Sunday, October 18, 2009

सच्चा सुख अपने ही भीतर है !

" मैं जीवन से उच्चतर कोई 'वस्तु' हूँ ! " 
** मैं कौन हूँ और यह जीवन क्या है ?  इस प्रश्न के उत्तर में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " मैं जीवन से उच्चतर कोई वस्तु हूँ; जीवन सदैव दासता है। हम (और जीवन ) सदा घुल-मिल जाते हैं। "(४:१३६) 

" हम सबों में मुक्ति की भावना-स्वाधीनता की भावना हुआ करती है, उसी से यह संकेत मिलता है कि हमारे अन्तराल में, शरीर(Hand) और मन (Head) से परे भी कुछ और है। हमारी अन्तर्यामी आत्मा(Heart) स्वरूपतः स्वाधीन है और वही हममे मुक्ति की इच्छा जाग्रत करती है। " (१:२५६)

"हम विश्व के रहस्य को हल करने की चेष्टा करते हैं। ऐसा लगता है कि यह सब हमे अवश्य जान लेना चाहिए, हमे ऐसा कभी महसूस नहीं होता कि 'ज्ञान' कोई प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। ....किन्तु अति बलवान इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को, 'अवशीभूत मन' - रूपी शत्रु की सहायता से बाहर की विषयों में खींच लातीं हैं।

मनुष्य ऐसे स्थान में सुख की खोज करने लगता है, जहाँ वे हैं ही नहीं, जहाँ वह उन्हें कभी पा नहीं सकता। ...हम कुछ कदम आगे जाते हैं, कि अनादी-अनन्त कालरुपी प्राचीर व्यवधान बन जाता है; जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर बढ़ते ही असीम देश का व्यवधान खड़ा हो जाता है, फ़िर यह सब कार्य-कारण रूपी दीवार द्वारा सुदृढ़ रूप से सीमा-बद्ध है !...तो भी हम संघर्ष करते हैं !" (२:७४)

" बुद्धदेव की जीवनी, ' ललित विस्तार ' के प्रसिद्द गीत में कहा गया है - बुद्ध ने मनुष्य जाती के परित्राता  या मार्गदर्शक ' नेता ' के रूप में जन्म लिया; किन्तु जब राज-प्रासाद की विलासिता में वे अपने को भूल गये, तब उनको जगाने के लिये देवदूतों ने एक गीत गाया, जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है - ' हम एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं; हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं- कहीं निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है; सारा संसार मृत्यु की ओर चला जा रहा है-सभी मरते हैं ! हमारी सभी प्रगति, व्यर्थ का आडम्बरी जीवन, हमारे समाज-सुधार ! हमारी विलासिता, हमारे ऐश्वर्य, हमारा ज्ञान - इन सबकी मृत्यु ही एक मात्र गति है ! हम क्यों इस जीवन में आसक्त हैं ? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते ?... यह हम नहीं जानते ! और यही माया है !! " (२:४७)

"जब मन किसी बाह्य-वस्तु का अध्यन करता है, तब वह उससे अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है, और स्वयं लूप्त हो जाता है। यह 'मन' आत्मा का ' दिव्य चक्षू ' है ! हमारा  मन उस  स्फटिक खंड के समान है, जो अपने निकट की वस्तुका रंग ग्रहण कर लेता है। हम लोगों ने शरीर का रंग ग्रहण कर लिया है,अर्थात शरीर के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लिया है, और भूल गये हैं कि हम क्या हैं। ....हम लोग उसी प्रकार शरीर नहीं हैं, जिस प्रकार स्फटिक ' लाल फूल ' नहीं है।... आत्मा की स्वस्थतम अवस्था - तब है जब वह 'स्व' का चिन्तन कर रही हो और अपनी गरिमा में स्थित हो।" (४:१३१)

" भारतीय कुशल-प्रश्न है, ' आप स्वस्थ तो हैं ? '- जिसका अर्थ है आप अपने में स्थित हैं या देह में?...ध्यान करने का तात्पर्य है- आत्मा का अपने में (या स्व में) स्थित होने के लिए यत्न करना। "

" आधुनिक विकासवाद का सिद्धांत कहता है, हर कार्य पूर्ववर्ती कारण की आवृत्ति मात्र है। परिस्थिति या परिवेश के कारण रूप-परिवर्तन होता है। योनी-परिवर्तनों के कारण को खोजने सृष्टि से बाहर जाने की जरुरत नहीं है। कार्य में ही कारण श्रृंखला विद्यमान है। विश्व का मूल कारण, ऐसी कोई शक्ति नहीं है, या कोई सत्ता नहीं है, जो इससे अलग रह कर रिमोट से इसको चला रही है। " (२:२८२)

" क्रमविकास-वाद क्या है? उसके दो अवयव क्या हैं ? क है प्रबल अन्तर्निहित शक्ति, जो अपने को व्यक्त करने की चेष्टा कर रही है, और दूसरा है बाहर की परिस्थितियाँ, जो उसे अवरुद्ध किए हुये है, या वह परिवेश है जो उसे व्यक्त होने नहीं देता। अतः इन परिस्थितियों से युद्ध करने केलिये यह ' शक्ति ' नये नये शरीर धारण कर रही है। एक अमीबा इस संघर्ष में एक और शरीर धारण करता है, और कुछ बाधाओं पर जय-लाभ करता है, और इस प्रकार भिन्न भिन्न शरीर धारण करते हुये अन्त में मनुष्य में परिणत हो जाता है। " (२:९१)

" मनुष्य दिव्य है, यह दिव्यता ही हमारा स्वरूप है। अन्य जो कुछ है वह अध्यास मात्र है। उसके दिव्य स्वरूप काकभी भी नाश नहीं होता। यह जिस प्रकार ' परम-संत ' में है, वैसे ही ' महा-अधम ' व्यक्ति में भी है। हमे अपने इसदेव-स्वभाव का केवल आह्वान करना होगा, और वह स्वयं ही अपने को प्रकट कर देगा।चकमक पत्थर और सूखी- लकड़ी में आग रहती है, पर उस आग को बाहर निकालने के लिये घर्षण आवश्यक था। नीचे धरती पर रेंगने वाला क्षुद्र कीड़ा और स्वर्ग का श्रेष्ठतम देवता इन दोनों में ज्ञान का भेद प्रकार्गत नहीं, परिणाम गत है। " (२:१८२)

" अगर कोई व्यक्ति हत्यारा है, तो उसमे प्रतिफलक (मन-दर्पण) बुरा है, न कि आत्मा। दूसरी ओर अगर कोई साधू है तो उसमे प्रतिफलक शुद्ध है। सत्ता केवल एक ही है जो कीट से लेकर पूर्णतया विकसित मनुष्य (बुद्ध या ईशा) तक में प्रतिबिम्बित है। इस तरह सम्पूर्ण विश्व एक एकत्व, एक सत्ता है- भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, हर दृष्टि से। इस एक सत्ता को ही हम विभिन्न रूपों में देखते हैं। " (२:११२)

" देश-काल-निमित्त या नाम-रूप के साँचे से जब ' वह ' जो इच्छा रूप में परिणत हो जाता है, जो पहले इच्छा के रूपमें नहीं था, परन्तु बाद में देश-काल-निमित्त के साँचे में पड़ने से जो मानवीय इच्छा हो गया, वह अवश्य स्वाधीनहै। और जब यह इच्छा इस वर्तमान नाम-रूप या देश-काल-निमित्त के साँचे से मुक्त हो जायगी तो ' वह ' पुनःस्वतंत्र हो जाएगा। " (३:६९)

" अतएव ' इच्छा ' के पूर्व बहुत सी वस्तुयें जरुरी है। यह इच्छा- अहं तत्त्व से निर्मित कोई प्रतिक्रिया मात्र है। औरअहं तत्व का सृजन उससे भी ऊँची वस्तु बुद्धि से होती है। और यह बुद्धि भी अविभक्त प्रकृति का परिणामहै।"(४:२०४)
" यह मानव आत्मा देह से देहान्तर में संक्रमित हो रही है, इस प्रवास में वह कितने ही भिन्न भिन्न रूपों में व्यक्त हुई है एवं होगी। आध्यात्मिक विकास के उस महान नियमानुसार वह अधिकाधिक अभिव्यक्त हो रही है। परन्तु जब वह सम्पूर्ण अभिव्यक्त हो जायेगी, तब उसमे और अधिक परिणाम न होगा। (१:२५४)

" (यदि कार्य-कारण वाद या परिणाम वाद सच है) तो हमे अपने पूर्व जन्मों का कुछ भी स्मरण क्यों नहीं है?
मनः समुद्र की उपरी सतह का नाम ही चेतन अवस्था है। किन्तु उसकी गहराई में (अवचेतन मन में) संचित है, मानव के समस्त सुखात्मक और दुखात्मक अनुभव। मानव आत्मा कुछ ऐसी वस्तु पाने की इच्छा करती है, जोअचल हो, अविनाशी हो।जबकि हमारा यह शरीर और मन ही क्या, नाना रूपात्मक यह समस्त प्रकृति ही अनवरत परिवर्तनशील है। पर हमारी अन्तरात्मा की सर्वोच्च अभिलाषा (या तड़प) यही है, कि उसे कुछ ऐसा प्राप्त हो जाये, जिसका परिवर्तन नहीं होता, जो चिर(शान्ति) पूर्णता को पा चुकी हो। और यही है उस असीम के लिये मानवात्मा कि अभीप्सा ! हमारा नैतिक और मानसिक विकास (अर्थात चरित्र-निर्माण) जितना ही सूक्ष्मतर होता जायेगा, उस अपरिवर्तनशील सत्ता के प्रति हमारी अभीप्सा (व्याकुलता) भी उतनी ही दृढ़ होती जायेगी। "(१:२५५)
" हमारा यह शरीर वृद्धि और क्षय के नियमों से बद्ध है, - जिसकी जन्म और वृद्धि है, उसका क्षय भी अवश्यमेव होगा। परन्तु देहमध्यस्त आत्मा तो असीम एवं सनातन है, वह अनादी और और अनन्त है। ...काल कि गति काशाश्वत सत्ता पर कोई असर नहीं होता।....मानव-बुद्धि के लिये सर्वथा अगम्य जो ' अतीन्द्रिय-भूमि ' है, वहाँ न तोभूत है न भविष्य। वेदों का कथन है कि मानव कि आत्मा अमर है। "(१:२५४)
" हमारे ऋषि तो यह कहते हैं, कि इन्द्रियजन्य सुखों में तृप्त रहना उन कारणों में से एक है, जिसने सत्य और हमारे बीच परदा सा डाल दिया है। केवल कर्म-कांडों में रूचि, इन्द्रियों में तृप्ति तथा नाना प्रकार मतवादों ने हमारे और सत्य के बीच एक आवरण डाल रखा है।' एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' - सत्ता केवल एक है, ऋषिगण उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।...सत्य तो चिरकाल से ही विद्यमान था, केवल इस (नाम-रूप) के आवरण ने ही उसे ढँक रखा था। " (१:२५५) 
" यह चित्त अपनी स्वाभाविक पवित्र अवस्था को फ़िर से प्राप्त कर लेने के लिये सतत् चेष्टा कर रहा है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर खींचे रहती हैं। चित्त में बाहर जाने और विषय भोगों में चिपके रहने की जो प्रवृत्ति है- उसका दमन करना होगा और उसकेबहिर्मुखी प्रवाह (पर वैराग्य का फाटक लगा कर, या लालच को कम करके ) को आत्मा की ओर मोड़देना होगा। यही योग का पहला सोपान है। "(१:११८)

" इन्द्रियपरायण जीवन से अतीत होने की हमारी असमर्थता, और शारीरक विषय-भोगों के लिये उद्यमही संसार में सभी प्रकार के आतंकों (भ्रष्टाचार) तथा दुखों का कारण है। "(४:११४)


" स्वाधीनता ही उच्च जीवन की कसौटी है।आध्यात्मिक जीवन उस समय प्रारम्भ होता है, जिस समय तुम अपने को इन्द्रिय बन्धनों से मुक्त करलेते हो। जो इन्द्रियों के अधीन है, वही संसारी है, वही दास है। " (४:४३)
" असीम शक्ति का एक स्प्रिंग इस छोटी सी काया में कुण्डली मारे विद्यमान है, और वह स्प्रिंग अपने को फैला रहा है। और ज्यों ज्यों यह फैलता है, त्यों त्यों एक के बाद दूसरा शरीर अपर्याप्त होता जाता है, वहउनका परित्याग कर उच्चतर शरीर धारण करता है। यही है मनुष्य का धर्म, सभ्यता या प्रगति काइतिहास। वह भीमकाय ' प्रोमिथियस ' (एक यूनानी देवता जिसने olampious से चुराई हुई अग्नि मनुष्य को दिया और जिसे दंड स्वरूप जंजीरों में जकड़ दिया गया) मानो अपने को बंधन मुक्त कर रहाहै। " (९:१५६)

" प्रकृति हमे चारो ओर से दमित करने का प्रयास कर रही है, और आत्मा अपने को अभिव्यक्त करनाचाहती है। प्रकृति कहती है - ' मैं विजयी होउंगी ' ; आत्मा कहती है- ' विजयी मुझे होना है '। प्रकृतिकहती है- ठहरो, मैं तुम्हे चुप रखने के लिये थोड़ा सुख भोग दूंगी। आत्मा को थोड़ा मज़ा आता है, क्षण भरके लिये वह धोखे में पड़ जाती है, पर दुसरे ही क्षण वह फ़िर मुक्ति के लिये चीत्कार कर उठती है।" (३:१७३) 

" एक अन्तर्निहित शक्ति मानो लगातार अपने स्वरूप में व्यक्त होने के लिये - अविराम चेष्टा कर रही है, और बाह्य परिवेश उसको दबाये रखने के लिये प्रयासरत है, बाहरी दबाव को हटा कर प्रस्फुटित हो जानेकी इस चेष्टा का नाम ही जीवन है।" (विवेकानन्द चरित-पृष्ठ १०८)
" हमारे इस अविराम,कठोर जीवन-संग्राम का लक्ष्य है, अंत में उनके निकट पहुँच कर उनके साथ एकीभूत हो जाना। " (४:५०)

" जीवन का अर्थ ही वृद्धि अर्थात विस्तार यानि प्रेम है। इसलिए प्रेम ही जीवन है, यही जीवन का एकमात्रनियम है, और स्वार्थपरता ही मृत्यु है। परोपकार ही जीवन है, परोपकार न करना ही मृत्यु है। ...जीसमे प्रेम नहीं वह जी भी नहीं सकता। ( ३:३३३)
" एकमात्र परोपकार को ही मैं कार्य मानता हूँ, बाकि सब कुकर्म है। " (४:२९८)
" आगे बढ़ो ! सैकड़ो युगों तक संघर्ष करने से एक चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ! सत्य के एक शब्द का भी लोप नहीं हो सकता। सत्य अविनाशी है, पुण्य अनश्वर है,पवित्रता अनश्वर है। मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है, मुझे शंख-ढपोर चेले नहीं चाहोये। ... सदाचार सम्बन्धी जिनकी उच्च अभिलाषा मर चुकी है, भविष्य की उन्नति के लिए जो बिल्कुल चेष्टा नहीं करते, और भलाई करने वालों को धर दबाने में जो हमेशा तत्पर हैं- ऐसे ' मृत-जड़पिण्डों ' के भीतर क्या तुम प्राण का संचार कर सकते हो ? क्या ' तुम ' उस वैद्य की जगह ले सकते हो, जो लातें मारते हुए उदण्ड बच्चे के गले में दवाई डालने कीकोशिश करता हो ? भारत को नव-विद्युत की आवशयकता है, जो राष्ट्र की धमनियों में नविन चेतना कासंचार कर सके। यह काम हमेशा धीरे धीरे हुआ है, और होगा। " ( ३:३४४)

" जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे सर्वभूतों कि सेवा में न्योछावर कर दिया जाये।"(४:५८)
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