचर्या को प्रारम्भ कीं स्वामीजी की वाणी उनके कानों में गूंजने लगी|
इस बात पर यह अनुमान लगाना सहज है कि क्या हुआ होगा| उन्होंने तो वास्तव में उनकी वाणी को अस्वीकार कर दिया था किन्तु उस वाणी ने उनको अस्वीकार नहीं किया था, एवं उनके ह्रदय के भीतरी गुफा में अपना आसन जमा लिया था|क्रमशः वे उस वाणी को सम्पूर्णतया विश्लेषण करके उनमे समाहित कूटशब्दों को समझने के कार्य में सचेतन से अधिक अवचेतन प्रयास करने लगीं| मुश्किल से सात दिन बीते होंगे कि उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा मानो उस युवा सन्यासी को समझने में उनसे कोई भूल हो गयी है|
जब उनकी सखी (लोर्ड रिपन की भतीजी) से अपने और स्वामीजी के बीच हुई बातचीत के बाद अपनी टिप्पणी देते हुये कहा था- ' उन्होंने कोई नयी बात तो कही नहीं ', तब क्या उन्होंने क्या यह सोंचा था कि उनके बीच बातचीत केवल ६० मिनट ही हुई थी ? और केवल उस एक ही घंटे की बातचीत में कोई भी विषय ऐसा नहीं था जो अछूता रह गया हो !
 उन्होंने इतने कम समय में प्रेम के ऊपर, आत्मा के ऊपर और इन्द्रियों की क्रिया-पद्धति के ऊपर विस्तार से अपने विचारों को प्रस्तुत किया था|वे उन कही गयी बातों पर चिन्तन-मनन करने लगीं|हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि इन तनावपूर्ण क्षणों में उनकी स्मरण शक्ति भी प्रतिकूल हो गयी होगी| उनको यह याद हो आया कि उन्होंने तो अन्य कई सारे विषयों के ऊपर भी कहा था|
अनगिनत होने के अतिरिक्त उन बातों कई ऐसी बातें भी समाविष्ट थीं जिनके बारे में उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं था|और तब क्या उन्हें यह महसूस नहीं हो गया होगा कि स्वामीजी के ऊपर अपनी टिप्पणी देने में उनसे थोड़ी जल्दीबाजी हो गयी है| 
उनके अतिरिक्त और किस व्यक्ति से उन्होंने सुना था कि धर्मों के बीच एकत्व है ? या यह भी सुना हो कि दुनिया में ऐसा कोई धर्म नहीं जो त्याग-वैराग्य के ऊपर बल न देता हो ? क्या उनके अतिरिक्त और किसी दूसरे व्यक्ति ने भी कभी यह कहा है कि मनुष्य एक भ्रम से सत्य कि ओर नहीं आता बल्कि निम्न सत्य से उच्चतर सत्य की दिशा में आगे बढ़ता रहता है ?उन्होंने कहा था आत्मा अनन्त अपरिवर्तनशील तथा सभी प्रकार के बन्धनों से परे है| क्या इन बातों में नया कुछ भी नहीं था ? पाश्चात्य से सम्बद्ध ज्ञान का सवाल जहाँ तक है, क्या ये विचार बिल्कुल अभिनव नहीं थे?
महर्षि व्यास गणेशजी से आगे रहने के लिये बीच बीच में कूट शब्दों का प्रयोग कर दिया करते थे|जबतक गणेश उस वाक्य के तात्पर्य के ऊपर विचार करते रहते तबतक व्यास अपने कृति रचना पर आगे बढ़ जाते|कभी कभी तो गणेश को वाक्यार्थ समझने में लम्बा समय भी लग जाता था| किन्तु ऐसी कोई बात (कूट-वाक्य) नहीं थी जिसे अन्ततोगत्वा वे रहस्योद्घाटित नहीं कर सकते हों| 
किन्तु निवेदिता के साथ यह स्थिति नहीं थी|उन्होंने उस दिन स्वामीजी को यह कहते हुए भी सुना था कि जैसे  मकड़ी के जाल अनेकों होते हैं वैसे ही मकड़ा भी अनेक नहीं होता एक ही होता है, ऐसा कैसे संभव है? जो बात विचारणीय नहीं है वह यह कि उनको ठीक से न समझ पाने के बाद भी निवेदिता स्वामीजी द्वारा १६ नवम्बर और २३ नवम्बर को प्रदत्त दोनों व्याख्यानों को सुनने गयीं थीं, उन्होंने न केवल उन्हें सुना था बल्कि उनके व्याख्यानों के ऊपर लेख भी लिखा था, दोने ही पढने के योग्य थीं, विशेषकर जब उनकी पैंठ को पहले ही स्वीकार कर लिया गया था|
निम्नलिखित पंक्तियाँ स्वामीजी द्वारा प्रदत्त २३ नवम्बर के भाषण पर बनाये गये उनके लेख का निचोड़ है- ' हमारी खोज शुभ या अशुभ के लिये नहीं है, किन्तु आनन्द और शुभ सत्य के अधिक नजदीक हैं जबकि दुःख और अशुभ सत्य से अधिक दूर हैं|पहला काँटा है अशुभ दूसरा काँटा है शुभ|और आत्मा वह शान्ति है जो शुभ और अशुभ दोनों से परे है| जब जगत विलीन होने लगता है, मनुष्य ईश्वर के निकटतर पहुँच जाता है, एक क्षण के लिये वह अपने यथार्थ स्वरूप -ईश्वर से एक हो जाता है|वह फिर से भेद-रहित हो जाता है- एक पैगम्बर बन जाता है|
अब उसके समक्ष यह जगत थरथराने लगता है|कोई मूर्ख जब सोकर उठता है, वह पहले के जैसा ही  मोहग्रस्त रहता है, उसकी समझ में कोई फर्क नहीं होता, किन्तु कोई मनुष्य जब अचेतन और अतिचेतन के स्तरों के भी उस पार जाकर वापस लौट आता है, तब वह अनन्त शक्ति, पवित्रता और प्रेम के साथ वापस आता है- एक देव-मानव में रूपान्तरित हो जाता है| अतिचेतन अवस्था में पहुँचने का व्यावहारिक उपयोग इतना ही है|" (The Master As I Saw Him,Appendix 2B )  
क्या स्वामीजी के एक और अनेक कि व्याख्या को समझने में असमर्थ व्यक्ति उपरोक्त कथन के सही अर्थ को समझ सकता है? क्या निवेदिता स्वामीजी से परिचय प्राप्त करने के लिये उद्विग्न थीं? लन्दन से लिखे गये १२ पत्रों में से किसी  भी पत्र में स्वामीजी ने निवेदिता के नाम को उल्लिखित नहीं किया है|क्या इसका यह अर्थ है कि एक ओर निवेदिता जहाँ उनका सम्मान करती थीं वहीँ उनकी संगती से बचना भी चाहती थीं? दूरियाँ अगर हर समय नहीं तो अक्सर संकोच को ही सूचित करती हैं|किन्तु यदि यह कहा जाय कि निवेदिता संकोची स्वभाव की थी तो यह कथन सत्य के परे ही होगा| क्योंकि वे तब २८ वर्ष की थीं, शिक्षण उनका पेशा था, उन्होंने एक विद्यालय भी निर्मित किया था, जिसमे कुछ समय पहले से ही एक प्रधानाचार्य के रूप में कार्य कर रहीं थीं|
एक बात और स्मरण कर लेना चाहिये कि वे एक प्रसिद्ध क्लब की सदस्या थीं, तथा उस रूप में वे कई वादविवाद प्रतियोगिता में भी शामिल होती रहती थीं, इसके अतिरिक्त सुसंस्कृत समाज में उनके कई मित्र भी थे|  और उनके सम्बन्ध में हम यह भी नहीं अनुमान लगा सकते कि वे एक अहंकारी स्त्री थीं, और स्वामीजी के निकट जाने में उनका वह अहंकार  ही आड़े आ जाता होगा, और शायद इसीलिये उस अवधि में स्वामीजी के किसी भी पत्र में उनके नाम का उल्लेख नहीं मिलता है| बेशक वे एक खरा या मुंह पर ही स्पष्ट कह देने वाली लड़की थी, किन्तु स्पष्ट-वक्ता होना और घमण्डी होना एक ही चीज नहीं है|
जब तक कोई व्यक्ति स्पष्ट-वक्ता (मुंह पर ही सच सच कह देने की आदत) होने का ढोंग नहीं करता, उसकी वह आदत सत्य के प्रति निश्छल प्रेम का परिणाम माना जाता है, जबकि दिखावा करने का दूसरा नाम है अहंकार| यह सन्देह करना कि स्वामीजी ने निवेदिता को या निवेदिता के बारे में और भी पत्र लिखे होंगे किन्तु कहीं खो गये होंगे, हमे कोई विश्वसनीय सुराग नहीं देते|स्वामीजी का बहुत कुछ खो गया है| प्रश्न है कि वे सब क्या हैं ? क्या उनके द्वारा लिखित पत्र के  एक भी शब्द को, उन्हें प्राप्त करने वाली नारी या पुरुष कभी कम महत्वपूर्ण समझ सकते हैं ?एक सच्चाई तो दिन के उजाले के समान स्पष्ट है| निवेदिता ने अपना गुरु ढूँढ़ लिया था|तथा उतना ही स्पष्ट यह भी है कि उसका रुपान्तरण भी प्रारम्भ हो चुका था|
वे कहतीं हैं- ' इस बिन्दु पर आकर यह सुस्पष्ट रूप से बता पाना कठिन है, स्वामीजी  जब इंग्लैंड से रवाना हुये थे, उसके पहले ही वह समय आ गया था कि मैंने उनको " मास्टर " (सदगुरु) कह कर संबोधित कर दिया था|  मैंने उस मानव में अन्तर्निहित वीरता के तन्तु को पहचान लिया था, तथा उनके अपने देशवासियों के प्रति उनके प्रेम की खातिर मैं स्वयं को उनकी दासी बनाने की ईच्छा करने लगी थी| किन्तु यह उनका चरित्र ही था, मैं जिसका अभिवादन इस रूप में करना चाहती थी | मैंने यह देखा था कि एक धार्मिक गुरु के रूप में उनके पास संदेशों की एक पद्धति थी जिसे वे दूसरों में वितरित करना चाहते थे, किन्तु यदि वे यह जान लेते कि वह सत्य कहीं अन्यत्र ले जायेगा तो उस प्रणाली का कुछ भी उनका ध्यान एक क्षण भी खींच नहीं सकती थी| और उनके सम्बन्ध में मेरे इस ज्ञान का परिणाम यह निकला कि मैं उनकी शिष्या बन गयी|" (C.W. vol 1P-22) स्वामीजी को उनके जीवन का ध्येय मिल गया था, जो उनके अनुसार ' To prob the ground a little ' था । जैसा वे कहा करते थे- आधार की थोड़ी परीक्षा करके जाँच लेना, इसीलिये वे अब लन्दन से रवाना हो गये| 

                                 दिसम्बर १८९५ में एक बार फिर वे अमेरिका में थे|  शायद इसी कारण से अपनी पुस्तक- ' The Master As I Saw Him ' में निवेदिता का लक्ष्य अपने बारे में कुछ बताना नहीं था बल्कि अपने गुरु के बारे में बताना था, कुछ अपवादों को छोड़ कर जब तक की उनका उद्देश्य इसकी मांग नहीं करता था| इस तथ्य को हम उनके स्वामीजी के दुबारा अमेरिका जाने के प्रसंग को उनमे घटित होने वाले एहसास को कार्यरूप से चुपचाप गुजर देने जातीं हैं| तथापि अगले अध्याय में जो कुछ वे एक संस्मरण के रूप में बोलीं हैं, उनके ऊपर एक नजर देने से ही हमे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो रूपान्तरण निवेदिता में पहले ही परिलक्षित हुआ था वह अब प्रगति पर था। निवेदिता में जो एक वैचारिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है, वह यह कि अब वे स्वामीजी की उस शिक्षा को जिसमे वे ईश्वर को पिता के रूप में देखने की सीख देते थे, ईश्वर का मानवीकरण करना सोंच कर निन्दनीय नहीं समझती थी|अब वे समझतीं हैं कि ईश्वर का न केवल पितृत्व बल्कि भारत में प्रचलित उपासना के दूसरे रूप, उदाहरण के लिये ईश्वर का पुत्रत्व या अन्य कोई भी रूप जो हमारी भावनाओं को ईश्वरीय चिन्तन में नियोजित कर देता है, ईश्वर का प्रत्येक मानवीय रूप या ईश्वर का किसी भी मनुष्य के रूप में अवतरित होने पर श्रद्धा रखना उपासना का सही पथ है | 
उनके विचारों में यह परिवर्तन क्यूँ कर हुआ  होगा यह अनुमान लगया जा सकता है|एक ओर वे जहाँ अपनी दैनिक दिनचर्या में संलग्न थीं उनकी अन्तरात्मा निरन्तर- ' परलोक और इहलोक के मध्य सजातीय बिन्दुओं का तलाश जारी रखने के लिये ' स्वामीजी कि शिक्षाओं ' में ही रमा करती थी| अतः स्वामीजी द्वारा कथित उपाख्यानों के मर्म को निवेदिता स्पष्ट रूप से समझ पाने में समर्थ हो गयीं थीं | पवहारी बाबा के जीवन से संबन्धित दो उपाख्यान पाश्चात्य में रहते समय एकाधिक अवसर पर स्वामीजी ने वर्णन किया था, उसके मर्म के बारे में निवेदिता कहतीं हैं, ' उन उपमाओं का नयापन और विचारों का परिवर्तन इन्हें एक उपलब्धि बना देतीं हैं|
उदहारण के लिये  उनमे से एक कथा उस सन्त की है जो उस चोर के पीछे दौड़ता है जो चोर स्वयं उनके डर से बर्तन गिरा कर भागने लगता है कि कहीं पकड़ा न जाऊ, उन सारे बर्तनों को उसके चरणों में अर्पित करके रुंधे गले से कहता है, ' हे प्रभु, मैं न जानता था कि आप ही वहाँ थे '| फिर उसी सन्त कि दूसरी कथा है, जिसमे वे एक काले नाग के द्वारा डस लिये जाने के बाद रात्रि बीत जाने के बाद स्वस्थ हो कर कहते हैं- ' मेरे प्रियतम के पास से एक दूत आया था '|निवेदिता जब एक सारांश भी कहती हैं तो कितना सटीक होता है! शायद वे अपने गुरुदेव के बारे में बोल रही होती हैं केवल सन्त के नाम को उन्होंने हटा दिया है| 
यदि हमलोग यह मान लें कि जब उनके गुरुदेव अपने व्याख्यानों में इन उपाख्यानों का जिक्र किया करते होंगे उस समय भी निवेदिता का मन उपमाओं के बीच उड़ता रहता होगा तो यह कोई बहुत बड़ी भूल नहीं मानी जाएगी|ईश्वर के नाम को जपने की महिमा का बखान जब स्वामीजी अग्नि के गुणों की उपमा से करते होंगे, चाहे अग्नि में हाँथ कोई होश में डाले या बेहोशी की हालत में उसका प्रभाव तो एक ही जैसा होने को बाध्य है|स्वामीजी की वह उपमा जहाँ वे कहते हैं कि किसी कुबड़े सन्तान की माता की  दृष्टि में, सारी कुरूपता के बाद भी वही बालक उसे सर्वाधिक सुन्दर लगता होगा- यह भी नेवेदिता को अभिभूत करता होगा| उसी प्रकार प्रेम की उपमा किसी त्रिकोण के तीसरे कोण से करते हुए उनके  असंदिग्ध आधिपत्य को ही प्रमाणित करता होगा|
 उन्होंने आदेश दिया था- ' अपनी दृष्टि को ज्ञानमयी बना लो और सबसे प्रेम करो '| ह्रदय के कमल को अवश्य ही खिल जाने दो ! उन्होंने कहा था - ह्रदय को अवश्य संवेदनशील होना चाहिये, मस्तिष्क को उपाय ढूँढ़ निकालने में समर्थ, और बाहुओं में इतनी शक्ति होनी चाहिये कि उस उपाय को मूर्तमान कर सके| जब स्वामी विवेकानन्द ने अपने प्रवचनों द्वारा यह दर्शाया होगा कि यदि किसी स्त्री में यदि मातृत्व को जाग्रत करा दिया जाय तो वे कैसे कैसे आश्चर्य जनक कार्यों को न कर सकती हैं? शायद उनका यह दोहरा वर्णन निवेदिता को सर्वाधिक हिलाया था तथा उस सभा भवन में उपस्थित कई स्त्रियों को भी चमत्कृत कर दिया था|
यदि इसे निवेदिता के शब्दों में कहें तो,  ' जो बातें मुझे विस्मयकारी लगी थीं वे कुछ दृष्टान्त थे जिसे व्याख्यान के दौरान उन्होंने प्रस्तुत किये थे| उनके श्रोताओं में अधिकांश महिलायें सजीली युवा मातायें थीं, उनमे डर से भागने का भाव उत्पन्न करते हुए उन्होंने कहा था - सोचो कि तुम रास्ते से अपने बच्चे को लेकर गुजर रही हो, और अपनी आवाज को नाटकीय अंदाज में डरावना बनाते हुए कहा, मानलो कि अचानक तुम्हारे सामने एक बाघ आ जाय, वैसी परिस्थिति में तुम क्या करोगी, डर कर स्वयं भागोगी या बच्चे को अपने पीछे छुपा कर स्वयं बाघ के मुंह में जाना चाहोगी? तुममे से कोई भी माँ ऐसी है जो बच्चे को वहीँ फेंक कर डर से भाग जाना पसंद करेगी, कोई भी माँ ? मैं निश्चित तौर से जानता हूँ कि कोई माँ ऐसा नहीं कर सकती| '
              ईश्वर से प्राप्त होने वाली प्रेरणा जिसप्रकार स्वतः अभिव्यक्त होतीं है, एवं उसकी प्रवृत्ति स्वतः स्फूर्त होती है, उसी प्रकार- ईश्वर से अनुप्रेरित कोई कर्म भी, स्वतः पथप्रदर्शक एवं आत्म-निर्भर बना देने वाली अदम्य क्रिया है| ऐसी प्रेरणा एक अन्दरूनी स्फूर्ति के रूप में प्राप्त होती है| किन्तु उसका बाह्य पक्ष सर्वदा एक जैसा प्रतीत नहीं होता |
निवेदिता की रचनाओं में कई संकेत ऐसे हैं, जिसमे स्वामीजी के विभिन्न उक्तियों का विविध अर्थ निकलते हैं|हमलोग यह समझ सकते हैं कि वे अपने उन सखियों के यहाँ जाया करती थीं जिन्होंने स्वामीजी के व्याख्यानों को सुना था|हम यह अनुमान भी लगा सकते हैं कि वे आपस में किसी खास शब्द या उनके द्वारा कथित किसी वाक्य के अर्थ को लेकर वाद-विवाद भी करती होंगी, किसी दूसरी से अपने गुरु के वाक-शक्ति पर चर्चा करती होगी, 
तो तीसरी से उनके चरित्र की उस विलक्षणता के ऊपर चर्चा करती होगी जो उनके शब्दों को और अधिक प्रभावशाली बना देती हैं| जब कभी उन्हें अवसर प्राप्त होता वे स्वामीजी के व्यखानो के ऊपर संचित अपने लेखों का अध्यन करती रहती थी|यह बिल्कुल संभव है कि जब वे अपने बिछावन पर सोने जाती होगी तब भी वे स्वामीजी को यही कहते सुनती होगी कि - 
' मनुष्य सत्य से दूसरे सत्य कि ओर बढ़ता है, वह भ्रम को त्याग कर सत्य की ओर नहीं बढ़ता|'
स्वामीजी जब अप्रैल १८९७ में दुबारा लौट कर आते हैं, तब वे उनके भाषणों को एक संवाद पटु व्यक्ति की अपेक्षा एक शिक्षक के रूप में अधिक ग्रहण करतीं हैं, निवेदिता की मानसिकता में ऐसा परिवर्तन लाने वाले कारणों में से शायद एक कारण यह भी रहा होगा|क्या निवेदिता ने उनके समस्त व्याख्यानों को सुना होगा, यह निश्चित तौर से नहीं कहा जा सकता| उनके अद्भुत व्याख्यान श्रृंखला जिसका शीर्षक था' व्यावहारिक जीवन में वेदान्त ' का कोई जिक्र उनकी पुस्तक में दिखयी नहीं पड़ता| तब भी स्वामीजी के वे व्याख्यान उन्हें बड़े आशावादी लगते थे|
इससे भी अधिक स्वामीजी के भाषण ' मेरे गुरुदेव ' की जिक्र में हुई चूक है, जिसे उन्होंने इंग्लैंड में ही दिया था|एकाधिक कारणों से उनके इस व्याख्यान का स्थान उनके सर्वश्रेष्ठ व्याख्यानों में से एक बना रहेगा|इस व्याख्यान कि शब्द रचना शैली इतनी सरल है कि यह किसी भी सत्यार्थी में आसानी से ईश्वरीय प्रेरणा को संचारित कर सकता है| यह कथोपकथन अपने   आप में इतना परिपूर्ण है कि इसे पढ़ कर साहित्य का कोई भी विद्यार्थी सम्मोहित हो जाता है| 
तथा इसमें वर्णित ठोस सिद्धान्त किसी दार्शनिक को विचारों में डूब जाने के लिये बाध्य कर देते हैं|यदि इसको जीवनी कहा जाये तो यह केवल एक जीवनी नहीं है, यदि इसे इतिहास कहो तो इसमें समाज-शास्त्र के साथ इतिहास का अविरोध भी देखा जा सकता है, फिर इसे केवल यह भी नहीं कहा जा सकता| यहाँ यह भी चर्चा हो सकता है कि यह पूरे तस्वीर की एक गौण पहलु है|
हमे जिस बात में दिलचस्पी है, और जिस बात के ऊपर हमे अपना सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करना है वह है- ' निवेदिता के जीवन में स्वामीजी के शिक्षाओं का पूर्णरूपेण आत्मसातीकरण '| निवेदिता की पुस्तक ' The Master As I Saw Him ' में कुछ अंश ऐसे हैं जिसको पढने से निर्णायक रूप से यह कहा जा सकता है कि उन्होंने स्वामीजी द्वारा प्रदत्त ' ज्ञान योग ' के भाषण को अवश्य सुना होगा, निःसंदेह यह भी आश्चर्य कि बात है|
यदि वे धरती के सर्वाधिक बहुमूल्य हीरा के जैसे अनमोल हैं तो रविन्द्रनाथ के दूसरे प्रसंग में दिए एक उपमा में कहें तो वे हीरा के जैसे कड़ा भी हैं| तथापि माया के ऊपर अपनी पुस्तक में निवेदिता द्वारा दी गयी टिप्पणी को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने न केवल इस विचार के झुकाव को समझा था, बल्कि वह विचार जो संप्रेषित करता था उसे भी आत्मसात कर लिया था|
 दोनों में उनकी पकड़ को देख कर सारी कल्पनाएँ निष्फल हो जाती हैं| उदहारण के लिये उस पुस्तक की एक उद्धरण को देखें- ' माया शब्द का तात्पर्य वह टिमटिमाहट है जो दुर्ग्राह्य है आधी असली आधी काल्पनिक,ऐसी जटिलता जिसमे कहीं विश्राम नहीं है, कहीं संतुष्टि नहीं, कोई परम निश्चितता नहीं, जिन बातों को हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से जानते हैं, और अपने मन के द्वारा जो निर्णय के लिये इन्द्रियों कि गवाही का आश्रित होता है...'
चैतन्य चरितामृत का एक दृश्य स्वतः बहुतों के मस्तिष्क में उभर कर सामने आ जाता है| दक्षिण भारत के तीर्थ स्थानों का भ्रमण करते हुए श्री चैतन्य जब श्रीरंग-क्षेत्र नामक पवित्र स्थान में पहुँचते हैं| वहाँ एक मन्दिर में वे एक गीता के पाठक से मिलते हैं, उसका यह आदत था कि वह उस पवित्र ग्रन्थ के प्रथम श्लोक से प्रारम्भ कर अंतिम श्लोक तक प्रत्येक संध्या में पाठ करता था| उसका यह बर्ताव ही चैतन्य देव को उसकी तरफ आकर्षित कर लिया था|
उन्होंने यह पहले ही यह ध्यान दिया था कि उसका उच्चारण अक्षम्य रूप से अशुद्ध था, जिसे सुन कर चारों तरफ से हँसी हो रही थी,किन्तु अपनी ओर से अपने कार्य में वह सदा कि तरह अनुद्विग्न भाव से पूरा कर रहा था|और उस पाठ का प्रत्येक शब्द का उच्चारण उसे भाव विभोर बना रहा था|अब उसकी आँखों से झर-झर अश्रु बह रहे थे,अब वह अनुभूति से कांपने लगा था, चैतन्य महाप्रभु ने बमुश्किल उससे पूछा, महाशय इस ग्रन्थ में आपको ऐसा क्या मिला जो आपको इतना आनन्द हुआ है? 
उसने उत्तर दिया -" मैं एक अज्ञानी निर्बुद्धि ब्यक्ति हूँ, किन्तु मैं जैसे ही इसे पढना शुरू करता हूँ, मैं अर्जुन के रथ को अपने सामने आता हुआ देखता हूँ और उस रथ के सारथि के आसन पर मैं श्री कृष्ण को अपने हांथों में लगाम थामे अपने शिष्य को उपदेश प्रदान करता हुआ देखता हूँ"| निवेदिता आगे कहती हैं- " किसी नदी के तट पर प्रभात कि बेला में कहीं दूर से आती हुई बंशी कि मधुर ध्वनी की तरह, संसार के सुमधूर संगीतों में से एक और श्रोता भी जब उसी रौ में बहने लगता, और जब वह स्वयं भी वादक बन जाता है, तब पाश्चात्य और पूर्व के विचारों में आत्मा का जीवन का जो अन्तर है उसे समझा जा सकता है|" 
उपरोक्त दोनों उद्धरणों पर विचार करें तो काल गणना के हिसाब से निवेदिता स्वामीजी के व्यक्तिगत संपर्क में कब से आयीं यह प्रश्न हमारे मन में किसी क्षण नहीं उठाना चाहिये|इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह है कि उनके ह्रदय में श्रद्धा ने किस क्षण संशय को जीत लिया था?अभी तक निवेदिता अपने सम्पूर्ण ह्रदय से प्रभु ईसा मसीह एवं उनकी शिक्षाओं पर विश्वास रखती थीं|पर एक दिन ऐसा आया जब उनका विश्वास लुप्त होता प्रतीत होने लगा| कभी तो वह विश्वास धृष्टता के साथ जमा रहता पर पुनः प्रकट हो जाता|यदि वे इसी उहा-पोह में सो भी जातीं तो पुनः जाग कर उठ बैठतीं|
ऐसे ही समय में उनके जीवन में स्वामीजी का आगमन होता है, और उनकी अलौकिक शक्तियाँ उनकी आत्मा में प्रविष्ट हो जातीं हैं| धुन्ध या कुहरा छंट गया, जमा हुआ बर्फ गल गया, ज्ञान कि ज्योति प्रज्ज्वलित हो गयी| जो सत्य उनकी दृष्टि से ओझल था, वह प्रत्यक्ष हो गया और अभिज्ञेय हो गया|यह ठीक है कि भ्रमजाल या माया अब भी उनकी आँखों को मोहित किये हुए थी, किन्तु उससे क्या भय होने वाला था? 
क्योंकि तब एकाग्रता कि शक्ति (माया नाशिनी - Power of Concentration) और इसके फलस्वरूप उत्पन्न होने ' ज्ञान ' या सच्चिदानन्द स्वरुप की स्पष्ट अवधारणा या उस ज्ञान को आत्मसातीकरण करने की शक्ति ( वैराग्य शक्ति - Power of Assimilation ) उनके ह्रदय में दोगुनी अधिक तीव्रता के साथ क्रियाशील थी| उनकी रचना ' The Master As I Saw Him ' को पढने से ऐसा प्रतीत होता है कि निवेदिता ने स्वामीजी के कक्षा वक्तृता (class lectures) को बहुत ध्यान से सुना था, जबकि उनके (Public Lectures)जान-सभाओं में दिए व्याख्यान उन्हें आश्चर्य से भर देते थे| अतः ये बिल्कुल स्वाभाविक ही था कि निवेदिता का जो रूपान्तरण पहले अदृश्य था वह क्लास रूम में ही ठोस आकार लेना शुरू हुआ होगा| वह रूपान्तरण किसी की भावनओं को आहत न कर आकर्षित ही करने वाला था|कक्षा की समाप्ति हुई, एक विवाद मन में उठा, उसे तय कर निपटा देने में सहायता करने को स्वामीजी सामने आ गये|
वे यह जानना चाहते थे कि उनके शिष्यों में क्या कोई शिष्य ऐसा भी था जिसके लिये ईश्वर ही सबकुछ थे? अपनी भावनाओं को नियंत्रित न कर सके तो वे उठ खड़े हुए और यह कहते हुए अपने चारों ओर देखे कि - (ईश्वर ही मेरे लिये सबकुछ बने हैं!) यदि यह बात सत्य है तो फिर अन्य किसी बात से मुझे क्या लेना-देना है? और यदि यह सत्य नहीं है तो, हमलोगों के जीवन का मूल्य ही क्या है? ये शब्द किसी बरछी कि नोक के जैसे सीधा निवेदिता के ह्रदय को छेद दिए थे| इसके बाद जो हम देखते हैं, हम उसके परिणाम का पूर्वानुमान अवश्य लगा सकते हैं| वे अपनी सेवा समर्पित करते हुए स्वामीजी को एक पत्र लिखतीं हैं|इस पत्र के उत्तर में स्वामीजी जो लिखते हैं उससे यह पता चल जाता है कि उनके पत्र से स्वामीजी भी अभिभूत हुए थे|
उस पत्र को पढने से निवेदिता की मानसिक बनावट और उसका सम्पूर्ण भविष्य स्वामीजी के लिये एक खुली पुस्तक बन गयी|स्वामीजी ने निवेदिता को जो जवाब भेजा था उसमे जो भाव व्यक्त हुए हैं वह सर्वाधिक यादगार पत्र होगा निवेदिता के लिये| 
इन पत्रों को चिर स्मरणीय बनाते हुए स्वामीजी लिखते हैं- ' my ideal indeed .....' ' this world is chain..... ' ' one idea that I see....' ' Religions of the world .....' स्वामीजी के द्वारा उनके विवेचना के लिये एक योग्य आदर्श उनके समक्ष बहुत शीघ्र ही रखा जाने वाले था|और उस आदर्श को प्राप्त करने के लिये जो अकल्पनीय त्याग उन्होंने किया था उसे देखने से इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि उस पत्र का अंतिम अंश उनमे जहाँ ईश्वरीय प्रेरणा को भर दिया होगा, वहीँ यह चरित्र का प्रकाशन जो इसमें परिलक्षित हुआ था वह उनके ह्रदय के अंतरतम प्रदेश तक प्रविष्ट हो गया था| अपनी पुस्तक में निवेदिता ने विशेष कर के इस बात कि पुष्टि की है, की लगभग इसी समय उन्होंने कुछ प्रयोग किये थे|

स्वामीजी की इस टिप्पणी ने भी निवेदिता को अचंभित कर दिया था कि- " महापुरुषों के मुख से निसृत " वचनामृत " (Immortal Utterances या अविनाशी वाक्य ) में जो अद्भुत अनुप्रेरक शक्ति पायी जाती है, वह वास्तव में उन महापुरुषों के चरित्र की ऋणी होती हैं| " निवेदिता स्वयं के जीवन में इस उक्ति को जाँच-परख कर उसकी सत्यता को सिद्ध करने के लिये अग्रसर होने लगीं| किन्तु इस बात का जिक्र उन्होंने स्पष्ट रूप से कभी नहीं किया कि, आगे चलकर स्वामीजी की उसी अवधारणा को उन्होंने अपने जीवन में कैसे धारण कर लिया था| 
किन्तु निवेदिता ने बाद के जीवन में जिन कार्यों को करने का बीड़ा उठा लिया था उन्हें देख कर यह अनुमान लगया जा सकता है कि, स्वामीजी की चारित्र सम्बन्धी वह अवधारणा कि- ' पहले स्वयं चरित्रवान मनुष्य बने बिना किसी के वचनों में अनुप्रेरक शक्ति आ ही नहीं सकती '  ही निवेदिता के भी दार्शनिक विचारों की नाभिकेंद्र हो चुकी थी|
यदि उस प्रसिद्ध उद्धरण से प्रारम्भ करें जिसमे एक मरती हुई शेरनी एक सिंह शिशु का प्रसव भेड़ों की झुण्ड में करती है, और वह भेड़ों की समस्त आदतें अपना लेता है, किन्तु जब उस शिशु को पानी में अपने चेहरे का प्रतिबिम्ब देखने का अवसर मिलता है, वह अपने स्वरूप को जान कर गरजने लगता है|
उपनिषदों की एक कथा है, जिसमे समान पंखों वाले दो पक्षियों को एक ही वृक्ष के डाल पर बैठे दिखाया गया है, इस अवधारणा को परिवर्धित करने के साथ इस सत्य को और अधिक आलोकित कर देता है| ' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया...' समान सुनहरे पंखो से युक्त दो पंछी एक ही वृक्ष की डाल पर निवास करते थे, आपस में उनका प्रेम सच्चा था, अतः वे एक दूसरे से निकट बैठे थे,
पर एक पंछी उपरी डाल पर था दूसरा उससे निचली डाल पर बैठा था| ऊपर की डाल पर बैठा पंछी कोई फल नहीं खाता था, किन्तु निचली डाल पर बैठा पंछी उस वृक्ष के खट्टे-मिट्ठे फलों को खाता था|जब कभी वह मिट्ठे फल खाता वह बड़ा आनन्दित होता किन्तु जब कोई अत्यन्त तीखा फल मिलता वह फल भक्षण करना छोड़ ऊपर वाले पंछी की प्रशांत मुद्रा को श्रद्धा से देखता रहता था|
जब उसकी चित्त-वृत्ति हर्ष से परिपूर्ण होती, उस वृक्ष के प्रति उसकी आसक्ति में वृद्धि हो जाती थी, जब दुखी होता उसे फल से अरुचि हो जाती, और फुदक कर और एक डाल ऊपर उठ जाता था|एक दिन इन्द्रिय भोगों के प्रति उसकी अरुचि इतनी अधिक बढ़ गयी कि उसने उसकी विशालतम छलांग लगा दी, और इस प्रकार वह अपने उस चिरंतन सखा के अत्यन्त निकट जा पहुँचा, जो फल का कभी भक्षण नहीं करता था, निर्लिप्त भाव से द्रष्टा बना रहता था|
निकट पहुँचते ही उसका ह्रदय भी ज्योतिर्मय हो उठा| और जैसे ही यह घटित हुआ नीचे वाले पंछी को यह अनुभव हो गया कि जिसे अभीतक वह अपना ' सखा ' समझ रहा था, वास्तव में वह स्वयं ही था!
इन उद्धरणों से  एक निष्कर्ष तक तो निरापद हो कर प्राप्त किया जा सकता है,वह यह कि स्वामीजी निश्चित रूप से यह जानते थे कि  प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, या मनुष्य जन्मजात रूप से दिव्य होता है ! यदि सचमुच यही सत्य है तो, प्रश्न उठता है कि तब कोई मनुष्य सहज ज्ञान से प्रेरित होकर बुराई के मार्ग को क्यूँ पसंद करता है? 
स्वामीजी के उत्तर के सार को यदि समझने कि चेष्टा करें तो, यह ज्ञात होता है कि , जगत में होने वाले समस्त कार्यव्यापार अपने उदगम के लिये ईच्छा शक्ति के ऋणी होते हैं|और ईच्छा शक्ति किसी मनुष्य के चरित्र से प्रकट होती है, और किसी व्यक्ति का चरित्र उसके द्वारा किये जाने वाले कर्मों का परिणाम है|
चूँकि हमारे मन में सदैव विचार तरंगें उठती रहतीं हैं, अतः मन की तुलना भी किसी सरोवर से की जा सकती है| तरंगों का उठाना- गिरना कैसे होता है?मन में कोई एक विचार उठता है, और कुछ समय के बाद ऐसा प्रतीत होता है की वह मानो अदृश्य हो गया हो|किन्तु वास्तव में यह बात यहीं समाप्त नहीं होती| मन में उत्पन्न कोई भी विचार यदि अदृश्य हो भी जाता है तो वह कभी नष्ट नहीं होता|(Conservation of Energy?) वह संभाव्यता के रूप में वहीँ बची रहती है|हो सकता है की वह विचार अभी उपरी सतह तक न पहुँचा हो किन्तु वह अवचेतन-क्षेत्र में बना रहता है, किन्तु ऑफिस कॉपी या कार्बन कॉपी की तरह मन रूपी फाईल में रहता अवश्य है| इसीलिये किसी विशिष्ट क्षण में कोई मनुष्य अपने मन पर पड़े छापों या संस्कारों की समष्टि होता है, तथा उसके संस्कारों की समष्टि को ही उसका चरित्र समझना चाहिये|
जहाँ तक संस्कारों का प्रश्न है वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के हो सकते हैं|' यदि कोई मनुष्य निरन्तर कामुक विचारों का चिन्तन करता रहता है, कामुक दृश्य और गानों को सुनता रहता है, निरन्तर बुरे की संगती में रह कर बुरा आचरण ही करता रहता है, भले वह ये सभी कार्य अनजाने ही क्यों न करता हो, उसका चरित्र बुरा होने को बाध्य है, उसी प्रकार शुभ कार्य से सद्-चरित्र का निर्माण भी अवश्यम भावी है| कहा गया है- ' जहाँ काम तहां राम नहीं , जहाँ राम नहीं काम '|
स्वामीजी के अनुसार मनुष्य का मन निरन्तर गतिशील अवस्था (State of Movement) में बना रहता है, " If it Does not Progress it Will Tend to Retrograde " - अर्थात यदि इसे(मन को)  उन्नत बनाने में नहीं नियोजित रखा गया तो यह स्वतः ही अपने आप को बुरे विचारों से परिपूर्ण कर लेगा,या इसका झुकाव नीचे जाने की ओर होगा|इसका तात्पर्य यह हुआ कि हमे न केवल सदैव सतर्क रहना होगा बल्कि क्रियाशील भी रहना होगा|यह याद रखना चाहिये कि केवल खगोल-विद्या का नाम दुहराते रहने से ही कोई व्यक्ति कभी  खगोल-शास्त्री नहीं बन सकता| यदि हमारे ऊपर बन्दरों का (मन और इन्द्रियों का) आक्रमण हो,तो हमे पूरी ताकत से (ईच्छा शक्ति को बलवती बना कर) उन बन्दरों का सामना करना चाहिये|
हमें अनेकों पहले से गठित विचारों (मैं स्त्री\पुरुष हूँ ) बातों को मन से निकालना (Unlearn) करना होगा|क्या प्रत्येक बढई का बेटा ईसा मसीह होता है? या प्रत्येक टिकैत सरदार का बेटा एक बुद्ध बन सकता है|क्या किसी दुष्ट-बदमाश व्यक्ति को सत्पुरुष बनने का प्रयास इस लिये नहीं करना चाहिये कि तबतो उसका व्यक्तित्व ही नष्ट हो जायेगा? मानसिक सतर्कता का विस्तार ही हमारा अटल लक्ष्य होना चाहिये|हमे निरन्तर अपने दिव्य स्वरुप में स्थित रहने के लिये प्रयासरत रहना चाहिये| ' उस दिव्यता को दिन प्रति दिन अधिक से अधिक अपने भीतर अनुभव करते रहना ही- 'अनन्त- उन्नति ' का पथ है|                 
  अब कोई यह प्रश्न कर सकता है कि दिव्यता (Divinity) क्या है? यह दिव्यता है क्या- जिसे प्राप्त करने के लिये हमे सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये? स्वामीजी का उत्तर है - मुक्ति (Freedom)!
इस संसार की प्रत्येक वस्तु,  चाहे वह सजीव है या निर्जीव - ' मुक्ति ' के लक्ष्य को प्राप्त करने  के अनवरत संघर्ष में लगी हुई है| और यही सृष्टि का आधार है|
मुक्ति प्राप्त करने की अदम्य ईच्छा, जब किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति या रुझान में परिणत हो जाती है, तो इसका प्रभाव ही उस व्यक्ति को एक सन्त में परिणत कर देती है | और इसका ही असाधारण प्रभाव किसी सन्त को सत्य की अनुभूति करने में भी सक्षम बना देती है| 
दूसरी ओर यह मुक्ति को प्राप्त करने की अदम्य ईच्छा ही, किसी व्यक्ति को डाकू बन जाने के लिये भी प्रेरित करती है, और किसी डकैत को अपने पेशे में और अधिक निपुणता प्राप्त करने के लिये भी उकसा देती है| अतः हमे ' सत-असत ' विवेक की सहायता से निर्णय लेकर सत-मार्ग पर चलने का ही संकल्प लेना चाहिये |
जो व्यक्ति स्वयं को दूसरों कि सेवा में समर्पित कर देता है, वह फिर अधिक दिनों तक ' मैं ' और ' मेरा ' के बंदीगृह में कैद नही रहता, मुक्त हो जाता है|जो व्यक्ति जितना अधिक स्वार्थरहित बनता जाता है, वह मुक्ति के उतना ही निकटतर होता जाता है|जो व्यक्ति पुर्णतः स्वार्थशून्य बन जाता है, वह ' अनन्त विस्तार ' को प्राप्त हो जाता है| इसीलिये मुक्ति और सर्व-गतत्व ( या सर्व-व्यापकत्व) तत्वतः अभिन्न हैं|
सर्वगतत्व  (या जीवन-मुक्ति ) प्राप्त करने के लिये किसी भी व्यक्ति को सम्पूर्ण विश्व के साथ एकत्व की अनुभूति अवश्य प्राप्त करनी चाहिये, उसे भेदभाव रहित  या अव्यक्तिगत (शरीर भाव से ऊपर) रहने के लिये मन , वचन और कर्मों की समस्त संकीर्णताओं के ऊपर उठाना चाहिये| उसका मिथ्या व्यक्तित्व (भेंड या नीचे वाला पंछी होने का भ्रम) अवश्य मिट जाना चाहिये ताकि उसका सच्चा व्यक्तित्व विकसित हो सके, और हम जानते हैं कि सर्व-व्यापकत्व(Universality) ही हमारा सच्चा  (Personality) व्यक्तित्व है! सर्व-व्यापकत्व (' पक्का मैं '- या ' Universalism ') प्राप्त करने (या अपना पुराना व्यक्तित्व -  ' कच्चा मैं ' खो देने )  का तात्पर्य क्या यह है,  कि मनुष्य मानो किसी ' पर-कटे पंछी ' के जैसा बेचारा और लाचार ( या नीरस ) बन जायेगा ? 
 नहीं, बिल्कुल नहीं - यहाँ तक कि सबसे दीन व्यक्ति ही अपनी ' शिव ज्ञान से जीव सेवा '  के बल पर सर्व-व्यापकत्व ( जीवन-मुक्ति , पक्का मैं, या Universalism) अर्जित कर सकता है| व्याध गीता को हमारे सर्वश्रेष्ठ धार्मिक ग्रंथों में से एक माना जाता है, जबकि उसकी रचना एक कसाई ने कि थी|इसे इस प्रकार देखना चाहिये कि सेवा को निष्काम भाव से करना ही सच्ची सेवा है|
दूसरी बात हमे यह देखना चाहिये कि हम और हमारे उद्देश्य ( चरित्र-निर्माण ) के बीच में किसी भी प्रकार के माया के परदे को आड़े , नहीं आने देना चाहिये|अर्थात अपने चरित्र को किसी भी परिस्थिति में नष्ट नहीं होने देना चाहिये| क्योंकि स्वामीजी के धर्म-पत्रों पर एक दृष्टि डाली जाये, तो वहाँ भी एक ही बात उभर कर सामने आती है कि उन सभी पत्रों में केवल चरित्र-गठन ही प्रमुख महत्व की वस्तु थी |
केवल अलग अलग व्यक्तियों के लिये लिखित  रहने के कारण , उनके पत्रों को एक प्रतिमान अथवा, एक दूसरे का नक़ल भी नहीं समझना चाहिये | उन पत्रों में विभिन्नता अवश्य है किन्तु मत का अलगाव नहीं है| उनका अन्तर केवल उनके विवरण में है, किन्तु प्रत्येक पत्र का मौलिक उद्देश्य सर्वदा एक है - और वह लक्ष्य है चरित्र कि उन्नति|एक पत्र में वे सहानुभूति के ऊपर जोर देते हैं तो दूसरे में पवित्रता-विश्वसनीयता और श्रद्धा के ऊपर, तो तीसरे में केवल प्रेम के लिये प्रेम पर जोर देते हैं|
स्वामीजी के कार्यों में जिस किसी भी मनुष्य की दिलचस्पी होगी वह स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखित उनके पत्र को बार बार पढना चाहेगा|उन पत्रों में स्वामीजी का ध्यान मुख्य रूप से जनसाधारण के उत्कर्ष पर ही केन्द्रित है, तथा वे उनके खोये हुए व्यक्तित्व को पुनरुज्जीवित करने के कार्य में अपना नियोग करते दिखायी देते हैं|
स्वामी अखंडानन्द को उनका परामर्श है- ' दरिद्रदेवो भव मूर्खदेवो भव |' उनको यह बताना चाहते हैं कि - ' इनकी सेवा करना ही सर्वोच्च धर्म है '| एक अमेरिकी शिष्य को मिशन के मुहर कि व्याख्या करते हुए लिखते हैं- ' इसमें दिखाया गया सर्प योग-विद्या का प्रतिनिधित्व करता है, सूर्य ज्ञान का प्रतीक है,हिलता हुआ जल कर्म का,कमल का फूल भक्ति का तथा इन सब के मध्य तैरता हुआ हंस आत्मा का प्रतीक है|' 
इस बात में कुछ सन्देह नहीं कि इन पत्रों का निवेदिता के ऊपर जरुर प्रभाव हुआ था|पहले जो संकल्प उनके अवचेतन मन में केवल एक काल्पनिक सम्भावना थी वही, अब एक ' कार्यकारी -शक्ति ' में परिणत हो गयी  थी| उनके पत्र ऐसे यथार्थ अनुप्रेरक हैं, जो उसके प्राप्तकर्ता या पाठक को निरन्तर क्रियाशील रहने के लिये अनुप्रेरित करते रहते हैं !
निवेदिता ने महसूस किया कि अपने पत्रों के उत्तर के रूप में प्राप्त हुये स्वामीजी के ये पत्र  मात्र एक पत्र नहीं थे, वे तो उनकी कल्पनाओं के उड़ान को अभिव्यक्त करने का आह्वान थे ! ये पत्र उनके लिये मानो, किसी सुमधूर संगीत के जैसा कर्ण-प्रिय, फूल कि कलियों जैसे कोमल, साथ ही साथ अन्तर मन में प्रेरणा भर देने वाले थे | वे पत्र उनके लिये एक आदेश थे, एक पुकार थी, वे पत्र मानो किसी सर्वभक्षण- कारी अग्नि की निःशब्द आवाज थी !
इसका परिणाम ऐसा हुआ कि, भारत आने की ईच्छा ने निवेदिता के मन पर अधिकार जमा लिया और  वे अपने गुरु स्वामी विवेकानन्द की शिष्या बन कर अविलम्ब भारत पहुँचने के लिये तत्पर हो गयी, और उधर स्वामीजी अपने जीवन को भारत माता की सेवा में समर्पित कर देने के उद्देश्य से इंग्लैंड से भारत के लिये प्रस्थान कर गये | इन दोनों घटनाओं का साधारण सा विश्लेषण करने से भी हम इसके तात्पर्य को समझ सकते हैं|
उन्हें जिन महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान देना पड़ा होगा वे संभवतः ये हो सकते हैं :- यदि वे सम्पूर्ण मानवता का कल्याण चाहतीं हैं तो उन्हें अपने देश को छोड़ने का निर्णय लेना ही पड़ेगा, उन्हें एक ऐसे देश में रहना पड़ेगा जो न तो इंग्लैंड के पड़ोस में है न यूरोप के, उन्होंने एक ऐसे उष्ण देश में रहने का निर्णय लिया जो गरीब है, जहाँ अकाल और भुखमरी है, जहाँ कोई छोटी से छोटी संक्रामक बीमारी भी  तुरत महामारी का रूप धारण कर लेती है, जिनमे प्लेग सबसे प्रमुख है|
यह पत्र यह सूचित करता है कि वह उस देश के लोगों के लिये जीना और मरना चाहती है विचारना और कार्य करना चाहती है, महसूस करना चाहती है, दरिद्रता और बिमारियों का सामना करना चाहती है, अपने जीवन भर की आदतों को त्याग देना चाहती हैं, तथा उन्हें ऐसी आदतों से बदलना चाहतीं हैं जो उनकी कर्म-भूमि उनसे अपेक्षा करती थी|
भारत लौट आने के बाद स्वामीजी ने जो पत्र निवेदिता को लिखे थे उनको यदि देखें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि उस समय उनके दिल कि धड़कन कितनी सही थी| हमलोग जिन तथ्यों को तुरन्त जान लेंगे वह यह कि स्वामीजी ने इंग्लैंड प्रवास के दौरान ही यह चाहा था कि निवेदिता भारत की सेवा करें तथा यह भी समझ में आता है कि निवेदिता ने उनकी ईच्छा को उनकी आज्ञा मान कर शिरोधार्य किया था, तथा स्वयं को इसकी सेवा में समर्पित कर दिया था|
इसके साथ साथ हम यह भी पाते हैं कि निवेदिता एक के बाद दूसरा पत्र भेज कर स्वामीजी को भी उकसा रही हैं कि वे उनको भारत आने की अनुमति प्रदान कर दें| २९ जुलाई १८९७ के पत्र में स्वामीजी दूसरी बार निवेदिता को यह समझाने का प्रयास करते है कि उन्हें यहाँ आने का दुस्साहस क्यों नहीं करना चाहिये| जो विचारणीय बिन्दु थे वे इस प्रकार हैं-
१.जनसाधारण का दुःख ऐसा कि वे दाने दाने को मुहताज थे|
२. वे यहाँ के समाज में स्वयं को समायोजित क्यों नहीं कर पाएंगी|
३. यहाँ की जलवायु उनके स्वास्थ्य के लिये अनुकूल न होगी|
हाँ पर इतना जरुर था कि स्वामीजी ने उनके प्रस्ताव को बिल्कुल ही अस्वीकार नहीं कर दिया था| 
स्वामीजी ने उनको लिखा था- ' सेवा कार्य में कूद पड़ने के पहले और बाद में सोंच लो यदि तुम इस कार्य में असफल हो जाओ या उकता जाओ, तो मेरी ओर से मैं प्रतिज्ञा करता हु कि मैं तुम्हारे साथ ही मृत्यु तक खड़ा रहूँगा,चाहे तुम भारत के लिये कार्य करो या न करो, चाहे तुम वेदान्त को त्याग दो या इसी में रहो|' 
इस पत्र का प्रभाव निवेदिता पर कितना पड़ा होगा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता|जैसे ही पत्र प्राप्त हुआ,निवेदिता ने कलकत्ता जाने वाले जहाज को पकड़ लिया, जो तब तक ' मार्गरेट नोबेल ' ही थी, उस समय तक वे - ' विवेकानन्द की निवेदिता ' नहीं बन सकी थीं !
हमलोगों में से कोई भी व्यक्ति, आज भी यदि भारत को पुनरुज्जीवित करना चाहता हो तो उसे भी निवेदिता की तरह ही अपने सभी निजी सवार्थों और सुख-सुविधाओं का त्याग कर ' नया भारत ' गढ़ने के कार्य में कूद पड़ना होगा, क्योंकि हमारी प्यारी भारत माता प्राण-वायु पाने के लिये आज भी हांफ रही है| 
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