Tuesday, July 21, 2009

आगामी युग होगा- जनसाधारण का युग !

"तुम्हारी मुक्ति का आलोक सम्पूर्ण विश्व में प्रतिबिम्बित  हो !"  
प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के विषय में अब्राहम लिंकन की प्रसिद्द उक्ति है- " संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की सरकार आम जनता की है, आम जनता के द्वारा है, आम जनता के लिए है (Of the people, By the people, For the people)"। इसी घोषणा को  प्रतिध्वनित करते हुए सम्पूर्ण विश्व के भावी युग की शासन-व्यवस्था के प्रसंग में, स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " पृथ्वी पर व्यक्तिविशेष के आधिपत्य के दिन बीत चुके हैंआगामी युग होगा- जनसाधारण का युग !  गणतंत्र का यही आदर्श है। "
गणतांत्रिक व्यवस्था में देश के सभी नागरिकों  को एक सामान स्वाधीनता और मर्यादा प्राप्त होगी, राष्ट्र-संचालन तथा अन्यान्य विषयों में भी सबों को एक सामान अधिकार और अवसर उपलब्ध रहेंगे  
गणतंत्र की इस अत्यन्त प्राचीन अवधारणा को, स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद व्यावहारिक रूप से सर्वप्रथम अमेरिका द्वारा ही  बृहद राष्ट्र के पैमाने पर प्रयोग में लाया गया है। स्वामी विवेकानन्द की हार्दिक इच्छा थी कि, मुक्ति-सूर्य का यह आलोक सम्पूर्ण विश्व में प्रतिफलित हो जाय ४ जुलाई १८९८ को स्वामी विवेकानंद जी कुछ अमेरिकन शिष्यों के साथ   कश्मीर का परिभ्रमण कर रहे थे, अमेरिकन 'स्वातंत्र्य घोषणा -दिवस ' की जयंती मनाने के अवसर पर उसी दिन उन्होंने अन्ग्रेज़ी में ' मुक्ति '(४ जुलाई के प्रति ) शीर्षक इस कविता में लिखते हैं-
 " आज तुम्हारा नव स्वागत है ! 
हे सूर्य , तुम आज मुक्ति-ज्योति फैलाते हो |

ओ देवता ! निर्बाध बढो ,

अपने पथ पर ,

तब तक ,

जब तक कि यह सूर्ये आकाश के मध्य न आ जाये —

जब तक तुम्हारा आलोक विश्व में प्रत्येक देश में  प्रतिफलित न हो ;

जब तक नारी और पुरुष सभी उन्नत मस्तक होकर यह नहीं देखें

कि उनकी जंजीरें टूट गयीं

और नवीन सुखों के वसंत में उन्हें नवजीवन मिला !

 (वि० सा० ख० १० : २०४)
तब से लेकर, विशेष कर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से विश्व के अनेक देशों में गणतांत्रिक व्यवस्था आ चुकी है। वर्१९५० के बाद से भारत भी ' गणतांत्रिक प्रजातंत्र ' बन चुका है। किन्तु जब तक जनसाधारण के बीच यथार्थ शिक्षा का प्रसार नहीं हो पाता तब तक कहीं भी सच्चा गणतंत्र भी स्थापित नहीं हो सकता। इसीलिए लगभग सभी देशों में थोड़े से स्वार्थपर लोग जनसाधारण को ठग कर सत्ता का सुख भोगते हैं, जिसके फलस्वरूप साधारण जनता का दुर्भाग्य भी मिट नहीं पाता है। भारत कि पिछली भंग हो गई लोक-सभा के ५४३  ' जन-प्रतिनिधियों ' में से कुल १२८ सांसद खून, दंगा से लेकर विभिन्न गंभीर अपराध के आसामी थे; तथा इनके चुनावी-प्रचार को और भी असरदार बनाने के लिए ब्लैक-मार्केट का करोड़ो करोड़ रुपया और अस्त्र-सश्त्र से सारे देश को पाट दिया गया था।
हमारे देश को वास्तव में कैसे लोग चलाते हैं, यह बात अब इतने वर्ष बीत जाने के बाद किसी से छुपी नहीं है। इसीलिए चुनाव-प्रचार करते समय इन राजनीतिज्ञों को आम जनता के दुःख -कष्टों के लिए घड़ियाली आँसू बहाने और थोथे आश्वासनों का किसी पर कोई असर नहीं होता। ' सच्ची-शिक्षा ' विहीन गणतंत्र में जन साधारण के लिए सामान स्वाधीनता, मर्यादा और सामान अधिकार देने की बातें करना दिन में सपने देखने जैसी बातें हैं।
पाकिस्तान के एक पूर्व राष्ट्रपति ने कहा था- " Democracy without education is a hypocrisy without limitation " - अर्थात  शिक्षा के सर्वगत न होने तक, सीमाहीन पाखण्ड का ही दूसरा नाम गणतंत्र है।" इस देश में गणतंत्र आने से बहुत पहले, अमेरिका और यूरोप में प्रवास करते समय स्वामीविवेकानन्द ने उन देशों में स्थापित गणतंत्र का जैसा चेहरा देखा था उसका वर्णन करते हुए स्वामी विवेकानन्दकहते हैं- " मैंने तुम्हारा पार्लियामेन्ट (लोक-सभा ), सीनेट (वरिष्ठ-सभा अथवा राज्य-सभा), Vote (मताधिकार), Majority (बहुमत अथवा जनादेश ), Ballot (मतपत्र), Ballot Rigging (मतपत्रों की हेराफेरी) सब कुछ को देखाहै- अरे राम हो राम ! प्रत्येक देश में एक ही नियम लागु होता है, थोड़े से शक्तिमान मनुष्य जिस ओर चाहते हैं, समाज को चलाते हैं; बाकि लोग भेंड़ की झुंड के समान उनका अनुशरण करते हैं। ...... यह ठीक है कि वोट, बैलेट आदि द्वारा प्रजा को जो एक विशेष ढंग कि शिक्षा मिलती है, उससे हम वंचित रह जातेहैं। किन्तु राजनीती के नाम पर चोरों का जो दल देशवासियों का रक्त चूस कर, समस्त यूरोपीय देशों का नाश करता है, और उनका भक्षण करके स्वयं मोटा-ताजा बना रहता है, वैसा कोई भी दल कम से कम हमारे देश में तो नहीं है। (यह बात उन्होंने १०० वर्षों से भी अधिक पहले कही थी) घूस कि वैसी धूम, वह दिन-दहाड़े लूट, जो पाश्चात्य देशोंमें होती है- अरे राम कहो ! यदि वहाँ की आन्तरिक व्यवस्था को देख लेते तो मनुष्य पर से विश्वास ही उठ जाता। !

' घर की जोरू बर्तन माँजे, गणिका लड्डू खाय।
गली-गली में गोरस फिरता, मदिरा बैठ बिकाय।। '

जिनके हाथ में रुपया है, वे राज्य-शासन को अपनी मुट्ठी में रखते हैं, प्रजा को लूटते हैं, उसको चूसते हैं, और बाद में उन्हें सिपाही बनाकर देश-देशान्तर में मरने के लिए भेज देते हैं। जीत होने पर पुनः उन्ही का घर धन-धान्य से भरा जाएगा, किन्तु बेचारी निरीह प्रजा तो उसी जगह मार डाली गई। ....राम हो राम ! यह सब देख-सुन कर भी न तो तुम्हे अपनी भृकुटी ताननी चाहिए, न किसी प्रकार का आर्श्चय ही व्यक्त करना चाहिए। " (वि०सा० ख० १० : ६१ )
'परानुवाद', 'परानुकरण' (दूसरों की नक़ल करने ) में दक्ष और कुशल हम भारत वासियों ने इतने वर्षों में 'गणतंत्र'- के ठीक इसी चेहरे की अनुकृति अपने देश में भी गठित कर लिया है ! क्यों की हमारे देश के शीर्ष नेताओं में से किसी ने भी स्वामी विवेकानन्द के परामर्श को आज तक सुना ही नहीं है,(या यूँ कहें कि सुना है तो समझा नहीं है)
 भारत के प्राचीन इतिहास और वर्तमान परिस्थिति पर गंभीरता पूर्वक चिन्तन-मनन करने के बाद, स्वामी विवेकानन्द ने ही सर्वप्रथम भारत के लिये  यथार्थ ' गणतांत्रिक ' व्यवस्था को प्रतिष्ठित करने के पथ का निर्देश करते करते हुए कहा था - " भारतवर्ष में हमारा शासन सदैव राजाओं द्वारा हुआ है, राजाओं ने ही हमारे सब कानून बनाये हैं। अब वे राजा नहीं हैं, और इस विषय में अग्रसर होने के लिए हमें मार्ग दिखलाने वाला अब कोई नहीं रहा है। सरकार भी साहस नहीं करती; वह तो जनमत कि गति देख कर ही अपना चुनाव-घोषणापत्र बनती है, और कार्य-प्रणाली निश्चित करती है। अपनी समस्याओं को स्वयं हल कर लेने में समर्थ एक कल्याणकारी और प्रबल लोकमत स्थापित करने में समय लगता है, - काफी लम्बा समय लगता है, और तब तक हमें प्रतीक्षा करनी होगी। अतएव सामाजिक सुधार की सम्पूर्ण समस्या यह रूप लेती है : कहाँ हैं वे लोग, जो सुधार चाहते हैं ? पहले उन्हें तैयार करो ! सुधार चाहने वाले लोग हैं कहाँ ? जन-साधारण कहाँ हैं ?...... राष्ट्र में आज प्रगति क्यों नहीं है ? वह क्यों जड़भावापन्न है ? पहले राष्ट्र को शिक्षित करो, आम जनता की अपनी निजी ' ग्राम-सभा ' आदि विधायिक संस्थाओं ( Legislative Body ) को गठित करो, फ़िर तो कानून आप ही आप आ जायेंगे। जिस नई शक्ति से, जिन यथार्थ शिक्षित मनुष्यों की सम्मति से नई व्यवस्था गठित होगी, वह लोक-शक्ति कहाँ है ? पहले उस लोकशक्ति को संगठित करो।......सुधार करने के लिए हमें समस्याओं के भीतर, उसकी जड़ तक पहुँचना होता है। इसी को मैं आमूल-सुधार कहता हूँ। आग जड़ में लगाओ और उसे क्रमशः ऊपर उठने दो एवं एक ' अखंड-भारतीय ' राष्ट्र संगठित करो।... अतएव समाज सुधार के लिए प्रथम कर्तव्य है, लोगों को यथार्थ शिक्षा में प्रशिक्षित करना। और जब तक यह कार्य सम्पन्न नहीं होता, तब तक प्रतीक्षा करनी होगी।" (वि० सा० ख० ५ :१११) 
उपरोक्त कथन से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि अल्पसंख्यक (मुट्ठी भर) शक्तिमान व्यक्ति, इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर एक भारी-भरकम संविधान कि रचना करके , भारत को ' प्रजातान्त्रिक गणराज्य ' घोषित कर दें, तथा कुछ वर्षों के अन्तराल पर, पंचायत स्तर से शुरू करके अनेक स्तरों पर बार-बार निर्वाचन का प्रहसन करते रहें, तो उतने भर से ही भारत में 'यथार्थ गणतंत्र ' को प्रतिष्ठित कर देने का दावा नहीं किया जा सकता।
इसके लिए हमे देश में एक ऐसी 'शिक्षा व्यवस्था 'को प्रतिष्ठित करना होगा, जिससे जन साधारण की भीतर की शक्ति (आत्मश्रद्धा ) जाग्रत हो जाय, उनमें विवेक-विचार पूर्वक कार्य करने की क्षमता उत्पन्न हो, सामाजिक चेतना में वृद्धि हो, जिससे सभी देशवासी एक-दुसरे के सुख-दुःख में भागी बनना सिखें । साक्षरता दर में वृद्धि अवश्य होनी चाहिए , किन्तु यह भी समझना चाहिए कि केवल साक्षर बन जाने से ही कोई यथार्थ शिक्षित मनुष्य नहीं बन जाता है। साक्षरता के साथ यदि ईमानदार मनुष्य का निर्माण भी नहीं किया गया तो साक्षर का उल्टा राक्षस भी बन सकता है। (असाक्षर व्यक्ति को 50/= देकर 100/= पर ठप्पा लगवाने वाला सरकारी कर्मचारी क्या ' साक्षर-राक्षस ' नहीं होता ? ) शिक्षा-व्यवथा ऐसी हो जिससे आम जनता अपनी समस्याओं का निराकरण स्वयं करने कि योग्यता अर्जित कर लें। क्योकि बिना योग्यता अर्जित किए ही अधिकार प्राप्त करने से , उसका सद्व्यवहार करना कभी सम्भव नहीं हो सकता।
अतः सर्व स्तर पर आम जनता की राजनैतिक -शक्ति में वृद्धि करने के पहले , "यथार्थ -शिक्षा " को सर्व-सुलभ बनाने की आवश्यकता थी। वैसी शिक्षा व्यवस्था नहीं प्रतिष्ठित करने के कारण देश का महा अकल्याण हो चुका है। तथा उच्च-शिक्षित कहे जाने वाले मनुष्यों में देशवासियों की 'निःस्वार्थ -सेवा 'करने की भावना के स्थान पर 'स्वार्थान्ध -राजनीती ' ने अपना स्थान बना लिया है। 
यदि इस अवस्था से देश को बचाना चाहते हों, तो नई पीढी के मन में 'निः स्वार्थपरता' का बीज वपन करना अत्यन्त आवश्यक कार्य है। देश के समस्त तरुणों को सूदृढ़ -चरित्र , प्रदीप्त बुद्धि, और अपने देशवासियों के प्रतितीव्र सहानुभूति के आदर्श को जीवन में धारण करने के लिए- जाग्रत करना होगा। राजनीती के गन्दे खेल से दुर रहते हुए , नीरव साधना कर के अनेकों युवाओं का चरित्र या जीवन गठन हो जाने के बाद ही जनसाधारण के पासयथार्थ शिक्षा का आलोक पहुँचाया जा सकता है, उन्हें जगाया जा सकता है।
  जिस दिन ' विराट की योजना ' के प्रयास से पर्याप्त संख्या में ' ब्रह्मविद ' -युवाओं का निर्माण कर लिया जायेगा, जो चरित्र-निर्माण आन्दोलन के मार्गदर्शक नेता बनकर भारत की साधारण ग्रामीण जनता के बीच यथार्थ शिक्षा के आलोक को फैलादेने में समर्थ होंगे।  उसी विशेष दिन की प्रतीक्षा में स्वामी विवेकानन्द ने एक कविता लिखी थी जिसका शीर्षक था- " To the Fourth of July ", उसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है-
" तुम्ही सोचो, संसार ने तुम्हारी कितनी प्रतीक्षा की ?
कितना खोजा तुम्हें,
....कुछ ने घर छोड़े,मित्रों का प्यार खोया,
स्वयं को निर्वासित किया,
निर्जन महासागरों, सुनसान जंगलों में कितना भटके,
लेकिन, वह दिन भी आया-जब संघर्ष फले,
पूजा,श्रद्धा और बलिदान पूर्ण हुए,
अंगीकृत हुए- तुमने अनुग्रह किया,
और समस्त मानवता पर मुक्ति-सूर्य का शुभ्र आलोक प्रतिफलित हुआ !"



( अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की द्विभाषी मासिक संवाद पत्रिका " विवेक-जीवन " के मई २००९ के अंक में महामण्डल के अध्यक्ष (परम-पूज्य नवनी दा) श्री नवनिहरण मुखोपाध्याय द्वारा बंगला भाषा में लिखित सम्पादकीय -" छड़ावार तरे मुक्तिर आलोक " का हिन्दी अनुवाद झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवामहामंडल(झारखण्ड) के हिन्दी प्रकाशन विभाग द्वारा प्रस्तुत किया गया। )

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