Sunday, April 12, 2009

महामण्डल का आदर्श, उद्देश्य और कार्यक्रम !


 धरती पर सत्ययुग लाने की समरनीति है -' चरैवेती,चरैवेति'!  
संक्षिप्त परिचय : परम राष्ट्रभक्त स्वामी विवेकानन्द ने १२ वर्षों के अपने दुःसाध्य परिव्राजक जीवन में,कश्मीर से कन्याकुमारी तक भ्रमण करते हुए तबके "अखण्ड भारत" को अत्यन्त करीब से देखा था। तथा उन्हों ने ह्रदय से यह अनुभव किया था, कि देवताओं और ऋषियों कि करोड़ो संतानें आज पशुतुल्य जीवन जीने को बाध्य हैं! यहाँ लाखों लोग भूख से मर जाते हैं और शताब्दियों से मरते आ रहे हैं। अज्ञान के काले बादल ने पूरे भारतवर्ष को ढांक लिया है। उन्होंने अनुभव किया था कि मेरे ही रक्त-मांसमय देह स्वरूप मेरे देशवासी दिन पर दिन अज्ञान के अंधकार में डूबते चले जा रहे हैं ! 
यथार्थ शिक्षा के आभाव ने इन्हें शारीरिक,मानसिक और आध्यात्मिक रूप से दुर्बल बना दिया है। सम्पूर्ण भारतवर्ष एक ओर "घोर- भौतिकवाद" तो दूसरी ओर इसीके प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न "घोर-रूढिवाद" जैसे दो विपरीत ध्रुवों पर केंद्रित हो गया है। भारत कि इस दुर्दशा ने उन्हें विह्वल कर दिया। इस असीम वेदना ने उनके ह्रदय में करुणा का संचार किया उन्होंने इसकी अवनति के मूल कारण को ढूंढ़ निकला: वह कारण था -'आत्मश्रद्धा का विस्मरण'। 

आवश्यकता सच्चे अर्थों में महान मनुष्यों की है। इसीलीये उन्हों ने सिंहनाद किया था- " मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिये !" शेष सबकुछ अपने आप ठीक हो जायगा। आवश्यकता है, ' वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धासम्पन्न, दृढ़-विश्वासी, निष्कपट - नवयुवकों की।'आवश्यकता है- ' चरित्र ' की और ' इच्छा शक्ति ' को सबल बनाने की।
स्वामी विवेकानन्द का यह मानना था कि भारत का कल्याण करने के लिये सर्वप्रथम युवाओं और तरुणों को मनुष्य के तीन मौलिक अंग (components 3-H's ) को उन्नत बनाने का प्रशिक्षण देना आवश्यक है। अर्थात उन्हें अपनी शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति तथा आत्मिक शक्ति को विकसित करने की शिक्षा-पद्धति से परिचित करवाना होगा। जिसे वे क्रमशः हाथ (Hand), मस्तिष्क (Head) और ह्रदय (Heart) के विकास की शिक्षा-पद्धति कहते थे। अतः महामण्डल का मुख्य कार्य प्रत्येक युवा में अंतर्निहित इन '3H' की शक्तियों को जाग्रत कर उन्हें अभिव्यक्त करने की शिक्षापद्धति को भारत के गाँव-गाँव तक फैला देना है। विशेषतः युवा वर्ग में स्वामी विवेकानंद के मनुष्य निर्माणकारी तथा चरित्र निर्माण के आदर्शों में सन्निहित मूल्यों का प्रचार-प्रसार  करना महामण्डल का लक्ष्य है । 
स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त भारत का पुनर्निमाण-मन्त्र है : "Be and Make !  अर्थात तुम स्वयं 
' मनुष्य बनो और दूसरों को भी मनुष्य बनने' में सहायता करो ! स्वयं मनुष्य बनने, तथा दूसरों को मनुष्य बनाने या चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया- को सम्पूर्ण भारतवर्ष में साथ-साथ फैला देना होगा।ताकि देश में एक बेहतर व्यवस्था (भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था ) कायम हो सके।
स्वामी विवेकानन्द के नाम से जुड़े समस्त युवा-संगठनों के 'सम्मिलित प्रयास' के द्वारा युवकों को  भारत निर्माण सूत्र -'BE AND MAKE' के प्रति सजग कर, उनमें स्वयं के प्रति ' श्रद्धा- भाव ' को जाग्रत करना तथा 'आत्म-अनुशासन' की भावना एवं 'सामाजिक दायित्व' के निर्वहन की चेतना को प्रतिष्ठित करना महामण्डल का आदर्श है। 
अतः महामण्डल के समस्त कार्यक्रम युवाओं और तरुणों के इन तीनो शक्तियों ( बाहू-बल, बुद्धि-बल और आत्म-बल ) की समुचित ' उन्नति एवं अभिव्यक्ति' को ध्यान में रखते हुए संचालित किये जाते हैं।  
महामण्डल युवाओं और तरुणों में इन तीनों, शारीरिक-मानसिक और आत्मिक शक्तियों के समुचित विकास के लिए "युवा पाठ-चक्र" (Youth Study Circle) तथा "युवा प्रशिक्षण शिविर" (Youth Training Camp) आदि विभिन्न कार्यक्रमों का संचालन करता है। महामण्डल द्वारा आयोजित  (१,२,३,६ दिवसीय) प्रत्येक युवा प्रशिक्षण-शिविर का लक्ष्य होता है, " युवा वर्ग में राष्ट्र-निर्माण के लिए  'निःस्वार्थ-सेवा' की भावना को जाग्रत करा कर युवाशक्ति  का अनुशासित सदुपयोग करना।" 
स्वामी विवेकानन्द जी के ऐसे ही विचारों से प्रेरणा लेकर, २५ अक्टूबर १९६७ ई० में 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामंडल' की स्थापना कलकत्ते में हुई। आज देश के बारह राज्यों में इसकी तीन सौ से भी अधिक शाखाएं हैं। इसके सदस्यों को न तो गृह त्याग करना है,न अपना अध्यन ही छोड़ना है, और न अपने दैनंदिन जीवन के अन्य दायित्वों का ही त्याग करना है। उन्हें केवल अपनी अतिरिक्त शक्ति,समय और यदि सम्भव हो सके तो कुछ धन देना है। महामण्डल में धर्म, जाती, संप्रदाय आदि के आधार पर, मनुष्यों में कोई भेद-भाव नहीं किया जाता है
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " मनुष्य- निर्माण ही मेरे जीवन का व्रत है, ...ज्यों ज्यों मेरी उम्र बढ़ती जा रही है, मुझे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि- सबकुछ 'पौरुष'में अर्थात प्रयत्न करने में ही अन्तर्निहित है ! यही मेरा नया धर्म-सिद्धान्त (सुसमाचार) है! "  एवं स्वामीजी के सपनों का नया भारत गढ़ना महामण्डल का व्रत है।"
अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल की आस्था:-  
* "कोई भी राष्ट्र इसलिए महान या अच्छा नहीं होता कि उसकी पार्लियामेन्ट ने ' यह ' या ' वह ' (लोक-पाल बिल आदि ) बिल पास कर दिया है, बल्कि वह इसलिए महान या अच्छा होता कि उस राष्ट्र के नागरिक महान और अच्छे (अर्थात चरित्रवान ) हैं।"
* "संसार चाहता है चरित्र ! संसार को आज ऐसे लोगों कि आवश्यकता है जिनके ह्रदय में निःस्वार्थ प्रेम प्रज्ज्वलित हो रहा हो; उस प्रेम से निसृत प्रत्येक शब्द का प्रभाव बज्रवत पड़ेगा ! "
* सर्वोत्तम शक्ति, युवा शक्ति है- आज के युवा ही हमारे लिए कल की आशायें हैं। इस शक्ति का सदुपयोग करने के लिए सर्वोत्तम कार्य युवा वर्ग के बीच कार्य करना है। 
*सफलता का सम्पूर्ण रहस्य "संगठन" में है, शक्ति संचय में है और इच्छाशक्ति के समन्वय में है। इसी लिए संघ बद्ध हो कर आगे बढो! सम्पूर्ण मानव-जाति में एकत्व की भावना को स्थापित करने वाला 'संघ-मंत्र' इस प्रकार है :-

संगच्ध्वं संग्वदध्वं संग वो मनांसि जानताम् ।
देवा   भागं यथा   पूर्वे   संजानाना उपासते ।।

समानो मन्त्रः समितिः समानी ।
समानं मनः सः चित्त्मेषाम ।।

समानं मन्त्रः अभिम्न्त्रये वः ।
समानेन वो हविषा जुहोमि ।।

समानी व् आकुतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ।। 
                                                                                    (ऋग्वेद :१०/१९१/२-४ )

हिन्दी भाव

एक पथ में चलेंगे ,एक बात बोलेंगे
 हम सबके मन को एक भाव से गढ़ेंगे ।।

देव गण जैसे बाँट हवि लेते हैं |
 हम सब सब कुछ बाँट कर ही लेंगे ।। 

याचना हमारी हो एक अंतःकरण एक हो|
 हमारे विचार में सब जीव एक हैं!

एक्य विचार के मन्त्र को गा कर
देवगण तुम्हें हम आहुति प्रदान करेंगे ||

हमारे संकल्प समान, ह्रदय भी समान
भावनाओं को एक करके परम ऐक्य पायेंगे |  
एक पथ में चलेंगे, एक बात बोलेंगे....... 


 - अर्थात हम अपने सारे निर्णय एक मन हो कर ही करेंगे ,क्योंकि देवता लोग एक मन रहने के कारण ही असुरों पर विजय प्राप्त कर सके थे । अर्थात 'एक मन' बन जाना ही समाज-गठन का रहस्य है ......"
*सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है - "उत्तम चरित्र" ! इसीलिए हमारा सर्वोच्च कर्तव्य है  - " अपने चरित्र का निर्माण" " अपना चरित्र-कमल पूर्णरूपेण खिलने दो "- उत्तम परिणाम अवश्य निकलेंगे।

*जब हमारे देश में सच्चे अर्थों में 'मनुष्य' ( चरित्रवान नागरिक ) तैयार हो जायेंगे, तो अपने देश से आकाल
-बाढ़ आदि दैवी विपत्तियों तथा सर्वोपरि ' भ्रष्टाचार ' को दूर करने में -कितना समय लगेगा ?

*हमलोग यदि भारत का सचमुच कल्याण करना चाहते हों, तो हमें " श्री रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा" में जीवन-गठन एवं चरित्र-निर्माण करने वाली "शिक्षा" को ( या महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यासों को) अपनाना ही पड़ेगा ! हम लोगों ने चाहे किसी भी जाति या धर्म में जन्म क्यों न लिया हो, प्रत्येक भारत-वासी को (अगड़ा-पिछड़ा, दलित-महादलित, चन्द्रवँशी (गुड्ड़ू) -यदुवंशी (कुंदन) , हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई-बौद्ध या जैन की भेद-बुद्धि से पहले) स्वयं ब्रह्मविद मनुष्य (चरित्रवान -मनुष्य, इंसान,मनोवैज्ञानिक) बनना होगा, और दूसरों को भी अपने यथार्थ स्वरूप को जानकर यथार्थ मनुष्य (ब्रह्मविद-मनुष्य) बनने में सहायता करनी होगी ! 
इन्हीं सब बातों को- महामण्डल के आदर्श,उद्देश्य और कार्यक्रम को, महामण्डल के प्रतीक-चिन्ह एवं ध्वज, संघ-मन्त्र, स्वदेश-मन्त्र तथा महामण्डल-जयघोष आदि के द्वारा बहुत सूक्ष्म रूप में व्यक्त किया गया है।   

  • महामण्डल का उद्देश्य: भारत का कल्याण !
  • भारत कल्याण का उपाय: चरित्र-निर्माण !
  • महामण्डल के आदर्श: चिरयुवा  स्वामी विवेकानन्द !
  • महामण्डल का 'आदर्श-वाक्य' (Motto): " Be and Make -मनुष्य बनो और बनाओ !" 
  • महामण्डल  चरित्र-निर्माण आन्दोलन का अभियान मन्त्र : " चरैवेति चरैवेति" 


[ महामण्डल का अभियान मन्त्र, समरनीति-  "चरैवेति चरैवेति" ही धरती पर सत्ययुग लाने की योजना  है ! इसीलिये  जगतगुरु श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द जैसे मानवजाति के मार्दर्शक नेता का अनुसरण, केवल उनकी स्तुति करने या आरती गाने से की जा सकती ! बल्कि ऐसे युग-नेताओं का अनुसरण अपने जीवन को भी उनके साँचे में ढालकर गढ़ने का अभ्यास करने से किया जा सकता है।
१८९५ में अपने गुरुभाई शशि, (स्वामी रामकृष्णानन्द) को लिखित एक पत्र में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-
" रामकृष्ण अवतार की जन्मतिथि से सत्य युग का आरम्भ हुआ है ! " [फ्रॉम दी डेट दैट दी रामकृष्ण इन्कारनेशन वाज बॉर्न, हैज स्प्रंग दी सत्य-युग (गोल्डन ऐज)-'रामकृष्णवतारेर जन्मदिन होइतेइ सत्ययुगोत्पत्ति होइयाछे' (রামকৃষ্ণবতারের জন্মদিন হইতেই সত্যযুগোত্পত্তি হইয়াছে)] 'सत्ययुग का आरम्भ हुआ है' - उनके इस कथन का तात्पर्य क्या है? जैसे ऐतरेय ब्राह्मण कहता है-
   कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
 उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् ।
चरैवेति चरैवेति॥
[http://vivek-jivan.blogspot.in/2016/04/new-youth-movement-20.html]


प्रभु- मैं गुलाम, मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा। २ बार 
तू दीवान तू दीवान, तू दीवान मेरा ।।
मैं गुलाम ........ 
दो रोटी और एक लंगोटी, तुझसे ही मैं  पाया,
भगतिभाव और दे,२ शरण मैं  तेरे आया,
मैं गुलाम मैं गुलाम तेरा .......
तू दीवान मेहरबान, नाम तेरा बढया,
दास कबीर शरण में मैं आया, तूने ही सबको पार लगाया।।
मैं गुलाम मैं गुलाम तेरा, तू दिवान तू दिवान ......... 
[lyrics source :_http://vivek-jivan.blogspot.in/2012/03/8.html]
प्रभु - मैं गुलाम, मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा ।
तू दीवान तू दीवान, तू दीवान मेरा ।। 

रूप नहीं, रंग नही, नही बरन छाया । 
निराकार निरगुन तूही रघुराया ॥१॥ 

दो रोटी, एक लंगोटी द्वार तेरे पावूं ।
काम क्रोध छोड़ कर हरीगुन गाऊं ॥

मेहरबान मेहरबान मेहेर करो मेरी ।
दास कबीर चरन खडा नजर देख तेरी ॥

प्रभु - मैं गुलाम मैं गुलाम  मैं गुलाम तेरा  (२)
तू दीवान तू दीवान, तू दीवान मेरा ।। 

 उन मार्गदर्शक नेताओं का अनुसरण अपने हृदय की वक्रता सीधी करने  (या हृदय को 'वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि बनाने ) का सहज उपाय है महामण्डल के वार्षिक युवा-प्रशिक्षण शिविर ! महामण्डल में गुरु कोई व्यक्ति नहीं होता, यह 'संगठन' ही हमारा गुरु है,जो हमें श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में " यथार्थ मनुष्य (ब्रह्मविद नेता) बनने और बनाने" " Be and Make" का प्रशिक्षण देता है। क्योंकि मानवजाति के नेता युगाचार्य श्रीरामकृष्ण एवम उनसे शिक्षा देने का चपरास प्राप्त नेता 'स्वामी विवेकानन्द' का अनुसरण ; महामण्डल द्वारा निर्देशित " विवेक-प्रयोग सहित  ५ अभ्यास को स्वयं करते हुए,अपने आस-पास रहने वाले ५ भाइयों की निःस्वार्थ सेवा -मनुष्य बनो और बनाओ!" का अभ्यास करने में सहायता देकर ही किया जा सकता है। ]  
महामण्डल की प्रमुख विशेषतायें:
* युवा लोग जहाँ कहीं भी एकसाथ एकत्र होते हैं ,महामण्डल वहीं पहुँच कर उनके साथ कार्य करता है। युवाओं के लिए तथा उनके मन पर कार्य करता है।उनमे आत्म-विश्वास जगाता है तथा अपने आप पर श्रद्धा करना सिखाता है। युवाओं को एक विधेयात्मक जीवन-दृष्टि और जीवन-लक्ष्य प्रदान करता है।
* महामण्डल सम्पूर्ण भारत के युवाओं को उन्हीं की भाषा में 'आत्म-विकास' और 'व्यक्तित्व-निर्माण' या ' चरित्र-गठन ' की व्यवहारिक पद्धति से  अवगत कराता है।
* वे युवा, जो स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में विश्वास रखते हैं, मनुष्य-जाती के प्रति उनके अमर संदेशों में तथा राष्ट्र के नाम उनके आत्मझंकिर्त कर देने वाली उनकी पुकार में आस्था रखते हैं; महामण्डल वैसे युवाओं का आह्वान करता है-कि वे महामण्डल से जुड़ कर " मनुष्य-निर्माणऔर चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन " को भारत के गाँव-गाँव तक ले जा कर , भारत का पुनर्निमाण करने के महान उद्देश्य में जुट जाएँ।

* स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-" मेरी आशा,मेरा विश्वास नविन पीढ़ी के नवयुवकों पर है। उन्हीं में से मैं अपने कार्यकर्ताओं का संग्रह करूँगा, वे सिंहविक्रम से देश कि यथार्थ उन्नति सम्बन्धी सारी समस्याओं का समाधान करेंगे।" .....वे एक केन्द्र से दुसरे केन्द्र का विस्तार करेंगे ,और इस प्रकार हम समग्र भारत में फ़ैल जायेंगे।

* " वत्स! मैं चाहता हूँ,'लोहे जैसी मांसपेशियाँ' और 'फौलाद के स्नायु' जिनके अन्दर ऐसे मन का वास हो जो ' वज्र ' के उपादानों (महर्षि दधिची के त्याग और सेवा की भावना) से गठित हो।...तुम्हारे अन्दर पूर्ण शक्ति निहित है ! तुम सब कुछ करने में समर्थ हो ! इस शक्ति को पहिचानो ! 

* मत समझो कि तुम निर्बल हो, तुम बिना किसी कि सहायता लिए सब कुछ करने में समर्थ हो ! सारी शक्ति तो तुम्हारे ही अन्दर विद्यमान है ! उठो ! और अपना अन्तस्थ ब्रह्मभाव अभिवयक्त करो !"
* स्वामी विवेकानन्द का महावाक्य - ' बनो और बनाओ !', " Be and Make " को चरित्र-निर्माण एवं मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन का रूप देकर, सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैला देने के लिये- " संघबद्ध हो कर आगे बढो!" 
महामण्डल का जय-घोष --
* महामण्डल केतन करो दुर्जय ; निवेदिता बज्र हो अक्षय !
* चरैवेति चरैवेति हुँकारों स्माकम, विवेकानन्द नेता नः विभीमः कस्माद वयं ? २ 
* मिलजुलकर एक साथ रहेंगे, और बढ़ेगी एकता ! उद्देश्य हमारा देश की सेवा !  विवेकानन्द हमारे नेता ! विवेकानन्द हमारे नेता ! विवेकानन्द हमारे नेता !!
*स्लीप नो मोर, एराईज अवेक, कॉल स्वामी जी बी ऐंड मेक ! ३ 
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1 comment:

Dr. Munish Raizada said...

बहुत अच्छा कार्य है.